॥ सलोक मः १ ॥ जा हउ नाही ता किआ आखा किसु आखा किआ होइ ॥ करता होइ जनावई हुकमु बूझै नदरि करेइ ॥ नानक हुकमे जे बुझै त हउमै कहै न कोइ ॥१॥
॥ मः १ ॥ खोटे कउ खरा कहै खरे साणु धरे ॥ खरे खोटे कि नीसाणीआ नदरी मूरतीआ नदरी पाणु धरे ॥ खरे खोटे तूंहै पछाणहि पारब्रहम परमेसरि सेइ ॥ सिजदा करे ता मनि बसहि नाम बिनु तरीऐ केइ ॥ खोटे जाणि न पाइनी कि कूड़ि सेवै पैरि ॥ मारिओ चितारी जा करे पासि गांढै सब डिगारि ॥२॥
और यह सलोक। आसा की वार के master पाठ में से एक। “खोटे खरे” (counterfeit और genuine) का imagery।
historical context: नानक के time में मुग़ल coinage system। हर सिक्के पर एक “खरा” (genuine) value होती थी। मगर बहुत सी जगह “खोटे” (counterfeit) सिक्के भी चलते थे। “सर्राफ़” (assayer) test करते थे, कौनसा खरा, कौनसा खोटा।
नानक उसी metaphor को use कर रहे हैं।
“खोटे कउ खरा कहै।” “खोटे को खरा कहता है।” “खरे साणु धरे।” “खरे को कसौटी (test stone) पर धरता है।”
यह hypocrisy है। एक तरफ़ counterfeit को “real” call करते हैं, दूसरी तरफ़ real को doubt करते हैं।
“खरे खोटे कि नीसाणीआ।” “खरे और खोटे की पहचान क्या है?” “नदरी मूरतीआ।” “नज़र (अपनी आँख) से (देखी जाने वाली) मूर्तियाँ (शक्लें)।” “नदरी पाणु धरे।” “नज़र (हरि की कृपा-दृष्टि) से ही पाण (real essence) रखी जाती है।”
यह subtle है। हम अपनी आँख से “खरा-खोटा” judge करते हैं, मगर असली judgment हरि की “नज़र” से होती है।
“खरे खोटे तूंहै पछाणहि, पारब्रहम परमेसरि सेइ।” “खरा और खोटा तू ही पहचानता है, पारब्रह्म परमेश्वर।”
यह key statement है। असली “assayer” हरि है। बाक़ी सब subjective opinions हैं।
दिल्ली के context में: हम सब हर रोज़ “खरा-खोटा” judge करते हैं, लोगों को, projects को, decisions को। नानक कह रहे हैं, हमारी judgement subjective है। असली truth का access सिर्फ़ हरि के पास है।
यह humbling perspective है। यह कह रहा है, “अपनी opinions को थोड़ा soften करो। तुम पूरा सच नहीं देख रहे।”
“सिजदा करे ता मनि बसहि, नाम बिनु तरीऐ केइ।” “सिज्दा (झुकना) करे, तब मन में बसते हैं।” “नाम के बिना तरना (कैसे)?”
यानी अगर genuine surrender (सिज्दा) हो, तब हरि “मन में” आते हैं। बिना नाम, तरना नहीं।
“खोटे जाणि न पाइनी, कि कूड़ि सेवै पैरि।” “खोटे जान (पहचान) नहीं पाते (अपने आप को), क्या झूठ-सेवा से पैर (मुक्ति) मिलेगी?”
यानी जो “खोटे” हैं, वो ख़ुद को “खरा” समझते हैं, क्योंकि वो genuine self-recognition नहीं कर पाते।
“मारिओ चितारी जा करे, पासि गांढै सब डिगारि।” “जब चित्त (हरि) का ‘मारना’ करता है, तो ‘पास’ से सब ‘डिगाड़’ (mistakes) निकालता है।”
closing point: जब हरि का “smoke alarm” बजता है (एक crisis, एक wake-up call), तब हम “खरे-खोटे” का अंतर अपने अंदर देखते हैं। बाक़ी सब external opinions disappear।
दिल्ली के life में हम सब बहुत बार “खोटे” को “खरा” समझते हैं, fake friendships, fake spirituality, fake achievements। नानक कह रहे हैं, असली “assay” करने वाला एक है। उसके सामने सब चीज़ें original form में show होंगी।
॥ पउड़ी ॥ सतिगुर विटहु वारिआ जितु मिलिऐ खसमु समालिआ ॥ जिनि करि उपदेसु गिआन अंजनु दीआ इनी नेत्री जगतु निहालिआ ॥ खसमु छोडि दूजै लगे डुबे से वणजारिआ ॥ सतिगुरू है बोहिथा विरलै किनै वीचारिआ ॥ करि किरपा पारि उतारिआ ॥१९॥
पौड़ी 19 सतगुरु की प्रशंसा है।
“सतिगुर विटहु वारिआ।” “सतगुरु पर मैं क़ुर्बान।” “जितु मिलिऐ खसमु समालिआ।” “जिसको मिलने पर ‘खसम’ (हरि) सम्भाला।”
यानी सतगुरु से मिलने पर ही हरि का “ध्यान” करना सीखा।
“जिनि करि उपदेसु गिआन अंजनु दीआ।” “जिसने उपदेश से, ज्ञान का ‘अंजन’ (collyrium, eyeliner) दिया।” “इनी नेत्री जगतु निहालिआ।” “इन आँखों से जग देख लिया।”
“अंजन” का use देखिए। संस्कृत में “अंजन” यानी काजल, eye-ointment। नानक कह रहे हैं, सतगुरु ने ज्ञान का “अंजन” दिया, और मेरी आँख खुल गई, अब मैं पूरा “जग” देख पा रहा हूँ।
यह transformative experience है। पहले आँख थी, मगर सही नहीं देख रही थी। ज्ञान का “अंजन” लगा, और दृष्टि साफ़ हो गई।
“खसमु छोडि दूजै लगे, डुबे से वणजारिआ।” “खसम (हरि) छोड़ कर ‘दूजे’ से लगे, वो ‘वणजारे’ (व्यापारी) डूब गए।”
यानी जो business के “real owner” (हरि) को छोड़ कर “दूजों” (दुनिया, माया) के पीछे लगे, वो “डूब” गए।
“सतिगुरू है बोहिथा, विरलै किनै वीचारिआ।” “सतगुरु ‘बोहिथा’ (boat, ship) है, विरला (दुर्लभ) ही समझता है।”
“बोहिथा” शब्द significant है। पंजाबी में “बोहिथा” यानी large boat, transport vessel। नानक एक merchant metaphor extend कर रहे हैं, समुद्र में, असली “बोहिथा” सतगुरु है।
“करि किरपा पारि उतारिआ।” “कृपा कर के पार उतार दिया।”
closing: कृपा से ही पार। ख़ुद के effort से नहीं।
दिल्ली में हम सब “self-help” books पढ़ते हैं। नानक कह रहे हैं, असली “help” ख़ुद से नहीं, सतगुरु से। और सतगुरु की पहचान दुर्लभ है, “विरला” कोई।
यह सलोक सबसे compact, सबसे direct है।
“जा हउ नाही ता किआ आखा।” “जब ‘मैं’ है ही नहीं, तो क्या कहूँ”?
यह advaitic statement है। “हउ” (मैं, अहंकार) यदि truly नहीं, तो बोलने वाला कौन?
“किसु आखा किआ होइ।” “किसको कहूँ क्या हुआ?”
यानी जब “मैं” नहीं, तो speaker भी नहीं, audience भी नहीं।
“करता होइ जनावई।” “करता ही जनवाता है (समझाता है)।” “हुकमु बूझै नदरि करेइ।” “हुकम को बूझता है, नज़र करता है।”
यानी “मैं” नहीं, “हरि” ही करता है। हम सिर्फ़ instruments हैं।
“नानक हुकमे जे बुझै, त हउमै कहै न कोइ।” नानक कहते हैं, “हुकम को बूझे” तो “हउमै” (अहंकार) कोई नहीं कहता।
यानी जब आदमी सच में समझ जाता है कि सब “हुकम” से होता है, अहंकार dissolve हो जाता है।
दिल्ली में हम सब “मैंने यह किया,” “मैंने वो किया” में busy हैं। नानक कह रहे हैं, यह “मैं” actual में है ही नहीं, यह बस perception है। समझ आ जाए, खेल ख़त्म।