बृहदारण्यक उपनिषद्, अध्याय 1

बृहदारण्यक उपनिषद् · अध्याय एक

मधु-काण्ड का प्रारम्भ

छह ब्राह्मण। “अहं ब्रह्मास्मि” का घर।

बृहदारण्यक का पहला अध्याय छह ब्राह्मणों में बँटा है, और हर एक का अपना ज़ोर है। पहले ब्राह्मण में अश्व-मेध-यज्ञ की cosmological-व्याख्या है, जहाँ यज्ञ-घोड़े के अंग-अंग को सूर्य, चन्द्र, दिन-रात, और दिशाओं के साथ बैठाया गया है। यह वैदिक-symbolism की उच्चतम-शैली है।

दूसरा ब्राह्मण एक चौंकाने वाली सृष्टि-कथा है, “नैव इह किञ्चन अग्र आसीत्, मृत्युना एव इदम् आवृतम् आसीत्” (शुरू में यहाँ कुछ नहीं था, मृत्यु से ही यह सब ढका था)। मृत्यु ने भोजन की इच्छा से सृष्टि की। यह वाक्य अद्भुत है क्योंकि अधिकांश सृष्टि-कथाएँ “सत्” (अस्तित्व) से शुरू होती हैं, यहाँ “मृत्यु” से।

तीसरा ब्राह्मण देव-असुर-युद्ध की कथा है। पाँच इन्द्रियाँ बारी-बारी प्राण को “उद्गीथ” के रूप में गातीं, हर बार असुर उन्हें हराते। अन्त में मुख्य-प्राण गाता है, और असुर पराजित होते हैं। इसी ब्राह्मण के अन्तिम मन्त्रों में दुनिया की सबसे-recited प्रार्थनाएँ हैं, “असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतम् गमय।”

चौथे ब्राह्मण में “अहं ब्रह्मास्मि” का प्रथम-प्रत्यक्ष-कथन है, “ब्रह्म वा इदम् अग्र आसीत्, तद् आत्मानम् एव अवेद अहं ब्रह्मास्मि इति।” यजुर्वेद का महावाक्य, यहाँ पहली बार। यह पंक्ति इतनी सघन है कि शंकराचार्य की टीका इस एक मन्त्र पर पन्द्रह पन्ने की है।

Key passages

1.3.28पवमान-मन्त्र (असतो मा सद्गमय)
असतो मा सद् गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्माऽमृतं गमय । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
asato mā sad gamaya । tamaso mā jyotirgamaya । mṛtyormā’mṛtaṃ gamaya । oṃ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ ॥

अर्थ: असत् (अस्तित्व-हीनता, झूठ) से सत् की ओर ले चलो। तम (अंधकार, अज्ञान) से ज्योति की ओर ले चलो। मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो। ॐ शान्ति-शान्ति-शान्ति।

संगति: विश्व-famous prayer। तीन-pair: असत्-सत्, तम-ज्योति, मृत्यु-अमृत। यह सब-spiritual-paths का universal-दावा। आज भी हर meditation-class का opening यह है।
1.4.10अहं ब्रह्मास्मि (महावाक्य!)
ब्रह्म वा इदमग्र आसीत् तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मीति । तस्मात्तत्सर्वमभवत् । तद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत् । तथर्षीणां तथा मनुष्याणाम् । तद्धैतत्पश्यन्नृषिर्वामदेवः प्रतिपेदे अहं मनुरभवं सूर्यश्चेति । तदिदमप्येतर्हि य एवं वेद अहं ब्रह्मास्मीति स इदं सर्वं भवति ॥
brahma vā idamagra āsīt tadātmānamevāvedahaṃ brahmāsmīti । tasmāttatsarvamabhavat । tadyo yo devānāṃ pratyabudhyata sa eva tadabhavat । tatharṣīṇāṃ tathā manuṣyāṇām । taddhaitatpaśyannṛṣirvāmadevaḥ pratipede ahaṃ manurabhavaṃ sūryaśceti । tadidamapyetarhi ya evaṃ veda ahaṃ brahmāsmīti sa idaṃ sarvaṃ bhavati ॥

अर्थ: ब्रह्म ही यह शुरू में था। उसने अपने को ही जाना, ‘मैं ब्रह्म हूँ’। इसलिए वो सब-कुछ बना। देवताओं में से जो भी जाग्रत हुआ, वो ही बना। ऋषियों में से, मनुष्यों में से, उसी-तरह। यह देख कर ऋषि वामदेव-ने भी पहचाना, ‘मैं मनु बना, मैं सूर्य बना’। यहाँ-भी जो अभी जान लेता है ‘अहं ब्रह्म अस्मि’, वो सब-कुछ बन जाता है।

संगति: चार महावाक्यों में से एक: ‘अहं ब्रह्मास्मि’ (मैं ब्रह्म हूँ)। बृहदारण्यक की सबसे-celebrated पंक्ति। यह यजुर्वेद का महावाक्य।

संगति

पहला अध्याय बृहदारण्यक का foundation है। यहाँ चार-पाँच मूल-तत्त्व रखे जाते हैं जो बाद के अध्यायों में विस्तार पाते हैं। मृत्यु से सृष्टि का aspect विशेष-अनूठा है, और बाद के अद्वैत-साहित्य में इसकी कई परतें खुली हैं।

“अहं ब्रह्मास्मि” का context याद रखना उपयोगी है। यह कोई व्यक्ति-केन्द्रित-घोषणा नहीं है, यह एक ऋषि का अपनी-realisation का स्व-वर्णन है। बाद की वेदान्त-परम्परा में, इस वाक्य को “श्रवण” का परिणाम बताया गया है, यानी सुनने का। शिष्य गुरु से इसे सुनता है, अपने में बैठाता है, और एक दिन इसे अपनी ही पंक्ति के रूप में बोल सकता है।

पाँचवें-छठे ब्राह्मण में मन, वाणी, और प्राण के बीच की त्रिपुटी रखी जाती है, जो आगे के अध्यायों में एक recurring-थीम है। यह anatomy of consciousness का सबसे प्राचीन सूत्रबद्ध-रूप है।

स्रोत: मूल देवनागरी sanskritdocuments.org के “bribasic.itx” से।

license: मूल text public-domain। हिन्दी टीका lulla.net, CC BY-NC 4.0।