अंग
388
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਦਿਨੁ ਰੈਣਿ ਤੇਰਾ ਨਾਮੁ ਵਖਾਨਾ ॥੧॥
ਮੈ ਨਿਰਗੁਨ ਗੁਣੁ ਨਾਹੀ ਕੋਇ ॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨਹਾਰ ਪ੍ਰਭ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮੂਰਖ ਮੁਗਧ ਅਗਿਆਨ ਅਵੀਚਾਰੀ ॥
ਨਾਮ ਤੇਰੇ ਕੀ ਆਸ ਮਨਿ ਧਾਰੀ ॥੨॥
ਜਪੁ ਤਪੁ ਸੰਜਮੁ ਕਰਮ ਨ ਸਾਧਾ ॥
ਨਾਮੁ ਪ੍ਰਭੂ ਕਾ ਮਨਹਿ ਅਰਾਧਾ ॥੩॥
ਕਿਛੂ ਨ ਜਾਨਾ ਮਤਿ ਮੇਰੀ ਥੋਰੀ ॥
ਬਿਨਵਤਿ ਨਾਨਕ ਓਟ ਪ੍ਰਭ ਤੋਰੀ ॥੪॥੧੮॥੬੯॥
ਮੈ ਨਿਰਗੁਨ ਗੁਣੁ ਨਾਹੀ ਕੋਇ ॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨਹਾਰ ਪ੍ਰਭ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮੂਰਖ ਮੁਗਧ ਅਗਿਆਨ ਅਵੀਚਾਰੀ ॥
ਨਾਮ ਤੇਰੇ ਕੀ ਆਸ ਮਨਿ ਧਾਰੀ ॥੨॥
ਜਪੁ ਤਪੁ ਸੰਜਮੁ ਕਰਮ ਨ ਸਾਧਾ ॥
ਨਾਮੁ ਪ੍ਰਭੂ ਕਾ ਮਨਹਿ ਅਰਾਧਾ ॥੩॥
ਕਿਛੂ ਨ ਜਾਨਾ ਮਤਿ ਮੇਰੀ ਥੋਰੀ ॥
ਬਿਨਵਤਿ ਨਾਨਕ ਓਟ ਪ੍ਰਭ ਤੋਰੀ ॥੪॥੧੮॥੬੯॥
दिनु रैणि तेरा नामु वखाना ॥१॥
मै निरगुन गुणु नाही कोइ ॥
करन करावनहार प्रभ सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
मूरख मुगध अगिआन अवीचारी ॥
नाम तेरे की आस मनि धारी ॥२॥
जपु तपु संजमु करम न साधा ॥
नामु प्रभू का मनहि अराधा ॥३॥
किछू न जाना मति मेरी थोरी ॥
बिनवति नानक ओट प्रभ तोरी ॥४॥१८॥६९॥
मै निरगुन गुणु नाही कोइ ॥
करन करावनहार प्रभ सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
मूरख मुगध अगिआन अवीचारी ॥
नाम तेरे की आस मनि धारी ॥२॥
जपु तपु संजमु करम न साधा ॥
नामु प्रभू का मनहि अराधा ॥३॥
किछू न जाना मति मेरी थोरी ॥
बिनवति नानक ओट प्रभ तोरी ॥४॥१८॥६९॥
हिन्दी अर्थ: पर तेरी ही मेहर से) मैं दिन-रात तेरा (ही) नाम उचारता हूँ। 1। हे प्रभू ! मैं गुणहीन हूँ।मेरे में कोई गुण नहीं (जिसके आसरे मैं तुझे प्रसन्न करने की आस कर सकूँ। पर) हे प्रभू ! वह तू ही है जो (सब जीवों में व्यापक हो के स्वयं ही) सब कुछ करने की ताकत रखता है और (सब जीवों को प्रेरित करके उनसे) करवाने की समर्था वाला है (मुझे भी खुद ही अपने चरणों में जोड़े रख)। 1।रहाउ। हे प्रभू ! मैं मूर्ख हूँ।मैं मति हीन हूँ।मैं ज्ञानहीन हूँ।मैं बेसमझ हूँ (पर तू अपने बिरद की लाज रखने वाला है)। मैंने तेरे (बिरद-पाल) नाम की आस मन में रखी हुई है (कि तू शरण आए की लाज रखेगा)। 2। हे भाई ! मैंने कोई जप नहीं किया।मैंने कोई तप नहीं किया।मैंने कोई संजम नहीं साधा (मुझे किसी जप तपसंजम का सहारा नहीं। का गुमान नहीं) मैं तो परमातमा का नाम ही अपने मन में याद करता रहता हूँ। 3। नानक बिनती करता है, हे प्रभू ! (कोई उक्ति।कोई समझदारी।कोई जप।कोई तप।कोई संजम) कुछ भी करना नहीं जानता।मेरी अक्ल बहुत थोड़ी सी है। मैंने सिर्फ तेरा ही आसरा लिया है। 4। 18। 69।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਅਖਰ ਦੁਇ ਇਹ ਮਾਲਾ ॥
ਜਪਤ ਜਪਤ ਭਏ ਦੀਨ ਦਇਆਲਾ ॥੧॥
ਕਰਉ ਬੇਨਤੀ ਸਤਿਗੁਰ ਅਪੁਨੀ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਰਾਖਹੁ ਸਰਣਾਈ ਮੋ ਕਉ ਦੇਹੁ ਹਰੇ ਹਰਿ ਜਪਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਮਾਲਾ ਉਰ ਅੰਤਰਿ ਧਾਰੈ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਕਾ ਦੂਖੁ ਨਿਵਾਰੈ ॥੨॥
ਹਿਰਦੈ ਸਮਾਲੈ ਮੁਖਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਬੋਲੈ ॥
ਸੋ ਜਨੁ ਇਤ ਉਤ ਕਤਹਿ ਨ ਡੋਲੈ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜੋ ਰਾਚੈ ਨਾਇ ॥
ਹਰਿ ਮਾਲਾ ਤਾ ਕੈ ਸੰਗਿ ਜਾਇ ॥੪॥੧੯॥੭੦॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਅਖਰ ਦੁਇ ਇਹ ਮਾਲਾ ॥
ਜਪਤ ਜਪਤ ਭਏ ਦੀਨ ਦਇਆਲਾ ॥੧॥
ਕਰਉ ਬੇਨਤੀ ਸਤਿਗੁਰ ਅਪੁਨੀ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਰਾਖਹੁ ਸਰਣਾਈ ਮੋ ਕਉ ਦੇਹੁ ਹਰੇ ਹਰਿ ਜਪਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਮਾਲਾ ਉਰ ਅੰਤਰਿ ਧਾਰੈ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਕਾ ਦੂਖੁ ਨਿਵਾਰੈ ॥੨॥
ਹਿਰਦੈ ਸਮਾਲੈ ਮੁਖਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਬੋਲੈ ॥
ਸੋ ਜਨੁ ਇਤ ਉਤ ਕਤਹਿ ਨ ਡੋਲੈ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜੋ ਰਾਚੈ ਨਾਇ ॥
ਹਰਿ ਮਾਲਾ ਤਾ ਕੈ ਸੰਗਿ ਜਾਇ ॥੪॥੧੯॥੭੦॥
आसा महला ५ ॥
हरि हरि अखर दुइ इह माला ॥
जपत जपत भए दीन दइआला ॥१॥
करउ बेनती सतिगुर अपुनी ॥
करि किरपा राखहु सरणाई मो कउ देहु हरे हरि जपनी ॥१॥ रहाउ ॥
हरि माला उर अंतरि धारै ॥
जनम मरण का दूखु निवारै ॥२॥
हिरदै समालै मुखि हरि हरि बोलै ॥
सो जनु इत उत कतहि न डोलै ॥३॥
कहु नानक जो राचै नाइ ॥
हरि माला ता कै संगि जाइ ॥४॥१९॥७०॥
हरि हरि अखर दुइ इह माला ॥
जपत जपत भए दीन दइआला ॥१॥
करउ बेनती सतिगुर अपुनी ॥
करि किरपा राखहु सरणाई मो कउ देहु हरे हरि जपनी ॥१॥ रहाउ ॥
हरि माला उर अंतरि धारै ॥
जनम मरण का दूखु निवारै ॥२॥
हिरदै समालै मुखि हरि हरि बोलै ॥
सो जनु इत उत कतहि न डोलै ॥३॥
कहु नानक जो राचै नाइ ॥
हरि माला ता कै संगि जाइ ॥४॥१९॥७०॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! मेरे पास तो) ‘हरि हरि’ – इन दो शब्दों की माला है। इस हरि-नाम-माला को जपते-जपते कंगालों पर भी परमात्मा दयावान हो जाता है। 1। हे सतिगुरू ! मैं तेरे आगे अपनी ये अर्ज करता हूँ कि कृपा करके मुझे अपनी शरण में रख और मुझे ‘हरि हरि’ नाम की माला दे। 1।रहाउ। जो मनुष्य हरि-नाम की माला अपने हृदय में टिका के रखता है। वह अपने जनम-मरण के चक्कर का दुख दूर कर लेता है। 2। जो मनुष्य हरि नाम को अपने हृदय में संभाल के रखता है और मुंह से हरि हरि नाम उचारता रहता है वह ना इस लोक में ना ही परलोक में कही भी (किसी बात पर भी) नहीं डोलता। 3। हे नानक ! कह, जो मनुष्य परमात्मा के नाम में जुड़ा रहता है। हरि-नाम की माला उस के साथ (परलोक में भी) जाती है। 4। 19। 70।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਿਸ ਕਾ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤਿਸ ਕਾ ਹੋਇ ॥
ਤਿਸੁ ਜਨ ਲੇਪੁ ਨ ਬਿਆਪੈ ਕੋਇ ॥੧॥
ਹਰਿ ਕਾ ਸੇਵਕੁ ਸਦ ਹੀ ਮੁਕਤਾ ॥
ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਰੈ ਸੋਈ ਭਲ ਜਨ ਕੈ ਅਤਿ ਨਿਰਮਲ ਦਾਸ ਕੀ ਜੁਗਤਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਗਲ ਤਿਆਗਿ ਹਰਿ ਸਰਣੀ ਆਇਆ ॥
ਤਿਸੁ ਜਨ ਕਹਾ ਬਿਆਪੈ ਮਾਇਆ ॥੨॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਜਾ ਕੇ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
ਤਿਸ ਕਉ ਚਿੰਤਾ ਸੁਪਨੈ ਨਾਹਿ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਪਾਇਆ ॥
ਭਰਮੁ ਮੋਹੁ ਸਗਲ ਬਿਨਸਾਇਆ ॥੪॥੨੦॥੭੧॥
ਜਿਸ ਕਾ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤਿਸ ਕਾ ਹੋਇ ॥
ਤਿਸੁ ਜਨ ਲੇਪੁ ਨ ਬਿਆਪੈ ਕੋਇ ॥੧॥
ਹਰਿ ਕਾ ਸੇਵਕੁ ਸਦ ਹੀ ਮੁਕਤਾ ॥
ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਰੈ ਸੋਈ ਭਲ ਜਨ ਕੈ ਅਤਿ ਨਿਰਮਲ ਦਾਸ ਕੀ ਜੁਗਤਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਗਲ ਤਿਆਗਿ ਹਰਿ ਸਰਣੀ ਆਇਆ ॥
ਤਿਸੁ ਜਨ ਕਹਾ ਬਿਆਪੈ ਮਾਇਆ ॥੨॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਜਾ ਕੇ ਮਨ ਮਾਹਿ ॥
ਤਿਸ ਕਉ ਚਿੰਤਾ ਸੁਪਨੈ ਨਾਹਿ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਪਾਇਆ ॥
ਭਰਮੁ ਮੋਹੁ ਸਗਲ ਬਿਨਸਾਇਆ ॥੪॥੨੦॥੭੧॥
आसा महला ५ ॥
जिस का सभु किछु तिस का होइ ॥
तिसु जन लेपु न बिआपै कोइ ॥१॥
हरि का सेवकु सद ही मुकता ॥
जो किछु करै सोई भल जन कै अति निरमल दास की जुगता ॥१॥ रहाउ ॥
सगल तिआगि हरि सरणी आइआ ॥
तिसु जन कहा बिआपै माइआ ॥२॥
नामु निधानु जा के मन माहि ॥
तिस कउ चिंता सुपनै नाहि ॥३॥
कहु नानक गुरु पूरा पाइआ ॥
भरमु मोहु सगल बिनसाइआ ॥४॥२०॥७१॥
जिस का सभु किछु तिस का होइ ॥
तिसु जन लेपु न बिआपै कोइ ॥१॥
हरि का सेवकु सद ही मुकता ॥
जो किछु करै सोई भल जन कै अति निरमल दास की जुगता ॥१॥ रहाउ ॥
सगल तिआगि हरि सरणी आइआ ॥
तिसु जन कहा बिआपै माइआ ॥२॥
नामु निधानु जा के मन माहि ॥
तिस कउ चिंता सुपनै नाहि ॥३॥
कहु नानक गुरु पूरा पाइआ ॥
भरमु मोहु सगल बिनसाइआ ॥४॥२०॥७१॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! जो मनुष्य) उस परमात्मा का (सेवक) बना रहता है जिसका ये सारा जगत रचा हुआ है उस मनुष्य पर माया का किसी तरह का भी प्रभाव नहीं पड़ सकता। 1। (हे भाई !) परमात्मा का भक्त सदा ही (माया के मोह के बंधनों से) आजाद रहता है। परमात्मा जो कुछ करता है सेवक को वह सदा भलाई ही भलाई प्रतीत होती है।सेवक की जीवन-शैली बहुत ही पवित्र होती है। 1।रहाउ। (हे भाई ! जो मनुष्य और) सारे (आसरे) छोड़ के परमात्मा की शरण आ पड़ता है। माया उस मनुष्य पर कभी अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। 2। (हे भाई !) जिस मनुष्य के मन में परमात्मा का नाम-खजाना टिका रहता है उसे कभी भी कोई चिंता छू नहीं सकती। 3। हे नानक ! कह, जो मनुष्य पूरा गुरू ढूँढ लेता है उसके अंदर से (माया की खातिर) भटकना दूर हो जाती है (उसके मन में से माया का) सारा मोह दूर हो जाता है। 4। 20। 71।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਉ ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ਹੋਇਓ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ॥
ਤਾਂ ਦੂਖੁ ਭਰਮੁ ਕਹੁ ਕੈਸੇ ਨੇਰਾ ॥੧॥
ਸੁਨਿ ਸੁਨਿ ਜੀਵਾ ਸੋਇ ਤੁਮੑਾਰੀ ॥
ਮੋਹਿ ਨਿਰਗੁਨ ਕਉ ਲੇਹੁ ਉਧਾਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਿਟਿ ਗਇਆ ਦੂਖੁ ਬਿਸਾਰੀ ਚਿੰਤਾ ॥
ਫਲੁ ਪਾਇਆ ਜਪਿ ਸਤਿਗੁਰ ਮੰਤਾ ॥੨॥
ਸੋਈ ਸਤਿ ਸਤਿ ਹੈ ਸੋਇ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਰਖੁ ਕੰਠਿ ਪਰੋਇ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਕਉਨ ਉਹ ਕਰਮਾ ॥
ਜਾ ਕੈ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਹਰਿ ਨਾਮਾ ॥੪॥੨੧॥੭੨॥
ਜਉ ਸੁਪ੍ਰਸੰਨ ਹੋਇਓ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ॥
ਤਾਂ ਦੂਖੁ ਭਰਮੁ ਕਹੁ ਕੈਸੇ ਨੇਰਾ ॥੧॥
ਸੁਨਿ ਸੁਨਿ ਜੀਵਾ ਸੋਇ ਤੁਮੑਾਰੀ ॥
ਮੋਹਿ ਨਿਰਗੁਨ ਕਉ ਲੇਹੁ ਉਧਾਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਿਟਿ ਗਇਆ ਦੂਖੁ ਬਿਸਾਰੀ ਚਿੰਤਾ ॥
ਫਲੁ ਪਾਇਆ ਜਪਿ ਸਤਿਗੁਰ ਮੰਤਾ ॥੨॥
ਸੋਈ ਸਤਿ ਸਤਿ ਹੈ ਸੋਇ ॥
ਸਿਮਰਿ ਸਿਮਰਿ ਰਖੁ ਕੰਠਿ ਪਰੋਇ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਕਉਨ ਉਹ ਕਰਮਾ ॥
ਜਾ ਕੈ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਹਰਿ ਨਾਮਾ ॥੪॥੨੧॥੭੨॥
आसा महला ५ ॥
जउ सुप्रसंन होइओ प्रभु मेरा ॥
तां दूखु भरमु कहु कैसे नेरा ॥१॥
सुनि सुनि जीवा सोइ तुम॑ारी ॥
मोहि निरगुन कउ लेहु उधारी ॥१॥ रहाउ ॥
मिटि गइआ दूखु बिसारी चिंता ॥
फलु पाइआ जपि सतिगुर मंता ॥२॥
सोई सति सति है सोइ ॥
सिमरि सिमरि रखु कंठि परोइ ॥३॥
कहु नानक कउन उह करमा ॥
जा कै मनि वसिआ हरि नामा ॥४॥२१॥७२॥
जउ सुप्रसंन होइओ प्रभु मेरा ॥
तां दूखु भरमु कहु कैसे नेरा ॥१॥
सुनि सुनि जीवा सोइ तुम॑ारी ॥
मोहि निरगुन कउ लेहु उधारी ॥१॥ रहाउ ॥
मिटि गइआ दूखु बिसारी चिंता ॥
फलु पाइआ जपि सतिगुर मंता ॥२॥
सोई सति सति है सोइ ॥
सिमरि सिमरि रखु कंठि परोइ ॥३॥
कहु नानक कउन उह करमा ॥
जा कै मनि वसिआ हरि नामा ॥४॥२१॥७२॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) जब मेरा प्रभू (किसी मनुष्य पर) बहुत प्रसन्न होता है तब बताओ कोई दुख-भ्रम उस मनुष्य के नजदीक कैसे आ सकता है। 1। (हे मेरे प्रभू !) तेरी शोभा (महिमा) सुन-सुन के मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा होता है। (हे मेरे प्रभू ! मेहर कर) मुझ गुण-हीन को (दुखों-भ्रमों से) बचाए रख। 1।रहाउ। (मेरे) अंदर से हरेक किस्म का दुख दूर हो गया है।मैंने (हरेक किस्म की) चिंता भुला दी है (हे भाई !) सतिगुरू की बाणी जपके मैंने ये फल प्राप्त कर लिया है । 2। (हे भाई !) वह परमात्मा ही सदा कायम रहने वाला है वह परमात्मा ही सदा स्थिर रहने वाला है। उसे सदा सिमरता रह।उस (के नाम) को अपने गले में परो के रख (जैसे फूलों का हार गले में डालते हैं)। 3। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य के मन में परमात्मा का नाम आ बसे। और वह कौन सा (निहित धार्मिक) कर्म (रह जाता है जो उसे करना चाहिए। )। 4। 21। 72।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਕਾਮਿ ਕ੍ਰੋਧਿ ਅਹੰਕਾਰਿ ਵਿਗੂਤੇ ॥
ਹਰਿ ਸਿਮਰਨੁ ਕਰਿ ਹਰਿ ਜਨ ਛੂਟੇ ॥੧॥
ਸੋਇ ਰਹੇ ਮਾਇਆ ਮਦ ਮਾਤੇ ॥
ਜਾਗਤ ਭਗਤ ਸਿਮਰਤ ਹਰਿ ਰਾਤੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮੋਹ ਭਰਮਿ ਬਹੁ ਜੋਨਿ ਭਵਾਇਆ ॥
ਅਸਥਿਰੁ ਭਗਤ ਹਰਿ ਚਰਣ ਧਿਆਇਆ ॥੨॥
ਬੰਧਨ ਅੰਧ ਕੂਪ ਗ੍ਰਿਹ ਮੇਰਾ ॥
ਮੁਕਤੇ ਸੰਤ ਬੁਝਹਿ ਹਰਿ ਨੇਰਾ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਸਰਣਾਈ ॥
ਈਹਾ ਸੁਖੁ ਆਗੈ ਗਤਿ ਪਾਈ ॥੪॥੨੨॥੭੩॥
ਕਾਮਿ ਕ੍ਰੋਧਿ ਅਹੰਕਾਰਿ ਵਿਗੂਤੇ ॥
ਹਰਿ ਸਿਮਰਨੁ ਕਰਿ ਹਰਿ ਜਨ ਛੂਟੇ ॥੧॥
ਸੋਇ ਰਹੇ ਮਾਇਆ ਮਦ ਮਾਤੇ ॥
ਜਾਗਤ ਭਗਤ ਸਿਮਰਤ ਹਰਿ ਰਾਤੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮੋਹ ਭਰਮਿ ਬਹੁ ਜੋਨਿ ਭਵਾਇਆ ॥
ਅਸਥਿਰੁ ਭਗਤ ਹਰਿ ਚਰਣ ਧਿਆਇਆ ॥੨॥
ਬੰਧਨ ਅੰਧ ਕੂਪ ਗ੍ਰਿਹ ਮੇਰਾ ॥
ਮੁਕਤੇ ਸੰਤ ਬੁਝਹਿ ਹਰਿ ਨੇਰਾ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਸਰਣਾਈ ॥
ਈਹਾ ਸੁਖੁ ਆਗੈ ਗਤਿ ਪਾਈ ॥੪॥੨੨॥੭੩॥
आसा महला ५ ॥
कामि क्रोधि अहंकारि विगूते ॥
हरि सिमरनु करि हरि जन छूटे ॥१॥
सोइ रहे माइआ मद माते ॥
जागत भगत सिमरत हरि राते ॥१॥ रहाउ ॥
मोह भरमि बहु जोनि भवाइआ ॥
असथिरु भगत हरि चरण धिआइआ ॥२॥
बंधन अंध कूप ग्रिह मेरा ॥
मुकते संत बुझहि हरि नेरा ॥३॥
कहु नानक जो प्रभ सरणाई ॥
ईहा सुखु आगै गति पाई ॥४॥२२॥७३॥
कामि क्रोधि अहंकारि विगूते ॥
हरि सिमरनु करि हरि जन छूटे ॥१॥
सोइ रहे माइआ मद माते ॥
जागत भगत सिमरत हरि राते ॥१॥ रहाउ ॥
मोह भरमि बहु जोनि भवाइआ ॥
असथिरु भगत हरि चरण धिआइआ ॥२॥
बंधन अंध कूप ग्रिह मेरा ॥
मुकते संत बुझहि हरि नेरा ॥३॥
कहु नानक जो प्रभ सरणाई ॥
ईहा सुखु आगै गति पाई ॥४॥२२॥७३॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! माया-ग्रसित जीव) काम में।क्रोध में।अहंकार में (फस के) दुखी होते रहते हैं। परमातमा के सेवक परमात्मा के नाम का सिमरन करके (काम-क्रोध-अहंकार आदि से) बचे रहते हैं। 1। (हे भाई ! माया में ग्रसित जीव) माया के नशे में मस्त हो के (आत्मिक जीवन के पक्ष से) सोए रहते हैं (बेपरवाह टिके रहते हैं)। पर परमात्मा की भक्ति करने वाले मनुष्य प्रभू नाम का सिमरन करते हुए (हरि-नाम-रंग में) रंग के (माया के हमलों की तरफ़ से) सचेत रहते हैं। 1।रहाउ। (हे भाई ! माया के) मोह की भटकना में पड़ के मनुष्य अनेकों जूनियों में भटकते रहते हैं पर भगत जन परमात्मा के चरणों का ध्यान धरते हैं वह (जनम-मरण के चक्कर से) अडोल रहते हैं। 2। (हे भाई !) ये घर मेरा है।ये घर मेरा है, इस मोह के अंधे कूएं के बंधनों से वे संत-जन आजाद रहते हैं जो परमात्मा को (हर वक्त) अपने नजदीक बसता समझते हैं। 3। हे नानक ! कह, जो मनुष्य परमात्मा की शरण पड़ा रहता है वह इस लोक में आत्मिक आनंद भोगता है। परलोक में भी वह उच्च आत्मिक अवस्था हासिल किए रहता है। 4। 22। 73।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 388 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली का summer-shaadi, मंडप के बीच bride-groom, और परिवार की उम्मीदें।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 53 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 388” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 389 →, पीछे का: ← अंग 387।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।