नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: नीले रंग के कपड़े पहन के (तुर्क हाकिमों के पास जाते हैं।तभी) उनके पास जाने की आज्ञा मिलती है। (जिन्हें) मलेछ (कहते हैं।उनसे) ही रोजी लेते हैं।और (फिर भी) पुराण को पूजते हैं (भाव।फिर भी यही समझते हैं कि हम पुराण के मुताबिक चल रहे हैं)। (यहीं बस नहीं) खुराक भी इनकी वह बकरा है जो कलमा पढ़ के हलाल किया हुआ है (भाव।जो मुसलमानों के हाथों का तैयार किया हुआ है।पर कहते हैं कि) हमारे चौके पे कोई और मनुष्य ना आ चढ़े। चौका बना के (चारों तरफ) लकीर खींचते हैं। (पर इस) चौके में वह मनुष्य आ बैठते हैं जो खुद झूठे हैं। (औरों को कहते हैं, हमारे चौके के पास ना आना) कहीं चौका अपवित्र ना हो जाए और हमारा अन्न खराब ना हो जाए; (पर खुद ये लोग) अपवित्र शरीर से बुरे कर्म करते हैं और झूठे मन से ही (भाव।मन तो अंदर से मलीन है)चुल्लियां करते हैं। हे नानक ! कह।प्रभू का ध्यान करना चाहिए। तभी स्वच्छता-पवित्रता हैं सकती है अगर सच्चा प्रभू मिल जाए। 2।
पउड़ी ॥ चितै अंदरि सभु को वेखि नदरी हेठि चलाइदा ॥ आपे दे वडिआईआ आपे ही करम कराइदा ॥ वडहु वडा वड मेदनी सिरे सिरि धंधै लाइदा ॥ नदरि उपठी जे करे सुलताना घाहु कराइदा ॥ दरि मंगनि भिख न पाइदा ॥16॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ प्रभू हरेक जीव को अपने ध्यान में रखता है।और हरेक को अपनी नजर में रख के काम में लगाए रखता है। खुद ही (जीवों को) महानताएं बख्शता है और खुद ही उन्हें काम में लगाता है। प्रभू बड़ों से बड़ा है (भाव।सबसे बड़ा है)।(उसकी रची हुई) सृष्टि भी बेअंत है।(इतनी बेअंत सृष्टि होते हुए भी) हरेक जीव को प्रभू धांधों में जोड़े रखता है। अगर कभी दुनिया के बादशाहों पर भी गुस्से की नजर कर दे।तो उन्हें भी खर-पतवार से हल्का कर देता है (इतना हल्का कि) उन्हें मांगने पर भीख भी नहीं मिलती। 16।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ अगर कोई ठॅग पराया घर ठॅगे।पराए घर को ठॅग के (वह पदार्थ) अपने पित्रों के नमित्त दे। तो (अगर सचमुच पिछलों का दिया पहुँचता है तो) परलोक में वह पदार्थ पहचान लिया जाता है।इस तरह मनुष्य अपने पित्रों को भी चोर बनाता है (क्योंकि उनके पास चोरी का माल निकल आता है)। (आगे) प्रभू ये न्याय करता है कि (ये चोरी का माल पहुँचाने वाले ब्राहमण) दलाल के हाथ काटे जाते हैं। हे नानक ! (किसी का पहुँचाया आगे क्या मिलना है।) आगे तो मनुष्य को वही कुछ मिलता है जो कमाता है और (हाथों से) देता है। 1।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ जैसे स्त्री को हर महीने माहवारी आती है (और ये अपवित्रता सदा उसके अंदर से ही पैदा हो जाती है)। वैसे ही झूठे मनुष्य के मुंह में सदा झूठ ही रहता है और इस करके वह सदा दुखी ही रहता है। ऐसे मनुष्य स्वच्छ नहीं कहे जाते जो सिर्फ शरीर को ही धो के (अपनी ओर से पवित्र बन के) बैठ जाते हैं। हे नानक ! केवल वही मनुष्य स्वच्छ हैं।सुच्चे हैं जिनके मन में प्रभू बसता है। 2।
पउड़ी ॥ तुरे पलाणे पउण वेग हर रंगी हरम सवारिआ ॥ कोठे मंडप माड़ीआ लाइ बैठे करि पासारिआ ॥ चीज करनि मनि भावदे हरि बुझनि नाही हारिआ ॥ करि फुरमाइसि खाइआ वेखि महलति मरणु विसारिआ ॥ जरु आई जोबनि हारिआ ॥17॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिनके पास काठियों समेत (भाव।सदा तैयार भर तैयार) घोड़े हवा जितनी तेज चाल वाले होते हैं।जो अपने हरमों को कई रंगों से सजाते हैं। जो मनुष्य कोठे-महल-माढ़ियां आदि पसारे पसार के (अहंकारी हुए) बैठे हैं। जो मनुष्य मन-मानियां रंग-रलियां करते हैं।पर प्रभू को नहीं पहचानते।वे अपना मानस जन्म हार बैठते हैं। जो मनुष्य (गरीबों पे) हुकम करके (पदार्थ) खाते हैं (भाव।मौजें करते हैं) और अपने महलों को देख के अपनी मौत को भुला देते हैं। उन जवानी से ठॅगे हुओं को (भाव।जवानी के नशे में मस्त हुए मनुष्यों को) (गफलत में ही।पता ही नहीं चलता कब) बुढ़ापा आ दबोचता है। 17।
सलोकु मः 1 ॥ जे करि सूतकु मंनीऐ सभ तै सूतकु होइ ॥ गोहे अतै लकड़ी अंदरि कीड़ा होइ ॥ जेते दाणे अंन के जीआ बाझु न कोइ ॥ पहिला पाणी जीउ है जितु हरिआ सभु कोइ ॥ सूतकु किउ करि रखीऐ सूतकु पवै रसोइ ॥ नानक सूतकु एव न उतरै गिआनु उतारे धोइ ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ अगर सूतक को मान लें (भाव।अगर मान लें कि सूतक का भ्रम रखना चाहिए।तो यह भी याद रखें कि इस तरह के) सूतक तो भरे पड़े हैं; (चूल्हे में जलाए जाने वाले सूखे) गोबर और लकड़ी में भी कीड़े होते हैं (वे भी पैदा होते मरते रहते हैं); अनाज के जितने भी दाने हैं। इनमें से कोई भी दाना जीवन के बगैर नहीं। खुद पानी भी जीव ही है।क्योंकि इसीसे हरेक जीव हरा-भरा (जीवन वाला) रहता है। सूतक कैसे रखा जा सकता है।(भाव।सूतक की रस्म पूरी तौर पर मानना बहुत कठिन है।क्योंकि इस तरह तो हर समय ही) रसोई में सूतक बना रहता है। हे नानक ! इस तरह (भाव।भ्रम में पड़ने से) सूतक (मन से) नहीं उतरता।इसे (प्रभू का) ज्ञान ही धो के उतार सकता है। 1।
मः 1 ॥ मन का सूतकु लोभु है जिहवा सूतकु कूड़ु ॥ अखी सूतकु वेखणा पर त्रिअ पर धन रूपु ॥ कंनी सूतकु कंनि पै लाइतबारी खाहि ॥ नानक हंसा आदमी बधे जम पुरि जाहि ॥2॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ मन का सूतक लोभ है (भाव।जिन मनुष्यों के मन में लोभ रूपी सूतक चिपका है);जीभ का सूतक झूठ बोलना है (भाव।जिन मनुष्यों की जीभ को झूठ-रूप सूतक है); (जिन मनुष्यों की) आँखों को पराया धन और पराई सि्त्रयों का रूप देखने का सूतक (चिपका हुआ है); (जिन मनुष्यों के) कान भी सूतक हैं कि कानों से बिफक्र हो के चुगली सुनते हैं; हे नानक ! (ऐसे) मनुष्य (देखने में भले ही) हंसों जैसे (सुंदर) हों (तो भी वह) बंधे हुए नर्क में जाते हैं। 2।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ सूतक निरा भ्रम ही है।ये (सूतक रूपी भ्रम) माया में फसे (मनुष्यों को) आ लगता है। (वैसे तो) जीवों का पैदा होना-मरना प्रभू का हुकम है।प्रभू की रजा में ही जीव पैदा होता और मरता है। (पदार्थों का) खाना-पीना भी पवित्र है (भाव।बुरा नहीं।क्योंकि) प्रभू ने स्वयं इकट्ठा करके जीवों को रिजक दिया है। हे नानक ! जिन गुरमुखों ने ये बात समझ ली है।उन्हें सूतक नहीं लगता। 3।
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “नीले रंग के कपड़े पहन के (तुर्क हाकिमों के पास जाते हैं।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।