अंग 428

अंग
428
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਘਰ ਹੀ ਸੋ ਪਿਰੁ ਪਾਇਆ ਸਚੈ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਿ ॥੧॥
ਅਵਗਣ ਗੁਣੀ ਬਖਸਾਇਆ ਹਰਿ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥
ਹਰਿ ਵਰੁ ਪਾਇਆ ਕਾਮਣੀ ਗੁਰਿ ਮੇਲਿ ਮਿਲਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਇਕਿ ਪਿਰੁ ਹਦੂਰਿ ਨ ਜਾਣਨੑੀ ਦੂਜੈ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇ ॥
ਕਿਉ ਪਾਇਨਿੑ ਡੋਹਾਗਣੀ ਦੁਖੀ ਰੈਣਿ ਵਿਹਾਇ ॥੨॥
ਜਿਨ ਕੈ ਮਨਿ ਸਚੁ ਵਸਿਆ ਸਚੀ ਕਾਰ ਕਮਾਇ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਸੇਵਹਿ ਸਹਜ ਸਿਉ ਸਚੇ ਮਾਹਿ ਸਮਾਇ ॥੩॥
ਦੋਹਾਗਣੀ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਈਆ ਕੂੜੁ ਬੋਲਿ ਬਿਖੁ ਖਾਹਿ ॥
ਪਿਰੁ ਨ ਜਾਣਨਿ ਆਪਣਾ ਸੁੰਞੀ ਸੇਜ ਦੁਖੁ ਪਾਹਿ ॥੪॥
ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਏਕੁ ਹੈ ਮਤੁ ਮਨ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਹਿ ॥
ਗੁਰ ਪੂਛਿ ਸੇਵਾ ਕਰਹਿ ਸਚੁ ਨਿਰਮਲੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਹਿ ॥੫॥
ਸੋਹਾਗਣੀ ਸਦਾ ਪਿਰੁ ਪਾਇਆ ਹਉਮੈ ਆਪੁ ਗਵਾਇ ॥
ਪਿਰ ਸੇਤੀ ਅਨਦਿਨੁ ਗਹਿ ਰਹੀ ਸਚੀ ਸੇਜ ਸੁਖੁ ਪਾਇ ॥੬॥
ਮੇਰੀ ਮੇਰੀ ਕਰਿ ਗਏ ਪਲੈ ਕਿਛੁ ਨ ਪਾਇ ॥
ਮਹਲੁ ਨਾਹੀ ਡੋਹਾਗਣੀ ਅੰਤਿ ਗਈ ਪਛੁਤਾਇ ॥੭॥
ਸੋ ਪਿਰੁ ਮੇਰਾ ਏਕੁ ਹੈ ਏਕਸੁ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਜੇ ਸੁਖੁ ਲੋੜਹਿ ਕਾਮਣੀ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਮੰਨਿ ਵਸਾਇ ॥੮॥੧੧॥੩੩॥
घर ही सो पिरु पाइआ सचै सबदि वीचारि ॥१॥
अवगण गुणी बखसाइआ हरि सिउ लिव लाई ॥
हरि वरु पाइआ कामणी गुरि मेलि मिलाई ॥१॥ रहाउ ॥
इकि पिरु हदूरि न जाणन॑ी दूजै भरमि भुलाइ ॥
किउ पाइनि॑ डोहागणी दुखी रैणि विहाइ ॥२॥
जिन कै मनि सचु वसिआ सची कार कमाइ ॥
अनदिनु सेवहि सहज सिउ सचे माहि समाइ ॥३॥
दोहागणी भरमि भुलाईआ कूड़ु बोलि बिखु खाहि ॥
पिरु न जाणनि आपणा सुंञी सेज दुखु पाहि ॥४॥
सचा साहिबु एकु है मतु मन भरमि भुलाहि ॥
गुर पूछि सेवा करहि सचु निरमलु मंनि वसाहि ॥५॥
सोहागणी सदा पिरु पाइआ हउमै आपु गवाइ ॥
पिर सेती अनदिनु गहि रही सची सेज सुखु पाइ ॥६॥
मेरी मेरी करि गए पलै किछु न पाइ ॥
महलु नाही डोहागणी अंति गई पछुताइ ॥७॥
सो पिरु मेरा एकु है एकसु सिउ लिव लाइ ॥
नानक जे सुखु लोड़हि कामणी हरि का नामु मंनि वसाइ ॥८॥११॥३३॥

हिन्दी अर्थ: सदा स्थिर हरी की सिफतसालाह वाले गुर-शबद के द्वारा (प्रभू के गुणों को ) विचार के उन्होंने प्रभू पति को अपने हृदय घर में ही पा लिया। 1। जिस जीव-स्त्री ने परमात्मा के चरणों में सुरति जोड़ ली उसने अपने (पहले किए) अवगुण।गुणों की बरकति से बख्शवा लिए। उस जीव-स्त्री ने प्रभू-पति का मिलाप हासिल कर लिया।गुरू ने उसको प्रभू चरणों में जोड़ दिया। 1।रहाउ। जो जीव-सि्त्रयां माया की भटकना के कारण गलत रास्ते पर पड़ के प्रभू-पति को अंग-संग बसता नहीं समझतीं। वह दुर्भाग्यनियां प्रभू-पति को नहीं मिल सकतीं।उनकी (जिंदगी की सारी) रात दुखों में बीत जाती है। 2। सदा-स्थिर हरी की सिफत सालाह की कार कमा के जिनके मन में सदा-स्थिर हरी आ बसता है वह सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू में लीन हो के आत्मिक अडोलता से हर वक्त उस प्रभू की सेवा-भक्ति करती रहती हैं। 3। दुर्भाग्यशाली जीव-सि्त्रयां माया की भटकना के कारण गलत रास्ते पर पड़ जाती है वह (माया के मोह वाला ही) व्यर्थ बोल-बोल के (माया के मोह का) जहर खाती रहती है (जो उनके आत्मिक जीवन को समाप्त कर देता है)। वे कभी अपने प्रभू के साथ गहरी सांझ नहीं डालती।उनके हृदय की सेज सदा खाली पड़ी रहती है। 4। हे मेरे मन ! कहीं ऐसा ना हो कि तू माया की भटकना में पड़ के गलत रास्ते पर पड़ जाए (याद रख) सदा कायम रहने वाला सिर्फ एक मालिक प्रभू ही है। अगर तू गुरू की शिक्षा ले के उसकी सेवा-भक्ति करेगा।तो उस सदा-स्थिर पवित्र प्रभू को अपने अंदर बसा लेगा। 5। अच्छे भाग्यों वाली जीव-स्त्री अपने अंदर से अहंकार गवा के सदा-स्थिर प्रभू-पति को मिल जाती है। वह हर समय प्रभू-पति के चरणों से जुड़ी रहती है। उस (के हृदय) की सेज अडोल हो जाती है वह सदा आत्मिक आनंद पाती है। 6। हे भाई ! जो लोग यही कहते-कहते जगत से चले गए कि ये मेरी माया है ये मेरी मल्कियत है उनके हाथ-पल्ले कुछ भी ना पड़ा। दुर्भाग्यपूर्ण जीव-स्त्री को परमात्मा के चरणों में ठिकाना नहीं मिलता।वह दुनिया से आखिर हाथ मलती ही जाती है। 7। हे जीव-स्त्री ! सदा कायम रहने वाला प्रभू-पति सिर्फ एक ही है।उस एक के चरणों में सुरति जोड़े रख। हे नानक ! (कह,) हे जीव-स्त्री ! अगर तू सुख हासिल करना चाहती है तो उस परमात्मा का नाम अपने मन में बसाए रख। 8। 11। 33।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਜਿਨੑਾ ਚਖਾਇਓਨੁ ਰਸੁ ਆਇਆ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥
ਸਚਾ ਵੇਪਰਵਾਹੁ ਹੈ ਤਿਸ ਨੋ ਤਿਲੁ ਨ ਤਮਾਇ ॥੧॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਸਚਾ ਵਰਸਦਾ ਗੁਰਮੁਖਾ ਮੁਖਿ ਪਾਇ ॥
ਮਨੁ ਸਦਾ ਹਰੀਆਵਲਾ ਸਹਜੇ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਸਦਾ ਦੋਹਾਗਣੀ ਦਰਿ ਖੜੀਆ ਬਿਲਲਾਹਿ ॥
ਜਿਨੑਾ ਪਿਰ ਕਾ ਸੁਆਦੁ ਨ ਆਇਓ ਜੋ ਧੁਰਿ ਲਿਖਿਆ ਸੋੁ ਕਮਾਹਿ ॥੨॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਬੀਜੇ ਸਚੁ ਜਮੈ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਵਾਪਾਰੁ ॥
ਜੋ ਇਤੁ ਲਾਹੈ ਲਾਇਅਨੁ ਭਗਤੀ ਦੇਇ ਭੰਡਾਰ ॥੩॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਦਾ ਸੋਹਾਗਣੀ ਭੈ ਭਗਤਿ ਸੀਗਾਰਿ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਰਾਵਹਿ ਪਿਰੁ ਆਪਣਾ ਸਚੁ ਰਖਹਿ ਉਰ ਧਾਰਿ ॥੪॥
ਜਿਨੑਾ ਪਿਰੁ ਰਾਵਿਆ ਆਪਣਾ ਤਿਨੑਾ ਵਿਟਹੁ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥
ਸਦਾ ਪਿਰ ਕੈ ਸੰਗਿ ਰਹਹਿ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਇ ॥੫॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਸੀਤਲੁ ਮੁਖ ਉਜਲੇ ਪਿਰ ਕੈ ਭਾਇ ਪਿਆਰਿ ॥
ਸੇਜ ਸੁਖਾਲੀ ਪਿਰੁ ਰਵੈ ਹਉਮੈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਮਾਰਿ ॥੬॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਘਰਿ ਆਇਆ ਗੁਰ ਕੈ ਹੇਤਿ ਅਪਾਰਿ ॥
ਵਰੁ ਪਾਇਆ ਸੋਹਾਗਣੀ ਕੇਵਲ ਏਕੁ ਮੁਰਾਰਿ ॥੭॥
ਸਭੇ ਗੁਨਹ ਬਖਸਾਇ ਲਇਓਨੁ ਮੇਲੇ ਮੇਲਣਹਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਆਖਣੁ ਆਖੀਐ ਜੇ ਸੁਣਿ ਧਰੇ ਪਿਆਰੁ ॥੮॥੧੨॥੩੪॥
आसा महला ३ ॥
अंम्रितु जिन॑ा चखाइओनु रसु आइआ सहजि सुभाइ ॥
सचा वेपरवाहु है तिस नो तिलु न तमाइ ॥१॥
अंम्रितु सचा वरसदा गुरमुखा मुखि पाइ ॥
मनु सदा हरीआवला सहजे हरि गुण गाइ ॥१॥ रहाउ ॥
मनमुखि सदा दोहागणी दरि खड़ीआ बिललाहि ॥
जिन॑ा पिर का सुआदु न आइओ जो धुरि लिखिआ सोु कमाहि ॥२॥
गुरमुखि बीजे सचु जमै सचु नामु वापारु ॥
जो इतु लाहै लाइअनु भगती देइ भंडार ॥३॥
गुरमुखि सदा सोहागणी भै भगति सीगारि ॥
अनदिनु रावहि पिरु आपणा सचु रखहि उर धारि ॥४॥
जिन॑ा पिरु राविआ आपणा तिन॑ा विटहु बलि जाउ ॥
सदा पिर कै संगि रहहि विचहु आपु गवाइ ॥५॥
तनु मनु सीतलु मुख उजले पिर कै भाइ पिआरि ॥
सेज सुखाली पिरु रवै हउमै त्रिसना मारि ॥६॥
करि किरपा घरि आइआ गुर कै हेति अपारि ॥
वरु पाइआ सोहागणी केवल एकु मुरारि ॥७॥
सभे गुनह बखसाइ लइओनु मेले मेलणहारि ॥
नानक आखणु आखीऐ जे सुणि धरे पिआरु ॥८॥१२॥३४॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ३ ॥ जिन्हें आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल परमात्मा ने (गुरू के द्वारा) खुद चखाया।उन्हें आत्मिक अडोलता में प्रेम में टिक के उसका स्वाद आ गया (उन्हें ये भी समझ आ गई कि) वह सदा-स्थिर प्रभू बे-मुथाज है उसे रत्ती भर भी (किसी किस्म की कोई) लालच नहीं। 1। हे भाई ! सदा-स्थिर रहने वाला और आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल (हर जगह) बरस रहा है।पर ये पड़ता है उन मनुष्यों के मुंह में जो गुरू के सन्मुख रहते हैं। आत्मिक अडोलता में टिक के हरी के गुण गा-गा के उनका मन सदा खिला रहता है। 1।रहाउ। (हे भाई !) अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-सि्त्रयां सदा दुर्भाग्यशाली रहतीं हैं वह प्रभू के दर पर खड़ी (हुई भी) बिलकती हैं। जिन्हें प्रभू पति के मिलाप का कभी स्वाद नहीं आया वे वही मनमुखता वाले कर्म कमाती रहती हैं जो धुर-दरगाह से उनके पिछले किए कर्मों के अनुसार उनके माथे पर लिखे हुए हैं। 2। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम (अपने हृदय-खेत में) बीजता है ये नाम ही वहीं पर उगता है।सदा स्थिर नाम को हीवह अपना वणज-व्यापार बनाता है। जिन मनुष्यों को प्रभू ने इस लाभशाली काम में लगाया है उन्हें अपनी भक्ति के खजाने दे देता है। 3। गुरू के सन्मुख रहने वाली जीव-सि्त्रयां सदा सौभाग्यशाली होती हैं।वे प्रभू के डर-अदब में रह कर प्रभू की भक्ति के द्वारा अपना आत्मिक जीवन सोहणा बनाती हैं। वे हर समय प्रभू-पति के मिलाप का आनंद लेती हैं।वे सदा-स्थिर हरी-नाम को अपने हृदय में टिका के रखती हैं। 4। हे भाई ! मैं कुर्बान जाता हूँ उनसे जिन्होंने प्रभू-पति के मिलाप को सदा पाया है। वे अपने अंदर से स्वै-भाव दूर करके सदा प्रभू-पति के चरणों में जुड़ी रहती हैं। 5। प्रभू-पति के प्रेम में प्यार में रहने वालियों का मन और हृदय ठंडा-ठार रहता है उनके मुंह (लोक-परलोक में) रौशन हो जाते हैं। अपने अंदर से अहंकार को तृष्णा को मार के उनकी हृदय सेज सुखदाई हो जाती है।प्रभू-पति (उस सेज पर) सदा आ के टिके रहते हैं। 6। गुरू की अपार मेहर की बरकति से प्रभू कृपा करके जिस जीव-स्त्री के हृदय-घर में आ बसता है वह सौभाग्यवती उस प्रभू-पति को मिल जाती है जो अपने जैसा एक स्वयं ही है। 7। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ के जिस मनुष्य ने प्रभू की सिफत सालाह की।उसने (पिछले किए अपने) सारे पाप बख्शवा लिए।मिलाने की समर्था रखने वाले प्रभू ने उसे अपने चरणों में मिला लिया। हे नानक ! (कह,हे भाई ! प्रभू की सिफत सालाह के) बोल ही बोलने चाहिए जिसे सुन के वह प्रभू (हमारे साथ) प्यार करे। 8। 12। 34।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਤੇ ਗੁਣ ਊਪਜੈ ਜਾ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਲੈ ਸੋਇ ॥
आसा महला ३ ॥
सतिगुर ते गुण ऊपजै जा प्रभु मेलै सोइ ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ३ ॥ जब प्रभू उस गुरू से मिला देता है तब गुरू से गुणों की दाति मिलती है।

संदर्भ: यह अंग 428 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।

Sangam Vihar में सुबह 4 बजे जब रसोई शुरू होती है।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 38 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 428” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 429 →, पीछे का: ← अंग 427

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।