अंग 409

अंग
409
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਤਜਿ ਮਾਨ ਮੋਹ ਵਿਕਾਰ ਮਿਥਿਆ ਜਪਿ ਰਾਮ ਰਾਮ ਰਾਮ ॥
ਮਨ ਸੰਤਨਾ ਕੈ ਚਰਨਿ ਲਾਗੁ ॥੧॥
ਪ੍ਰਭ ਗੋਪਾਲ ਦੀਨ ਦਇਆਲ ਪਤਿਤ ਪਾਵਨ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਹਰਿ ਚਰਣ ਸਿਮਰਿ ਜਾਗੁ ॥
ਕਰਿ ਭਗਤਿ ਨਾਨਕ ਪੂਰਨ ਭਾਗੁ ॥੨॥੪॥੧੫੫॥
तजि मान मोह विकार मिथिआ जपि राम राम राम ॥
मन संतना कै चरनि लागु ॥१॥
प्रभ गोपाल दीन दइआल पतित पावन पारब्रहम हरि चरण सिमरि जागु ॥
करि भगति नानक पूरन भागु ॥२॥४॥१५५॥

हिन्दी अर्थ: हे मन ! अहंकार-मोह-विकार-झूठ त्याग दे।सदा परमात्मा का सिमरन किया कर। और संत-जनों की शरण पड़ा रह। 1। हे भाई ! उस हरी-प्रभू के चरणों का ध्यान धर के (माया के हमलों से) सचेत रह।जो धरती का रखवाला है जो दीनों पे दया करने वाला है और जो विकारों में गिरे हुए लोगों को पवित्र करने वाला है। हे नानक ! (कह, हे भाई !) परमात्मा की भक्ति कर।तेरे भाग्य जाग जाएंगे। 2। 4। 155।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਖ ਸੋਗ ਬੈਰਾਗ ਅਨੰਦੀ ਖੇਲੁ ਰੀ ਦਿਖਾਇਓ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਖਿਨਹੂੰ ਭੈ ਨਿਰਭੈ ਖਿਨਹੂੰ ਖਿਨਹੂੰ ਉਠਿ ਧਾਇਓ ॥
ਖਿਨਹੂੰ ਰਸ ਭੋਗਨ ਖਿਨਹੂੰ ਖਿਨਹੂ ਤਜਿ ਜਾਇਓ ॥੧॥
ਖਿਨਹੂੰ ਜੋਗ ਤਾਪ ਬਹੁ ਪੂਜਾ ਖਿਨਹੂੰ ਭਰਮਾਇਓ ॥
ਖਿਨਹੂੰ ਕਿਰਪਾ ਸਾਧੂ ਸੰਗ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਰੰਗੁ ਲਾਇਓ ॥੨॥੫॥੧੫੬॥
आसा महला ५ ॥
हरख सोग बैराग अनंदी खेलु री दिखाइओ ॥१॥ रहाउ ॥
खिनहूं भै निरभै खिनहूं खिनहूं उठि धाइओ ॥
खिनहूं रस भोगन खिनहूं खिनहू तजि जाइओ ॥१॥
खिनहूं जोग ताप बहु पूजा खिनहूं भरमाइओ ॥
खिनहूं किरपा साधू संग नानक हरि रंगु लाइओ ॥२॥५॥१५६॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे सहेली ! (हे सत्संगी !) आनंद-रूप परमात्मा ने मुझे ये जगत-तमाशा दिखा दिया है (इस जगत-तमाशे की अस्लियत दिखा दी है)।(इसमें कहीं) खुशी है (कहीं) ग़म है (कहीं) वैराग है। 1।रहाउ। (हे सत्संगी ! इस जगत-तमाशे में कहीं) एक पल में अनेकों डर (आ घेरते हैं।कहीं) निडरता है (कहीं कोई दुनियावी पदार्थों की ओर) उठ के भागता है। कहीं एक पल में स्वादिष्ट पदार्थ भोगे जा रहे हैं कहीं कोई एक पल में इन भोगों को त्याग जाता है। 1। (हे सखी ! इस जगत-तमाशे में कहीं) जोग-साधना की जा रही है।कहीं धूणियां तपाई जा रही हैं।कहीं अनेकों देव-पूजा हो रहीं हैं।कहीं और की ओर भटकनें भटकी जा रही हैं। हे नानक ! (कह,हे सखी !) कहीं साध-संगति में रख के एक पल में परमात्मा की मेहर हो रही है।और परमात्मा का प्रेम रंग बख्शा जा रहा है। 2। 4। 156।
ਰਾਗੁ ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੧੭ ਆਸਾਵਰੀ
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਗੋਬਿੰਦ ਗੋਬਿੰਦ ਕਰਿ ਹਾਂ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਮਨਿ ਪਿਆਰਿ ਹਾਂ ॥
ਗੁਰਿ ਕਹਿਆ ਸੁ ਚਿਤਿ ਧਰਿ ਹਾਂ ॥
ਅਨ ਸਿਉ ਤੋਰਿ ਫੇਰਿ ਹਾਂ ॥
ਐਸੇ ਲਾਲਨੁ ਪਾਇਓ ਰੀ ਸਖੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪੰਕਜ ਮੋਹ ਸਰਿ ਹਾਂ ॥
ਪਗੁ ਨਹੀ ਚਲੈ ਹਰਿ ਹਾਂ ॥
ਗਹਡਿਓ ਮੂੜ ਨਰਿ ਹਾਂ ॥
ਅਨਿਨ ਉਪਾਵ ਕਰਿ ਹਾਂ ॥
ਤਉ ਨਿਕਸੈ ਸਰਨਿ ਪੈ ਰੀ ਸਖੀ ॥੧॥
ਥਿਰ ਥਿਰ ਚਿਤ ਥਿਰ ਹਾਂ ॥
ਬਨੁ ਗ੍ਰਿਹੁ ਸਮਸਰਿ ਹਾਂ ॥
ਅੰਤਰਿ ਏਕ ਪਿਰ ਹਾਂ ॥
ਬਾਹਰਿ ਅਨੇਕ ਧਰਿ ਹਾਂ ॥
ਰਾਜਨ ਜੋਗੁ ਕਰਿ ਹਾਂ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਲੋਗ ਅਲੋਗੀ ਰੀ ਸਖੀ ॥੨॥੧॥੧੫੭॥
रागु आसा महला ५ घरु १७ आसावरी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गोबिंद गोबिंद करि हां ॥
हरि हरि मनि पिआरि हां ॥
गुरि कहिआ सु चिति धरि हां ॥
अन सिउ तोरि फेरि हां ॥
ऐसे लालनु पाइओ री सखी ॥१॥ रहाउ ॥
पंकज मोह सरि हां ॥
पगु नही चलै हरि हां ॥
गहडिओ मूड़ नरि हां ॥
अनिन उपाव करि हां ॥
तउ निकसै सरनि पै री सखी ॥१॥
थिर थिर चित थिर हां ॥
बनु ग्रिहु समसरि हां ॥
अंतरि एक पिर हां ॥
बाहरि अनेक धरि हां ॥
राजन जोगु करि हां ॥
कहु नानक लोग अलोगी री सखी ॥२॥१॥१५७॥

हिन्दी अर्थ: रागु आसा महला ५ घरु १७ आसावरी ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे सखी !) सदा परमात्मा का सिमरन करती रह। (इस तरह अपने) मन में परमात्मा से प्यार बना। जो कुछ गुरू ने बताया वह अपने चिक्त में बसा। परमात्मा के बिना औरों के साथ बनाई प्रीति तोड़ दे।औरों से अपने मन को फेर ले। हे सहेली ! (जिसने भी) परमात्मा को (पाया है) इस तरीके से ही पाया है। 1।रहाउ। हे सहेली ! संसार समुंद्र में मोह का कीचड़ है (इसमें फसा हुआ) पैर परमात्मा की ओर नहीं चल सकता। मूर्ख मनुष्य ने (अपना पैर मोह के कीचड़ में) फंसाया हुआ है। हे सखी ! केवल एक परमात्मा के सिमरन का ही आहर कर। और परमात्मा की शरण पड़।तभी (मोह के कीचड़ में फंसा हुआ पैर) निकल सकता है। 1। हे सहेली ! अपने चिक्त को (माया के मोह से) अडोल बना ले (इतना स्थिर कि) जंगल और घर एक समान प्रतीत हों। अपने दिल में एक परमात्मा की याद टिकाए रख। औरजगत में बेशक कई तरह के काम-काज किए जा (इस तरह) राज भी कर और जोग भी कमा। (पर) हे नानक ! कह, हे सखी ! (काम-काज करते हुए ही निर्लिप रहना-ये) संसार से निराला रास्ता है। 2। 1। 157।
ਆਸਾਵਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਨਸਾ ਏਕ ਮਾਨਿ ਹਾਂ ॥
ਗੁਰ ਸਿਉ ਨੇਤ ਧਿਆਨਿ ਹਾਂ ॥
ਦ੍ਰਿੜੁ ਸੰਤ ਮੰਤ ਗਿਆਨਿ ਹਾਂ ॥
ਸੇਵਾ ਗੁਰ ਚਰਾਨਿ ਹਾਂ ॥
ਤਉ ਮਿਲੀਐ ਗੁਰ ਕ੍ਰਿਪਾਨਿ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਟੂਟੇ ਅਨ ਭਰਾਨਿ ਹਾਂ ॥
ਰਵਿਓ ਸਰਬ ਥਾਨਿ ਹਾਂ ॥
ਲਹਿਓ ਜਮ ਭਇਆਨਿ ਹਾਂ ॥
ਪਾਇਓ ਪੇਡ ਥਾਨਿ ਹਾਂ ॥
ਤਉ ਚੂਕੀ ਸਗਲ ਕਾਨਿ ॥੧॥
ਲਹਨੋ ਜਿਸੁ ਮਥਾਨਿ ਹਾਂ ॥
ਭੈ ਪਾਵਕ ਪਾਰਿ ਪਰਾਨਿ ਹਾਂ ॥
ਨਿਜ ਘਰਿ ਤਿਸਹਿ ਥਾਨਿ ਹਾਂ ॥
ਹਰਿ ਰਸ ਰਸਹਿ ਮਾਨਿ ਹਾਂ ॥
ਲਾਥੀ ਤਿਸ ਭੁਖਾਨਿ ਹਾਂ ॥
ਨਾਨਕ ਸਹਜਿ ਸਮਾਇਓ ਰੇ ਮਨਾ ॥੨॥੨॥੧੫੮॥
आसावरी महला ५ ॥
मनसा एक मानि हां ॥
गुर सिउ नेत धिआनि हां ॥
द्रिड़ु संत मंत गिआनि हां ॥
सेवा गुर चरानि हां ॥
तउ मिलीऐ गुर क्रिपानि मेरे मना ॥१॥ रहाउ ॥
टूटे अन भरानि हां ॥
रविओ सरब थानि हां ॥
लहिओ जम भइआनि हां ॥
पाइओ पेड थानि हां ॥
तउ चूकी सगल कानि ॥१॥
लहनो जिसु मथानि हां ॥
भै पावक पारि परानि हां ॥
निज घरि तिसहि थानि हां ॥
हरि रस रसहि मानि हां ॥
लाथी तिस भुखानि हां ॥
नानक सहजि समाइओ रे मना ॥२॥२॥१५८॥

हिन्दी अर्थ: आसावरी महला ५ ॥ (हे मेरे मन !) एक (परमात्मा के मिलाप) की तमन्ना (अपने अंदर) कायम कर। गुरू के चरणों में जुड़ के सदा (परमात्मा के) ध्यान में टिका रह। गुरू के उपदेश की जान-पहिचान में मजबूत-चिक्त हो। गुरू चरणों में (रहके) सेवा-भक्ति कर। हे मेरे मन ! तब ही गुरू की कृपा से (परमात्मा को) मिल सकते हैं। 1।रहाउ। हे मेरे मन ! जब और भटकनें खत्म हो जाती हैं। तब हरेक जगह में परमात्मा ही व्यापक दिखता है। तब डरावने जम का सहम उतर जाता है। संसार-वृक्ष के आदि-हरी के चरणों में ठिकाना मिल जाता है। तब हरेक किस्म की मुहताजी खत्म हो जाती है। 1। जिस मनुष्य के माथे पर भाग्य जागते हैं वह विकारों की आग के खतरे से पार लांघ जाता है। उसको अपने असल घर (प्रभू चरणों में) जगह मिल जाती है। वह रसों में श्रेष्ठ हरि-नाम रस को हमेशा भोगता है। उसकी (माया की) प्यास भूख दूर हो जाती है। हे नानक ! (कह,) हे मेरे मन ! वह सदा आत्मिक अडोलता में लीन रहता है। 2। 2। 158।
ਆਸਾਵਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਗੁਨੀ ਹਾਂ ॥
ਜਪੀਐ ਸਹਜ ਧੁਨੀ ਹਾਂ ॥
ਸਾਧੂ ਰਸਨ ਭਨੀ ਹਾਂ ॥
ਛੂਟਨ ਬਿਧਿ ਸੁਨੀ ਹਾਂ ॥
ਪਾਈਐ ਵਡ ਪੁਨੀ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਖੋਜਹਿ ਜਨ ਮੁਨੀ ਹਾਂ ॥
ਸ੍ਰਬ ਕਾ ਪ੍ਰਭ ਧਨੀ ਹਾਂ ॥
ਦੁਲਭ ਕਲਿ ਦੁਨੀ ਹਾਂ ॥
ਦੂਖ ਬਿਨਾਸਨੀ ਹਾਂ ॥
ਪ੍ਰਭ ਪੂਰਨ ਆਸਨੀ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੧॥
ਮਨ ਸੋ ਸੇਵੀਐ ਹਾਂ ॥
आसावरी महला ५ ॥
हरि हरि हरि गुनी हां ॥
जपीऐ सहज धुनी हां ॥
साधू रसन भनी हां ॥
छूटन बिधि सुनी हां ॥
पाईऐ वड पुनी मेरे मना ॥१॥ रहाउ ॥
खोजहि जन मुनी हां ॥
स्रब का प्रभ धनी हां ॥
दुलभ कलि दुनी हां ॥
दूख बिनासनी हां ॥
प्रभ पूरन आसनी मेरे मना ॥१॥
मन सो सेवीऐ हां ॥

हिन्दी अर्थ: आसावरी महला ५ ॥ जो सारे गुणों का मालिक है- हे मेरे मन ! आत्मिक अडोलता की लहर में लीन हो के उस परमात्मा का नाम सदा जपना चाहिए (हे भाई !) गुरू की शरण पड़ कर (अपनी) जीभ से परमात्मा के गुण उचार।हे मेरे मन ! सुन। यही है विकारों से बचने का तरीका। पर ये बडे़ भाग्यों से प्राप्त होता है। 1।रहाउ। हे मेरे मन ! सारे ऋषि मुनि उस परमात्मा को खोजते आ रहे हैं। जो सारे जीवों का मालिक है जो इस माया-ग्रसित दुनिया में ढूँढना मुश्किल है। जो सारे दुखों का नाश करने वाला है। और जो सबकी आशाएं पूरी करने वाला है। 1। हे (मेरे) मन ! उस परमात्मा की सेवा-भक्ति करनी चाहिए।

संदर्भ: यह अंग 409 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Mehrauli के पुराने पत्थरों के पास, 800 साल का इतिहास और एक 600 साल पुरानी पंक्ति।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 57 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 409” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 410 →, पीछे का: ← अंग 408

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।