कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: (बूढ़ा हो के आप अभी भी) आप (और) जीने की आशाएं बना रहा है।(और उधर) यम आपके श्वासों पे निगाह गाड़े बैठा है (आपकी सांसें गिन रहा है) कि कब खत्म हों। हे कबीर ! जगत नट की खेल ही है।(इस खेल में जीतने के लिए) प्रभू की याद का पासा फेंक (प्रभू की याद की खेल खेलो)। 3। 1। 23।
आसा ॥ तनु रैनी मनु पुन रपि करि हउ पाचउ तत बराती ॥ राम राइ सिउ भावरि लैहउ आतम तिह रंगि राती ॥1॥ गाउ गाउ री दुलहनी मंगलचारा ॥ मेरे ग्रिह आए राजा राम भतारा ॥1॥ रहाउ ॥ नाभि कमल महि बेदी रचि ले ब्रहम गिआन उचारा ॥ राम राइ सो दूलहु पाइओ अस बडभाग हमारा ॥2॥ सुरि नर मुनि जन कउतक आए कोटि तेतीस उजानां ॥ कहि कबीर मोहि बिआहि चले है पुरख एक भगवाना ॥3॥2॥24॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: आसा ॥ मैंने अपने शरीर को (अपना मन रंगने के लिए) रंगने वाला बर्तन बनाया है।(भाव।मैं अपने मन को बाहर भटकने से रोकने के लिए शरीर के अंदर ही रख रही हूँ)।मन को मैंने भले गुणों (के रंग) से रंगा है।(इस काम में सहायता करने के लिए) दया-धर्म आदि दैवी गुणों को मैंने मेली (बाराती) बनाया है। अब मैं जगत पति परमात्मा के साथ लावें ले रही हूँ।और मेरी आत्मा उस पति के प्यार में रंगी गई है। 1। हे नई नवेली दुल्हनियो ! (प्रभू-प्रीति में रंगी हुई ज्ञानेन्द्रियो !) आप बारंबार सुहाग के गीत गाओ। (क्योंकि) मेरे (हृदय-) घर में मेरा पति (जगत का) मालिक परमात्मा आया है। 1।रहाउ। सांस-सांस उसकी याद में गुजारने के लिए मैंने (विवाह के लिए) वेदी बना ली है।सतिगुरू का शबद जो प्रभू-पति के साथ जान-पहिचान करवाता है (विवाह का मंत्र) उचारा जा रहा है। मेरे ऐसे भाग्य जागे हैं कि मुझे जगत के मालिक परमात्मा जैसा दूल्हा मिल गया है। 2। प्रभू-चरणों में उड़ाने भरने वाले मेरे सत्संगी मेरे विवाह की मर्यादा करने आए हैं। कबीर कहता है, मुझे अब एक परमात्मा पति ब्याह के ले चला है। 3। 2। 24।
आसा ॥ सासु की दुखी ससुर की पिआरी जेठ के नामि डरउ रे ॥ सखी सहेली ननद गहेली देवर कै बिरहि जरउ रे ॥1॥ मेरी मति बउरी मै रामु बिसारिओ किन बिधि रहनि रहउ रे ॥ सेजै रमतु नैन नही पेखउ इहु दुखु का सउ कहउ रे ॥1॥ रहाउ ॥ बापु सावका करै लराई माइआ सद मतवारी ॥ बडे भाई कै जब संगि होती तब हउ नाह पिआरी ॥2॥ कहत कबीर पंच को झगरा झगरत जनमु गवाइआ ॥ झूठी माइआ सभु जगु बाधिआ मै राम रमत सुखु पाइआ ॥3॥3॥25॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: आसा ॥ हे वीर ! मैं माया के हाथों दुखी हूँ।फिर भी शरीर से प्यार (देह-अध्यास) होने के कारण।मुझे जेठ के नाम से ही डर लगता है (भाव।मेरा मरने को चित्त नहीं करता)। हे सखी सहेलियो ! मुझे इन्द्रियों ने अपने वश में कर रखा है।मैं देवर के विछोड़े में (भाव।विचार से वंचित होने के कारण अंदर ही अंदर से) जल रही हूँ। 1। मेरी अकल मारी गई है।मैंने परमात्मा को भुला दिया है।हे वीर ! अब (इस हालत में) कैसे उमर गुजारूँ। हे वीर ! ये दुख मैं किसको सुनाऊँ कि वह प्रभू मेरी हृदय-सेज पर बसता है।पर मुझे आँखों से नहीं दिखता। 1।रहाउ। मेरे साथ पैदा हुआ ये शरीर सदा मेरे साथ लड़ता रहता है (भाव।सदा खाने को मांगता है)।माया ने मुझे झल्ली कर रखा है। जब (माँ के पेट में) मैं बड़े वीर (ज्ञान) के साथ थी तब (सिमरन करती थी और) पति को प्यारी थी। 2। कबीर कहता है, (बस इसी तरह) सब जीवों को पाँच कामादिकों से वास्ता पड़ा हुआ है।सारा जगत इन से जूझता हुआ ही जिंदगी व्यर्थ गवाए जा रहा है; ठॅगनी माया के साथ बंधा पड़ा है।पर मैंने प्रभू को सिमर के सुख पा लिया है। 3।
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: आसा ॥ (हे झल्ले ब्राहमण ! अगर आपको इस करके अपनी ऊँची जाति का गर्व है कि) आपके गले में जनेऊ है (जो हमारे गले में नहीं। तो देख।वैसा ही) हमारे घर (बहुत सारा) सूतर है (जिससे) हम नित्य ताना तनते हैं। (आपका वेद आदि पढ़ने का गुमान भी झूठा।क्योंकि) आप वेद व गायत्री मंत्र निरे जीभ से ही उचारते हैं।पर परमात्मा मेरे हृदय में बसता है। 1। हे कमले ब्राहमण ! प्रभू जी मेरी तो जीभ पर।मेरी आँखों में और मेरे दिल में बसते हैं। पर आपको जब धर्मराज की हजूरी में प्रभू से पूछा जाएगा तो क्या उत्तर देगा (क्या करता रहा यहाँ सारी उम्र) । 1।रहाउ। कई जन्मों से आप लोग हमारे रखवाले बने चले आ रहे हैं।हम आपकी गऊएं बने रहे।आप हमारे मालिक ग्वाले बने रहे।पर आप अब तक नकारे ही साबित हुए। आपने कभी भी हमें (नदी से) पार लंघा के नहीं चराया (भाव।इस संसार समंदर से पार लांघने की कोई मति ना दी)। 2। (ये ठीक है कि) आप काशी का ब्राहमण है (भाव।आपको गुमान है अपनी विद्या का।जो तूने काशी में हासिल की)।और मैं (जाति का) जुलाहा हूँ (जिसको आपकी विद्या पढ़ने का अधिकार नहीं है)।पर। मेरी विचार की एक बात सोच (कि विद्या पढ़ के आखिर आप करते क्या हो)।आप तो राजे-रानियों के दर पर मांगते फिरते हैं।और मेरी सुरति प्रभू के साथ जुड़ी हुई है। 3। 4। 26।
आसा ॥ जगि जीवनु ऐसा सुपने जैसा जीवनु सुपन समानं ॥ साचु करि हम गाठि दीनी छोडि परम निधानं ॥1॥ बाबा माइआ मोह हितु कीन॑ ॥ जिनि गिआनु रतनु हिरि लीन॑ ॥1॥ रहाउ ॥ नैन देखि पतंगु उरझै पसु न देखै आगि ॥ काल फास न मुगधु चेतै कनिक कामिनि लागि ॥2॥ करि बिचारु बिकार परहरि तरन तारन सोइ ॥ कहि कबीर जगजीवनु ऐसा दुतीअ नाही कोइ ॥3॥5॥27॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: आसा ॥ जगत में (मनुष्य की) जिंदगी ऐसी ही है जैसे सपना।जिंदगी सपने जैसी ही है। पर हम सबसे ऊँचे सुखों के खजाने प्रभू को छोड़ के।(इस स्वप्न समान जीवन को) सदा कायम रहने वाला जान के इसे गाँठ दे रखी है। 1। हे बाबा ! हमने माया के साथ मोह-प्यार डाला हुआ है। जिसने हमारा ज्ञान रूपी हीरा चुरा लिया है। 1।रहाउ। पतंगा आँखों से (दीपक की लाट का रूप) देख के भूल जाता है।मूर्ख आग को नहीं देखता। (वैसे ही) मूर्ख जीव सोने और स्त्री (के मोह) में फंस के मौत की फाही को याद नहीं रखता। 2। कबीर कहता है, (हे भाई ! आप विकार छोड़ दे और प्रभू को याद कर) वही (इस संसार समुंद्र में से) तैराने वाला जहाज है। और वह (हमारे) जीवन का आसरा-प्रभू ऐसा है कि कोई और उस जैसा नहीं। 3। 5। 27।
आसा ॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: आसा ॥
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(बूढ़ा हो के आप अभी भी) आप (और) जीने की आशाएं बना रहा है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।