सीधे सामग्री पर जाइए
लुल्ला परिवारLulla Family

विश्वास और विधि

हर संग्रह किस आधार पर खड़ा है

हर संग्रह का दायरा और उपलब्ध पाठ देखिए →

इन टिप्पणियों में पुस्तकालय के आधार-संस्करण, हर संग्रह का दायरा और पाठ-मिलान की सीमाएँ दी गई हैं। किसी विशेष पाठ को पढ़ते समय उसके साथ दिए प्रसंग और स्रोत को भी देख लीजिए।

महाकाव्य

वाल्मीकि रामायण

आधार-संस्करण दर्ज है
मुख्य आधार
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण, संस्कृत-हिन्दी, गीता प्रेस, गोरखपुर।
दूसरा आधार
अध्यात्म रामायण का PDF संस्करण, केवल परम्पराओं के स्पष्ट भेद देखने के लिए है; यह प्राथमिक आधार नहीं है।
सम्पादकीय नीति
मूल कथा के क्रम और प्रमुख प्रसंगों के निकट सरल हिन्दी पुनर्कथन।
दायरा
सात काण्डों को 34 सतत अध्यायों में प्रस्तुत किया गया है।
ज्ञात सीमाएँ
बाद की परम्पराओं के लोकप्रिय प्रसंगों को जहाँ आवश्यक हो, अलग बताया जाता है।
सन्दर्भ की रीति
स्पष्ट सन्दर्भों में काण्ड, सर्ग और श्लोक।

महाकाव्य

श्रीरामचरितमानस

आधार-संस्करण दर्ज है
मुख्य आधार
गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस, सचित्र, सटीक, मोटा टाइप, गीता प्रेस, गोरखपुर; मूल अवधी पद्य इसी संस्करण से अक्षरशः लिया गया है।
दूसरा आधार
उसी संस्करण में छपी हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका; कठिन अवधी का अर्थ इसी से तय होता है।
सम्पादकीय नीति
हर प्रसंग की हिन्दी कथा उसके अपने पद्य और पोद्दार जी की टीका से लिखी गई है। उद्धृत हर पंक्ति छपे पाठ से मिलाकर ही पन्ने पर आती है, दोबारा टाइप नहीं की जाती।
दायरा
सातों सोपान, 142 प्रसंग: बालकाण्ड 42, अयोध्याकाण्ड 36, अरण्यकाण्ड 11, किष्किन्धाकाण्ड 5, सुन्दरकाण्ड 9, लङ्काकाण्ड 17, उत्तरकाण्ड 22।
ज्ञात सीमाएँ
पाठ गीता प्रेस संस्करण की डिजिटल प्रति की पुरानी फ़ॉन्ट-परत से यूनिकोड में बदला गया और कई चरणों में सुधारा गया। जिन थोड़े से अंशों में पद्य की जगह टीका आ गई थी, वे उद्धृत नहीं किए गए; उनकी कथा टीका से कही गई है। इसका अंग्रेज़ी संस्करण नहीं है।
सन्दर्भ की रीति
काण्ड, दोहा-संख्या और उसके भीतर चौपाई का क्रम, गीता प्रेस संस्करण की गिनती के अनुसार।

महाकाव्य

महाभारत

आधार-संस्करण दर्ज है
मुख्य आधार
महाभारत, हिन्दी, खण्ड 1 से 6, गीता प्रेस।
दूसरा आधार
तुलना और अंग्रेज़ी सम्पादन के लिए किसारी मोहन गांगुली का असंक्षिप्त अंग्रेज़ी अनुवाद।
सम्पादकीय नीति
पर्वों के क्रम, मुख्य संवादों और नैतिक जटिलता को बचाते हुए सरल पुनर्कथन।
दायरा
महाकाव्य की मुख्य यात्रा 41 अध्यायों में।
ज्ञात सीमाएँ
संक्षेप के कारण उपकथाओं का चयन किया गया है; चयन को पूर्ण अनुवाद न समझें।
सन्दर्भ की रीति
पर्व, अध्याय और श्लोक जहाँ स्पष्ट रूप से दिये गये हों।

पुराण

श्रीमद्भागवत महापुराण

आधार-संस्करण दर्ज है
मुख्य आधार
श्रीमद्भागवत महापुराण, संस्कृत-हिन्दी, खण्ड 1 और 2, गीता प्रेस।
दूसरा आधार
इस स्रोत-सूची में कोई अलग द्वितीयक संस्करण घोषित नहीं है।
सम्पादकीय नीति
कथा का क्रम और शास्त्रीय विवरण बचाते हुए सहज हिन्दी।
दायरा
चुनी हुई 65 कथाएँ; सम्पूर्ण स्कन्ध-अनुवाद नहीं।
ज्ञात सीमाएँ
ज्ञात क्रम और श्रेय-सुधार 2026 की सम्पादकीय जाँच में लागू किये गये।
सन्दर्भ की रीति
स्कन्ध, अध्याय और श्लोक: उदाहरण 10.10.22।

योग और वेदान्त

योग वासिष्ठ

आधार-संस्करण दर्ज है
मुख्य आधार
विहारीलाल मित्र का अंग्रेज़ी अनुवाद, कलकत्ता, 1891।
दूसरा आधार
स्वामी वेंकटेशनन्द की Vasistha’s Yoga।
हिन्दी संस्करणों से तुलना
पुण्य और पावन की कथा (उपशम-प्रकरण, सर्ग 19, 20 और 21 का आरम्भ) दो हिन्दी संस्करणों से मिलाई गई है: श्रीयोगवाशिष्ठ का पुराना हिन्दी गद्य अनुवाद, तेजकुमार प्रेस, लखनऊ में छपा, जिसे उस पन्ने पर लखनऊ गद्य संस्करण कहा गया है; और गीता प्रेस, गोरखपुर का संक्षिप्त योगवासिष्ठ, जिसमें ये सर्ग एक साथ संक्षेप में आते हैं। नाम, घटनाओं का क्रम और पूर्वजन्मों की सूची इन्हीं से जाँची गई।
सम्पादकीय नीति
कथा-दृष्टान्तों और दार्शनिक तर्क को पठनीय हिन्दी में संक्षिप्त करना।
दायरा
39 कथा और संवाद-आधारित प्रवेश।
ज्ञात सीमाएँ
संस्करणों की संरचना में भेद हो सकता है; यह स्रोत-सूची आधार बताती है, आलोचनात्मक संस्करण का दावा नहीं करती।
सन्दर्भ की रीति
प्रकरण या कथा का नाम; श्लोक संख्या केवल वहाँ जहाँ स्रोत में स्पष्ट हो।

शाक्त अद्वैत

त्रिपुरा रहस्य

आधार-संस्करण दर्ज है
मुख्य आधार
ज्ञानखण्ड का संस्कृत पाठ, श्रीनिवासभट्ट की तात्पर्यदीपिका सहित; स्वतंत्र तुलना: रमणानन्द सरस्वती, श्रीरमणाश्रमम्, 2006।
दूसरा आधार
स्वामी श्री रमणानन्द सरस्वती का अंग्रेज़ी अनुवाद, श्रीरमणाश्रमम्, तिरुवण्णामलै, 2006; प्रत्येक कथा के साथ चयनित अंशों का विवरण।
सम्पादकीय नीति
संस्कृत पाठ से नाम, संख्याएँ, माप और अध्याय-सीमा नियंत्रित रखते हुए आधुनिक, स्रोत-निष्ठ कथा-गद्य।
दायरा
तीन चुने हुए कथा-पाठ: हेमचूड़-हेमलेखा 3 से 10; महासेन 12 से 14 के चयनित अंश; जनक-अष्टावक्र 15 और 16 का आरम्भ। सम्पूर्ण ग्रन्थ का अनुवाद नहीं।
ज्ञात सीमाएँ
संस्कृत की श्लोक-संख्या और अंग्रेज़ी के समूह अलग हो सकते हैं। महासेन की काल-संख्या का पाठ-भेद तथा जनक-अष्टावक्र कथा और स्वतंत्र अष्टावक्रगीता का अंतर सम्बन्धित पन्नों पर स्पष्ट है।
सन्दर्भ की रीति
अध्याय, मुद्रित पृष्ठ और श्लोक-संकेत जहाँ उपलब्ध हों।
आधिकारिक संदर्भ

देवी

देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती)

आधार-संस्करण दर्ज है
मुख्य आधार
मार्कण्डेय पुराण के अध्याय 81 से 93 का संस्कृत पाठ, अपनी श्लोक-संख्या सहित; छपा पाठ गॉटिंगन विश्वविद्यालय के ग्रेटिल संग्रह के मार्कण्डेय पुराण से मिलता है। गीता प्रेस की श्रीदुर्गासप्तशती इसी पाठ को 700 मन्त्रों में गिनती है, और अध्याय-पन्ने यह भेद बताते हैं।
दूसरा आधार
अर्थ की जाँच एफ. ई. पार्जिटर के अंग्रेज़ी अनुवाद से, एशियाटिक सोसाइटी, कलकत्ता, 1904; श्लोक-संख्या और पाठ-भेद का मिलान गीता प्रेस की 700 मन्त्रों वाली गिनती से।
सम्पादकीय नीति
तेरह अध्यायों की कथा, स्तुतियों और फलश्रुति को स्पष्ट हिन्दी में प्रस्तुत करना।
दायरा
देवी माहात्म्य के 13 अध्याय।
ज्ञात सीमाएँ
स्तोत्र-पाठ और कथा की व्याख्या को अलग रखा जाता है।
सन्दर्भ की रीति
अध्याय और श्लोक जहाँ उपलब्ध हों।

पुराण

हरिवंश

संदर्भ-सूची दर्ज है
मुख्य आधार
पाठ-जाँच के लिए भांडारकर ओरिएण्टल रिसर्च इंस्टीट्यूट का Critical Edition of Harivamsa, खण्ड 1 और 2, सम्पादक डॉ. पी. एल. वैद्य, नामित संदर्भ है।
दूसरा आधार
मन्मथनाथ दत्त का अंग्रेज़ी गद्यानुवाद, कलकत्ता, 1897, कथा-मिलान के लिए।
सम्पादकीय नीति
भीतरी स्रोत-संकेतों के आधार पर कथा-सम्पादन; स्रोत-स्तर के बदलाव नामित संस्करण से मिलान के बाद।
दायरा
20 चुने हुए प्रसंग।
ज्ञात सीमाएँ
पूरे संग्रह के पंक्ति-दर-पंक्ति मिलान का दावा नहीं किया जाता।
सन्दर्भ की रीति
प्रसंग और अध्याय जहाँ सामग्री में दिये हों।
आधिकारिक संदर्भ

गीता

भगवद्गीता

संदर्भ-सूची दर्ज है
मुख्य आधार
पाठ-जाँच के लिए BORI का The Bhagavadgita Reprinted From The Bhismaparvan, प्रो. एस. के. बेलवलकर, नामित संदर्भ है।
दूसरा आधार
अर्थ और हिन्दी सम्पादकीय तुलना के लिए गीता प्रेस की श्रीमद्भगवद्गीता तत्त्वविवेचनी, जयदयाल गोयन्दका।
सम्पादकीय नीति
अध्याय-क्रम में मूल पाठ, अर्थ और व्याख्या को अलग रखना।
दायरा
18 अध्यायों की व्याख्या; मूल श्लोक चयन के रूप में।
ज्ञात सीमाएँ
संदर्भ-समुच्चय नामित है; सभी पृष्ठों के श्लोक-दर-श्लोक मिलान का दावा नहीं किया जाता।
सन्दर्भ की रीति
अध्याय और श्लोक: उदाहरण 2.47।
आधिकारिक संदर्भ
चुने हुए पाठ की जाँच
दूसरे अध्याय का श्लोक-मानचित्र और जाँच

पुराण

शिवपुराण

आधार-संस्करण दर्ज है
मुख्य आधार
गीता प्रेस, गोरखपुर का संक्षिप्त शिवपुराण (संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), हिन्दी; बत्तीसों कथाएँ इसी के पन्नों से कही गई हैं, संहिता और अध्याय संकेत सहित।
दूसरा आधार
अंग्रेज़ी पन्नों की तुलना जे. एल. शास्त्री के सम्पूर्ण अंग्रेज़ी अनुवाद से, मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली; कुछ अंग्रेज़ी पन्नों में इस पूरे पाठ के वे अंश भी हैं जो संक्षिप्त संस्करण में नहीं मिलते।
सम्पादकीय नीति
भीतरी सन्दर्भों के साथ सरल कथा-रूप; स्रोत-सुधार नामित पाठ से मिलान के बाद।
दायरा
32 चुने हुए प्रसंग।
ज्ञात सीमाएँ
संदर्भ नामित है; पूरा संग्रह संस्करण-स्तर पर उससे मिलाया हुआ नहीं बताया जाता।
सन्दर्भ की रीति
संहिता, खण्ड या अध्याय जहाँ दिया हो।

पुराण

विष्णुपुराण

संदर्भ-सूची दर्ज है
मुख्य आधार
पाठ-जाँच के लिए गीता प्रेस का सम्पूर्ण विष्णु पुराण, संस्कृत और हिन्दी अनुवाद सहित, नामित संदर्भ है।
दूसरा आधार
वंश, अंश और अध्याय संकेतों को सम्पादकीय तुलना में प्राथमिकता दी जाती है।
सम्पादकीय नीति
कथा, वंश और ब्रह्माण्ड-विज्ञान को स्पष्ट गद्य में संक्षिप्त करना।
दायरा
छह अंशों से 26 चुने हुए कथा-पाठ। पाँचवें अंश से कृष्ण-जन्म (5.3), गोवर्धन (5.10 से 12) और यदुवंश का अन्त।
ज्ञात सीमाएँ
संदर्भ नामित है; प्रसंग उससे अंश-दर-अंश मिलाए हुए नहीं बताए जाते।
सन्दर्भ की रीति
अंश और अध्याय जहाँ सामग्री में स्पष्ट हो।
आधिकारिक संदर्भ

देवी

श्रीमद्देवीभागवत

संदर्भ-सूची दर्ज है
मुख्य आधार
पाठ-जाँच के लिए गीता प्रेस का श्रीमद्देवीभागवत पुराण, हिन्दी अनुवाद सहित, खण्ड 1 और 2, नामित संदर्भ-समुच्चय है।
दूसरा आधार
गीता प्रेस की संस्कृत-मूल सूची को मूल पाठ के संकेतों की तुलना में देखा जाता है।
सम्पादकीय नीति
चुनी हुई कथाओं का सहज पुनर्कथन, स्कन्ध और अध्याय संकेत सुरक्षित रखते हुए।
दायरा
27 चुनी हुई कथाएँ।
ज्ञात सीमाएँ
संदर्भ-समुच्चय नामित है; कथाओं का स्कन्ध-दर-स्कन्ध मिलान दर्ज नहीं है।
सन्दर्भ की रीति
स्कन्ध और अध्याय जहाँ दिये हों।
आधिकारिक संदर्भ

उपनिषद्

उपनिषद्

संदर्भ-सूची दर्ज है
मुख्य आधार
पाठ-जाँच के लिए अद्वैत आश्रम का Eight Upanishads, दो खण्ड, स्वामी गम्भीरानन्द, नामित संदर्भ है।
दूसरा आधार
छान्दोग्य और बृहदारण्यक के लिए शंकराचार्य-भाष्य सहित अद्वैत आश्रम के अलग संस्करण भी तुलना में हैं। श्वेताश्वतर और कैवल्य इन आठ उपनिषदों में नहीं आते: श्वेताश्वतर के लिए शंकराचार्य-भाष्य सहित अद्वैत आश्रम का अलग संस्करण, स्वामी गम्भीरानन्द, नामित संदर्भ है; कैवल्य पर शंकराचार्य का भाष्य नहीं है, उसका पन्ना मूल संस्कृत के साथ पढ़कर लिखा गया है और उसके लिए अभी कोई मुद्रित संस्करण नामित नहीं है।
सम्पादकीय नीति
मूल मन्त्र, अर्थ और व्याख्या को स्पष्ट रूप से अलग रखना।
दायरा
बारह उपनिषद्: ग्यारह आदि से अन्त तक, ईशावास्य चुने हुए मन्त्रों में।
ज्ञात सीमाएँ
संदर्भ-समुच्चय नामित है; हर उपनिषद् का मन्त्र-दर-मन्त्र मिलान दर्ज नहीं है।
सन्दर्भ की रीति
उपनिषद्, अध्याय, वल्ली और मन्त्र जहाँ उपलब्ध हों।
आधिकारिक संदर्भ
चुने हुए पाठ की जाँच
ईशावास्य की व्याख्या का अपना आधार

योग और वेदान्त

योग और वेदान्त ग्रंथ

संदर्भ-सूची दर्ज है
मुख्य आधार
पतञ्जलि योगसूत्र के लिए BORI का The Yoga of Patañjali, एम. आर. यार्दी, नामित संदर्भ है। ब्रह्मसूत्र का सूत्र-पाठ संस्कृत-डॉक्युमेण्ट्स संग्रह के देवनागरी पाठ से है; सूत्रों की गिनती और अधिकरण-विभाग शंकराचार्य के अनुसार हैं, 555 सूत्र और 191 अधिकरण, उसी संग्रह की अधिकरण-सूची से, जो स्वामी गम्भीरानन्द के अनुवाद और बेल्वलकर के ब्रह्मसूत्रपाठ पर बनी है। शंकराचार्य के भाष्य की जाँच जॉर्ज थीबो के अंग्रेज़ी अनुवाद से, सेक्रेड बुक्स ऑफ़ द ईस्ट, खण्ड 34 (1890) और 38 (1896)।
दूसरा आधार
विवेकचूडामणि, अष्टावक्र संहिता और अवधूत गीता के लिए अद्वैत आश्रम की आधिकारिक ग्रंथ-सूची।
सम्पादकीय नीति
पाठ, अर्थ और सम्पादकीय व्याख्या को अलग रखना।
दायरा
योगसूत्र, ब्रह्मसूत्र, विवेकचूडामणि और अद्वैत ग्रंथ।
ज्ञात सीमाएँ
संदर्भ नामित हैं; किसी ग्रंथ के सूत्र या श्लोक-स्तर मिलान का दावा नहीं किया जाता।
सन्दर्भ की रीति
सूत्र या श्लोक संख्या जहाँ स्पष्ट हो।
आधिकारिक संदर्भ

सिख वाणी

सिख वाणी

संदर्भ-सूची दर्ज है
मुख्य आधार
पाठ-जाँच के लिए शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी का गुरु ग्रन्थ साहिब परिचय और मानक 1430 अंगों वाला ढाँचा नामित संदर्भ है।
दूसरा आधार
SGPC की वर्तमान आधिकारिक डिजिटल लाइब्रेरी सहायक प्रकाशनों और पाठ-संदर्भों के मिलान के लिए दर्ज है।
सम्पादकीय नीति
अंग, राग और बाणी संकेत सुरक्षित रखना; स्रोत-सुधार SGPC संदर्भ से मिलान के बाद।
दायरा
जपजी, आनंद साहिब, आसा दी वार, सुखमनी और सलोक महला 9 पूरी बाणी में, और आदि ग्रंथ के सभी 1430 अंग।
ज्ञात सीमाएँ
यह सबसे बड़ा संग्रह है; अंग-दर-अंग पूर्ण मिलान का दावा नहीं किया जाता।
सन्दर्भ की रीति
अंग संख्या और राग जहाँ पृष्ठ पर स्पष्ट हों।
आधिकारिक संदर्भ

भक्ति

स्तोत्र और भक्ति ग्रंथ

संदर्भ-सूची दर्ज है
मुख्य आधार
पाठ-जाँच के लिए गीता प्रेस की स्तोत्ररत्नावली और उसकी आधिकारिक स्तोत्र-संग्रह सूची नामित संदर्भ हैं।
दूसरा आधार
शिवमहिम्न स्तोत्र और श्रीललिता सहस्रनाम के लिए अद्वैत आश्रम की आधिकारिक ग्रंथ-सूची भी तुलना में है।
सम्पादकीय नीति
मूल पाठ, लिप्यन्तरण, अर्थ और टिप्पणी को अलग रखना।
दायरा
दस पाठ: विष्णु और ललिता सहस्रनाम, नारद भक्ति सूत्र, सौन्दर्य लहरी, पुरुष सूक्त, हनुमान चालीसा, शिव महिम्न स्तोत्र, श्री रुद्रम्, गणेश अथर्वशीर्ष और भज गोविन्दम्।
ज्ञात सीमाएँ
संदर्भ-समुच्चय नामित है; अलग-अलग स्तोत्रों का पाठ-मिलान दर्ज नहीं है।
सन्दर्भ की रीति
श्लोक या मन्त्र संख्या जहाँ उपलब्ध हो।
आधिकारिक संदर्भ

मुखपृष्ठ पर आने वाले अंश

ये 73 अंश पुस्तकालय के अपने हिन्दी और अंग्रेज़ी पन्नों से शब्दशः लिए गए हैं। हिन्दी मुखपृष्ठ हर अंश को उसके हिन्दी पन्ने के शब्दों में दिखाता है, और अंग्रेज़ी मुखपृष्ठ अंग्रेज़ी पन्ने के शब्दों में। हर अंश को अपने पन्ने से मिलाया गया। नीचे हर टिप्पणी बताती है कि अंश अपने पन्ने में कहाँ आता है।

भुशुण्ड: कल्पवृक्ष पर युगों के साक्षीयोग वासिष्ठ · भुशुण्ड

कहाँ से: भुशुण्ड 'महामुनि' वसिष्ठ के आगे भुशुण्ड: कल्पवृक्ष पर युगों के साक्षी के 'दीर्घजीवन की भीतरी रीति' खण्ड में अपनी लम्बी आयु के कारण एक-एक कर गिनाते हैं, और हर कारण के साथ 'इसी ने' की टेक लौट आती है।

प्रसंग: मेरु पर कल्पवृक्ष पर बैठे, युगों के साक्षी भुशुण्ड मुनि वसिष्ठ को बताते हैं कि इतने युगों में किस बात ने उन्हें स्वस्थ और प्रसन्न रखा।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 2: सांख्य योगभगवद् गीता · 2.47

कहाँ से: अध्याय 2: सांख्य योग के 'श्लोक-दर-श्लोक' भाग में श्लोक 2.47 का सीधा अर्थ यही है, जो अन्वय 'ते कर्मणि एव अधिकारः' के ठीक नीचे आता है; वहाँ अध्याय के सभी 72 श्लोक मूल, पदच्छेद और अन्वय के साथ खुले हैं।

प्रसंग: कुरुक्षेत्र में कृष्ण अर्जुन को कर्म की पहली सीख यहीं देते हैं। गीता का सबसे अधिक दोहराया जाने वाला वचन यही है।

पूरा पन्ना पढ़िए

जपजी साहिब के बारह चुने हुए पाठगुरु नानक · जपजी साहिब, समापन सलोक · गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 8 · हिन्दी भाव

कहाँ से: जपजी साहिब के सलोक की पहली दो पंक्तियाँ जपजी साहिब के बारह चुने हुए पाठ के बारहवें और अन्तिम पाठ, 'समापन का सलोक', में आती हैं; मूल पंक्ति 'पवणु गुरू पाणी पिता' देवनागरी में पहले है, फिर यह भाव।

प्रसंग: अड़तीस पउड़ियों में सृष्टि की विशालता की बात के बाद जपजी साहिब का समापन हवा, पानी, धरती और दिन-रात पर लौट आता है।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 23 · विभीषण-शरणागतिवाल्मीकि रामायण · युद्धकाण्ड, सर्ग 1 से 19 · गीता प्रेस

कहाँ से: सुग्रीव के सन्देह का उत्तर देते हुए राम अध्याय 23 · विभीषण-शरणागति के खण्ड 'शरणागत-धर्म, श्रीराम का निर्णय' में पहले ऋषि कण्डु का वचन मानने की बात कहते हैं, फिर यह व्रत सुनाते हैं; पाठ गीता प्रेस के क्रम पर है।

प्रसंग: लंका के राजा के भाई विभीषण राम की शरण माँगने आए हैं, और साथी उन पर सन्देह करते हैं। राम उत्तर में वह नियम सुनाते हैं जिस पर उनका जीवन टिका है।

पूरा पन्ना पढ़िए

मुण्डक उपनिषद्: परा विद्या, दो पक्षी और सत्यमेव जयतेमुण्डक उपनिषद् · मुण्डक 3

कहाँ से: मुण्डक उपनिषद्: परा विद्या, दो पक्षी और सत्यमेव जयते में तीसरा मुण्डक इसी चित्र से खुलता है, मूल 'द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया' के साथ; अगला मन्त्र उसी पेड़ पर डूबे, अपनी बेबसी पर शोक करते पुरुष की ओर मुड़ता है।

प्रसंग: ऋषि अङ्गिरस गृहस्थ शौनक को अपना अन्तिम उपदेश एक चित्र से आरम्भ करते हैं। एक पक्षी संसार को जीता है, और दूसरा शान्त होकर उसे देखता रहता है।

पूरा पन्ना पढ़िए

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 1: साक्षीअष्टावक्र गीता · प्रकरण 1.11

कहाँ से: अष्टावक्र गीता · प्रकरण 1: साक्षी में 'श्लोक 10 · 11' के मूल से पहले के गद्य में, रस्सी और साँप वाले चित्र के ठीक बाद, यह 'कहावत-सी बात' आती है; मूल में अष्टावक्र इसे 'किंवदन्तीह सत्येयं' कहते हैं।

प्रसंग: मिथिला के दरबार में बालक-ऋषि अष्टावक्र राजा जनक के मुक्ति-सम्बन्धी प्रश्नों का उत्तर दे रहे हैं। यहाँ वे बाज़ार की एक जानी-पहचानी कहावत उठाते हैं और उसे सुनने वाले की ओर मोड़ देते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 4 · शक्रादि-स्तुतिदेवी माहात्म्य · अध्याय 4, शक्रादि-स्तुति · श्लोक 17 · मार्कण्डेय पुराण

कहाँ से: शक्र आदि देवों की स्तुति में यह श्लोक 17 है, जिसका मूल 'दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः' से आरम्भ होता है; अध्याय 4 · शक्रादि-स्तुति में श्लोक-संख्या मार्कण्डेय पुराण के अनुसार है, और गीता प्रेस की सप्तशती की गिनती उससे भिन्न है।

प्रसंग: देवी की पहली बड़ी विजय के बाद देवों की स्तुति उस श्लोक तक पहुँचती है जो आज भी हर संकट की घड़ी में दोहराया जाता है।

पूरा पन्ना पढ़िए

रन्तिदेव की करुणाश्रीमद्भागवत · स्कन्ध 9, अध्याय 21

कहाँ से: रन्तिदेव की प्रार्थना के तीन वचनों में यह बीच का है: पहले वे आठों सिद्धियों वाली परम गति और मोक्ष तक नहीं चाहते, फिर यह माँगते हैं; रन्तिदेव की करुणा का पुनर्कथन स्कन्ध 9, अध्याय 21 पर चलता है।

प्रसंग: अड़तालीस दिन के उपवास के बाद राजा रन्तिदेव के हाथ में बस थोड़ा-सा जल बचा है, और तभी द्वार पर एक प्यासा अतिथि आ पहुँचता है। जल देने से पहले उनके भीतर से यह प्रार्थना उठती है।

पूरा पन्ना पढ़िए

उद्दालक: मन, प्रणव और सत्ता-सामान्ययोग वासिष्ठ · उद्दालक

कहाँ से: 'ओ मेरे नासमझ मन!', इसी सम्बोधन से उद्दालक: मन, प्रणव और सत्ता-सामान्य के 'कन्दरा में मन से संवाद' खण्ड में उद्दालक का भाषण खुलता है, और यह वचन मन्दार-पुष्पों का कुञ्ज छोड़ विषैले वन में घुसने वाले की उपमा के ठीक बाद आता है।

प्रसंग: गन्धमादन की एक कन्दरा में तरुण उद्दालक ध्यान में बैठे हैं और उनका मन ठहरता नहीं। वे अपने ही चंचल मन को सम्बोधित करके उसे समझाते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

धर्म-रथ के पहिये: शौर्य और धैर्यरामचरितमानस · लंकाकाण्ड, विभीषण गीता

कहाँ से: धर्म-रथ का वर्णन धर्म-रथ के पहिये: शौर्य और धैर्य में इसी चौपाई से आरम्भ होता है, जिसे वहाँ तुलसीदास का सबसे प्रसिद्ध रूपक कहा गया है; अर्थ के बाद राम के पहियों के चुनाव की व्याख्या आती है, साहस और धीरज साथ-साथ।

प्रसंग: लंका के रण में राम पैदल खड़े हैं और विभीषण को चिन्ता है कि उनके पास रथ नहीं। राम उस रथ का वर्णन करते हैं जो सच्ची विजय दिलाता है, और जो मनुष्य के अपने गुणों से बनता है।

पूरा पन्ना पढ़िए

सौन्दर्य लहरी · भाग 2 · सौन्दर्य वर्णनसौन्दर्य लहरी · श्लोक 100, समापन

कहाँ से: सौन्दर्य लहरी · भाग 2 · सौन्दर्य वर्णन में '100 · समापन' के मूल श्लोक से ठीक पहले के गद्य में कवि अपनी स्तुति को चाँद को उसी से झरी बूँदों का अर्घ्य देने और समुद्र को उसी के पानी से तृप्त करने जैसा बताकर यह कहते हैं।

प्रसंग: सौ श्लोकों के अंत में कवि अपनी स्तुति को सूर्य के आगे दीया दिखाने जैसा मानते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 11क · भाग 2 · द्वैतवन: द्रौपदी, युधिष्ठिर और भीम का संवादमहाभारत · वन पर्व, द्वैतवन का संवाद · गांगुली खण्ड 1 से 35

कहाँ से: द्रौपदी को 'हे कृष्णा' कहकर युधिष्ठिर अध्याय 11क · भाग 2 · द्वैतवन: द्रौपदी, युधिष्ठिर और भीम का संवाद के प्रह्लाद-बलि संवाद वाले खण्ड में क्षमा की महिमा गिनाते हैं; क्रम गांगुली के खण्ड 1 से 35 का है, और पाठ-भेद पर गीता प्रेस का पाठ चलता है।

प्रसंग: द्वैतवन में द्रौपदी युधिष्ठिर से अन्याय का उत्तर क्रोध से देने को कहती हैं। युधिष्ठिर उत्तर में ऋषि कश्यप के वे श्लोक सुनाते हैं जो उन्होंने क्षमाशीलों के सम्मान में गाए थे।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 1: अश्वमेध, प्राणों की होड़ और अहं ब्रह्मास्मिबृहदारण्यक उपनिषद् · अध्याय 1

कहाँ से: अध्याय 1: अश्वमेध, प्राणों की होड़ और अहं ब्रह्मास्मि के खण्ड 'प्राण के कई नाम, और वह प्रार्थना जो आज भी गाई जाती है' में मूल 'असतो मा सद्गमय' के साथ यह अर्थ आता है, और फिर उपनिषद् स्वयं इन पंक्तियों को खोलता है: असत् मृत्यु है, सत् अमृत।

प्रसंग: उपनिषद् ये तीन पंक्तियाँ साम-गान के समय चुपचाप जपने के लिए देता है। आज भी संसार भर में लोग इन्हें गाते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

अवधूत के चौबीस गुरुभागवतम् · स्कन्ध 11, अध्याय 7 से 9

कहाँ से: भिरड़ की सीख के ठीक बाद, जब महाराज यदु सिर झुकाते हैं, अवधूत के चौबीस गुरु की कथा अवधूत के इसी उत्तर पर पूरी होती है; पुनर्कथन स्कन्ध 11, अध्याय 7 से 9 पर टिका है।

प्रसंग: राजा यदु अवधूत के मुख से पृथ्वी से लेकर भृंगी कीट तक उनके चौबीस गुरुओं के नाम सुन चुके हैं। राजा गिनती पर अचरज करते हैं, तो अवधूत हँसकर कहते हैं कि गुरु तो असंख्य हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

जपजी साहिब के बारह चुने हुए पाठगुरु नानक · जपजी साहिब, पउड़ी 21 · गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 4 · हिन्दी भाव

कहाँ से: जपजी साहिब के बारह चुने हुए पाठ का आठवाँ पाठ, 'पउड़ी 21 · भीतर का तीर्थ', इस पउड़ी की पहली चार पंक्तियाँ देता है; व्याख्या याद दिलाती है कि 'सुणिआ' और 'मंनिआ' वही दो क्रियाएँ हैं जिनसे पउड़ी 8 से 15 बनी हैं।

प्रसंग: गुरु नानक बाहरी पुण्य-कर्मों को सुनने, मानने और प्रेम के भीतरी काम के सामने तौलते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 15 · हनुमान-राम भेंट, सुग्रीव-मैत्रीवाल्मीकि रामायण · किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 1 से 15 · गीता प्रेस

कहाँ से: सुग्रीव यह राम से अध्याय 15 · हनुमान-राम भेंट, सुग्रीव-मैत्री के खण्ड 'सुग्रीव का आत्मनिवेदन और वैर का आरम्भ' में कहते हैं, और राम का उत्तर बस इतना है, 'ऐसा ही है जैसा आप कहते हैं'; पाठ गीता प्रेस के क्रम पर है।

प्रसंग: राम और निर्वासित वानरराज सुग्रीव ने अभी-अभी अग्नि को साक्षी बनाकर मित्रता की है। सुग्रीव बताते हैं कि एक मित्र दूसरे मित्र के लिए क्या होता है।

पूरा पन्ना पढ़िए

चूड़ाला: रानी, योगिनी और गुरुयोग वासिष्ठ · चूड़ाला

कहाँ से: शिखिध्वज के एक हजार दस वर्षा ऋतुओं के राज्य का वृत्तान्त सुनाकर वसिष्ठ, चूड़ाला: रानी, योगिनी और गुरु के खण्ड 'गुरु का असली रूप और राज्य में वापसी' में, राम से उस राजा का अनुकरण करने को कहते हैं और फिर यह वचन जोड़ते हैं।

प्रसंग: रानी चूड़ाला और राजा शिखिध्वज वन से लौटकर मुक्त मन से राज करते हैं। उनकी कथा पूरी करके वसिष्ठ राम को यह सीख देते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 6: ध्यान योगभगवद् गीता · 6.5

कहाँ से: अन्वय 'आत्मना आत्मानम् उद्धरेत्' के ठीक नीचे, अध्याय 6: ध्यान योग के 'श्लोक-दर-श्लोक' भाग में, श्लोक 6.5 का यही सीधा अर्थ लिखा है; उस अध्याय के सभी 47 श्लोक वहाँ इसी ढंग से खुले हैं।

प्रसंग: ध्यान के अध्याय में कृष्ण साधक का ध्यान उसकी अपनी भीतरी शक्ति की ओर ले जाते हैं। इस वचन में हर इंसान अपने उत्थान का पहला सहायक है।

पूरा पन्ना पढ़िए

शिव महिम्न स्तोत्रपुष्पदन्त · शिव महिम्न स्तोत्र · श्लोक 7 से 9

कहाँ से: शिव महिम्न स्तोत्र में 'श्लोक 7 से 9 · सब नदियाँ एक समुद्र, और शरमाते हुए गाना' से पहले का गद्य इसे स्तोत्र का सबसे उदार श्लोक कहकर खोलता है; ठीक बाद की पंक्ति है, 'मार्ग टेढ़ा होने से जल मैला नहीं हो जाता'।

प्रसंग: पुष्पदन्त वेद, सांख्य, योग और भक्ति की अलग-अलग राहें गिनाते हैं, जिनमें हर एक अपने को सही मानती है, और फिर सबको एक ही मंज़िल देते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 15 · यक्ष-प्रश्नमहाभारत · वन पर्व, यक्ष-प्रश्न · गीता प्रेस

कहाँ से: युधिष्ठिर का यह उत्तर अध्याय 15 · यक्ष-प्रश्न के खण्ड 'मित्र, अमृत, धर्म और त्याग के प्रश्न' में है; प्रसंग वन पर्व के आरणेय उपपर्व में अध्याय 311 से 315 का है, और पाठ-भेद पर गीता प्रेस का पाठ माना गया है।

प्रसंग: वन के एक सरोवर पर रहस्यमय यक्ष जल पीने देने से पहले युधिष्ठिर से धर्म के प्रश्न पूछता है। जब वह पूछता है कि मनुष्य क्या त्यागे और हर त्याग से उसे क्या मिलता है, तो युधिष्ठिर चार छोटे उत्तर देते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

योग सूत्र · पाद 2 · साधन पादपतञ्जलि योग सूत्र · साधन पाद 2.16

कहाँ से: सूत्र 2.16, 'हेयं दुःखमनागतम्', के ठीक नीचे योग सूत्र · पाद 2 · साधन पाद में यह व्याख्या आती है और इसे पूरे योग का सबसे काम का सूत्र कहती है; मूल पाठ आगाशे संस्करण (आनन्दाश्रम, 1904) और विवेकानन्द के राजयोग से मिलाया गया है।

प्रसंग: पतञ्जलि पूरे अभ्यास का प्रयोजन पाँच संस्कृत शब्दों में रखते हैं, हेयं दुःखमनागतम्। यह पंक्ति आने वाले दिनों के लिए एक सीधा भरोसा देती है।

पूरा पन्ना पढ़िए

भाग 1 · दुर्लभ मानव-जन्मविवेकचूडामणि · श्लोक 3

कहाँ से: भाग 1 · दुर्लभ मानव-जन्म में श्लोक 2 की 'दुर्लभता की सीढ़ी' के बाद शंकराचार्य उस सीढ़ी को तीन में समेटते हैं, और '3 · तीन दुर्लभ वस्तुएँ' का मूल इसी गद्य के बाद आता है; पाठ मानक 580-श्लोक संस्करण का है।

प्रसंग: विवेकचूडामणि के आरम्भ में शंकराचार्य उन देनों को गिनाते हैं जो साधक के पास पहले से हैं। जिस पाठक के पास मनुष्य-जीवन है और भीतर देखने की चाह है, उसे इनमें से दो मिल चुकी हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

आनंद साहिबगुरु अमरदास · आनंद साहिब, पउड़ी 40 · गुरु ग्रंथ साहिब, राग रामकली · हिन्दी भाव

कहाँ से: आनंद साहिब की अन्तिम पउड़ी, 'पउड़ी 40 · समापन', के भाव में यह वाक्य 'अनदु सुणहु वडभागीहो' के ठीक बाद आता है; अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की टीका पर आधारित है।

प्रसंग: गुरु अमरदास के आनंद-गीत की आख़िरी पउड़ी बताती है कि वह आनंद आख़िर है क्या।

पूरा पन्ना पढ़िए

प्रह्लाद की प्रार्थनाश्रीमद्भागवत · स्कन्ध 7, अध्याय 9

कहाँ से: 'प्रभो' कहकर प्रह्लाद प्रह्लाद की प्रार्थना में पहले उन मुनियों की बात करते हैं जो अपनी ही मुक्ति के लिए निर्जन वन में जाकर मौन साध लेते हैं, फिर यह कहते हैं; पुनर्कथन स्कन्ध 7, अध्याय 9 पर चलता है।

प्रसंग: बालक प्रह्लाद अपनी स्तुति से नृसिंह का क्रोध शान्त कर चुके हैं, और जन्म-मृत्यु से छुटकारा उनके सामने है। उनका मन उन सबकी ओर जाता है जो अभी संसार में भटक रहे हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

वासुदेव: समंगा-तट से शुक्र की वापसीयोग वासिष्ठ · वासुदेव

कहाँ से: जल में हिलती सूर्य की छाया की उपमा देकर वसिष्ठ यह वचन वासुदेव: समंगा-तट से शुक्र की वापसी के 'मन्दराचल का अस्थिपंजर' खण्ड में कहते हैं, दशरथ की सभा में उठे श्रीराम के प्रश्न के उत्तर में।

प्रसंग: वसिष्ठ श्रीराम को समझाते हैं कि शुक्र जैसे मुक्त मुनि भी अपने देह के लिए शोक क्यों कर सके। फिर वे बताते हैं कि मुक्ति और बन्धन का असली ठिकाना कहाँ है।

पूरा पन्ना पढ़िए

भज गोविन्दम् · Bhaja Govindamभज गोविन्दम् · श्लोक 9

कहाँ से: भज गोविन्दम् · Bhaja Govindam में 'श्लोक 9-10 · मुक्ति की सीढ़ी' से पहले का गद्य इसे रचना का सबसे प्रसिद्ध श्लोक कहकर उतारता है, और इसके बाद इसे 'ग्यारह-बारह शब्दों में पूरी अद्वैत-साधना का नक्शा' कहता है।

प्रसंग: आदि शंकराचार्य पूरी साधना को एक ही सीढ़ी में बाँध देते हैं, जिसका हर डण्डा नीचे वाले से उठता है, और जिसकी शुरुआत संगति से होती है।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 11 · नारायणी स्तुतिदेवी माहात्म्य · अध्याय 11, नारायणी स्तुति · श्लोक 9 · मार्कण्डेय पुराण

कहाँ से: अध्याय 11 · नारायणी स्तुति में '8 · 9 · 10 · 11' के मूल से पहले के गद्य में नारायणी के चार नमनों में यह दूसरा है, जिसका मूल 'सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके' है; श्लोक-संख्या मार्कण्डेय पुराण के पाठ के अनुसार है।

प्रसंग: नारायणी स्तुति देवी को एक के बाद एक रूप में नमन करती है; यह वही श्लोक है जो अनगिनत पूजाओं के आरम्भ में गाया जाता है।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 20 · लंका-प्रवेश व नगर-दर्शनवाल्मीकि रामायण · सुन्दरकाण्ड, सर्ग 4 से 13 · गीता प्रेस

कहाँ से: हार न मानना ही श्री की जड़ है, यह स्वयं से कहकर हनुमान अध्याय 20 · लंका-प्रवेश व नगर-दर्शन के खण्ड 'निराशा और फिर धैर्य' में यह वचन जोड़ते हैं; कड़ी गीता प्रेस के क्रम पर सुन्दरकाण्ड के सर्ग 4 से 13 निभाती है।

प्रसंग: हनुमान रात भर लंका छानकर भी सीता को नहीं पाते और निराशा के किनारे आ खड़े होते हैं। वे अनिर्वेद, यानी हार न मानने, का सहारा लेकर फिर खोज में लग जाते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 7: नारद, सनत्कुमार और भूमाछान्दोग्य उपनिषद् · अध्याय 7

कहाँ से: सनत्कुमार का यह एक पंक्ति का उत्तर, मूल 'यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति' के साथ, अध्याय 7: नारद, सनत्कुमार और भूमा के खण्ड 'भूमा: जहाँ दूसरा कुछ बचता ही नहीं' को खोलता है, जिसमें खण्ड 23 से 26 आते हैं।

प्रसंग: नारद सारी विद्याएँ पढ़ चुके हैं, फिर भी अपना शोक लेकर सनत्कुमार के पास आते हैं। उपदेश की लम्बी सीढ़ी के शिखर पर आचार्य उन्हें यह उत्तर देते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 9: राजविद्या-राजगुह्य योगभगवद् गीता · 9.26

कहाँ से: श्लोक 9.26 का यह सीधा अर्थ अध्याय 9: राजविद्या-राजगुह्य योग के 'श्लोक-दर-श्लोक' भाग में अन्वय के नीचे है; उसी अध्याय का कथा-भाग 'पत्ता, फूल, फल, जल' शीर्षक से इसी भेंट को खोलता है, और सभी 34 श्लोक वहाँ हैं।

प्रसंग: जिस अध्याय को कृष्ण राजविद्या कहते हैं, उसमें वे सबसे छोटी भेंटों के नाम लेते हैं। उन्हें भेंट के साथ आया प्रेम चाहिए।

पूरा पन्ना पढ़िए

जपजी साहिब के बारह चुने हुए पाठगुरु नानक · जपजी साहिब, पउड़ी 38 · गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 8 · हिन्दी भाव

कहाँ से: जपजी साहिब के बारह चुने हुए पाठ का ग्यारहवाँ पाठ, 'पउड़ी 38 · सच्ची टकसाल', इस पउड़ी की पहली पाँच पंक्तियाँ मूल के साथ देता है, जो 'जतु पाहारा धीरजु सुनिआरु' से चलकर 'घड़ीऐ सबदु सची टकसाल' पर ठहरती हैं।

प्रसंग: जपजी साहिब की आख़िरी पउड़ी एक सुनार की टकसाल खोल कर रखती है, जिसका हर औज़ार एक भीतरी गुण है।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 14ख · सावित्री-सत्यवान और कर्ण का कवच-कुण्डल दानमहाभारत · वन पर्व, सावित्री-कथा · गांगुली खण्ड 291 से 308

कहाँ से: पहला वर देकर यम सावित्री से कहते हैं कि थककर अब लौट जाइए, और अध्याय 14ख · सावित्री-सत्यवान और कर्ण का कवच-कुण्डल दान में उनका उत्तर यही है; मार्कण्डेय की सुनाई यह कथा गांगुली के खण्ड 291 से 308 के क्रम पर है, पाठ-भेद पर गीता प्रेस के साथ।

प्रसंग: सावित्री यम के पीछे-पीछे चलती हैं, जो उनके पति के प्राण लिए जा रहे हैं। वे चलती भी रहती हैं और बोलती भी, और सज्जनों की संगति पर उनके वचन यम को इतने भाते हैं कि वे वर देने को तैयार हो जाते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

गाधि का चाण्डाल-स्वप्न: दो मुहूर्त और अनेक वर्षयोग वासिष्ठ · गाधि

कहाँ से: भ्रान्ति का चक्र रोकने के श्रीराम के प्रश्न पर वसिष्ठ गाधि का चाण्डाल-स्वप्न: दो मुहूर्त और अनेक वर्ष के 'ऋष्यमूक पर दस वर्ष' खण्ड में घड़े में बन्द मच्छर की उपमा के बाद यह उपाय बताते हैं।

प्रसंग: गाधि नाम के ब्राह्मण ने कुछ ही पलों के एक दृश्य में पूरा दूसरा जीवन जी लिया था। यह कथा पूरी करके वसिष्ठ राम को यह उपाय बताते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

अवधूत गीता · अध्याय 1अवधूत गीता · अध्याय 1.56

कहाँ से: अवधूत गीता · अध्याय 1 में '55 · 56 · 57 · 58' के मूल से पहले का गद्य 'अरे बोध, अरे ज्ञान' की विस्मय-माला के बाद यह पुकार उतारता है, जिसका मूल 'किं नाम रोदिषि सखे' है; प्रथम अध्याय में 76 श्लोक हैं।

प्रसंग: अवधूत गीता के घुमक्कड़ ऋषि दत्तात्रेय यहाँ एक मित्र के स्वर में बोलते हैं। वे हर दुखी मन से कहते हैं कि उसके भीतर जो है, उसे कभी कोई चोट नहीं पहुँची।

पूरा पन्ना पढ़िए

ललिता सहस्रनाम, खण्ड 10ललिता सहस्रनाम · खण्ड 10, नाम 986 से 995

कहाँ से: ललिता सहस्रनाम, खण्ड 10 में 'नाम 986 से 995' वाले समूह से पहले का गद्य यही है, जो 'समापन से ठीक पहले' देवी को करुणा की मूर्ति कहकर खुलता है; नामों के अर्थ भास्करराय के 'सौभाग्य-भास्कर' भाष्य के अनुसार हैं।

प्रसंग: जगन्माता के सहस्र नामों के समापन के पास ये नाम उनकी कृपा की ओर मुड़ते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

पार्वती की परीक्षाशिवपुराण · रुद्रसंहिता, पार्वती खण्ड · गीता प्रेस

कहाँ से: 'मुनीश्वरो!' कहकर पार्वती पार्वती की परीक्षा के खण्ड 'सप्तर्षियों की परीक्षा' में यह उत्तर देती हैं, और प्रण सुनकर सप्तर्षि जय-जयकार करते शिव के पास लौट जाते हैं; पाठ गीता प्रेस के संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क पर है।

प्रसंग: पार्वती के तप के दिनों में सप्तर्षि उनके पास आकर उन्हें शिव को पाने के संकल्प से डिगाने का यत्न करते हैं। यह उनका उत्तर है।

पूरा पन्ना पढ़िए

सुरघु और परिघ: राजधर्म से सहज समाधि तकयोग वासिष्ठ · सुरघु और परिघ

कहाँ से: माण्डव्य का उपदेश सुरघु और परिघ: राजधर्म से सहज समाधि तक के 'माण्डव्य का आगमन' खण्ड में इसी वचन पर पहुँचता है; चट्टान की उपमा के ठीक बाद उठी हुई लहर के उसी स्थिर जल में लौट जाने की उपमा आती है।

प्रसंग: किरातों के राजा सुरघु अपने दण्ड-निर्णयों की पीड़ा से व्याकुल होकर मुनि माण्डव्य से शान्ति माँगते हैं। माण्डव्य उन्हें भीतर झाँककर यह पूछने को कहते हैं कि वे वास्तव में क्या हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 15: तत्त्वज्ञानअष्टावक्र गीता · प्रकरण 15.8

कहाँ से: आठवें श्लोक का यह भाव अष्टावक्र गीता · प्रकरण 15: तत्त्वज्ञान में है, जिसका संस्कृत मूल 'श्रद्धस्व तात श्रद्धस्व' अगले खण्ड 'श्लोक 7 · 8' में आता है; इससे ठीक पहले अष्टावक्र जनक को समुद्र और उसकी लहरों का चित्र देते हैं।

प्रसंग: जहाँ तर्क की डोर छोटी पड़ जाती है, वहाँ अष्टावक्र जनक को श्रद्धा का सहारा देते हैं। वे राजा को पिता की तरह वत्स कहकर पुकारते हैं और कहते हैं कि आप जो पहले से हैं, उस पर भरोसा कीजिए।

पूरा पन्ना पढ़िए

सलोक महला 9गुरु तेग़ बहादुर · सलोक महला 9, सलोक 22 · गुरु ग्रंथ साहिब · हिन्दी भाव

कहाँ से: गुरु तेग बहादुर के बाईसवें सलोक का भाव, सलोक महला 9 के खण्ड 'सलोक 22 · 23' में; मूल पंक्ति 'कहु नानक आपन तरै अउरन लेत उधार' वहीं दी गई है, और अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की टीका पर आधारित है।

प्रसंग: गुरु ग्रंथ साहिब के समापन-सलोकों में गुरु तेग़ बहादुर उन चार गाँठों का नाम लेते हैं जो इंसान को रोके रखती हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 10 · भाग 2 · चित्रकूट में भरत-राम मिलनवाल्मीकि रामायण · अयोध्याकाण्ड, सर्ग 93 से 119 · गीता प्रेस

कहाँ से: समुद्र पर मिलकर बिछुड़ते दो काठों की उपमा के बाद राम भरत से यह कहते हैं, अध्याय 10 · भाग 2 · चित्रकूट में भरत-राम मिलन के खण्ड 'भरत की पुनः याचना और राम का संसार-नश्वरता उपदेश' में; पाठ अयोध्याकाण्ड के सर्ग 93 से 119 पर, गीता प्रेस के क्रम से चलता है।

प्रसंग: भरत पिता के शोक में डूबे चित्रकूट आए हैं। राम उन्हें समय के बहाव और जीवन को किस काम में लगाना चाहिए, इस पर समझाकर ढाढ़स देते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

तैत्तिरीय उपनिषद्: सत्यं वद, पाँच कोश, और भृगु की तपस्यातैत्तिरीय उपनिषद्

कहाँ से: तैत्तिरीय उपनिषद्: सत्यं वद, पाँच कोश, और भृगु की तपस्या विदाई के इसी दृश्य से खुलता है, और कुछ ही पंक्तियों बाद 'मातृदेवो भव' आता है; यह उपदेश शिक्षावल्ली का है, जो कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय शाखा के इस उपनिषद् की तीन वल्लियों में पहली है।

प्रसंग: गुरु के घर में बरसों रहने के बाद विदाई की सुबह आचार्य अपने शिष्य को इन वचनों के साथ घर भेजते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योगभगवद् गीता · 18.66

कहाँ से: श्लोक 18.66 का सीधा अर्थ, अध्याय 18: मोक्ष संन्यास योग के 'श्लोक-दर-श्लोक' खण्ड से, जहाँ 'सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज' पदच्छेद और अन्वय के साथ आता है; ठीक पहले 18.65 में श्रीकृष्ण कहते हैं कि आप मुझे प्रिय हैं।

प्रसंग: गीता के समापन के पास, सारी राहें दिखा देने के बाद, कृष्ण पूरी सीख को शरण के एक वचन में समेट देते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

हनुमान चालीसातुलसीदास · हनुमान चालीसा · चौपाई 40

कहाँ से: चालीसवीं चौपाई 'तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महँ डेरा॥' का भाव; हनुमान चालीसा में बताया गया है कि यही छाप वह आधार है जिस पर परम्परा चालीसा को तुलसीदास की रचना मानती है।

प्रसंग: चालीस चौपाइयों की स्तुति के बाद तुलसीदास ख़ुद को सदा श्रीहरि का दास कहते हैं और बस एक चीज़ माँगते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 40 · पाण्डवों की महायात्रा, द्रौपदी व भाइयों का गिरना, युधिष्ठिर व कुत्तामहाभारत · महाप्रस्थानिक पर्व, अध्याय 1 से 3 · गीता प्रेस

कहाँ से: युधिष्ठिर इन्द्र को 'हे सहस्र नेत्रों वाले' कहकर यह उत्तर देते हैं, अध्याय 40 · पाण्डवों की महायात्रा, द्रौपदी व भाइयों का गिरना, युधिष्ठिर व कुत्ता के खण्ड 'इन्द्र का रथ और कुत्ते की परीक्षा' में; पुनर्कथन महाप्रस्थानिक पर्व के अध्याय 1 से 3 पर, गीता प्रेस के पाठ से चलता है।

प्रसंग: महायात्रा के अन्त में इन्द्र युधिष्ठिर को सशरीर स्वर्ग ले जाने आते हैं, और एक शर्त रखते हैं: जो कुत्ता पूरे रास्ते उनके साथ चला है, उसे वे पीछे छोड़ दें। यह युधिष्ठिर का उत्तर है।

पूरा पन्ना पढ़िए

भास और विलास: दो मित्रों का आत्मविचारयोग वासिष्ठ · भास और विलास

कहाँ से: बरसों बाद मिले विलास भास से यह कहते हैं, भास और विलास: दो मित्रों का आत्मविचार के खण्ड 'वन में हुई भेंट' में; वसिष्ठ यह कथा राम को सह्य पर्वत के दो मित्रों के पुराने संवाद के रूप में सुनाते हैं।

प्रसंग: भास और विलास मुनि अत्रि के आश्रम में दो देहों में एक मन की तरह पले थे। बरसों के बिछोह के बाद बुढ़ापे में फिर मिलने पर विलास अपने मित्र का स्वागत करते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

उद्धव गीताभागवतम् · स्कन्ध 11, उद्धव गीता

कहाँ से: श्रीकृष्ण उद्धव से यह कहते हैं; उद्धव गीता के अन्त में इसका स्थान भागवत 11.14.20 बताया गया है, और इस अंश की परम्परागत व्याख्या का आधार श्रीधर स्वामी की भावार्थ-दीपिका कही गई है।

प्रसंग: उद्धव के आगे साँख्य, योग और ज्ञान के मार्ग खोल देने के बाद श्रीकृष्ण एक पल ठहरते हैं और एक ही राह पर उँगली रखते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

आनंद साहिबगुरु अमरदास · आनंद साहिब, पउड़ी 17 · गुरु ग्रंथ साहिब, राग रामकली · हिन्दी भाव

कहाँ से: पउड़ी 17 के भाव का अंश, आनंद साहिब से; मूल पंक्ति 'कहदे पवितु सुणदे पवितु से पवितु जिनी मंनि वसाइआ' वहीं दी गई है, और अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की टीका पर आधारित है।

प्रसंग: आनंद साहिब की इस पउड़ी में गुरु अमरदास बार-बार एक ही शब्द पर लौटते हैं, पवित्र।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 21 · अशोक-वाटिका, सीता-दर्शन, मुद्रिकावाल्मीकि रामायण · सुन्दरकाण्ड, सर्ग 14 से 40 · गीता प्रेस

कहाँ से: रत्नों से भरी लंका के विनाश की चेतावनी के ठीक बाद सीता रावण से यह कहती हैं, अध्याय 21 · अशोक-वाटिका, सीता-दर्शन, मुद्रिका के खण्ड 'सीता का तृण की ओट से उत्तर' में; पुनर्कथन सुन्दरकाण्ड के सर्ग 14 से 40 पर, गीता प्रेस के क्रम से है।

प्रसंग: अशोक-वाटिका में बन्दिनी सीता के सामने लंका का सारा वैभव रखा जाता है। वे अपने पति राम, राघव, का नाम लेकर उत्तर देती हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

दाम, व्याल और कट: अभ्यास से बना अहंकारयोग वासिष्ठ · दाम, व्याल और कट

कहाँ से: उपमन्यु और उस सावित्री के उदाहरण गिनाकर, जो अपनी वाणी की मधुरता से यम को मनाकर सत्यवान को लौटा लाई, वसिष्ठ राम से यह कहते हैं; प्रसंग दाम, व्याल और कट: अभ्यास से बना अहंकार के खण्ड 'अहंकार के तीन अर्थ' में है।

प्रसंग: वसिष्ठ राम से कहते हैं कि अपनी शक्ति में कभी ढील न दीजिए, और नन्दी और विश्वामित्र को याद करते हैं, जिन्होंने निरन्तर प्रयत्न से वह पाया जो पहुँच से बाहर लगता था।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 2: सांख्य योगभगवद् गीता · 2.70

कहाँ से: मूल 'आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्' और उसके अन्वय के साथ यह 2.70 का सीधा अर्थ है, अध्याय 2: सांख्य योग के 'श्लोक-दर-श्लोक' खण्ड में; अगला श्लोक 2.71 'निर्ममो निरहंकारः' पुरुष की शान्ति पर आता है।

प्रसंग: स्थिर बुद्धि वाले इंसान की तस्वीर कृष्ण समुद्र की उपमा से पूरी करते हैं, जो हर नदी को समा लेता है और फिर भी अपनी जगह ठहरा रहता है।

पूरा पन्ना पढ़िए

जपजी साहिब के बारह चुने हुए पाठगुरु नानक · जपजी साहिब, मूल मन्त्र · गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1 · हिन्दी भाव

कहाँ से: जपजी साहिब के बारह चुने हुए पाठ के बारह पड़ावों में पहला, '1 · मूल मन्त्र', यही है; अर्थ के बाद वहाँ सलाह है कि इसे उसी क्रम में पढ़िए जिसमें शब्द आते हैं, एक ओंकार से गुर प्रसादि तक।

प्रसंग: गुरु ग्रंथ साहिब की पहली पंक्ति, जिस पर पूरी जपजी साहिब टिकी है।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 19 · भाग 5 · कुन्ती का सन्देश: विदुला की कथा और अन्तिम विदामहाभारत · उद्योग पर्व, विदुला की कथा · गांगुली खण्ड 72 से 139

कहाँ से: विदुला यह फटकार अपने पुत्र संजय को देती है, जो सिन्धुराज से हारकर धरती पर पड़ा है; अध्याय 19 · भाग 5 · कुन्ती का सन्देश: विदुला की कथा और अन्तिम विदा अध्याय 19 का पाँचवाँ भाग है, और पुनर्कथन गांगुली के खण्ड 72 से 139 का क्रम निभाता है।

प्रसंग: रानी विदुला अपने पुत्र को हार के बाद निराशा में पड़ा देखती हैं और उसे फिर से उठ खड़े होने के लिए जगाती हैं। बरसों बाद कुन्ती यही कथा अपने पुत्रों को सन्देश के रूप में भेजती हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

कठ उपनिषद्: नचिकेता और तीन वरकठ उपनिषद् · वल्ली 3

कहाँ से: तीसरी वल्ली के खण्ड 'रथ, सारथी, और छुरे की धार' में कठ उपनिषद्: नचिकेता और तीन वर यह 'उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत' का अर्थ देता है; ठीक बाद 'क्षुरस्य धारा' की चेतावनी आती है, और विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत दिया गया है।

प्रसंग: यमराज इन्द्रियों से शान्त आत्मा तक की भीतरी चढ़ाई बता चुके हैं। फिर वह पुकार आती है जिसे भारत सदियों से दोहराता आया है।

पूरा पन्ना पढ़िए

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 18: जीवन्मुक्तिअष्टावक्र गीता · प्रकरण 18.50

कहाँ से: अठारहवें प्रकरण का पचासवाँ श्लोक, जिसे अष्टावक्र गीता · प्रकरण 18: जीवन्मुक्ति में स्वातन्त्र्य की एक घोषणा कहा गया है; उससे पहले वाले श्लोक में सरल चित्त की चेष्टा बच्चे की चेष्टा जैसी सहज बताई गई है।

प्रसंग: लम्बे अठारहवें प्रकरण में अष्टावक्र उस व्यक्ति का चित्र खींचते हैं जो संसार में रहते हुए भी मुक्त है। यहाँ वे पूरी बात एक गूँजती पंक्ति में समेट देते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 5 · या देवी हिम्नदेवी माहात्म्य · अध्याय 5, या देवी स्तुति · श्लोक 30 · मार्कण्डेय पुराण

कहाँ से: श्लोक 30 से 33 वाले समूह की पहली पंक्ति, संस्कृत 'या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता', का भाव; अध्याय 5 · या देवी हिम्न के अनुसार यह स्तुति मार्कण्डेय पुराण का अध्याय पचासी है, और श्लोक संख्या उसी पुराण के अनुसार रखी गई है।

प्रसंग: या देवी स्तुति में देव हर प्राणी के भीतर देवी को पाते हैं, एक-एक गुण के रूप में।

पूरा पन्ना पढ़िए

भरत और जड़भरत की कथाविष्णुपुराण · गीता प्रेस, गोरखपुर

कहाँ से: सौवीर-नरेश इक्षुमती के तट पर कपिल मुनि से मनुष्य का सच्चा श्रेय पूछने जा रहे थे, जब जड़भरत ने उन्हें यह उपमा दी; प्रसंग भरत और जड़भरत की कथा के खण्ड 'शिबिका का रहस्य' में है, और कथा गीता प्रेस, गोरखपुर के विष्णुपुराण पर आधारित है।

प्रसंग: राजा की पालकी ढोने में लगाए गए जड़भरत उसी राजा को परमार्थ का उपदेश देने लगते हैं। अनेक देहों में एक ही आत्मा को वे बाँसुरी की इसी उपमा से समझाते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

राजा जनक: सिद्धगीत से स्थिर प्रज्ञा तकयोग वासिष्ठ · राजा जनक

कहाँ से: खण्ड 'ऊँचे महल में अकेला राजा' में जनक अपने आप से यह कहते हैं, यह पूछने के कुछ ही आगे कि वह कौन जादूगर है जिसने ऐसा जादू किया कि जादू दिखता ही नहीं; राजा जनक: सिद्धगीत से स्थिर प्रज्ञा तक की यह कथा वसिष्ठ राम को सुनाते हैं।

प्रसंग: वसन्त के उपवन में सिद्धों के आत्मा पर गाए गीत सुनकर विदेह के राजा जनक महल की सबसे ऊँची अटारी पर अकेले बैठते हैं और यह प्रश्न अपने ही ऊपर मोड़ देते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 12: भक्ति योगभगवद् गीता · 12.15

कहाँ से: अध्याय 12: भक्ति योग के 'श्लोक-दर-श्लोक' खण्ड में 12.15 का सीधा अर्थ है, मूल 'यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः' के साथ; अगला श्लोक 'अनपेक्षः शुचिर्दक्ष' से खुलता है, और वहाँ भी अन्त 'स मे प्रियः' पर होता है।

प्रसंग: भक्ति के अध्याय में कृष्ण उस भक्त की पहचान गिनाते हैं जो उन्हें प्रिय है। यह पहचान उस शान्ति की है जो ऐसा इंसान अपने आस-पास रखता है।

पूरा पन्ना पढ़िए

आनंद साहिबगुरु अमरदास · आनंद साहिब, पउड़ी 12 · गुरु ग्रंथ साहिब, राग रामकली · हिन्दी भाव

कहाँ से: पउड़ी 12 का भाव, जहाँ आनंद साहिब के अनुसार स्वर फिर अरज़ बन जाता है, एक विनम्रता के साथ, कि अपने असली स्वरूप को बस प्रभु स्वयं जानते हैं; यह बानी गुरु ग्रंथ साहिब के अंग 917 से 922 पर, राग रामकली में है।

प्रसंग: गुरु अमरदास उस प्रभु से अरज़ करते हैं जिसका अंत किसी ने नहीं पाया, और उसे हर बोलने और देखने वाले में पाते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 8 · राम का वन-गमन, नगर का विलाप, गुह, चित्रकूटवाल्मीकि रामायण · अयोध्याकाण्ड, सर्ग 14 से 39 · गीता प्रेस

कहाँ से: आँसुओं की अशुद्धि मिटाने को शुद्ध जल का आचमन करके कौसल्या राम पर यह आशीष रखती हैं, अध्याय 8 · राम का वन-गमन, नगर का विलाप, गुह, चित्रकूट के खण्ड 'माता का स्वस्त्ययन और आशीर्वाद' में; आधार गीता प्रेस, गोरखपुर की वाल्मीकि रामायण है।

प्रसंग: रानी कौसल्या अपने पुत्र राम को वनवास जाने से रोक नहीं पातीं। वे माँ का आशीर्वाद देकर उन्हें विदा करती हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

पुण्य और पावन: शोक से आत्मबोध तकयोग वासिष्ठ · पुण्य और पावन

कहाँ से: वसिष्ठ राम से यह कहते हैं, पुण्य और पावन: शोक से आत्मबोध तक के खण्ड 'पावन का बोध और दोनों भाइयों की गति' में; मूल पाठ में यह हिस्सा उपशम 5.21 के आरम्भ में आता है, और तथ्य विहारीलाल मित्र के अनुवाद के अनुसार रखे गए हैं।

प्रसंग: वसिष्ठ दो भाइयों की कथा पूरी करते हैं, जिनमें छोटे भाई के शोक को बड़े भाई ने आत्मबोध तक पहुँचाया। फिर वे श्रीराम के लिए उसका सार कहते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

अवधूत के चौबीस गुरुभागवतम् · स्कन्ध 11, अध्याय 7 से 9

कहाँ से: नौवें गुरु अजगर के बाद और ग्यारहवें पतंगे से पहले अवधूत राजा यदु से यह कहते हैं; अवधूत के चौबीस गुरु में शुकदेव यह प्रसंग परीक्षित् के आगे स्कन्ध 11, अध्याय 7 से 9 के अनुसार रखते हैं।

प्रसंग: अवधूत के चौबीस गुरुओं में दसवाँ गुरु समुद्र है, जो नदियाँ उमड़ें तो उफनता नहीं और सूख जाएँ तो घटता नहीं।

पूरा पन्ना पढ़िए

विष्णु सहस्रनामविष्णु सहस्रनाम · फलश्रुति (उत्तरपीठिका)

कहाँ से: उत्तरपीठिका के श्लोक 11 से 13 का भाव, विष्णु सहस्रनाम के खण्ड 'फलश्रुति एवं उत्तर-पीठिका' से, जहाँ भीष्म स्वयं पाठ का फल बताते हैं; स्तोत्र महाभारत के अनुशासन-पर्व के एक सौ उनचासवें अध्याय का अंश है।

प्रसंग: हज़ार नामों के बाद विष्णु सहस्रनाम के समापन-श्लोक बताते हैं कि पाठ करने वाले के भीतर क्या ठहरता है।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 18 · भाग 4 · धृतराष्ट्र की रात और विदुर की नीतिमहाभारत · उद्योग पर्व, विदुर-नीति · गांगुली खण्ड 1 से 71

कहाँ से: विदुर धृतराष्ट्र से यह कहते हैं, अध्याय 18 · भाग 4 · धृतराष्ट्र की रात और विदुर की नीति के खण्ड 'कर्म ही साथ जाएँगे: विदुर की अन्तिम विनती' में, और फिर जीवन को दूसरी नदी बताते हैं जिसमें कामना और क्रोध मगर हैं; क्रम गांगुली के खण्ड 1 से 71 का है।

प्रसंग: युद्ध से पहले की एक बेचैन रात में विदुर अन्धे राजा धृतराष्ट्र को समझा रहे हैं। अपने लम्बे उपदेश के अन्त के पास वे आत्मा को एक ऐसी नदी के रूप में दिखाते हैं जिसमें मनुष्य स्नान कर सकता है।

पूरा पन्ना पढ़िए

ईश उपनिषद्: ओढ़ा हुआ जगत, और अन्तिम प्रार्थनाईश उपनिषद् · मन्त्र 7

कहाँ से: सातवें मन्त्र 'तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः' का अर्थ, ईश उपनिषद्: ओढ़ा हुआ जगत, और अन्तिम प्रार्थना के खण्ड 'सब भूतों में अपने को देखना (मन्त्र 6 से 8)' में; व्याख्या आगे कहती है कि मोह और शोक एक ही जड़ से उगते हैं।

प्रसंग: ईश उपनिषद् अभी सब भूतों में अपने को और अपने में सब भूतों को देखने की बात कर चुका है। यहाँ वह बताता है कि यह देखना क्या मिटा देता है।

पूरा पन्ना पढ़िए

भज गोविन्दम् · Bhaja Govindamभज गोविन्दम् · श्लोक 19

कहाँ से: भज गोविन्दम् · Bhaja Govindam में श्लोक 19 'योगरतो वा भोगरतो वा' का भाव है, जो 'श्लोक 19-20 · भीतर का रुख़, गीता का स्पर्श' वाले खण्ड की ओर ले जाता है; देवनागरी मूल पाठ वैदिक विज्ञानम् से लिया गया है।

प्रसंग: शंकर के शिष्यों के जोड़े श्लोकों में यह रचना का सबसे समावेशी स्वर है, जहाँ बाहरी परिस्थिति का कोई मोल नहीं रह जाता।

पूरा पन्ना पढ़िए

जपजी साहिब के बारह चुने हुए पाठगुरु नानक · जपजी साहिब, पउड़ी 1 · गुरु ग्रंथ साहिब, अंग 1 · हिन्दी भाव

कहाँ से: पहली पउड़ी की आख़िरी दो पंक्तियों, 'किव सचिआरा होईऐ किव कूड़ै तुटै पालि' से 'नानक लिखिआ नालि' तक, का भाव; जपजी साहिब के बारह चुने हुए पाठ में यह दूसरा पड़ाव है, '2 · पउड़ी 1 · जो रास्ते पार नहीं लगाते'।

प्रसंग: गुरु नानक अभी उन तरीक़ों को गिना चुके हैं जिनसे शुद्धि नहीं मिलती: बेहिसाब सोच, ज़बरदस्ती की चुप्पी, जमाख़ोरी और चतुराई।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 34 · राम का स्वधाम-गमनवाल्मीकि रामायण · उत्तरकाण्ड, सर्ग 98 से 111 · गीता प्रेस

कहाँ से: हनुमान राम को यह उत्तर देते हैं, अध्याय 34 · राम का स्वधाम-गमन के खण्ड 'विभीषण, हनुमान और जाम्बवान को पृथ्वी पर रहने का आदेश' में; फिर राम पाँचों को कलि के आने तक जीवित रहने की आज्ञा देते हैं। रामायण इसी अध्याय पर पूरी होती है।

प्रसंग: जब राम संसार से विदा होने की तैयारी करते हैं, तब वे हनुमान से धरती पर ठहरने को कहते हैं। हनुमान हर्ष से यह भार स्वीकार करते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

मंकि: मरुभूमि से परमसमाधि तकयोग वासिष्ठ · मंकि

कहाँ से: अपना परिचय देकर कि वे राजर्षि अज के किसी काम से उस रास्ते जा रहे थे, वसिष्ठ मंकि से यह कहते हैं; प्रसंग मंकि: मरुभूमि से परमसमाधि तक के खण्ड 'मंकि जिससे बच न सका' में है, और कथा वे स्वयं राम को सुनाते हैं।

प्रसंग: तपती मरुभूमि में वसिष्ठ की भेंट मंकि से होती है, जो शान्ति की लम्बी खोज में थक चुके हैं। वसिष्ठ उस थके हुए साधक से कहते हैं कि वे अपने अज्ञान पर हताश न हों, और फिर यह वचन कहते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 6: ध्यान योगभगवद् गीता · 6.40

कहाँ से: अध्याय 6: ध्यान योग के 'श्लोक-दर-श्लोक' खण्ड में 6.40 की दूसरी पंक्ति 'न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति' का अर्थ है; पदच्छेद में 'तात' का अर्थ 'हे प्यारे' दिया गया है।

प्रसंग: अर्जुन पूछते हैं कि जो साधक मंज़िल से पहले चूक जाए, उसका क्या होता है। कृष्ण स्नेह से, उन्हें प्यारे कहकर, यह उत्तर देते हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

ललिता सहस्रनाम, खण्ड 3ललिता सहस्रनाम · खण्ड 3, नाम 166 से 171

कहाँ से: नाम 166 से 171, निष्पापा से लोभनाशिनी तक, का भाव ललिता सहस्रनाम, खण्ड 3 से; नामों का अर्थ भास्करराय के सौभाग्य-भास्कर भाष्य के अनुसार है, और स्रोत ब्रह्माण्ड-पुराण के उत्तर-खण्ड का ललितोपाख्यान है।

प्रसंग: जगन्माता के इन नामों में जिस दोष से वे मुक्त हैं, वही मुक्ति वे अपने उपासक को दे देती हैं।

पूरा पन्ना पढ़िए

अध्याय 35 · भीष्म: मोक्ष-धर्म व आपद्-धर्ममहाभारत · शान्ति पर्व, अध्याय 129 से 353 · गीता प्रेस

कहाँ से: मेधावी अपने पिता से यह कहता है, अध्याय 35 · भीष्म: मोक्ष-धर्म व आपद्-धर्म के खण्ड 'पिता-पुत्र संवाद: मृत्यु का पीछा और सत्य से अमरत्व' में; इसके बाद भीष्म युधिष्ठिर से उसी पिता की भाँति आचरण करने को कहते हैं, और पुनर्कथन गीता प्रेस के पाठ पर चलता है।

प्रसंग: शर-शय्या से भीष्म युधिष्ठिर को मेधावी नाम के एक युवक की कथा सुनाते हैं, जो अपने विद्वान् पिता से परम कल्याण की खोज में देर न करने का आग्रह करता है। पुत्र अपना उपदेश इसी वचन से पूरा करता है।

पूरा पन्ना पढ़िए

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 2: आश्चर्यअष्टावक्र गीता · प्रकरण 2.4

कहाँ से: जनक की उपमाओं की लड़ी इसी चौथे श्लोक से खुलती है; अष्टावक्र गीता · प्रकरण 2: आश्चर्य में आगे कपड़े में धागे और गन्ने के रस में शक्कर की उपमाएँ आती हैं, और मूल श्लोक 'श्लोक 4 · 5 · 6' वाले खण्ड में दिए गए हैं।

प्रसंग: अष्टावक्र का पहला उपदेश सुनकर राजा जनक विस्मय से भर उठते हैं। वे एक ऐसा चित्र उठाते हैं जिसे कोई भी पानी के किनारे खड़ा होकर देख सकता है।

पूरा पन्ना पढ़िए

श्लोक-मानचित्र और चुने हुए पाठ

भगवद्गीता का दूसरा अध्यायचुने हुए श्लोकों के साथ व्याख्या · गीता 2.1 से 72

आधार-संस्करण: गीताप्रेस महाभारत। अंग्रेज़ी अध्याय-व्याख्या में खण्डों का श्लोक-मानचित्र है। चार संस्कृत खण्डों में पाँच श्लोक हैं: 2.20, 2.22, 2.47 और 2.62 से 63। पूरे 72 श्लोक वहाँ नहीं दिए गए हैं। हिन्दी अध्याय अपने स्वतंत्र पाठ के रूप में उपलब्ध है।

तुलना: बीबीटी का स्वतंत्र पाठ और अनुवाद। पहले कथन के लिए 1.25, शिष्य होने की प्रार्थना के लिए 2.7, मौन के लिए 2.9 और आगे के प्रश्न के लिए 2.54 देखा गया है। व्याख्याओं के दार्शनिक मतों को एक नहीं माना गया है।

काम और उसके फल पर चिंतन · आधार की पहली चार बैठकें

चुने हुए प्रसंगों की जाँच: 11 सितम्बर 2026।

ईशावास्य: विषयों के अनुसार व्याख्याईशावास्य पन्ने का अपना आधार और 18 मन्त्रों का नक़्शा

इस पन्ने का मुख्य आधार: स्वामी कृष्णानन्द की व्याख्या। ऊपर पूरे उपनिषद्-संग्रह के लिए दी गई संदर्भ-सूची से इस विशेष पन्ने का आधार अलग पहचानिए। हिन्दी पाठ और अंग्रेज़ी पाठ में छह विषयगत खण्डों के मूल प्रसंग अब दिए गए हैं।

तुलना: श्री अरविन्द की प्रकाशित ईश उपनिषद्, प्रथम भाग, पाठ और अनुवाद, पृष्ठ 5 से 10। खण्डों के विषय क्रमशः 1;2;9 से 11;4 से 5;15 से 18; और 1,6 से 7 से उठते हैं। मन्त्र 3,8 और 12 से 14 के लिए इन पन्नों में अलग खण्ड नहीं है; पूरे स्रोत का रास्ता साथ दिया गया है। यह मन्त्र का पता है, दोनों भाष्यों के हर अर्थ में सहमति का दावा नहीं।

मन्त्र-मानचित्र की जाँच: 11 सितम्बर 2026।