अंग
401
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਰੂ ਵਿਟਹੁ ਹਉ ਵਾਰਿਆ ਜਿਸੁ ਮਿਲਿ ਸਚੁ ਸੁਆਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਗੁਨ ਅਪਸਗੁਨ ਤਿਸ ਕਉ ਲਗਹਿ ਜਿਸੁ ਚੀਤਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਤਿਸੁ ਜਮੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵਈ ਜੋ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭਿ ਭਾਵੈ ॥੨॥
ਪੁੰਨ ਦਾਨ ਜਪ ਤਪ ਜੇਤੇ ਸਭ ਊਪਰਿ ਨਾਮੁ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਰਸਨਾ ਜੋ ਜਪੈ ਤਿਸੁ ਪੂਰਨ ਕਾਮੁ ॥੩॥
ਭੈ ਬਿਨਸੇ ਭ੍ਰਮ ਮੋਹ ਗਏ ਕੋ ਦਿਸੈ ਨ ਬੀਆ ॥
ਨਾਨਕ ਰਾਖੇ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮਿ ਫਿਰਿ ਦੂਖੁ ਨ ਥੀਆ ॥੪॥੧੮॥੧੨੦॥
ਸਗੁਨ ਅਪਸਗੁਨ ਤਿਸ ਕਉ ਲਗਹਿ ਜਿਸੁ ਚੀਤਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਤਿਸੁ ਜਮੁ ਨੇੜਿ ਨ ਆਵਈ ਜੋ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭਿ ਭਾਵੈ ॥੨॥
ਪੁੰਨ ਦਾਨ ਜਪ ਤਪ ਜੇਤੇ ਸਭ ਊਪਰਿ ਨਾਮੁ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਰਸਨਾ ਜੋ ਜਪੈ ਤਿਸੁ ਪੂਰਨ ਕਾਮੁ ॥੩॥
ਭੈ ਬਿਨਸੇ ਭ੍ਰਮ ਮੋਹ ਗਏ ਕੋ ਦਿਸੈ ਨ ਬੀਆ ॥
ਨਾਨਕ ਰਾਖੇ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮਿ ਫਿਰਿ ਦੂਖੁ ਨ ਥੀਆ ॥੪॥੧੮॥੧੨੦॥
गुरू विटहु हउ वारिआ जिसु मिलि सचु सुआउ ॥१॥ रहाउ ॥
सगुन अपसगुन तिस कउ लगहि जिसु चीति न आवै ॥
तिसु जमु नेड़ि न आवई जो हरि प्रभि भावै ॥२॥
पुंन दान जप तप जेते सभ ऊपरि नामु ॥
हरि हरि रसना जो जपै तिसु पूरन कामु ॥३॥
भै बिनसे भ्रम मोह गए को दिसै न बीआ ॥
नानक राखे पारब्रहमि फिरि दूखु न थीआ ॥४॥१८॥१२०॥
सगुन अपसगुन तिस कउ लगहि जिसु चीति न आवै ॥
तिसु जमु नेड़ि न आवई जो हरि प्रभि भावै ॥२॥
पुंन दान जप तप जेते सभ ऊपरि नामु ॥
हरि हरि रसना जो जपै तिसु पूरन कामु ॥३॥
भै बिनसे भ्रम मोह गए को दिसै न बीआ ॥
नानक राखे पारब्रहमि फिरि दूखु न थीआ ॥४॥१८॥१२०॥
हिन्दी अर्थ: क्योंकि उस (गुरू) को मिल के ही मैंने सदा स्थिर प्रभू का नाम सिमरना (अपनी जिंदगी का) उद्देश्य बनाया है। 1।रहाउ। (हे भाई ! मेरे अंदर अच्छे-बुरे शगुनों का सहिम भी नहींरह गया) अच्छे-बुरे शगुनों के सहम उस मनुष्य को चिपकते हैं जिसके चित्त में परमात्मा नहीं बसता।पर। जो मनुष्य प्रभू (की याद) में (जुड़ के) हरि-प्रभू को प्यारा लगने लग पड़ता है जमदूत भी उसके नजदीक नहीं फटकते। 2। (हे भाई ! निहित) नेक कर्म।दान।जप व तप- ये जितने भी हैं परमात्मा का नाम जपना इन सभी में से श्रेष्ठ कर्म है। जो मनुष्य अपनी जीभ से परमात्मा का नाम जपता है उसका जीवन मनोरथ सफल हो जाता है। 3। उनके सारे डर नाश हो जाते हैं उनके मोह के भरम समाप्त हो जाते हैं।उन्हें कोई मनुष्य बेगाना नहीं दिखाई देता। हे नानक ! जिन मनुष्यों की रक्षा परमात्मा ने स्वयं की है उन्हें दुबारा कोई दुख नहीं व्याप्ता। 4। 18। 120।
ਆਸਾ ਘਰੁ ੯ ਮਹਲਾ ੫
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਚਿਤਵਉ ਚਿਤਵਿ ਸਰਬ ਸੁਖ ਪਾਵਉ ਆਗੈ ਭਾਵਉ ਕਿ ਨ ਭਾਵਉ ॥
ਏਕੁ ਦਾਤਾਰੁ ਸਗਲ ਹੈ ਜਾਚਿਕ ਦੂਸਰ ਕੈ ਪਹਿ ਜਾਵਉ ॥੧॥
ਹਉ ਮਾਗਉ ਆਨ ਲਜਾਵਉ ॥
ਸਗਲ ਛਤ੍ਰਪਤਿ ਏਕੋ ਠਾਕੁਰੁ ਕਉਨੁ ਸਮਸਰਿ ਲਾਵਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਊਠਉ ਬੈਸਉ ਰਹਿ ਭਿ ਨ ਸਾਕਉ ਦਰਸਨੁ ਖੋਜਿ ਖੋਜਾਵਉ ॥
ਬ੍ਰਹਮਾਦਿਕ ਸਨਕਾਦਿਕ ਸਨਕ ਸਨੰਦਨ ਸਨਾਤਨ ਸਨਤਕੁਮਾਰ ਤਿਨੑ ਕਉ ਮਹਲੁ ਦੁਲਭਾਵਉ ॥੨॥
ਅਗਮ ਅਗਮ ਆਗਾਧਿ ਬੋਧ ਕੀਮਤਿ ਪਰੈ ਨ ਪਾਵਉ ॥
ਤਾਕੀ ਸਰਣਿ ਸਤਿ ਪੁਰਖ ਕੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਧਿਆਵਉ ॥੩॥
ਭਇਓ ਕ੍ਰਿਪਾਲੁ ਦਇਆਲੁ ਪ੍ਰਭੁ ਠਾਕੁਰੁ ਕਾਟਿਓ ਬੰਧੁ ਗਰਾਵਉ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਉ ਸਾਧਸੰਗੁ ਪਾਇਓ ਤਉ ਫਿਰਿ ਜਨਮਿ ਨ ਆਵਉ ॥੪॥੧॥੧੨੧॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਚਿਤਵਉ ਚਿਤਵਿ ਸਰਬ ਸੁਖ ਪਾਵਉ ਆਗੈ ਭਾਵਉ ਕਿ ਨ ਭਾਵਉ ॥
ਏਕੁ ਦਾਤਾਰੁ ਸਗਲ ਹੈ ਜਾਚਿਕ ਦੂਸਰ ਕੈ ਪਹਿ ਜਾਵਉ ॥੧॥
ਹਉ ਮਾਗਉ ਆਨ ਲਜਾਵਉ ॥
ਸਗਲ ਛਤ੍ਰਪਤਿ ਏਕੋ ਠਾਕੁਰੁ ਕਉਨੁ ਸਮਸਰਿ ਲਾਵਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਊਠਉ ਬੈਸਉ ਰਹਿ ਭਿ ਨ ਸਾਕਉ ਦਰਸਨੁ ਖੋਜਿ ਖੋਜਾਵਉ ॥
ਬ੍ਰਹਮਾਦਿਕ ਸਨਕਾਦਿਕ ਸਨਕ ਸਨੰਦਨ ਸਨਾਤਨ ਸਨਤਕੁਮਾਰ ਤਿਨੑ ਕਉ ਮਹਲੁ ਦੁਲਭਾਵਉ ॥੨॥
ਅਗਮ ਅਗਮ ਆਗਾਧਿ ਬੋਧ ਕੀਮਤਿ ਪਰੈ ਨ ਪਾਵਉ ॥
ਤਾਕੀ ਸਰਣਿ ਸਤਿ ਪੁਰਖ ਕੀ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਧਿਆਵਉ ॥੩॥
ਭਇਓ ਕ੍ਰਿਪਾਲੁ ਦਇਆਲੁ ਪ੍ਰਭੁ ਠਾਕੁਰੁ ਕਾਟਿਓ ਬੰਧੁ ਗਰਾਵਉ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਉ ਸਾਧਸੰਗੁ ਪਾਇਓ ਤਉ ਫਿਰਿ ਜਨਮਿ ਨ ਆਵਉ ॥੪॥੧॥੧੨੧॥
आसा घरु ९ महला ५
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चितवउ चितवि सरब सुख पावउ आगै भावउ कि न भावउ ॥
एकु दातारु सगल है जाचिक दूसर कै पहि जावउ ॥१॥
हउ मागउ आन लजावउ ॥
सगल छत्रपति एको ठाकुरु कउनु समसरि लावउ ॥१॥ रहाउ ॥
ऊठउ बैसउ रहि भि न साकउ दरसनु खोजि खोजावउ ॥
ब्रहमादिक सनकादिक सनक सनंदन सनातन सनतकुमार तिन॑ कउ महलु दुलभावउ ॥२॥
अगम अगम आगाधि बोध कीमति परै न पावउ ॥
ताकी सरणि सति पुरख की सतिगुरु पुरखु धिआवउ ॥३॥
भइओ क्रिपालु दइआलु प्रभु ठाकुरु काटिओ बंधु गरावउ ॥
कहु नानक जउ साधसंगु पाइओ तउ फिरि जनमि न आवउ ॥४॥१॥१२१॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
चितवउ चितवि सरब सुख पावउ आगै भावउ कि न भावउ ॥
एकु दातारु सगल है जाचिक दूसर कै पहि जावउ ॥१॥
हउ मागउ आन लजावउ ॥
सगल छत्रपति एको ठाकुरु कउनु समसरि लावउ ॥१॥ रहाउ ॥
ऊठउ बैसउ रहि भि न साकउ दरसनु खोजि खोजावउ ॥
ब्रहमादिक सनकादिक सनक सनंदन सनातन सनतकुमार तिन॑ कउ महलु दुलभावउ ॥२॥
अगम अगम आगाधि बोध कीमति परै न पावउ ॥
ताकी सरणि सति पुरख की सतिगुरु पुरखु धिआवउ ॥३॥
भइओ क्रिपालु दइआलु प्रभु ठाकुरु काटिओ बंधु गरावउ ॥
कहु नानक जउ साधसंगु पाइओ तउ फिरि जनमि न आवउ ॥४॥१॥१२१॥
हिन्दी अर्थ: आसा घरु ९ महला ५ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई !) मैं (सदा) चाहता (तो ये) हूँ कि परमात्मा का सिमरन करके (उससे) मैं सारे सुख हासिल करूँ (पर मुझे ये पता नहीं कि ये तमन्ना करके) मैं प्रभू की हजूरी में ठीक लग रहा हूँ कि नहीं। (कोई सुख आदि मांगने के लिए) मैं किसी और के पास जा भी नहीं सकता।क्योंकि दातें देने वाला तो सिर्फ एक परमात्मा ही है और सृष्टि (उसके दर से) मांगने वाली है। (हे भाई ! जब) मैं (परमात्मा के बिना) किसी और से मांगता हूँ तो शर्माता हूँ (क्योंकि) एक मालिक प्रभू ही सब जीवों का राजा है। मैं किसी और को उसके बराबर का सोच ही नहीं सकता। 1।रहाउ। (हे भाई ! परमात्मा का दर्शन करने के लिए) मैं उठता हूँ (कोशिश करता हूँ।फिर) बैठ जाता हूँ।(पर दर्शन किए बिना) रह भी नहीं सकता।दुबारा खोज-खोज के दर्शन तलाशता हूँ। (मैं बेचारा क्या चीज हूँ। ) परमात्मा के ठिकाने तो उनके वास्ते भी दुर्लभ ही रहे जो ब्रहमा जैसे (बड़े-बड़े देवता माने गए) जो सनक जैसे-सनक।सनंदन।सनातन व सनत कुमार (ब्रहमा के पुत्र कहलवाए)। 2। हे भाई ! परमात्मा अपहुँच है।जीवों की पहुँच से परे है।वह एक अथाह समुंद्र है जिसकी गहराई की सूझ नहीं पड़ सकती।उसकी कीमत नहीं लगाई जा सकती।मैं उसका मूल्य नहीं निश्चित कर सकता। (हे भाई ! उसके दर्शन की खातिर) मैंने गुरू महापुरख की शरण देखी है।मैं सतिगुरू की आराधना करता हूँ। 3। हे भाई ! जिस मनुष्य पर ठाकुर प्रभू दयावान होता है उसके गले की (माया के मोह की) फाही काट देता है। हे नानक ! कह,अगर मुझे साधसंगति प्राप्त हो जाए।तो ही मैं बार-बार जन्मों में नहीं आऊँगा (जन्मों के चक्करों से बच सकूँगा)। 4। 1। 121।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਅੰਤਰਿ ਗਾਵਉ ਬਾਹਰਿ ਗਾਵਉ ਗਾਵਉ ਜਾਗਿ ਸਵਾਰੀ ॥
ਸੰਗਿ ਚਲਨ ਕਉ ਤੋਸਾ ਦੀਨੑਾ ਗੋਬਿੰਦ ਨਾਮ ਕੇ ਬਿਉਹਾਰੀ ॥੧॥
ਅਵਰ ਬਿਸਾਰੀ ਬਿਸਾਰੀ ॥
ਨਾਮ ਦਾਨੁ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਦੀਓ ਮੈ ਏਹੋ ਆਧਾਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦੂਖਨਿ ਗਾਵਉ ਸੁਖਿ ਭੀ ਗਾਵਉ ਮਾਰਗਿ ਪੰਥਿ ਸਮੑਾਰੀ ॥
ਨਾਮ ਦ੍ਰਿੜੁ ਗੁਰਿ ਮਨ ਮਹਿ ਦੀਆ ਮੋਰੀ ਤਿਸਾ ਬੁਝਾਰੀ ॥੨॥
ਦਿਨੁ ਭੀ ਗਾਵਉ ਰੈਨੀ ਗਾਵਉ ਗਾਵਉ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਰਸਨਾਰੀ ॥
ਸਤਸੰਗਤਿ ਮਹਿ ਬਿਸਾਸੁ ਹੋਇ ਹਰਿ ਜੀਵਤ ਮਰਤ ਸੰਗਾਰੀ ॥੩॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਕਉ ਇਹੁ ਦਾਨੁ ਦੇਹੁ ਪ੍ਰਭ ਪਾਵਉ ਸੰਤ ਰੇਨ ਉਰਿ ਧਾਰੀ ॥
ਸ੍ਰਵਨੀ ਕਥਾ ਨੈਨ ਦਰਸੁ ਪੇਖਉ ਮਸਤਕੁ ਗੁਰ ਚਰਨਾਰੀ ॥੪॥੨॥੧੨੨॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਆਸਾ ਘਰੁ ੧੦ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਤੂੰ ਅਸਥਿਰੁ ਕਰਿ ਮਾਨਹਿ ਤੇ ਪਾਹੁਨ ਦੋ ਦਾਹਾ ॥
ਅੰਤਰਿ ਗਾਵਉ ਬਾਹਰਿ ਗਾਵਉ ਗਾਵਉ ਜਾਗਿ ਸਵਾਰੀ ॥
ਸੰਗਿ ਚਲਨ ਕਉ ਤੋਸਾ ਦੀਨੑਾ ਗੋਬਿੰਦ ਨਾਮ ਕੇ ਬਿਉਹਾਰੀ ॥੧॥
ਅਵਰ ਬਿਸਾਰੀ ਬਿਸਾਰੀ ॥
ਨਾਮ ਦਾਨੁ ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਦੀਓ ਮੈ ਏਹੋ ਆਧਾਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦੂਖਨਿ ਗਾਵਉ ਸੁਖਿ ਭੀ ਗਾਵਉ ਮਾਰਗਿ ਪੰਥਿ ਸਮੑਾਰੀ ॥
ਨਾਮ ਦ੍ਰਿੜੁ ਗੁਰਿ ਮਨ ਮਹਿ ਦੀਆ ਮੋਰੀ ਤਿਸਾ ਬੁਝਾਰੀ ॥੨॥
ਦਿਨੁ ਭੀ ਗਾਵਉ ਰੈਨੀ ਗਾਵਉ ਗਾਵਉ ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਰਸਨਾਰੀ ॥
ਸਤਸੰਗਤਿ ਮਹਿ ਬਿਸਾਸੁ ਹੋਇ ਹਰਿ ਜੀਵਤ ਮਰਤ ਸੰਗਾਰੀ ॥੩॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਕਉ ਇਹੁ ਦਾਨੁ ਦੇਹੁ ਪ੍ਰਭ ਪਾਵਉ ਸੰਤ ਰੇਨ ਉਰਿ ਧਾਰੀ ॥
ਸ੍ਰਵਨੀ ਕਥਾ ਨੈਨ ਦਰਸੁ ਪੇਖਉ ਮਸਤਕੁ ਗੁਰ ਚਰਨਾਰੀ ॥੪॥੨॥੧੨੨॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਆਸਾ ਘਰੁ ੧੦ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਿਸ ਨੋ ਤੂੰ ਅਸਥਿਰੁ ਕਰਿ ਮਾਨਹਿ ਤੇ ਪਾਹੁਨ ਦੋ ਦਾਹਾ ॥
आसा महला ५ ॥
अंतरि गावउ बाहरि गावउ गावउ जागि सवारी ॥
संगि चलन कउ तोसा दीन॑ा गोबिंद नाम के बिउहारी ॥१॥
अवर बिसारी बिसारी ॥
नाम दानु गुरि पूरै दीओ मै एहो आधारी ॥१॥ रहाउ ॥
दूखनि गावउ सुखि भी गावउ मारगि पंथि सम॑ारी ॥
नाम द्रिड़ु गुरि मन महि दीआ मोरी तिसा बुझारी ॥२॥
दिनु भी गावउ रैनी गावउ गावउ सासि सासि रसनारी ॥
सतसंगति महि बिसासु होइ हरि जीवत मरत संगारी ॥३॥
जन नानक कउ इहु दानु देहु प्रभ पावउ संत रेन उरि धारी ॥
स्रवनी कथा नैन दरसु पेखउ मसतकु गुर चरनारी ॥४॥२॥१२२॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आसा घरु १० महला ५ ॥
जिस नो तूं असथिरु करि मानहि ते पाहुन दो दाहा ॥
अंतरि गावउ बाहरि गावउ गावउ जागि सवारी ॥
संगि चलन कउ तोसा दीन॑ा गोबिंद नाम के बिउहारी ॥१॥
अवर बिसारी बिसारी ॥
नाम दानु गुरि पूरै दीओ मै एहो आधारी ॥१॥ रहाउ ॥
दूखनि गावउ सुखि भी गावउ मारगि पंथि सम॑ारी ॥
नाम द्रिड़ु गुरि मन महि दीआ मोरी तिसा बुझारी ॥२॥
दिनु भी गावउ रैनी गावउ गावउ सासि सासि रसनारी ॥
सतसंगति महि बिसासु होइ हरि जीवत मरत संगारी ॥३॥
जन नानक कउ इहु दानु देहु प्रभ पावउ संत रेन उरि धारी ॥
स्रवनी कथा नैन दरसु पेखउ मसतकु गुर चरनारी ॥४॥२॥१२२॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आसा घरु १० महला ५ ॥
जिस नो तूं असथिरु करि मानहि ते पाहुन दो दाहा ॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ अब मैं अपने हृदय में परमात्मा के गुण गाता हूँ।बाहर दुनिया से कार्य-व्यवहार करते हुए भी परमात्मा की सिफत सालाह याद रखता हूँ।सोने के समय भी और जाग के भी मैं परमात्मा की सिफत सालाह करता हूँ। (हे भाई !) परमात्मा के नाम के वणजारे सत्संगियों ने मेरे से साथ करने के लिए मुझे (परमात्मा का नाम) यात्रा-खर्च (के तौर पर) दे दिया है। 1। (हे भाई ! परमात्मा के बिना) कोई अन्य ओट मैंने बिल्कुल ही भुला दी है। पूरे गुरू ने मुझे परमात्मा के नाम (की) दाति दी है।मैंने इसी को (अपनी जिंदगी का) आसरा बना लिया है। 1।रहाउ। अब मैं दुखों में परमात्मा के गुण गाता रहता हूँ।सुख में भी गाता हूँ।रास्ते पर चलते हुए भी (परमात्मा की याद को अपने दिल में) संभाले रखता हूँ। (हे भाई !) गुरू ने मेरे मन में प्रभू-नाम दृढ़ कर दिया है (उस नाम ने) मेरी तृष्णा मिटा दी है।2। (हे भाई !) अब मैं दिन में भी और रात को भी।और हरेक सांस के साथ भी अपनी जीभ से परमात्मा के गुण गाता रहता हूँ। (हे भाई ! ये सारी बरकति साध-संगति की है) साध-संगति में टिकने से ये निश्चय बन जाता है कि परमात्मा जीते-मरते हर वक्त हमारे साथ रहता है। 3। हे प्रभू ! अपने दास नानक को ये दान दे कि मैं तेरे संत-जनों की चरण-धूड़ प्राप्त करूँ। तेरी याद को अपने हृदय में टिकाए रखूँ।तेरी सिफत सालाह अपने कानों से सुनता रहूँ।तेरे दर्शन अपनी आँखों से करता रहूँ।और अपना माथा गुरू के चरणों में रखे रखूँ। 4। 2। 122। ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। आसा घरु १० महला ५ ॥ हे मन ! जिस पुत्र को जिस स्त्री को जिस घर के सामान को तू सदा कायम रहने वाला माने बैठा है।ये सारे तो दो दिनों के मेहमान हैं।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 401 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Connaught Place के Bangla Sahib में दोपहर 12 बजे का langar-समय, और बीच में यह पंक्ति।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 33 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 401” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 402 →, पीछे का: ← अंग 400।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।