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चित्रकूट में सेना का प्रवेश
उस विशाल चलती ससैन्य ध्वजिनी से दबे मतवाले हाथी-यूथपति अपने झुण्डों-सहित इधर-उधर भागे। रीछ, चीतल और रुरु-मृग वन-मार्गों, पर्वतों और नदी-तटों पर सब ओर भागते दिखे। चतुरंगिणी सेना से घिरे धर्मात्मा दशरथ-पुत्र भरत श्रीराम-मिलन की आशा में प्रसन्न होकर आगे बढ़े। महात्मा भरत की समुद्र-तरंग-सी सेना ने पृथ्वी को वैसे ढक दिया जैसे वर्षा में मेघ आकाश को। घोड़ों और महाबल हाथियों के समूहों से ढकी भूमि बहुत देर तक अदृश्य रही।
लम्बा मार्ग तय कर, वाहन थक जाने पर, श्रीमान् भरत ने मन्त्रिवर वसिष्ठ से कहा, “यहाँ का रूप देखकर और जो मैंने सुना था उससे स्पष्ट है कि हम उसी प्रदेश में पहुँच गए जिसे भरद्वाज ने बताया था। यह चित्रकूट पर्वत है, यह मन्दाकिनी नदी, और दूर से यह वन नील-मेघ-सा दिख रहा है। मेरे पर्वत-तुल्य हाथी चित्रकूट के रमणीय शिखरों को रौंद रहे हैं। हाथियों से हिले वृक्ष शिखरों पर वैसे ही फूल बरसा रहे हैं जैसे ग्रीष्मान्त में मेघ जल। हे शत्रुघ्न, देखिए, किन्नरों से सेवित यह पर्वत-प्रदेश अब घोड़ों से ऐसे भर गया जैसे समुद्र मगरों से। प्रेरित ये मृग-समूह शरद् में वायु से उड़े मेघ-जाल-से दिख रहे हैं। दक्षिण के लोगों की भाँति ये सैनिक मेघ-से ढालों और सिर पर सुगन्धित फूल-आभूषणों से सजे हैं। अब तक नीरव, भयावना यह वन जनों से भरकर मुझे अयोध्या-सा प्रतीत हो रहा है। खुरों से उठी धूल आकाश को ढक रही है, पर वायु उसे शीघ्र उड़ाकर मानो मुझ पर कृपा कर दृश्य दिखा रही है।
“हे शत्रुघ्न, देखिए, श्रेष्ठ सारथियों से चलाए ये घोड़ों के रथ श्रीराम-दर्शन को आतुर वन में तेज़ दौड़ रहे हैं। सेना से डरे ये सुन्दर मोर पक्षियों के आवास-पर्वत की ओर भाग रहे हैं। यह प्रदेश मुझे अत्यन्त मनोहर लग रहा है, हे निष्पाप, यह तपस्वियों का निवास स्पष्ट ही स्वर्ग-मार्ग है। मृगियों-सहित बहुत-से चीतल मानो फूलों से चित्रित दिख रहे हैं। अब उत्तम रीति से सेना आगे बढ़कर वन को छाने, ताकि वे पुरुष-व्याघ्र श्रीराम और लक्ष्मण दिख जाएँ।”
भरत का वचन सुनकर शूर शस्त्रधारी पुरुष वन में घुसे और दूर एक धुएँ की रेखा देखी। वे भरत के पास आकर बोले, “मनुष्य-रहित स्थान में आग नहीं होती, स्पष्ट है कि श्रीराम और लक्ष्मण यहीं रहते हैं। और यदि वे यहाँ न हों, तो निश्चय ही श्रीराम-जैसे अन्य तपस्वी यहाँ हैं।” सज्जनों-सम्मत यह वचन सुनकर शत्रु-सेना-मर्दन भरत ने सब सैनिकों से कहा, “आप सब सावधान रहकर यहीं रुकिए, आगे न बढ़िए। मैं स्वयं, सुमन्त्र और धृति-सहित ही जाऊँगा।” आदेश पाकर सैनिक सब ओर रुक गए, और भरत ने धुएँ की रेखा पर दृष्टि टिकाई। श्रीराम-मिलन निकट जानकर रोकी गई वह सेना भी हर्षित हुई।
समझने की कुंजी: भरद्वाज ने चित्रकूट की दूरी ढाई योजन (दस कोस) बताई। योजन और कोस की पुरानी माप पर टीकाकारों में मतभेद है, पर प्रयाग से चित्रकूट की वास्तविक दूरी लगभग 80 आधुनिक मील (लगभग 130 किलोमीटर) बैठती है, अर्थात् सेना को कई दिन की यात्रा करनी पड़ी। चित्रकूट आज भी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित तीर्थ है।
सार: भरत की समुद्र-सी सेना ने चित्रकूट के वन में प्रवेश किया, जहाँ भरत ने भरद्वाज के बताए चिह्नों से स्थान पहचाना। सैनिकों ने दूर धुआँ देखकर श्रीराम का आश्रम होने का अनुमान लगाया, और भरत ने सेना को रोककर केवल सुमन्त्र और धृति-सहित आगे जाने का निश्चय किया।
श्रीराम का चित्रकूट-वर्णन
उधर चित्रकूट पर लगभग तीन मास से रह रहे, श्रेष्ठ पर्वतों के प्रेमी दशरथ-पुत्र श्रीराम, सीता को प्रसन्न करने और अपना मन बहलाने के लिए, उस अद्भुत चित्रकूट की शोभा वैसे ही दिखाने लगे जैसे इन्द्र शची को नन्दन-वन दिखाते हैं। श्रीराम ने कहा, “हे भद्रे, इस रमणीय पर्वत को देखकर न राज्य-नाश का दुःख मन को सताता है, न प्रियजनों का वियोग। इस पर्वत को देखिए, जो भाँति-भाँति के पक्षी-समूहों से भरा है, और जिसके खनिज-समृद्ध शिखर मानो आकाश को बेधते हैं। इसके खनिजों से सजे भाग कहीं चाँदी-से, कहीं रक्त-से लाल, कहीं पीले, कहीं श्रेष्ठ मणि-से, और कहीं पुखराज-स्फटिक-से चमक रहे हैं।
“भाँति-भाँति के मृग-समूहों, निरुपद्रवी चीतों-तेन्दुओं-रीछों और अनेक पक्षियों से भरा यह पर्वत मनोहर है। आम, जामुन, असन, लोध्र, प्रियाल, कटहल, धव, अंकोल, भव्य, तिनिश, बेल, तेन्दु, बाँस, काश्मरी, नीम, वरुण, महुआ, तिलक, बेर, आँवला, कदम्ब, बेंत, धन्वन और बीजों से भरे अनार-वृक्षों से, जो फूल-फलों से लदे और छायादार हैं, यह पर्वत अपनी शोभा बढ़ा रहा है। हे भद्रे, रमणीय शिखरों पर जोड़ों में विहार करते, एक-दूसरे में लीन ये किन्नर देखिए। वृक्षों की शाखाओं पर टँगी इनकी तलवारें और विद्याधर-स्त्रियों के उत्तम वस्त्र तथा क्रीड़ास्थल देखिए। झरनों और सोतों से यह पर्वत मद बहाते हाथी-सा दिखता है। गुफाओं से आती, फूलों की गन्ध से भरी वायु किस पुरुष को प्रसन्न न करेगी?
“हे अनिन्द्ये, यदि मैं आपके और लक्ष्मण के साथ अनेक शरद् ऋतुएँ यहाँ बिताऊँ, तो शोक मुझे नहीं सताएगा। हे भामिनी, बहुत फूल-फलों वाले, भाँति-भाँति के पक्षियों से भरे, विचित्र शिखरों वाले इस पर्वत पर मैं सचमुच आसक्त हूँ। इस वनवास से मुझे दोहरा लाभ हुआ है: पिता के सत्य-धर्म से उऋण हुआ, और भरत का प्रिय हुआ। हे वैदेही, क्या आप चित्रकूट पर मेरे साथ, मन-वचन-काय को भाने वाले अनेक दृश्य देखकर प्रसन्न हैं? मनु आदि मेरे श्रेष्ठ राजर्षि-पूर्वज ऐसे वनवास को अमृत-तुल्य और मृत्यु के बाद पुनर्जन्म से मुक्ति का कारण बताते आए हैं।
“नीली, पीली, श्वेत और लाल, अनेक रंगों की विशाल शिलाएँ पर्वत के चारों ओर सैकड़ों की संख्या में चमक रही हैं। रात में अपनी प्रभा से दमकती हजारों औषधियाँ अग्नि-शिखाओं-सी जगमगाती हैं। कहीं यह पर्वत घरों-सा, कहीं उद्यानों-सा, और कहीं एक ही विशाल शिला-सा दिखता है। यह चित्रकूट मानो पृथ्वी को फोड़कर उठ खड़ा हुआ है। कुश-पत्तों और कमल-दलों से ढकी, स्थगर-पुन्नाग-भोजपत्र के पत्तों वाली विलासियों की कोमल शय्याएँ देखिए। मसले-बिखरे कमल-हार और चखकर फेंके भाँति-भाँति के फल देखिए। बहुत मूल-फल-जल वाला यह चित्रकूट कुबेर की अलका, इन्द्र की अमरावती और उत्तर-कुरु से भी सुन्दर है। हे सीते, यदि मैं आपके और लक्ष्मण के साथ इस चौदह वर्ष के काल को सत्पुरुषों के मार्ग और कठिन संयम पर चलते हुए आनन्द से बिता सकूँ, तो मैं अपने कुल-धर्म को बढ़ाने वाला आनन्द पाऊँगा।”
सार: चित्रकूट पर लगभग तीन मास से रह रहे श्रीराम ने सीता का मन बहलाने और अपना चित्त विचलित होने से रोकने के लिए पर्वत की विस्तृत शोभा का वर्णन किया, उसके रंग-बिरंगे खनिज, फलदार वृक्ष, किन्नर-विद्याधर और औषधियाँ गिनाईं, और कहा कि सीता-लक्ष्मण के साथ यह वनवास उन्हें अमृत-तुल्य लगता है।
मन्दाकिनी का वर्णन
फिर पर्वत से मुड़कर कोसल के प्रभु श्रीराम ने मिथिला-राजकुमारी सीता को शुभ-जल वाली रमणीय मन्दाकिनी नदी दिखाई। कमल-से नेत्रों वाले श्रीराम ने सुन्दर अंगों वाली, चन्द्र-से मुख वाली विदेहराज-कन्या से कहा, “विचित्र बालू-तटों वाली, हंस-सारस से सेवित, फूलों से भरी मन्दाकिनी नदी देखिए। भाँति-भाँति के तट-वृक्षों से घिरी, फूल-फलदार वृक्षों से सजी यह नदी कुबेर की सौगन्धिक नलिनी-सी सब ओर शोभायमान है। मृग-यूथों के पीने से इस समय भले ही इसका जल मटमैला है, पर ये रमणीय घाट मुझे आनन्द देते हैं।
“हे प्रिये, जटा और मृगचर्म धारण किए, ऊपर वल्कल पहने ऋषि नियत समय पर मन्दाकिनी में स्नान करते हैं। हे विशालाक्षी, ये अन्य संयतव्रत मुनि बाँहें उठाए सूर्य की उपासना कर रहे हैं। वायु से हिले शिखर वाले वृक्ष नदी के दोनों ओर फूल-पत्ते बिखेरते मानो पर्वत को नाचता-सा दिखाते हैं। कहीं मणि-से जल वाली, कहीं बालू-तट वाली, कहीं सिद्धों से भरी मन्दाकिनी देखिए। हे तनुमध्यमे, वायु से झड़े, तट पर फैले और धारा में बहते फूलों के ढेर देखिए। हे कल्याणी, ये मधुर बोली वाले चक्रवाक मनोहर स्वर में बोलते तट चढ़ रहे हैं।
“हे शोभने, चित्रकूट और मन्दाकिनी का दर्शन मुझे नगर-निवास से भी अधिक प्रिय है, विशेषकर आपके सान्निध्य से। तप और इन्द्रिय-संयम से कल्मष-रहित सिद्धों के नित्य-स्नान से सदा हिलते इस जल में मेरे साथ डुबकी लगाइए। हे भामिनी, सखी के साथ खेलती सखी-सी, इसमें खिले लाल-श्वेत कमलों को डुबाती हुई मन्दाकिनी में स्नान कीजिए। हे प्रिये, वनवासियों को नगर-वासियों-सा, चित्रकूट को अयोध्या-सा, और इस नदी को सरयू-सा मानिए। धर्मात्मा लक्ष्मण मेरी आज्ञा-पालन में स्थित हैं, और हे वैदेही, आप भी अनुकूल रहकर मुझे प्रसन्न करती हैं। तीनों समय स्नान कर, मधु-मूल-फल खाकर आपके साथ रहते हुए मुझे न अयोध्या की चाह है, न राज्य की। इस रमणीय नदी में, जो हाथी-यूथों से मथी, हाथी-सिंह-वानरों से जल पी गई, और फूलों से सजी है, स्नान कर कौन थकान-मुक्त और सुखी न होगा?” इस प्रकार अनेक सार्थक बातें कहते रघुवंश-वर्धन श्रीराम अपनी प्रिया सीता के साथ काजल-राशि-सी चमकते रमणीय चित्रकूट पर विचरते रहे।
सार: सीता को प्रसन्न रखने के लिए श्रीराम ने मन्दाकिनी नदी की शोभा का वर्णन किया, उसके बालू-तट, हंस-सारस, स्नान करते ऋषि और तटों पर बहते फूल गिनाए, और कहा कि सीता-सहित चित्रकूट-निवास उन्हें अयोध्या और राज्य से भी प्रिय है।
चित्रकूट पर धूल का बादल और लक्ष्मण का सन्देह
चित्रकूट के मनोहर शिखरों पर श्रीराम सीता जी के साथ विश्राम कर रहे थे। मन्दाकिनी (चित्रकूट के पास बहने वाली पर्वतीय नदी) दिखाकर वे एक सपाट शिला पर बैठ गए और तपस्वियों के योग्य फलों के गूदे का वर्णन करते हुए सीता जी का मन बहला रहे थे। उसी समय भरत की सेना के समीप आने से उठी हुई धूल और पैरों की धमक आकाश तक छा गई।
उस भारी कोलाहल से डरे हुए मतवाले हाथी अपने झुण्डों से छूटकर दिशाओं में भागने लगे। श्रीराम ने सेना का वह शब्द सुना और झुण्ड से बिछुड़े हुए गजराजों को इधर-उधर भागते देखा। उन्होंने लक्ष्मण से कहा, “हे सुमित्रानन्दन ! सुमित्रा आप-जैसे योग्य पुत्र को पाकर धन्य हैं। यह गम्भीर गर्जना वज्र के समान सुनाई दे रही है। वन के हाथियों के झुण्ड हों, महिष हों, या सिंहों से डराए गए मृग, जो सहसा सब दिशाओं में भाग चले हैं। हे सुमित्रापुत्र ! आप यह जानने की चेष्टा कीजिए कि कोई राजा या राजकुमार वन में आखेट को आया है, अथवा कोई और हिंसक पशु यहाँ आ निकला है। यह पर्वत तो पक्षियों के लिए भी अत्यन्त दुर्गम है; इसलिए आप यह सब ठीक-ठीक जान लीजिए।”
आज्ञा पाकर लक्ष्मण फूले हुए साल वृक्ष पर शीघ्रता से चढ़ गए और सब दिशाएँ देखते हुए उन्होंने उत्तर की ओर दृष्टि डाली। वहाँ उन्हें हाथी, घोड़े और रथों से भरी, सावधान पैदल सैनिकों से युक्त एक विशाल सेना दीख पड़ी। उन्होंने श्रीराम से उस सेना के समीप आने का समाचार कहा और बोले, “जहाँ वह फूलों-फलों से भरा विशाल वृक्ष स्पष्ट दिख रहा है, वहाँ एक रथ पर कोविदार वृक्ष के चिह्न वाली, उज्ज्वल दण्ड वाली ध्वजा शोभा पा रही है।”
लक्ष्मण कोविदार-ध्वज देखकर शीघ्र ही इस निश्चय पर पहुँच गए कि भरत श्रीराम का वध करने आ रहे हैं। क्रोध से प्रज्वलित होकर, मानो उस सेना को भस्म कर देना चाहते हों, उन्होंने कहा, “हे आर्य ! आप अग्नि बुझा दीजिए और सीता गुफा में चली जाएँ। निश्चय ही, अभिषेक पाकर और निष्कण्टक राज्य चाहकर, कैकेयीनन्दन भरत हम दोनों को मारने आ रहे हैं। आइए, हम दोनों धनुष लेकर पर्वत के शिखर पर खड़े हों, अथवा कवच धारण कर अस्त्र उठाए यहीं स्थित रहें। हे राघव ! जिसके कारण आपको, सीता जी को और मुझे यह महान् कष्ट सहना पड़ा, और जिसके कारण आप अपने चिरकालीन राज्य से वंचित किए गए, उस भरत को आमने-सामने देख लूँगा।”
लक्ष्मण आगे बोले, “हे राघव ! भरत के वध में मुझे कोई दोष नहीं दिखता। पहले अपराध करने वाले को मारने से अधर्म नहीं लगता। भरत ने पहले ही अपराध किया है। आज मैं अपने रोके हुए क्रोध को शत्रु-सेना पर बाणों के रूप में छोड़ूँगा, जैसे कोई सूखी झाड़ियों पर अग्नि उगल दे। तीखे बाणों से शत्रुओं के शरीर चीरकर मैं आज ही चित्रकूट के वन को रक्त से सींच दूँगा। सेनासहित भरत को मारकर मैं अपने धनुष और बाणों का ऋण उतार दूँगा। राज्य की लोभी कैकेयी अपने पुत्र को मेरे हाथों मारा गया देखकर शोक से व्याकुल होगी; उसके कुटुम्ब और बन्धुओं सहित मैं उसका भी वध कर डालूँगा।”
समझने की कुंजी (कोविदार-ध्वज): कोविदार (कचनार) का वृक्ष-चिह्न अयोध्या के राजकुल की ध्वजा का प्रतीक था। लक्ष्मण ने इसी चिह्न से सेना को पहचाना; किन्तु उन्हें भरत की मंशा का भान नहीं था, इसी से सन्देह जागा।
सार: चित्रकूट पर उठी धूल और कोलाहल देखकर लक्ष्मण ने सेना में कोविदार-ध्वज पहचाना और भरत पर शत्रुता का सन्देह कर बैठे, और क्रोध में सेनासहित भरत तथा कैकेयी के वध की प्रतिज्ञा कर डाली।
श्रीराम लक्ष्मण को शान्त करते हैं; सेना का पड़ाव
भरत के प्रति अत्यन्त कुपित और क्रोध से अधीर लक्ष्मण को श्रीराम ने हर प्रकार से शान्त किया और कहा, “जब महाबली भरत मुझसे मिलने की उत्कट इच्छा से स्वयं चले आए हैं, तब इस समय धनुष या ढाल-तलवार से क्या प्रयोजन? हे लक्ष्मण ! पिता के सत्य की प्रतिज्ञा करके, युद्ध में भरत का वध करके मैं उस कलंकित राज्य का क्या करूँगा? बन्धुओं या मित्रों के विनाश पर आने वाली सम्पत्ति को मैं वैसे ही नहीं स्वीकार करूँगा, जैसे कोई विष-मिले पकवान न खाए।”
“हे लक्ष्मण ! धर्म, अर्थ, काम और पृथ्वी का राज्य भी मैं केवल आप भाइयों के लिए चाहता हूँ; यह मैं आपको वचन देता हूँ। हे सौम्य ! समुद्र-पर्यन्त इस पृथ्वी का राज्य मेरे लिए दुर्लभ नहीं है, किन्तु अधर्म से मैं इन्द्र का पद भी नहीं चाहता। यदि भरत, आपके और शत्रुघ्न के बिना मुझे कोई सुख प्राप्त हो, तो उसे अग्नि भस्म कर दे।”
“मैं मानता हूँ कि भ्रातृवत्सल भरत, जो मुझे प्राणों से भी प्रिय हैं, मुझे जटा-वल्कलधारी होकर सीता और आपके साथ वनवासी हुआ सुनकर, कुलधर्म का स्मरण करते हुए, स्नेह और शोक से व्याकुल होकर मुझसे मिलने ही आए हैं, किसी और भाव से नहीं। हे लक्ष्मण ! भरत ने कब और कौन-सा अपराध आपके प्रति किया था जो आप उन पर ऐसी शंका कर रहे हैं? यदि आप राज्य के लोभ से ऐसा कह रहे हैं, तो मैं भरत को देखकर कह दूँगा कि यह राज्य लक्ष्मण को दे दिया जाए, और भरत ‘बहुत अच्छा’ कहकर इसे मान लेंगे।”
धर्मशील ज्येष्ठ भ्राता के ऐसे वचन सुनकर लक्ष्मण लज्जा से मानो अपने ही अंगों में समा गए और बोले, “मेरा विचार है कि पिता दशरथ स्वयं आपसे मिलने आए हैं।” लज्जित लक्ष्मण को देखकर श्रीराम ने कहा, “हाँ, मैं भी समझता हूँ कि महाबाहु पिताजी ही हमें यहाँ देखने आए हैं। अथवा वे हमें सुख के योग्य मानकर और वनवास के कष्टों का विचार करके हमें घर लौटा ले जाने आए हैं। मेरे श्रीमान् पिता राघव सदा सुख भोगने वाली इस वैदेही को भी वन से ले जाएँगे।”
“देखिए, वायु के वेग के समान ये दो उत्तम जाति के घोड़े स्पष्ट दिख रहे हैं। यह विशालकाय वृद्ध हाथी, हमारे बुद्धिमान् पिता का शत्रुंजय नामक गज, सेना के आगे झूम रहा है। किन्तु पिता का वह संसार-प्रसिद्ध श्वेत दिव्य छत्र मुझे नहीं दिखाई दे रहा; इससे मेरे मन में सन्देह उत्पन्न हो रहा है। हे लक्ष्मण ! आप वृक्ष के अग्रभाग से उतर आइए।” साल वृक्ष के शिखर से उतरकर शत्रुओं को जीतने वाले लक्ष्मण हाथ जोड़कर श्रीराम के पास खड़े हो गए।
उधर भरत की आज्ञा थी कि श्रीराम के आश्रम को किसी प्रकार की बाधा न हो। इसी से इक्ष्वाकुवंशी भरत की हाथी, घोड़े और मनुष्यों से भरी वह सेना डेढ़ योजन के क्षेत्र में पर्वत के समीप ठहर गई। धर्म को आगे रखकर, दर्प त्यागकर, श्रीराम को प्रसन्न करने के उद्देश्य से नीतिज्ञ भरत द्वारा लाई गई वह सेना चित्रकूट के समीप शोभा पा रही थी।
समझने की कुंजी (श्वेत छत्र का अभाव): राजा का दिव्य श्वेत छत्र जीवित सम्राट का चिह्न था। श्रीराम को सेना तो दशरथ की पहचानी, पर छत्र न देखकर उन्हें संशय हुआ। पाठक को यहीं संकेत मिल जाता है कि महाराज अब इस लोक में नहीं रहे।
सार: श्रीराम ने भरत के स्नेह पर विश्वास रखकर लक्ष्मण का क्रोध शान्त किया; पिता का श्वेत छत्र न देखकर उन्हें मन में संशय हुआ; और भरत की आज्ञा से सेना ने आश्रम को बाधा न देते हुए चित्रकूट के समीप पड़ाव डाला।
भरत पैदल ही आश्रम की खोज में निकलते हैं
चित्रकूट के समीप सेना ठहराकर, पैरों वालों में श्रेष्ठ महाबली भरत ने पिता के वचन का पालन करने वाले काकुत्स्थ श्रीराम के पास पैदल ही जाने की इच्छा की। सेना के ठहरते ही भरत ने अपने छोटे भाई शत्रुघ्न से कहा, “हे सौम्य ! इन मनुष्यों के समूहों के साथ, और गुह के अनुचर निषादों के साथ, आप शीघ्र इस वन को चारों ओर से खोजिए। गुह अपने सहस्र बन्धुओं के साथ, जिनके हाथों में धनुष, बाण और तलवार हों, स्वयं इस वन में काकुत्स्थ राम और लक्ष्मण को ढूँढ़ें। और मैं मन्त्रियों, पुरवासियों, गुरुजनों तथा ब्राह्मणों के साथ स्वयं पैदल ही सारा वन घूम लूँगा।”
“जब तक मैं श्रीराम को, अथवा महाबली लक्ष्मण को, अथवा महाभागा वैदेही को न देख लूँगा, तब तक मुझे शान्ति नहीं मिलेगी। जब तक भाई का पूर्णचन्द्र-सा, कमल के समान विशाल नेत्रों वाला शुभ मुख न देख लूँगा, तब तक मुझे शान्ति नहीं होगी। धन्य हैं सुमित्रापुत्र लक्ष्मण, जो श्रीराम का राजीवनयन, महातेजस्वी मुख निरन्तर देखते हैं। जब तक मैं राज्य के योग्य भाई को पैतृक सिंहासन पर अभिषिक्त, स्नान-जल से सिक्त न देख लूँगा, तब तक मुझे शान्ति न होगी।”
“कृतकृत्य हैं जनकनन्दिनी वैदेही, जो समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी के स्वामी अपने पति के पीछे-पीछे चलती हैं। धन्य है यह चित्रकूट पर्वत, जो गिरिराज हिमालय के समान है, जिस पर श्रीराम वैसे ही निवास करते हैं जैसे कुबेर अपने चैत्ररथ उद्यान में।” इतना कहकर महातेजस्वी महाबाहु भरत पैदल ही महान् वन में प्रवेश कर गए। पर्वत-शिखरों पर उगे, पुष्पित अग्रभाग वाले वृक्ष-समूहों के बीच से वे वाणी-विशारदों में श्रेष्ठ भरत आगे बढ़े।
चित्रकूट पर एक साल वृक्ष पर शीघ्रता से चढ़कर भरत ने श्रीराम के आश्रम की अग्नि से उठता ऊँचा धूम-स्तम्भ देखा। उसे देखकर ‘यहाँ श्रीराम हैं’ ऐसा जानकर श्रीमान् भरत बन्धु शत्रुघ्न सहित ऐसे प्रसन्न हुए मानो किसी ने जलराशि का पार पा लिया हो। पुण्यजनों से सेवित श्रीराम के उस आश्रम को देखकर, उन्होंने खोज में भेजी हुई सेना को शिविरों में लौटा दिया और गुह के साथ शीघ्र श्रीराम से मिलने को आगे बढ़े।
सार: भरत ने सेना को आश्रम-खोज में लगाकर गुह तथा शत्रुघ्न को एक ओर भेजा, और श्रीराम के दर्शन की उत्कण्ठा में सीता-लक्ष्मण के सौभाग्य को सराहते हुए पैदल ही वन में बढ़े; धूम-स्तम्भ देखकर आश्रम पहचाना और गुह के साथ आगे चले।
पर्णकुटी और भाइयों का मिलन
सेना के ठहर जाने पर ज्येष्ठ भ्राता के दर्शन को उत्सुक भरत शत्रुघ्न को मार्ग में आश्रम के चिह्न दिखाते हुए आगे चले। उन्होंने ऋषि वसिष्ठ से प्रार्थना की, “मेरी माताओं को शीघ्र ले आइए,” और स्वयं तेजी से बढ़ गए। श्रीराम के दर्शन की उत्कण्ठा से सुमन्त्र भी शत्रुघ्न के पीछे-पीछे चल पड़े; उनका हृदय भी भरत के समान ही श्रीराम-दर्शन की लालसा से भरा था।
चलते-चलते द्युतिमान् भरत ने तपस्वियों के निवास की शैली में बनी अपने ज्येष्ठ भ्राता की पर्णकुटी और सीता के लिए बनी काठ की दीवार से घिरी दूसरी कुटी देखी। कुटी के सामने उन्होंने चीरे हुए काठ के टुकड़े और पूजा के लिए चुने हुए फूल देखे; वृक्षों पर कहीं-कहीं कुश और चीर से बनाए मार्ग-चिह्न देखे, जो स्नान या जल लाने के लिए लक्ष्मण और श्रीराम ने बनाए थे। वन में उन्होंने शीत से बचाव के लिए मृगों और महिषों के सूखे गोबर के बड़े ढेर भी देखे।
हर्ष से उल्लसित भरत शत्रुघ्न और मन्त्रियों से बोले, “मैं मानता हूँ हम उसी प्रदेश में पहुँच गए हैं जिसका वर्णन ऋषि भरद्वाज ने किया था। मन्दाकिनी नदी यहाँ से अधिक दूर नहीं जान पड़ती। यहाँ वृक्षों पर ऊँचे बँधे चीर दिख रहे हैं, यही असमय स्नान या जल लाने जाते लक्ष्मण का बनाया मार्ग होगा। यहीं मैं पुरुषव्याघ्र, गुरुजनों का सत्कार करने वाले अपने आर्य श्रीराम को महर्षि के समान हर्षित बैठे देखूँगा।”
मन्दाकिनी के तट पर चित्रकूट पहुँचकर भरत ने अपने साथियों से कहा, “इस निर्जन स्थान में, धरती पर वीरासन में बैठे लोकनाथ महातेजस्वी श्रीराम, सब भोग त्यागकर, मेरे ही कारण इस विपत्ति में पड़कर वन में निवास कर रहे हैं। संसार मुझे धिक्कारता है; आज मैं श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के चरणों में गिरकर उन्हें प्रसन्न करूँगा। मेरे जन्म और जीवन को धिक्कार है !” इस प्रकार विलाप करते हुए भरत ने वन में एक विशाल, पवित्र, मनोहर पर्णशाला देखी, जो साल, ताल और अश्वकर्ण के पत्तों से छाई हुई, यज्ञ की वेदी के समान कुश से बिछी हुई दूर से दिखाई पड़ रही थी।
वह कुटी सोने के पृष्ठ वाले, इन्द्रधनुष-सरीखे चमकते महान् धनुषों से सुशोभित थी; तरकशों में रखे, सूर्यकिरण-से चमकते भयंकर बाणों से वैसे ही शोभित थी जैसे भोगवती (नागलोक) दीप्त फणों वाले सर्पों से। वहाँ सोने की म्यानों में रखी दो तलवारें और स्वर्णपुष्पों से जड़ी दो ढालें थीं। दीवारों पर लटके, स्वर्ण से सजे गोह-चर्म के दस्ताने थे; वह कुटी शत्रुसमूहों के लिए वैसे ही अजेय थी जैसे सिंह की गुफा मृगों के लिए। उस पुण्य निवास में भरत ने अग्निहोत्र की प्रज्वलित अग्नि से युक्त, अग्निकोण की ओर ढलवाँ एक विशाल पवित्र वेदी देखी।
क्षण भर देखते रहकर भरत ने जटाओं का मण्डल धारण किए, कृष्णमृगचर्म और चीर-वल्कल पहने, अग्नि-सी कान्ति वाले श्रीराम को कुटी में बैठे देखा। सिंह-सी भुजाओं और कमल-से नेत्रों वाले, समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी के पालक श्रीराम कुश से बिछी समतल भूमि पर सीता और लक्ष्मण के साथ शाश्वत ब्रह्मा के समान विराजमान थे। उन्हें देखकर शोक और मोह में डूबे धर्मात्मा कैकेयीपुत्र भरत उनकी ओर दौड़ पड़े।
दर्शनमात्र से आर्त भरत आँसुओं से रुँधे स्वर में विलाप करने लगे, “जो मन्त्रियों से सेवित होकर राजसभा में बैठने योग्य थे, मेरे वही ज्येष्ठ भ्राता वन्य मृगों के साथ बैठे हैं ! जो सहस्रों मूल्य के वस्त्र पहनते थे, वही आज पिता का धर्म निभाते हुए मृगचर्म पहने हैं। जो सदा भाँति-भाँति के सुन्दर फूल धारण करते थे, वही राघव आज जटाओं का यह भार कैसे ढो रहे हैं ! जिस शरीर पर बहुमूल्य चन्दन लगता था, मेरे आर्य का वही अंग आज मैल से ढका है ! मुझ-जैसे निर्दयी का संसार-निन्दित जीवन धिक्कार है !”
इस प्रकार दीनभाव से विलाप करते हुए, पसीने से लथपथ मुख वाले भरत श्रीराम के चरण न छू पाने के कारण रोते हुए धरती पर गिर पड़े। दुःख से सन्तप्त महाबली राजकुमार ने केवल एक बार दीन स्वर में “हे आर्य !” कहा, और फिर कुछ न कह सके; कण्ठ आँसुओं से अवरुद्ध हो गया। शत्रुघ्न ने भी रोते हुए श्रीराम के चरणों में प्रणाम किया। दोनों को आलिंगन में लेकर श्रीराम भी आँसू बहाने लगे।
तब वन में मिले उन राजकुमारों ने सुमन्त्र और गुह को भी ऐसे आलिंगन किया जैसे आकाश में सूर्य और चन्द्रमा शुक्र और बृहस्पति से मिलते हैं। गजराजों पर सवारी के योग्य उन राजकुमारों को वहाँ इकट्ठा देखकर सब वनवासी हर्ष भुलाकर आँसू बहाने लगे।
सार: भरत ने पर्णशाला में जटा-वल्कलधारी श्रीराम को सीता-लक्ष्मण के साथ देखा; अपने को विपत्ति का कारण मानकर विलाप करते हुए चरणों में गिर पड़े; श्रीराम ने दोनों भाइयों, सुमन्त्र और गुह को आलिंगन दिया और सब आँसुओं में डूब गए।
श्रीराम का राजनीति-उपदेश और कुशल-प्रश्न
जटाधारी, चीरवस्त्रधारी, हाथ जोड़े भूमि पर गिरे भरत को श्रीराम ने ऐसे देखा जैसे प्रलयकाल का सूर्य दर्शन में कष्ट देता हो। किसी प्रकार पहचानकर, विवर्ण मुख और कृश शरीर वाले भाई भरत को श्रीराम ने हाथों से उठाया, मस्तक सूँघा, गोद में बिठाया और स्नेह से पूछा, “हे तात ! आपके पिता कहाँ हैं, जो आप वन में आ गए? उनके जीवित रहते आपको वन में आना उचित न था। चिर काल बाद मैं भरत को देख रहा हूँ; हे तात ! आप वन में क्यों आए?”
“क्या राजा हमारे पिता जीवित हैं, जो आप यहाँ आए हैं? कहीं वे दुःखी सम्राट सहसा परलोक तो नहीं चले गए? हे सौम्य ! कहीं आपका अनादिकाल से चला आता राज्य आप-जैसे अल्पवयस्क के हाथ से छिन तो नहीं गया? क्या आप सत्यपराक्रमी पिता की सेवा कर रहे हैं? राजसूय और अश्वमेध यज्ञों के कर्ता, सत्यप्रतिज्ञ, धर्मनिष्ठ महाराज दशरथ कुशल से तो हैं? इक्ष्वाकुओं के उपाध्याय, ब्रह्मनिष्ठ, महातेजस्वी विद्वान् वसिष्ठ का आप यथोचित आदर करते हैं? कौसल्या, सुसन्तानवती सुमित्रा, और आर्या देवी कैकेयी सुखी हैं?”
श्रीराम ने इसी क्रम में राजधर्म की अनेक बातें पूछीं, यथा विनयसम्पन्न, बहुश्रुत, अनसूयक पुरोहित का सत्कार होता है? अग्निहोत्र की विधि जानने वाला ऋत्विज् समय पर हवन की सूचना देता है? देवताओं, पितरों, भृत्यों, गुरुजनों, वृद्धों, वैद्यों और ब्राह्मणों का आप सम्मान करते हैं? इष्वस्त्र-विशारद, अर्थशास्त्र में निपुण आचार्य सुधन्वा का आप आदर करते हैं? आत्म-समान शूर, श्रुतवान्, जितेन्द्रिय, कुलीन और चिह्नज्ञ (संकेत समझने वाले) ही मन्त्री नियुक्त किए हैं?
“हे राघव ! मन्त्र (गुप्त मन्त्रणा) ही राजाओं की विजय का मूल है। शास्त्रकोविद और धुरन्धर अमात्यों से अच्छी प्रकार सुरक्षित मन्त्र राष्ट्र में फैल तो नहीं जाता? आप अकेले मन्त्रणा तो नहीं करते, न बहुतों के साथ? निर्णय किया हुआ मन्त्र कार्य पूरा होने से पहले प्रजा तक तो नहीं पहुँचता? लाभकारी और सरल आरम्भ वाले कार्य को आप शीघ्र आरम्भ करते हैं, टालते तो नहीं? सहस्रों मूर्खों की अपेक्षा एक पण्डित को आप अधिक मानते हैं, क्योंकि अर्थसंकट में पण्डित ही महान् कल्याण कर सकता है।”
श्रीराम ने सेनापति, दूत, गुप्तचर, दुर्ग, कोष और प्रजा-पालन के विषय में भी पूछा, “शूर, बलवान्, युद्धविशारद वीरों का यथोचित सत्कार होता है? सेना को भोजन और वेतन ठीक समय पर मिलता है, उसमें विलम्ब तो नहीं? कठोर दण्ड से प्रजा अधिक उद्विग्न तो नहीं? जनपद का विद्वान्, दक्ष, प्रतिभाशाली, यथार्थवादी पण्डित ही दूत बनाया है? अठारह तीर्थों (राज्य के प्रमुख अधिकारियों) में शत्रु-पक्ष के अठारह और अपने पक्ष के पन्द्रह पर तीन-तीन अज्ञात गुप्तचरों से दृष्टि रखते हैं?”
“हे राघव ! आप वीर पूर्वजों से बसाई, सत्यनाम वाली, दृढ़ द्वारों वाली, हाथी-घोड़े-रथों से भरी, ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्यों से सहस्रों की संख्या में बसी समृद्ध अयोध्या की चारों ओर से रक्षा करते हैं? कृषि और गोरक्षा से जीने वाले वैश्य आपके प्रिय हैं? आय अधिक और व्यय कम है? कोष अपात्रों में तो नहीं जाता? निरपराध शुद्धात्मा लोभवश दण्डित तो नहीं होता, और अपराधी चोर धनलोभ से छूट तो नहीं जाता? मिथ्या दोष लगाए गए लोगों के आँसू राजा के पुत्र-पशु तक का नाश कर देते हैं।”
“हे विजयश्रेष्ठ ! आप अर्थ, धर्म और काम, इन तीनों का सेवन समय बाँटकर करते हैं? सब शास्त्रार्थ के ज्ञाता ब्राह्मण, पुरवासियों और जनपदवासियों सहित आपके कल्याण की कामना करते हैं? चौदह राजदोषों (नास्तिकता, असत्य, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, विद्वानों से विमुखता, आलस्य, पाँच इन्द्रियों की दासता, अकेले मन्त्रणा, कुबुद्धियों से सलाह, निश्चित कार्य का अनारम्भ, मन्त्र की अरक्षा, मंगल का अप्रयोग, और हर आने वाले के स्वागत में आसन से उठ खड़े होना) से बचते हैं?”
श्रीराम ने वेदों, कर्मों, सन्तान और शास्त्र-ज्ञान की सफलता पूछी, पूर्वजों का मार्ग अपनाने पर बल दिया, और कहा, “स्वादिष्ट भोजन अकेले तो नहीं खाते, याचक मित्रों को देते हैं? जो राजा धर्म से प्रजा का पालन करके, समस्त पृथ्वी पाकर यथार्थ रूप से राज्य करता है, वह विद्वान् क्षत्रिय इस नश्वर शरीर से अलग होकर स्वर्ग को जाता है।”
एक उप-कथा (पुत्र का अर्थ): बाद के सर्ग में श्रीराम राजर्षि गय का प्रसंग कहते हैं, “पुत्” नामक नरक से जो पिता की रक्षा करे, वही “पुत्र” कहलाता है (पितृ-त्राण से पुत्र)। इसी से अनेक गुणी पुत्रों की कामना की जाती है, कि उनमें से एक भी गया जाकर श्राद्ध करे और पिता को नरक से उबारे।
सार: श्रीराम ने भरत को गोद में बिठाकर पिता और सबकी कुशल पूछने के बहाने मन्त्रणा, सेना, कोष, दुर्ग, प्रजा-पालन, राजदोष और धर्म-अर्थ-काम के सन्तुलन पर विस्तृत राजनीति-उपदेश दिया।
भरत राज्य लौटाते हैं, श्रीराम पिता की आज्ञा को सर्वोपरि बताते हैं
तपस्वी-वेष से भरत को अपने प्रति प्रेम से भरा जानकर श्रीराम लक्ष्मण सहित पूछने लगे, “हे आर्य ! महान् दुष्कर कर्म करके आप चीर-जटा-मृगचर्म धारण किए इस प्रदेश में क्यों आए? राज्य छोड़कर वन में आने का कारण कहिए।” तब महात्मा काकुत्स्थ के आलिंगन में बँधे कैकेयीपुत्र भरत ने हाथ जोड़कर कहा,
“हे परंतप ! अपनी प्रिया और मेरी माता कैकेयी के कहने पर पिता ज्येष्ठ पुत्र का त्याग रूपी अत्यन्त दुष्कर कर्म करके, हम सबको छोड़कर, पुत्र-शोक से पीड़ित होकर स्वर्ग सिधार गए। हे आर्य ! उस माता ने अपना यश हरने वाला यह महान् पाप किया। राज्य का फल न पाकर मेरी विधवा माता शोक से कृश होकर महाघोर नरक में गिरेगी।”
“हे आर्य ! मुझ अपयशी दास पर कृपा कीजिए और आज ही इन्द्र के समान अयोध्या के राज्य पर अभिषिक्त हो जाइए। ये सब प्रजाएँ और जो मेरी विधवा माताएँ हैं, सब आपको प्रसन्न करने आई हैं। ज्येष्ठता के कारण आप ही राज्य के अधिकारी हैं; धर्मपूर्वक राज्य ग्रहण कर सुहृदों की कामना पूरी कीजिए। आप-जैसे पति को पाकर यह समुद्रवसना पृथ्वी अविधवा हो जाए, जैसे निर्मल चन्द्रमा से शरद की रात्रि। इन मन्त्रियों सहित मैं मस्तक झुकाकर याचना करता हूँ, भाई, शिष्य और दास इस मुझ पर कृपा कीजिए। यह शाश्वत पैतृक मन्त्रिमण्डल, जो आपका सम्मानित है, इसकी प्रार्थना का उल्लंघन न कीजिए।” इतना कहकर अश्रुपूर्ण भरत ने पुनः मस्तक से श्रीराम के चरण स्पर्श किए।
मतवाले हाथी की भाँति बार-बार साँसें भरते भरत को आलिंगन में लेकर श्रीराम बोले, “कुलीन, सत्त्वसम्पन्न, तेजस्वी, व्रतधारी मुझ-जैसा पुरुष राज्य के लिए पाप कैसे कर सकता है? हे अरिसूदन ! मैं आप में सूक्ष्म भी दोष नहीं देखता, और आप भी अज्ञानवश माता की निन्दा न कीजिए। हे महाप्राज्ञ ! योग्य पत्नी और पुत्रों के विषय में गुरुजनों का स्वतन्त्र अधिकार शास्त्रसम्मत है। हे सौम्य ! जैसे गृहस्थ की पत्नियाँ, सन्तान और शिष्य उसके अधीन माने जाते हैं, वैसे ही हम सब महाराज के अधीन हैं।”
“महाराज दशरथ मुझे वन में चीर-मृगचर्म पहनाकर रखें या राज्य पर बिठाएँ, वे सर्वथा समर्थ थे। पिता के समान ही लोकसम्मानित माता का भी आदर है। माता-पिता दोनों ने मुझे ‘वन जाइए’ कहा है, तो मैं और क्या करूँ? हे राघव ! लोकसम्मानित अयोध्या का राज्य आप भोगिए, और मैं चौदह वर्ष वल्कल पहनकर दण्डकारण्य में निवास करूँ। लोकों में पूज्य, इन्द्र-समान महात्मा पिता ने जो मुझे आदेश दिया, वही मेरे लिए परम हितकारी है, अविनाशी ब्रह्मलोक का स्वामित्व नहीं।”
समझने की कुंजी (पिता का दो आदेश): श्रीराम पिता के वचन को एक ही आज्ञा के दो भाग मानते हैं, पहला भाग ज्येष्ठ का वनवास, जो उन पर बँधा है; दूसरा भाग राज्य भरत को, जो भरत पर बँधा है। दोनों भाई अपने-अपने भाग का पालन करें, तभी पिता का सत्य पूरा होता है।
सार: भरत ने राज्य लौटाकर श्रीराम से अभिषेक की याचना की और कैकेयी को कोसा; श्रीराम ने कैकेयी की निन्दा रोकी, माता-पिता को सर्वोपरि बताया, और पिता की आज्ञा को दो भागों में बाँटकर अपने वनवास तथा भरत के राज्य को अनिवार्य घोषित किया।
भरत पिता के स्वर्गवास का समाचार देते हैं
श्रीराम के वचन सुनकर भरत बोले, “मुझ धर्म से वंचित को राजधर्म से क्या प्रयोजन? हे नरश्रेष्ठ ! हम सबमें यह शाश्वत धर्म स्थित है कि ज्येष्ठ पुत्र के रहते कनिष्ठ राजा नहीं होता। अतः हे राघव ! आप मेरे साथ समृद्ध अयोध्या लौटिए और इस कुल की उन्नति के लिए स्वयं को अभिषिक्त कीजिए। जिस राजा को लोग मनुष्य कहते हैं, पर जिसका धर्म-अर्थयुक्त आचरण अमानुष कहलाता है, वे मुझे देवतुल्य प्रतीत होते हैं।”
“मैं जब केकय देश में था और आप वन में, तब वह बुद्धिमान्, यज्ञशील, सत्पुरुषों के सम्मानित राजा स्वर्ग सिधार गए। सीता और लक्ष्मण सहित आपके अयोध्या से निकलते ही, दुःख-शोक से अभिभूत राजा त्रिदिव को चले गए। हे पुरुषव्याघ्र ! उठिए, पिता को जलांजलि दीजिए। मैं और यह शत्रुघ्न पहले ही उन्हें जल दे चुके हैं। प्रिय पुत्र का दिया हुआ जल पितृलोक में अक्षय होता है, ऐसा ज्ञानीजन कहते हैं; और आप तो पिता के परम प्रिय हैं। आप ही से बिछुड़े, आप ही का स्मरण और चिन्ता करते हुए, आप ही के दर्शन की इच्छा से शोकग्रस्त होकर पिता ने प्राण त्यागे।”
सार: भरत ने ज्येष्ठ के रहते कनिष्ठ के राजा न होने का कुलधर्म दुहराकर पुनः राज्य की प्रार्थना की, और महाराज दशरथ के राम-शोक में स्वर्गवास का समाचार सुनाते हुए श्रीराम से पिता को जलांजलि देने को कहा।
श्रीराम का मूर्च्छित होना और पितृ-तर्पण

पिता की मृत्यु का करुण समाचार सुनते ही श्रीराम मूर्च्छित होकर वहीं गिर पड़े। भरत के कहे वज्र-सरीखे अमनोज्ञ वचन सुनकर परंतप श्रीराम भुजाएँ उठाकर ऐसे भूमि पर गिरे जैसे वन में कुठार से कटा फूलों-भरा वृक्ष गिर पड़े। नदी-तट पर दाँत मारकर थके, थकान से सोए हाथी की भाँति शोक से आहत भूमि पर गिरे श्रीराम पर वैदेही सहित रोते हुए तीनों भाइयों ने जल छिड़का।
थोड़ी देर में संज्ञा पाकर श्रीराम नेत्रों से आँसू बहाते हुए करुण विलाप करने लगे। उन्होंने भरत से धर्मसंगत वचन कहा, “हे तात ! पिता दिष्ट गति को प्राप्त हो गए, तो अब मैं अयोध्या में क्या करूँगा? राजश्रेष्ठ दशरथ से रहित उस अयोध्या का पालन कौन करेगा? जो मेरे शोक से मरे और जिनका मैं संस्कार तक न कर सका, उन महात्मा पिता के लिए मैं अभागा अब क्या कर सकता हूँ? हे निष्पाप भरत ! आप कृतार्थ हैं, जिन्होंने और शत्रुघ्न ने राजा के सब प्रेतकृत्य सम्पन्न किए।”
“वनवास पूरा होने पर भी मेरा मन राजा-विहीन, बिखरी हुई अयोध्या लौटने को नहीं करेगा। हे परंतप ! पिता के परलोक चले जाने पर, वनवास पूरा कर लौटने पर मुझे कौन शिक्षा देगा? मेरा सदाचार देखकर पिता जो कानों को सुख देने वाली बातें कहते थे, वे अब किससे सुनूँगा?” यह कहकर श्रीराम पूर्णचन्द्र-मुखी अपनी पत्नी और लक्ष्मण की ओर मुड़े और शोक से सन्तप्त होकर बोले, “हे सीता ! आपके श्वशुर नहीं रहे। हे लक्ष्मण ! आप पितृहीन हो गए। भरत महाराज के स्वर्गवास का समाचार दे रहे हैं।” यह सुनकर सब राजकुमारों के नेत्रों में अश्रु उमड़ पड़े। श्वशुर के स्वर्गवास की बात सुनकर सीता अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपने प्रिय स्वामी की ओर देख तक न सकीं।
रोती हुई जनकनन्दिनी को सान्त्वना देकर दुःखी श्रीराम ने दुःखी लक्ष्मण से वहीं कहा, “इंगुदी का पिसा गूदा लाइए और एक ओढ़ने का चीर लाइए। मैं महात्मा पिता के जल-तर्पण के लिए नदी-तट चलूँगा। सीता आगे चलें, आप उनके पीछे रहें, मैं सबके पीछे चलूँगा; शोक के अवसर पर यही अत्यन्त कठोर रीति है।” तब आत्मज्ञानी, मृदु, संयमी, श्रीराम के अनन्य भक्त, पैतृक सेवक सुमन्त्र ने राजकुमारों सहित श्रीराम को सान्त्वना देकर, हाथ का सहारा देकर कल्याणमयी मन्दाकिनी तक उतारा।

कीचड़-रहित, शीघ्रगामी, शिवप्रद सुतीर्थ पर पहुँचकर सबने राजा के लिए जल छिड़कते हुए कहा, “हे तात ! आपको यह जल प्राप्त हो।” जल से भरी अंजलि लेकर, यमराज के अधिष्ठित दक्षिण दिशा की ओर मुख करके श्रीराम ने रोते हुए कहा, “हे राजशार्दूल ! पितृलोक को गए हुए आपको आज मेरा दिया यह निर्मल जल अक्षय रूप से प्राप्त हो।” फिर मन्दाकिनी-तट पर लौटकर भाइयों सहित श्रीराम ने पिता को पिण्ड-तर्पण किया। कुश की शय्या पर बेरों के साथ मिला इंगुदी का गूदा रखकर अत्यन्त आर्त श्रीराम रोते हुए बोले, “हे महाराज ! जिसे हम खाते हैं, उसी को प्रसन्न होकर ग्रहण कीजिए; जिस अन्न को मनुष्य खाता है, वही उसके देवताओं का अन्न होता है।”
नदी-तट से उसी मार्ग से ऊपर चढ़कर नरव्याघ्र श्रीराम रमणीय शिखर वाले चित्रकूट पर्वत पर आए और पर्णकुटी के द्वार पर पहुँचकर भरत और लक्ष्मण को दोनों हाथों से पकड़कर ऊँचे स्वर में रोने लगे। वैदेही सहित उन भाइयों के सिंह-गर्जना-से क्रन्दन की प्रतिध्वनि पर्वत में गूँज उठी।
उस तुमुल शब्द को सुनकर भरत के सैनिक डर गए और कहने लगे, “निश्चय ही भरत श्रीराम से मिल गए; यह चारों भाइयों के अपने मृत पिता के लिए शोक करने का महान् शब्द है।” वाहन छोड़कर सब सैनिक उसी दिशा को दौड़ पड़े। कोई घोड़ों पर, कोई हाथियों पर, कोई सजे रथों पर, और सुकुमार लोग पैदल ही चल पड़े। चित्रकूट की भूमि रथों के पहियों और खुरों से रौंदी जाकर मेघसंगम के समय आकाश-सी तुमुल ध्वनि करने लगी। उस शब्द से डरकर वन के हाथी हथिनियों सहित गन्ध से दिशाओं को सुवासित करते हुए दूसरे वन को चले गए; वराह, भेड़िये, सिंह, महिष, बाघ, गवय और चित्रित मृग भयभीत हो उठे; चक्रवाक, हंस, जलपक्षी, कोकिल और क्रौंच संज्ञा खोकर दिशाओं में उड़ चले।
सहसा लोगों ने वेदी पर बैठे यशस्वी निष्पाप नरव्याघ्र श्रीराम को देखा। कैकेयी और मन्थरा को कोसते हुए लोग श्रीराम के पास पहुँचकर अश्रुपूर्ण मुख हो गए। आँसुओं से भरी आँखों वाले उन अत्यन्त दुःखी जनों को देखकर धर्मज्ञ श्रीराम ने उन्हें पिता और माता के समान आलिंगन किया; किसी को गले लगाया, कोई उन्हें अभिवादन कर गया। मित्रों और बन्धुओं सहित सबका उन्होंने यथायोग्य आदर किया। उन महात्माओं के रोने का स्वर मृदंग की ध्वनि-सा पृथ्वी, आकाश, गिरि-गुफाओं और दिशाओं में निरन्तर गूँजता रहा।
सार: पिता की मृत्यु सुनकर श्रीराम मूर्च्छित हो गिरे, फिर विलाप करते हुए सीता-लक्ष्मण को समाचार सुनाया, मन्दाकिनी पर जलांजलि और इंगुदी-पिण्ड से पितृ-तर्पण किया; भाइयों के क्रन्दन से सेना दौड़ी आई और श्रीराम ने सबका यथायोग्य आदर किया।
माताओं का आगमन और सीता-कौसल्या मिलन
दशरथ की विधवाओं को आगे करके श्रीराम-दर्शन के प्यासे वसिष्ठ उस प्रदेश की ओर चले। मन्दाकिनी की ओर धीरे-धीरे जाती राजपत्नियों ने राम-लक्ष्मण द्वारा सेवित वह तीर्थ देखा। आँसुओं से भीगे, सूखे मुख वाली कौसल्या ने दीन सुमित्रा और अन्य रानियों से कहा, “उन अनाथ, राज्य से वंचित बालकों के लिए वन में यह पहली बार चुना गया तीर्थ है, जो आज कठिन जीवन बिता रहे हैं।”
“हे सुमित्रा ! इसी मार्ग से आपके पुत्र लक्ष्मण मेरे पुत्र के लिए सदा आलस्यरहित होकर स्वयं जल लाते हैं। आपके पुत्र ने यद्यपि निम्न सेवा की, पर वह निन्दनीय नहीं; ज्येष्ठ भाई के, जो पिता-समान है, उपयोग में न आने वाला सब कुछ गुणीजनों द्वारा निन्दित होता है। अब, जब ज्येष्ठ भाई शीघ्र अयोध्या लौट रहे हैं, तो आपका यह पुत्र भी यह कष्टप्रद नीच कर्म छोड़ दे।” तभी विशाललोचना कौसल्या ने भूमि पर दक्षिणाग्र कुश पर श्रीराम का पिता के लिए रखा हुआ इंगुदी-गूदा देखा।
उसे देखकर देवी कौसल्या सब रानियों से बोलीं, “इक्ष्वाकुनाथ महात्मा राघव का यह विधिपूर्वक दिया पितृ-तर्पण देखिए। देवतुल्य, समस्त भोग भोग चुके सम्राट के लिए मैं इस इंगुदी-गूदे का भोजन उचित नहीं मानती। चारों समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी भोग चुके, इन्द्र-समान सम्राट इंगुदी का गूदा कैसे ग्रहण करेंगे? इस लोक में मुझे इससे बड़ा दुःख कोई नहीं दिखता, जहाँ ऋद्धिमान् राम पिता को इंगुदी-गूदा अर्पित करें। राम का दिया यह इंगुदी-गूदा देखकर मेरा हृदय शोक से सहस्र टुकड़े क्यों नहीं हो जाता? किन्तु यह लौकिक श्रुति निश्चय ही सत्य प्रतीत होती है कि जिस अन्न पर मनुष्य रहता है, वही उसके देवताओं का अन्न होता है।”
आर्त कौसल्या को सान्त्वना देकर सहचरी रानियाँ आगे बढ़ीं और स्वर्ग से गिरे अमर-से श्रीराम को आश्रम में बैठे देखा। भोगों से वंचित श्रीराम को देखकर माताएँ शोक से कृश होकर ऊँचे स्वर में रोने लगीं। श्रीराम ने उठकर सब माताओं के चरण-कमल पकड़े। सत्यप्रतिज्ञ श्रीराम ने सब माताओं के, और सुमित्रापुत्र लक्ष्मण ने राम के तुरन्त बाद, उन्हें प्रणाम किया। सुन्दर हाथों से, जिनकी अँगुलियों के मूल अत्यन्त कोमल थे, उन विशाललोचना देवियों ने श्रीराम की पीठ से धूल पोंछी। जैसा श्रीराम के साथ, वैसा ही शुभलक्षण लक्ष्मण के साथ सब रानियों ने व्यवहार किया।
सीता ने भी दुःखी होकर सब सासों के चरण पकड़े और अश्रुपूर्ण नेत्रों से उनके सामने खड़ी रहीं। कौसल्या ने उन्हें पुत्री की भाँति आलिंगन कर वनवास से कृश दीन सीता से कहा, “वैदेहराज की पुत्री और दशरथ की पुत्रवधू, राम की पत्नी इस निर्जन वन में दुःख कैसे झेल रही हैं? हे वैदेही ! आपका सूर्यताप से झुलसे कमल-सा, मसले हुए कुमुद-सा, धूलि-मलिन स्वर्ण-सा और बादल-ढके चन्द्रमा-सा मुख देखकर, विपत्ति की अरणि से उत्पन्न शोक मुझे वैसे ही जलाता है जैसे अग्नि अपने आश्रय को।”
आर्त माता के यों कहते-कहते भरत के अग्रज श्रीराम ने वसिष्ठ के चरण पकड़े। अग्नि-समान तेजस्वी पुरोहित के चरणों को वैसे ही पकड़कर, जैसे इन्द्र बृहस्पति के, श्रीराम उन्हीं के साथ बैठ गए। तब धर्मज्ञश्रेष्ठ, धर्मवान् भरत भी अपने मन्त्रियों, पुरप्रधानों और सैनिकों के साथ ज्येष्ठ भ्राता के पीछे बैठ गए। तपस्वी-वेष में श्रीतेज से दीप्त राघव को देखकर पासवाले भरत ने वैसे ही हाथ जोड़े जैसे महेन्द्र प्रजापति ब्रह्मा के सामने।
वहाँ बैठे आर्यजनों में बड़ी उत्कण्ठा उठी कि श्रीराम को प्रणाम और सत्कार करके भरत आज क्या भली बात कहेंगे। सुहृदों से घिरे सत्यधृति राघव, महानुभाव लक्ष्मण और धार्मिक भरत यज्ञभूमि में सदस्यों सहित तीन अग्नियों (गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि) के समान शोभा पा रहे थे।
सार: वसिष्ठ माताओं को लेकर आश्रम आए; मार्ग में कौसल्या ने श्रीराम का दिया इंगुदी-तर्पण देखकर विलाप किया; आश्रम में राम-लक्ष्मण ने माताओं को प्रणाम किया, सीता सासों के चरणों में गिरीं, और श्रीराम वसिष्ठ के चरण छूकर बैठ गए।
भरत की पुनः याचना और श्रीराम का संसार-नश्वरता उपदेश
सुहृदों से घिरे उन पुरुषसिंहों की वह रात शोक में बीती। प्रातःकाल मन्दाकिनी में हवन-जप करके भाई सुहृदों सहित श्रीराम के पास आए। सब मौन बैठे रहे, किसी ने कुछ न कहा। तब भरत ने सुहृदों के बीच श्रीराम से कहा, “मेरी माता को आपने सान्त्वना दी और यह राज्य मुझे दिया; उसे मैं आपको ही लौटाता हूँ। इस निष्कण्टक राज्य को आप भोगिए।”
“जैसे वर्षा में जल के महावेग से टूटा बाँध सहज नहीं बँधता, वैसे ही यह विशाल राज्य आपके सिवा किसी और से सहज नहीं सम्भलेगा। जैसे गधे में घोड़े की चाल और साधारण पक्षी में गरुड़ की उड़ान की शक्ति नहीं, वैसे ही, हे महीपते ! आपकी गति का अनुसरण करने की सामर्थ्य मुझ में नहीं। हे राम ! जिस पर दूसरे निर्भर हों, उसका जीवन सुखमय है; जो दूसरों पर निर्भर हो, उसका जीवन कष्टमय।”
“जैसे मनुष्य का लगाया-सींचा वृक्ष विशाल होकर बौने के लिए दुरारोह हो जाता है, और फूलने पर भी फल न दे तो लगाने वाला वह प्रीति नहीं पाता जिसके लिए उसने उसे लगाया, यही उपमा है, हे महाबाहो ! जब आप, हमारे स्वामी वृषभ, हम सेवकों को इस अवसर पर शासन नहीं देना चाहते। हे महाराज ! श्रेणियाँ और व्यापारी-प्रमुख आपको सिंहासन पर सूर्य-सा प्रतापी देखें; आपकी अयोध्या-यात्रा में मतवाले हाथी गर्जें और अन्तःपुर की स्त्रियाँ हर्षित हों।” नागरिकों ने ‘साधु-साधु’ कहकर भरत के वचन की प्रशंसा की।

दुःखी विलाप करते यशस्वी भरत को देखकर कृतात्मा, आत्मवान् श्रीराम ने सान्त्वना दी, “मनुष्य अपने पर स्वतन्त्र नहीं, अनीश्वर है; नियति उसे इधर-उधर खींचती है। सब संचय क्षय में, सब उन्नतियाँ पतन में, सब संयोग वियोग में, और सब जीवन मृत्यु में अन्त पाते हैं। जैसे पके फल को गिरने के सिवा कोई भय नहीं, वैसे ही जन्मे मनुष्य को मृत्यु के सिवा कोई भय नहीं। जैसे दृढ़ खम्भों वाला घर भी जीर्ण होकर ढह जाता है, वैसे ही जरा-मृत्यु के वश मनुष्य गिरते हैं।”
“जो रात्रि बीत जाती है वह लौटती नहीं; यमुना जल-पूर्ण समुद्र में मिल ही जाती है। ग्रीष्म की किरणें जैसे जल सोख लेती हैं, वैसे ही बीतते दिन-रात सब प्राणियों की आयु शीघ्र क्षीण कर देते हैं। अपने लिए शोक कीजिए, दूसरे के लिए क्यों? घर में रहते हों या परदेश गए हों, सबकी आयु प्रति क्षण घटती है। मृत्यु हमारे साथ चलती, बैठती और बहुत दूर जाकर भी साथ लौटती है। शरीर पर झुर्रियाँ और बाल श्वेत हो जाते हैं; जरा से जीर्ण मनुष्य उन्हें किस उपाय से रोके?”
“मनुष्य सूर्योदय और सूर्यास्त पर हर्षित होते हैं, पर अपने जीवन का क्षय नहीं समझते। ऋतु को नया देखकर हर्षित होते हैं, पर ऋतु-परिवर्तन के साथ प्राण-क्षय नहीं देखते। जैसे महासागर में दो काठ मिलकर कुछ काल बाद बिछुड़ जाते हैं, वैसे ही पत्नी, पुत्र, बन्धु और धन मिलकर बिछुड़ जाते हैं; उनका वियोग निश्चित है। कोई प्राणी अपनी जन्म-मृत्यु की गति टाल नहीं सकता; इसीलिए मृत के लिए शोक करने वाले में उसे टालने की सामर्थ्य नहीं।”
“जैसे मार्ग में खड़ा कोई यात्रियों के समूह से कहे ‘मैं भी आप लोगों के पीछे आता हूँ’, वैसे ही पूर्वज जिस अटल मार्ग पर गए, उस पर पहुँचा हुआ अपने पितरों के लिए कैसे शोक करे? बहती जलधारा-सी न लौटने वाली आयु को देखकर आत्मा को सुख (कल्याण) में लगाना चाहिए। हमारे पिता धर्मात्मा थे; अत्यन्त शुभ यज्ञ करके, प्रचुर दक्षिणा देकर, सब पाप धोकर स्वर्ग गए। भृत्यों के भरण, प्रजा के पालन और धर्म से कर-संग्रह के कारण पिता स्वर्ग गए। उत्तम आयु और भोग पाकर सत्पुरुषों के सम्मानित स्वर्ग को गए राघव शोक के योग्य नहीं। जीर्ण मानव-देह त्यागकर हमारे पिता ब्रह्मलोक में विहार करने वाली दिव्य ऋद्धि को प्राप्त हुए हैं।”
“आप-जैसा या मुझ-जैसा श्रुतवान्, बुद्धिमान् कोई भी ऐसे सम्राट के लिए शोक न करे। धीर-बुद्धिमान् को सब अवस्थाओं में ये नाना शोक, विलाप और रुदन त्यागने चाहिए। अतः स्वस्थ हो जाइए, शोक न कीजिए, और अयोध्या लौटकर वहीं निवास कीजिए; जितेन्द्रिय पिता ने आपको यही आदेश दिया है। हे नरश्रेष्ठ ! आप अपने स्वभाव के अनुसार आत्म-कल्याण में लगिए और पिता दशरथ के शुभ आचरण का स्मरण कीजिए।” यह अर्थपूर्ण उपदेश देकर महात्मा प्रभु श्रीराम क्षण भर में मौन हो गए।
सार: भरत ने वृक्ष और बाँध की उपमाओं से पुनः राज्य की याचना की; श्रीराम ने नियति की प्रबलता, संयोग-वियोग और जन्म-मृत्यु की अनिवार्यता का गम्भीर उपदेश देकर भरत को सान्त्वना दी और अयोध्या लौटने को कहा।
भरत की प्रतिज्ञा और माताओं की प्रार्थना
अर्थपूर्ण वचन कहकर श्रीराम के मौन होने पर धार्मिक भरत ने मन्दाकिनी-तट पर प्रजावत्सल श्रीराम से अद्भुत धर्मयुक्त वचन कहा, “हे अरिंदम ! इस संसार में आप-जैसा कौन होगा? न दुःख आपको व्यथित करता, न सुख आपको हर्षित करता। वृद्धों के सम्मानित होकर भी आप अपने सन्देह उन्हीं से पूछते हैं। जिसकी ऐसी बुद्धि हो कि जीते हुए भी मृततुल्य, और सत् तथा असत् में समान भाव रखे, वह किसलिए परिताप करे? हे मनुजाधिप ! आप-जैसा पर-अपर का ज्ञाता विपत्ति पाकर भी खिन्न न हो।”

“देवतुल्य सत्त्ववान्, महात्मा, सत्यप्रतिज्ञ, सर्वज्ञ, सर्वदर्शी और बुद्धिमान् आप-जैसे को असह्य दुःख नहीं छूना चाहिए। मेरे प्रवास में मेरी क्षुद्र माता ने मेरे लिए जो पाप किया, वह मुझे अनिष्ट था; आप मुझ पर प्रसन्न हों। धर्म के बन्धन से बँधा हूँ, इसी से दण्ड-योग्य पापिनी माता को तीव्र दण्ड से नहीं मारता। शुभ अभिजन और कर्म वाले दशरथ का पुत्र होकर, धर्म-अधर्म जानते हुए, मातृवध-सा निन्दित कर्म कैसे करूँ?”
“पिता क्रियावान्, वृद्ध, राजा और देवता थे, परलोक सिधार गए; उन्हें मैं सभा में निन्दित नहीं करता। मरणकाल में प्राणी मोहित हो जाते हैं, यह पुरानी श्रुति राजा ने ऐसा करके प्रत्यक्ष कर दी। शुभ उद्देश्य से, पिता का क्रोध-मोह-साहस से किया अतिक्रमण आप ठीक कर दीजिए। जो पुत्र पिता के अतिक्रमण को सुधारता है, वही संसार में सच्चा पुत्र माना जाता है। अतः आप सच्चे पुत्र बनिए, पिता के दुष्कृत का अनुमोदन मत कीजिए। कैकेयी, मुझे, पिता, सुहृदों, बन्धुओं और सब पुरवासी-जनपदवासियों की रक्षा के लिए मेरी यह प्रार्थना स्वीकार कीजिए।”
“वन और क्षात्रधर्म में, जटा और प्रजा-पालन में क्या मेल? क्षत्रिय का प्रथम धर्म अभिषेक है, जिससे प्रजा-पालन सम्भव होता है। प्रत्यक्ष फल देने वाला कर्तव्य छोड़कर संशयग्रस्त, अनिश्चित धर्म कौन क्षत्रिय करेगा? यहीं सब प्रकृतियाँ मन्त्रज्ञ वसिष्ठ आदि ऋत्विजों सहित आपका अभिषेक करें। हमसे अभिषिक्त होकर, मरुतों से अभिषिक्त इन्द्र की भाँति, लोकों को जीतकर अयोध्या के पालन को चलिए। देव-ऋषि-पितृ के तीन ऋण चुकाते, शत्रुओं का नाश और सुहृदों को सन्तुष्ट करते हुए आप वहीं मुझे शासन दीजिए। आज मित्र हर्षित हों, शत्रु डरकर भागें। मेरा और मेरी माता का अपयश पोंछकर, और पिता को पाप से बचा लीजिए।”
“मैं मस्तक झुकाकर याचना करता हूँ; मुझ पर और सब बन्धुओं पर वैसे ही कृपा कीजिए जैसे महेश्वर सब प्राणियों पर। अथवा मेरी प्रार्थना अनसुनी कर यदि आप वन में ही रहेंगे, तो मैं भी आपके साथ वन ही चलूँगा।” इस प्रकार भरत के मस्तक झुकाकर मनाने पर भी, पिता के वचन में दृढ़ श्रीराम का मन अयोध्या लौटने को न हुआ। श्रीराम की वह अद्भुत स्थिरता देखकर अयोध्यावासी हर्ष और दुःख दोनों से भर गए, राम के न जाने से दुःखी, और प्रतिज्ञा की दृढ़ता से हर्षित। ऋत्विज, नागरिक, यूथप्रधान और संज्ञाहीन-सी आँसू बहाती माताएँ, सब ने भरत की सराहना की और श्रीराम को प्रणाम कर भरत के साथ याचना में सम्मिलित हो गए।
सार: भरत ने श्रीराम की समता-स्थिरता सराहकर, सच्चे पुत्र का धर्म और क्षात्रधर्म का तर्क देकर अभिषेक की याचना की और न मानने पर साथ वन चलने की बात कही; पर श्रीराम अडिग रहे, और माताएँ-नागरिक भी भरत के साथ प्रार्थना में जुट गए।
कैकेयी को दिए वरदान और पिता का सत्य
फिर वैसा ही कहते भरत को ज्ञातिजनों में सम्मानित श्रीमान् श्रीराम ने उत्तर दिया, “हे भरत ! आपका कथन उचित है। पहले, आपकी माता को विवाहते समय हमारे पिता ने आपके मातामह को राज्य-शुल्क के रूप में आपके वंश के लिए राज्य देने का वचन दिया था। फिर देवासुर-संग्राम में आपकी माता ने पिता की सहायता की, तो प्रसन्न होकर राजा ने उन्हें वर दिया। तब आपकी यशस्विनी माता ने प्रतिज्ञाबद्ध करके दो वर माँगे, एक आपके लिए राज्य, और दूसरा मेरे लिए वनवास; और राजा ने वे वर दे दिए।”
“इसी कारण, हे पुरुषर्षभ ! मुझे पिता ने चौदह वर्ष वन में रहने की आज्ञा दी। निष्प्रतिद्वन्द्व मैं, पिता के सत्य में स्थित रहकर, लक्ष्मण और सीता सहित इस निर्जन वन में आया हूँ। हे राजेन्द्र ! आप भी पिता के वचन को सत्य करने के लिए शीघ्र अभिषिक्त हो जाइए। मेरे लिए राजा को इस ऋण से मुक्त कीजिए, पिता को बचाइए और माता को आनन्दित कीजिए।”
श्रीराम ने राजर्षि गय का प्रसंग सुनाया कि “पुत्” नामक नरक से जो पिता की रक्षा करे, वही “पुत्र” कहलाता है; इसी से अनेक गुणी पुत्रों की कामना होती है कि एक भी गया जाकर श्राद्ध करे। “अतः हे नरश्रेष्ठ ! आप पिता को नरक से बचाइए। हे वीर ! शत्रुघ्न सहित और सब ब्राह्मणों सहित अयोध्या लौटकर प्रजा का पालन कीजिए। मैं भी सीता और लक्ष्मण सहित अविलम्ब दण्डकारण्य में प्रवेश करूँगा। हे भरत ! आप मनुष्यों के राजा बनिए, मैं वन्य पशुओं का राजा बनूँगा। आप अयोध्या जाइए, मैं दण्डक में जाऊँगा। राजछत्र आपके सिर पर शीतल छाया करे, और मैं इन वन-वृक्षों की सघन छाया का सहारा लूँगा। अद्वितीय बुद्धि वाले शत्रुघ्न आपके सहायक हों और लक्ष्मण मेरे प्रधान मित्र। हम चारों श्रेष्ठ पुत्र पिता को सत्य में स्थित रखें; आप खिन्न न हों।”
समझने की कुंजी (राज्य-शुल्क और देवासुर-वर): श्रीराम भरत को बताते हैं कि कैकेयी की माँग केवल स्वार्थ नहीं थी; विवाह के समय कैकेयी के पिता को दिया वचन और देवासुर-संग्राम में मिले वर, दोनों पिता पर ऋण थे। इन्हें चुकाना पिता का सत्य बचाना है।
सार: श्रीराम ने राज्य-शुल्क और देवासुर-वर का इतिहास बताकर सिद्ध किया कि पिता को सत्य पर बनाए रखना दोनों भाइयों का धर्म है, और भरत को अयोध्या का राजा बनकर पिता को ऋण-मुक्त करने को कहा।
जाबालि का नास्तिक-वाद और श्रीराम का खण्डन
भरत को सान्त्वना देते श्रीराम से ब्राह्मणश्रेष्ठ जाबालि ने वेदविरुद्ध वचन कहा, “हे राघव ! आप-जैसे आर्यबुद्धि तपस्वी को साधारण मनुष्य-सी यह व्यर्थ बुद्धि शोभा नहीं देती। कौन किसका बन्धु है, किसको किससे क्या मिलता है? प्राणी अकेला जन्म लेता और अकेला नष्ट होता है। जो ‘यह माता-पिता है’ कहकर आसक्त होता है, उसे उन्मत्त समझिए; कोई किसी का सम्बन्धी नहीं। जैसे यात्री दूसरे गाँव जाते हुए किसी आवास में ठहरकर अगले दिन आगे चल देता है, वैसे ही माता-पिता, घर और धन मनुष्य के लिए मात्र आवास हैं; विवेकी इनसे आसक्त नहीं होते।”
“पिता का राज्य त्यागकर आप दुःखमय, विषम, काँटों-भरे कुपथ पर मत चलिए। समृद्ध अयोध्या में स्वयं को अभिषिक्त कीजिए; नगरी एक वेणी धारण किए (शोकमयी विधवा-सी) आपकी प्रतीक्षा कर रही है। हे राजकुमार ! इन्द्र के स्वर्ग-विहार की भाँति आप अयोध्या में राजभोग भोगिए। दशरथ आपके कोई नहीं थे, आप उनके कोई नहीं; राजा अन्य थे, आप अन्य हैं, अतः जो कहा जा रहा है वही कीजिए। पिता तो प्राणी का बीजमात्र है। राजा जहाँ जाना था वहाँ (पंचभूतों में) गए; आप व्यर्थ कष्ट पा रहे हैं।”
जाबालि ने और कहा, “मैं उन्हीं के लिए शोक करता हूँ जो अर्थ-धर्म में लगे रहे, अन्य के लिए नहीं; क्योंकि वे इस जीवन में कष्ट पाकर परलोक में नाश को प्राप्त हुए। ‘अष्टका आदि श्राद्ध पितरों को तृप्त करते हैं’, इस विश्वास से लोग प्रवृत्त हैं; पर देखिए अन्न का अपव्यय, मरा हुआ क्या खाएगा? यदि एक का खाया दूसरे की देह तक पहुँचता हो, तो परदेश जाने वालों के लिए श्राद्ध भेज दिया जाए, उन्हें मार्ग-भोजन की आवश्यकता न रहे। ये ग्रन्थ दान को प्रोत्साहित करने को मेधावियों ने रचे हैं, ‘यज्ञ कीजिए, दान दीजिए, दीक्षा लीजिए, तप कीजिए, त्याग कीजिए।’ हे महामते ! इसी निश्चय पर पहुँचिए कि इस दृश्य जगत् के परे कुछ नहीं। जो प्रत्यक्ष है उसी का आश्रय लीजिए।”
जाबालि के वचन सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीराम ने वेद की उत्तम सूक्ति से, उनके मत के विरुद्ध दृढ़ बुद्धि से उत्तर दिया, “आपने मेरे प्रिय के लिए जो कहा, वह करने योग्य न होकर भी वैसा प्रतीत होता है, और अपथ्य होकर भी पथ्य-सा। मर्यादा-रहित, पापाचारी, भिन्न-चरित्र वाला पुरुष सत्पुरुषों में आदर नहीं पाता। चरित्र ही बताता है कि कोई कुलीन है या अकुलीन, शूर है या केवल शूरता का अभिमानी, शुद्ध है या अशुद्ध।”
“आपके बताए मार्ग पर चलने वाला आर्य-वेष में अनार्य, शुद्ध-सा अशुद्ध, सुलक्षण-सा कुलक्षण, और शीलवान्-सा दुःशील होगा। यदि मैं धर्म के वेष में लोक-संकर करने वाला अधर्म अपनाऊँ, तो शुभ क्रिया छोड़कर अविधिक कर्म करूँगा। कौन विवेकी मुझे, कुचरित्र और लोकदूषक जानकर, सम्मान देगा? यदि वनवास-व्रत त्यागकर ऐसी आचरणहीन वृत्ति से चलूँ, तो किसके आचरण का अनुसरण कर स्वर्ग पाऊँ? जैसे राजा आचरण करते हैं, वैसी ही प्रजा हो जाती है।”
“क्रूरता-रहित सत्य ही राजाओं का सनातन धर्म है; अतः राज्य सत्यात्मक है और लोक सत्य पर ही टिका है। ऋषियों और देवों ने सत्य को ही माना; सत्यवादी अक्षय परम पद पाता है। असत्यवादी से लोग वैसे ही डरते हैं जैसे साँप से। सत्य ही धर्म का मूल है, सत्य ही लोक में ईश्वर है, सत्य से बढ़कर कोई पद नहीं। दान, यज्ञ, हवन, तप और वेद, सब सत्य पर आधारित हैं; अतः सत्यपरायण रहना चाहिए।”
“मैं सब जानता हूँ, तो पिता का सत्य-प्रतिज्ञ आदेश क्यों न पालूँ? न लोभ से, न मोह से, न अज्ञान से मैं गुरु (पिता) के सत्य का सेतु तोड़ूँगा। जिसने पिता की प्रतिज्ञा का बन्धन तोड़ा, उसके देव-पितर हवि नहीं स्वीकारते। पिता की दी हुई वन-निवास की प्रतिज्ञा छोड़कर मैं भरत का कहा कैसे करूँ? मैंने पिता और देवी कैकेयी के समक्ष दृढ़ प्रतिज्ञा की थी, जिसे सुनकर कैकेयी प्रसन्न हुई थीं। हे जाबालि ! आपको मेरे पिता ने अपना मन्त्री-पुरोहित बनाया, इस कर्म की मैं निन्दा करता हूँ; आप-जैसे नास्तिक, धर्ममार्ग से भटके पुरुष का संग करना उचित न था।”
“जो चोर के समान दण्डनीय है, वैसा ही नास्तिक भी; बुद्धिमान् को नास्तिक के सम्मुख तक न होना चाहिए। आपसे पहले के लोगों और ब्राह्मणों ने वेद के अनुसार अनेक शुभ कर्म किए; इसी से ब्राह्मण अहिंसा, सत्य, तप, दान और हवन करते हैं। धर्म में रत, सत्पुरुषों के समान, तेजस्वी, दानशील, अहिंसक और निर्मल मुनि ही लोक में पूज्य होते हैं।”
क्रोधपूर्वक बोलते अदीनसत्त्व श्रीराम से जाबालि ने पुनः सत्य, पथ्य और आस्तिक वचन कहा, “मैं नास्तिकों के वचन नहीं कहता; न मैं नास्तिक हूँ, न यह सत्य कि कुछ नहीं है। समय देखकर मैं आस्तिक बन जाता हूँ, समय आने पर पुनः नास्तिक की भाँति बोल देता हूँ। हे राम ! वह समय आ गया था जब आपको वनवास से लौटाने और मनाने के लिए मैंने वह नास्तिक-वचन कहा।”
सार: जाबालि ने नास्तिक-तर्क देकर श्रीराम को राज्य लेने को उकसाया; श्रीराम ने सत्य को धर्म और लोक का मूल बताकर उसका खण्डन किया, और जाबालि ने अन्ततः स्वीकार किया कि उसने केवल श्रीराम को लौटाने के लिए वह वाद रचा था।
वसिष्ठ का इक्ष्वाकु-वंश और ज्येष्ठ-अभिषेक का विधान
श्रीराम को क्रुद्ध जानकर राजपुरोहित वसिष्ठ ने जाबालि की ओर से कहा, “जाबालि भी इस लोक की गति-आगति (जन्म-मरण के क्रम) को जानते हैं; आपको लौटाने की इच्छा से ही उन्होंने ऐसा कहा। हे लोकनाथ ! मुझसे सृष्टि की उत्पत्ति सुनिए। आरम्भ में सब जल ही था, उसी में पृथ्वी रची गई; फिर देवताओं सहित स्वयम्भू ब्रह्मा प्रकट हुए। वराह रूप धरकर उन्होंने पृथ्वी का उद्धार किया और कृतात्मा पुत्रों सहित समस्त जगत् रचा।”
वसिष्ठ ने वंश-क्रम सुनाया, आकाश से ब्रह्मा, ब्रह्मा से मरीचि, मरीचि से कश्यप, कश्यप से विवस्वान्, विवस्वान् से मनु, और मनु से इक्ष्वाकु, जो अयोध्या के प्रथम राजा हुए। इक्ष्वाकु से कुक्षि, कुक्षि से विकुक्षि, उससे बाण, उससे अनरण्य, जिसके राज्य में न दुर्भिक्ष था न चोर। फिर पृथु, फिर त्रिशंकु, जो सत्यप्रतिज्ञ विश्वामित्र के बल से सशरीर स्वर्ग गए; उनसे धुन्धुमार, फिर युवनाश्व, फिर मान्धाता, फिर सुसन्धि, फिर ध्रुवसन्धि और प्रसेनजित्।
ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत, उनसे असित। असित को हैहय, तालजंघ और शशबिन्दु शत्रु मिले; पराजित होकर राजा वनवासी हुए। उनकी दो गर्भवती रानियों में से एक ने सौत के गर्भ-नाश के लिए विष दिया; भृगुनन्दन च्यवन के वर से दूसरी रानी कालिन्दी ने उसी विष के साथ पुत्र को जन्म दिया, इसी से वह सगर (विष-सहित) कहलाया। सगर वही राजा थे जिन्होंने अपने पुत्रों से समुद्र खुदवाया। सगर के ज्येष्ठ असमंज पापकर्मी थे, अतः जीवित पिता ने ही उन्हें त्याग दिया; असमंज के पुत्र अंशुमान्, फिर दिलीप, फिर भगीरथ।
भगीरथ से ककुत्स्थ, जिनके नाम से वंशज काकुत्स्थ कहलाए; ककुत्स्थ से रघु, जिनसे राघव कहलाए। रघु के पुत्र प्रवृद्ध (कल्माषपाद, सौदास), फिर शंखण, फिर सुदर्शन, फिर अग्निवर्ण, फिर शीघ्रग, फिर मरु, फिर प्रशुश्रुव, फिर अम्बरीष, फिर नहुष, फिर नाभाग, फिर अज और सुव्रत; अज से धर्मात्मा राजा दशरथ।
वसिष्ठ बोले, “उन्हीं के आप ज्येष्ठ पुत्र, राम नाम से विख्यात उत्तराधिकारी हैं; अतः अपना राज्य ग्रहण कर संसार की रक्षा कीजिए। इक्ष्वाकुओं में ज्येष्ठ पुत्र ही राजा होता है; ज्येष्ठ के रहते कनिष्ठ कभी अभिषिक्त नहीं होता। राघवों के इस सनातन कुलधर्म का आज उल्लंघन न कीजिए। पिता के समान महायशस्वी आप रत्नभरी, बहुराष्ट्र वाली पृथ्वी का शासन कीजिए।”
समझने की कुंजी (ज्येष्ठ-अभिषेक का कुलधर्म): वसिष्ठ का सारा वंश-इतिहास इसी निष्कर्ष पर पहुँचता है कि इक्ष्वाकुवंश में ज्येष्ठ पुत्र ही राजा होता है। यह उपदेश राम को कुल-परम्परा के नाते राज्य लेने को प्रेरित करता है।
सार: वसिष्ठ ने ब्रह्मा से दशरथ तक का इक्ष्वाकु-वंश-क्रम सुनाकर बताया कि इस वंश में ज्येष्ठ पुत्र ही राजा होता है, और श्रीराम को ज्येष्ठ होने के नाते राज्य ग्रहण कर पृथ्वी का शासन करने को कहा।
गुरु से माता-पिता की श्रेष्ठता और भरत का प्रायोपवेश
श्रीराम से ऐसा कहकर राजपुरोहित वसिष्ठ ने पुनः धर्मयुक्त वचन कहा, “हे काकुत्स्थ ! मनुष्य के लिए आचार्य, पिता और माता, ये तीनों सदा पूज्य होते हैं। पिता तो इस पुरुष को केवल उत्पन्न करता है, पर आचार्य प्रज्ञा देता है, इसी से वह गुरु (श्रेष्ठ) कहलाता है। हे परंतप ! मैं आपके पिता का और आपका भी आचार्य हूँ; मेरा कहना मानकर आप सत्पुरुषों के मार्ग का उल्लंघन नहीं करेंगे। ये परिषद्, ज्ञातिजन और राजा सब उपस्थित हैं; इनके प्रति धर्म निभाकर आप सन्मार्ग नहीं छोड़ेंगे। धर्मशील वृद्ध माता के प्रति कर्तव्य निभाइए; भरत की याचना मानकर भी आप अपनी मर्यादा का अतिक्रमण नहीं करेंगे।”
गुरु के मधुर वचन सुनकर श्रीराम ने बैठे हुए वसिष्ठ को उत्तर दिया, “माता-पिता पुत्र के लिए जो करते हैं (यथाशक्ति देना, सुलाना, उबटन लगाना, सदा प्रिय बोलना और पोषण करना), वह सहज नहीं चुकाया जा सकता। राजा दशरथ मेरे जन्मदाता पिता थे; उन्होंने जो आज्ञा दी, वह मिथ्या नहीं होगी।” यह सुनकर विशाल वक्षःस्थल वाले भरत अत्यन्त दुःखी होकर सारथि सुमन्त्र से बोले, “हे सारथे ! यहाँ इस समतल भूमि पर शीघ्र कुश बिछाइए; मैं आर्य के द्वार पर तब तक प्रायोपवेश (अनशन-संकल्प से बैठना) करूँगा जब तक वे मुझ पर प्रसन्न न हों। ऋण न लौटाने वाले देनदार के कारण धन गँवा बैठे निर्धन ब्राह्मण की भाँति, बिना अन्न-जल, मुख ढके, मैं श्रीराम की कुटी के सामने तब तक पड़ा रहूँगा जब तक वे अयोध्या न लौटें।”

सुमन्त्र को श्रीराम की ओर देखते पाकर दुःखी भरत स्वयं अपने हाथों कुश बिछाकर भूमि पर बैठ गए। तब राजर्षिश्रेष्ठ महातेजस्वी श्रीराम ने कहा, “हे तात भरत ! मैंने आपका क्या अपराध किया कि आप मेरे विरुद्ध प्रायोपवेश कर रहे हैं? द्वार पर लेटकर लोगों को रोकना ब्राह्मण का अधिकार है, मूर्धाभिषिक्त क्षत्रियों का नहीं। उठिए, यह कठोर व्रत छोड़कर शीघ्र अयोध्या लौटिए।” किन्तु भरत वहीं बैठे रहे और पुरवासी-जनपदवासियों से बोले, “आप लोग मेरे आर्य से क्यों नहीं प्रार्थना करते?”
वे लोग बोले, “हम जानते हैं कि आप ठीक कह रहे हैं; पर ये महाभाग श्रीराम भी पिता के वचन में स्थित हैं, इसी से हम इन्हें सहज नहीं लौटा सकते।” यह सुनकर श्रीराम ने कहा, “हे भरत ! धर्मदर्शी सुहृदों का यह वचन सुनिए। उठिए, हे महाबाहो ! मुझे और जल को स्पर्श कर लीजिए (व्रत-त्याग के संकल्प-रूप में)।” तब भरत ने उठकर जल स्पर्श कर कहा, “परिषद् और मन्त्री सुनें, मैंने न पिता से राज्य माँगा, न माता को ऐसा करने को कहा, न राघव के वनवास का अनुमोदन किया; ये परमधर्मज्ञ हैं। यदि पिता का वचन पालना ही है और वन में रहना ही है, तो चौदह वर्ष मैं ही वन में रहूँगा।”
भाई की सच्ची प्रतिज्ञा सुनकर विस्मित धर्मात्मा श्रीराम ने पुरवासी-जनपदवासियों को देखकर कहा, “जीवित पिता ने जो विक्रय, धरोहर या क्रय किया, उसे मैं या भरत मिटा नहीं सकते। वनवास में मैं किसी प्रतिनिधि (उपाधि) को नहीं भेज सकता, क्योंकि यह निन्दित होगा; प्रतिनिधि तभी भेजा जाता है जब मूल व्यक्ति असमर्थ हो। कैकेयी की माँग उचित थी और पिता ने वर देकर सत्कर्म किया। मैं भरत को क्षमाशील और गुरुजनों का सत्कार करने वाला जानता हूँ; सत्यप्रतिज्ञ इस महात्मा के साथ सब कल्याण होगा। वन से लौटकर मैं इसी धर्मशील भाई के साथ पृथ्वी का उत्तम स्वामी बनूँगा। कैकेयी ने राजा से वर माँगा, उनका वचन मैंने पूरा किया; अब आप उन महीपति पिता को राज्य करके असत्य से मुक्त कीजिए।”
समझने की कुंजी (प्रायोपवेश और उपाधि): भरत ने ब्राह्मणों की रीति “प्रायोपवेश” (किसी के द्वार पर अनशन-संकल्प से बैठना) अपनाई, पर श्रीराम ने इसे क्षत्रिय के लिए अनुचित बताया। साथ ही “उपाधि” (प्रतिनिधि भेजना) को भी अस्वीकार किया, क्योंकि वह तभी होता है जब मूल व्यक्ति असमर्थ हो।
सार: वसिष्ठ ने आचार्य की श्रेष्ठता का तर्क दिया, पर श्रीराम ने माता-पिता को और भी पूज्य ठहराया; भरत ने प्रायोपवेश और स्वयं वन जाने का संकल्प किया, पर श्रीराम ने प्रतिनिधि-भाव अस्वीकार कर भरत को राज्य द्वारा पिता को असत्य से मुक्त करने को कहा।
सर्ग 112: पादुका का वरदान और भरत की प्रतिज्ञा
दोनों भाइयों का वह रोमांचकारी मिलन देखकर वहाँ एकत्र हुए महर्षि (बड़े ऋषिगण) विस्मित रह गए। आकाश में अदृश्य खड़े मुनिगण और प्रत्यक्ष उपस्थित परम ऋषि, उन दोनों कुलदीपक भाइयों राम और भरत की प्रशंसा इन शब्दों में करने लगे: “ये दोनों राजकुमार सदा से आर्य (श्रेष्ठ) हैं, धर्म को जानते हैं और धर्म पर ही चलते भी हैं। इन दोनों का संवाद सुनकर हमारा मन बार-बार उसे सुनने को लालायित होता है।”
तब रावण का वध चाहने वाले ऋषिगणों ने एक स्वर से भरत को यह उपदेश दिया: “हे उच्च कुल में जन्मे, असाधारण बुद्धिवाले, श्रेष्ठ आचरणवाले और महान यशवाले राजकुमार! यदि आपको अपने पिता का तनिक भी आदर है तो राम का यह वचन आपको मान लेना चाहिए। हम चाहते हैं कि राम पिता के ऋण से सदा के लिए मुक्त हो जाएँ; क्योंकि राम के सहर्ष वन जाने से कैकेयी का ऋण चुक गया और राजा दशरथ स्वर्ग सिधार गए।”
इतना कहकर गन्धर्व (आकाशचारी दिव्य गायक), महर्षि और राजर्षि (ऋषि-तुल्य राजा) सब अपनी-अपनी गति को चले गए। इस वचन से प्रसन्न होकर शुभदर्शन राम और भी देदीप्यमान हो उठे; प्रफुल्ल मुख से उन्होंने उन ऋषियों का यथोचित सत्कार किया।
भरत के अंग काँप रहे थे। हाथ जोड़कर लड़खड़ाते स्वर में उन्होंने फिर निवेदन किया: “हे राम! यह जो धर्म कुल-परम्परा से चला आ रहा है, उस पर विचार कीजिए। हे काकुत्स्थ (ककुत्स्थ-वंशी)! आपको यह करना चाहिए, और मेरी तथा हमारी माता कौसल्या की याचना पूरी कीजिए। इतने विशाल राज्य की रक्षा मैं अकेला नहीं कर सकता, न आपके भक्त नगरवासियों और जनपदवासियों को प्रसन्न रख सकता हूँ।”
श्यामवर्ण, कमल के समान नेत्रोंवाले भरत को अपनी गोद में बिठाकर, मतवाले हंस के स्वर वाले राम ने उत्तर दिया: “हे प्रिय! विनय से उत्पन्न यह जो आत्म-लघुता की स्वाभाविक बुद्धि आप में जागी है, इसी से आप पृथ्वी तक की रक्षा कर सकते हैं, अयोध्या की तो बात ही क्या। अपने मन्त्रियों, सुहृदों और बुद्धिमान सलाहकारों से शान्तचित्त परामर्श करके बड़े-बड़े कार्य भी सम्पन्न कीजिए।
चन्द्रमा से कान्ति भले ही चली जाए, हिमालय भले ही अपना हिम त्याग दे, समुद्र भले ही अपनी मर्यादा लाँघ जाए, पर मैं अपने पिता की प्रतिज्ञा का उल्लंघन कभी नहीं करूँगा। हे प्रिय! आपकी माता ने स्नेह से या राज्य के लोभ से जो भी किया, उसे मन में न लाइए और उनके प्रति माता के ही समान बर्ताव कीजिए।”
समझने की कुंजी (पादुका का अर्थ): पादुका अर्थात राम की काठ की खड़ाऊँ, जिन पर सोने का काम जड़ा था। प्राचीन राजनीति में यह केवल जूता न होकर राजा की उपस्थिति का प्रतीक चिह्न थी। जैसे आज किसी अनुपस्थित अधिकारी का पद चिह्न उसके नाम पर निर्णय का अधिकार रखता है, वैसे ही पादुका राम के राजपद को धारण करती है। भरत राजा बनकर नहीं, पादुका के “प्रतिनिधि” बनकर शासन करने जा रहे हैं।

आदित्य-सा तेजस्वी और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा के चन्द्रमा-सा मनोहर राम जब यह कह रहे थे, तब भरत ने उनके सामने सोने से सजी काठ की पादुकाएँ रखकर कहा: “हे आर्य! इन स्वर्णमण्डित पादुकाओं पर अपने चरण रखिए। यही समस्त लोक का योग-क्षेम (आजीविका और सुरक्षा) सँभालेंगी।”
नरश्रेष्ठ राम ने उन पादुकाओं पर चरण रखकर तुरन्त उतार लिया और महात्मा भरत को सौंप दिया। भरत ने उन्हें प्रणाम करके कहा: “हे रघुनन्दन! चौदह वर्ष जटा और चीर धारण किए, फल-मूल पर रहकर, नगर से बाहर रहकर मैं आपके लौटने की प्रतीक्षा करूँगा। हे परंतप! आपकी इन पादुकाओं में राज्यतन्त्र सौंपकर मैं रहूँगा। हे रघूत्तम! यदि चौदहवाँ वर्ष पूरा होते ही, उसके अगले दिन मैं आपको लौटा न देखूँ, तो मैं अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा।”
राम ने “ऐसा ही हो” कहकर सहमति दी, भरत और शत्रुघ्न को प्रेम से गले लगाया, और कहा: “माता कैकेयी की रक्षा कीजिए, उन पर क्रोध न कीजिए। हे रघुनन्दन! इसकी शपथ मैं और सीता दोनों आपको दिलाते हैं।” यह कहते हुए राम के नेत्र आँसुओं से भर आए और उन्होंने भरत को विदा किया।

धर्मज्ञ भरत ने उन अत्यन्त उज्ज्वल पादुकाओं को आदर से ग्रहण किया, राम की प्रदक्षिणा (दायीं ओर से परिक्रमा) की और उन्हें एक श्रेष्ठ हाथी के मस्तक पर रख दिया। फिर वहाँ एकत्र सब जनों, गुरुओं, मन्त्रियों, प्रजा और दोनों छोटे भाइयों भरत-शत्रुघ्न का यथाक्रम सत्कार करके, धर्म पर हिमालय-सा अचल राम ने सबको विदा किया। दुःख से माताओं का गला रुँध गया, वे उनसे विदा का एक वचन भी न कह सकीं। सब माताओं को प्रणाम करके राम भी रोते हुए अपनी कुटी में लौट गए।
सार: ऋषियों के अनुरोध और भरत की अन्तिम विनती के बाद राम वन में रहने के अपने व्रत पर अडिग रहते हैं। भरत राज्य के बदले राम की पादुका माँग लेते हैं और प्रतिज्ञा करते हैं कि चौदह वर्ष पूरे होते ही राम न लौटे तो वे अग्नि में प्रवेश करेंगे। राम पादुका सौंपकर, सबको विदा देकर कुटी में लौट जाते हैं।
सर्ग 113: भरत का अयोध्या को लौटना और भरद्वाज से भेंट
तब भरत ने पादुकाओं को अपने सिर पर धारण किया और प्रसन्न होकर शत्रुघ्न के साथ रथ पर चढ़े। मन्त्रणा में पूजित मन्त्रीगण, वसिष्ठ, वामदेव और दृढ़व्रत जाबालि सब आगे-आगे चले। रमणीय मन्दाकिनी नदी और महान चित्रकूट पर्वत को दायीं ओर रखते हुए वे पूर्व की ओर मुख करके चले। भरत हजारों प्रकार के सुन्दर रंग-बिरंगे धातुओं (पहाड़ी खनिजों) को देखते हुए सेना सहित पर्वत के पार्श्व से आगे बढ़े।
चित्रकूट से थोड़ी ही दूरी पर भरत ने वह आश्रम देखा जहाँ मुनि भरद्वाज ने अपना निवास बनाया था। पराक्रमी भरत रथ से उतरकर मुनि के चरणों में प्रणत हुए। प्रसन्न भरद्वाज ने पूछा: “हे प्रिय! क्या आप राम से मिले? क्या आपका प्रयोजन सिद्ध हुआ?”
धर्मवत्सल भरत ने उत्तर दिया: “गुरु वसिष्ठ और मेरे द्वारा अयोध्या लौटने की प्रार्थना किए जाने पर, दृढ़ पराक्रमी राघव परम प्रसन्न होकर भी वसिष्ठ से बोले: ‘मैं अपने पिता की वह प्रतिज्ञा निश्चय ही अक्षरशः निभाऊँगा, जो उन्होंने माता कैकेयी को दी थी कि मैं चौदह वर्ष तक वन में ही रहूँगा।’ यह सुनकर वाक्यकुशल वसिष्ठ ने वचन-चतुर राघव से यह महत्त्वपूर्ण वचन कहा: ‘हे महाप्राज्ञ! परम हर्ष से ये स्वर्णमण्डित पादुकाएँ भरत को दीजिए। इन पादुकाओं के रूप में स्थित होकर अयोध्या की प्रजा का योग-क्षेम सँभालिए।’
वसिष्ठ के इस वचन पर राघव ने पूर्वाभिमुख होकर पादुकाओं पर खड़े होकर, राज्य चलाने के लिए वे स्वर्णमण्डित पादुकाएँ मुझे दे दीं। महात्मा राम की अनुमति से विदा होकर, मैं वे शुभ पादुकाएँ लेकर अयोध्या लौट रहा हूँ।”
एक उप-कथा: गीता प्रेस के अनुवादक इस स्थल पर ध्यान दिलाते हैं कि उन दिनों चित्रकूट के निकट यमुना के दक्षिण तट पर भी भरद्वाज का एक आश्रम था, जो गंगा-यमुना के बीच वाले उस आश्रम से भिन्न है जहाँ राम का दल पहले ठहरा था और जहाँ भरत के दल का भव्य आतिथ्य हुआ था। आगे भरत के यमुना पार करने के उल्लेख से यही निष्कर्ष निकलता है कि चित्रकूट के घटनाक्रम से जुड़े रहने के लिए मुनि सम्भवतः इस निकटवर्ती स्थान पर आ गए थे।
उच्च आत्मावाले भरत का यह शुभ समाचार सुनकर भरद्वाज ने और भी मधुर वचन कहा: “हे नरश्रेष्ठ! हे शील-आचरण के ज्ञाताओं में श्रेष्ठ! यह आश्चर्य नहीं कि जैसे ऊपर से बहा जल निचले गड्ढे में जा भरता है, वैसे ही श्रेष्ठ आचरण आप में आ बसा है। आपके पिता दशरथ ऋण से मुक्त हैं, जिनके आप-जैसे धर्मात्मा और धर्मवत्सल पुत्र हुए।”
हाथ जोड़कर भरत ने महाप्राज्ञ ऋषि के चरण पकड़कर विदा ली और बार-बार प्रदक्षिणा करके श्रीमान भरत मन्त्रियों सहित अयोध्या के लिए चले। रथों, छकड़ों, घोड़ों और हाथियों पर चढ़ी वह विशाल सेना उसी मार्ग से लौट चली। फिर तरंगमालिनी दिव्य यमुना नदी को पार करके सबने पवित्र जलवाली गंगा नदी को फिर देखा। रमणीय जल से भरी उस नदी को बन्धु-बान्धवों सहित पार करके भरत सेना सहित मनोहर शृंगवेरपुर में प्रविष्ट हुए।
शृंगवेरपुर से आगे बढ़ते हुए भरत ने अयोध्या को फिर देखा। पिता और बड़े भाई राम से सूनी अयोध्या को देखकर दुःख से सन्तप्त भरत ने सारथि सुमन्त्र से कहा: “हे सारथि! देखिए, यह अयोध्या उजड़ी हुई है, इसकी शोभा नहीं रही। श्रीहीन, आनन्दहीन, दीन और मानो प्राणहीन यह नगरी अब पहले-सी उज्ज्वल नहीं दीखती।”
सार: पादुका सिर पर धरकर भरत अयोध्या लौटते हैं। मार्ग में भरद्वाज को चित्रकूट का सारा वृत्तान्त और पादुका-प्रसंग सुनाते हैं। मुनि उनकी सराहना करते हैं। यमुना और गंगा पार करके, शृंगवेरपुर होते हुए जब भरत अयोध्या को दूर से देखते हैं तो वह राम-विहीन होकर उजड़ी-सी दिखती है।
सर्ग 114: उजड़ी अयोध्या का चित्र और पिता के भवन में प्रवेश
गम्भीर मधुर घोष करते रथ पर चढ़े प्रतापी और महायशस्वी भरत शीघ्र ही अयोध्या में प्रविष्ट हुए। यहाँ वाल्मीकि कई उपमाओं से उस सूनी नगरी का चित्र खींचते हैं। बिल्ली और उल्लुओं से भरी, अन्धकार से ढकी, लोगों के बन्द द्वारवाली वह नगरी काली रात-सी दीख रही थी। राहु से ग्रसित, स्वामी चन्द्र-वियोग में पीड़ित रोहिणी (चन्द्र की प्रिय पत्नी, एक नक्षत्र) के समान वह उदास थी।
सूर्य की किरणों से जिसका थोड़ा जल गरम और क्षुब्ध हो उठा हो, जिसके पक्षी ताप से झुलस गए हों और छोटे-बड़े मत्स्य और घड़ियाल कीचड़ में छिप गए हों, ऐसी सूखती पर्वतीय नदी-सी वह क्षीण थी। दूध छिड़ककर बुझाई गई धूमरहित स्वर्णवर्णी अग्निशिखा-सी प्रतीत होती थी। महायुद्ध में जिसके कवच टूट गए हों, हाथी-घोड़े-रथों के ध्वज छिन्न हो गए हों और श्रेष्ठ वीर मारे गए हों, ऐसी पराजित सेना-सी जान पड़ती थी।
तीव्र आँधी से फेन और गर्जना के साथ ऊँची उठी समुद्र-लहर, जो शान्त वायु में नीरव हो जाए, वैसी निःशब्द थी। यज्ञ का समय बीत जाने पर सब यज्ञ-पात्र हटा लिए जाने पर, ब्राह्मणों के चले जाने पर शान्त हुई वेदी-सी मौन थी। बैल से रहित, ताजी घास भी न चरती, गोशाला में उदास खड़ी गाय-सी थी। उत्कृष्ट माणिक्य और मणियों से रहित नई मोती-माला-सी, पुण्य क्षय होने पर अपने स्थान से गिरकर पृथ्वी पर आई तारे-सी कान्तिहीन थी।
वसन्त के अन्त में फूली, मतवाले भौंरों से शोभित, पर दावाग्नि से झुलसी वन-लता-सी म्लान थी। चन्द्र-नक्षत्र को ढके मेघाच्छन्न आकाश-सी; मद्यपायियों के मारे जाने पर टूटे पात्रों से भरी सूनी मधुशाला-सी; जल चुक जाने पर टूटी, धँसी प्याऊ-सी; वीरों के बाणों से कटी, पृथ्वी पर गिरी धनुष की प्रत्यंचा-सी; और शत्रु-सेना द्वारा मारी गई घोड़ी-सी पतित दीख रही थी।
रथ पर बैठे श्रीमान दशरथनन्दन भरत ने रथ हाँकते सारथि सुमन्त्र से कहा: “आज अयोध्या में पहले-सा गहरा, गूँजता हुआ गीत-वाद्य का स्वर क्यों नहीं सुनाई देता? मद्य की मादक गन्ध, फूलों की महक, चन्दन और अगुरु की सुगन्ध, जो चारों ओर फैली रहती थी, अब क्यों नहीं बहती? राम के वनगमन से न रथों की ध्वनि, न घोड़ों की हिनहिनाहट, न मतवाले हाथियों का चिग्घाड़ सुनाई देता है। राम के जाने से सन्तप्त नवयुवक चन्दन-अगुरु का लेप और सुन्दर माला नहीं पहनते, न भ्रमण को बाहर जाते हैं।
राम के शोक से पीड़ित इस नगरी में अब उत्सव नहीं होते; मेरे बड़े भाई राम के साथ इस नगरी की कान्ति निश्चय ही चली गई। निरन्तर वर्षा से रहित शुक्ल पक्ष की रात्रि-सी, राम के बिना यह अयोध्या शोभित नहीं होती। मेरे भाई महोत्सव-सा अयोध्या में हर्ष कब लाएँगे, जैसे ग्रीष्म में मेघ लाता है? सुन्दर वेषवाले, गर्व से चलते युवक अब अयोध्या के राजमार्गों पर शोभा नहीं देते।”

इस प्रकार सारथि से बातें करते दुःखी भरत अयोध्या के भीतर प्रवेश करके, उस नरेन्द्र-रहित नगरी में, सिंह-विहीन गुफा-सी सूनी पिता के भवन में पहुँचे। सूर्य-विहीन दिन-सा कान्तिहीन और अस्तव्यस्त वह अन्तःपुर देखकर, आत्मसंयमी होते हुए भी अत्यन्त दुःखी भरत आँसू बहाने लगे।
एक उप-कथा: “सूर्य-विहीन दिन” की उपमा पर टीकाकार पुराणों की एक कथा का संकेत करते हैं। देवासुर संग्राम में देव पराजित हो रहे थे और राहु ने सूर्यदेव को गिरा दिया। इससे सृष्टि में रात-दिन का भेद ही मिट गया। देवता ब्रह्मा के पास गए, जिन्होंने एक सप्ताह के लिए ऋषि अत्रि को सूर्य के स्थान पर नियुक्त किया। उन्हीं प्रलयतुल्य दिनों में से एक को यहाँ “देवों द्वारा शोचित सूर्य-विहीन दिन” कहा गया है।
सार: वाल्मीकि उपमाओं की झड़ी से राम-विहीन अयोध्या की उदासी चित्रित करते हैं: बुझी अग्निशिखा, पराजित सेना, सूखती नदी, बैल-विहीन गाय। भरत सुमन्त्र से नगरी के सूनेपन की बात करते हुए भारी मन से पिता के सिंह-विहीन गुफा-से भवन में प्रवेश करते हैं और आँसू बहाते हैं।
सर्ग 115: नन्दिग्राम में पादुका का राज-तिलक
माताओं को अयोध्या में पहुँचाकर, शोक से सन्तप्त दृढ़व्रत भरत ने गुरुजनों से कहा: “मैं आप सभी से यहाँ विदा लेता हूँ; अभी नन्दिग्राम जाऊँगा। राघव के बिना यह सारा दुःख मैं वहीं सहूँगा। हाय! राजा स्वर्ग सिधार गए और मेरे बड़े भाई वन में जा बसे। मैं राज्य के लिए राम की प्रतीक्षा करता हूँ; वही महायशस्वी अयोध्या के राजा हैं।”
उच्च आत्मावाले भरत का यह शुभ वचन सुनकर सब मन्त्रियों और पुरोहित वसिष्ठ ने उत्तर दिया: “हे भरत! भ्रातृ-स्नेह से आपने जो वचन कहा है, वह अत्यन्त श्लाघनीय है और आप ही के योग्य है। आप जैसे सदा बन्धुओं के हित-कामी, भ्रातृ-प्रेम में दृढ़ और धर्म के श्रेष्ठ मार्ग पर चलने वाले की इस प्रतिज्ञा का कौन पुरुष अनुमोदन न करेगा?”
अपने मनोनुकूल यह प्रिय उत्तर सुनकर भरत ने सारथि से कहा: “मेरा रथ जोता जाए।” अत्यन्त प्रसन्न मुख से सब माताओं से कुशल-वार्ता करके श्रीमान भरत शत्रुघ्न सहित रथ पर चढ़े। मन्त्रियों और पुरोहितों से घिरे अत्यन्त प्रसन्न दोनों भाई शीघ्र चल पड़े। वसिष्ठ आदि सब गुरुजन और ब्राह्मण आगे-आगे, पूर्वाभिमुख होकर, उसी मार्ग से चले जिससे नन्दिग्राम पहुँचा जाता था। भरत के चलने पर बिना बुलाए ही हाथी-घोड़े-रथों से भरी सारी सेना और नगरवासी भी चल पड़े।
समझने की कुंजी (स्थान, नन्दिग्राम): नन्दिग्राम अयोध्या से कुछ ही कोस दूर एक छोटा गाँव था (आज के उत्तर प्रदेश में फैजाबाद-अयोध्या क्षेत्र के निकट माना जाता है)। भरत राजधानी के भीतर सिंहासन पर नहीं बैठते; वे नगर के बाहर इस ग्राम में तपस्वी का वेष धारण करके रहते हैं, ताकि राज्य पर राम का ही अधिकार बना रहे और वे स्वयं केवल रक्षक-प्रतिनिधि बने रहें।
रथ पर बैठे धर्मात्मा भ्रातृवत्सल भरत पादुकाओं को सिर पर लिए शीघ्र नन्दिग्राम पहुँचे और रथ से उतरकर गुरुजनों से बोले: “यह राज्य मेरे बड़े भाई ने मुझे परम न्यास (धरोहर) के रूप में सौंपा है, और साथ ही ये स्वर्णमण्डित पादुकाएँ, जो हमारा सारा योग-क्षेम सँभालेंगी।” फिर सिर झुकाकर इस धरोहर को पादुकाओं को समर्पित करके, दुःख से सन्तप्त भरत ने समस्त मन्त्रिमण्डल से कहा:
“इन पादुकाओं पर शीघ्र राजछत्र धारण कीजिए; ये मेरे गुरुजन और बड़े भाई के चरण ही मानी जाती हैं। मेरे बड़े भाई की इन पादुकाओं से राज्य में धर्म प्रतिष्ठित रहेगा। भाई ने स्नेह से ही यह न्यास मुझे सौंपा है; राघव के लौटने तक मैं इसे सँभालूँगा। राघव के लौटते ही, उन्हें ये पादुकाएँ पुनः सौंपकर, मैं राम के उन चरणों को पादुका सहित देखूँगा। तब भार उतारकर, राघव से मिलकर, गुरुजन को राज्य लौटाकर मैं भाई की सेवकवृत्ति ग्रहण करूँगा।
राघव को यह राज्य, अयोध्या और श्रेष्ठ पादुकाएँ लौटाकर मैं पाप के कलंक से मुक्त हो जाऊँगा। काकुत्स्थ का राज्यतिलक होने और प्रजा के प्रसन्न होने पर मुझे राज्य पाने से चौगुनी प्रीति और यश मिलेगा।” इस प्रकार विलाप करते हुए दीन किन्तु महायशस्वी भरत ने नन्दिग्राम से, मन्त्रियों सहित, दुखी मन से राज्य का संचालन किया।

वल्कल और जटा धारण किए, मुनि का वेष पहने, धीर भरत राम के लौटने की कामना करते हुए सेना सहित नन्दिग्राम में रहने लगे। भाई के आज्ञाकारी, प्रतिज्ञा के पारगामी भरत ने पादुकाओं का राज्याभिषेक करके वहीं निवास किया। उन्होंने स्वयं पादुकाओं पर चँवर सहित राजछत्र धारण किया और सारा शासन पादुकाओं को निवेदित करते रहे। पादुकाओं का अभिषेक करके श्रीमान भरत उनके अधीन रहकर ही सदा राज्य चलाते रहे; जो भी राजकार्य आता या जो भी बहुमूल्य उपहार राज्य को भेंट होता, उसे पहले पादुकाओं को निवेदित करके भरत बाद में यथाविधि उसका निर्णय करते।
सार: गुरुजनों और प्रजा की सम्मति से भरत राजधानी के बजाय नन्दिग्राम जाते हैं। वहाँ राम की पादुका का राज्याभिषेक करके, स्वयं वल्कल-जटाधारी तपस्वी का जीवन अपनाते हैं और पादुका के प्रतिनिधि के रूप में, हर राजकार्य उन्हें निवेदित करके, राम के लौटने तक शासन चलाते हैं।
सर्ग 116: चित्रकूट के तपस्वियों का प्रस्थान
भरत के अयोध्या लौट जाने पर, वन में रहते हुए राम ने उसी समय तपस्वियों में उद्वेग के साथ एक व्याकुलता-सी देखी। चित्रकूट के उस आश्रम में, राम के आश्रय में पहले प्रसन्न रहने वाले ऋषि अब उत्सुक-व्याकुल दीखे। आशंकित वे नेत्रों और भौंहों के संकेत से राम की ओर इशारा करते, एक-दूसरे को बुलाकर धीरे-धीरे आपस में फुसफुसाते। उनकी व्याकुलता देखकर राम को अपने ही विषय में आशंका हुई और हाथ जोड़कर उन्होंने आश्रम के कुलपति (मुखिया) ऋषि से कहा:
“हे भगवन्! कहीं मुझ में कोई पूर्व-आचरण से विकृति तो नहीं दीख पड़ी, जिससे तपस्वी विचलित हो रहे हैं? कहीं मुझ में मेरे पूर्वजों का आचरण लुप्त तो नहीं हो गया, जिससे ये क्षुब्ध हैं? कहीं मेरे महात्मा छोटे भाई लक्ष्मण से कोई ऐसी चूक तो नहीं हुई जो ऋषियों ने देख ली हो? कहीं आपकी सेवा में लगी, मेरी सेवा में तत्पर सीता, युवती के योग्य आपके प्रति आदरपूर्ण आचरण से तो नहीं चूकीं?”
आयु और तप दोनों से वृद्ध वह ऋषि, मानो काँपते हुए, प्राणियों पर दया को परम धर्म मानने वाले राम से बोले: “हे प्रिय! कल्याणमयी, सदा सद्गुण में रत, विशेषकर तपस्वियों के प्रति आदरशील विदेहकुमारी सीता में विचलन कैसा? यह संकट तो आप ही के कारण तपस्वियों पर आ पड़ा है; राक्षसों से भयभीत होकर ये आपस में बातें करते हैं।
जनस्थान (दण्डक वन का एक भाग) के सब तपस्वियों को उखाड़कर, रावण का छोटा भाई खर नामक एक नरभक्षी राक्षस (जो धृष्ट, युद्ध में विजयी, क्रूर, अहंकारी और पापी है) आपको भी सहन नहीं कर पाता। हे प्रिय! जब से आप इस आश्रम में रहने आए हैं, तब से राक्षस तपस्वियों को सताते हैं। वे विकराल, भयानक, घृणित और कुरूप रूपों में प्रकट होते हैं, जिनका दर्शन ही दुःखदायी है। तपस्वियों को अपवित्र और निषिद्ध वस्तुओं से छूकर, सामने खड़े दूसरों को शीघ्र मार डालते हैं।
आश्रम-स्थानों में अदृश्य छिपकर ये अल्पबुद्धि तपस्वियों को मारकर वहीं प्रसन्न विचरते हैं। हवन के समय हाथ आते ही ये स्रुक् (आहुति का चम्मच) आदि पात्र फेंक देते हैं, अग्नि पर जल छिड़क देते हैं और कलश तोड़ देते हैं। इन दुरात्माओं से दूषित आश्रमों को सदा के लिए छोड़ देने को उत्सुक ऋषि आज मुझे अन्यत्र जाने को प्रेरित कर रहे हैं। इसलिए, हे राम! इन दुष्टों के तपस्वियों पर प्रत्यक्ष हिंसा करने से पहले ही हम यह आश्रम छोड़ देंगे।
यहाँ से थोड़ी ही दूर मूल-फल से भरा एक वन है; मैं अपने गण सहित अश्व नामक ऋषि के उस आश्रम में जा रहूँगा। हे राम! यदि आपकी बुद्धि भी ऐसी ही हो तो खर के आपसे भी अन्याय करने से पहले हमारे साथ यहाँ से चल दीजिए। हे राघव! आप सतर्क और समर्थ होते हुए भी, सपत्नी यहाँ रहना अब संकटपूर्ण और दुःखद है।”
इस प्रकार स्थान छोड़ने को उत्सुक उस तपस्वी को राजकुमार राम युक्तियों से भी न रोक सके। राम की प्रशंसा करके, विधिवत विदा लेकर और उन्हें सान्त्वना देकर, वह कुलपति अपने ऋषि-गणों सहित आश्रम छोड़कर चले गए। राम उन ऋषियों के पीछे कुछ दूर तक गए, कुलपति ऋषि को प्रणाम किया और उनके द्वारा अपने कर्तव्य का उपदेश पाकर, उनकी अनुमति से अपने पवित्र निवास को लौट आए। प्रतापी राम ने ऋषि-विहीन उस आश्रम को क्षण भर के लिए भी न छोड़ा; और राम में मन लगाए वे तपस्वी भी मन से सदा राम के साथ ही बने रहे।
सार: भरत के लौटने पर राम चित्रकूट के तपस्वियों में व्याकुलता देखते हैं। कुलपति बताते हैं कि रावण का भाई खर अपने राक्षसों से तपस्वियों को सता रहा है, और राम के यहाँ रहने से संकट बढ़ गया है। ऋषि आश्रम छोड़ अश्व ऋषि के आश्रम चले जाते हैं; राम उन्हें ससम्मान विदा करके अपने निवास लौटते हैं।
सर्ग 117: चित्रकूट से प्रस्थान और अत्रि-आश्रम में सीता को अनसूया का उपदेश
सब तपस्वियों के चले जाने पर, बार-बार विचार करके राघव ने अनेक कारणों से अब वहाँ और रुकना उचित न समझा। राम ने सोचा: “यहीं मुझे भरत, मेरी माताएँ और अयोध्या के लोग दीख पड़े थे; वह स्मृति अब भी मुझे सालती है और मैं उनके लिए प्रतिदिन शोक करता हूँ। और भरत की सेना के पड़ाव से घोड़ों-हाथियों के सूखे गोबर से यह भूमि बहुत दूषित हो गई है। इसलिए हम अन्यत्र चलें।” यह विचार कर राम सीता और लक्ष्मण सहित चित्रकूट से प्रस्थान कर गए।
महायशस्वी राम अत्रि के आश्रम में पहुँचकर मुनि को प्रणत हुए; भगवान अत्रि ने भी उन्हें पुत्र के समान स्वीकार किया। स्वयं आतिथ्य का आदेश देकर, सब प्रकार से उनका सत्कार करके, उन्होंने महाभाग्यशाली लक्ष्मण और सीता को भी सान्त्वना दी। फिर अपनी वृद्धा और महाभाग्यवती पत्नी अनसूया को, जो तप और धर्म-आचरण में रत थीं, बुलाकर ऋषिश्रेष्ठ ने उन्हें सान्त्वना दी और कहा: “विदेहकुमारी का स्वागत कीजिए, इन्हें अपनाइए।”
राम से उन्होंने उस धर्मचारिणी तपस्विनी का परिचय इस प्रकार दिया: “हे निष्पाप राजकुमार! आपके लिए माता-तुल्य ये अनसूया कठोर तप और पवित्र व्रतों से विभूषित हैं। जब लगातार दस वर्ष की अनावृष्टि से संसार झुलस रहा था, तब इन्होंने तप से मूल-फल उत्पन्न किए और जाह्नवी (गंगा) को इस आश्रम के निकट बहा दिया। इन्होंने दस हजार वर्ष कठोर तप किया, ऋषियों के विघ्न दूर किए और देवों के कार्य के लिए शीघ्रता से दस रातों को एक रात में बदल दिया। हे निष्पाप! सब प्राणियों की नमस्या, सदा क्रोधरहित इन वृद्धा तपस्विनी के पास विदेहकुमारी विनम्र होकर जाएँ।”
एक उप-कथा: “दस रातों को एक रात में बदलना”, इस पर टीकाकार पुराणों की एक कथा सुनाते हैं। ऋषि माण्डव्य ने अनसूया की सखी शाण्डिली नामक तपस्विनी को शाप दिया कि अगले दस दिनों में एक प्रातः उसका पति न रहेगा। शाण्डिली ने पलटकर शाप दिया कि अब प्रातः ही न होगा। इससे घबराए देव अनसूया के पास गए, जिन्होंने अपने तप से दस रातों को एक रात में बदल दिया, इस प्रकार शाण्डिली के पति की मृत्यु टाल दी और देवों का कार्य भी सिद्ध किया।
ऋषि के “ऐसा ही हो” कहकर, धर्मज्ञा सीता की ओर देखकर राम ने उससे कहा: “हे राजकुमारी! इस मुनि का वचन आपने सुना। अपने ही कल्याण के लिए शीघ्र इन तपस्विनी के पास आदर से जाइए। जो लोक में अपने कर्मों से अनसूया (ईर्ष्यारहित) नाम से विख्यात हैं, उन सम्माननीय तपस्विनी के पास शीघ्र जाइए।”
राम का यह वचन सुनकर यशस्विनी मिथिलेशकुमारी सीता धर्मज्ञा अत्रि-पत्नी से मिलने चलीं, जो शिथिल अंगवाली, झुर्रीदार, वृद्ध, बुढ़ापे से श्वेत केशवाली थीं और जिनका शरीर तेज वायु में केले के पौधे-सा निरन्तर काँपता था। पतिव्रता अनसूया को सीता ने शान्तभाव से प्रणाम करके अपना नाम कहकर परिचय दिया। संयमवती उन तपस्विनी का अभिवादन करके प्रसन्न सीता ने हाथ जोड़कर उनकी कुशल पूछी।
धर्मचारिणी सीता को देखकर वृद्धा अनसूया ने सान्त्वना देते हुए कहा: “सौभाग्य से आपकी दृष्टि धर्म पर टिकी है। हे मानिनी सीता! ज्ञातिजनों और मान-प्रतिष्ठा को त्यागकर, वन में आए राम का अनुसरण करती आप धन्य हैं। जिन स्त्रियों को उनका पति प्रिय है (चाहे वह नगर में हो या वन में, अनुकूल हो या प्रतिकूल), उन्हें महान उत्कर्षवाले लोक मिलते हैं। आर्य स्वभाववाली स्त्रियों के लिए पति ही परम देवता है, चाहे वह दुःशील हो, कामी हो, या धनहीन हो।
हे विदेही! गहराई से विचार करने पर भी मुझे स्त्री के लिए पति से बढ़कर कोई बन्धु नहीं दीखता, जो सर्वत्र अक्षय तप-फल-सा हितकारी हो। पर जिन दुष्टा स्त्रियों के हृदय काम के वश रहते हैं, जो पति पर शासन चलाती हैं और स्वेच्छाचारिणी रहती हैं, वे इस प्रकार पति का अनुसरण नहीं करतीं। हे मिथिलेशकुमारी! वे त्याज्य काम के वश होकर धर्म से गिरती हैं और अपयश भी पाती हैं। पर आप-जैसी गुणवती, लोक के हिताहित को जानने वाली स्त्रियाँ पुण्यकर्मियों के समान स्वर्ग में विचरेंगी।
इसलिए इस राजकुमार की सेवा में अनुरक्त, पति को परम आराध्य मानती, समय पर उनकी सेवा करती हुई आप पति के साथ धर्म-आचरण कीजिए; इससे आपको यश और धर्म दोनों सहज ही प्राप्त होंगे।”
सार: स्मृतियों और दूषित भूमि के कारण राम चित्रकूट छोड़कर अत्रि-आश्रम पहुँचते हैं। अत्रि अपनी तपस्विनी पत्नी अनसूया का महिमावर्णन करके सीता को उनके पास भेजते हैं। अनसूया सीता को पतिव्रत-धर्म का उपदेश देती हैं।
सर्ग 118: सीता का उत्तर, दिव्य उपहार और विवाह-कथा
अनसूया के इस उपदेश पर ईर्ष्यारहित विदेहकुमारी सीता ने उनके वचन की सराहना करके धीरे-धीरे उत्तर देना आरम्भ किया: “आर्ये का मुझे यह उपदेश देना आश्चर्य नहीं; मुझे भी ज्ञात है कि स्त्री के लिए पति ही गुरु है। यदि मेरे पति अनार्य और आजीविका-हीन भी होते, तो भी मुझे उनके प्रति निःशंक होकर यही आचरण करना चाहिए था; यही मेरा धर्म है। फिर वे तो गुणों से प्रशंसनीय, करुणामय, जितेन्द्रिय, स्थिर अनुराग वाले, धर्मात्मा और माता-पिता दोनों-से प्रिय हैं, तब तो वे और भी अधिक आराध्य हैं।
महाबली राम जैसा बर्ताव कौसल्या के प्रति करते थे, वैसा ही अन्य राजपत्नियों (विमाताओं) के प्रति भी करते थे। पिता-भक्त धर्मज्ञ वीर राम मान त्यागकर, राजा द्वारा एक बार भी प्रेम से देखी गई स्त्रियों के प्रति भी माता-समान बर्ताव करते थे। इस भयावने निर्जन वन में आते समय मेरी सास ने जो उपदेश दिया, वह मेरे हृदय में स्थिर है। पहले विवाह के समय अग्नि के समीप, पाणिग्रहण के अवसर पर मेरी माता ने जो शिक्षा दी थी, वह भी मुझे याद है।
हे धर्मचारिणी! आपके वचनों ने वह सब शिक्षा मेरे मन में फिर ताज़ा कर दी; स्त्री के लिए पति-सेवा से बढ़कर कोई तप नहीं। सावित्री पति-सेवा करके स्वर्ग में पूजित हुईं; वैसे ही आचरण से आप भी पति-सेवा द्वारा मानो स्वर्ग में पहुँच गई हैं। सब नारियों में श्रेष्ठ यह रोहिणी आज स्वर्ग में देवी रूप में रहती हुई भी चन्द्रमा के बिना क्षण भर भी नहीं दिखतीं। पति-व्रत में दृढ़ ऐसी और भी श्रेष्ठ स्त्रियाँ अपने पुण्य-कर्म से देवलोक में पूजित होती हैं।”
सीता का यह वचन सुनकर परम प्रसन्न अनसूया ने उनका सिर सूँघकर, मिथिलेशकुमारी को हर्षित करते हुए कहा: “विविध व्रतों से अर्जित मेरा महान तप-बल है; हे शुचिव्रते सीता! उसी बल के आश्रय से मैं आपको वर माँगने को कहती हूँ। हे मिथिलेशकुमारी! आपका वचन उचित और युक्त है, और मैं प्रसन्न हूँ। बताइए, मैं आपका क्या प्रिय करूँ?”
अनसूया का यह वचन सुनकर विस्मित सीता ने, अल्प विस्मय से, तप-बल-सम्पन्न उनसे कहा: “आपकी कृपा से ही सब कुछ हो चुका।” इस उत्तर से धर्मज्ञा अनसूया और भी प्रसन्न हुईं और बोलीं: “तो मैं आपके इस सन्तोष-जन्य हर्ष को प्रेम-उपहार देकर सफल करती हूँ। हे विदेही! यह दिव्य श्रेष्ठ माला, वस्त्र, आभूषण, बहुमूल्य अंगराग और अनुलेप लीजिए। हे सीता! मेरा दिया यह उपहार आपके अंगों को शोभायमान करेगा; यह आपके योग्य रहेगा और निरन्तर प्रयोग से भी मलिन नहीं होगा। हे जनककुमारी! इस दिव्य अंगराग से लिप्त अंगोंवाली आप अपने पति को वैसे ही शोभायमान करेंगी जैसे लक्ष्मी अव्यय विष्णु को।”
मिथिलेशकुमारी ने वस्त्र, अंगराग, आभूषण और मालाएँ उस अनुपम प्रेम-उपहार के रूप में ग्रहण कीं। उस प्रेम-उपहार को लेकर यशस्विनी धीर सीता हाथ जोड़े उन तपोधना के पास बैठ गईं। तब दृढ़व्रत अनसूया ने, सीता से कोई मनोहर कथा सुनने की इच्छा से, उनसे पूछना आरम्भ किया: “हे सीता! मैंने सुना है कि स्वयंवर में इस यशस्वी राघव ने आपको प्राप्त किया था। हे मिथिलेशकुमारी! मैं वह कथा विस्तार से सुनना चाहती हूँ; जैसी घटी, वैसी ही पूरी आप मुझे सुनाइए।”
“सुनिए” कहकर सीता ने धर्मचारिणी तपस्विनी को वह कथा सुनाई: “मिथिला के अधिपति, धर्मज्ञ, वीर जनक नाम के राजा हैं, जो क्षत्रिय-कर्म में रत होकर न्यायपूर्वक पृथ्वी पर शासन करते हैं। यज्ञ के लिए भूमि जोतते समय, हाथ में हल लिए, मैं पृथ्वी को भेदकर उठी और तब से राजा की पुत्री हुई, ऐसा कहा जाता है। धूल से भरे अंगोंवाली मुझे देखकर बीज बोने में लगे जनक विस्मित हो उठे। सन्तानहीन होने से स्नेहवश उन्होंने स्वयं मुझे गोद में उठाकर ‘यह मेरी पुत्री है’ कहा, और मुझ पर अपार प्रेम उँडेल दिया। आकाश में भी वाणी हुई, ‘हे नरपते! ऐसा ही हो; धर्म से यह आपकी पुत्री है।’
तब धर्मात्मा मिथिलाधिप मेरे पिता परम प्रसन्न हुए और मुझे पाकर उन्होंने विपुल समृद्धि पाई। पुण्यकर्मा ज्येष्ठ रानी को मैं इष्ट सन्तान-सी सौंप दी गई, और उस स्नेहमयी ने मातृ-वात्सल्य से मेरा पालन किया। पति-संयोग के योग्य मेरी अवस्था देखकर मेरे पिता धन-नाश से दरिद्र-से चिन्तातुर हो उठे। अयोनिजा (बिना माता के गर्भ से न जन्मी) जानकर वे, बहुत सोचने पर भी, मेरे योग्य अनुरूप वर न पा सके।
निरन्तर चिन्तित रहते हुए उनके मन में यह बुद्धि जागी: ‘क्षत्रिय-धर्म के अनुसार मैं अपनी पुत्री का स्वयंवर रचूँगा।’ एक महायज्ञ में महात्मा वरुण ने मेरे पूर्वज देवरात को प्रेमपूर्वक एक श्रेष्ठ धनुष और अक्षय बाणोंवाले दो तरकश दिए थे। वह धनुष इतना भारी था कि मनुष्य उसे प्रयत्न से भी हिला न पाते; राजा लोग स्वप्न में भी उसे झुका न सकते थे। उस धनुष को पाकर सत्यवादी मेरे पिता ने राजाओं को निमन्त्रित कर घोषणा की: ‘जो पुरुष इस धनुष को उठाकर उसकी डोरी चढ़ा देगा, मेरी पुत्री उसकी पत्नी होगी; इसमें सन्देह नहीं।’
पर्वत-सा भारी वह श्रेष्ठ धनुष देखकर और प्रणाम करके, राजा लोग उसे हाथों में सँभाल पाने में भी असमर्थ होकर लौट गए। बहुत समय बाद महाद्युतिमान यह राघव, विश्वामित्र के साथ, धनुष-यज्ञ देखने पधारे। सत्यपराक्रमी राम अपने छोटे भाई लक्ष्मण सहित आए, और धर्मात्मा विश्वामित्र मेरे पिता द्वारा भलीभाँति सत्कृत हुए।
विश्वामित्र ने मेरे पिता से कहा: ‘ये दशरथ के दो पुत्र राम और लक्ष्मण हैं, जो धनुष देखना चाहते हैं; अतः राजकुमार राम को यह दिव्य धनुष दिखाइए।’ इस ब्राह्मण के कहने पर मेरे पिता ने वह धनुष मँगवाकर राजकुमार को दिखाया। महाबली पराक्रमी राम ने पल भर में उसे झुकाकर, झटपट डोरी चढ़ाकर, पूरी शक्ति से खींचा। वेग से खींचते ही वह धनुष बीच से दो टुकड़ों में टूट गया; उसका वज्रपात-सा भयंकर शब्द हुआ।
तब सत्यप्रतिज्ञ मेरे पिता ने उत्तम जलपात्र उठाकर मुझे राम को देने को उद्यत हुए। पर अयोध्याधिप अपने पिता का अभिप्राय भलीभाँति न जानने के कारण राघव ने तब विवाह में दी जाती मुझे स्वीकार नहीं किया। तब वृद्ध राजा दशरथ को बुलाकर मेरे पिता ने आत्मज्ञानी राम को मुझे विवाह में दिया। मेरी छोटी बहन साध्वी, शुभदर्शना ऊर्मिला को भी मेरे पिता ने स्वयं लक्ष्मण को पत्नी रूप में दिया। इस प्रकार उस स्वयंवर में मैं राम को दी गई; तब से धर्मपूर्वक मैं वीरों में श्रेष्ठ अपने पति में अनुरक्त हूँ।”
सार: सीता पतिव्रत-धर्म को अपनी सास और माता की शिक्षा से जोड़कर स्वीकार करती हैं। प्रसन्न अनसूया उन्हें दिव्य वस्त्र, आभूषण और अंगराग देती हैं। फिर अनसूया के अनुरोध पर सीता अपनी जन्म-कथा (हल चलाते समय धरती से उत्पन्न होना) और स्वयंवर में राम के धनुष-भंग तथा विवाह की कथा सुनाती हैं।
सर्ग 119: सन्ध्या-वर्णन और दण्डक वन में प्रवेश
वह महान कथा सुनकर धर्मज्ञा अनसूया ने मिथिलेशकुमारी का सिर सूँघकर उसे दोनों भुजाओं में भर लिया और कहा: “आपने स्पष्ट अक्षरों और पदों में जो मधुर वचन कहे, वे अद्भुत हैं। आपका स्वयंवर जैसे हुआ, वह सब मैंने पूरा सुन लिया। हे मधुरभाषिणी! मैं आपकी कथा और सुनकर बहुत प्रसन्न होती, पर शुभ रात्रि का आगमन करके श्रीमान सूर्य अस्त हो गए।
दिन भर आहार के लिए इधर-उधर बिखरे और सन्ध्याकाल में नीड़ों में छिपे पक्षियों की निद्रा हेतु ध्वनि सुनाई दे रही है। स्नान से भीगे और भीगे वल्कलोंवाले ये मुनि भी जल से भरे कलश उठाए झुण्ड में लौट रहे हैं। ऋषि अत्रि द्वारा विधिपूर्वक अग्निहोत्र हो जाने पर, वायु से उठा कबूतर की गर्दन-सा नीला धुआँ वहाँ दिख रहा है। दूर के प्रदेश में पतले पत्तोंवाले वृक्ष भी घने जान पड़ते हैं, इसलिए दिशाएँ स्पष्ट नहीं दीखतीं। रात में विचरने वाले राक्षस चारों ओर घूम रहे हैं, और ये तपोवन के मृग पवित्र वेदियों के पास लेटे हैं।
हे सीता! नक्षत्रों से सजी रात्रि भलीभाँति आ गई है; ज्योत्स्ना (चाँदनी) से ढका चन्द्रमा आकाश में उदित दिख रहा है। अब मैं आपको जाने की अनुमति देती हूँ; जाइए, राम की सेवा में रहिए। मधुर वचन कहती हुई आपसे मैं भी सन्तुष्ट हुई। हे मिथिलेशकुमारी! मेरे ही दिए वस्त्र-आभूषणों से अभी मेरे सामने अपने को सजाइए; दिव्य अलंकारों से शोभित होकर, हे वत्से, मुझे प्रसन्न कीजिए।”
तब देवकन्या-सी सीता भलीभाँति सजकर, सिर झुकाकर अनसूया के चरणों में प्रणाम करके राम की ओर चलीं। वक्ताओं में श्रेष्ठ राघव ने वैसे सजी-धजी सीता को देखा और तपस्विनी के प्रेम-उपहार से प्रसन्न हुए। मिथिलेशकुमारी सीता ने तपस्विनी के दिए वस्त्र-आभूषण-माला के प्रेम-उपहार का सारा वृत्तान्त राम को सुनाया। मनुष्यों में अत्यन्त दुर्लभ इस सत्कार को देखकर राम और महारथी लक्ष्मण परम प्रसन्न हुए।
तब उस पवित्र होलिका के सत्कार से सम्मानित, चन्द्रमुखी सीता को देखकर, सब तपस्वियों द्वारा सम्मानित रघुनन्दन राम ने प्रसन्न होकर वह पवित्र रात्रि वहीं बिताई। वह रात बीत जाने पर, अग्निहोत्र करने वाले वनवासी तपस्वियों से, स्नान के बाद, नरश्रेष्ठ राम-लक्ष्मण ने विदा माँगी। धर्मचारी उन वनचर तपस्वियों ने उस वन के राक्षस-संकुल मार्ग के विषय में दोनों भाइयों को बताया:
“हे राघव! इस महावन में नाना रूप धारण करने वाले नरभक्षी राक्षस और रक्त पीने वाले हिंसक जन्तु बसते हैं। ये जूठे मुँह या असावधान तपस्वी-ब्रह्मचारी को इस महावन में खा जाते हैं; हे राघव! इनसे रक्षा कीजिए। यह वह मार्ग है जिससे महर्षि वन में फल लाने जाते हैं; हे राघव! इसी मार्ग से इस दुर्गम वन में जाना आपके लिए उचित होगा।”
हाथ जोड़े तपस्वी ब्राह्मणों द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, फूल आदि से, मंगलकामना और आशीर्वाद सहित विदा किए गए परंतप राघव, सीता और लक्ष्मण सहित, उस वन के हृदय में वैसे ही प्रविष्ट हुए जैसे सूर्य मेघमण्डल में प्रवेश करता है।
समझने की कुंजी (अरण्यकाण्ड की भूमिका): राम का दण्डक वन में प्रवेश आगामी अरण्यकाण्ड (तीसरी पुस्तक) की भूमिका है, जहाँ शूर्पणखा, खर-दूषण और अन्ततः सीताहरण की घटनाएँ घटेंगी। यहाँ अयोध्या की राजनीति पीछे छूट जाती है और कथा वन-वन भटकते राम के संघर्ष की ओर मुड़ती है।
सार: कथा सुनकर अनसूया सीता को सायंकाल का सुन्दर वर्णन करके, दिव्य आभूषणों से सजाकर, राम के पास विदा करती हैं। दिव्य अलंकारों से शोभित सीता को देख राम और लक्ष्मण प्रसन्न होते हैं। रात बिताकर, तपस्वियों से दण्डक वन के मार्ग और संकटों की जानकारी पाकर, उनके आशीर्वाद के साथ राम सीता-लक्ष्मण सहित दण्डक वन में प्रवेश करते हैं।
मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, अयोध्याकाण्ड, सर्ग 65-119; पाठान्तर में गीता प्रेस का क्रम रखा गया है।
आधार: वाल्मीकि रामायण (गीता प्रेस, गोरखपुर)