मोह-मुद्गर, “moh को तोड़ने वाला हथौड़ा”
आदि शंकराचार्य की 12-verse-दादशा-मञ्जरिका + 14 शिष्यों की verses + 7 closing
🟢 पूरा , सभी 33 verses, हर एक का पाँच-block treatment। verified Sanskrit।
पहले एक बात
एक कहानी है। शंकराचार्य काशी की गलियों में चल रहे थे। 80 साल का एक brahman अपने chamber में बैठा “डुकृञ् करणे, डुकृञ् करणे” बार-बार बोल रहा था। यह Panini की संस्कृत-व्याकरण की एक specific dhātu-rule है, जो बच्चे रटते हैं। शंकर ने देखा, सोचा, “यह आदमी मरने वाला है, और grammar-rules रट रहा है।”
उसी moment Bhaja Govindam compose हुई, या परंपरा कहती है। पहली ही पंक्ति, “गोविन्द को भज, गोविन्द को भज, गोविन्द को भज, हे मूर्ख मन। जब मृत्यु आ जाएगी, तेरी डुकृञ्-rules कुछ नहीं बचाएँगी।”
यह harsh लगता है शुरू में। मगर यह affection-driven harshness है, गुरु की चाबुक की तरह। शंकर ने इसे “मोह-मुद्गर” कहा, यानी “moh को तोड़ने वाला हथौड़ा।”
रचना तीन parts में है: पहले 12 verses (Dvadasha-manjarika) शंकर के अपने। बीच के 14 शिष्यों के। आख़िरी 7 फिर शंकर के, closing के लिए। Total 33 verses (कुछ editions में 31-34, version variations से)। हर verse के अंत में “भज गोविन्दं भज गोविन्दं …” refrain आती है।
tone काफ़ी sharp है, मगर सख़्ती के पीछे genuine concern है। हर verse एक मनोवैज्ञानिक observation है, बच्चा-जवान-बूढ़ा के distractions, धन-stree-यौवन का गर्व, परिवार-attachment की conditionality, monk-form vs internal-renunciation का distinction।
इसे कैसे पढ़ें
एक approach: एक सिटिंग में, 33 verses, 60 मिनट का focused-reading।
दूसरा approach: हर रोज़ एक verse, 33 दिन का pact। एक verse पर 10-15 मिनट, उसका रहस्य खुलने तक बैठें।
तीसरा approach: सिर्फ़ देवनागरी, बार-बार। Mantra-quality पकड़ने का तरीक़ा। फिर एक दिन अर्थ देखें।
recital practice: दिल्ली के बहुत-से Sankaracharya-mathadhipatis इसे complete recital देते हैं, 30-40 मिनट में। YouTube पर बहुत-से recordings हैं।
सम्प्राप्ते सन्निहिते काले नहि नहि रक्षति डुकृङ्करणे ॥ 1 ॥
samprāpte sannihite kāle nahi nahi rakṣati ḍukṛṅkaraṇe || 1 ||
भज = “भजन कर।” गोविन्द = कृष्ण का एक नाम। मूढमते = “हे मूर्ख मन।” सम्प्राप्ते = “जब आ जाए।” सन्निहिते = “पास।” काले = “मृत्यु-समय।” डुकृङ्करण = एक संस्कृत व्याकरण-rule, “डुकृञ् करणे” (the dhātu for “to do”)।
गोविन्द को भज, गोविन्द को भज, गोविन्द को भज, हे मूर्ख मन। जब मृत्यु-समय आ जाएगा, तब तेरी संस्कृत-व्याकरण-rules कोई काम नहीं आएँगी।
पूरी रचना का thesis यहीं है। शंकर के साथ एक legend जुड़ी है, उन्होंने एक 80-साल के grammar-scholar को रट-कर “डुकृञ्” rules याद करते देखा, और सोचा, “यह आदमी मरने वाला है, यह क्या कर रहा है?” उसी moment Bhaja Govindam composed हुई। “मूढमते” यानी “मूर्ख मन।” यह harsh लग सकता है, मगर यह affection-driven harshness है, गुरु का shock-treatment। दिल्ली के IAS-aspirants जो 30 साल तक syllabus रटते रहते हैं, फिर 50 साल की उम्र में सोचते हैं “मैंने क्या किया?”, उनके लिए यह verse exactly designed है।
शंकर का अद्वैत-vedanta नियम-formal philosophical होता है। Bhaja Govindam अलग है, यह devotional-immediate है। यह same Shankara है मगर शिक्षा-mode में। मूल claim एक ही, यानी “ब्रह्म-realisation।” मगर tools अलग।
यल्लभसे निजकर्मोपात्तं वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ॥ 2 ॥
yallabhase nijakarmopāttaṃ vittaṃ tena vinodaya cittam || 2 ||
मूढ = “मूर्ख।” जहीहि = “त्याग कर।” धनागम-तृष्णां = “धन-प्राप्ति की प्यास।” सद्बुद्धिं = “सच्ची बुद्धि।” वितृष्णां = “बिना-तृष्णा।” निजकर्मोपात्तं = “अपने कर्म से प्राप्त।” विनोदय = “मनोरंजन कर।”
मूर्ख, धन-प्राप्ति की प्यास छोड़, मन में सद्बुद्धि और निर्मोह बना। जो भी अपने कर्म से मिले, उसी से मन को संतुष्ट कर।
धन का त्याग नहीं, धन की “तृष्णा” का त्याग। यह subtle distinction है। शंकर नहीं कह रहे “गरीब हो जाओ।” वो कह रहे हैं, “जो मिले, उसमें settle हो।” दिल्ली के professionals जो हर साल 25% raise चाहते हैं, फिर भी unhappy रहते हैं, उनके लिए यह “वित्तं तेन विनोदय चित्तम्” वाली पंक्ति है। मिलने वाले से करा संतुष्टि, यह skill है।
भगवद् गीता अध्याय 6 का “युक्ताहार-विहारस्य” इसी principle का formal-version है। संतोष की theory दोनों में same है।
एतन्मांसवसादिविकारं मनसि विचिन्तय वारं वारम् ॥ 3 ॥
etanmāṃsavasādivikāraṃ manasi vicintaya vāraṃ vāram || 3 ||
नारी-स्तन-भर-नाभी-देश = “स्त्री-शरीर के विशेष भाग।” दृष्ट्वा = “देख कर।” मा गा = “मत जा।” मोहावेश = “मोह में।” मांस-वसा-आदि-विकार = “मांस-चर्बी-आदि का विकार।” वारं वारम् = “बार-बार।”
नारी-शरीर के parts देख कर मोह में मत बहो। यह सब मांस-चर्बी का विकार है, इसे बार-बार मन में सोच।
यह verse blunt है, modern sensibility में difficult। मगर शंकर का context: वो 8वीं सदी के monks-को address कर रहे हैं, और उनकी biggest temptation यही थी। आज भी sex-driven attention-economy का जो problem है, उसका Vedic version यहाँ। शंकर का method “anatomy-meditation” है, यह Buddhist परंपरा में भी है, जिसे “ashubha-bhavana” कहते हैं। मगर modern reader को यह verse पर ज़रूर रुकना चाहिए, क्योंकि context-without यह body-shaming लगता है।
इसी पैटर्न पर Avadhuta Gita और Vivekachudamani में भी references हैं। शंकर consistent हैं इस point पर, body को real-substance के रूप में देखना अस्वीकार।
विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं लोकं शोकहतं च समस्तम् ॥ 4 ॥
viddhi vyādhyabhimānagrastaṃ lokaṃ śokahataṃ ca samastam || 4 ||
नलिनी-दल = “कमल का पत्ता।” गत-जलम् = “गिरा हुआ पानी।” अति-तरलम् = “बहुत चंचल।” जीवित = “जीवन।” अति-चपलम् = “बहुत चंचल।” व्याधि-अभिमान-ग्रस्तम् = “व्याधि और अभिमान से ग्रस्त।” शोक-हतम् = “शोक से मारा हुआ।”
जैसे कमल के पत्ते पर गिरा पानी एक moment में लुढ़क जाता है, वैसे ही जीवन भी अत्यंत चंचल है। पूरा संसार व्याधि और अभिमान से ग्रस्त है, और शोक से मारा हुआ है।
कमल-पत्ते पर पानी की image शंकर की signature है। यह उसी कमल का है जो Bhagavad Gita 5.10 में “पद्म-पत्र-इव अम्भसा” (कमल-पत्ते-पानी की तरह) रूप में आता है। मगर वहाँ “अलिप्त” वाला metaphor है, यहाँ “चंचल” वाला। दिल्ली में मानसून की पहली बारिश में पत्तों पर पानी की चमक देखी हो, उसी moment से पूरा metaphor accessible है।
भगवद् गीता 5.10 में “कमल-पत्र पानी” से अलिप्त। यहाँ “कमल-पत्र पानी” से चंचल। एक ही image, दो different teaching।
पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे ॥ 5 ॥
paścājjīvati jarjaradehe vārtāṃ ko’pi na pṛcchati gehe || 5 ||
यावत् = “जब तक।” वित्त-उपार्जन-सक्तः = “धन-कमाने में लगा।” तावत् = “तब तक।” परिवार रक्तः = “परिवार attached।” पश्चात् = “बाद में।” जर्जर-देहे = “बूढ़े-शरीर में।” वार्तां कोऽपि न पृच्छति = “कोई हाल नहीं पूछता।”
जब तक तू धन कमाने में लगा है, तब तक तेरा परिवार तुझ से attached है। बाद में जब बूढ़ा-शरीर बच जाता है, तब घर में कोई हाल भी नहीं पूछता।
यह verse painful है, क्योंकि यह सच्ची है। दिल्ली के बहुत-से पिता जिन्होंने 35 साल बच्चों के लिए कमाया, retirement के बाद same बच्चे time नहीं देते। शंकर judge नहीं कर रहे, observe कर रहे हैं। यह transactional-attachment की reality है।
सुखमनी साहिब (M5) के “अष्टपदी 13” में भी same observation है: संसार-संबंध सब conditional हैं। शंकर 8वीं सदी, गुरु अर्जन 16वीं सदी, मगर experience एक।
गतवति वायौ देहापाये भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ॥ 6 ॥
gatavati vāyau dehāpāye bhāryā bibhyati tasminkāye || 6 ||
यावत् पवनो = “जब तक प्राण।” निवसति देहे = “शरीर में रहता है।” पृच्छति कुशलं = “हाल पूछता है।” गतवति वायौ = “जब प्राण चला गया।” देह-अपाये = “शरीर के अंत में।” भार्या बिभ्यति = “पत्नी डरती है।” काये = “शरीर से।”
जब तक शरीर में प्राण है, तब तक घर में हाल पूछा जाता है। जब प्राण चला गया, शरीर के अंत में, पत्नी भी उस शरीर से डरती है।
पिछले verse का continuation। यहाँ end-state है। मृत्यु के बाद का body, जो कुछ ही देर पहले “मेरा प्रिय” था, अब “लाश” बन जाता है, और सब डरते हैं। दिल्ली के crematoriums में जो scene रोज़ चलती है, उसका 8वीं सदी का documentation।
इस अनुभव की detailed exploration कठोपनिषद् (नचिकेता-यम-संवाद) में है, जहाँ death-context का foundation है।
वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः परमे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः ॥ 7 ॥
vṛddhastāvaccintāsaktaḥ parame brahmaṇi ko’pi na saktaḥ || 7 ||
बालः = “बच्चा।” क्रीडा-सक्तः = “खेल में लीन।” तरुणः = “जवान।” तरुणी-सक्तः = “जवान-स्त्री में लीन।” वृद्धः = “बूढ़ा।” चिन्ता-सक्तः = “चिन्ता में लीन।” परमे ब्रह्मणि = “परम ब्रह्म में।”
बच्चा खेल में लीन, जवान जवान-स्त्री में लीन, बूढ़ा चिन्ता में लीन। मगर परम ब्रह्म में कोई भी लीन नहीं।
तीन age-groups, तीन preoccupations, और एक underlying-message: हर age की अपनी distraction है। यह observation सच्ची है। दिल्ली के 6-साल-बच्चे video-games में, 26-साल-वाले relationships में, 60-साल-वाले retirement-anxiety में। शंकर पूछ रहे हैं: कब फिर ब्रह्म-attention?
भगवद् गीता का “स्थितप्रज्ञ” वर्णन इसी absent-attention की counterpoint है।
कस्य त्वं कः कुत आयातः तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः ॥ 8 ॥
kasya tvaṃ kaḥ kuta āyātaḥ tattvaṃ cintaya tadiha bhrātaḥ || 8 ||
का ते कान्ता = “तेरी पत्नी कौन?” कस्ते पुत्रः = “तेरा पुत्र कौन?” अति विचित्र = “बहुत आश्चर्यजनक।” कस्य त्वम् = “तू किसका?” कः कुत आयातः = “तू कौन, कहाँ से आया?” भ्रातः = “हे भाई।”
तेरी पत्नी कौन है, तेरा बेटा कौन है? यह संसार बहुत आश्चर्यजनक है। तू किसका है, तू कौन है, कहाँ से आया है? हे भाई, इन तत्त्वों का चिन्तन कर।
पाँच classic questions, “मैं कौन?” “कहाँ से आया?” “किसका हूँ?” शंकर ने यहाँ Vedanta-foundation पूछ डाले हैं। यह आज भी हर genuine seeker के starting-questions हैं। बच्चे जब 5 साल के होते हैं, पूछते हैं “मैं कहाँ से आया?” शंकर कह रहे हैं, अब 40 साल के हो कर वही सवाल फिर पूछो।
यह “कोऽहम्” प्रश्न Ashtavakra Gita प्रकरण 1 का opening भी है। शंकर इसी ancient प्रश्न को restate कर रहे हैं।
निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥ 9 ॥
nirmohatve niścalatattvaṃ niścalatattve jīvanmuktiḥ || 9 ||
सत्सङ्गत्वे = “सत्संग से।” निस्सङ्गत्वम् = “नि-संग।” निर्मोहत्वम् = “नि-मोह।” निश्चल-तत्त्वम् = “स्थिर-तत्त्व।” जीवन्मुक्तिः = “जीते-जी मुक्ति।”
सत्संग से नि-संग होते हैं। नि-संग से नि-मोह। नि-मोह से निश्चल-तत्त्व। निश्चल-तत्त्व से जीवन्मुक्ति।
यह verse सबसे famous है। पाँच steps का chain: सत्संग → नि-संग → नि-मोह → निश्चलता → जीवन-मुक्ति। यह practical roadmap है। शंकर ने compress कर के पूरा spiritual-path इन 4 lines में रख दिया। दिल्ली के spiritual-seekers इसे memorize करते हैं। 11-12 शब्द, मगर पूरा अद्वैत-program।
योग सूत्र पाद 2 में भी ऐसा progression है (यम-नियम-आसन-प्राणायाम-…)। शंकर का यह 4-step version compressed-form में।
क्षीणे वित्ते कः परिवारः ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः ॥ 10 ॥
kṣīṇe vitte kaḥ parivāraḥ jñāte tattve kaḥ saṃsāraḥ || 10 ||
वयसि गते = “उम्र चली गई।” काम-विकारः = “काम-विकार।” शुष्के नीरे = “पानी सूख गया।” कासारः = “तालाब।” क्षीणे वित्ते = “धन कम।” तत्त्वे ज्ञाते = “तत्त्व को जान कर।”
उम्र बीत गई, फिर कैसा काम-विकार? पानी सूख गया, फिर कैसा तालाब? धन कम हो गया, फिर कैसा परिवार? तत्त्व जान लिया, फिर कैसा संसार?
चार parallel rhetorical questions। हर एक एक specific dependence दिखाती है। शंकर कह रहे हैं, सब-कुछ conditional है। और अंतिम तुलना यह है: जब तत्त्व जान लिया, तब “संसार” बच ही नहीं जाता। यह radical statement है।
अष्टावक्र गीता प्रकरण 13 (यथासुख) इसी “conditions remove कर के state देख” वाली approach को apply करती है।
मायामयमिदमखिलं हित्वा ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा ॥ 11 ॥
māyāmayamidamakhilaṃ hitvā brahmapadaṃ tvaṃ praviśa viditvā || 11 ||
मा कुरु = “मत कर।” धन-जन-यौवन-गर्वम् = “धन-लोग-जवानी का गर्व।” निमेषात् = “एक pal में।” मायामयम् = “माया-मय।” अखिलं = “सब।” हित्वा = “त्याग कर।” ब्रह्मपदं प्रविश = “ब्रह्म-पद में प्रवेश कर।”
धन, लोग, जवानी पर गर्व मत कर। काल एक pal में सब हर लेता है। यह सब माया-मय है, इसे त्याग कर ब्रह्म-पद में प्रवेश कर, जान कर।
तीन common sources of pride, धन-जन-यौवन, सब temporary। शंकर का message: यह अहंकार-fuel है, इसके instead actual reality की ओर देख। दिल्ली के नवधनिकों के लिए (और जो भी net-worth-driven self-identity carry करते हैं) यह verse direct है।
भगवद् गीता 16-अध्याय (देव-असुर-संपद) में आसुर-सम्पद की सूची में “धन-दर्प-मद” आता है। यह verse उसी का concentrated essence।
कालः क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि न मुञ्चत्याशावायुः ॥ 12 ॥
kālaḥ krīḍati gacchatyāyustadapi na muñcatyāśāvāyuḥ || 12 ||
दिनयामिन्यौ = “दिन और रात।” सायं प्रातः = “शाम-सुबह।” शिशिर-वसन्तौ = “शीत-ऋतु और वसंत।” काल क्रीडति = “काल खेलता है।” गच्छति आयुः = “आयु जाती है।” आशा-वायुः = “आशा-रूपी हवा।” मुञ्चति = “छोड़ती।”
दिन-रात, शाम-सुबह, शीत-वसंत, फिर-फिर आते हैं। काल खेलता है, आयु जा रही है, फिर भी आशा-वायु छोड़ती नहीं।
टाइम-cycles का beautiful observation। साल-दर-साल वही cycle, मगर हम अभी भी “अगला साल बेहतर होगा” वाली आशा carry करते हैं। आशा-वायु। यह “वायु” शब्द perfect है, हवा है, खाली है, मगर पकड़ नहीं छोड़ती। दिल्ली में हर 1 January को resolutions बनते हैं, और हर 31 December को break। यह verse exactly वही cycle observe कर रहा है।
यह verse पूरी Dvadasha-manjarika (शंकर के 12-verse गुच्छ) का closing है। अगले verses (13-27) उनके 14 disciples के हैं।
त्रिजगति सज्जनसङ्गतिरेका भवति भवार्णवतरणे नौका ॥ 13 ॥
trijagati sajjanasaṅgatirekā bhavati bhavārṇavataraṇe naukā || 13 ||
कान्ता = “स्त्री।” धन-गत-चिन्ता = “धन की चिन्ता।” वातुल = “हे पागल।” नियन्ता = “controller, regulator।” त्रिजगति = “तीन लोकों में।” सज्जन-सङ्गति = “सज्जनों की संगति।” भव-अर्णव = “संसार-समुद्र।” तरण = “पार।” नौका = “नौका।”
तू स्त्री और धन की चिन्ता क्यों कर रहा है, हे पागल? क्या तेरा कोई नियन्ता नहीं है? तीनों लोकों में, सज्जनों की संगति ही संसार-समुद्र पार करने की नौका है।
यह verse पद्म-पाद-आचार्य (शंकर के एक shishya) की मानी जाती है। “सज्जन-संगति” पर यह emphasis traditional vedanta का है। दिल्ली में “good company” का importance बच्चपन से सिखाया जाता है, “अच्चे लोगों के साथ रहो।” यह उसी common-sense का formal Vedic articulation।
भगवद् गीता 13-अध्याय का “साधु-सङ्ग” reference और गुरु ग्रन्थ साहिब का “साधसङ्गति” यहाँ एक ही point पर मिलते हैं।
पश्यन्नपि च न पश्यति मूढो ह्युदरनिमित्तं बहुकृतवेषः ॥ 14 ॥
paśyannapi ca na paśyati mūḍho hyudaranimittaṃ bahukṛtaveṣaḥ || 14 ||
जटिल = “जटाधारी।” मुण्डी = “मुण्डा हुआ।” लुञ्छित-केशः = “बाल खींचे हुए।” काषाय-अम्बर = “गेरुआ-वस्त्र।” बहु-कृत-वेषः = “बहुत वेष धरे।” पश्यन्नपि = “देखते हुए भी।” न पश्यति = “देखता नहीं।” उदर-निमित्तं = “पेट के लिए।”
जटाधारी, मुण्डा हुआ, बाल खींचे हुए, गेरुआ-वस्त्र, कई वेष धरे। देखते हुए भी देखता नहीं। मूर्ख। पेट के लिए कई वेष धारे हुए है।
यह सबसे sharp verse है। शंकर के लिए spirituality का outward-show useless है। जो “spiritual-look” है मगर actual realisation नहीं। दिल्ली के Spiritual-marketplace में आज भी यह verse fully applicable है। Sadhu, Maharaj, Yoga-guru, “expert,” सब category-labels के लिए। शंकर पूछ रहे हैं, क्या वो “देख” रहे हैं?
यह harsh critique है, मगर शंकर consistently इस stance पर हैं। Vivekachudamani भी same warning carry करती है।
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम् ॥ 15 ॥
vṛddho yāti gṛhītvā daṇḍaṃ tadapi na muñcatyāśāpiṇḍam || 15 ||
अङ्गं गलितम् = “अंग shaft हो गया।” पलितं मुण्डम् = “बाल सफ़ेद।” दशन-विहीनम् = “दाँत बिना।” तुण्डम् = “मुँह।” वृद्धः याति गृहीत्वा दण्डम् = “बूढ़ा छड़ी ले कर जाता।” आशा-पिण्डम् = “आशा का पिण्ड।”
अंग गिरते जा रहे, बाल सफ़ेद, मुँह दाँत-बिना। बूढ़ा छड़ी ले कर चल रहा। फिर भी आशा का पिण्ड नहीं छोड़ता।
यह verse painful-funny है। शंकर ने physical-decay का graphic-description किया है, और बीच में बैठा है एक 80-साल का insan जो अभी भी desires-list maintain कर रहा है। दिल्ली के Old-Age-homes में यह scene रोज़ की है।
भगवद् गीता का “देहीनोऽस्मिन् यथा देहे कौमारं यौवनं जरा” (2.13) इस physical-decay की formal-philosophy है। यह verse उसी की warm-Hindi-translation।
करतलभिक्षस्तरुतलवासः तदपि न मुञ्चत्याशापाशः ॥ 16 ॥
karatalabhikṣastarutalavāsaḥ tadapi na muñcatyāśāpāśaḥ || 16 ||
अग्रे वह्निः = “आगे आग।” पृष्ठे भानुः = “पीछे सूर्य।” चुबुक-समर्पित-जानुः = “घुटनों पर ठोड़ी टिकाई।” करतल-भिक्षः = “हथेली में भिक्षा।” तरु-तल-वासः = “पेड़ के नीचे रहना।” आशा-पाशः = “आशा का बंधन।”
सामने आग, पीछे सूरज। रात में घुटनों पर ठोड़ी टिकाए। हाथ में भिक्षा, पेड़ के नीचे रहता है। फिर भी आशा का बंधन नहीं छोड़ता।
यह “monk” का description है, मगर शंकर कह रहे हैं, बाहर का renunciation भी sufficient नहीं अगर “आशा-पाश” अंदर है। यह verse internal-vs-external का distinction draw करता है। बाहर त्याग आसान, अंदर का त्याग कठिन।
Avadhuta Gita में यह बहुत explicitly कहा गया है: real avadhuta वही जो inner-attachment-free हो। शंकर यहाँ same warning दे रहे हैं।
ज्ञानविहीनः सर्वमतेन भजति न मुक्तिं जन्मशतेन ॥ 17 ॥
jñānavihīnaḥ sarvamatena bhajati na muktiṃ janmaśatena || 17 ||
गङ्गासागर-गमनम् = “गंगा-समुद्र-यात्रा।” व्रत-परिपालनम् = “व्रत-पालन।” दानम् = “दान।” ज्ञान-विहीनः = “ज्ञान-बिना।” सर्वमतेन = “सब schools के अनुसार।” भजति न मुक्तिम् = “मुक्ति नहीं पाता।” जन्म-शतेन = “सौ जन्मों में।”
गंगा-सागर की यात्रा करे, व्रत पाले, या दान दे। ज्ञान-बिना, सब schools के अनुसार, सौ जन्मों में भी मुक्ति नहीं पाता।
शंकर consistent हैं, ज्ञान-without ritual = empty। दान, तीर्थ-यात्रा, व्रत सब अच्छे हैं, मगर necessary-not-sufficient। यह उन Hindus के लिए important reminder है जो सोचते हैं “मैंने तीर्थ-यात्रा कर ली, अब सब-ठीक।”
भगवद् गीता 4-अध्याय: “ज्ञानाग्नि सर्व-कर्माणि भस्मसात्कुरुते।” ज्ञान-fire सब-कर्मों को भस्म कर देती है। शंकर वही point repeat कर रहे हैं।
सर्व-परिग्रह-भोग-त्यागः कस्य सुखं न करोति विरागः ॥ 18 ॥
sarva-parigraha-bhoga-tyāgaḥ kasya sukhaṃ na karoti virāgaḥ || 18 ||
सुर-मन्दिर = “देव-मंदिर।” तरु-मूल = “पेड़ की जड़।” निवासः = “निवास।” शय्या = “बिस्तर।” भू-तल = “ज़मीन।” अजिन = “मृग-चर्म।” वासः = “वस्त्र।” सर्व-परिग्रह = “सब-संग्रह।” विरागः = “वैराग्य।”
देव-मंदिर या पेड़ की जड़ निवास, बिस्तर ज़मीन, मृग-चर्म वस्त्र। सब-संग्रह और भोग का त्याग। यह वैराग्य किसे सुख नहीं देता?
पिछले verse (16) में “monk-form, मगर आशा-पाश” warning थी। इस verse में real-त्याग का positive-side। यह paradoxical लगता है, मगर शंकर कह रहे हैं, genuine renunciation actually pleasant है, painful नहीं। दिल्ली के बहुत-से शुद्ध-monastic-traditions में अब भी यह practice है।
योग-सूत्र पाद 2 का “अपरिग्रह” (non-possession) पर यह verse एक comment है।
यस्य ब्रह्मणि रमते चित्तं नन्दति नन्दति नन्दत्येव ॥ 19 ॥
yasya brahmaṇi ramate cittaṃ nandati nandati nandatyeva || 19 ||
योग-रतः = “योग में लीन।” भोग-रतः = “भोग में लीन।” सङ्ग-रतः = “संग में।” सङ्ग-विहीन = “संग-बिना।” यस्य ब्रह्मणि रमते चित्तं = “जिसका चित्त ब्रह्म में रमे।” नन्दति = “आनंदित होता है।”
चाहे योग में लीन हो, या भोग में, या संगति में, या अकेला, जिसका चित्त ब्रह्म में रमता है, वह आनंदित होता है, आनंदित होता है, आनंदित ही होता है।
सबसे inclusive verse है। शंकर कह रहे हैं, external-form नहीं matter करती। योगी हो, भोगी हो, social हो, hermit हो , internal-orientation ब्रह्म-attentive है, तो आनंद आता है। दिल्ली के professionals जो “साधना के लिए monastic-life चाहिए” सोचते हैं, उनके लिए यह verse liberating है।
अष्टावक्र गीता प्रकरण 18 (जीवन्मुक्ति) इसी point को expand करती है: real-mukti हर lifestyle में possible है।
सकृदपि येन मुरारिसमर्चा क्रियते तस्य यमेन न चर्चा ॥ 20 ॥
sakṛdapi yena murārisamarcā kriyate tasya yamena na carcā || 20 ||
भगवद्गीता = “भगवद् गीता।” किञ्चित् अधीता = “थोड़ी भी पढ़ी।” गङ्गा-जल-लव-कणिका = “गंगा-जल की एक बूँद।” पीता = “पी ली।” सकृत् अपि = “एक बार भी।” मुरारि-समर्चा = “मुरारी (कृष्ण) की पूजा।” यमेन न चर्चा = “यम (मृत्यु) से discussion नहीं।”
जिसने भगवद् गीता थोड़ी भी पढ़ी हो, गंगा-जल की एक बूँद भी पी हो, मुरारी की एक बार पूजा की हो, उसकी यम (मृत्यु) से कोई discussion नहीं।
यह verse भगवद् गीता को directly endorse करती है। “किञ्चित्” यानी “थोड़ी भी”। यह spiritual-arrogance के against है: तू पूरी गीता नहीं पढ़ पाया? कोई बात नहीं, थोड़ी भी पढ़ ले। यह encouraging-tone है, demanding नहीं।
भगवद् गीता site पर हमारी 18-अध्याय की commentary से directly जुड़ता है। यह self-referential है: read the Gita that this site already has।
इह संसारे बहुदुस्तारे कृपयाऽपारे पाहि मुरारे ॥ 21 ॥
iha saṃsāre bahudustāre kṛpayā’pāre pāhi murāre || 21 ||
पुनः अपि = “फिर भी।” जननम् = “जन्म।” मरणम् = “मृत्यु।” जननी-जठरे = “माँ के पेट में।” शयनम् = “सोना।” बहु-दुस्तारे = “बहुत मुश्किल पार करने वाले।” कृपया अपारे = “अपार कृपा से।” पाहि = “रक्षा कर।” मुरारे = “मुरारी।”
फिर जन्म, फिर मृत्यु, फिर माँ के पेट में सोना। इस बहुत-मुश्किल-पार-करने-वाले संसार में, अपार कृपा से मुझे बचा, मुरारी!
यह verse cycle-of-rebirth का painful acknowledgement है। शंकर pleadingly कह रहे हैं, “मुरारी पाहि।” यह formal philosophy नहीं, यह devotional cry है। शंकर का यह devotional-side अक्सर overlook होता है, उन्हें “dry advaitin” समझा जाता है। मगर वो “भज मुरारी” भी थे।
Bhagavad Gita 13-अध्याय: “जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि-दुःख-दोषानुदर्शनम्।” वही awareness, वही cry।
योगी योगनियोजितचित्तो रमते बालोन्मत्तवदेव ॥ 22 ॥
yogī yoganiyojitacitto ramate bālonmattavadeva || 22 ||
रथ्या-चर्पट = “सड़क के कपड़े के टुकड़े।” विरचित-कन्थ = “जुड़ा हुआ कपड़ा।” पुण्य-अपुण्य-विवर्जित-पन्थ = “पुण्य-पाप से रहित मार्ग।” योग-नियोजित-चित्तः = “योग में लगा चित्त।” बाल-उन्मत्त-वत् = “बच्चे और पागल की तरह।”
सड़क के टुकड़ों से जोड़ कर कपड़ा बना, पुण्य-पाप के पार के मार्ग पर, योगी अपने योग-लगे-चित्त के साथ, बच्चे या पागल की तरह आनंदित होता है।
यह “अवधूत” का beautiful description है, society की categories से बाहर, जो भी मिले उसमें संतुष्ट, और inside playful। दिल्ली में इस तरह के लोग बहुत कम हैं, मगर हैं, कुछ ऋषिकेश, कुछ बनारस-ghat पर। शंकर का यह romantic-yet-real picture।
Avadhuta Gita का central theme यही है। Bhaja Govindam Avadhuta-Gita की एक baby version है, या उसका gateway।
इति परिभावय सर्वमसारं विश्वं त्यक्त्वा स्वप्न-विचारम् ॥ 23 ॥
iti paribhāvaya sarvamasāraṃ viśvaṃ tyaktvā svapna-vicāram || 23 ||
कस्त्वम् = “तू कौन?” कोऽहम् = “मैं कौन?” कुत आयातः = “कहाँ से आया?” का मे जननी = “मेरी माँ कौन?” को मे तातः = “मेरा पिता कौन?” परिभावय = “अच्छे से विचार कर।” सर्वम् असारम् = “सब असार।” स्वप्न-विचारम् = “स्वप्न-विचार।”
तू कौन, मैं कौन, कहाँ से आया, मेरी माँ कौन, मेरा पिता कौन? ऐसा अच्छे से विचार कर। सब असार है, यह विश्व, स्वप्न-विचार है, छोड़।
यह verse 8 का echo है, थोड़ा reformulated। पाँच रिश्ते-questions। शंकर बार-बार वही foundational-inquiry को re-introduce कर रहे हैं। यह repetition intentional है, बिना repetition के यह questions stick नहीं करते।
अष्टावक्र गीता प्रकरण 1 की “कोऽहम्” inquiry का refrain।
भव समचित्तः सर्वत्र त्वं वाञ्छस्यचिराद्यदि विष्णुत्वम् ॥ 24 ॥
bhava samacittaḥ sarvatra tvaṃ vāñchasyacirādyadi viṣṇutvam || 24 ||
त्वयि = “तुझ में।” मयि = “मुझ में।” अन्यत्र = “और जगह।” एको विष्णुः = “एक ही विष्णु।” व्यर्थं कुप्यसि = “व्यर्थ क्रोध करता।” मयि असहिष्णुः = “मुझ पर असहिष्णु।” समचित्तः = “सम-चित्त।” वाञ्छसि = “चाहता है।” अचिरात् = “जल्दी।” विष्णुत्वम् = “विष्णु-होना।”
तुझ में, मुझ में, और हर जगह, एक ही विष्णु है। मुझ पर व्यर्थ क्रोध मत कर, असहिष्णु मत बन। हर जगह सम-चित्त हो। अगर जल्दी “विष्णुत्व” चाहता है।
यह verse अद्वैत-statement है, in interpersonal-form। दूसरों से क्रोध करना यानी ख़ुद से क्रोध करना। दिल्ली के office-conflicts, family-disputes, road-rage, सब के लिए यह verse pertinent है। शंकर ने 8वीं सदी में conflict-resolution का formal model दे दिया।
भगवद् गीता 6-अध्याय: “सर्व-भूत-स्थम् आत्मानम् सर्व-भूतानि च आत्मनि।” 12-अध्याय: “सम-दुःख-सुखः” का सम-चित्त।
सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम् ॥ 25 ॥
sarvasminnapi paśyātmānaṃ sarvatrotsṛja bhedājñānam || 25 ||
शत्रौ = “शत्रु में।” मित्रे = “मित्र में।” बन्धौ = “बंधु में।” विग्रह-सन्धौ = “युद्ध-संधि।” यत्नम् = “कोशिश।” सर्वस्मिन् अपि पश्य आत्मानम् = “सब में आत्मा को देख।” उत्सृज = “छोड़।” भेद-अज्ञानम् = “भेद-अज्ञान।”
शत्रु में, मित्र में, पुत्र में, बंधु में, युद्ध-संधि का यत्न मत कर। सब में आत्मा को देख। हर तरफ़ भेद-अज्ञान छोड़।
यह verse आज की दिल्ली में बहुत relevant है। हम सब अपने relationships को categorize करते हैं, कौन शत्रु, कौन मित्र, और फिर उन्ही categories में invest करते हैं। शंकर कह रहे हैं, यह categories ज़्यादा real नहीं हैं। एक deeper unity है।
विभीषण गीता का “जासु कवच अभिमोचय सोई” वाला statement same अद्वैत-implication carry करता है।
आत्मज्ञान-विहीना मूढाः ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः ॥ 26 ॥
ātmajñāna-vihīnā mūḍhāḥ te pacyante narakanigūḍhāḥ || 26 ||
कामं क्रोधं लोभं मोहम् = “काम, क्रोध, लोभ, मोह।” त्यक्त्वा = “त्याग कर।” आत्मानम् भावय = “आत्मा का विचार कर।” कोऽहम् = “मैं कौन?” आत्म-ज्ञान-विहीन = “आत्म-ज्ञान बिना।” नरक-निगूढ़ाः = “नरक में फँसे।”
काम, क्रोध, लोभ, मोह त्याग कर “मैं कौन” का विचार कर। आत्म-ज्ञान-बिना मूर्ख नरक में फँस कर पकते हैं।
यह verse भगवद् गीता 16-अध्याय का echo है, “त्रिविधं नरकस्येदं द्वारम्” (काम-क्रोध-लोभ)। शंकर ने वही trinity ली और मोह add किया। चार gates of trouble। और प्रश्न “कोऽहम्” वही ancient है।
भगवद् गीता 16.21 + शंकर का अद्वैत = perfect alignment। यह same teaching है, बस अलग angle से।
नेयं सज्जन-सङ्गे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम् ॥ 27 ॥
neyaṃ sajjana-saṅge cittaṃ deyaṃ dīnajanāya ca vittam || 27 ||
गेयम् = “गाना चाहिए।” गीता-नाम-सहस्रम् = “गीता और नाम-सहस्र।” ध्येयम् = “ध्यान करना चाहिए।” श्रीपति-रूपम् = “श्री-पति (विष्णु) का रूप।” अजस्रम् = “लगातार।” नेयं चित्तम् = “मन को ले जाना।” देयं वित्तम् = “धन देना।” दीन-जनाय = “दीन-जन को।”
भगवद् गीता और विष्णु सहस्र-नाम गाना चाहिए। श्री-पति का रूप लगातार ध्याना चाहिए। मन को सज्जन-संग में ले जाना चाहिए। और धन दीन-जनों को देना चाहिए।
चार practical actions, बहुत concrete। यह verse गीता और सहस्र-नाम दोनों को specifically endorse करती है, साथ ही सत्संग और दान भी। यह आज की दिल्ली में पूरा executable है: रोज़ गीता पढ़ें, विष्णु सहस्र-नाम सुनें, अच्छे लोगों के साथ रहें, ज़रूरतमंदों की help करें। शंकर ने इसे चार steps में रख दिया।
विष्णु सहस्रनाम site पर already है। यह verse उसे directly endorse करती है।
यद्यपि लोके मरणं शरणं तदपि न मुञ्चति पाप-आचरणम् ॥ 28 ॥
yadyapi loke maraṇaṃ śaraṇaṃ tadapi na muñcati pāpa-ācaraṇam || 28 ||
सुखतः = “सुख से।” क्रियते = “किया जाता।” रामा-भोगः = “स्त्री-भोग।” पश्चात् हन्त = “बाद में, अरे।” शरीरे रोगः = “शरीर में रोग।” मरणं शरणम् = “मृत्यु ही शरण।” पाप-आचरणम् = “पाप-आचरण।”
सुख से स्त्री-भोग किया जाता है, बाद में अरे, शरीर में रोग आता है। यद्यपि लोक में मृत्यु ही अंतिम शरण है, फिर भी पाप-आचरण नहीं छोड़ता।
cycle observation: सुख → रोग → मृत्यु, फिर भी सीख नहीं। शंकर repetition कर रहे हैं अब यह point को, क्योंकि यह point बहुत important है और यह stick नहीं करता।
भगवद् गीता 13-अध्याय का “जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि” repetition यहाँ confirmation है।
पुत्रादपि धन-भाजां भीतिः सर्वत्रैषा विहितरीतिः ॥ 29 ॥
putrādapi dhana-bhājāṃ bhītiḥ sarvatraiṣā vihitarītiḥ || 29 ||
अर्थम् अनर्थम् = “धन को अनर्थ।” भावय नित्यम् = “नित्य विचार कर।” सुख-लेशः = “सुख का लेश।” पुत्रात् अपि = “पुत्र से भी।” धन-भाजां = “धन-वाले।” भीति = “डर।” विहित-रीतिः = “व्यवस्थित रीति।”
धन को अनर्थ (असली प्रयोजन के विपरीत) नित्य विचार। उससे सच में सुख का अंश भी नहीं। धन वालों को अपने पुत्र से भी डर रहता है। यह हर जगह की व्यवस्थित रीति है।
धन का बहुत-गहरा critique। शंकर कह रहे हैं, धन-वाले को “अपने ही बेटे से डर” , यह बहुत specific observation है। दिल्ली के Wealth-Managers कहते हैं, ultra-rich families में inheritance-conflicts सबसे ज़्यादा हैं। शंकर 8वीं सदी में यह देख रहे थे।
भगवद् गीता 16-अध्याय का “आसुर-संपद” (दर्प-दम्भ-अभिमान-क्रोध) के साथ यह verse aligns करती है।
जाप्य-समेत-समाधि-विधानं कुर्ववधानं महदवधानम् ॥ 30 ॥
jāpya-sameta-samādhi-vidhānaṃ kurvavadhānaṃ mahadavadhānam || 30 ||
प्राणायाम = “breath-control।” प्रत्याहार = “sense-withdrawal।” नित्यानित्य-विवेक = “नित्य-अनित्य का विवेक।” जाप्य = “जप।” समाधि-विधानम् = “समाधि-method।” अवधानम् = “attention।” महत् अवधानम् = “great attention।”
प्राणायाम, प्रत्याहार, नित्य-अनित्य-विवेक, जप-सहित-समाधि-विधान, यह सब बहुत-attention से कर।
यह verse Patanjali Yoga-Sutras के साथ direct connection बनाती है। प्राणायाम (पाद 2), प्रत्याहार (पाद 2), समाधि (पाद 1)। शंकर का अद्वैत-vedanta और पतञ्जलि-योग दोनों एक frame में आ रहे हैं।
योग सूत्र पाद 1-2 इस verse के formal-foundation हैं। दोनों texts complementary हैं।
सेन्द्रिय-मानस-नियमादेवं द्रक्ष्यसि निज-हृदयस्थं देवम् ॥ 31 ॥
sendriya-mānasa-niyamādevaṃ drakṣyasi nija-hṛdayasthaṃ devam || 31 ||
गुरु-चरण-अम्बुज = “गुरु के चरण-कमल।” निर्भर-भक्तः = “पूर्ण-भक्त।” अचिरात् = “जल्दी।” इन्द्रिय-मानस-नियमात् = “इन्द्रिय-मन के नियमन से।” द्रक्ष्यसि = “देखेगा।” निज-हृदयस्थम् = “अपने हृदय में स्थित।”
गुरु के चरण-कमलों में पूर्ण-भक्त बन। संसार से जल्दी मुक्त हो। इन्द्रिय और मन के नियमन से ही तू अपने हृदय में स्थित देव को देखेगा।
यह verse traditional Vedanta का closing-template है। तीन elements: गुरु-भक्ति, इन्द्रिय-नियम, और हृदयस्थ-देव-दर्शन। शंकर ने अपने पूरे system को compress कर के 4 lines में रख दिया।
यह last 4 verses (28-31) फिर से शंकर की मानी जाती हैं। 12 + 14 + 4 = 30 verses, plus 1 opening = 31 total। यह count में थोड़ी variation है, मगर content same है।
श्रीमच्छङ्कर-भगवच्छिष्यैः बोधित आसिच्छोधितकरणः ॥ 32 ॥
śrīmacchaṅkara-bhagavacchiṣyaiḥ bodhita āsicchodhitakaraṇaḥ || 32 ||
वैयाकरणः = “व्याकरणवादी।” डुकृञ् करण = the dhātu list। धुरीणः = “मुख्य।” शङ्कर-भगवत्-शिष्यैः = “शंकर-भगवत्-पाद के शिष्यों ने।” बोधित = “समझाया।” शोधित-करण = “purified-instrument।”
कोई एक मूर्ख व्याकरणवादी, डुकृञ्-rule के अध्ययन में लीन। श्रीमत् शंकर-भगवत्-पाद के शिष्यों ने उसे समझाया, और उसकी इंद्रियाँ शुद्ध हुईं।
यह verse meta-historical है। यह बता रहा है कि Bhaja Govindam क्यों composed हुई। एक 80-साल का grammarian डुकृञ् rules रट रहा था, शंकर ने observe किया, और 12 verses (Dvadasha-manjarika) कहीं। फिर उनके 14 disciples ने जोड़ीं। यह verse पूरी कथा को inside-the-text record करता है।
यह self-referential verse है। यह compose-history को preserve करती है। दिल्ली के literary-traditions में यह तकनीक अब rare है, मगर ancient text में common।
नाम-स्मरणाद् अन्य-उपायं नहि पश्यामो भव-तरणे ॥ 33 ॥
nāma-smaraṇād anya-upāyaṃ nahi paśyāmo bhava-taraṇe || 33 ||
नाम-स्मरणात् = “नाम-स्मरण से।” अन्य-उपायम् = “और कोई उपाय।” नहि पश्यामः = “हम नहीं देखते।” भव-तरणे = “संसार-पार में।”
गोविन्द को भज, गोविन्द को भज, गोविन्द को भज, हे मूर्ख मन। नाम-स्मरण के अलावा संसार-पार करने का और कोई उपाय हम नहीं देखते।
closing-verse। पूरी रचना का summary। पहली verse में जो “मूढमते” था, यहाँ फिर है। मगर अब reader को पता है क्यों। नाम-स्मरण = single solution। यह radical simplicity है। शंकर सब philosophical complexity के बावजूद, अंत में यही कहते हैं।
हनुमान चालीसा का “रामलखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप” same simplicity का दूसरा form है। दोनों एक same destination की ओर point करते हैं।
साथ में पढ़ें
- भगवद् गीता , verse 20 explicitly endorses this
- विष्णु सहस्रनाम , verse 27 endorses this
- पतञ्जलि योग सूत्र , verse 30 का formal-source
- अष्टावक्र गीता , “कोऽहम्” का thread
- गणेश अथर्वशीर्ष , comparable Atharva-tradition