मोह-मुद्गर, मोह को तोड़ने वाला हथौड़ा
आदि शंकराचार्य की द्वादश-मञ्जरिका, चौदह शिष्यों की पंक्तियाँ, और शंकर का closing
पहले एक बात
शंकराचार्य काशी की गलियों में चल रहे थे। अस्सी साल का एक पंडित अपने कमरे में बैठा “डुकृञ् करणे, डुकृञ् करणे” बार-बार दोहरा रहा था। यह पाणिनि के व्याकरण की एक धातु-rule है, जो बच्चे रटते हैं। शंकर ने देखा और सोचा, यह आदमी अंत के क़रीब है, और अभी भी grammar की rules रट रहा है। परंपरा कहती है, उसी क्षण भज गोविन्दम् रच गई। पहली ही पंक्ति में चेतावनी, मृत्यु आ जाएगी तो आपकी डुकृञ्-rules कुछ नहीं बचाएँगी।
शुरू में यह कठोर लगता है। मगर यह स्नेह से उपजी कठोरता है, गुरु की चाबुक जैसी। शंकर ने इसे मोह-मुद्गर कहा, यानी मोह को तोड़ने वाला हथौड़ा। रचना तीन हिस्सों में है। पहले बारह श्लोक (द्वादश-मञ्जरिका) शंकर के अपने, बीच के चौदह उनके शिष्यों के, और आख़िरी कुछ फिर शंकर के। हर श्लोक के पीछे एक मनोवैज्ञानिक observation है, बच्चे-जवान-बूढ़े की अलग-अलग distraction, धन-स्त्री-यौवन का गर्व, परिवार के मोह की conditionality, और बाहरी वेष बनाम भीतरी वैराग्य का फ़र्क़।
इसे कैसे पढ़ें
एक तरीक़ा, एक ही बैठक में पूरी रचना, साठ मिनट का focused पाठ। दूसरा तरीक़ा, हर रोज़ एक श्लोक, तैंतीस दिन का संकल्प, एक श्लोक पर दस-पंद्रह मिनट जब तक उसका रहस्य न खुले। तीसरा तरीक़ा, सिर्फ़ देवनागरी, बार-बार, मन्त्र की तरह, और फिर किसी दिन अर्थ देखें।
पूरी रचना का बीज पहली ही पंक्ति में है। गोविन्द का भजन करो, हे मूर्ख मन, क्योंकि जब मृत्यु का समय पास आ जाएगा तब व्याकरण की rules आपको नहीं बचाएँगी। यही वह signature पंक्ति है जो हर refrain में लौटती है। इसके बाद शंकर सीधे मन की एक पुरानी आदत पर हाथ रखते हैं, धन कमाने की प्यास। वे ग़रीबी का उपदेश नहीं दे रहे, वे कह रहे हैं कि अपने कर्म से जो मिले उसी में मन को टिका लो, संतोष को एक कला की तरह सीखो।
श्लोक 1-2 · हथौड़े की पहली चोट
सम्प्राप्ते सन्निहिते काले नहि नहि रक्षति डुकृङ्करणे ॥ 1 ॥
यल्लभसे निजकर्मोपात्तं वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ॥ 2 ॥
अब शंकर शरीर और जीवन की क्षणभंगुरता की ओर मुड़ते हैं। स्त्री-शरीर को देख कर मोह में मत बहो, यह सब मांस और चर्बी का विकार है, इसे बार-बार मन में देखो। यह आठवीं सदी के संन्यासियों को संबोधित कठोर anatomy-ध्यान है, बौद्ध परंपरा की अशुभ-भावना जैसा। और फिर वही कमल के पत्ते वाली छवि, जैसे पत्ते पर गिरा पानी एक क्षण में ढुलक जाता है, वैसे ही जीवन भी अत्यंत चंचल है, और पूरा संसार रोग, अभिमान और शोक से ग्रस्त है।
श्लोक 3-4 · देह और जीवन की चंचलता
एतन्मांसवसादिविकारं मनसि विचिन्तय वारं वारम् ॥ 3 ॥
विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं लोकं शोकहतं च समस्तम् ॥ 4 ॥
यहाँ शंकर परिवार के मोह की सच्चाई खोलते हैं, बिना किसी पर दोष मढ़े, सिर्फ़ observe करते हुए। जब तक आप धन कमाने में लगे हैं, तब तक घर के लोग आपसे जुड़े रहते हैं, बाद में जब बूढ़ा शरीर बच जाता है तो कोई हाल तक नहीं पूछता। और अगला श्लोक इसी का अंतिम पड़ाव है, जब तक देह में प्राण है तब तक कुशल पूछा जाता है, प्राण निकलते ही वही शरीर, जो अभी प्रिय था, लाश बन जाता है और पत्नी तक उससे डरने लगती है। यह रिश्तों की transactional reality का बेरहम दस्तावेज़ है।
श्लोक 5-6 · रिश्तों की शर्त
पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे ॥ 5 ॥
गतवति वायौ देहापाये भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये ॥ 6 ॥
अब एक सीधी तस्वीर, हर उम्र की अपनी distraction। बच्चा खेल में डूबा, जवान युवती में, बूढ़ा चिंता में, मगर परम ब्रह्म में कोई नहीं रमता। इसके तुरंत बाद वे पाँच मूल प्रश्न रख देते हैं जो हर सच्चे साधक की शुरुआत हैं, आपकी पत्नी कौन, बेटा कौन, यह संसार कितना विचित्र है, आप किसके हैं, आप कौन हैं, कहाँ से आए हैं। हे भाई, इन्हीं तत्त्वों पर विचार करो।
श्लोक 7-8 · हर उम्र की उलझन
वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः परमे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः ॥ 7 ॥
कस्य त्वं कः कुत आयातः तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः ॥ 8 ॥
अब रचना का सबसे प्रसिद्ध श्लोक, जिसमें शंकर पूरी साधना को एक सीढ़ी में बाँध देते हैं। सत्संग से नि-संगता आती है, नि-संगता से नि-मोह, नि-मोह से तत्त्व की निश्चलता, और उस निश्चलता से जीते-जी मुक्ति। ग्यारह-बारह शब्दों में पूरा अद्वैत-program। इसके साथ चार समानांतर प्रश्न, उम्र बीत गई तो कैसा काम-विकार, पानी सूख गया तो कैसा तालाब, धन घट गया तो कैसा परिवार, और तत्त्व जान लिया तो कैसा संसार। हर निर्भरता शर्त पर टिकी है, और तत्त्व-ज्ञान के बाद संसार बचता ही नहीं।

श्लोक 9-10 · मुक्ति की सीढ़ी
निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः ॥ 9 ॥
क्षीणे वित्ते कः परिवारः ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः ॥ 10 ॥
द्वादश-मञ्जरिका का समापन गर्व और काल पर है। धन, लोग, जवानी का घमंड मत करो, काल एक पलक में सब हर लेता है, यह सारा फैलाव मायामय है, इसे जान कर छोड़ो और ब्रह्म-पद में प्रवेश करो। और फिर समय का सुंदर चक्र, दिन-रात, शाम-सुबह, शीत-वसंत बार-बार लौटते हैं, काल खेलता रहता है, आयु बीतती जाती है, फिर भी आशा की हवा पकड़ नहीं छोड़ती। यह आशा-वायु शब्द ख़ाली हवा जैसा है, फिर भी हमें बाँधे रखता है। यहीं शंकर के अपने बारह श्लोक पूरे होते हैं।
श्लोक 11-12 · गर्व और काल का चक्र
मायामयमिदमखिलं हित्वा ब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा ॥ 11 ॥
कालः क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि न मुञ्चत्याशावायुः ॥ 12 ॥
अब शिष्यों की पंक्तियाँ शुरू होती हैं। पहली पद्म-पाद की मानी जाती है, स्त्री और धन की चिंता क्यों, हे पागल, क्या आपका कोई नियन्ता नहीं? तीनों लोकों में सज्जनों की संगति ही वह नौका है जो संसार-समुद्र पार कराती है। फिर एक तीखी चोट बाहरी वेष पर, जटाधारी हो, मुंडा हो, बाल नुचवाए हों, गेरुआ ओढ़े हो, अनेक वेष धरे हो, फिर भी देखते हुए न देखने वाला मूर्ख है, क्योंकि यह सब वेष पेट के लिए हैं। बाहर का दिखावा भीतर के बोध की जगह नहीं ले सकता।
श्लोक 13-14 · संगति और दिखावे का वेष
त्रिजगति सज्जनसङ्गतिरेका भवति भवार्णवतरणे नौका ॥ 13 ॥
पश्यन्नपि च न पश्यति मूढो ह्युदरनिमित्तं बहुकृतवेषः ॥ 14 ॥
दो श्लोक बूढ़े शरीर और भीतरी आशा की ज़िद पर हैं। अंग ढीले पड़ते जा रहे, बाल सफ़ेद, मुँह दाँत-विहीन, बूढ़ा छड़ी टेक कर चलता है, फिर भी आशा का पिंड नहीं छूटता। यहाँ तक कि एक संन्यासी, जिसके आगे आग, पीछे सूरज, रात में घुटनों पर ठोड़ी, हथेली में भिक्षा, पेड़ के नीचे बसेरा, वह भी आशा का बंधन नहीं छोड़ पाता। बाहरी त्याग आसान है, भीतर की आशा का त्याग कठिन।
श्लोक 15-16 · आशा का न छूटना
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम् ॥ 15 ॥
करतलभिक्षस्तरुतलवासः तदपि न मुञ्चत्याशापाशः ॥ 16 ॥
अब ज्ञान बनाम कर्मकांड का प्रश्न। कोई गंगासागर की यात्रा करे, व्रत पाले, दान दे, मगर ज्ञान के बिना, किसी भी मत के अनुसार, सौ जन्मों में भी मुक्ति नहीं मिलती। शंकर इस बिंदु पर अडिग हैं, तीर्थ और दान अच्छे हैं पर पर्याप्त नहीं। और इसके ठीक विपरीत वैराग्य का सुखद पक्ष, देव-मंदिर या पेड़ की जड़ में निवास, बिस्तर ज़मीन, मृग-चर्म वस्त्र, सारे संग्रह और भोग का त्याग, ऐसा वैराग्य भला किसे सुख नहीं देता। सच्चा त्याग पीड़ा नहीं, आनंद है।
श्लोक 17-18 · ज्ञान और सच्चा वैराग्य
ज्ञानविहीनः सर्वमतेन भजति न मुक्तिं जन्मशतेन ॥ 17 ॥
सर्व-परिग्रह-भोग-त्यागः कस्य सुखं न करोति विरागः ॥ 18 ॥
अब रचना का सबसे समावेशी स्वर। योग में लीन हो या भोग में, संगति में हो या अकेला, जिसका चित्त ब्रह्म में रमता है वह आनंदित होता है, आनंदित होता है, आनंदित ही होता है। बाहरी रूप मायने नहीं रखता, भीतर का रुख़ ब्रह्म की ओर हो तो आनंद आता ही है। और इसी के साथ गीता और गंगा की महिमा, जिसने भगवद् गीता थोड़ी भी पढ़ी, गंगाजल की एक बूँद भी पी, मुरारी की एक बार भी पूजा की, उसका यम से कोई विवाद नहीं। यह माँगने वाला नहीं, हौसला देने वाला स्वर है, थोड़ा भी काफ़ी है।
श्लोक 19-20 · भीतर का रुख़, गीता का स्पर्श
यस्य ब्रह्मणि रमते चित्तं नन्दति नन्दति नन्दत्येव ॥ 19 ॥
सकृदपि येन मुरारिसमर्चा क्रियते तस्य यमेन न चर्चा ॥ 20 ॥
अब शंकर का भक्ति-पक्ष खुलता है, जिसे अक्सर भुला दिया जाता है। बार-बार जन्म, बार-बार मृत्यु, बार-बार माँ के गर्भ में शयन, इस अत्यंत दुस्तर संसार में अपार कृपा से मुझे बचा, हे मुरारी। यह सूखे अद्वैतवादी की नहीं, एक भक्त की पुकार है। इसके साथ अवधूत की छवि, सड़क पर पड़े कपड़ों के टुकड़ों से जोड़ी हुई कन्था पहने, पुण्य-पाप से परे मार्ग पर, योग में लगे चित्त वाला योगी बच्चे या मस्त-पागल की तरह आनंद में रमता है।
श्लोक 21-22 · पुकार और अवधूत
इह संसारे बहुदुस्तारे कृपयाऽपारे पाहि मुरारे ॥ 21 ॥
योगी योगनियोजितचित्तो रमते बालोन्मत्तवदेव ॥ 22 ॥
वही मूल प्रश्न फिर लौटता है, थोड़ा नए शब्दों में। आप कौन, मैं कौन, कहाँ से आया, मेरी माँ कौन, मेरा पिता कौन, इन पर गहराई से विचार करो, यह सारा विश्व असार है, स्वप्न जैसा विचार है, इसे छोड़ो। यह दोहराव जान-बूझ कर है, बिना बार-बार उठाए ये प्रश्न मन में टिकते नहीं। फिर अद्वैत को रिश्तों में उतारा जाता है, आप में, मुझ में, हर जगह एक ही विष्णु है, मुझ पर व्यर्थ क्रोध मत करो, असहिष्णु मत बनो, हर जगह सम-चित्त रहो अगर शीघ्र ही विष्णुत्व चाहते हो। दूसरों पर क्रोध अपने ही स्वरूप पर क्रोध है।
श्लोक 23-24 · कौन हूँ मैं, और एक ही विष्णु
इति परिभावय सर्वमसारं विश्वं त्यक्त्वा स्वप्न-विचारम् ॥ 23 ॥
भव समचित्तः सर्वत्र त्वं वाञ्छस्यचिराद्यदि विष्णुत्वम् ॥ 24 ॥
अद्वैत की वही धारा रिश्तों की दीवारों को और गिराती है। शत्रु, मित्र, पुत्र, बंधु, किसी से झगड़े या संधि का यत्न मत करो, सबमें आत्मा को देखो, हर ओर से भेद का अज्ञान छोड़ो। फिर भीतर के शत्रुओं की ओर इशारा, काम, क्रोध, लोभ, मोह को त्याग कर आत्मा का विचार करो, मैं कौन हूँ। जिनके पास आत्म-ज्ञान नहीं वे मूर्ख नरक के गहरे गड्ढे में पकते रहते हैं।

श्लोक 25-26 · भेद का त्याग, भीतरी शत्रु
सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम् ॥ 25 ॥
आत्मज्ञान-विहीना मूढाः ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः ॥ 26 ॥
अब चार ठोस, रोज़ करने योग्य काम। भगवद् गीता और विष्णु सहस्र-नाम गाओ, श्रीपति विष्णु के रूप का लगातार ध्यान करो, मन को सज्जनों की संगति में ले जाओ, और धन ज़रूरतमंदों को दो। इसके बाद वही पुराना चक्र फिर खुलता है, सुख से भोग किया जाता है, फिर देह में रोग आता है, और यद्यपि लोक में मृत्यु ही अंतिम शरण है, फिर भी मनुष्य पाप-आचरण नहीं छोड़ता। बार-बार दोहराने के पीछे यही चिंता है कि यह सीख मन में ठहरती नहीं।
श्लोक 27-28 · करने योग्य काम, और वही पुराना चक्र
नेयं सज्जन-सङ्गे चित्तं देयं दीनजनाय च वित्तम् ॥ 27 ॥
यद्यपि लोके मरणं शरणं तदपि न मुञ्चति पाप-आचरणम् ॥ 28 ॥
धन का गहरा critique और साधना का व्यावहारिक खाका साथ-साथ आते हैं। धन को नित्य अनर्थ की तरह देखो, उससे सच में सुख का अंश भी नहीं मिलता, धनवान को अपने पुत्र तक से डर बना रहता है, यह हर जगह की बँधी हुई रीति है। फिर साधना के औज़ार, प्राणायाम, प्रत्याहार, नित्य-अनित्य का विवेक, जप-सहित समाधि का विधान, यह सब बड़ी सावधानी से, पूरे ध्यान से करो। यहाँ शंकर का अद्वैत और पतञ्जलि का योग एक ही frame में आ जाते हैं।
श्लोक 29-30 · धन का डर, साधना के औज़ार
पुत्रादपि धन-भाजां भीतिः सर्वत्रैषा विहितरीतिः ॥ 29 ॥
जाप्य-समेत-समाधि-विधानं कुर्ववधानं महदवधानम् ॥ 30 ॥
अब रचना समापन की ओर बढ़ती है। गुरु के चरण-कमलों में पूर्ण भक्त बनो, संसार से शीघ्र मुक्त हो जाओ, और इंद्रिय तथा मन के नियमन से ही अपने हृदय में बसे देव का दर्शन करो। यहाँ तीनों धागे एक साथ बँधते हैं, गुरु-भक्ति, इंद्रिय-नियम, और हृदयस्थ देव। फिर एक meta-श्लोक जो रचना की अपनी जन्म-कथा को भीतर ही दर्ज कर देता है, वह मूर्ख व्याकरणवादी जो डुकृञ् के अध्ययन में डूबा था, श्रीमत् शंकर-भगवत्-पाद के शिष्यों के समझाने से उसकी इंद्रियाँ शुद्ध हो गईं।
श्लोक 31-32 · गुरु-चरण और रचना की अपनी कथा
सेन्द्रिय-मानस-नियमादेवं द्रक्ष्यसि निज-हृदयस्थं देवम् ॥ 31 ॥
श्रीमच्छङ्कर-भगवच्छिष्यैः बोधित आसिच्छोधितकरणः ॥ 32 ॥
और अंत में वही पहली पंक्ति लौटती है, मगर अब पाठक जानता है कि क्यों। गोविन्द का भजन करो, हे मूर्ख मन, क्योंकि नाम-स्मरण के सिवा संसार पार करने का और कोई उपाय हमें नहीं दिखता। सारी दार्शनिक जटिलता के बाद शंकर इसी सरलता पर आ टिकते हैं, एक ही समाधान, एक ही शरण।
श्लोक 33 · वही पुकार, अंतिम बार
नाम-स्मरणाद् अन्य-उपायं नहि पश्यामो भव-तरणे ॥ 33 ॥
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