अंग 472

अंग
472
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आसा-दी-वार का हिस्सा। पूरी 24 पउड़ियों की commentary /asa-di-vaar/ पर है।
ਨੀਲ ਵਸਤ੍ਰ ਪਹਿਰਿ ਹੋਵਹਿ ਪਰਵਾਣੁ ॥
ਮਲੇਛ ਧਾਨੁ ਲੇ ਪੂਜਹਿ ਪੁਰਾਣੁ ॥
ਅਭਾਖਿਆ ਕਾ ਕੁਠਾ ਬਕਰਾ ਖਾਣਾ ॥
ਚਉਕੇ ਉਪਰਿ ਕਿਸੈ ਨ ਜਾਣਾ ॥
ਦੇ ਕੈ ਚਉਕਾ ਕਢੀ ਕਾਰ ॥
ਉਪਰਿ ਆਇ ਬੈਠੇ ਕੂੜਿਆਰ ॥
ਮਤੁ ਭਿਟੈ ਵੇ ਮਤੁ ਭਿਟੈ ॥ ਇਹੁ ਅੰਨੁ ਅਸਾਡਾ ਫਿਟੈ ॥
ਤਨਿ ਫਿਟੈ ਫੇੜ ਕਰੇਨਿ ॥
ਮਨਿ ਜੂਠੈ ਚੁਲੀ ਭਰੇਨਿ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸਚੁ ਧਿਆਈਐ ॥
ਸੁਚਿ ਹੋਵੈ ਤਾ ਸਚੁ ਪਾਈਐ ॥੨॥
नील वसत्र पहिरि होवहि परवाणु ॥
मलेछ धानु ले पूजहि पुराणु ॥
अभाखिआ का कुठा बकरा खाणा ॥
चउके उपरि किसै न जाणा ॥
दे कै चउका कढी कार ॥
उपरि आइ बैठे कूड़िआर ॥
मतु भिटै वे मतु भिटै ॥ इहु अंनु असाडा फिटै ॥
तनि फिटै फेड़ करेनि ॥
मनि जूठै चुली भरेनि ॥
कहु नानक सचु धिआईऐ ॥
सुचि होवै ता सचु पाईऐ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: नीले रंग के कपड़े पहन के (तुर्क हाकिमों के पास जाते हैं।तभी) उनके पास जाने की आज्ञा मिलती है। (जिन्हें) मलेछ (कहते हैं।उनसे) ही रोजी लेते हैं।और (फिर भी) पुराण को पूजते हैं (भाव।फिर भी यही समझते हैं कि हम पुराण के मुताबिक चल रहे हैं)। (यहीं बस नहीं) खुराक भी इनकी वह बकरा है जो कलमा पढ़ के हलाल किया हुआ है (भाव।जो मुसलमानों के हाथों का तैयार किया हुआ है।पर कहते हैं कि) हमारे चौके पे कोई और मनुष्य ना आ चढ़े। चौका बना के (चारों तरफ) लकीर खींचते हैं। (पर इस) चौके में वह मनुष्य आ बैठते हैं जो खुद झूठे हैं। (औरों को कहते हैं, हमारे चौके के पास ना आना) कहीं चौका अपवित्र ना हो जाए और हमारा अन्न खराब ना हो जाए; (पर खुद ये लोग) अपवित्र शरीर से बुरे कर्म करते हैं और झूठे मन से ही (भाव।मन तो अंदर से मलीन है)चुल्लियां करते हैं। हे नानक ! कह।प्रभू का ध्यान करना चाहिए। तभी स्वच्छता-पवित्रता हो सकती है अगर सच्चा प्रभू मिल जाए। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਚਿਤੈ ਅੰਦਰਿ ਸਭੁ ਕੋ ਵੇਖਿ ਨਦਰੀ ਹੇਠਿ ਚਲਾਇਦਾ ॥
ਆਪੇ ਦੇ ਵਡਿਆਈਆ ਆਪੇ ਹੀ ਕਰਮ ਕਰਾਇਦਾ ॥
ਵਡਹੁ ਵਡਾ ਵਡ ਮੇਦਨੀ ਸਿਰੇ ਸਿਰਿ ਧੰਧੈ ਲਾਇਦਾ ॥
ਨਦਰਿ ਉਪਠੀ ਜੇ ਕਰੇ ਸੁਲਤਾਨਾ ਘਾਹੁ ਕਰਾਇਦਾ ॥
ਦਰਿ ਮੰਗਨਿ ਭਿਖ ਨ ਪਾਇਦਾ ॥੧੬॥
पउड़ी ॥
चितै अंदरि सभु को वेखि नदरी हेठि चलाइदा ॥
आपे दे वडिआईआ आपे ही करम कराइदा ॥
वडहु वडा वड मेदनी सिरे सिरि धंधै लाइदा ॥
नदरि उपठी जे करे सुलताना घाहु कराइदा ॥
दरि मंगनि भिख न पाइदा ॥१६॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ प्रभू हरेक जीव को अपने ध्यान में रखता है।और हरेक को अपनी नजर में रख के काम में लगाए रखता है। खुद ही (जीवों को) महानताएं बख्शता है और खुद ही उन्हें काम में लगाता है। प्रभू बड़ों से बड़ा है (भाव।सबसे बड़ा है)।(उसकी रची हुई) सृष्टि भी बेअंत है।(इतनी बेअंत सृष्टि होते हुए भी) हरेक जीव को प्रभू धांधों में जोड़े रखता है। अगर कभी दुनिया के बादशाहों पर भी गुस्से की नजर कर दे।तो उन्हें भी खर-पतवार से हल्का कर देता है (इतना हल्का कि) उन्हें मांगने पर भीख भी नहीं मिलती। 16।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੧ ॥
ਜੇ ਮੋਹਾਕਾ ਘਰੁ ਮੁਹੈ ਘਰੁ ਮੁਹਿ ਪਿਤਰੀ ਦੇਇ ॥
ਅਗੈ ਵਸਤੁ ਸਿਞਾਣੀਐ ਪਿਤਰੀ ਚੋਰ ਕਰੇਇ ॥
ਵਢੀਅਹਿ ਹਥ ਦਲਾਲ ਕੇ ਮੁਸਫੀ ਏਹ ਕਰੇਇ ॥
ਨਾਨਕ ਅਗੈ ਸੋ ਮਿਲੈ ਜਿ ਖਟੇ ਘਾਲੇ ਦੇਇ ॥੧॥
सलोकु मः १ ॥
जे मोहाका घरु मुहै घरु मुहि पितरी देइ ॥
अगै वसतु सिञाणीऐ पितरी चोर करेइ ॥
वढीअहि हथ दलाल के मुसफी एह करेइ ॥
नानक अगै सो मिलै जि खटे घाले देइ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला १॥ अगर कोई ठॅग पराया घर ठॅगे।पराए घर को ठॅग के (वह पदार्थ) अपने पित्रों के नमित्त दे। तो (अगर सचमुच पिछलों का दिया पहुँचता है तो) परलोक में वह पदार्थ पहचान लिया जाता है।इस तरह मनुष्य अपने पित्रों को भी चोर बनाता है (क्योंकि उनके पास चोरी का माल निकल आता है)। (आगे) प्रभू ये न्याय करता है कि (ये चोरी का माल पहुँचाने वाले ब्राहमण) दलाल के हाथ काटे जाते हैं। हे नानक ! (किसी का पहुँचाया आगे क्या मिलना है। ) आगे तो मनुष्य को वही कुछ मिलता है जो कमाता है और (हाथों से) देता है। 1।
ਮਃ ੧ ॥
ਜਿਉ ਜੋਰੂ ਸਿਰਨਾਵਣੀ ਆਵੈ ਵਾਰੋ ਵਾਰ ॥
ਜੂਠੇ ਜੂਠਾ ਮੁਖਿ ਵਸੈ ਨਿਤ ਨਿਤ ਹੋਇ ਖੁਆਰੁ ॥
ਸੂਚੇ ਏਹਿ ਨ ਆਖੀਅਹਿ ਬਹਨਿ ਜਿ ਪਿੰਡਾ ਧੋਇ ॥
ਸੂਚੇ ਸੇਈ ਨਾਨਕਾ ਜਿਨ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਸੋਇ ॥੨॥
मः १ ॥
जिउ जोरू सिरनावणी आवै वारो वार ॥
जूठे जूठा मुखि वसै नित नित होइ खुआरु ॥
सूचे एहि न आखीअहि बहनि जि पिंडा धोइ ॥
सूचे सेई नानका जिन मनि वसिआ सोइ ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला १॥ जैसे स्त्री को हर महीने माहवारी आती है (और ये अपवित्रता सदा उसके अंदर से ही पैदा हो जाती है)। वैसे ही झूठे मनुष्य के मुंह में सदा झूठ ही रहता है और इस करके वह सदा दुखी ही रहता है। ऐसे मनुष्य स्वच्छ नहीं कहे जाते जो सिर्फ शरीर को ही धो के (अपनी ओर से पवित्र बन के) बैठ जाते हैं। हे नानक ! केवल वही मनुष्य स्वच्छ हैं।सुच्चे हैं जिनके मन में प्रभू बसता है। 2।
ਪਉੜੀ ॥
ਤੁਰੇ ਪਲਾਣੇ ਪਉਣ ਵੇਗ ਹਰ ਰੰਗੀ ਹਰਮ ਸਵਾਰਿਆ ॥
ਕੋਠੇ ਮੰਡਪ ਮਾੜੀਆ ਲਾਇ ਬੈਠੇ ਕਰਿ ਪਾਸਾਰਿਆ ॥
ਚੀਜ ਕਰਨਿ ਮਨਿ ਭਾਵਦੇ ਹਰਿ ਬੁਝਨਿ ਨਾਹੀ ਹਾਰਿਆ ॥
ਕਰਿ ਫੁਰਮਾਇਸਿ ਖਾਇਆ ਵੇਖਿ ਮਹਲਤਿ ਮਰਣੁ ਵਿਸਾਰਿਆ ॥
ਜਰੁ ਆਈ ਜੋਬਨਿ ਹਾਰਿਆ ॥੧੭॥
पउड़ी ॥
तुरे पलाणे पउण वेग हर रंगी हरम सवारिआ ॥
कोठे मंडप माड़ीआ लाइ बैठे करि पासारिआ ॥
चीज करनि मनि भावदे हरि बुझनि नाही हारिआ ॥
करि फुरमाइसि खाइआ वेखि महलति मरणु विसारिआ ॥
जरु आई जोबनि हारिआ ॥१७॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिनके पास काठियों समेत (भाव।सदा तैयार भर तैयार) घोड़े हवा जितनी तेज चाल वाले होते हैं।जो अपने हरमों को कई रंगों से सजाते हैं। जो मनुष्य कोठे-महल-माढ़ियां आदि पसारे पसार के (अहंकारी हुए) बैठे हैं। जो मनुष्य मन-मानियां रंग-रलियां करते हैं।पर प्रभू को नहीं पहचानते।वे अपना मानस जन्म हार बैठते हैं। जो मनुष्य (गरीबों पे) हुकम करके (पदार्थ) खाते हैं (भाव।मौजें करते हैं) और अपने महलों को देख के अपनी मौत को भुला देते हैं। उन जवानी से ठॅगे हुओं को (भाव।जवानी के नशे में मस्त हुए मनुष्यों को) (गफलत में ही।पता ही नहीं चलता कब) बुढ़ापा आ दबोचता है। 17।
ਸਲੋਕੁ ਮਃ ੧ ॥
ਜੇ ਕਰਿ ਸੂਤਕੁ ਮੰਨੀਐ ਸਭ ਤੈ ਸੂਤਕੁ ਹੋਇ ॥
ਗੋਹੇ ਅਤੈ ਲਕੜੀ ਅੰਦਰਿ ਕੀੜਾ ਹੋਇ ॥
ਜੇਤੇ ਦਾਣੇ ਅੰਨ ਕੇ ਜੀਆ ਬਾਝੁ ਨ ਕੋਇ ॥
ਪਹਿਲਾ ਪਾਣੀ ਜੀਉ ਹੈ ਜਿਤੁ ਹਰਿਆ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥
ਸੂਤਕੁ ਕਿਉ ਕਰਿ ਰਖੀਐ ਸੂਤਕੁ ਪਵੈ ਰਸੋਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸੂਤਕੁ ਏਵ ਨ ਉਤਰੈ ਗਿਆਨੁ ਉਤਾਰੇ ਧੋਇ ॥੧॥
सलोकु मः १ ॥
जे करि सूतकु मंनीऐ सभ तै सूतकु होइ ॥
गोहे अतै लकड़ी अंदरि कीड़ा होइ ॥
जेते दाणे अंन के जीआ बाझु न कोइ ॥
पहिला पाणी जीउ है जितु हरिआ सभु कोइ ॥
सूतकु किउ करि रखीऐ सूतकु पवै रसोइ ॥
नानक सूतकु एव न उतरै गिआनु उतारे धोइ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला १॥ अगर सूतक को मान लें (भाव।अगर मान लें कि सूतक का भ्रम रखना चाहिए।तो यह भी याद रखें कि इस तरह के) सूतक तो भरे पड़े हैं; (चूल्हे में जलाए जाने वाले सूखे) गोबर और लकड़ी में भी कीड़े होते हैं (वे भी पैदा होते मरते रहते हैं); अनाज के जितने भी दाने हैं। इनमें से कोई भी दाना जीवन के बगैर नहीं। खुद पानी भी जीव ही है।क्योंकि इसीसे हरेक जीव हरा-भरा (जीवन वाला) रहता है। सूतक कैसे रखा जा सकता है।(भाव।सूतक की रस्म पूरी तौर पर मानना बहुत कठिन है।क्योंकि इस तरह तो हर समय ही) रसोई में सूतक बना रहता है। हे नानक ! इस तरह (भाव।भ्रम में पड़ने से) सूतक (मन से) नहीं उतरता।इसे (प्रभू का) ज्ञान ही धो के उतार सकता है। 1।
ਮਃ ੧ ॥
ਮਨ ਕਾ ਸੂਤਕੁ ਲੋਭੁ ਹੈ ਜਿਹਵਾ ਸੂਤਕੁ ਕੂੜੁ ॥
ਅਖੀ ਸੂਤਕੁ ਵੇਖਣਾ ਪਰ ਤ੍ਰਿਅ ਪਰ ਧਨ ਰੂਪੁ ॥
ਕੰਨੀ ਸੂਤਕੁ ਕੰਨਿ ਪੈ ਲਾਇਤਬਾਰੀ ਖਾਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਹੰਸਾ ਆਦਮੀ ਬਧੇ ਜਮ ਪੁਰਿ ਜਾਹਿ ॥੨॥
मः १ ॥
मन का सूतकु लोभु है जिहवा सूतकु कूड़ु ॥
अखी सूतकु वेखणा पर त्रिअ पर धन रूपु ॥
कंनी सूतकु कंनि पै लाइतबारी खाहि ॥
नानक हंसा आदमी बधे जम पुरि जाहि ॥२॥

हिन्दी अर्थ: महला १॥ मन का सूतक लोभ है (भाव।जिन मनुष्यों के मन में लोभ रूपी सूतक चिपका है);जीभ का सूतक झूठ बोलना है (भाव।जिन मनुष्यों की जीभ को झूठ-रूप सूतक है); (जिन मनुष्यों की) आँखों को पराया धन और पराई सि्त्रयों का रूप देखने का सूतक (चिपका हुआ है); (जिन मनुष्यों के) कान भी सूतक हैं कि कानों से बिफक्र हो के चुगली सुनते हैं; हे नानक ! (ऐसे) मनुष्य (देखने में भले ही) हंसों जैसे (सुंदर) हों (तो भी वह) बंधे हुए नर्क में जाते हैं। 2।
ਮਃ ੧ ॥
ਸਭੋ ਸੂਤਕੁ ਭਰਮੁ ਹੈ ਦੂਜੈ ਲਗੈ ਜਾਇ ॥
ਜੰਮਣੁ ਮਰਣਾ ਹੁਕਮੁ ਹੈ ਭਾਣੈ ਆਵੈ ਜਾਇ ॥
ਖਾਣਾ ਪੀਣਾ ਪਵਿਤ੍ਰੁ ਹੈ ਦਿਤੋਨੁ ਰਿਜਕੁ ਸੰਬਾਹਿ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਨੑੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੁਝਿਆ ਤਿਨੑਾ ਸੂਤਕੁ ਨਾਹਿ ॥੩॥
मः १ ॥
सभो सूतकु भरमु है दूजै लगै जाइ ॥
जंमणु मरणा हुकमु है भाणै आवै जाइ ॥
खाणा पीणा पवित्रु है दितोनु रिजकु संबाहि ॥
नानक जिन॑ी गुरमुखि बुझिआ तिन॑ा सूतकु नाहि ॥३॥

हिन्दी अर्थ: महला १॥ सूतक निरा भ्रम ही है।ये (सूतक रूपी भ्रम) माया में फसे (मनुष्यों को) आ लगता है। (वैसे तो) जीवों का पैदा होना-मरना प्रभू का हुकम है।प्रभू की रजा में ही जीव पैदा होता और मरता है। (पदार्थों का) खाना-पीना भी पवित्र है ( भाव।बुरा नहीं।क्योंकि) प्रभू ने स्वयं इकट्ठा करके जीवों को रिजक दिया है। हे नानक ! जिन गुरमुखों ने ये बात समझ ली है।उन्हें सूतक नहीं लगता। 3।

संदर्भ: यह अंग 472 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Noida के office-tower की 15वीं मंज़िल से शाम का Delhi-view।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 50 पंक्तियों का है, 8 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 472” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 473 →, पीछे का: ← अंग 471

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।