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मंकि: मरुभूमि से परमसमाधि तक

कथा · 28

मंकि: मरुभूमि से परमसमाधि तक

तपती दोपहर में एक विराट मरुभूमि पार करते हुए वसिष्ठ को ऐसा यात्री मिलता है, जो भोग, तीर्थयात्रा और कठोर साधना, तीनों आज़मा चुका है। मंकि के प्रश्न अनुभव की पहली छाप से उस वासना तक पहुँचते हैं, जो दूसरा जीवन रच सकती है। संवाद का समापन एक वर्ष की परमसमाधि में होता है।

तपती दोपहर का यात्री

वसिष्ठ ने श्रीराम से कहा कि जिस प्रकार मंकि ने वासनारूपी संसार पार किया, उसी प्रकार उन्हें भी उससे पार होना चाहिए।

अयोध्या की उस सभा से बहुत पहले की बात थी। वसिष्ठ अपने आकाश-निवास में थे, जब श्रीराम के पितामह राजा अज ने उन्हें बुलाया। महर्षि वहाँ से उतरे और राजा की नगरी की ओर चल पड़े। उनका मार्ग कई योजन तक फैले एक भयानक निर्जन प्रदेश से होकर जाता था।

मध्याह्न का समय था। धूप में तपती रेत चमक रही थी, धूल खाली भूमि पर घूम रही थी और वृक्ष झुलसे हुए दिखाई देते थे। दूर मरीचिका जल का आभास देती, किन्तु उस विस्तार में न कोई मनुष्य दिखता था, न पशु। मानो पूरा प्रदेश गर्मी के भीतर सिमट गया हो।

वसिष्ठ ने एक अकेले पथिक को देखा। यात्रा और सूर्य के ताप से उसके अंग शिथिल थे। कुछ दूर धीवरों के छोटे से गाँव के पाँच अथवा सात घर दिखाई दे रहे थे। उन्हें देखते ही पथिक ने गति बढ़ा दी। उसे लगा कि वहाँ जल, छाया, भोजन और विश्राम मिल जाएगा।

महर्षि के हृदय में करुणा हुई। उन्होंने पुकारा, “मार्ग के मीत, जिस राहत के पीछे तुम दौड़ रहे हो, वह भीतर की गर्मी और बढ़ा सकती है। जो लोग स्वयं इन्द्रिय-तृष्णा में जल रहे हों, वे दूसरे की वही आग कैसे बुझाएँगे? खारा पानी क्षण भर मुख भिगोता है और प्यास बढ़ा देता है। ऐसी संगति खोजो, जिसमें भीतर का ताप शान्त हो।”

पथिक रुक गया। बोलने वाले का परिचय जाने बिना ही उसने वसिष्ठ की वाणी में ऐसी स्थिरता अनुभव की, जो उसके भीतर उतर रही थी। वह पास आया, प्रणाम किया और बोला, “आपके कुछ शब्दों ने उस स्थान को शीतल कर दिया, जहाँ छाया और पानी नहीं पहुँच सकते। आप कौन हैं, जिनकी उपस्थिति में ऐसी शान्ति है?”

वसिष्ठ ने उत्तर दिया, “मैं वसिष्ठ हूँ। मेरा निवास आकाश में है। राजा अज ने मुझे बुलाया है, इसलिए उनकी ओर जा रहा हूँ। अब तुम अपना परिचय दो और बताओ कि इस निर्जन मार्ग पर क्यों आए हो।”

पथिक उनके चरणों में गिर पड़ा। उसकी आँखों में आँसू भर आए।

“मेरा नाम मंकि है। मैं माण्डव्य ऋषि के कुल में जन्मा ब्राह्मण हूँ। घर छोड़कर तीर्थयात्रा पर निकला था। सभी दिशाओं में घूमा और कठिन तीर्थों तक गया। मुझे आशा थी कि कहीं इन्द्रियों की जलन समाप्त हो जाएगी। स्थान बदलते रहे, आग मेरे साथ चलती रही।”

मंकि जिससे बच न सका

मंकि घर लौट रहा था, किन्तु विचार ने अब घर का अर्थ भी बदल दिया था। उसने शरीर को दुर्बल होते, परिवारों को बदलते और सम्पत्ति को एक हाथ से दूसरे हाथ में जाते देखा था। जीवन की हर व्यवस्था क्षय की ओर बढ़ रही थी। घर शरीर को आश्रय दे सकता था, उसके भीतर उठे प्रश्न का समाधान नहीं।

वसिष्ठ ने पहचान लिया कि मंकि का वैराग्य परिपक्व हो चुका है। निराशा अब शिकायत न रहकर ईमानदार जिज्ञासा बन गई थी।

उन्होंने कहा, “जो जानना चाहते हो, पूछो। पुराने आकर्षण क्षीण हो चुके हैं। जो समुद्र के तट पर आ पहुँचा हो, उसे पार उतरने का उपाय जान लेना चाहिए।”

मंकि ने कहा, “मैंने अनेक प्रकार के भोग किए। हर भोग ने उस इच्छा को और बढ़ा दिया, जिसे वह तृप्त करने का आश्वासन देता था। आयु अपना काम कर रही है। केश बदलते हैं, दाँत ढीले होते हैं, शक्ति घटती है और त्वचा के नीचे नसें दिखने लगती हैं। शरीर इच्छा की आज्ञा मानने में असमर्थ होने लगता है, पर इच्छा भीतर सतर्क बनी रहती है।”

उसने दूसरा मार्ग भी अपनाया था। बहुत समय तक मन, शरीर तथा वाणी से तप किया। आचरण रोका, असुविधा सही, शास्त्र सुने और उन लोगों के पास रहा जो मुक्ति की बात करते थे। फिर भी आत्मा का प्रकाश प्रत्यक्ष नहीं हुआ।

“मैंने शास्त्र सुना,” उसने कहा, “फिर मन को विषयों की ओर लौटते देखा। सत्संग और विश्वसनीय वाणी ने चाँदनी जैसा उजाला दिया। आत्मा की सीधी पहचान का दिन अभी नहीं निकला। मैंने वासना से अपना ही घेरा बनाया और उसी में फँस गया, जैसे कोई कीट अपना आवरण बनाकर स्वयं उसमें बन्द हो जाए।”

मंकि ने अनेक चित्रों के सहारे अपनी व्याकुलता रखी। ज्ञान का सिंह अज्ञानरूपी हाथी को कब परास्त करेगा? विवेक का वसन्त पुराने कर्मों की घास कब साफ़ करेगा? पहचान का सूर्य उस रात को कब समाप्त करेगा, जिसमें वासना फैलती रहती है?

अब वह सुखद उपाय नहीं माँग रहा था। ऐसा दुःख, जिसका मार्ग मोह के पार जाता हो, उस सुख से अच्छा लगता था जिसका फल फिर तृष्णा हो। उसने वसिष्ठ से हृदय के अन्धकार को जड़ से मिटाने वाला उपदेश माँगा।

संसार के चार बीज

वसिष्ठ ने उस सूक्ष्म गति से आरम्भ किया, जिसके द्वारा कोई संसार व्यक्ति का अपना संसार बन जाता है।

उन्होंने कहा, “इसके चार परस्पर जुड़े हुए बीज हैं: संवेदन, भावना, वासना और कलना।”

संवेदन किसी विषय का पहला अनुभव था। रूप आँख से मिला, ध्वनि कान में आई, स्वाद जिह्वा तक पहुँचा या कोई विचार मन में उठा। वह सम्पर्क क्षण भर का था।

भावना ने उस क्षण को अवधि दी। स्मृति फिर उसकी ओर गई। कल्पना ने दूसरा अनुभव रचा, सुख को अधिक मनोहर बनाया, संवाद को मन में बदला या भय का बार-बार अभ्यास किया। जो घटना बीत चुकी थी, उसे ध्यान में स्थायी स्थान मिलने लगा।

बार-बार लौटने से वही गति वासना बनी, एक दृढ़ संस्कार। वासना निर्धारित करने लगी कि मन किसे देखेगा और किसे अनदेखा करेगा, किससे आकृष्ट होगा और किससे भय खाएगा। उसी से अधूरी निजी कथा को आगे बढ़ाने की आवश्यकता अनुभव होती थी।

मृत्यु के समय संचित संस्कार कलना बनता है। वह ऐसी रचनात्मक स्मृति या कल्पना है, जिसके द्वारा दूसरा शरीर और दूसरा संसार अनुभव में प्रकट हो सकते हैं। क्रम की शुरुआत एक ऐसे सम्पर्क से हुई थी, जो बहुत छोटा लगता था। अपनाने, दोहराने और विश्वास करने से उसमें भविष्य बनाने की शक्ति आ गई।

मंकि ध्यान से सुन रहा था। वसिष्ठ इन्द्रियों के स्वाभाविक काम को दोष नहीं दे रहे थे। वे दिखा रहे थे कि अनुभव किसी दावेदार के चारों ओर किस प्रकार कठोर हो जाता है।

“‘मैं यह हूँ’ का विचार पहली सीमा खींचता है,” उन्होंने कहा। “फिर ‘यह मेरा है’, ‘यह मुझे अच्छा लगता है’, ‘इसने मुझे चोट पहुँचाई’ और ‘यह फिर होना चाहिए’ जैसे विचार आते हैं। अहं ममता को केन्द्र देता है। वासना अहं को चलने के लिए संसार देती है।”

द्रष्टा, दर्शन और दृश्य

वसिष्ठ ने मंकि से हर अनुभव के तीन पक्ष देखने को कहा: देखने वाला, देखने की क्रिया और दिखाई देने वाली वस्तु। तीनों जागरूकता के भीतर प्रकट होते थे। चेतना से बाहर खड़े होकर कोई अपनी सूचना नहीं दे सकता था।

शुद्ध चेतना शब्द और अर्थ, चल और अचल रूप, स्मृति और अपेक्षा, सबका आधार थी। उसी में एक सीमित पहचान उठती और पूरे क्षेत्र को अपना निजी अनुभव कहने लगती थी।

वसिष्ठ ने इस भूल की तुलना रस्सी को साँप समझ लेने से की। भ्रम रहते हुए भय, शरीर की प्रतिक्रिया और बचने की जल्दी, सब वास्तविक अनुभव होते हैं। साफ़ दिखाई देने पर किसी साँप को मारना नहीं पड़ता। पहचान उस काल्पनिक वस्तु को हटा देती है, जिस पर भय टिका हुआ था।

अहं का संसार दोषपूर्ण दृष्टि से दिखाई देने वाले दूसरे चन्द्रमा जैसा भी था। देखने वाले के लिए उसका आभास प्रभावशाली हो सकता था, फिर भी उससे आकाश में दूसरा चन्द्रमा स्थापित नहीं हो जाता।

वसिष्ठ ने कहा, “बन्धन ‘मैं’ के उदय के चारों ओर व्यवस्थित होता है। उस दावे का आधार मिटे तो ‘मेरा’ का स्वतन्त्र राज्य नहीं बन सकता। स्वर्ग, पाताल, सुख, दुःख, सफलता और हानि उसी एक चेतन सत्ता में नाम पाते हैं। नाम उसके स्वरूप को विभाजित नहीं करते।”

वासना अनजाने मन को अनेक जन्मों में वैसे ले जाती है, जैसे वायु सूखी घास को बिखेरती है। पर्वत से छूटा पत्थर नीचे लुढ़कता रहता है। चोट खाई गेंद ऊपर और नीचे जाती है। इसी प्रकार बार-बार की पहचान अनुभवों की अगली कड़ियों को गति देती है।

मंकि मुक्ति की खोज में कई प्रदेश पार कर चुका था। वसिष्ठ ने संसार को एक रात की सराय कहा। मन का घूमना उसे स्थायी घर जैसा बना देता है।

स्वामित्व के बिना कर्म

इस शिक्षा में शरीर को जड़ बना देना आवश्यक नहीं था। निजी स्वामित्व का दावा शान्त हो जाने के बाद भी गति चल सकती थी।

वसिष्ठ ने सरल उदाहरण दिए। पालने में बालक के हाथ-पाँव बिना किसी सोची हुई कर्तापन-धारणा के चलते हैं। लकड़ी की पुतली परिस्थितियों के अनुसार गति करती है। ज्ञानी भी चलता, बोलता, खाता, सिखाता और सामने आए उचित कर्तव्य को पूरा करता है। “मैं अलग स्वामी हूँ और यह फल अपने लिए बना रहा हूँ” का विचार फिर उसी प्रकार नया बीज नहीं बोता।

बाहर की ओर बहती चेतना तब बन्धन बनती है, जब ध्यान वस्तुओं से पूर्णता माँगता रहता है। जैसे वसन्त वनस्पतियों में पत्ते और फूल निकालता है, वैसे वासना अनुभव में संसार फैलाती है। मनुष्य-देह का विशेष उत्तरदायित्व था, क्योंकि उसमें आत्मा की खोज सम्भव थी।

ब्रह्मलोक से लेकर लकड़ी के छोटे टुकड़े तक, हर विषय-सुख एक ही सीमा दिखाता है। उसकी मिठास पहले सम्पर्क तक रहती है। दोहराव किसी बीतते अनुभव से स्थायित्व माँगता है।

अहं शान्त होने पर आत्मा की शान्ति किसी दूसरी जगह से नहीं आती। वसिष्ठ ने उसकी शीतलता ऐसी बताई, जिसके सामने चन्द्रमा भी तपता हुआ लगे। संसार का अलग भौतिक आधार कभी था ही नहीं। वह बिना दीवार के आकाश में बने चित्र और स्वप्न की उस नगरी जैसा दिखाई देता है, जिसकी दूरी, इतिहास और निवासी स्वप्न-दृष्टि में ही बने होते हैं।

“मैं सुखी हूँ”, “मैं दुःखी हूँ”, “यह स्वर्ग है” और “यह नरक है”, ऐसे सभी कथन उसी आधार में उठते हैं। ज्ञान प्रत्येक कथन को दबाने नहीं आता। वह बोलने वाले, अवस्था और नाम दिए गए संसार की कल्पित स्वतन्त्रता को मिटा देता है।

एक वर्ष की परमसमाधि

मंकि ने भोग, तीर्थ, तपस्या और दूर दिखाई देने वाले घरों की ओर अपनी आतुर चाल में एक ही सूत्र देखा। हर बार मन ने शान्ति को आगे रख दिया था और दावेदार को उसकी ओर चलाया था।

मरुभूमि का ताप बना हुआ था। राजा अज अभी भी वसिष्ठ की प्रतीक्षा कर रहे थे। दूर का छोटा गाँव भी अपनी जगह था। मंकि की निर्णायक यात्रा उस मान्यता के भीतर हुई, जो इन सभी परिस्थितियों से होकर आई थी।

उसका विवेक स्थिर हो गया। अलग साधक और भविष्य में मिलने वाली मुक्ति के बीच जो दूरी उसने मान रखी थी, उसका अधिकार समाप्त हो गया। सुनी हुई बात से नया दावा बनाने के लिए विचार फिर नहीं लौटा।

मंकि परम निर्वाण-पद को प्राप्त हुआ और परमसमाधि में स्थित हो गया। वह एक वर्ष तक पाषाण की भाँति स्थिर रहा। उसके हृदय में कोई नई भावना या वासना नहीं उगी।

वसिष्ठ ने श्रीराम को यह इतिहास सुनाकर आरम्भ की बात फिर रखी। उन्हें भी मंकि की तरह वासनारूपी संसार पार करना था। यह दूरी चार सूक्ष्म चरणों में बनती थी: अनुभव, दोहराव, संस्कार और भावी प्रक्षेप। ज्ञान ने यह दिखाकर यात्रा पूरी की कि पथिक, मार्ग, प्यास और गन्तव्य सदा एक ही चेतना में प्रकट हुए थे।

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