लुल्ला परिवारLulla Family
English
उपनिषद्प्रश्न के भीतर का मौन

अध्याय 1: अश्वमेध, प्राणों की होड़ और अहं ब्रह्मास्मि

इस पृष्ठ पर
शुक्ल यजुर्वेद · बृहदारण्यक उपनिषद् · अध्याय 1
यज्ञ का घोड़ा जो सारा ब्रह्माण्ड है, भूख जो मृत्यु है, प्राणों की होड़, और सृष्टि के आरम्भ में गूँजा पहला शब्द, मैं हूँ।

भोर की पहली किरण फूट रही है। किसी यज्ञशाला के बाहर एक घोड़ा बँधा है, अभिषिक्त, सजा हुआ, और उसके पास खड़ा ऋषि उसे देखते हुए कहता है कि इस घोड़े का सिर उषा है, आँख सूरज है, साँस हवा है, और उसका खुला हुआ मुँह वह आग है जो सारे संसार को पचाती है। यह घोड़ा अब घोड़ा नहीं रहा। उसकी पीठ आकाश हो गई, पेट अन्तरिक्ष, पसलियाँ दिशाएँ, हड्डियाँ नक्षत्र। जब वह जँभाई लेता है तो बिजली चमकती है, जब देह झटकता है तो बादल गरजते हैं, और जब वह मूतता है तो बरसात होती है। बृहदारण्यक उपनिषद् इसी दृश्य से खुलता है, और पहले ही वाक्य में हमें बता देता है कि यहाँ कोई भी चीज़ केवल वही नहीं है जो दिखती है।

यह पहला अध्याय पूरे उपनिषद् की देहरी है। यह शतपथ ब्राह्मण के आख़िरी काण्ड से निकला है, इसलिए इसकी बोली में अभी यज्ञ की धूल लगी है, घोड़ा है, सोम है, उद्गाता है, हवन है। पर हर यज्ञ-प्रसंग को यह उपनिषद् धीरे से भीतर की ओर मोड़ देता है। छह ब्राह्मणों (खण्डों) में यह तीन काम करता है। पहले वह दिखाता है कि बाहर का समूचा जगत् एक ही देह है। फिर वह पूछता है कि इस देह में सबसे ज़रूरी कौन है, और उत्तर पाता है, प्राण। और तब वह सबसे बड़ी बात कहता है, कि आरम्भ में जो अकेला था, उसने अपने को जाना और कहा, मैं हूँ। यह अध्याय हमसे बस इतना चाहता है कि हम अपने “मैं” को थोड़ा ग़ौर से देखें।

इस अध्याय के मुख्य किरदार

मेध्य अश्व: अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा, जिसके अंग-अंग में उषा, सूर्य, आकाश और ऋतुएँ बसाई गई हैं; बाहर के जगत् को एक देह की तरह देखने का पहला पाठ।

मृत्यु, यानी अशनाया: भूख के रूप में खड़ी वह आदि शक्ति जिसने सृष्टि से पहले सब कुछ ढँक रखा था, और जिसकी तपन से जल, पृथ्वी और अग्नि निकले।

देवता और असुर: प्रजापति की दो सन्तानें, जो यज्ञ के मैदान में उद्गीथ (सामवेद का ऊँचा गान) के सहारे एक दूसरे को हराने निकलीं।

मुख्य प्राण, अयास्य आङ्गिरस: मुँह के भीतर बसी वह साँस जिसे असुर बेध न सके, और जिसे बाद में बृहस्पति, ब्रह्मणस्पति, साम और उद्गीथ कहकर पुकारा गया।

पुरुषविध आत्मा: आरम्भ का वह अकेला, जिसने चारों ओर देखा, अपने सिवा कुछ न पाया, डरा, ऊबा, और अपने ही दो टुकड़े कर संसार रच डाला।

याज्ञवल्क्य और ऋषि वामदेव: इस अध्याय में दो नाम एक-एक पंक्ति के लिए आते हैं; एक “आधे टुकड़े” की उपमा देता है, दूसरा कह उठता है, मैं मनु हुआ, मैं सूर्य हुआ।

पिता और पुत्र: पाँचवें ब्राह्मण का वह घर, जहाँ मरणासन्न पिता अपना सब कुछ तीन शब्दों में बेटे को सौंपता है।

यज्ञ का घोड़ा, जिसकी देह में सारा जगत् है

अश्वमेध उस युग का सबसे बड़ा यज्ञ था। राजा एक घोड़ा छोड़ता, वह बरस भर धरती नापता, और लौटने पर उसका बलिदान होता। पूरा राज्य, पूरा साल, सैकड़ों पुरोहित, इस एक यज्ञ में लगते थे। बृहदारण्यक उपनिषद् उसी यज्ञ के घोड़े को सामने रखता है और कहता है कि इसे ठीक से देखिए। “उषा वा अश्वस्य मेध्यस्य शिरः”, यज्ञ के योग्य इस घोड़े का सिर उषा है। सूर्य उसकी आँख, वायु उसका प्राण, वैश्वानर अग्नि उसका खुला मुँह, और संवत्सर, पूरा वर्ष, उसकी देह है। आकाश पीठ, अन्तरिक्ष उदर, पृथ्वी वह ज़मीन जिस पर उसके खुर टिकते हैं। दिशाएँ उसके पार्श्व, कोने की दिशाएँ उसकी पसलियाँ, ऋतुएँ उसके अंग, महीने और पखवाड़े उसके जोड़, दिन और रात उसके पैर, नक्षत्र उसकी हड्डियाँ, बादल उसका माँस।

उपनिषद् यहाँ रुकता नहीं। उसके पेट में जो अधपचा भोजन है, वह रेत है। नदियाँ उसकी आँतें हैं, पहाड़ उसका कलेजा और फेफड़े, पेड़-पौधे उसके रोम। उगता हुआ सूरज उसका अगला आधा हिस्सा है और डूबता हुआ सूरज पिछला। जब वह जँभाई लेता है, बिजली चमकती है। जब देह झटकता है, बादल गरजते हैं। जब वह मूतता है, वर्षा होती है। और उसकी आवाज़ ही वाणी है। यह किसी कवि की उड़ान नहीं, यह एक साधना का नक़्शा है। जो यजमान बरस भर इस घोड़े को इस तरह देखता रहे, वह बलि के दिन तक जान चुका होता है कि वह किसी जानवर को नहीं, पूरे संसार को अग्नि में अर्पित कर रहा है, और वह संसार उसकी अपनी देह से अलग नहीं।

दूसरे मन्त्र में उपनिषद् घोड़े के आगे-पीछे दो पात्र रख देता है। सामने दिन है, जो पूर्व के समुद्र से उपजा, और पीछे रात है, जो पश्चिम के समुद्र से। यज्ञ में घोड़े के आगे-पीछे जो सोने और चाँदी के पात्र रखे जाते थे, उनकी जगह यहाँ दिन और रात ने ले ली है। यही घोड़ा हय बनकर देवताओं को ढोता है, वाजी बनकर गन्धर्वों को, अर्वा बनकर असुरों को और अश्व बनकर मनुष्यों को। एक ही प्राणी, जो हर लोक में अलग नाम से पुकारा जाता है। और उसका बन्धु, उसका उद्गम, समुद्र है, यानी वह अनन्त जल जहाँ से सब निकला। घोड़ा दौड़ता है, पर उसकी जड़ वहीं रहती है जहाँ से वह आया।

एक सवाल यहाँ स्वाभाविक है। उपनिषद् आत्मा की बात करने आया है, फिर घोड़े से क्यों शुरू करता है? इसलिए कि जो मन बरसों से यज्ञ को बाहर की क्रिया मानता आया है, उसे अचानक भीतर नहीं मोड़ा जा सकता। पहले उसे यह देखना पड़ता है कि सूरज और आँख, हवा और साँस, बादल और माँस अलग चीज़ें नहीं। जो इतना देख ले, उसके लिए अगला क़दम आसान हो जाता है, कि इस विराट देह के भीतर बसने वाला कौन है। घोड़े की यह मूर्ति पूरे उपनिषद् की पहली सीढ़ी है।

सार: पहला ब्राह्मण अश्वमेध के घोड़े को पूरा ब्रह्माण्ड बना देता है, उषा उसका सिर, सूर्य उसकी आँख, नक्षत्र उसकी हड्डियाँ। यह उपमा नहीं, एक दृष्टि का अभ्यास है, कि बाहर जो कुछ है, वह एक ही जीवित देह है। इसी दृष्टि से यह उपनिषद् आगे भीतर की यात्रा शुरू करता है।

भूख जो मृत्यु है, और उससे निकली हुई दुनिया

दूसरा ब्राह्मण उसी घोड़े के पीछे का पर्दा उठा देता है, और जो दृश्य खुलता है वह किसी भी सजी हुई सृष्टि-कथा से बहुत दूर है। “नैवेह किं चनाग्र आसीत्”, आरम्भ में यहाँ कुछ भी न था। न आकाश, न धरती, न दिन, न कोई देखने वाली आँख। और फिर वह पंक्ति आती है जिस पर यह पूरा अध्याय टिका है, कि यह सब मृत्यु से ढँका हुआ था, और वह मृत्यु भूख के रूप में थी। उपनिषद् अगली ही साँस में गाँठ खोल देता है, “अशनाया हि मृत्युः”, भूख ही तो मृत्यु है। जहाँ कुछ पाने की चाह है, वहीं घटने का नियम बैठा है। शून्य नहीं था वहाँ, एक अतृप्ति थी, और उसी अतृप्ति से सब कुछ निकलना था।

उस भूख ने मन रचा, और मन ने पहली इच्छा की, कि मैं देहवाला हो जाऊँ, मुझे एक आत्मा मिले। फिर वह अर्चना करता हुआ चला, और अर्चना करते-करते जल उत्पन्न हुआ। यहाँ उपनिषद् एक सुन्दर बात कहता है। पूजा करते हुए उसे जो सुख हुआ, उसी सुख के नाम पर उस अग्नि का नाम “अर्क” पड़ा, क्योंकि अर्चना में “क”, यानी सुख, मिला। जो इस अर्क के अर्कत्व को जान ले, उसे भी वैसा ही सुख मिलता है। जल में जो सार ऊपर जमा, वह जमकर पृथ्वी बना। उस पृथ्वी पर वह श्रम करता रहा, तपता रहा, और उस श्रान्त और तप्त देह से तेज का रस निकला, वही अग्नि हुआ।

फिर उसने अपने को तीन भागों में बाँटा, अग्नि, आदित्य और वायु। वही एक प्राण तीन जगह बँटकर बैठ गया, और यहीं उपनिषद् फिर घोड़े की मूर्ति लौटा लाता है। पूर्व दिशा उसका सिर है, कोने की दिशाएँ अगली बाँहें, पश्चिम पूँछ, दक्षिण और उत्तर उसके पार्श्व, आकाश पीठ, अन्तरिक्ष पेट और यह धरती उसका वक्ष। वह जल में प्रतिष्ठित है, और जो ऐसा जानता है वह जहाँ भी जाए, वहीं जमकर बैठ जाता है। पहले ब्राह्मण में जो घोड़ा बाहर बँधा था, वही अब सृष्टि की हड्डियों में बुन दिया गया है।

अब वह अकेला फिर कामना करता है, कि मेरा दूसरा आत्मा जन्मे। मन से उसने वाणी का मिथुन किया, और जो बीज बना, वही संवत्सर हो गया। उपनिषद् यहाँ एक चौंकाने वाली बात कहता है, कि इससे पहले संवत्सर था ही नहीं। समय स्वयं इसी जोड़ से पैदा हुआ। उसने उसे उतने ही काल तक धारण किया जितना एक वर्ष होता है, और फिर छोड़ दिया। जन्मते ही उसने उसे खाने को मुँह फाड़ा, और वह शिशु घबराकर बोल उठा, और वही बोल वाणी बन गई। सृष्टि की पहली आवाज़ मृत्यु के खुले मुँह के सामने निकली हुई एक पुकार है।

फिर उसने सोचा कि यदि मैं इसे अभी खा गया तो आगे के लिए अन्न कम पड़ जाएगा। इसलिए उसी वाणी और उसी देह से उसने यह सब रचा, ऋचाएँ, यजुष्, साम, छन्द, यज्ञ, प्रजा और पशु। और जो-जो रचा, उसी को खाने लगा। उपनिषद् मुस्कराकर एक नाम खोल देता है, कि जो सब कुछ खा जाती है, इसीलिए वह अदिति है, और अदिति का अदितित्व यही है। जो इसे इस तरह जान ले, वह सबका भोक्ता हो जाता है और सब कुछ उसका अन्न हो जाता है। भूख से बनी दुनिया में खाना और खाया जाना एक ही सिक्के के दो रुख़ हैं।

उसकी कामना अब भी शान्त नहीं हुई, कि मैं और बड़े यज्ञ से यजन करूँ। उसने फिर श्रम किया, तप किया, और उस तपे हुए शरीर से यश और वीर्य निकल गया। उपनिषद् बता देता है कि वह यश और वीर्य प्राण ही थे। प्राण निकलते ही शरीर फूलने लगा, पर मन शरीर में ही रह गया। तब उसने चाहा कि यह देह मेरे लिए यज्ञ के योग्य हो जाए, और उससे अश्व बना। जो फूला, वही मेध्य हुआ, और उपनिषद् कहता है कि अश्वमेध का अश्वमेधत्व यही है। संवत्सर बीतने पर उसने उसे अपने लिए अर्पित किया और बाक़ी पशु देवताओं को सौंप दिए, इसीलिए आज भी प्रोक्षित पशु प्रजापति का माना जाता है।

अन्तिम मन्त्र में उपनिषद् एक ही झटके में यज्ञ को आकाश पर टाँग देता है। जो वहाँ तपता है, वह सूर्य ही अश्वमेध है, संवत्सर उसकी देह है, यह अग्नि अर्क है, और ये सब लोक उसके शरीर हैं। अर्क और अश्वमेध, दो दिखते हैं, पर देवता एक ही है, और वह मृत्यु है। जो इसे जानता है, वह बार-बार मरने से छूट जाता है, मृत्यु उसे पकड़ नहीं पाती, उलटे मृत्यु ही उसकी आत्मा हो जाती है, और वह अपनी पूरी आयु जीता है। जिस भूख से डरकर आदमी भागता है, उसी को पहचान लेने पर वह डर ख़त्म हो जाता है।

सार: दूसरा ब्राह्मण सृष्टि की जड़ में भूख बैठाता है और भूख को मृत्यु कह देता है। उसी भूख की अर्चना से जल, पृथ्वी, अग्नि, समय और वाणी निकलते हैं, और वही सब खाकर अदिति कहलाती है। जो इस अर्क और अश्वमेध को एक ही देवता जान ले, उसके लिए मृत्यु शत्रु नहीं रह जाती।

उद्गीथ की होड़, और वह साँस जिसे असुर न बेध सके

मुख के भीतर बसे मुख्य प्राण पर चारों ओर से टूटते असुर, जो पत्थर से टकराए ढेले की तरह चूर होकर बिखर रहे हैं
जिस पर असुर टूटे, वही अकेला अटूट निकला।

तीसरा ब्राह्मण एक कथा से खुलता है जो सुनने में पुरानी लड़ाई लगती है और निकलती हमारे ही भीतर की है। प्रजापति की दो तरह की सन्तानें थीं, देवता और असुर। देवता संख्या में कम थे और छोटे, असुर अधिक और बड़े। दोनों इन लोकों पर होड़ करने लगे, तब देवताओं ने कहा कि चलो, यज्ञ में उद्गीथ के सहारे असुरों को पार कर जाएँ। उद्गीथ सामगान का वह ऊँचा हिस्सा है जिसे उद्गाता गाता है, और उस युग में गान को हथियार की तरह बरता जाता था। पर इस कथा के देवता और असुर कोई बाहरी सेनाएँ नहीं, वे हमारी इन्द्रियों के दो रुख़ हैं।

देवताओं ने पहले वाणी से कहा कि हमारे लिए उद्गान कीजिए। वाणी ने स्वीकार किया और गाने लगी। पर उपनिषद् बहुत बारीक़ बात पकड़ता है। वाणी ने जो भोग बोलने में है वह तो देवताओं को गाकर दे दिया, और जो कल्याण-वचन है, वह अपने पास रख लिया। असुर ताड़ गए कि इसी उद्गाता के सहारे ये हमें पार कर जाएँगे। उन्होंने दौड़कर वाणी को पाप से बेध दिया। और वह पाप क्या है, उपनिषद् इशारे में बता देता है, कि जो अनुचित बोला जाता है, वही वह पाप है। जिस क्षण वाणी ने अपने लिए कुछ बचाया, उसी क्षण उसमें दरार पड़ गई।

फिर देवताओं ने घ्राण-प्राण से कहा, फिर आँख से, फिर कान से, फिर मन से। हर बार वही क्रम दोहराया गया। हर इन्द्रिय ने गाया, हर इन्द्रिय ने अपना सुख अपने पास रखा, और हर बार असुर उसे बेधकर चले गए। इसीलिए दुर्गन्ध भी है और सुगन्ध भी, कुरूप भी दिखता है और सुन्दर भी, अनुचित भी सुनाई पड़ता है और उचित भी, और मन में भी भला संकल्प उठता है और बुरा भी। उपनिषद् की दृष्टि में यह किसी बाहरी शत्रु का किया हुआ नहीं है, यह इन्द्रिय के भीतर की उस पकड़ का फल है जो हर अनुभव में से अपना हिस्सा काटकर रख लेती है।

तब देवताओं ने मुँह के भीतर बसे उस मुख्य प्राण से कहा कि अब हमारे लिए आप गाइए। उसने स्वीकार किया और गाने लगा। असुरों ने वही जाना जो पहले जाना था, और दौड़कर उसे भी बेधने चले। पर इस बार जो हुआ, उसे उपनिषद् एक ही उपमा में कह देता है, कि जैसे मिट्टी का ढेला पत्थर से टकराकर चूर-चूर हो जाता है, वैसे ही वे बिखरकर चारों दिशाओं में नष्ट हो गए। उसी क्षण देवता देवता हुए और असुर हार गए। जो भीतर की साँस है, उस पर बाहर का कोई दाग़ नहीं ठहरता, क्योंकि वह किसी अनुभव को अपना हिस्सा बनाकर नहीं रखती, वह केवल चलती रहती है।

देवताओं ने आपस में पूछा कि वह था कौन जिसने हमें इस तरह थाम लिया। उत्तर मिला कि वह यही है जो मुँह के भीतर बसा हुआ है। इसी से उसका नाम अयास्य आङ्गिरस पड़ा, क्योंकि वह अङ्गों का रस है। उपनिषद् कहता है कि इस देवता का एक नाम “दूर्” भी है, क्योंकि मृत्यु उससे दूर रहती है, और जो इसे जान ले, मृत्यु उससे भी दूर हो जाती है। फिर उसने इन देवताओं के पाप और मृत्यु को उठाकर वहाँ पहुँचा दिया जहाँ दिशाओं का अन्त है। इसीलिए कहा गया कि उस सीमा तक न जाइए, कहीं वह पाप साथ न लग जाए।

फिर वही प्राण उन देवताओं को एक-एक कर मृत्यु के पार ले गया, और यह पूरे अध्याय का सबसे सुन्दर दृश्य है। पहले वाणी को उतारा, और मृत्यु से छूटते ही वह अग्नि हो गई, जो आज मृत्यु के परे जल रही है। फिर घ्राण-प्राण को, जो वायु बनकर परे बह रहा है। फिर आँख को, जो आदित्य होकर तप रही है। फिर कान को, जो दिशाएँ बन गईं। फिर मन को, जो चन्द्रमा होकर चमक रहा है। जो इस देवता को ऐसा जान ले, उसे भी यह इसी तरह मृत्यु के पार उतार ले जाता है।

अन्त में उसने अपने लिए अन्न गाया, क्योंकि जो कुछ भी अन्न खाया जाता है, इसी के द्वारा खाया जाता है। देवता बोले कि जितना यह सब है, उतना ही अन्न है, और आपने उसे अपने लिए गा लिया; हमें भी इसमें भाग दीजिए। उसने कहा कि तो मेरे चारों ओर आकर बैठ जाइए। वे उसे घेरकर बैठ गए, इसीलिए जो अन्न यह प्राण खाता है, उसी से वे सब तृप्त हो जाते हैं। और जो मनुष्य यह जान लेता है, उसके अपने लोग उसी तरह उसे घेरकर बैठते हैं, वह उनका भरण करने वाला होता है, सबमें श्रेष्ठ, अन्न का स्वामी।

सार: वाणी, घ्राण, आँख, कान और मन, सब इसलिए बेधे गए कि हर एक ने अपने भोग का हिस्सा अपने पास रख लिया। मुख के भीतर बसा मुख्य प्राण अकेला अटूट निकला, और असुर उससे टकराकर ढेले की तरह बिखर गए। वही प्राण इन्द्रियों को मृत्यु के पार उतारता है और सबके लिए अन्न कमाता है।

प्राण के कई नाम, और वह प्रार्थना जो आज भी गाई जाती है

अब उपनिषद् उसी प्राण के नाम गिनाता है, और हर नाम एक नई पहचान खोल देता है। पहले वह दोहराता है कि वह अयास्य आङ्गिरस है, क्योंकि वह अङ्गों का रस है, और इसका प्रमाण देह ख़ुद देती है। जिस अङ्ग से प्राण निकल जाता है, वही अङ्ग सूख जाता है। हाथ हो या पैर, जब तक साँस उसमें बहती है तब तक वह गर्म और जीवित रहता है, और साँस के हटते ही वह लकड़ी हो जाता है। रस का अर्थ यहाँ स्वाद नहीं, वह गीलापन है जिससे कोई चीज़ जीवित कहलाती है।

फिर वही प्राण बृहस्पति कहलाता है, क्योंकि वाणी बृहती छन्द है और यह उसका पति है। वही ब्रह्मणस्पति भी है, क्योंकि वाणी ब्रह्म है और यह उसका स्वामी। और वही साम भी है, और यहाँ उपनिषद् दो तरह से नाम खोलता है। एक यह कि वाणी “सा” है और प्राण “अम” है, दोनों मिलकर साम हो जाते हैं। दूसरा यह कि साम का अर्थ समता है, और यह प्राण चींटी के बराबर है, मच्छर के बराबर, हाथी के बराबर, तीनों लोकों के बराबर। जिसमें छोटे और बड़े का भेद ही न रहे, वही सच्चा साम है।

वही उद्गीथ भी है। प्राण “उत्” है, क्योंकि प्राण से ही यह सब ऊपर थमा हुआ है, और वाणी “गीथा” है, दोनों मिलकर उद्गीथ। इसी सन्दर्भ में एक छोटा सा दरबारी दृश्य आता है। ब्रह्मदत्त चैकितानेय सोम पीते हुए बोल उठे कि यदि अयास्य आङ्गिरस ने वाणी और प्राण के सिवा किसी और से उद्गान किया हो, तो यह सोम राजा मेरा सिर उड़ा दे। इतने कठोर वचन से वे एक ही बात कहना चाहते थे, कि गान साँस और शब्द के मेल से ही होता है। इसीलिए उपनिषद् कहता है कि यज्ञ कराने वाला अपनी वाणी में स्वर चाहे, क्योंकि साम का अपना धन उसका स्वर ही है।

अँधेरे से प्रकाश की ओर उठता हुआ साधक, हाथ जोड़े, सामने फैलती भोर की रोशनी, असतो मा सद्गमय की प्रार्थना का दृश्य
असत् से सत् की ओर, अँधेरे से उजाले की ओर।

और अब वह जगह आती है जिसे आज दुनिया भर में लोग बिना जाने गाते हैं कि यह यहीं से आई है। उपनिषद् कहता है कि पवमान स्तोत्रों के समय प्रस्तोता जब साम का आरम्भ करे, तब यजमान चुपचाप ये पंक्तियाँ जपे, “असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मामृतं गमय”, मुझे असत् से सत् की ओर ले चलिए, अँधेरे से प्रकाश की ओर ले चलिए, मृत्यु से अमृत की ओर ले चलिए। तीन पंक्तियाँ, और तीनों में एक ही याचना, कि जो मैं हूँ उससे मुझे आगे ले जाइए।

उपनिषद् इन पंक्तियों को अपने ही ढंग से खोलता भी है। जब कोई कहता है कि मुझे असत् से सत् की ओर ले चलिए, तो असत् का अर्थ मृत्यु है और सत् का अमृत, इसलिए वह असल में यही कह रहा होता है कि मुझे अमर कीजिए। जब वह कहता है कि अँधेरे से उजाले की ओर ले चलिए, तब भी तम मृत्यु है और ज्योति अमृत। और तीसरी पंक्ति के बारे में उपनिषद् साफ़ कह देता है कि यहाँ कुछ छिपा हुआ नहीं है, वह जो माँगती है वही कहती है। बाक़ी स्तोत्रों में उद्गाता जो कामना हो वह माँग ले, क्योंकि यह साम लोकों को जीतने वाला है।

सार: वही मुख्य प्राण बृहस्पति है, ब्रह्मणस्पति है, साम है और उद्गीथ है, क्योंकि हर नाम वाणी और साँस के मेल से बनता है। चींटी से लेकर तीनों लोकों तक यह सबके बराबर है, इसीलिए इसे साम कहा गया। और इसी की उपासना के बीच वह तीन-पंक्ति की प्रार्थना रखी है जो असत्, अँधेरे और मृत्यु से पार ले जाने को कहती है।

आरम्भ में अकेला, और पहला शब्द, मैं हूँ

सृष्टि से पहले के सूने विस्तार में अकेला जागता हुआ विराट पुरुष, जिसकी आँखें अभी-अभी खुली हैं और चारों ओर कुछ भी नहीं है
जागते ही उसने जाना, और पहला शब्द निकला।

चौथा ब्राह्मण इस अध्याय का हृदय है, और वह एक अकेले की कहानी से खुलता है। “आत्मैवेदमग्र आसीत्पुरुषविधः”, आरम्भ में यह सब आत्मा ही था, और वह पुरुष के आकार का था। उसने चारों ओर देखा और अपने सिवा कुछ न पाया। तब उसने पहली बार कहा, “सोऽहमस्मि”, वह मैं हूँ। और उसी क्षण से “अहम्”, यानी मैं, एक नाम हो गया। उपनिषद् इसका सबूत हमारी रोज़ की आदत में दिखाता है। आज भी कोई पुकारे तो पहले उत्तर जाता है, मैं हूँ, और उसके बाद अपना नाम बताया जाता है। सबसे पहले “मैं” आता है, नाम बाद में आता है, और यह क्रम सृष्टि जितना पुराना है।

फिर वह अकेला डरा। उपनिषद् इसी से एक सीधी बात निकाल लेता है, कि अकेला आदमी इसीलिए डरता है। पर उस पहले ने डरकर छोड़ नहीं दिया, उसने विचार किया कि जब मुझसे अलग कुछ है ही नहीं, तब मैं किससे डरूँ। इतना सोचते ही उसका भय चला गया। “द्वितीयाद्वै भयं भवति”, भय तो दूसरे से होता है, और जहाँ दूसरा ही नहीं, वहाँ भय टिकेगा कहाँ। यह वाक्य इस उपनिषद् की सबसे व्यावहारिक पंक्तियों में से है, क्योंकि हमारा हर डर किसी दूसरे की कल्पना पर खड़ा होता है।

पर भय जाने के बाद भी वह प्रसन्न नहीं हुआ। अकेले में मन नहीं लगा, और उपनिषद् फिर हमारी ओर देखकर कहता है कि इसीलिए अकेला रमता नहीं। उसने दूसरे की इच्छा की। वह उतना बड़ा था जितने एक स्त्री और एक पुरुष आपस में लिपटे हुए होते हैं। उसने अपने को दो टुकड़ों में गिरा दिया, और उन दो टुकड़ों से पति और पत्नी हुए। याज्ञवल्क्य इसी पर कहा करते थे कि इसीलिए यह देह आधे टुकड़े की तरह अधूरी लगती है, और जो रिक्त जगह बचती है वह स्त्री से भरती है। दोनों मिले, और उनसे मनुष्य उत्पन्न हुए।

अब कथा एक अनोखा मोड़ लेती है। उस स्त्री ने सोचा कि मुझे तो इसी ने अपने में से जन्माया है, फिर मुझसे संयोग कैसे, मैं छिप जाती हूँ। वह गाय बनी तो दूसरा बैल बन गया, और उनसे गायें हुईं। वह घोड़ी हुई, वह घोड़ा; वह गदही हुई, वह गदहा, और उनसे एक खुर वाले पशु हुए। वह बकरी हुई, वह बकरा; वह भेड़ हुई, वह मेढ़ा। इसी तरह चींटी तक जितने जोड़े हैं, सब उसी से रचे गए। छिपने का हर प्रयास एक नई प्रजाति बन गया। और तब उसने जान लिया कि मैं ही यह सृष्टि हूँ, क्योंकि यह सब मैंने ही रचा है।

फिर उसने हाथों को मुँह के पास ले जाकर मथा और अग्नि उत्पन्न किया, इसीलिए हथेली और मुँह, दोनों भीतर से रोमरहित हैं। उपनिषद् यहाँ एक बड़ी बात कह देता है, कि लोग जो कहते हैं कि उस देवता का यजन करो, उस दूसरे का, वे सब इसी की फैलाई हुई सृष्टि हैं, और यही अकेला सब देवता है। जो कुछ गीला है वह उसी के बीज से रचा गया, वही सोम है। सोम अन्न है, अग्नि खाने वाला। यह उसकी अतिसृष्टि है, क्योंकि मरणधर्मा होकर भी उसने अमरों को रच दिया।

अब उपनिषद् एक शान्त, गहरा वाक्य रखता है। तब यह सब अव्याकृत था, बिना नाम और बिना रूप के, फिर यह नाम और रूप से खुला, कि इसका यह नाम है और यह रूप। वही आत्मा इस देह में नख के सिरे तक घुसा हुआ है, जैसे छुरा म्यान में छिपा रहता है, जैसे आग अपने घोंसले में। लोग उसे देख नहीं पाते, क्योंकि वह टुकड़ों में दिखता है। साँस लेते हुए वह प्राण कहलाता है, बोलते हुए वाणी, देखते हुए आँख, सुनते हुए कान, सोचते हुए मन। ये सब उसके काम के नाम हैं। इसलिए उपनिषद् आदेश देता है कि आत्मा के रूप में ही उपासना कीजिए, क्योंकि यहीं ये सब एक हो जाते हैं।

और फिर वह पंक्ति आती है जो घर-गृहस्थी के बीच रहने वाले हर आदमी को छूती है। यह आत्मा पुत्र से भी प्रिय है, धन से भी प्रिय है, और सबसे भीतर बैठा हुआ है। जो किसी और चीज़ को अपने से अधिक प्रिय बताए, उससे कहा जा सकता है कि उसका वह प्रिय एक दिन छिन जाएगा, और ऐसा होता भी है। इसलिए आत्मा को ही प्रिय मानकर उपासना कीजिए, क्योंकि जो आत्मा को प्रिय मानता है, उसका प्रिय कभी नष्ट नहीं होता।

सार: आरम्भ का अकेला डरा, फिर समझा कि दूसरे के बिना भय का कोई आधार नहीं। ऊब से उसने अपने को दो किया, और उन दो से मनुष्य, पशु और चींटी तक सब जोड़े बने। वही आत्मा आज नख के सिरे तक हमारे भीतर छिपा है और साँस, वाणी, आँख और मन के नामों से पुकारा जाता है।

अहं ब्रह्मास्मि, और उसके बाद खड़ा हुआ समाज

अब उपनिषद् बीच में एक आपत्ति उठा देता है, जैसे कोई सभा में खड़ा होकर पूछ रहा हो। लोग कहते हैं कि ब्रह्मविद्या से मनुष्य सब कुछ हो जाएँगे। तो उस ब्रह्म ने ऐसा क्या जान लिया था जिससे वह सब कुछ हो गया। उत्तर वही वाक्य है जिसके लिए यह उपनिषद् पहचाना जाता है। आरम्भ में यह सब ब्रह्म ही था, उसने अपने आपको जाना, “अहं ब्रह्मास्मि”, मैं ब्रह्म हूँ, और इसीलिए वह सब कुछ हो गया। इस वाक्य में साधना का कोई लम्बा नुस्ख़ा नहीं है, बस एक पहचान है।

फिर उपनिषद् बताता है कि यह दरवाज़ा किसी एक जाति के लिए नहीं खुला। देवताओं में से जो-जो जागा, वही वह हो गया। ऋषियों में भी वही हुआ, मनुष्यों में भी वही। ऋषि वामदेव ने इसी को देखकर कह दिया था, “अहं मनुरभवं सूर्यश्च”, मैं मनु हुआ, और मैं सूर्य भी हुआ। और आज भी जो इस तरह जानता है कि मैं ब्रह्म हूँ, वह यह सब हो जाता है। देवता तक उसे रोक नहीं पाते, क्योंकि वह उनका भी आत्मा बन चुका होता है।

इसके उलट, जो किसी देवता की उपासना यह मानकर करता है कि वह अलग है और मैं अलग, वह नहीं जानता। उपनिषद् यहाँ बहुत तीखी उपमा देता है। ऐसा आदमी देवताओं के लिए पशु के समान है। जैसे कोई गृहस्थ बहुत से पशु पालकर उनसे काम लेता है, वैसे ही एक-एक मनुष्य देवताओं को पालता है। और जैसे एक पशु के खो जाने पर भी मालिक को बुरा लगता है, वैसे ही देवताओं को यह प्रिय नहीं कि मनुष्य इसे जान जाएँ। इसी निडरता के लिए यह उपनिषद् जाना जाता है।

इसके बाद वह पूरे समाज को एक ही सृष्टि-कथा में बुन देता है। आरम्भ में ब्रह्म अकेला था, और अकेला होने से वह फैला नहीं। इसलिए उसने अपना श्रेष्ठ रूप क्षत्र रचा, वे क्षत्रिय देवता जिनके नाम इन्द्र, वरुण, सोम, रुद्र, पर्जन्य, यम, मृत्यु और ईशान हैं। इसीलिए क्षत्र से बढ़कर कुछ नहीं, और राजसूय में ब्राह्मण क्षत्रिय से नीचे बैठकर उसकी उपासना करता है। पर उपनिषद् तुरन्त सन्तुलन लगा देता है, कि क्षत्र की योनि तो ब्रह्म ही है, इसलिए राजा चाहे कितना ही ऊपर चला जाए, अन्त में अपनी उसी जड़ के पास लौटता है, और जो उस जड़ को चोट पहुँचाता है, वह अपनी ही जड़ काटता है।

फिर भी वह फैला नहीं। तब उसने विश् को रचा, वे देवगण जो झुंड में गिने जाते हैं, वसु, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव और मरुत्। फिर भी बात न बनी, तो उसने शूद्र वर्ण को पूषन् के रूप में रचा, और जोड़ दिया कि यह पृथ्वी ही पूषा है, क्योंकि यही सबका पोषण करती है। और तब भी वह पूरा न पड़ा, इसलिए उसने अपना और भी श्रेष्ठ रूप रचा, धर्म। धर्म क्षत्र का भी क्षत्र है, इसलिए धर्म से बढ़कर कुछ नहीं। जो निर्बल है, वह भी धर्म के सहारे बलवान से आशा कर सकता है। और अन्त में उपनिषद् दोनों को एक कर देता है, “यो वै स धर्मः सत्यं वै तत्”, जो धर्म है वही सत्य है।

अन्तिम मन्त्रों में यह अध्याय फिर भीतर मुड़ता है। जो मनुष्य अपने लोक को, यानी अपने आत्मा को, बिना देखे चला जाता है, उसे वह लोक भोग नहीं देता, जैसे बिना पढ़ा हुआ वेद कोई फल नहीं देता। बड़े से बड़ा पुण्य कर्म भी, बिना इस जानकारी के, अन्त में चुक जाता है। इसलिए उपनिषद् कहता है कि आत्मा को ही अपना लोक मानकर उपासना कीजिए, क्योंकि जो ऐसा करता है उसका कर्म कभी क्षीण नहीं होता।

और यह आत्मा केवल अपना लोक नहीं, सब प्राणियों का लोक है। हवन और यजन से वह देवताओं का लोक बनता है, स्वाध्याय से ऋषियों का, पितरों को अर्पण और सन्तान से पितरों का, मनुष्यों को ठहराने और अन्न देने से मनुष्यों का, पशुओं को घास और पानी देने से पशुओं का, और घर के कीड़े, पक्षी और चींटी तक को जीने देने से उनका भी। जैसे हर आदमी अपने लोक की कुशल चाहता है, वैसे ही ऐसे जानने वाले की कुशल सारे प्राणी चाहते हैं। इसी ब्राह्मण के अन्त में वे चार कामनाएँ भी भीतर ले आई गई हैं, कि मन ही उसका आत्मा है, वाणी पत्नी, प्राण सन्तान, आँख मनुष्य का धन, और आत्मा ही उसका कर्म।

सार: ब्रह्म ने अपने को जाना और कहा कि मैं ब्रह्म हूँ, और इसी पहचान से वह सब कुछ हो गया, देवताओं में भी, ऋषियों में भी, मनुष्यों में भी। जो देवता को अपने से अलग मानकर पूजता है, वह देवों का पशु बना रहता है। और जो समाज इसी से फैला, उसके ऊपर उपनिषद् धर्म को रखता है और धर्म को सत्य कह देता है।

सात अन्न, सोलह कलाएँ, और पिता से पुत्र को सौंपी हुई थाती

पाँचवाँ ब्राह्मण एक श्लोक से शुरू होता है। पिता ने मेधा और तप से सात अन्न उत्पन्न किए। उनमें से एक सबके लिए साधारण रखा, दो देवताओं को बाँटे, तीन अपने लिए रखे, और एक पशुओं को दे दिया। उसी में सब कुछ टिका है, जो साँस लेता है वह भी और जो नहीं लेता वह भी। फिर श्लोक ख़ुद ही सवाल उठाता है कि ये अन्न रोज़ खाए जाते हैं, फिर चुकते क्यों नहीं। उत्तर आगे आता है, कि जो इस अक्षय स्रोत को जान लेता है, वह मुँह से अन्न खाता है, देवताओं तक पहुँचता है और बल से जीता है।

उपनिषद् फिर एक-एक पंक्ति खोलता है। जो सबके लिए साधारण अन्न है, वह यही है जो रोज़ खाया जाता है, और जो केवल इसी की उपासना में लगा रहता है वह पाप से नहीं छूटता, क्योंकि यह मिला-जुला है। दो अन्न देवताओं को दिए गए, वे हुत और प्रहुत हैं, जिन्हें कुछ लोग दर्श और पूर्णमास भी कहते हैं। पशुओं को जो एक दिया गया, वह दूध है, क्योंकि आरम्भ में मनुष्य और पशु दोनों दूध पर ही जीते हैं। इसीलिए नवजात शिशु को पहले घी चटाया जाता है, और नए जन्मे बछड़े के बारे में कहा जाता है कि वह अभी घास नहीं खाता।

यहीं उपनिषद् एक प्रचलित मान्यता को सुधार देता है। लोग कहते थे कि साल भर दूध से हवन करने पर बार-बार मरना छूट जाता है। उपनिषद् कहता है कि ऐसा मत जानिए, क्योंकि जो जिस दिन हवन करता है, उसी दिन वह उस मृत्यु को जीत लेता है, बशर्ते वह इस तरह जानता हो। और जो अक्षय स्रोत है, वह कोई बाहर की खान नहीं, पुरुष ही वह अक्षय है, क्योंकि वही इस अन्न को बार-बार अपनी बुद्धि और अपने कर्मों से पैदा करता रहता है। जो मेज़ पर रोज़ आता है, वह श्रम से आता है।

जो तीन अन्न उसने अपने लिए रखे, वे मन, वाणी और प्राण हैं, और यहीं से यह ब्राह्मण भीतर उतरता है। मन के लिए उपनिषद् वही उदाहरण देता है जो हम रोज़ जीते हैं, कि आदमी कहता है, मेरा मन कहीं और था, इसलिए मैंने देखा नहीं, मेरा मन कहीं और था, इसलिए मैंने सुना नहीं। देखता तो मन ही है, सुनता भी मन ही है। कामना, संकल्प, सन्देह, श्रद्धा और अश्रद्धा, धीरज और बेधीरजी, लज्जा, बुद्धि और भय, यह सब मन ही है। जो कोई शब्द है वह वाणी है। और प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान, यह सब प्राण ही है। यही तीन मिलकर हमारी देह हैं, यह आत्मा वाणीमय है, मनोमय है, प्राणमय है।

फिर उपनिषद् इन्हीं तीनों में सारा जगत् समेट देता है। तीन लोक यही हैं, वाणी यह लोक, मन अन्तरिक्ष, प्राण वह ऊपर का लोक। तीन वेद यही हैं, वाणी ऋग्वेद, मन यजुर्वेद, प्राण सामवेद। देवता, पितर और मनुष्य यही हैं। पिता, माता और सन्तान भी यही हैं, मन पिता, वाणी माता, प्राण सन्तान। जो जाना जा चुका है वह वाणी का रूप है, जो जानने को बाक़ी है वह मन का, और जो कभी नहीं जाना जाता वह प्राण का। वाणी का शरीर पृथ्वी है और प्रकाश अग्नि, मन का शरीर आकाश और प्रकाश सूर्य, और इन दोनों के मिलन से प्राण जन्मा, वही इन्द्र है, जिसका कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं।

अब एक सुन्दर गणित आता है। संवत्सर ही प्रजापति है, और उसकी सोलह कलाएँ हैं। पन्द्रह कलाएँ उसकी रातें हैं और सोलहवीं कला ध्रुव, अचल। वह रातों से ही भरता है और रातों से ही घटता है। अमावस्या की रात वह उसी सोलहवीं कला से सब प्राणियों में घुस जाता है और सुबह फिर जन्म लेता है, इसीलिए उस रात किसी प्राणी का प्राण न लीजिए, गिरगिट तक का नहीं। फिर वही गणित आदमी पर रख दिया जाता है। उसकी पन्द्रह कलाएँ उसका धन हैं और सोलहवीं उसका आत्मा। आत्मा पहिए की नाभि है और धन उसका बाहरी घेरा।

फिर तीन लोक गिनाए जाते हैं। मनुष्यलोक पुत्र से जीता जाता है, पितृलोक कर्म से, और देवलोक विद्या से। देवलोक सबमें श्रेष्ठ है, इसीलिए विद्या की इतनी प्रशंसा की जाती है। और यहीं वह दृश्य आता है जिसे उपनिषद् सम्प्रत्ति कहता है, यानी सौंपना। जब पिता को लगे कि अब चलने का समय है, वह पुत्र को बुलाकर कहता है, “त्वं ब्रह्म त्वं यज्ञस्त्वं लोकः”, आप ब्रह्म हैं, आप यज्ञ हैं, आप लोक हैं। और पुत्र उत्तर देता है कि मैं ब्रह्म हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं लोक हूँ। जो कुछ पढ़ा गया, उस सबकी एकता ब्रह्म है, और जितने लोक हैं, उन सबकी एकता लोक।

ऐसा जानने वाला जब इस लोक से जाता है, तो इन्हीं प्राणों के साथ पुत्र में प्रवेश करता है। और यदि उससे कुछ टेढ़ा हो गया हो, तो उस सबसे पुत्र उसे छुड़ा देता है, इसीलिए उसका नाम पुत्र है। फिर उसमें वे दिव्य प्राण प्रवेश करते हैं। पृथ्वी और अग्नि से दिव्य वाणी आती है, वह वाणी जिससे जो कहा जाए वही हो जाता है। आकाश और सूर्य से दिव्य मन आता है, जिससे आदमी आनन्द में रहता है और शोक नहीं करता। जल और चन्द्रमा से दिव्य प्राण आता है, जो चलते हुए भी और ठहरे हुए भी न व्यथित होता है न नष्ट।

इस ब्राह्मण का अन्त एक और कथा से होता है, जिसे उपनिषद् व्रत की मीमांसा कहता है। प्रजापति ने इन्द्रियों के कर्म रचे, और रचते ही हर एक ने ठान लिया कि यह काम मेरा ही है। तब मृत्यु थकान का रूप धरकर आई और उन्हें पकड़ लिया, इसीलिए वाणी थकती है, आँख थकती है, कान थकता है। पर बीच में बसे उस मुख्य प्राण को वह पकड़ न सकी। तब बाक़ी इन्द्रियों ने जाना कि सबमें श्रेष्ठ यही है, इसलिए हम सब इसी का रूप हो जाएँ, और इसीलिए आज वे सब प्राण कहलाती हैं। देवताओं में भी वायु वही है, क्योंकि बाक़ी देवता अस्त होते हैं और वायु कभी अस्त नहीं होती। इसीलिए अन्त में उपनिषद् एक ही व्रत बताता है, कि साँस लीजिए और साँस छोड़िए।

सार: सात अन्नों की गिनती से शुरू होकर यह ब्राह्मण मन, वाणी और प्राण पर आ ठहरता है, और उन्हीं तीनों में लोक, वेद और कुटुम्ब समेट देता है। सोलह कलाओं का गणित बताता है कि धन घटता-बढ़ता है और आत्मा अचल रहता है। और अन्त में मरता हुआ पिता तीन वाक्यों में अपना सब कुछ पुत्र को सौंप देता है।

नाम, रूप और कर्म, तीन जो एक ही हैं

छठा ब्राह्मण बहुत छोटा है, तीन ही मन्त्र, पर वह पूरे अध्याय की गाँठ बाँध देता है। उपनिषद् कहता है कि यह सब तीन है, नाम, रूप और कर्म। इससे बाहर कुछ नहीं। जो कुछ भी आप जानते हैं, उसका कोई नाम है, कोई दिखावट है, और वह कुछ करता है। इतनी सीधी गिनती में सारा संसार आ जाता है, और यही इस ब्राह्मण की ताक़त है।

इन तीनों में से नामों का उक्थ वाणी है, क्योंकि सारे नाम उसी से उठते हैं, वही उनका साम है, क्योंकि वह सब नामों के बराबर है, और वही उनका ब्रह्म, क्योंकि वही सब नामों को उठाए रखती है। इसी तरह रूपों का उक्थ आँख है, क्योंकि सारे रूप उसी से उठते हैं और उसी पर टिके हैं। और कर्मों का उक्थ आत्मा है, क्योंकि सारे कर्म उसी से उठते हैं और उसी के सहारे चलते हैं।

और फिर वह अन्तिम वाक्य, “तदेतत्त्रयं सदेकमयमात्मा”, ये तीनों होकर भी एक ही हैं, और वह एक यही आत्मा है, और आत्मा एक होकर भी ये तीनों है। नाम अलग दिखते हैं, रूप अलग, कर्म अलग, पर जिस पर ये तीनों टिके हैं वह एक ही है। जो अध्याय एक घोड़े के अंगों की गिनती से शुरू हुआ था, वह यहाँ आकर गिनती को समेट लेता है।

अन्तिम पंक्ति एक बारीक़ चित्र खींचती है। यह अमृत सत्य से ढका हुआ है। प्राण अमृत है, और नाम तथा रूप सत्य हैं, और इन्हीं दोनों से यह प्राण ढँका हुआ है। जो ऊपर से दिखता है, वह झूठ नहीं है, वह सत्य ही है, पर वह एक ओढ़नी की तरह है, और उसके नीचे जो साँस चल रही है, वही कभी न मरने वाली है। पहले ब्राह्मण में जिस घोड़े के नाम और रूप गिनाए गए थे, छठे में उसी के नीचे बहती हुई साँस दिखा दी गई है।

सार: सारा जगत् तीन में आ जाता है, नाम, रूप और कर्म, और उनके पीछे क्रमशः वाणी, आँख और आत्मा खड़े हैं। ये तीनों मिलकर एक ही आत्मा हैं। और वह अमृत प्राण नाम तथा रूप की ओढ़नी के नीचे ढँका हुआ चलता रहता है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस अध्याय से जो एक बात सबसे पहले हाथ लगती है, वह भूख वाली है। उपनिषद् ने सृष्टि की जड़ में जिसे रखा, वह कोई सजा हुआ देवता नहीं, एक अतृप्ति है, और उसी को उसने मृत्यु कह दिया। अपने दिन को इस कसौटी पर रखकर देखिए। जो-जो चीज़ें हम अपनी ओर खींचते रहते हैं, उनमें से कितनी भूख से आती हैं और कितनी भरेपन से। जिस क्षण कुछ पाने की जल्दी उतर जाती है, उसी क्षण वह पुराना डर भी थोड़ा ढीला पड़ता है, क्योंकि जैसा उस पहले अकेले ने समझा था, भय हमेशा किसी दूसरे की कल्पना से खड़ा होता है।

दूसरी बात प्राणों की उस होड़ से आती है। वाणी, आँख, कान और मन, चारों इसलिए बेधे गए कि हर एक ने अनुभव में से अपना हिस्सा काटकर रख लिया था। और जो अकेला अटूट निकला, वह वही था जो कुछ जमा नहीं करता, बस चलता रहता है। हमारे भीतर भी यही फ़र्क़ रोज़ बनता है। जो काम अपने नाम के लिए किया जाता है वह थकाता है, और जो बिना हिसाब के किया जाता है वह साँस की तरह चलता रहता है। इसीलिए उपनिषद् ने पूरे अध्याय के बाद व्रत के नाम पर बस इतना कहा, कि साँस लीजिए और साँस छोड़िए।

और तीसरी बात उस घर की है जहाँ पिता जाते-जाते बेटे से कहता है कि आप ब्रह्म हैं, आप यज्ञ हैं, आप लोक हैं। यह किसी सम्पत्ति का बँटवारा नहीं है, यह एक भरोसे का हस्तान्तरण है, कि जो मैंने जिया, उसकी डोर अब आपके हाथ में है। इस अध्याय की सबसे बड़ी पंक्ति भी यही करती है। “अहं ब्रह्मास्मि” किसी दूर की उपलब्धि की घोषणा नहीं, यह अपने को पहचान लेने की एक सीधी बात है, और उपनिषद् कहता है कि जिस दिन कोई इसे सचमुच जान लेता है, उस दिन वह सब कुछ हो जाता है। यह अध्याय हमसे इतना ही चाहता है कि हम अपने भीतर की उस साँस को एक बार बिना नाम और बिना रूप के देख लें।

आधार: बृहदारण्यक उपनिषद्, अध्याय 1, ब्राह्मण 1 से 6; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।