अंग 436

अंग
436
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਧਨ ਪਿਰਹਿ ਮੇਲਾ ਹੋਇ ਸੁਆਮੀ ਆਪਿ ਪ੍ਰਭੁ ਕਿਰਪਾ ਕਰੇ ॥
ਸੇਜਾ ਸੁਹਾਵੀ ਸੰਗਿ ਪਿਰ ਕੈ ਸਾਤ ਸਰ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਭਰੇ ॥
ਕਰਿ ਦਇਆ ਮਇਆ ਦਇਆਲ ਸਾਚੇ ਸਬਦਿ ਮਿਲਿ ਗੁਣ ਗਾਵਓ ॥
ਨਾਨਕਾ ਹਰਿ ਵਰੁ ਦੇਖਿ ਬਿਗਸੀ ਮੁੰਧ ਮਨਿ ਓਮਾਹਓ ॥੧॥
ਮੁੰਧ ਸਹਜਿ ਸਲੋਨੜੀਏ ਇਕ ਪ੍ਰੇਮ ਬਿਨੰਤੀ ਰਾਮ ॥
ਮੈ ਮਨਿ ਤਨਿ ਹਰਿ ਭਾਵੈ ਪ੍ਰਭ ਸੰਗਮਿ ਰਾਤੀ ਰਾਮ ॥
ਪ੍ਰਭ ਪ੍ਰੇਮਿ ਰਾਤੀ ਹਰਿ ਬਿਨੰਤੀ ਨਾਮਿ ਹਰਿ ਕੈ ਸੁਖਿ ਵਸੈ ॥
ਤਉ ਗੁਣ ਪਛਾਣਹਿ ਤਾ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਣਹਿ ਗੁਣਹ ਵਸਿ ਅਵਗਣ ਨਸੈ ॥
ਤੁਧੁ ਬਾਝੁ ਇਕੁ ਤਿਲੁ ਰਹਿ ਨ ਸਾਕਾ ਕਹਣਿ ਸੁਨਣਿ ਨ ਧੀਜਏ ॥
ਨਾਨਕਾ ਪ੍ਰਿਉ ਪ੍ਰਿਉ ਕਰਿ ਪੁਕਾਰੇ ਰਸਨ ਰਸਿ ਮਨੁ ਭੀਜਏ ॥੨॥
ਸਖੀਹੋ ਸਹੇਲੜੀਹੋ ਮੇਰਾ ਪਿਰੁ ਵਣਜਾਰਾ ਰਾਮ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੋੁ ਵਣੰਜੜਿਆ ਰਸਿ ਮੋਲਿ ਅਪਾਰਾ ਰਾਮ ॥
ਮੋਲਿ ਅਮੋਲੋ ਸਚ ਘਰਿ ਢੋਲੋ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ਤਾ ਮੁੰਧ ਭਲੀ ॥
ਇਕਿ ਸੰਗਿ ਹਰਿ ਕੈ ਕਰਹਿ ਰਲੀਆ ਹਉ ਪੁਕਾਰੀ ਦਰਿ ਖਲੀ ॥
ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਸਮਰਥ ਸ੍ਰੀਧਰ ਆਪਿ ਕਾਰਜੁ ਸਾਰਏ ॥
ਨਾਨਕ ਨਦਰੀ ਧਨ ਸੋਹਾਗਣਿ ਸਬਦੁ ਅਭ ਸਾਧਾਰਏ ॥੩॥
ਹਮ ਘਰਿ ਸਾਚਾ ਸੋਹਿਲੜਾ ਪ੍ਰਭ ਆਇਅੜੇ ਮੀਤਾ ਰਾਮ ॥
ਰਾਵੇ ਰੰਗਿ ਰਾਤੜਿਆ ਮਨੁ ਲੀਅੜਾ ਦੀਤਾ ਰਾਮ ॥
ਆਪਣਾ ਮਨੁ ਦੀਆ ਹਰਿ ਵਰੁ ਲੀਆ ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਰਾਵਏ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਪਿਰ ਆਗੈ ਸਬਦਿ ਸਭਾਗੈ ਘਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਫਲੁ ਪਾਵਏ ॥
ਬੁਧਿ ਪਾਠਿ ਨ ਪਾਈਐ ਬਹੁ ਚਤੁਰਾਈਐ ਭਾਇ ਮਿਲੈ ਮਨਿ ਭਾਣੇ ॥
ਨਾਨਕ ਠਾਕੁਰ ਮੀਤ ਹਮਾਰੇ ਹਮ ਨਾਹੀ ਲੋਕਾਣੇ ॥੪॥੧॥
धन पिरहि मेला होइ सुआमी आपि प्रभु किरपा करे ॥
सेजा सुहावी संगि पिर कै सात सर अंम्रित भरे ॥
करि दइआ मइआ दइआल साचे सबदि मिलि गुण गावओ ॥
नानका हरि वरु देखि बिगसी मुंध मनि ओमाहओ ॥१॥
मुंध सहजि सलोनड़ीए इक प्रेम बिनंती राम ॥
मै मनि तनि हरि भावै प्रभ संगमि राती राम ॥
प्रभ प्रेमि राती हरि बिनंती नामि हरि कै सुखि वसै ॥
तउ गुण पछाणहि ता प्रभु जाणहि गुणह वसि अवगण नसै ॥
तुधु बाझु इकु तिलु रहि न साका कहणि सुनणि न धीजए ॥
नानका प्रिउ प्रिउ करि पुकारे रसन रसि मनु भीजए ॥२॥
सखीहो सहेलड़ीहो मेरा पिरु वणजारा राम ॥
हरि नामोु वणंजड़िआ रसि मोलि अपारा राम ॥
मोलि अमोलो सच घरि ढोलो प्रभ भावै ता मुंध भली ॥
इकि संगि हरि कै करहि रलीआ हउ पुकारी दरि खली ॥
करण कारण समरथ स्रीधर आपि कारजु सारए ॥
नानक नदरी धन सोहागणि सबदु अभ साधारए ॥३॥
हम घरि साचा सोहिलड़ा प्रभ आइअड़े मीता राम ॥
रावे रंगि रातड़िआ मनु लीअड़ा दीता राम ॥
आपणा मनु दीआ हरि वरु लीआ जिउ भावै तिउ रावए ॥
तनु मनु पिर आगै सबदि सभागै घरि अंम्रित फलु पावए ॥
बुधि पाठि न पाईऐ बहु चतुराईऐ भाइ मिलै मनि भाणे ॥
नानक ठाकुर मीत हमारे हम नाही लोकाणे ॥४॥१॥

हिन्दी अर्थ: प्रभू स्वामी स्वयं कृपा करते हैं तब ही जीव-स्त्री का प्रभू-पति से मिलाप होता है। पति प्रभू की संगति में उसकी हृदय-सेज सुंदर बन जाती है।उसके पाँचों ज्ञानेद्रियां।उसका मन और उसकी बुद्धि ये सारे नाम-अमृत से भरपूर हो जाते हैं। हे सदा-स्थिर रहने वाले दयालु प्रभू ! मेरे पर मेहर कर।कृपा कर।मैं गुरू के शबद में जुड़ के तेरे गुण गाऊँ। हे नानक ! जिस जीव-स्त्री के मन में प्रभू-पति के मिलाप का चाव पैदा होता है वह हरी पति का दीदार करके (अंतरात्मा में) प्रसन्न होती है। 1। हे आत्मिक अडोलता में टिकी सुंदर नेंत्रों वाली जीव-स्त्री ! मेरी एक प्यार भरी विनती सुन। (मुझे भी रास्ता दिखा ता कि) मुझे भक्ति में प्रभू प्यारा लगे और मैं प्रभू के साथ घुल मिल जाऊँ। जो जीव-स्त्री प्रभू के प्यार में रंगी रहती है और उसके दर पर विनतियां करती रहती है उस प्रभू के नाम में जुड़ के आत्मिक आनंद में जीवन व्यतीत करती है। हे प्रभू ! जो जीव-सि्त्रयां जब तेरे गुण पहचानती हैं तब वे तेरे साथ गहरी जान-पहचान डाल लेती हैं।उनके हृदय में गुण आ टिकते हैं और अवगुण उनके अंदर से दूर हो जाते हैं। हे प्रभू ! मैं तेरे बिना एक तिल जितना समय भी जी नहीं सकती (मेरी जीवात्मा व्याकुल हो उठती है)।(तेरे नाम के बिना कुछ और) कहने या सुनने से मेरे मन को धीरज नहीं आता। हे नानक ! जो जीव-स्त्री प्रभू को ‘हे प्यारे ! हे प्यारे !’ कह कह के याद करती रहती है उसकी जीभ उसका मन परमात्मा के नाम-रस में भीग जाता है। 2। हे (सत्संगी) सहेलियो ! परमात्मा प्रेम का व्यापारी है। जिसने उसका नाम विहाजा है वह उसके नाम-रस में भीग के इतने ऊँचे आत्मिक जीवन वाली हो जाती है कि वह अमूल्य हो जाती है। वह जीव-सखी बहुमूल्य हो जाती है।प्यारे प्रभू के सदा-स्थिर चरणों में वह जुड़ी रहती है।वही जीव-स्त्री ठीक समझो जो पति-प्रभू को प्यारी लगती है। अनेकों ही हैं जो प्रभू की याद में जुड़ के आत्मिक आनंद पाती हैं।मैं उनके दर पे खड़े हो के विनती करती हूँ (कि मेरी सहायता करो मैं भी प्रभू को याद कर सकूँ)। हे नानक ! जिस जीव स्त्री पे प्रभू की मेहर की निगाह होती है वह भाग्यशाली है।गुरू का शबद उसके हृदय को सहारा दिए रखता है; वह परमात्मा जो सारे जगत का मूल है जो सब कुछ करने योग्य है जो माया का पति है उस जीव-स्त्री के मानस जनम के मनोरथ को सफल करता है। 3। हे सहेलियो ! मेरे हृदय-घर में।जैसे।अटॅल खुशियों भरा गीत गाया जा रहा है।क्योंकि मित्र प्रभू मेरे अंदर आ बसा है। वह प्रभू उन जीवों को मिल जाता है जो उसके प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं।वह अपना मन उसके हवाले करते हैं और वह नाम हासिल करते हैं। जो जीव-स्त्री अपना मन प्रभू-पति के हवाले करती है वह प्रभू-पति का मिलाप हासिल कर लेती है फिर अपनी रजा के अनुसार प्रभू उस जीव-स्त्री के साथ मिला रहता है। जो जीवात्मा-वधू गुरू के शबद में जुड़ के अपना मन अपना हृदय प्रभू-पति को भेट करती है वह अपने भाग्यों वाले हृदय-घर में आत्मिक जीवन देने वाला नाम-फल पा लेती है। प्रभू किसी समझदारी से किसी बुद्धिमानी से किसी (धार्मिक पुस्तकों के) पाठ से नहीं मिलता।वह तो प्रेम से ही मिलता है।उसे मिलता है जिसके मन में वह प्यारा लगता है। हे नानक ! (कह,) हे मेरे ठाकुर ! हे मेरे मित्र ! (मेहर कर मुझे अपना बनाए रख) मैं (तेरे बिना) किसी और का ना बनूँ। 4। 1।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਅਨਹਦੋ ਅਨਹਦੁ ਵਾਜੈ ਰੁਣ ਝੁਣਕਾਰੇ ਰਾਮ ॥
ਮੇਰਾ ਮਨੋ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ਲਾਲ ਪਿਆਰੇ ਰਾਮ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਰਾਤਾ ਮਨੁ ਬੈਰਾਗੀ ਸੁੰਨ ਮੰਡਲਿ ਘਰੁ ਪਾਇਆ ॥
ਆਦਿ ਪੁਰਖੁ ਅਪਰੰਪਰੁ ਪਿਆਰਾ ਸਤਿਗੁਰਿ ਅਲਖੁ ਲਖਾਇਆ ॥
ਆਸਣਿ ਬੈਸਣਿ ਥਿਰੁ ਨਾਰਾਇਣੁ ਤਿਤੁ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਬੈਰਾਗੀ ਅਨਹਦ ਰੁਣ ਝੁਣਕਾਰੇ ॥੧॥
ਤਿਤੁ ਅਗਮ ਤਿਤੁ ਅਗਮ ਪੁਰੇ ਕਹੁ ਕਿਤੁ ਬਿਧਿ ਜਾਈਐ ਰਾਮ ॥
ਸਚੁ ਸੰਜਮੋ ਸਾਰਿ ਗੁਣਾ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਕਮਾਈਐ ਰਾਮ ॥
ਸਚੁ ਸਬਦੁ ਕਮਾਈਐ ਨਿਜ ਘਰਿ ਜਾਈਐ ਪਾਈਐ ਗੁਣੀ ਨਿਧਾਨਾ ॥
ਤਿਤੁ ਸਾਖਾ ਮੂਲੁ ਪਤੁ ਨਹੀ ਡਾਲੀ ਸਿਰਿ ਸਭਨਾ ਪਰਧਾਨਾ ॥
ਜਪੁ ਤਪੁ ਕਰਿ ਕਰਿ ਸੰਜਮ ਥਾਕੀ ਹਠਿ ਨਿਗ੍ਰਹਿ ਨਹੀ ਪਾਈਐ ॥
ਨਾਨਕ ਸਹਜਿ ਮਿਲੇ ਜਗਜੀਵਨ ਸਤਿਗੁਰ ਬੂਝ ਬੁਝਾਈਐ ॥੨॥
ਗੁਰੁ ਸਾਗਰੋ ਰਤਨਾਗਰੁ ਤਿਤੁ ਰਤਨ ਘਣੇਰੇ ਰਾਮ ॥
आसा महला १ ॥
अनहदो अनहदु वाजै रुण झुणकारे राम ॥
मेरा मनो मेरा मनु राता लाल पिआरे राम ॥
अनदिनु राता मनु बैरागी सुंन मंडलि घरु पाइआ ॥
आदि पुरखु अपरंपरु पिआरा सतिगुरि अलखु लखाइआ ॥
आसणि बैसणि थिरु नाराइणु तितु मनु राता वीचारे ॥
नानक नामि रते बैरागी अनहद रुण झुणकारे ॥१॥
तितु अगम तितु अगम पुरे कहु कितु बिधि जाईऐ राम ॥
सचु संजमो सारि गुणा गुर सबदु कमाईऐ राम ॥
सचु सबदु कमाईऐ निज घरि जाईऐ पाईऐ गुणी निधाना ॥
तितु साखा मूलु पतु नही डाली सिरि सभना परधाना ॥
जपु तपु करि करि संजम थाकी हठि निग्रहि नही पाईऐ ॥
नानक सहजि मिले जगजीवन सतिगुर बूझ बुझाईऐ ॥२॥
गुरु सागरो रतनागरु तितु रतन घणेरे राम ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला १ ॥ मेरा मन प्यारे प्रभू (के प्रेम रंग) में रंगा गया है।अब मेरे अंदर (जैसे) घुँघरूओं-झांझरों की झनकार देने वाला (बाजा) एक रस बज रहा है। मेरा मन हर समय (प्रभू की याद में) मतवाला रहता है।मस्त रहता है। मैंने अब ऐसे ऊँचे मण्डल में ठिकाना पा लिया है जहाँ कोई मायावी फुरना नहीं उठता। सतिगुरू ने मुझे वह अदृश्य प्रभू दिखा दिया है जो सबका आदि है और सब में व्यापक है जो सब का प्यारा है और जिससे परे और कोई हस्ती नहीं। मेरा मन गुरू के शबद के विचार की बरकति सेउस नारायण में मस्त रहता है जो अपने आसन पर अपने तख़्त पर सदा अडोल रहता है। हे नानक ! जिन लोगों के मन प्रभू के नाम में रंगे जाते हैं (प्रभू-नाम के) मतवाले हो जाते हैं।उनके अंदर।(जैसे) झांझर-घुंघरू की झनकार देने वाला (बाजा) एक-रस बजता है। 1। (हे सहेलिए !) बता।उस अपहुँच परमात्मा के शहर में किस ढंग से जाते हैं। (सहेली उत्तर देती है, हे बहिन ! उस शहर में पहुँचने के लिए) सदा-स्थिर प्रभू का नाम सिमर के।(सिमरन की बरकति से) इन्द्रियों को विकारों की ओर से रोक के।प्रभू के गुण (हृदय में) संभाल के सतिगुरू का शबद कमाना चाहिए (भाव।गुरू के शबद के अनुसार जीवन बनाना चाहिए)। सदा-स्थिर प्रभू से मिलाने वाला गुर-शबद कमाने से अपने घर में (स्वै-स्वरूप में) पहुँच जाते हैं।और गुणों का खजाना परमात्मा मिल जाता है। उस प्रभू का आसरा ले के उसकी टहनियां-डालियां-जड़-पत्तियां (आदि।भाव।उसके रचे हुए जगत) का आसरा लेने की जरूरत नहीं रहती (क्योंकि) वह परमात्मा सबक सिर पर प्रधान है। ये दुनिया जप करके तप साध के इन्द्रियों को रोकने का यत्न करके हार गई है।(इस किस्म के) हठ से इन्द्रियों को वश में करने के प्रयत्न करने से परमात्मा नहीं मिलता। हे नानक ! वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के जगत के आसरे प्रभू को मिल जाते हैं जिन्हें सतिगुरू की (दी हुई) मति ने (सही जीवन-राह) समझा दी है। 2। गुरू (एक) समुन्द्र है।गुरू रत्नों की खान है।उसमें (सु-जीवन शिक्षा के) अनेकों रत्न हैं।

संदर्भ: यह अंग 436 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Lohri की रात अगियारी के पास, गाने और तिल-गुड़।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 36 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 436” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 437 →, पीछे का: ← अंग 435

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।