महामुद्रा
सिंह: संस्कृत 3.10 से 18 · आलोचनात्मक संस्करण 3.10 से 18
आसन, श्वास और ध्यान का संगम; तीन निकट सम्बद्ध विधियों की पहली कड़ी।
अभ्यास · हाथ और ध्यान
आराम से बैठिए और हाथ की एक मुद्रा चुनिए। हर मार्गदर्शन में हाथ रखने के साफ़ चरण, ध्यान का एक सहारा और सहजता से अभ्यास पूरा करने का ढंग है। नीचे अञ्जलि खुली है; मन हो तो दूसरी मुद्रा चुन लीजिए।
शास्त्रीय अभ्यास और उनके स्रोतदोनों हाथ मिलने का छोटा-सा संकेत दिन की भागदौड़ में ठहरने की जगह बन सकता है। हाथों का स्पर्श महसूस कीजिए और सामने के इस क्षण पर ध्यान लाइए।
बड़ा चित्र देखिएअञ्जलि: हथेलियों का हल्का सम्पर्क; उँगलियाँ ऊपर।
कुर्सी या अपने सुविधाजनक आसन पर सीधे, सहज बैठिए। कन्धों को ऊपर खींचे बिना ढीला रहने दीजिए।
हाथ पहले जाँघों पर रखें। गर्दन और चेहरे की अनावश्यक कसावट छोड़ दीजिए।
साँस को अपनी सहज गति में आने-जाने दीजिए। चाहें तो एक आती साँस और फिर जाती साँस का अनुभव कीजिए; गिनती निभाना आवश्यक नहीं।
हथेलियाँ अलग कीजिए, हाथ धीरे से जाँघों पर रख दीजिए और उँगलियाँ आराम करने दें।
हाथ कुछ नीचे रखिए या हथेलियों के बीच थोड़ी जगह छोड़ दीजिए। केवल आरामदेह सम्पर्क भी पर्याप्त है।
दर्द वाले जोड़ को सीधा करने या हथेलियाँ पूरी चिपकाने के लिए ज़ोर न लगाइए। दर्द, सुन्नपन या खिंचाव बढ़े तो हाथ खोलकर विश्राम दें।
शिक्षण-स्रोत इस जुड़े हाथों के रूप को प्रार्थना के आसन में रखते हैं। जोसेफ़ लेपेज इसे अञ्जलि नाम से पहचानते हैं और आदर तथा भक्ति से जोड़ते हैं। यहाँ बैठकर किया जाने वाला परिचय उसी हाथ-स्थिति का सहज रूप है; आप इसे नमस्कार, कृतज्ञता या शांत ध्यान के भाव से अपना सकते हैं।
एक छोटे-से स्पर्श पर ध्यान टिकाइए। अंगूठे और तर्जनी का मिलना ऐसा साफ़ संकेत देता है जिस पर मन भटके तो फिर लौट सकते हैं।
बड़ा चित्र देखिएचिन: उँगलियों की स्थिति पास से। हाथ रखने की सहज स्थिति निर्देशों में देखिए।
आराम से सीधे बैठिए और दोनों हाथ जाँघों पर रखिए। कोहनियाँ सहज रहें।
सहज साँस लेते हुए उँगली और अंगूठे के सम्पर्क को महसूस कीजिए। ध्यान हट जाए तो उसी स्पर्श पर लौट आइए।
तर्जनी और अंगूठे को अलग कीजिए। हाथ खोलकर जाँघों पर रख दें।
दोनों हाथों में एक साथ करना कठिन लगे तो पहले एक हाथ से देखिए। सिरों को मिलाना असुविधाजनक हो तो हाथ खुला ही रखिए।
उँगली के जोड़ खींचकर घेरा न बनाइए। दर्द या झनझनाहट हो तो सम्पर्क छोड़ दें।
यहाँ हथेली ऊपर वाला रूप चिन मुद्रा के नाम से दिया है। ऑस्ट्रेलियन स्कूल ऑफ़ मेडिटेशन ऐंड योग हथेली नीचे वाले उसी उँगली-रूप को ज्ञान मुद्रा कहता है। आराम हो तो हाथ को धीरे से पलटकर यह भेद भी देख सकते हैं। नाम-पद्धति सभी विद्यालयों में एक-सी नहीं। उसी विद्यालय की व्याख्या में अंगूठे और तर्जनी का मिलना जीव और परमात्मा के सम्बन्ध का प्रतीक है।
चिन की खुली हथेली से उँगलियों के मुड़ने का छोटा-सा परिवर्तन देखिए। अभ्यास का सहारा वही हल्का सम्पर्क है, अब हाथ कुछ अधिक सिमटा हुआ है।
बड़ा चित्र देखिएचिन्मय: उँगलियों की स्थिति पास से। बाकी तीन उँगलियाँ नरमी से मुड़ी रहें।
आराम से बैठिए। हाथ जाँघों पर ऐसे रखें कि कोहनियाँ लटकी हुई या कसी हुई न लगें।
साँस की सहज गति बनी रहने दीजिए। उँगलियाँ मोड़ते समय अनजाने में साँस थाम लें तो हाथ ढीला करके फिर आराम से बैठें।
पहले तीनों मुड़ी उँगलियाँ खोलिए, फिर अंगूठे और तर्जनी का सम्पर्क छोड़ दीजिए। हाथ विश्राम में रखें।
तीनों उँगलियों को जितना सहज हो उतना ही मोड़िए। पूरी तरह हथेली तक पहुँचाना आवश्यक नहीं।
उँगलियों को ज़ोर से मोड़ने या हथेली में दबाने से बचिए। दर्द या ऐंठन हो तो स्थिति छोड़ दें।
चिन्मय का यह उँगली-रूप आईसीवाईईआर और एआईआईएमएस/डीएसटी की शिक्षण-पुस्तिका में मिलता है। यहाँ हाथ जाँघों पर रखने का आईसीवाईईआर वाला विकल्प लिया गया है; दूसरे स्रोत में वक्ष के पास हाथ रखने का निर्देश भी है। दोनों पुस्तिकाएँ इसे विस्तृत श्वास-पाठ में रखती हैं। ऊपर का परिचय हाथ को आराम से बनाना और उसके साथ स्वाभाविक श्वास बनाए रखना सिखाता है।
खुले हाथ को नरमी से समेटने का अभ्यास कीजिए। आकार मुट्ठी जैसा है, पर ध्यान कसने पर नहीं, भीतर जगह रहने पर है।
बड़ा चित्र देखिएपहले अंगूठा हथेली में रखिए।
फिर चारों उँगलियाँ अंगूठे के ऊपर नरमी से मोड़िए।
सुविधाजनक आसन पर बैठकर हाथ जाँघों पर रखिए। कलाई सीधी और सहज रहने दीजिए।
साँस को सहज रहने दीजिए। हाथ बन्द करने के साथ जबड़ा या पेट भी कस रहा हो तो उस कसावट को नरम कीजिए।
पहले चारों उँगलियाँ खोलिए, फिर अंगूठे को धीरे से बाहर आने दीजिए। हथेली को विश्राम दें।
उँगलियों को पूरी तरह बन्द करने के बजाय ढीला घेरा बनाएँ। अंगूठे में तकलीफ़ हो तो हाथ खुला रखें।
अंगूठे को अन्दर दबाकर मुट्ठी न भींचिए। दर्द या सुन्नपन हो तो हाथ खोल दीजिए।
आईसीवाईईआर इसे Adhi और एआईआईएमएस/डीएसटी की पुस्तिका Adi लिखती है; दोनों में अंगूठा उँगलियों के भीतर रहता है। यह रूप उनके श्वास-पाठ में आता है। यहाँ पहले हाथ के आराम और हल्के घेरे का अभ्यास है। ब्रह्म मुद्रा में इन्हीं दो हाथों को नाभि के पास साथ रखा जाता है।
दोनों हाथों को एक साथ रखते हुए समता और सहजता का अनुभव कीजिए। आकार बनाने के बाद कन्धों तथा पेट को आराम में रहने दें।
बड़ा चित्र देखिएब्रह्म: हथेलियाँ ऊपर की ओर; दोनों हाथ नाभि के पास मिलें।
पहले अंगूठा हथेली में रखिए।
सीधे, सुविधाजनक ढंग से बैठिए। हाथ पहले जाँघों पर रखें।
साँस आती-जाती रहे। पेट को अपनी स्वाभाविक गति की जगह दीजिए; हाथ केवल अपने स्थान पर आराम से रहें।
दोनों हाथ अलग करके जाँघों पर रखिए। उँगलियाँ और फिर अंगूठे खोल दीजिए।
हाथ ऊँचे रखने से कन्धे थकें तो गोद में कुशन या मुड़ा कपड़ा रखकर उन्हें सहारा दीजिए। मिलाना असुविधाजनक हो तो हाथ अलग टिके रहने दें।
हाथों से पेट दबाने या कलाइयों को मोड़कर पोर मिलाने का प्रयास न करें। खिंचाव हो तो हाथ नीचे रख दें।
यहाँ ब्रह्म मुद्रा का वही हाथ-रूप है जो आईसीवाईईआर तथा एआईआईएमएस/डीएसटी की पुस्तिका के खण्ड 9.1(d) में आता है: अंगूठे भीतर, नाभि के पास मिलते पोर और हथेलियाँ ऊपर। पुस्तिकाएँ इसे पूर्ण योगिक श्वास के पाठ में रखती हैं। नाम से मिलते किसी अन्य अभ्यास को इसमें नहीं जोड़ा गया है; ऊपर के परिचय में श्वास अपनी सहज गति में रहती है।
उँगलियों की साफ़ व्यवस्था नासिकाएँ बदलने का काम सरल बनाती है। पहले हाथ समझिए; फिर नीचे दिया पूरा अनुलोम-विलोम क्रम सहज गति से कर सकते हैं।
बड़ा चित्र देखिएविष्णु: पहले उँगलियों की स्थिति पहचानिए।
क्रम का पहला पक्ष: दायाँ अंगूठा दायीं नासिका पर, बायीं नासिका खुली। पूरा श्वास-क्रम नीचे है।
आराम से सीधे बैठिए। बायाँ हाथ जाँघ पर रखिए और दाहिना कन्धा ढीला रहने दें।
पूरा क्रम नीचे दिया है। एक नासिका से साँस लें, दूसरी से छोड़ें और उसी दूसरी से लेकर पहली पर लौटें। बीच में साँस न रोकें।
हाथ नीचे जाँघ पर रख दीजिए, उँगलियाँ खोलिए और दोनों नासिकाओं से सामान्य श्वास पर लौटिए।
श्वास-क्रम करने से पहले हाथ की स्थिति नाक से दूर बनाकर देखिए। हाथ थके तो नीचे रखकर सामान्य साँस लें।
नासिका पूरी बन्द हो, उँगली के दबाव से दर्द हो या श्वास सँभालने से घबराहट बढ़े तो सामान्य श्वास पर लौटें। नीचे के पूरे क्रम की सावधानियाँ भी साथ पढ़िए।
नीचे पूरा अभ्यास बिना कुम्भक के है। बायीं और दायीं नासिका से होकर क्रम अपनी आरम्भिक ओर लौटता है। चार चक्रों का सुझाव इस पुस्तकालय के आरम्भिक परिचय से है; सामान्य योग प्रोटोकॉल में पाँच चक्र हैं। दोनों की गिनती को एक ही उद्धरण न समझिए।
सहज शुरुआत
नासिकाओं का क्रम बदलना · बिना कुम्भक
स्पर्श हल्का हो और साँस शांत। एक पूरा चक्र ध्यान से करना तेज़ी से कई चक्र करने से अधिक उपयोगी शुरुआत है।
सीधे बैठें। बायाँ हाथ जाँघ पर रखें। दाएँ हाथ की तर्जनी और मध्यमा भीतर मोड़ें। अंगूठे से दायीं नासिका और अनामिका व छोटी उँगली से बायीं नासिका को हल्का बंद करें। इस हाथ की स्थिति को विष्णु मुद्रा कहते हैं।
श्वास और मात्रा
सहज, समान गिनती पर 4 चक्र से शुरू करें। गिनती निभाने के लिए साँस को खींचें नहीं।
नाड़ीशोधन और अनुलोम-विलोम नाम अलग शिक्षण-परम्पराओं में कुछ भिन्न क्रमों के लिए भी मिलते हैं। यहाँ केवल नासिकाओं को बारी-बारी बदलने का सरल रूप दिया है। इसे अनुपात, बन्ध या कुम्भक वाले पूर्ण पारम्परिक क्रम का स्थानापन्न न मानें।
स्वामी सत्यानन्द सरस्वती, आसन प्राणायाम मुद्रा बन्ध, नाड़ीशोधन प्रकरण: आधुनिक शिक्षण-संदर्भ। यहाँ दिया प्रारम्भिक रूप कुम्भक के बिना है।
मोड़ी हुई तर्जनी-मध्यमा वाला रूप शिवानन्द की पुस्तिका में विष्णु और 2026 के सामान्य योग प्रोटोकॉल में नासाग्र कहलाता है। आईसीवाईईआर विष्णु नाम से भौंहों के बीच मध्यमा रखने वाला अलग रूप देता है। उँगलियों की व्यवस्था यहाँ वही है जो शिवानन्द परम्परा और प्रोटोकॉल में है, और साथ में बिना कुम्भक वाला पूरा आरम्भिक अभ्यास दिया है।
हाथों को टिकने की जगह दीजिए, ताकि ध्यान बार-बार उनकी व्यवस्था में न उलझे। फिर साँस के आने-जाने के साथ चुपचाप बैठ सकते हैं।
बड़ा चित्र देखिएध्यान: दाहिना हाथ ऊपर, बायाँ नीचे; अंगूठों के सिरों का हल्का सम्पर्क।
कुर्सी पर या सुविधाजनक आसन में बैठिए। रीढ़ सहज सीधी रहे और कन्धे ढीले हों।
गोद में हाथ आराम से न टिकें तो कुशन या मुड़ा कपड़ा रख लीजिए।
साँस सामान्य ढंग से लें। नासिका के पास आती-जाती हवा का स्पर्श महसूस कीजिए। विचार में खो जाएँ तो अगली साँस पर लौट आइए।
अंगूठे अलग कीजिए, हाथ धीरे से खोलकर जाँघों पर रखिए और कमरे की ओर ध्यान लौटाइए।
हथेलियाँ अलग-अलग जाँघों पर भी रख सकते हैं। अंगूठे मिलाना असुविधाजनक हो तो उन्हें अपने आराम के स्थान पर रहने दें।
मुद्रा के लिए कमर झुकाकर हाथ गोद तक न पहुँचाएँ। सहारा ऊँचा कर लीजिए; दर्द या सुन्नपन हो तो स्थिति बदलें।
यहाँ दाहिना हाथ बाएँ पर रखने वाला रूप लिया गया है। लामा येशे विज़डम आर्काइव के शिक्षण और थानिस्सरो भिक्खु के ध्यान-निर्देश दोनों इसका समर्थन करते हैं; वाइल्डमाइंड हाथों के सहारे और हल्के अंगूठा-सम्पर्क को स्पष्ट करता है। बौद्ध कला में भी यह ध्यान का परिचित संकेत है। दूसरी परम्पराओं में हाथों का क्रम या ध्यान मुद्रा नाम का रूप बदल सकता है; आईसीवाईईआर इसी नाम से अलग उँगली-व्यवस्था भी देता है।
जिस मुद्रा में रुचि हो, वहीं से आरम्भ कीजिए। सातों को क्रम से पूरा करना आवश्यक नहीं। स्पर्श हल्का रखिए और जितनी देर सहज लगे, उतनी ही देर ठहरिए।
आगे हठयोगप्रदीपिका की मुद्राएँ और बन्ध, सम्बन्धित पारम्परिक वर्णन तथा हस्तमुद्राओं के आधार-स्रोत पढ़िए।
नीचे के तेरह पाठ ग्रन्थों को समझने और उनकी विधियों पर योग्य शिक्षक से चर्चा करने के लिए हैं। यह अध्ययन-भाग ऊपर दिए हाथ की मुद्राओं के अभ्यास से अलग है।
आरम्भिक सूची के क्रम से आगे बढ़िए। हर प्रविष्टि में स्रोत का वर्णन और उसके भेद समझाए गए हैं; यह पढ़ने का मार्ग है, शारीरिक अभ्यासों की क्रमावली नहीं।
“सिंह: संस्कृत” से आशय पंचम सिंह के 1914 संस्करण के साथ दी गई संस्कृत श्लोक-संख्या है। “आलोचनात्मक संस्करण” ऑक्सफ़र्ड-मारबुर्ग का डिजिटल पाठ है। आगे के प्रकरणों का क्रम, विस्तार और अतिरिक्त पद्य बदल सकते हैं। नीचे के संकेत सम्बन्धित पाठ तक पहुँचाते हैं; हर श्लोक के ठीक समान होने का दावा नहीं करते।
तीसरे अध्याय के 3.6 से 7 श्लोक नीचे दिए दस नाम रखते हैं। महामुद्रा, महाबन्ध और महावेध एक सम्बन्धित समूह बनाते हैं; उड्डीयान, मूल और जालन्धर बन्ध हैं। सूची में जीभ से सम्बन्धित मुद्रा, शरीर की उलटी व्यवस्था, वज्रोली और शक्तिचालन के प्रसंग भी हैं। इसका दायरा उँगलियों से कहीं आगे जाता है।
ये इस अंश में गिनाए गए दस नाम हैं। प्रदीपिका चौथे अध्याय में शाम्भवी की चर्चा भी करती है। संग्रह की बीस विधियाँ पहचाने हुए स्रोतों से चुनी गई हैं; यह दावा नहीं कि किसी एक शास्त्रीय ग्रन्थ में यही बीस विधियाँ दी गई हैं।
सिंह: संस्कृत 3.10 से 18 · आलोचनात्मक संस्करण 3.10 से 18
आसन, श्वास और ध्यान का संगम; तीन निकट सम्बद्ध विधियों की पहली कड़ी।
सिंह: संस्कृत 3.19 से 25 · आलोचनात्मक संस्करण 3.19 से 24
बैठी हुई स्थिति का बन्ध, जिसे महामुद्रा और महावेध के पास रखकर पढ़िए; पाठ में मतान्तर भी हैं।
सिंह: संस्कृत 3.26 से 31 · आलोचनात्मक संस्करण 3.25 से 31
उसी समूह की तीसरी कड़ी; घेरण्डसंहिता में इसका वर्णन अलग है।
सिंह: संस्कृत 3.32 से 54 · आलोचनात्मक संस्करण 3.32 से 48
जीभ से सम्बन्धित मुद्रा; ध्यान और अमृत के प्रसंग में इसका विस्तृत वर्णन आता है।
सिंह: संस्कृत 3.55 से 60 · आलोचनात्मक संस्करण 3.58 से 65
उदर का बन्ध, जिसकी व्याख्या में ऊपर उड़ने की छवि आती है।
सिंह: संस्कृत 3.61 से 69 · आलोचनात्मक संस्करण 3.49 से 57
आधार का बन्ध, जिसे प्राण और अपान के सम्बन्ध में समझाया गया है।
सिंह: संस्कृत 3.70 से 76 · आलोचनात्मक संस्करण 3.66 से 72
कण्ठ का बन्ध; इसके आगे तीन बन्धों को साथ रखने की चर्चा है।
सिंह: संस्कृत 3.77 से 82 · आलोचनात्मक संस्करण 3.73 से 77
शरीर की उलटी व्यवस्था, जिसे ग्रन्थ की सूर्य-चन्द्र वाली छवि के साथ पढ़ा जाता है।
सिंह: संस्कृत 3.83 से 103 · आलोचनात्मक संस्करण 3.78 से 93
यौन द्रवों से सम्बन्धित ऐतिहासिक वर्णन; घेरण्डसंहिता में इसी नाम की विधि बहुत अलग है।
सिंह: संस्कृत 3.104 से 120 · आलोचनात्मक संस्करण 3.94 से 102
ग्रन्थ की कुण्डलिनी-दृष्टि में शक्ति के चालन और जागरण का प्रसंग।
ऑक्सफ़र्ड-मारबुर्ग, Haṭhapradīpikā Online, 3.6 to 9। नीचे की संस्कृत इसी आलोचनात्मक संस्करण के अनुसार है। हिन्दी और अंग्रेज़ी अर्थ इस पुस्तकालय के लिए नए लिखे गए हैं; किसी आधुनिक अनुवाद के उद्धरण नहीं हैं।
पंचम सिंह का 1914 संस्करण, अध्याय 3 परिचित समानान्तर गणना का आधार है। स्वामी शिवानन्द की Kundalini Yoga का “Mudras and Bandhas” प्रकरण अलग पारम्परिक शिक्षण-वर्णन देता है। जहाँ नामित विधियों में भेद है, वहाँ जेम्स मलिन्सन का घेरण्डसंहिता संस्करण, 2004, अध्याय 3 तुलना में लिया गया है। प्रत्येक विषय-पृष्ठ अपने ठीक पाठ-स्थान बताता है।
आलोचनात्मक संस्करण के 3.7 में मुद्रादिदशकम् है, जिससे मुद्राएँ और उनसे सम्बन्धित विधियाँ, ये दस, अर्थ निकलता है। परिचित पाठ में हि मुद्रादशकम्, अर्थात् ये दस मुद्राएँ, है। नाम दोनों में वही दस हैं। उड्डीयान की वर्तनी में भी भेद मिलता है। उद्धरण में संस्करण का अपना पाठ रखा गया है; पुस्तकालय के परिचित पृष्ठ-नाम नहीं बदले गए हैं।
समकालीन परिचय: आर्ट ऑफ़ लिविंग का हस्तमुद्रा-परिचय, असिवाना की हस्तमुद्रा-सूची और जोसेफ़ लेपेज का विवेचन। ये आज के चयन और व्याख्याएँ दिखाते हैं; किसी भंगिमा या स्वास्थ्य-फल को प्रदीपिका का कथन मानने का आधार नहीं हैं।
दायरा: स्रोतों के साथ चुना संग्रह और पाठ-तुलना; तीसरे अध्याय का पूरा अनुवाद नहीं। स्रोत-समीक्षा: 12 सितम्बर 2026।
महामुद्रा महाबन्धो महावेधश्च खेचरी ।
3.6
उड्डीयाणं मूलबन्धस्ततो जालन्धराभिधः ॥
करणी विपरीताख्या वज्रोली शक्तिचालनम् ।
3.7
इदं मुद्रादिदशकं जरामरणनाशनम् ॥
महामुद्रा, महाबन्ध, महावेध, खेचरी, उड्डीयान, मूलबन्ध, जालन्धर नाम का बन्ध, विपरीत नाम वाली करणी, वज्रोली और शक्तिचालन: पाठ इन दस मुद्राओं और सम्बन्धित विधियों की प्रशंसा जरा तथा मृत्यु को नष्ट करने वाली कहकर करता है।
अन्तिम पद ग्रन्थ की सिद्धि-भाषा का कथन है; यहाँ उसे दीर्घायु या चिकित्सा-फल का वादा नहीं बनाया गया है। आगे के श्लोक शिक्षण को आदिनाथ से जोड़ते हैं और उसे सुरक्षित रखे जाने वाले उपदेश के रूप में देखते हैं (3.8 से 9)। प्रशंसा को उसके प्रसंग के साथ पढ़ने से मूल स्वर भी बचता है और आज का स्वास्थ्य-दावा भी नहीं बनता।
यह उद्धरण आलोचनात्मक संस्करण का है; इसमें उड्डीयाण और मुद्रादिदशकम् जैसे पाठ भी उसी के अनुसार हैं। परिचित संस्करण में उड्डीयान तथा हि मुद्रादशकम् मिल सकता है। स्रोत-टिप्पणी यह अन्तर स्पष्ट करती है।
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