अंग
414
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਕੰਚਨ ਕਾਇਆ ਜੋਤਿ ਅਨੂਪੁ ॥
ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਦੇਵਾ ਸਗਲ ਸਰੂਪੁ ॥
ਮੈ ਸੋ ਧਨੁ ਪਲੈ ਸਾਚੁ ਅਖੂਟੁ ॥੪॥
ਪੰਚ ਤੀਨਿ ਨਵ ਚਾਰਿ ਸਮਾਵੈ ॥
ਧਰਣਿ ਗਗਨੁ ਕਲ ਧਾਰਿ ਰਹਾਵੈ ॥
ਬਾਹਰਿ ਜਾਤਉ ਉਲਟਿ ਪਰਾਵੈ ॥੫॥
ਮੂਰਖੁ ਹੋਇ ਨ ਆਖੀ ਸੂਝੈ ॥
ਜਿਹਵਾ ਰਸੁ ਨਹੀ ਕਹਿਆ ਬੂਝੈ ॥
ਬਿਖੁ ਕਾ ਮਾਤਾ ਜਗ ਸਿਉ ਲੂਝੈ ॥੬॥
ਊਤਮ ਸੰਗਤਿ ਊਤਮੁ ਹੋਵੈ ॥
ਗੁਣ ਕਉ ਧਾਵੈ ਅਵਗਣ ਧੋਵੈ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸੇਵੇ ਸਹਜੁ ਨ ਹੋਵੈ ॥੭॥
ਹੀਰਾ ਨਾਮੁ ਜਵੇਹਰ ਲਾਲੁ ॥
ਮਨੁ ਮੋਤੀ ਹੈ ਤਿਸ ਕਾ ਮਾਲੁ ॥
ਨਾਨਕ ਪਰਖੈ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਲੁ ॥੮॥੫॥
ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਦੇਵਾ ਸਗਲ ਸਰੂਪੁ ॥
ਮੈ ਸੋ ਧਨੁ ਪਲੈ ਸਾਚੁ ਅਖੂਟੁ ॥੪॥
ਪੰਚ ਤੀਨਿ ਨਵ ਚਾਰਿ ਸਮਾਵੈ ॥
ਧਰਣਿ ਗਗਨੁ ਕਲ ਧਾਰਿ ਰਹਾਵੈ ॥
ਬਾਹਰਿ ਜਾਤਉ ਉਲਟਿ ਪਰਾਵੈ ॥੫॥
ਮੂਰਖੁ ਹੋਇ ਨ ਆਖੀ ਸੂਝੈ ॥
ਜਿਹਵਾ ਰਸੁ ਨਹੀ ਕਹਿਆ ਬੂਝੈ ॥
ਬਿਖੁ ਕਾ ਮਾਤਾ ਜਗ ਸਿਉ ਲੂਝੈ ॥੬॥
ਊਤਮ ਸੰਗਤਿ ਊਤਮੁ ਹੋਵੈ ॥
ਗੁਣ ਕਉ ਧਾਵੈ ਅਵਗਣ ਧੋਵੈ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸੇਵੇ ਸਹਜੁ ਨ ਹੋਵੈ ॥੭॥
ਹੀਰਾ ਨਾਮੁ ਜਵੇਹਰ ਲਾਲੁ ॥
ਮਨੁ ਮੋਤੀ ਹੈ ਤਿਸ ਕਾ ਮਾਲੁ ॥
ਨਾਨਕ ਪਰਖੈ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਲੁ ॥੮॥੫॥
कंचन काइआ जोति अनूपु ॥
त्रिभवण देवा सगल सरूपु ॥
मै सो धनु पलै साचु अखूटु ॥४॥
पंच तीनि नव चारि समावै ॥
धरणि गगनु कल धारि रहावै ॥
बाहरि जातउ उलटि परावै ॥५॥
मूरखु होइ न आखी सूझै ॥
जिहवा रसु नही कहिआ बूझै ॥
बिखु का माता जग सिउ लूझै ॥६॥
ऊतम संगति ऊतमु होवै ॥
गुण कउ धावै अवगण धोवै ॥
बिनु गुर सेवे सहजु न होवै ॥७॥
हीरा नामु जवेहर लालु ॥
मनु मोती है तिस का मालु ॥
नानक परखै नदरि निहालु ॥८॥५॥
त्रिभवण देवा सगल सरूपु ॥
मै सो धनु पलै साचु अखूटु ॥४॥
पंच तीनि नव चारि समावै ॥
धरणि गगनु कल धारि रहावै ॥
बाहरि जातउ उलटि परावै ॥५॥
मूरखु होइ न आखी सूझै ॥
जिहवा रसु नही कहिआ बूझै ॥
बिखु का माता जग सिउ लूझै ॥६॥
ऊतम संगति ऊतमु होवै ॥
गुण कउ धावै अवगण धोवै ॥
बिनु गुर सेवे सहजु न होवै ॥७॥
हीरा नामु जवेहर लालु ॥
मनु मोती है तिस का मालु ॥
नानक परखै नदरि निहालु ॥८॥५॥
हिन्दी अर्थ: जो परमात्मा (शुद्ध) सोने जैसी पवित्र हस्ती वाला है।जो सिर्फ प्रकाश ही प्रकाश है। जिस जैसा और कोई नहीं।जो तीन भवनों का मालिक है।ये सारा आकार जिस का (सरगुण) स्वरूप है। उस परमात्मा का सदा-स्थिर और कभी ना समाप्त होने वाला नाम-धन मुझे (गुरू-सर्राफ से) प्राप्त हुआ है। 4। जो परमात्मा पाँचों तत्वों में।माया के तीनों गुणों में।नौ खण्डों में और चारें कुंटों में व्यापक है। जो धरती और आकाश को अपनी सत्ता के आसरे (अपनी जगह पर) टिकाए रखता है। गुरू सर्राफ मनुष्य के बाहर दिखाई देते आकार की ओर दौड़ते मन को उस परमात्मा की ओर पलट के लाता है। 5। (गुरू-सर्राफ बताता है कि परमात्मा सारी सृष्टि में रमा हुआ है।पर) वह मनुष्य मूर्ख है जिसे आँखों से (प्रभू) नहीं दिखाई देता। जिसकी जीभ में (प्रभू का) नाम-रस नहीं आया।जो गुरू के बताए उपदेश को नहीं समझता। वह मनुष्य विषौली माया में मस्त हो के जगत से झगड़े मोल लेता है। 6। गुरू की श्रेष्ठ संगति की बरकति से मनुष्य श्रेष्ठ जीवन वाला बन जाता है। आत्मिक गुणों की प्राप्ति के लिए दौड़-भाग करता है और (अपने अंदर से नाम-अमृत की सहायता से) अवगुणों को धो देता है। (ये बात यकीनन है कि) गुरू द्वारा बताई हुई सेवा किए बिना (अवगुणों से निजात नहीं मिलती।और) अडोल आत्मिक अवस्था नहीं मिलती। 7। हीरा-जवाहर और लाल मोती (जैसा सुच्चा-स्वच्छ) मन परमात्मा का नाम उस मनुष्य की राशि-पूँजी बन जाती है। हे नानक ! गुरू-सर्राफ जिस मनुष्य को मेहर की नजर से देखता है वह निहाल हो जाता है। 8। 5।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਗਿਆਨੁ ਧਿਆਨੁ ਮਨਿ ਮਾਨੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਹਲੀ ਮਹਲੁ ਪਛਾਨੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੁਰਤਿ ਸਬਦੁ ਨੀਸਾਨੁ ॥੧॥
ਐਸੇ ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਵੀਚਾਰੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚਾ ਨਾਮੁ ਮੁਰਾਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਨਿਰਮਲੁ ਥਾਨਿ ਸੁਥਾਨੁ ॥
ਤੀਨ ਭਵਨ ਨਿਹਕੇਵਲ ਗਿਆਨੁ ॥
ਸਾਚੇ ਗੁਰ ਤੇ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਨੁ ॥੨॥
ਸਾਚਾ ਹਰਖੁ ਨਾਹੀ ਤਿਸੁ ਸੋਗੁ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਗਿਆਨੁ ਮਹਾ ਰਸੁ ਭੋਗੁ ॥
ਪੰਚ ਸਮਾਈ ਸੁਖੀ ਸਭੁ ਲੋਗੁ ॥੩॥
ਸਗਲੀ ਜੋਤਿ ਤੇਰਾ ਸਭੁ ਕੋਈ ॥
ਆਪੇ ਜੋੜਿ ਵਿਛੋੜੇ ਸੋਈ ॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਰੇ ਸੁ ਹੋਈ ॥੪॥
ਢਾਹਿ ਉਸਾਰੇ ਹੁਕਮਿ ਸਮਾਵੈ ॥
ਹੁਕਮੋ ਵਰਤੈ ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ॥
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਪੂਰਾ ਕੋਇ ਨ ਪਾਵੈ ॥੫॥
ਬਾਲਕ ਬਿਰਧਿ ਨ ਸੁਰਤਿ ਪਰਾਨਿ ॥
ਭਰਿ ਜੋਬਨਿ ਬੂਡੈ ਅਭਿਮਾਨਿ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਕਿਆ ਲਹਸਿ ਨਿਦਾਨਿ ॥੬॥
ਜਿਸ ਕਾ ਅਨੁ ਧਨੁ ਸਹਜਿ ਨ ਜਾਨਾ ॥
ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਨਾ ਫਿਰਿ ਪਛੁਤਾਨਾ ॥
ਗਲਿ ਫਾਹੀ ਬਉਰਾ ਬਉਰਾਨਾ ॥੭॥
ਬੂਡਤ ਜਗੁ ਦੇਖਿਆ ਤਉ ਡਰਿ ਭਾਗੇ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਰਾਖੇ ਸੇ ਵਡਭਾਗੇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਕੀ ਚਰਣੀ ਲਾਗੇ ॥੮॥੬॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਗਿਆਨੁ ਧਿਆਨੁ ਮਨਿ ਮਾਨੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਹਲੀ ਮਹਲੁ ਪਛਾਨੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸੁਰਤਿ ਸਬਦੁ ਨੀਸਾਨੁ ॥੧॥
ਐਸੇ ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਵੀਚਾਰੀ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਾਚਾ ਨਾਮੁ ਮੁਰਾਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਨਿਰਮਲੁ ਥਾਨਿ ਸੁਥਾਨੁ ॥
ਤੀਨ ਭਵਨ ਨਿਹਕੇਵਲ ਗਿਆਨੁ ॥
ਸਾਚੇ ਗੁਰ ਤੇ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਨੁ ॥੨॥
ਸਾਚਾ ਹਰਖੁ ਨਾਹੀ ਤਿਸੁ ਸੋਗੁ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਗਿਆਨੁ ਮਹਾ ਰਸੁ ਭੋਗੁ ॥
ਪੰਚ ਸਮਾਈ ਸੁਖੀ ਸਭੁ ਲੋਗੁ ॥੩॥
ਸਗਲੀ ਜੋਤਿ ਤੇਰਾ ਸਭੁ ਕੋਈ ॥
ਆਪੇ ਜੋੜਿ ਵਿਛੋੜੇ ਸੋਈ ॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਰੇ ਸੁ ਹੋਈ ॥੪॥
ਢਾਹਿ ਉਸਾਰੇ ਹੁਕਮਿ ਸਮਾਵੈ ॥
ਹੁਕਮੋ ਵਰਤੈ ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ॥
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਪੂਰਾ ਕੋਇ ਨ ਪਾਵੈ ॥੫॥
ਬਾਲਕ ਬਿਰਧਿ ਨ ਸੁਰਤਿ ਪਰਾਨਿ ॥
ਭਰਿ ਜੋਬਨਿ ਬੂਡੈ ਅਭਿਮਾਨਿ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਕਿਆ ਲਹਸਿ ਨਿਦਾਨਿ ॥੬॥
ਜਿਸ ਕਾ ਅਨੁ ਧਨੁ ਸਹਜਿ ਨ ਜਾਨਾ ॥
ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਨਾ ਫਿਰਿ ਪਛੁਤਾਨਾ ॥
ਗਲਿ ਫਾਹੀ ਬਉਰਾ ਬਉਰਾਨਾ ॥੭॥
ਬੂਡਤ ਜਗੁ ਦੇਖਿਆ ਤਉ ਡਰਿ ਭਾਗੇ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਰਾਖੇ ਸੇ ਵਡਭਾਗੇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਕੀ ਚਰਣੀ ਲਾਗੇ ॥੮॥੬॥
आसा महला १ ॥
गुरमुखि गिआनु धिआनु मनि मानु ॥
गुरमुखि महली महलु पछानु ॥
गुरमुखि सुरति सबदु नीसानु ॥१॥
ऐसे प्रेम भगति वीचारी ॥
गुरमुखि साचा नामु मुरारी ॥१॥ रहाउ ॥
अहिनिसि निरमलु थानि सुथानु ॥
तीन भवन निहकेवल गिआनु ॥
साचे गुर ते हुकमु पछानु ॥२॥
साचा हरखु नाही तिसु सोगु ॥
अंम्रितु गिआनु महा रसु भोगु ॥
पंच समाई सुखी सभु लोगु ॥३॥
सगली जोति तेरा सभु कोई ॥
आपे जोड़ि विछोड़े सोई ॥
आपे करता करे सु होई ॥४॥
ढाहि उसारे हुकमि समावै ॥
हुकमो वरतै जो तिसु भावै ॥
गुर बिनु पूरा कोइ न पावै ॥५॥
बालक बिरधि न सुरति परानि ॥
भरि जोबनि बूडै अभिमानि ॥
बिनु नावै किआ लहसि निदानि ॥६॥
जिस का अनु धनु सहजि न जाना ॥
भरमि भुलाना फिरि पछुताना ॥
गलि फाही बउरा बउराना ॥७॥
बूडत जगु देखिआ तउ डरि भागे ॥
सतिगुरि राखे से वडभागे ॥
नानक गुर की चरणी लागे ॥८॥६॥
गुरमुखि गिआनु धिआनु मनि मानु ॥
गुरमुखि महली महलु पछानु ॥
गुरमुखि सुरति सबदु नीसानु ॥१॥
ऐसे प्रेम भगति वीचारी ॥
गुरमुखि साचा नामु मुरारी ॥१॥ रहाउ ॥
अहिनिसि निरमलु थानि सुथानु ॥
तीन भवन निहकेवल गिआनु ॥
साचे गुर ते हुकमु पछानु ॥२॥
साचा हरखु नाही तिसु सोगु ॥
अंम्रितु गिआनु महा रसु भोगु ॥
पंच समाई सुखी सभु लोगु ॥३॥
सगली जोति तेरा सभु कोई ॥
आपे जोड़ि विछोड़े सोई ॥
आपे करता करे सु होई ॥४॥
ढाहि उसारे हुकमि समावै ॥
हुकमो वरतै जो तिसु भावै ॥
गुर बिनु पूरा कोइ न पावै ॥५॥
बालक बिरधि न सुरति परानि ॥
भरि जोबनि बूडै अभिमानि ॥
बिनु नावै किआ लहसि निदानि ॥६॥
जिस का अनु धनु सहजि न जाना ॥
भरमि भुलाना फिरि पछुताना ॥
गलि फाही बउरा बउराना ॥७॥
बूडत जगु देखिआ तउ डरि भागे ॥
सतिगुरि राखे से वडभागे ॥
नानक गुर की चरणी लागे ॥८॥६॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला १ ॥ (हे भाई ! तू) गुरू के सन्मुख हो के अपने मन में परमात्मा के साथ गहरी सांझ और परमात्मा में जुड़ी सुरति (का आनंद) ले। गुरू की शरण पड़ के तू अपने अंदर प्रभू का ठिकाना पहचान। गुरू के सन्मुख रहके तू गुरू के शबद को अपने सोच-मण्डल में टिका।(ये तेरी जीवन-यात्रा के लिए) राहदारी है। 1। इस तरह प्रभू चरणों से प्रेम और परमात्मा की भक्ति करके वह ऊँचे विचारों का मालिक बन जा गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य को परमात्मा का सदा स्थिर रहने वाला नाम प्राप्त हो जाता है। 1।रहाउ। (जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है वह) दिन-रात अपने हृदय-स्थल में परमात्मा का पवित्र श्रेष्ठ डेरा बनाए रखता है। तीनों भवनों में व्यापक और वासना-रहित प्रभू के साथ उसकी गहरी सांझ पड़ जाती है। (हे भाई ! तू भी) अभॅुल गुरू से (भाव।शरण पड़ के) परमात्मा की रजा को समझ। 2। (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है उसके) अंदर स्थिर आनंद बनारहता है।उसे कभी कोई चिंता नहीं छूती। परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाले श्रेष्ठ रस का नाम और परमात्मा के साथ गहरी सांझ उस मनुष्य का आत्मिक भोजन बन जाता है। (अगर गुरू की शरण पड़ के) जगत कामादिक पाँचों को खत्म कर दे तो सारा जगत ही सुखी हो जाए। 3। (गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य इस प्रकार अरदास करता है, हे प्रभू !) सारी सृष्टि में तेरी ही ज्योति (प्रकाश कर रही है।हरेक जीव तेरा ही पैदा किया हुआ) है। (गुरमुखि को ये पक्का निश्चय होता है कि) परमात्मा स्वयं ही जीवों के संजोग बनाता है।और स्वयं ही फिर विछोड़े डाल देता है। जो कुछ करतार स्वयं ही करता है वही होता है। 4। (गुरमुखि को यकीन हो जाता है कि) परमात्मा स्वयं ही सारी सृष्टि को गिरा के स्वयं ही दुबारा उसकी सृजना करता है।उसके हुकम के अनुसार ही जगत दुबारा उसमें लीन हो जाता है। जो उसको अच्छा लगता है उसके अनुसार उसका हुकम चलता है। गुरू की शरण आए बिना कोई भी जीव पूरन परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता। 5। (जिस प्राणी की सुरति) ना बाल अवस्था में ना वृद्ध अवस्था में (और ना ही जवानी के समय) कभी भी परमात्मा में नहीं जुड़ती। (बल्कि) भरी-जवानी में वह (जवानी के) अहंकार में डूबा रहता है। वह परमात्मा के नाम से टूट के आखिर (यहाँ से) क्या कमाएगा। 6। जिस परमात्मा का दिया हुआ अंन्न और धन जीव इस्तेमाल करता रहता है। अगर अडोल अवस्था में टिक के उससे कभी भी सांझ भी नहीं डालता और माया की भटकना में असल जीवन-राह भटका रहता है।तो आखिर पछताता है। उसके गले में मोह की फांसी लगी रहती है।मोह में ही वह सदा झल्ला हुआ फिरता है। 7। वह जगत को (मोह में) डूबता देख के (मोह से) डर के भाग जाते हैं। वह बड़े भाग्यशाली हैं।सतिगुरू ने उन्हें (मोह की कैद से) बचा लिया है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के चरणों में लगते हैं।8। 6।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਗਾਵਹਿ ਗੀਤੇ ਚੀਤਿ ਅਨੀਤੇ ॥
ਰਾਗ ਸੁਣਾਇ ਕਹਾਵਹਿ ਬੀਤੇ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਮਨਿ ਝੂਠੁ ਅਨੀਤੇ ॥੧॥
ਕਹਾ ਚਲਹੁ ਮਨ ਰਹਹੁ ਘਰੇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਤ੍ਰਿਪਤਾਸੇ ਖੋਜਤ ਪਾਵਹੁ ਸਹਜਿ ਹਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਮਨਿ ਮੋਹੁ ਸਰੀਰਾ ॥
ਲਬੁ ਲੋਭੁ ਅਹੰਕਾਰੁ ਸੁ ਪੀਰਾ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਕਿਉ ਮਨੁ ਧੀਰਾ ॥੨॥
ਅੰਤਰਿ ਨਾਵਣੁ ਸਾਚੁ ਪਛਾਣੈ ॥
ਅੰਤਰ ਕੀ ਗਤਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਣੈ ॥
ਸਾਚ ਸਬਦ ਬਿਨੁ ਮਹਲੁ ਨ ਪਛਾਣੈ ॥੩॥
ਨਿਰੰਕਾਰ ਮਹਿ ਆਕਾਰੁ ਸਮਾਵੈ ॥
ਅਕਲ ਕਲਾ ਸਚੁ ਸਾਚਿ ਟਿਕਾਵੈ ॥
ਸੋ ਨਰੁ ਗਰਭ ਜੋਨਿ ਨਹੀ ਆਵੈ ॥੪॥
ਜਹਾਂ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਤਹ ਜਾਉ ॥
ਗਾਵਹਿ ਗੀਤੇ ਚੀਤਿ ਅਨੀਤੇ ॥
ਰਾਗ ਸੁਣਾਇ ਕਹਾਵਹਿ ਬੀਤੇ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਮਨਿ ਝੂਠੁ ਅਨੀਤੇ ॥੧॥
ਕਹਾ ਚਲਹੁ ਮਨ ਰਹਹੁ ਘਰੇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਤ੍ਰਿਪਤਾਸੇ ਖੋਜਤ ਪਾਵਹੁ ਸਹਜਿ ਹਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਮਨਿ ਮੋਹੁ ਸਰੀਰਾ ॥
ਲਬੁ ਲੋਭੁ ਅਹੰਕਾਰੁ ਸੁ ਪੀਰਾ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਕਿਉ ਮਨੁ ਧੀਰਾ ॥੨॥
ਅੰਤਰਿ ਨਾਵਣੁ ਸਾਚੁ ਪਛਾਣੈ ॥
ਅੰਤਰ ਕੀ ਗਤਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਣੈ ॥
ਸਾਚ ਸਬਦ ਬਿਨੁ ਮਹਲੁ ਨ ਪਛਾਣੈ ॥੩॥
ਨਿਰੰਕਾਰ ਮਹਿ ਆਕਾਰੁ ਸਮਾਵੈ ॥
ਅਕਲ ਕਲਾ ਸਚੁ ਸਾਚਿ ਟਿਕਾਵੈ ॥
ਸੋ ਨਰੁ ਗਰਭ ਜੋਨਿ ਨਹੀ ਆਵੈ ॥੪॥
ਜਹਾਂ ਨਾਮੁ ਮਿਲੈ ਤਹ ਜਾਉ ॥
आसा महला १ ॥
गावहि गीते चीति अनीते ॥
राग सुणाइ कहावहि बीते ॥
बिनु नावै मनि झूठु अनीते ॥१॥
कहा चलहु मन रहहु घरे ॥
गुरमुखि राम नामि त्रिपतासे खोजत पावहु सहजि हरे ॥१॥ रहाउ ॥
कामु क्रोधु मनि मोहु सरीरा ॥
लबु लोभु अहंकारु सु पीरा ॥
राम नाम बिनु किउ मनु धीरा ॥२॥
अंतरि नावणु साचु पछाणै ॥
अंतर की गति गुरमुखि जाणै ॥
साच सबद बिनु महलु न पछाणै ॥३॥
निरंकार महि आकारु समावै ॥
अकल कला सचु साचि टिकावै ॥
सो नरु गरभ जोनि नही आवै ॥४॥
जहां नामु मिलै तह जाउ ॥
गावहि गीते चीति अनीते ॥
राग सुणाइ कहावहि बीते ॥
बिनु नावै मनि झूठु अनीते ॥१॥
कहा चलहु मन रहहु घरे ॥
गुरमुखि राम नामि त्रिपतासे खोजत पावहु सहजि हरे ॥१॥ रहाउ ॥
कामु क्रोधु मनि मोहु सरीरा ॥
लबु लोभु अहंकारु सु पीरा ॥
राम नाम बिनु किउ मनु धीरा ॥२॥
अंतरि नावणु साचु पछाणै ॥
अंतर की गति गुरमुखि जाणै ॥
साच सबद बिनु महलु न पछाणै ॥३॥
निरंकार महि आकारु समावै ॥
अकल कला सचु साचि टिकावै ॥
सो नरु गरभ जोनि नही आवै ॥४॥
जहां नामु मिलै तह जाउ ॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला १ ॥ जो मनुष्य (दूसरों को सुनाने के लिए ही भक्ति के) गीत गाते हैं,पर उनके चित्त में बुरे ख्याल (मौजूद) हैं; जो (औरों को) राग (द्वैष से बचने की बातें) सुना के कहलवाते हैं कि हम राग-द्वैष से बचे हुए हैं। परमात्मा का नाम सिमरन के बिना उनके मन में झूठ (बसता) है।उनके मन में कुकर्म (टिके हुए) हैं। 1। (औरों को समझ देने वाले) हे मन ! तू (कुकर्मों में) क्यूँ भटक रहा है।अपने अंदर ही टिका रह। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होते हैं वे परमात्मा के नाम में जुड़ के (विकारों की ओर से) हट जाते हैं।हे मन ! तू भी गुरू के द्वारा तलाश करके सहज अवस्था में टिक के परमात्मा को पा लेगा। 1।रहाउ। जिस मनुष्य के मन में शरीर में काम है।क्रोध है मोह है। जिसके अंदर लब (लालच) है।लोभ है अहंकार है (जिसके अंदर इन विकारों का) कलेश है। परमात्मा का नाम सिमरन के बिना उसका मन (इनका मुकाबला करने का) कैसे हौसला कर सकता है। 2। जो मनुष्य अपने अंदर सदा स्थिर प्रभू के साथ सांझ पा लेता है।वह अपनी आत्मा में (तीर्थ-) स्नान कर रहा है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ के अपनी अंदरूनी आत्मिक अवस्था को समझ लेता है। (पर गुरू के) सच्चे शबद के बिना परमात्मा का ठिकाना कोई मनुष्य नहीं पहचान सकता। 3। जो मनुष्य दिखाई देते संसार को अदृश्य प्रभू में लीन कर लेता है (भावअपनी बिरती को बाहर से रोक के अंदर ले आता है;) जिस प्रभू की सत्ता गिनती-मिनती से परे है वह सदा स्थिर प्रभू को जो मनुष्य सिमरन द्वारा अपने हृदय में टिकाता है। वह मनुष्य जनम-मरण के चक्कर में नहीं आता। 4। (इस वास्ते मेरी ये अरदास है कि) जहाँ (गुरू की संगति में से) मुझे परमातमा का नाम मिल जाए।मैं वहीं जाऊँ।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 414 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Janpath की सड़क-side चाय और बीच में एक quiet moment।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 58 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 414” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 415 →, पीछे का: ← अंग 413।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।