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महाभारतधर्म की कठिन भूमि

भीष्म: मोक्ष-धर्म व आपद्-धर्म

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महाभारत · शान्ति पर्व
आपद्-धर्म (विपत्ति-काल का धर्म) तथा मोक्ष-धर्म, संकट में राजा का आचरण, और भीष्म का सांख्य-योग एवं परम तत्त्व पर विस्तृत उपदेश, अनेक आख्यानों सहित।

पढ़ने में लगभग 110 मिनट

कुरुक्षेत्र में बाणों की शय्या पर लेटे भीष्म के पास शोकमग्न युधिष्ठिर खड़े हैं, पीछे श्रीकृष्ण और योद्धा।

शर-शय्या पर लेटे हुए पितामह भीष्म की वाणी अब युद्ध और राजनीति की सीमा लाँघकर उस प्रदेश में प्रवेश कर रही थी जहाँ राजा का धर्म और मुक्ति का मार्ग एक ही धागे में पिरोए जाते हैं। युधिष्ठिर पास बैठे थे, हाथ जोड़े, और पितामह ने सृष्टि के आदि से कथा आरम्भ की। यह विपत्ति-काल के धर्म से उठकर मोक्ष-धर्म तक की यात्रा है, जिसमें भृगु और भरद्वाज का संवाद, चार वर्णों का उद्गम, जीवन के चार आश्रम, आचरण के नियम, अध्यात्म का रहस्य, ध्यान-योग की चार सीढ़ियाँ, जप करने वालों की गति, और परम तत्त्व नारायण का स्वरूप, सब क्रम से खुलते हैं। हम आपको पास रहकर वही सुनाते हैं, जैसा व्यास ने कहा।

मोक्ष-धर्म पर्व का आरम्भ: शोक की औषधि और सेनजित की कथा

युधिष्ठिर ने कहा, “हे पितामह! आपने संकट में पड़े मनुष्य के धर्म और राज-धर्म पर उपदेश दिया। अब उन श्रेष्ठ धर्मों को बताइए जो चारों आश्रमों में रहने वालों के हैं।”

भीष्म बोले, “धर्म के अनेक द्वार हैं; उसका पालन कभी निष्फल नहीं जाता। हर आश्रम के लिए कर्तव्य निर्धारित हैं। उनके फल अदृश्य हैं, परलोक में मिलते हैं; पर आत्मा की ओर निर्दिष्ट तप का फल इसी लोक में मिलता है। जब मनुष्य ठीक से विचार करता है, तब वह जान लेता है कि संसार की वस्तुएँ तृण-तुल्य मूल्यहीन हैं, और उनसे विरक्त हो जाता है। दोष-भरे इस संसार में हर बुद्धिमान को आत्मा की मुक्ति के लिए यत्न करना चाहिए।”

युधिष्ठिर ने पूछा, “हे पितामह! धन के नाश पर, या पत्नी, पुत्र, पिता की मृत्यु पर, मनुष्य किस मनोभाव से अपना शोक मारे?”

भीष्म बोले, “इस सम्बन्ध में सेनजित के दरबार में आए एक ब्राह्मण-मित्र की पुरानी कथा है। पुत्र-शोक से सन्तप्त राजा सेनजित को देखकर ब्राह्मण ने कहा, ‘आप क्यों मोहित हैं? आप स्वयं शोक के पात्र हैं, फिर दूसरों के लिए क्यों शोक करते हैं? कुछ दिन बाद दूसरे आपके लिए शोक करेंगे, और उनके लिए और दूसरे। आप, मैं, और आपके सेवक, सब उसी स्थान को जाएँगे जहाँ से आए हैं।’

“सेनजित ने पूछा, ‘हे विद्वान ब्राह्मण! वह कौन-सी बुद्धि, तप, समाधि, ज्ञान या विद्या है, जिसे पाकर आप शोक के वश नहीं होते?’ ब्राह्मण बोला, ‘देखिए, सब प्राणी, श्रेष्ठ, मध्यम और निम्न, अपने-अपने कर्मों से शोक में बँधे हैं। मैं अपने को भी अपना नहीं मानता; पूरे संसार को अपना मानता हूँ, और यह सब जितना मेरा है उतना ही दूसरों का। इस विचार के कारण शोक मुझ तक नहीं पहुँचता। समुद्र पर तैरते दो काठ के टुकड़े जैसे कभी मिलते कभी बिछुड़ते हैं, वैसा ही प्राणियों का मिलन है। पुत्र, पौत्र, बन्धु, सब ऐसे ही हैं; इनसे स्नेह व्यर्थ है, क्योंकि वियोग निश्चित है।

“‘आपका पुत्र एक अदृश्य लोक से आया था और अदृश्य होकर चला गया। न उसने आपको जाना, न आपने उसे। आप कौन हैं, और किसके लिए शोक करते हैं? शोक इच्छा-रूपी रोग से उपजता है, और सुख उस रोग के मिटने से। सुख-दुःख मनुष्यों के लिए चक्र पर घूमते हैं; कोई सदा दुःख नहीं भोगता, कोई सदा सुख नहीं। शरीर ही दोनों का आश्रय है। सब सुख-दुःख भाग्य पर निर्भर हैं, न मित्र सुख के कारण हैं, न शत्रु दुःख के; सुख उसी को मिलता है जिसके लिए वह नियत है। सुख हो या दुःख, प्रिय हो या अप्रिय, जो आ पड़े उसे अविचल हृदय से भोगना चाहिए।

“‘जिस वस्तु में “यह मेरा” का भाव होता है, वही शोक का स्रोत बनती है; और जो त्याग दी जाती हैं, वे सुख का स्रोत बनती हैं। इन्द्रिय-सुख या स्वर्ग-सुख, उस सुख के सोलहवें भाग को भी नहीं छूते जो सब कामनाओं के नाश से उपजता है। जो उस परम आत्मा को जानता है जिससे सब उपजता और जिसमें सब लीन होता है, उसे शोक छू नहीं सकता। जब मनुष्य किसी से भय नहीं पाता और किसी को भयभीत नहीं करता, जब उसमें न इच्छा रहती है न द्वेष, तब वह ब्रह्म-अवस्था को पाता है।’

“इसी प्रसंग में, हे राजन्, पिंगला के वे श्लोक सुने जाते हैं जिनसे उसने एक अति प्रतिकूल समय में भी शाश्वत पुण्य पाया। पिंगला नामक एक गणिका, संकेत-स्थल पर पहुँचकर, एक संयोगवश अपने प्रेमी की संगति से वंचित रह गई। उस घोर दुःख के क्षण में उसने आत्मा की शान्ति पा ली।

“पिंगला बोली, ‘हाय! मैं अनेक वर्ष उन्माद में डूबी, उस प्रिय आत्मा की उपेक्षा करती रही जिसमें केवल शान्ति है। मृत्यु मेरे द्वार पर है, पर मैंने पहले उस पवित्र सार के पास नहीं गई। अब मैं जाग गई हूँ, अज्ञान की नींद से उठ गई हूँ। मैं अब इच्छा के वश नहीं। मानव प्रेमी, जो वस्तुतः नरक के मूर्त रूप हैं, अब मुझे काम से नहीं ठग सकेंगे। आशा और इच्छा से मुक्त होकर मनुष्य सुख से सोता है। पिंगला, हर आशा-इच्छा को विदा कर, अब सुख से सोती है।’ इन वचनों से प्रबुद्ध होकर राजा सेनजित ने शोक त्यागकर परम आनन्द पाया।”

समझने की कुंजी (मोक्ष-धर्म पर्व, पिंगला का दृष्टान्त): यहाँ से शान्ति पर्व का तीसरा भाग, मोक्ष-धर्म पर्व, आरम्भ होता है, जहाँ बल राज-नीति से हटकर मुक्ति, वैराग्य और आत्म-ज्ञान पर आ जाता है। पिंगला का दृष्टान्त (जो भागवत में भी आता है) सिखाता है कि घोर निराशा भी वैराग्य का द्वार बन सकती है, गणिका जब बाहरी प्रेमी से वंचित होती है, तब “भीतर के प्रिय” यानी आत्मा की ओर मुड़ती है। “एक खम्भे और नौ द्वारों वाला घर” शरीर का रूपक है (नौ इन्द्रिय-द्वार)।

सार: शोक की औषधि है यह बोध कि मिलन-वियोग, सुख-दुःख चक्र पर घूमते हैं और सब भाग्य व कर्म के अधीन है; “मेरा” का भाव ही शोक का मूल है। सेनजित और पिंगला, दोनों इसी ज्ञान से वैराग्य पाकर शान्त होते हैं।

पिता-पुत्र संवाद: मृत्यु का पीछा और सत्य से अमरत्व

युधिष्ठिर ने कहा, “हे पितामह! काल, जो हर रचित वस्तु का नाशक है, बीतता जा रहा है। बताइए, वह कौन-सा कल्याण है जिसे खोजना चाहिए?”

भीष्म बोले, “इस सम्बन्ध में पिता-पुत्र के संवाद की पुरानी कथा है। वेदों के अध्ययन में लीन एक ब्राह्मण को एक अति बुद्धिमान पुत्र हुआ, जो इसी से मेधावी कहलाया। मुक्ति के धर्म और लोक-व्यवहार, दोनों का ज्ञाता वह पुत्र एक दिन अपने वेदाध्ययनी पिता से बोला, ‘पिताजी! जब मनुष्य का आयु-काल इतनी शीघ्रता से बीत रहा है, तब बुद्धिमान को क्या करना चाहिए? कर्तव्यों का वह क्रम बताइए जिसका मैं पालन करूँ।’

“पिता बोले, ‘हे पुत्र! ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए पहले वेदों का अध्ययन करे। फिर पितरों के उद्धार के लिए सन्तान चाहे। फिर अग्नि स्थापित कर विधिपूर्वक यज्ञ करे। और अन्त में चिन्तन के लिए वन में प्रवेश करे।’

“पुत्र बोला, ‘जब संसार चारों ओर से घिरा और प्रहार-ग्रस्त है, जब उस पर ऐसी अनिवार्य और घातक वस्तुएँ टूटती हैं, तब आप इतने शान्त भाव से ये बातें कैसे कहते हैं?’ पिता ने पूछा, ‘संसार पर कौन-सी घातक वस्तुएँ टूटती हैं? आप मुझे क्यों डराते हैं?’ पुत्र बोला, ‘मृत्यु वह है जो संसार पर प्रहार करती है। जरा (बुढ़ापा) इसे घेरती है। और वे अनिवार्य वस्तुएँ जो आती-जाती रहती हैं, वे रातें हैं, जो निरन्तर आयु को घटाती हैं। जब मैं जानता हूँ कि मृत्यु किसी की प्रतीक्षा नहीं करती, तब मैं ज्ञान का कवच ओढ़े बिना समय कैसे बिताऊँ?

“‘हर बीतती रात आयु का अंश घटाती है, इसलिए बुद्धिमान दिन को निष्फल माने। मृत्यु मनुष्य को तब उठा ले जाती है जब वह फूल चुन रहा होता है और मन कहीं और लगा होता है, जैसे बाघिन भेड़ को उठा ले जाती है। इसी आज अपना कल्याण-कर्म पूरा करूँ। कल के कर्म आज करूँ, दोपहर के पूर्वाह्न में। मृत्यु यह नहीं देखती कि उसके शिकार के कर्म पूरे हुए या नहीं। कौन जानता है कि मृत्यु आज ही न आ जाए?

“‘गाँव और नगर में (मनुष्यों के बीच) बसने की आसक्ति को मृत्यु का मुख कहा गया है; वन इन्द्रियों को बाँधने का बाड़ा है, ऐसा श्रुति कहती है। जो मन-वचन-कर्म से किसी प्राणी की हिंसा नहीं करता, उसे जीवन और सम्पत्ति के नाशक भी हानि नहीं पहुँचाते। मृत्यु के दूतों (रोग और जरा) को सत्य के सिवा कोई नहीं रोक सकता, जो असत्य को निगल जाता है। सत्य में ही अमरत्व है। इसलिए सत्य का व्रत धारण करूँ, सत्य को ही अपना वेद बनाऊँ, और इन्द्रियों को रोककर सत्य से मृत्यु को जीतूँ।

“‘अमरत्व और मृत्यु, दोनों शरीर में ही रोपे हैं। अज्ञान और विवेक-नाश से मृत्यु आती है, सत्य से अमरत्व। इसलिए मैं हिंसा से विरत होकर सत्य साधूँगा, काम-क्रोध को लाँघकर सुख-दुःख को समान दृष्टि से देखूँगा, और शान्ति पाकर अमर की भाँति मृत्यु से बचूँगा। मैं ब्रह्म से, ब्रह्म के द्वारा उपजा हूँ; निःसन्तान होते हुए भी ब्रह्म को समर्पित होकर ब्रह्म में लौटूँगा। मुझे उद्धार के लिए पुत्र की आवश्यकता नहीं। ज्ञान-समान कोई नेत्र नहीं, सत्य-समान कोई तप नहीं, आसक्ति-समान कोई शोक नहीं, और त्याग-समान कोई सुख नहीं।’ भीष्म ने कहा, “हे राजन्! आप भी उसी पिता की भाँति आचरण कीजिए जो पुत्र के वचन सुनकर सत्य-धर्म में लीन हो गया।”

सार: मेधावी पुत्र अपने पिता को विधिवत आश्रम-क्रम पर रुकने नहीं देता, मृत्यु निरन्तर पास आ रही है, इसलिए कल्याण-कर्म आज ही करना चाहिए। उसका मार्ग: हिंसा-त्याग, सत्य-व्रत और इन्द्रिय-निग्रह, क्योंकि सत्य में ही अमरत्व है। भीष्म युधिष्ठिर को यही अपनाने को कहते हैं।

सम्पाक और मंकि: निर्धनता और त्याग का सुख

युधिष्ठिर ने पूछा, “हे पितामह! धनी और निर्धन, जो भिन्न-भिन्न आचरण में रहते हैं, उन्हें सुख-दुःख कहाँ से और कैसे आता है?”

भीष्म बोले, “इस सम्बन्ध में सम्पाक के गाए वचन उद्धृत हैं, जिसने शान्ति और मुक्ति पा ली थी। पूर्व-काल में एक ब्राह्मण, कुलक्षणा पत्नी, फटे वस्त्र और भूख से दुखी, त्याग-व्रत में रहता हुआ, मुझसे ये वचन कह गया, ‘जन्म के दिन से ही नाना सुख-दुःख मनुष्य पर आते हैं। यदि वह दोनों को भाग्य का कर्म मान ले, तो न सुख आने पर हर्षित हो, न दुःख आने पर खिन्न। यदि घर और प्रिय वस्तुएँ त्यागकर आप विचरें, तो सच्चा सुख चखेंगे। सब कुछ त्यागा हुआ मनुष्य सुख से सोता और सुख से जागता है। इस संसार में पूर्ण निर्धनता ही सुख है, यह कल्याण का स्रोत है, भय से मुक्ति है।

“‘तीनों लोकों पर दृष्टि डालने पर भी मुझे ऐसा कोई नहीं दिखता जो शुद्ध-आचरण, आसक्ति-रहित निर्धन के समान हो। मैंने निर्धनता और राज्य को तराज़ू पर तौला, निर्धनता राज्य से भारी निकली। राजा, सम्पन्न होकर भी, चिन्ता से व्याकुल और मृत्यु के मुख में रहता है; पर निर्धन, सब आशाओं से मुक्त, न आग से, न शत्रु से, न मृत्यु से, न चोरों से डरता। देवता भी ऐसे को सराहते हैं जो अपनी इच्छानुसार विचरता, भुजा को तकिया बना धरती पर सोता, और शान्ति से युक्त है। त्याग के बिना न सुख मिलता है, न परम कल्याण, न सुख की नींद। इसलिए सब त्यागकर सुख अपना बनाइए।’ इसी से, हे राजन्, मैं त्याग को परम मानता हूँ।”

युधिष्ठिर ने पूछा, “यदि कोई दान-यज्ञ करना चाहे पर धन न पाए और धन की तृष्णा उसे घेर ले, तो वह सुख के लिए क्या करे?” भीष्म बोले, “जो सुख-दुःख, मान-अपमान को समान दृष्टि से देखता है, जो सांसारिक भोग के लिए यत्न नहीं करता, सत्यभाषी है, सब आसक्ति से मुक्त है, और कर्म की इच्छा नहीं रखता, वही सुखी है। ये पाँच ही पूर्ण शान्ति या मुक्ति के साधन हैं, इन्हें ही स्वर्ग, धर्म और परम सुख कहा गया है।

“इस सम्बन्ध में मंकि का गाया वचन सुनिए। धन का इच्छुक मंकि बार-बार निराश हुआ। अन्त में बची-खुची सम्पत्ति से उसने हल के लिए दो बछड़े खरीदे। एक दिन जुए में जुते वे बछड़े, मार्ग पर बैठे एक ऊँट को देखकर बिदककर उसकी गर्दन पर जा गिरे। क्रुद्ध ऊँट तेज़ी से उठ खड़ा हुआ और दोनों असहाय बछड़ों को गर्दन के दोनों ओर लटकाए दौड़ पड़ा। उन्हें मृत्यु के मुख में देख मंकि बोला, ‘यदि धन भाग्य से नियत न हो, तो कुशल मनुष्य भी पूरे यत्न से उसे नहीं पा सकता। मैंने कितने ही उपायों से धन कमाना चाहा। देखो, मेरी सम्पत्ति पर यह विपत्ति! मेरे प्रिय बछड़े ऊँट की गर्दन पर रत्नों-से लटक रहे हैं! यह केवल भाग्य का फल है। प्रयत्न व्यर्थ है जहाँ संयोग है; और यदि प्रयत्न को कारण माना भी जाए, तो गहराई से खोजने पर भाग्य ही तल में मिलता है।

“‘इसलिए सुख चाहने वाला सब आसक्ति त्यागे। हे मेरी लोभ-ग्रस्त आत्मा! बार-बार ठगी जाकर भी आप आसक्ति से क्यों मुक्त नहीं होतीं? आपने बार-बार संचित धन खोया है। शर्म है मेरी मूढ़ता पर, मैं आपका खिलौना बन गया! हे इच्छा! मैं आपकी जड़ जानता हूँ, आप संकल्प से उपजती हैं। इसलिए मैं संकल्प को त्यागूँगा, और आप जड़ समेत नष्ट हो जाएँगी। धन की इच्छा कभी सुखकर नहीं, मिल जाए तो चिन्ता, खो जाए तो मृत्यु-सी पीड़ा। गंगा के मीठे जल की भाँति धन केवल तृष्णा बढ़ाता है। हे इच्छा, मुझे छोड़! मैं अब सत्त्व-गुण का आश्रय लूँगा, और ब्रह्म में प्रवेश कर राजा-सा सुख से रहूँगा!’ ऐसी बुद्धि से मंकि ने सब इच्छाएँ त्यागकर परम कल्याण-धाम ब्रह्म को पाया। दो बछड़ों के नाश ने ही उसे अमरत्व तक पहुँचा दिया, क्योंकि उसने इच्छा की जड़ ही काट दी।”

एक उप-कथा: मंकि की कथा भाग्य और पुरुषार्थ के सनातन प्रश्न को छूती है। बछड़ों का ऊँट की गर्दन पर लटकना एक विचित्र, लगभग हास्यपूर्ण दुर्घटना है, पर मंकि इसे प्रयत्न की सीमा के प्रतीक के रूप में पढ़ता है। ध्यान दीजिए कि वह “इच्छा” को सम्बोधित करके आत्म-संवाद करता है, मानो इच्छा कोई बाहरी शत्रु हो; और निष्कर्ष यह कि इच्छा की जड़ “संकल्प” (मन का निश्चय) है। जड़ काटो, तो इच्छा-रूपी वृक्ष स्वयं गिर जाता है।

सार: सम्पाक निर्धनता को राज्य से श्रेष्ठ बताता है, क्योंकि निर्धन भय-मुक्त है। मंकि अपने दो बछड़ों के अद्भुत नाश से सीखता है कि धन भाग्याधीन है और इच्छा की जड़ संकल्प है; उसे काटकर वह ब्रह्म-सुख पाता है। भीष्म त्याग और समदर्शिता को परम सुख का साधन बताते हैं।

जनक, वोध्य और प्रह्लाद-अजगर: आसक्ति-मुक्ति के छह गुरु

भीष्म बोले, “इसी सम्बन्ध में विदेह-राज जनक के वचन उद्धृत हैं, जिन्होंने आत्म-शान्ति पाई थी, ‘मेरा धन असीम है, और साथ ही मेरे पास कुछ नहीं। यदि मेरी समस्त मिथिला आग में जल जाए, तो मेरी कोई हानि नहीं।’ इसी विषय पर, आसक्ति से मुक्ति पर, वोध्य के वचन भी सुनिए। एक बार नहुष-पुत्र ययाति ने ऋषि वोध्य से, जिसने इच्छा-त्याग से शान्ति पाई थी, पूछा, ‘हे महाज्ञानी! मुझे शान्ति का उपदेश दीजिए। वह कौन-सी बुद्धि है जिसके बल पर आप सब कर्मों से विलग, शान्त-चित्त संसार में विचरते हैं?’

“वोध्य बोला, ‘मैं दूसरों के उपदेशों के अनुसार आचरण करता हूँ, पर स्वयं किसी को उपदेश नहीं देता। फिर भी जिन संकेतों से मेरा आचरण ढला है, उन्हें बताता हूँ; आप मनन से उनका मर्म पकड़िए। मेरे छह गुरु हैं, पिंगला, ओस्प्रे (मत्स्य-भक्षी पक्षी), सर्प, वन की मधुमक्खी, बाण बनाने वाला, और कन्या।’ भीष्म ने आगे बताया, ‘आशा हृदय को अति विचलित करती है; आशा-त्याग परम सुख है। आशा को अपेक्षा-शून्यता में बदलकर पिंगला शान्ति से सोई। चोंच में मांस लिए ओस्प्रे को, जिन्हें मांस नहीं मिला, वे अन्य पक्षी सताते और मारते हैं; एक ओस्प्रे ने मांस का सर्वथा त्याग कर सुख पाया। अपने लिए घर बनाना दुःख का कारण है; सर्प दूसरे के बनाए बिल में रहकर सुख से जीता है। तपस्वी, वन की मधुमक्खियों की भाँति किसी को कष्ट दिए बिना भिक्षा से सुख से जीते हैं।

“‘एक बाण-निर्माता अपने काम में इतना तल्लीन था कि पास से गुज़रते राजा को भी न देखा, यह एकाग्रता का गुरु है। जब बहुत-से साथ हों, विवाद होता है; जब दो भी साथ रहें, बातचीत होती ही है। इसलिए मैं उस कन्या की कथा की भाँति अकेला विचरता हूँ, जिसकी कलाई में समुद्र-शंखों के कंगन थे, और दो कंगन परस्पर टकराकर शब्द करते, अतः उसने एक-एक कर सब तोड़ दिए, हर कलाई में केवल एक ही रहने दिया, जो शब्द नहीं करता था।’”

युधिष्ठिर ने पूछा, “हे मानव-आचरण के ज्ञाता! किस आचरण से मनुष्य इस संसार में शोक-मुक्त होकर सफल होता है, और उत्तम गति पाता है?” भीष्म बोले, “इस सम्बन्ध में प्रह्लाद और ऋषि अजगर के संवाद की कथा है। एक बार महाज्ञानी राजा प्रह्लाद ने एक शान्त, संयमी ब्राह्मण से पूछा, ‘इच्छा-रहित, शुद्ध-आत्मा, विनम्र, संयमी, कर्म की इच्छा से रहित, मधुर-भाषी, गरिमामय, आप बालक-से सरल जीते हैं। न किसी लाभ की कामना करते, न हानि पर शोक करते। आप सदा सन्तुष्ट हैं और संसार की किसी वस्तु की परवाह नहीं करते। जब सब प्राणी इच्छा और राग के प्रवाह में बहे जा रहे हैं, आप धर्म, अर्थ और काम के सब कर्मों के प्रति उदासीन हैं। आप मुक्त आत्मा-से, सब कुछ केवल साक्षी-भाव से देखते हैं। आपकी यह बुद्धि, विद्या और आचरण क्या है?’

“उस ब्राह्मण ने मधुर, गम्भीर वचनों में उत्तर दिया, ‘हे प्रह्लाद! प्राणियों की उत्पत्ति, वृद्धि, क्षय और मृत्यु, किसी समझ में आने वाले कारण से बँधे नहीं; इसी से मैं न हर्ष करता हूँ न शोक। सब प्रवृत्तियाँ प्राणियों के अपने स्वभाव से बहती हैं; सब वस्तुएँ अपने-अपने स्वभाव पर निर्भर हैं, इसलिए मैं किसी से प्रसन्न नहीं होता। हर मिलन में बिछुड़ने की प्रवृत्ति है, हर प्राप्ति का अन्त नाश में है; इसलिए मैं किसी वस्तु की प्राप्ति पर हृदय नहीं टिकाता। जल, थल और आकाश के सब प्राणियों का अन्त मैं देखता हूँ; अतः सब को एक-समान स्वभाव वाला मानकर मैं निश्चिन्त, शान्ति से सोता हूँ।

“‘यदि बिना श्रम भरपूर भोजन मिले, तो भोग लेता हूँ; न मिले, तो अनेक दिन बिना खाए रहता हूँ। कभी लोग बहुमूल्य व्यंजन खिलाते हैं, कभी थोड़ा, कभी कुछ भी नहीं। कभी ऊँचे पलंग पर सोता हूँ, कभी खुली भूमि पर। कभी चीथड़े पहनता हूँ, कभी मृगचर्म, कभी बहुमूल्य वस्त्र। बिना प्रयत्न मिले और धर्म-संगत भोग को मैं नहीं ठुकराता, पर दुर्लभ वस्तु के लिए यत्न नहीं करता। मेरा यह कठोर व्रत अजगर कहलाता है। यह व्रत अमरत्व देता है, शुभ और शोक-रहित है, ज्ञानियों के मत से युक्त, और मूढ़ों द्वारा अपालित। शुद्ध हृदय से मैं इसका पालन करता हूँ, और सब दोष जीतकर, तृष्णा से मुक्त होकर मनुष्यों के बीच विचरता हूँ।’ भीष्म बोले, “जो आसक्ति, भय, लोभ, मूढ़ता और क्रोध से मुक्त होकर इस अजगर-व्रत का पालन करता है, वह सुख से दिन बिताता है।”

समझने की कुंजी (अजगर-व्रत, छह गुरु): अजगर-व्रत = अजगर-सर्प की भाँति आचरण, जो हिले-डुले बिना, जो स्वयं सामने आ जाए उसी से तृप्त रहता है; यानी प्रयत्न-रहित सन्तोष। जनक (“विदेह”) राज्य के स्वामी होकर भी पूर्ण अनासक्त हैं, “मिथिला जले तो मेरी हानि नहीं” इसी अनासक्ति का प्रसिद्ध वाक्य है। वोध्य के “छह गुरु” प्रकृति और जीवन से सीखी शिक्षाएँ हैं: आशा-त्याग, अपरिग्रह, अनासक्त-निवास, अहिंसक भिक्षा, एकाग्रता, और एकाकीपन।

सार: जनक राज्य में रहकर भी अनासक्त हैं; वोध्य प्रकृति के छह गुरुओं से अनासक्ति सीखते हैं; और अजगर-व्रती ब्राह्मण प्रह्लाद को प्रयत्न-रहित सन्तोष का धर्म बताता है, जो सुख-दुःख, भोग-अभाव को समान भाव से स्वीकारता है।

इन्द्र और कश्यप: सियार के रूप में सन्तोष का उपदेश

युधिष्ठिर ने पूछा, “हे पितामह! बन्धु, कर्म, धन या बुद्धि, इनमें से किसे मनुष्य का आश्रय मानें?” भीष्म बोले, “बुद्धि ही प्राणियों का आश्रय है, परम सम्पत्ति, परम सुख और साधु-जनों के मत में स्वर्ग। बुद्धि से ही बलि, प्रह्लाद, नमुचि और मंकि ने सांसारिक सम्पन्नता खोकर भी कल्याण पाया। इस सम्बन्ध में इन्द्र और कश्यप के संवाद की कथा है।

“एक बार एक सम्पन्न वैश्य, अपने ऐश्वर्य के मद में, असावधानी से रथ हाँकते हुए, कठोर-व्रती तपस्वी ऋषि-पुत्र कश्यप को गिरा गया। भूमि पर पड़ा वह युवक, घोर पीड़ा में, क्रोध और निराशा से बोला, ‘मैं प्राण त्याग दूँगा। निर्धन को इस संसार में जीवन की क्या आवश्यकता?’ जब वह मौन, व्याकुल, तेज-हीन, मृत्यु के निकट पड़ा था, तब इन्द्र सियार के रूप में आकर बोले, ‘सब निम्न प्राणी मनुष्य-जन्म चाहते हैं; मनुष्यों में ब्राह्मणत्व अति वांछित। आप मनुष्य हैं, ब्राह्मण हैं, और वेदज्ञ ब्राह्मण भी। अति दुर्लभ को पाकर भी मूढ़ता से प्राण त्यागना आपको शोभा नहीं देता!

“‘हाय, वे धन्य हैं जिनके हाथ हैं! मैं हाथ वालों के पद की उत्कट इच्छा करता हूँ। हम हाथों के लिए वैसे ही लालायित हैं जैसे आप धन के लिए। हाथ से बड़ी कोई सम्पत्ति नहीं। देखिए, मैं अपने शरीर में घुसा यह काँटा नहीं निकाल सकता, न मुझे काटते कीड़े मसल सकता हूँ! दस अँगुलियों वाले दो हाथ जिनके हैं, वे काँटे-कीड़े हटा सकते हैं, वर्षा-शीत-ताप से आश्रय बना सकते हैं, उत्तम वस्त्र-अन्न-शय्या भोग सकते हैं, और गायों आदि पशुओं से बोझ ढुलवा सकते हैं। जो जीभ-रहित, असहाय, अल्प-बल और हाथ-रहित हैं, वे ये सब दुःख सहते हैं। सौभाग्य से, हे तपस्वी, आप उनके समान नहीं, न सियार, न कीड़ा, न चूहा, न मेंढक। इतने लाभ से आपको सन्तुष्ट होना चाहिए! और आप तो श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, यह सोचकर कितने सुखी होने चाहिए!

“‘ये कीड़े मुझे काट रहे हैं, हाथ न होने से मैं इन्हें हटा नहीं सकता, यह मेरी दुर्दशा देखिए! फिर भी मैं प्राण नहीं त्यागता, क्योंकि ऐसा करना घोर पाप है और मुझे और भी निम्न योनि में डाल देगा। सियार की यह योनि दुखी होते हुए भी सहनीय है; इससे नीची अनेक योनियाँ और दुखी हैं। मनुष्य धन पाकर राज्य चाहता है, राज्य पाकर देवत्व, देवत्व पाकर देवराज-पद; किसी अवस्था में सन्तोष नहीं। सन्तोष इच्छित वस्तु पाने से नहीं आता। जल की प्रचुरता पर भी प्यास नहीं बुझती; नया धन पाते ही तृष्णा की आग नई लकड़ी पाकर और भड़कती है।

“‘आपमें शोक है, पर आनन्द भी; सुख-दुःख दोनों आपमें बसते हैं, फिर शोक को क्यों झुकते हैं? सब इच्छाओं और कर्मों के मूल, यानी बुद्धि और इन्द्रियों को, पिंजरे में बन्द पक्षियों की भाँति रोक लेना चाहिए। दूसरा सिर या तीसरा हाथ नहीं काटा जा सकता; जो वस्तु है ही नहीं, उससे भय नहीं। जिसने किसी सुख का अनुभव नहीं किया, वह उसकी इच्छा नहीं करता; इच्छाएँ तो स्पर्श, दृष्टि और श्रवण के अनुभव से उपजती हैं।

“‘मेरे पूर्व-जन्म में मेरे पास बहुत-सी व्यर्थ विद्या थी। मैं तर्क खोजता, श्रद्धा कम रखता, वेदों का निन्दक था, सभाओं में केवल तर्क बोलता, श्रुति-वचनों का अनादर करता, और ब्राह्मणों से दर्प-भरे स्वर में बोलता। मैं नास्तिक, सर्व-संशयी, अज्ञानी होते हुए भी अपनी विद्या पर अभिमानी था। इसी पाप का फल यह सियार-योनि है। यदि सैकड़ों दिन-रात बाद भी मैं फिर मनुष्य-योनि पाऊँ, तो सन्तोष से, यज्ञ-दान में लगकर, जानने योग्य को जानूँगा और त्यागने योग्य को त्यागूँगा।’

“यह सुनकर कश्यप उठ खड़े हुए, बोले, ‘अरे! आप तो ज्ञान और बुद्धि से सम्पन्न हैं! मैं विस्मित हूँ!’ तब ज्ञान से विस्तृत दृष्टि वाले ब्राह्मण ने जाना कि वह सियार-वेश में स्वयं इन्द्र है। कश्यप ने उस देवराज की पूजा की, और उनकी अनुमति लेकर अपने आश्रम लौटे।”

एक उप-कथा: सियार-वेशधारी इन्द्र की यह उलटी शिक्षा-विधि मार्मिक है, देवराज स्वयं को एक हीन प्राणी बताकर ब्राह्मण को उसके अनमोल मनुष्य-जन्म की याद दिलाते हैं। सियार बार-बार कहता है, “हाथ वाले धन्य हैं”, यानी जो हम सहज पाए हुए मानकर तुच्छ समझते हैं (हाथ, मनुष्य-तन, ब्राह्मण-जन्म), वही दूसरों के लिए परम दुर्लभ है। और सियार का अपना अतीत, तर्क-घमंडी, श्रद्धा-हीन, वेद-निन्दक, इस बात की चेतावनी है कि कोरी बुद्धि बिना श्रद्धा के पतन की ओर ले जाती है।

सार: आत्म-हत्या को उद्यत निर्धन ब्राह्मण कश्यप को इन्द्र सियार-रूप में सन्तोष का पाठ पढ़ाते हैं, मनुष्य-जन्म दुर्लभ है, तृष्णा कभी तृप्त नहीं होती, और बुद्धि (श्रद्धा-सहित) ही परम आश्रय है। सियार का अपना सियार-जन्म उसके पूर्व-जन्म के तर्क-अभिमान का फल है।

कर्म-फल की अनिवार्यता: छाया-सा पीछा करता पूर्व-कर्म

युधिष्ठिर ने पूछा, “हे पितामह! क्या दान, यज्ञ, तप और गुरु-सेवा बुद्धि और परम कल्याण देते हैं?” भीष्म बोले, “यदि मन काम-क्रोध आदि से ग्रस्त हो, तो वह पाप की ओर दौड़ता है; और पाप-कर्म से मनुष्य को पीड़ादायी लोकों में रहना पड़ता है। पापी दरिद्र-घरों में जन्म लेते और बार-बार भूख, शोक, भय और मृत्यु की पीड़ा सहते हैं। जो सत्कर्मी, श्रद्धालु और जितेन्द्रिय हैं, वे सम्पन्न होकर बार-बार उत्सव, स्वर्ग और सुख में रमते हैं।

“जो पूर्व-कर्म से नियत है, वह कर्ता का पीछा करता है, चाहे वह उसे पीछे छोड़ने का कितना ही यत्न करे। वह उसके सोने पर सोता है, उसके सब कर्मों के साथ चलता है। छाया की भाँति वह विश्राम पर विश्राम करता, गति पर गति करता, और कर्म पर कर्म करता है। जो कर्म मनुष्य करता है, उसका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है। पूर्व-जन्म के कर्म अपने उचित समय पर फल देते हैं, जैसे फूल-फल बिना किसी बाहरी प्रयत्न के अपने ऋतु में आते हैं।

“जीव माता के गर्भ में ही अपने कर्मानुसार सुख-दुःख भोगने लगता है। बचपन, यौवन या वृद्धावस्था, जीवन के जिस काल में जो शुभ-अशुभ कर्म किया जाता है, उसका फल अगले जन्म में ठीक उसी काल में मिलता है। जैसे बछड़ा हज़ार गायों के बीच भी अपनी माता को पहचानकर उसके पास जाता है, वैसे ही पूर्व-कर्म नए जन्म में अपने कर्ता को पहचानकर उस तक पहुँचता है। जल में धोने से मैला वस्त्र स्वच्छ होता है; वैसे ही पश्चात्ताप में जलते मनुष्य उचित तप से अनन्त सुख पाते हैं। जैसे आकाश में पक्षियों या जल में मछलियों का मार्ग चिह्नित नहीं होता, वैसे ही जिनकी आत्मा ज्ञान से शुद्ध हो गई, उनका मार्ग किसी से अंकित नहीं होता। उचित विवेक से मनुष्य वही करे जो उसके लिए श्रेयस्कर हो; यही बुद्धि और परम कल्याण का साधन है।”

सार: पूर्व-कर्म छाया की भाँति मनुष्य का पीछा करता और अपने नियत समय पर अवश्य फल देता है, गर्भ से ही और अगले जन्म में भी उसी काल में। पश्चात्ताप और उचित तप पापों को धो सकते हैं, और ज्ञान से शुद्ध आत्मा का मार्ग अंकित नहीं होता।

भृगु-भरद्वाज संवाद: सृष्टि की उत्पत्ति और पंचभूत

युधिष्ठिर ने पूछा, “हे पितामह! यह चराचर विश्व किससे रचा गया? प्रलय में किसमें लीन होता है? समुद्र, आकाश, पर्वत, मेघ, भूमि, अग्नि और वायु सहित यह विश्व किसने रचा? वर्णों का यह विभाजन कहाँ से आया? जीवों का जीवन कैसा है? मरे हुए कहाँ जाते हैं?”

नदी-तट पर पेड़ के नीचे बैठे भृगु छोटे ऋषि भरद्वाज को उपदेश देते हुए आकाश में तेजस्वी ब्रह्मा से निकलती चार रंगों की मानव आकृतियों की ओर संकेत करते हैं, जैसे चार वर्ण आकार ले रहे हों

भीष्म बोले, “इस सम्बन्ध में भृगु के भरद्वाज को दिए उत्तर की कथा है। कैलास-शिखर पर तेज से देदीप्यमान महर्षि भृगु को देख भरद्वाज ने यही प्रश्न पूछे। भृगु ने कहा, ‘एक आदि-पुरुष हैं, जिन्हें महर्षि मानस कहते हैं, अनादि, अनन्त, अव्यय, अमर, अव्यक्त, शाश्वत और अपरिवर्तनीय। उन्हीं से प्राणी जन्मते और उन्हीं में लीन होते हैं। उन्होंने पहले महत् नामक दिव्य तत्त्व रचा, महत् ने अहंकार (चेतना), उसने आकाश। आकाश से जल, जल से अग्नि और वायु, और अग्नि-वायु के मिलन से पृथ्वी उपजी। स्वयम्भू मानस ने तब ऊर्जा से भरा एक दिव्य कमल रचा; उस कमल से वेदों के सागर ब्रह्मा प्रकट हुए।

“‘ये पाँच भूत ही महान ब्रह्म हैं। पर्वत उसकी हड्डियाँ, पृथ्वी मांस-मेद, समुद्र रक्त, आकाश उदर, वायु श्वास, अग्नि तेज, नदियाँ नस-नाड़ियाँ, और सूर्य-चन्द्र उसके दो नेत्र हैं। ऊपर का आकाश उसका शिर, पृथ्वी दो पैर, और दिशाएँ भुजाएँ हैं। वह अनन्त नाम से भी जाना जाता है।’

“भरद्वाज ने आकाश, दिशाओं, पृथ्वी और वायु का विस्तार पूछा। भृगु ने कहा, ‘जो आकाश आप देखते हैं वह अनन्त है; सूर्य-चन्द्र अपनी किरणों से परे नहीं देख सकते। जहाँ उनकी किरणें नहीं पहुँचतीं, वहाँ स्वयं-प्रकाशित ज्योतियाँ हैं। भूमि के परे जल के सागर हैं, जल के परे अन्धकार, अन्धकार के परे फिर जल, और उसके परे अग्नि। नीचे पाताल के परे जल, जल के परे महासर्पों का लोक, फिर आकाश, फिर जल, इस प्रकार जल और आकाश अनन्त रूप से बारी-बारी फैले हैं। कमल वस्तुतः पृथ्वी है, जो ब्रह्मा-रूपी मानस को आसन देने रची गई; सुमेरु उस कमल की कर्णिका बना, और उसी में रहकर ब्रह्मा ने सब लोक रचे।’

“भरद्वाज ने पूछा, ‘जल, अग्नि, वायु और पृथ्वी कैसे उपजे?’ भृगु ने ब्रह्म-कल्प की वह आकाशवाणी सुनाई जो ध्यानस्थ ऋषियों ने सुनी थी, ‘पहले केवल अनन्त, निश्चल आकाश था। फिर अन्धकार के भीतर अन्धकार-सा जल उपजा। जल के दाब से वायु उठी, बड़े शब्द के साथ। वायु और जल के घर्षण से, ऊपर की ओर ज्वाला वाली महाबली अग्नि प्रकट हुई, जिसने अन्धकार को मिटाया। वायु की सहायता से अग्नि ने आकाश और जल को मिलाया, ठोस हुई, और गिरते समय अग्नि का द्रव-अंश जमकर पृथ्वी बना। यह पृथ्वी ही सब रस, गन्ध, द्रव और प्राणियों का मूल है।’

“भरद्वाज ने पूछा कि जब ब्रह्मा ने हज़ारों प्राणी रचे, तो केवल इन पाँच भूतों को ही ‘महाभूत’ (महान प्राणी) क्यों कहा गया? भृगु ने उत्तर दिया, ‘जो अनन्त या विशाल की कोटि में हों, वे ही “महान” कहलाते हैं, इसी से ये पाँच महाभूत कहे जाते हैं। गति वायु है; जो शब्द सुना जाता है वह आकाश; भीतरी ताप अग्नि; द्रव-रस जल; और ठोस मांस-हड्डी पृथ्वी। प्राणियों के शरीर इन्हीं पाँच भूतों से बने हैं, और पाँच इन्द्रियाँ भी इन्हीं के अंश हैं, कान आकाश का, नाक पृथ्वी का, जिह्वा जल का, त्वचा वायु का, और नेत्र अग्नि (प्रकाश) का।’

“भरद्वाज ने शंका की कि यदि स्थावर (वृक्ष आदि) भी पंचभूत के बने हैं, तो उनमें ताप, गति या इन्द्रियाँ क्यों नहीं दिखतीं? भृगु ने सिद्ध किया कि वृक्षों में भी पाँचों भूत हैं, घनी होते हुए भी उनमें आकाश है (इसी से वे फूलते-फलते हैं); ताप है (इसी से पत्ते सूखकर झड़ते हैं); स्पर्श-बोध है; ध्वनि सुनते हैं (इसी से वायु-गर्जन से फल झड़ते हैं); लता पेड़ पर चढ़ती है, अतः दृष्टि है; सुगन्ध-दुर्गन्ध से प्रभावित होते हैं, अतः घ्राण है; जड़ों से जल पीते और रोग पाते-मिटाते हैं, अतः रस-बोध है। इसलिए वृक्ष सजीव हैं, निर्जीव नहीं।

“भृगु ने आगे शरीर में पंचभूत और गन्ध-रस-रूप-स्पर्श-शब्द के भेद, तथा प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान, इन पाँच वायुओं का विस्तृत वर्णन किया, जो जीव को जीवित रखती और उसके भीतर भोजन-पाचन, गति और वाणी का संचालन करती हैं।”

समझने की कुंजी (पंचभूत, पंच-प्राण): पंचभूत = पाँच मूल तत्त्व, आकाश, वायु, अग्नि (तेज), जल, पृथ्वी, जिनसे सारा भौतिक जगत और शरीर बना है; पाँच इन्द्रियाँ इन्हीं से जुड़ी हैं। पंच-प्राण = शरीर की पाँच जीवन-वायुएँ: प्राण (श्वास/मस्तिष्क), अपान (मल-मूत्र-निष्कासन, अधोगामी), समान (हृदय में स्थित, देह की ऊष्मा को सारे शरीर में फैलाने वाला), उदान (वाणी-डकार, ऊर्ध्वगामी), व्यान (सब सन्धियों में, क्रिया-बल)। यह भृगु-संवाद महाभारत का सांख्य-शैली का सृष्टि-विज्ञान है, अव्यक्त “मानस” से क्रमशः महत् → अहंकार → पंचभूत का प्रकटीकरण।

सार: भृगु बताते हैं कि अव्यक्त “मानस” से महत्, अहंकार और फिर आकाश-वायु-अग्नि-जल-पृथ्वी क्रमशः उपजे; कमल पर ब्रह्मा प्रकट हुए। पाँच महाभूत ही ब्रह्म का शरीर हैं, और वृक्षों समेत सब प्राणी इन्हीं से बने व सजीव हैं, पाँच इन्द्रियों और पाँच प्राण-वायुओं सहित।

जीव और देह: मृत्यु के पार आत्मा का स्वरूप

भरद्वाज ने गहरी शंका उठाई, “यदि वायु हमें जिलाती और चलाती है, और अग्नि भोजन पचाती है, तो जीवन तुच्छ-सा जान पड़ता है। प्राणी के मरते समय जिसे ‘जीव’ कहते हैं, वह निकलता दिखाई नहीं देता; केवल श्वास रुकता है और भीतरी ताप बुझ जाता है। यदि जीवन केवल वायु होता, तो निकलकर वह बाहरी वायु-सागर में मिल जाता, जैसे जल कुएँ में या दीप की लौ अग्नि में मिलकर अपना अलग अस्तित्व खो देती है। पंचभूत से बने इस शरीर में ‘जीवन’ है, यह हम कैसे कहें? जो मर गया, पक्षियों ने खा लिया, या पर्वत से गिरकर चूर हो गया, या अग्नि में जल गया, वह फिर कैसे जीवित होगा? कटे वृक्ष की जड़ नहीं उगती, केवल बीज अंकुरित होते हैं। तो जो मर गया, वह फिर कहाँ आता है? जो मरते हैं, वे मरकर नष्ट होते हैं; केवल बीज से बीज चलता है।”

भृगु ने उत्तर दिया, “जीव का, दान का, या हमारे किसी कर्म का नाश नहीं होता। मरने वाला प्राणी केवल दूसरे रूप में चला जाता है। केवल शरीर घुलता है; देह पर आश्रित होकर भी जीव शरीर के नष्ट होने पर नष्ट नहीं होता। जैसे ईंधन जल जाने पर अग्नि दिखाई नहीं देती, वैसे ही शरीर-नाश के बाद जीव दिखाई नहीं देता।” भरद्वाज ने तर्क किया कि ईंधन समाप्त होने पर अग्नि तो वस्तुतः बुझ जाती है, मानो नष्ट हो जाती है। भृगु बोले, “अग्नि नष्ट नहीं होती; आश्रय न रहने पर वह आकाश में मिल जाती है और सूक्ष्म होने से दिखाई नहीं देती। वैसे ही जीव, शरीर छोड़कर, अपनी अति-सूक्ष्मता के कारण आकाश में रहता है, दिखाई नहीं देता। अग्नि (ताप) ही प्राण आदि वायुओं को धारण करती है; उसी ताप को जीवन या जीव-कर्ता जानिए। श्वास रुकने पर वह ताप बुझता है, शरीर निश्चेष्ट होकर गिरता और पृथ्वी में मिल जाता है।

“शरीर में जो श्वास है वह आकाश में, और ताप उस श्वास के साथ मिल जाता है। ये तीन (आकाश, वायु, अग्नि) मिल जाते हैं; शेष दो (जल, पृथ्वी) पृथ्वी-रूप में साथ रहते हैं।” भरद्वाज ने फिर पूछा कि जीव के लक्षण क्या हैं, क्योंकि शरीर के टूटने पर वह दिखता नहीं; और जब मन कहीं और लगा हो तो कान सुनते हुए भी नहीं सुनते, नेत्र देखते हुए भी नहीं देखते, तो फिर वह कौन है जो सुख-दुःख भोगता, क्रोध करता, सोचता और बोलता है?

“भृगु बोले, ‘मन भी पंचभूत से ही बना है, अतः इन कर्मों का मूल वह नहीं। केवल एक भीतरी आत्मा ही शरीर को धारण करती है। वही गन्ध, रस, शब्द, स्पर्श और रूप का अनुभव करती है। वह आत्मा सब अंगों में व्याप्त रहकर, पाँच गुणों वाले मन की और पंचभूत-शरीर की साक्षी है। वही सुख-दुःख अनुभव करती है, और उसके अलग होने पर शरीर इन्हें नहीं अनुभव करता। समस्त विश्व जल से बना है, जल सब देहधारियों का रूप है, और उस जल में वह आत्मा है जो मन में प्रकट होती है। जब आत्मा सामान्य गुणों से युक्त होती है, वह क्षेत्रज्ञ कहलाती है; जब उन गुणों से मुक्त होती है, परमात्मा। वही सृष्टा ब्रह्म है, जो सब में बसता है, कमल पर जल-बिन्दु की भाँति शरीर में रहता है।

“‘सत्त्व, रज और तम जीव-कर्ता के गुण हैं। आत्मा में चेतना है और वह जीवन-गुणों सहित रहती है। आत्मा भिन्न-भिन्न रूपों में लिपटकर एक देह से दूसरी देह में जाती है, अदृश्य, अनलक्षित। जिसे मूढ़ “मृत्यु” कहते हैं, वह केवल देह का घुलना है; जीव-कर्ता का नाश नहीं। ज्ञानी अपनी सूक्ष्म बुद्धि से उस आत्मा को देखते हैं। मिताहारी, पाप-रहित, योग-निष्ठ मनुष्य हर रात, निद्रा से पूर्व और पश्चात, अपनी आत्मा से अपनी आत्मा को देख लेता है। सन्तुष्ट हृदय से, सब शुभ-अशुभ कर्म त्यागकर, अपनी आत्मा पर टिककर अनन्त सुख पाया जा सकता है।’”

समझने की कुंजी (क्षेत्रज्ञ और परमात्मा): क्षेत्रज्ञ = “क्षेत्र (शरीर) को जानने वाला”, यानी देह-मन के साथ जुड़ी, गुण-युक्त आत्मा (व्यष्टि चेतना)। परमात्मा = उन्हीं गुणों से मुक्त, शुद्ध सर्वव्यापी आत्मा (समष्टि चेतना)। भृगु का तर्क भौतिकवादी आपत्ति का उत्तर है: अग्नि के रूपक से वे दिखाते हैं कि अदृश्य हो जाना नाश नहीं है। आत्मा देह की साक्षी है, कर्ता या भोक्ता “मन” नहीं, और मृत्यु केवल देह-वस्त्र बदलना है, यह गीता के देहान्तर-प्राप्ति वाले तर्क की प्रतिध्वनि है।

सार: भरद्वाज की भौतिकवादी शंका, कि देह-नाश ही सब कुछ का अन्त है, का उत्तर भृगु अग्नि के रूपक से देते हैं: जीव नष्ट नहीं होता, सूक्ष्म होकर अदृश्य हो जाता और नई देह धारण करता है। अनुभोक्ता मन नहीं, साक्षी आत्मा है, जो गुण-युक्त हो तो क्षेत्रज्ञ, गुण-मुक्त हो तो परमात्मा कहलाती है।

वर्णों की उत्पत्ति: रंग से नहीं, कर्म और गुण से

भृगु बोले, “ब्रह्मा ने पहले कुछ ब्राह्मण रचे, जो प्रजापति कहलाए, सूर्य-अग्नि-से तेजस्वी, उस आदि-पुरुष की ऊर्जा से उपजे। फिर उन्होंने सत्य, धर्म, तप, सनातन वेद, सब पुण्य-कर्म और पवित्रता रची, ताकि प्राणी इन्हें साधकर स्वर्ग पाएँ। इसके बाद देव, दानव, गन्धर्व, दैत्य, असुर, यक्ष, राक्षस, सर्प, पिशाच, और चारों वर्णों, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, सहित मनुष्य रचे। ब्राह्मणों का वर्ण श्वेत, क्षत्रियों का रक्त, वैश्यों का पीत, और शूद्रों का कृष्ण हुआ।”

भरद्वाज ने आपत्ति की, “यदि चारों वर्णों का भेद केवल रंग (गुण) से है, तो सब वर्ण तो आपस में घुले-मिले जान पड़ते हैं। काम, क्रोध, भय, लोभ, शोक, चिन्ता, भूख और थकान सब मनुष्यों पर समान रूप से छाते हैं। सब के शरीर पसीना, मल-मूत्र, कफ, पित्त और रक्त निकालते हैं। फिर मनुष्य गुणों से कैसे बाँटे जाएँ?”

भृगु ने उत्तर दिया, “वस्तुतः वर्णों में कोई मूल भेद नहीं। आरम्भ में सारा संसार ब्राह्मण ही था। ब्रह्मा ने सबको समान रचा; मनुष्य अपने कर्मों से भिन्न वर्णों में बँटे। जो काम-भोग में रमे, कठोरता और क्रोध से युक्त, साहसी पर धर्म-कर्म से उदासीन हुए, ये रजोगुणी ब्राह्मण क्षत्रिय बने। जो अपने कर्तव्य की उपेक्षा कर सत्त्व और रज, दोनों गुणों से युक्त होकर गो-पालन और कृषि में लगे, वे वैश्य बने। जो असत्य और हिंसा में रमे, लोभी, आजीविका के लिए सब कर्म करने वाले, शुद्ध-आचरण से गिरकर तमोगुणी हुए, वे शूद्र बने। इस प्रकार अपने-अपने कर्मों से अलग होकर ब्राह्मण अपने वर्ण से च्युत होकर अन्य तीन वर्णों के सदस्य बने।

“इसलिए चारों वर्णों को सदा सब पुण्य-कर्म और यज्ञ करने का अधिकार है। ब्रह्मा ने आरम्भ में सबको समान ही रचा था। केवल लोभ से अनेक च्युत होकर अज्ञान में पड़े। जो हर रचित वस्तु को परम ब्रह्म जानने में असमर्थ हैं, वे (वास्तव में) ब्राह्मण नहीं; च्युत होकर वे भिन्न (हीन) कोटियों के सदस्य बन गए, और ज्ञान की ज्योति खोकर पिशाच, राक्षस, प्रेत और नाना म्लेच्छ-योनियों में जन्म लेते हैं।”

भरद्वाज ने पूछा, “किन कर्मों से मनुष्य ब्राह्मण होता है, किनसे क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र?” भृगु बोले, “वह ब्राह्मण है जो जात आदि संस्कारों से शुद्ध हो, शुद्ध-आचरण हो, वेदाध्ययन में लगा हो, छह नित्य-कर्मों (दोनों सन्ध्या-स्नान, मन्त्र-जप, हवन, देव-पूजन, अतिथि-सत्कार और विश्वेदेवों को अन्न-अर्पण) में निरत हो, गुरु-भक्त हो, और सत्य व व्रत में लगा हो। जिसमें सत्य, दान, अहिंसा, करुणा, लज्जा, उदारता और तप हो, वही ब्राह्मण है। जो युद्ध-कर्म करे, वेद पढ़े, दान दे और (प्रजा से) धन ले, वह क्षत्रिय है। जो गो-पालन, कृषि और धन-अर्जन में लगे, शुद्ध-आचरण हो और वेद पढ़े, वह वैश्य है। जो हर प्रकार का भोजन खाने में रुचि रखे, हर कर्म करे, अशुद्ध-आचरण हो, और वेद न पढ़े, वह शूद्र है।

“यदि ये लक्षण शूद्र में दिखें और ब्राह्मण में न दिखें, तो वह शूद्र, शूद्र नहीं, और वह ब्राह्मण, ब्राह्मण नहीं। लोभ और क्रोध को पूरे हृदय से रोकना चाहिए, यही ज्ञान का परम फल है। मनुष्य अपनी सम्पन्नता को क्रोध से, तप को अभिमान से, ज्ञान को मान-अपमान से, और आत्मा को भ्रम से बचाए। जो बुद्धिमान फल की इच्छा बिना कर्म करे, जिसका सारा धन दान के लिए हो, और जो नित्य हवन करे, वही सच्चा संन्यासी है। सब प्राणियों का मित्र बने, हिंसा से बचे, किसी का दिया दान ग्रहण न करते हुए अपनी बुद्धि से इन्द्रियों का स्वामी बने। ऐसा मनुष्य यहाँ निर्भय रहता और परलोक में निर्भय-धाम पाता है।”

एक उप-कथा: यह भृगु-संवाद का परम क्रान्तिकारी अंश है। पहले भृगु वर्णों को रंग (श्वेत-रक्त-पीत-कृष्ण) से बँटा बताते हैं, पर भरद्वाज की पैनी आपत्ति, “सबका रक्त, पसीना, भूख तो एक-से हैं” के बाद भृगु स्वयं पलटकर कहते हैं: “वस्तुतः वर्णों में कोई भेद नहीं; आरम्भ में सब ब्राह्मण ही थे।” यानी वर्ण जन्म से नहीं, कर्म और गुण से बनता है, यदि शूद्र-लक्षण ब्राह्मण में दिखें तो वह ब्राह्मण नहीं, और इसका उलटा भी सच है। महाभारत यहाँ अपने ही पूर्व-कथित कठोर वर्ण-विधान के भीतर एक गहरा प्रश्न-चिह्न रख देता है, और इस तनाव को छिपाता नहीं।

सार: भृगु पहले वर्णों को रंग से बँटा बताते हैं, पर भरद्वाज के तर्क पर मानते हैं कि मूल भेद नहीं, आरम्भ में सब ब्राह्मण थे, और कर्म-गुण से ही वर्ण बने। वर्ण की कसौटी आचरण है, जन्म नहीं; सच्चा ब्राह्मण वह है जिसमें सत्य, दान, अहिंसा, करुणा और तप हो।

सत्य और असत्य, सुख और दुख

भृगु ने आगे कहा कि सत्य ही ब्रह्म है, सत्य ही तप है, सत्य ही सब प्राणियों को रचता है। सत्य से ही सम्पूर्ण विश्व टिका है, और सत्य के सहारे ही मनुष्य स्वर्ग जाता है। असत्य अन्धकार का ही दूसरा रूप है, और अन्धकार नीचे की ओर ले जाता है। कहा गया है कि स्वर्ग प्रकाश है और नरक अन्धकार। इसी संसार में भी सत्य और असत्य विपरीत आचरण और विपरीत चिह्न उत्पन्न करते हैं, जैसे धर्म और अधर्म, प्रकाश और अन्धकार, सुख और दुख। जो सत्य है वही धर्म है, जो धर्म है वही प्रकाश है, और जो प्रकाश है वही सुख है। इसी प्रकार जो असत्य है वही अधर्म, जो अधर्म वही अन्धकार, और जो अन्धकार वही शोक।

भृगु ने एक चौंकाने वाला सिद्धान्त रखा कि सुख से बढ़कर कुछ नहीं है। सुख आत्मा का गुण है। धर्म और अर्थ दोनों उसी के लिए खोजे जाते हैं, और धर्म सुख की जड़ है। सब कर्मों का अन्तिम लक्ष्य सुख की प्राप्ति है।

भरद्वाज को यह बात पच नहीं रही थी। उन्होंने कहा कि वे इसे नहीं समझ पाते। ऋषिगण, जो किसी ऊँचे प्रतिफल के लिए लगे माने जाते हैं, इस सुख को नहीं खोजते। सुना जाता है कि तीनों लोकों के रचयिता ब्रह्मा अकेले, ब्रह्मचर्य-व्रत में रहते हैं, और कभी काम-तृप्ति से मिलने वाले सुख में नहीं लगते। उमापति शिव ने तो काम (इच्छा के देवता) को ही भस्म कर दिया। इसलिए सुख उच्च-आत्माओं को स्वीकार्य नहीं जान पड़ता।

भृगु ने स्पष्ट किया कि असत्य से अन्धकार उपजता है। जो अन्धकार से ढके हैं वे अधर्म ही करते हैं, क्रोध, लोभ, द्वेष और मिथ्या से अभिभूत होकर। उन्हें न यहाँ सुख मिलता है न परलोक में। वे रोग, बन्धन, भूख-प्यास, और शीत-ताप-वायु के कष्टों से पीड़ित रहते हैं, और धन-नाश तथा प्रियजन-वियोग के मानसिक शोक से जर्जर। जो इन सब से अछूते रहते हैं, वही जानते हैं कि सुख क्या है। स्वर्ग में ये कष्ट नहीं हैं, वहाँ न भूख है न प्यास, न जरा न पाप। इस संसार में सुख और दुख दोनों हैं, नरक में केवल दुख। इसलिए सुख ही प्राप्ति का परम लक्ष्य है। पृथ्वी सब प्राणियों की जननी है, और प्रत्येक प्राणी अपने ही कर्मों से प्रभावित होकर सुख या दुख पाता है।

समझने की कुंजी (अवधारणा): यहाँ “सुख” का अर्थ इन्द्रिय-भोग नहीं; यह वह आत्मिक स्वास्थ्य है जो धर्म और सत्य से उपजता है। भरद्वाज भोग-सुख समझ रहे थे, भृगु आत्मा के स्थायी कल्याण की बात कर रहे थे। यह वही द्वन्द्व है जो आगे “श्रेय बनाम प्रेय” के रूप में लौटता है।

भरद्वाज ने दान, धर्म, आचरण, तप, वेदाध्ययन और अग्नि-होम के फल पूछे। भृगु ने संक्षेप में बताया कि अग्नि में आहुति देने से पाप जलता है, वेदाध्ययन से शान्ति मिलती है, दान से भोग की वस्तुएँ, और तप से स्वर्ग। दान दो प्रकार का है, परलोक के लिए और इस लोक के लिए। जो सत्पात्र को दिया जाए वह परलोक में साथ जाता है, जो असत्पात्र को दिया जाए उसका फल यहीं भोगा जाता है।

सार: सत्य ही ब्रह्म, धर्म, प्रकाश और सुख है; असत्य अन्धकार, अधर्म और शोक। सच्चा सुख आत्मा का गुण है और धर्म उसकी जड़। दान, तप और वेदाध्ययन के अलग-अलग फल हैं, और दान का फल पात्र की योग्यता पर निर्भर करता है।

जीवन के चार आश्रम

भरद्वाज ने ब्रह्मा द्वारा बताए चार आश्रमों और उनके आचरण के विषय में पूछा। भृगु ने कहा कि प्राचीन काल में ब्रह्मा ने संसार के हित और धर्म की रक्षा के लिए चार आश्रम बताए। इनमें पहला, क्रम में, गुरु के घर में निवास है। जो इस आश्रम में हो उसे शुद्ध आचरण, वैदिक कर्म, संयम, व्रत और विनय से अपनी आत्मा को निर्मल करना चाहिए। उसे प्रातः-सायं की सन्ध्या, सूर्य, अपनी अग्नि और देवताओं की उपासना करनी चाहिए, आलस्य और टालमटोल छोड़ देनी चाहिए। वह ब्रह्मचर्य का पालन करे, गुरु की सेवा करे, भिक्षा के लिए जाए, और जो मिले वह बिना कुढ़े पूरा गुरु को अर्पित करे।

दूसरा आश्रम गृहस्थ है। जो गुरु के घर से निवास पूरा करके लौटते हैं, पवित्र आचरण वाले, और पत्नी के साथ धर्म के फल चाहने वाले होते हैं, उनके लिए यह आश्रम बना है। इसमें धर्म, अर्थ और काम तीनों पाए जा सकते हैं। भृगु ने कहा कि यह आश्रम सब आश्रमों की जड़ है, क्योंकि जो गुरु-गृह में हैं, जो भिक्षा-जीवी हैं, और जो व्रती हैं, उन सबका जीवन-आधार इसी से मिलता है। उन्होंने वह वचन उद्धृत किया कि यदि अतिथि अपनी अपेक्षाएँ अधूरी छोड़कर किसी के घर से लौट जाए, तो वह गृहस्थ का पुण्य ले जाता है और अपने पाप उसके पास छोड़ जाता है।

गृहस्थ-आश्रम में देवता यज्ञों से, पितर श्राद्ध-कर्म से, ऋषि वैदिक ज्ञान और शास्त्र-स्मरण से, और सृष्टिकर्ता सन्तान उत्पन्न करने से तृप्त होते हैं। भृगु ने जोड़ा कि इस आश्रम में सब प्राणियों से स्नेह और प्रिय वचन बोलने चाहिए। पीड़ा देना, अपमान करना, कठोर वचन कहना, सब निन्दनीय हैं। अहंकार और छल भी त्याज्य हैं। अहिंसा, सत्य और अक्रोध चारों आश्रमों में तप का फल देते हैं। इस आश्रम में पुष्प-माला, आभूषण, वस्त्र, सुगन्ध, नृत्य-संगीत, और भाँति-भाँति के भोजन-पान का भोग वर्जित नहीं है।

तीसरा आश्रम वन-जीवन है। जो वानप्रस्थ होते हैं उनके लिए धन-संग्रह नहीं है। ये सत्पुरुष सादा भोजन करते, वेदाध्ययन में रत, तीर्थों की यात्रा करते पृथ्वी पर विचरते हैं। चौथे आश्रम का विस्तृत वर्णन भृगु अगले प्रसंग में करते हैं।

समझने की कुंजी (चार आश्रम): ब्रह्मचर्य (गुरु-गृह में अध्ययन), गार्हस्थ्य (गृहस्थ), वानप्रस्थ (वन-निवास), और संन्यास (परिव्राजक का त्याग-जीवन)। भृगु गृहस्थ को सबकी जड़ कहते हैं क्योंकि शेष तीनों आश्रमों का भरण-पोषण उसी से आता है।

सार: चार आश्रम धर्म-रक्षा के लिए बने; गृहस्थ-आश्रम सबकी जड़ है क्योंकि शेष आश्रमों का पोषण उसी से होता है। अहिंसा, सत्य और अक्रोध चारों आश्रमों में समान रूप से तप का फल देते हैं।

वानप्रस्थ, परिव्राजक, और उत्तर की वह भूमि

भृगु ने वन-वासियों का आचरण विस्तार से बताया कि धर्म चाहने वाले वन-तपस्वी पवित्र जलों, नदियों और झरनों पर जाकर हिरन, भैंसे, सूअर, बाघ और जंगली हाथियों से भरे एकान्त वनों में तप करते हैं। वे समाज के स्वादिष्ट भोजन और भोग त्याग देते हैं, जंगली जड़ी, फल, मूल और पत्तों पर अल्प जीवन चलाते हैं। नंगी भूमि उनका आसन है; वे भूमि, चट्टान, बजरी, रेत या भस्म पर लेटते हैं। घास, मृगचर्म और वल्कल से अंग ढकते हैं, सिर-दाढ़ी कभी नहीं मुँडवाते, नाखून नहीं काटते। शीत-ताप, वर्षा-वायु को बिना किसी विचार के सहते हैं, इसलिए उनकी त्वचा फट जाती है और मांस-रक्त-अस्थि क्षीण हो जाते हैं। महान धैर्य और सहनशक्ति से वे सदा सत्त्व-गुण का अभ्यास करते जीते हैं।

फिर भृगु ने परिव्राजकों, अर्थात संन्यासियों की रीति बताई। ये अग्नि, धन, पत्नी, सन्तान, वस्त्र, आसन और शय्या से आसक्ति तोड़कर, स्नेह के बन्धन काटकर विचरते हैं, मिट्टी के ढेले और स्वर्ण को समान दृष्टि से देखते हुए। वे धर्म-अर्थ-काम तीनों पर मन नहीं लगाते, शत्रु-मित्र-तटस्थ को समान देखते हैं, मन-वचन-कर्म से किसी प्राणी की हिंसा नहीं करते। उनका कोई घर नहीं; वे पर्वतों, नदी-तटों, वृक्ष-छाया और देव-मन्दिरों में रहते हैं। नगर में पाँच रात से अधिक नहीं ठहरते, गाँव में एक रात से अधिक नहीं। वे काम, क्रोध, गर्व, लोभ, मोह, कृपणता, छल, निन्दा, अभिमान और हिंसा से मुक्त होते हैं।

भृगु ने एक सूक्ष्म रूपक दिया कि जो विद्वान बाहरी अग्नि जलाकर नहीं, अपने ही शरीर की अग्नि से अग्निहोत्र करता है, जो अपने मुख में और अपने भीतर की अग्नि में आहुति देता है, वह उस अग्नि के बल पर अनेक लोकों में सुख पाता है। जो परिव्राजक मुक्ति को लक्ष्य बनाकर, शुद्ध हृदय और संकल्प-मुक्त बुद्धि से इस आश्रम का पालन करता है, वह उस शान्त किरण की भाँति ब्रह्म तक पहुँचता है जो किसी जलते ईंधन से पुष्ट नहीं होती।

भरद्वाज ने एक उत्सुकता प्रकट की कि हमारे इस प्रदेश से परे एक प्रदेश है जिसे हमने सुना तो है पर देखा नहीं। भृगु ने कहा कि उत्तर की ओर, हिमवान के पार, एक पवित्र, धन्य और परम वांछनीय प्रदेश है जिसे “परलोक” कहते हैं। वहाँ के निवासी धर्मपरायण, पवित्र-हृदय, लोभ और भ्रम से मुक्त, और किसी कष्ट के अधीन नहीं हैं। वह प्रदेश स्वर्ग के समान है। वहाँ मृत्यु उचित समय पर आती है, रोग किसी को नहीं छूते, कोई पराई स्त्री की इच्छा नहीं करता, हर कोई अपनी पत्नी के प्रति समर्पित है। वहाँ कोई किसी को सताता या मारता नहीं, किसी की वस्तु का लोभ नहीं करता, कोई पाप नहीं होता, कोई संशय नहीं उठता।

इसके विपरीत हमारा यह प्रदेश कर्म-भूमि है। यहाँ कुछ धर्म में रत हैं, कुछ छल में; कुछ सुखी, कुछ दुखी; कुछ निर्धन, कुछ धनी। यहाँ परिश्रम, भय, भ्रम और भूख प्रकट होते हैं, और धन का लोभ विद्वानों को भी मोहित कर देता है। यहीं भले और बुरे कर्म करके मनुष्य भले कर्म का भला और बुरे का बुरा फल पाता है। उत्तर की भूमि अत्यन्त शुभ और पवित्र है; जो इस प्रदेश के लोग धर्म-कर्म करते या योग का आदर करते हैं, वे उस उत्तरी भूमि में जन्म लेते हैं। शेष मध्यम योनियों में जन्म लेते हैं, और कुछ अपनी अवधि बीतने पर पृथ्वी पर ही भटकते रह जाते हैं।

भीष्म ने कहा कि इस प्रकार भृगु ने भरद्वाज को सृष्टि का उद्गम विस्तार से सुनाया, और भरद्वाज विस्मित होकर उस महर्षि की पूजा करने लगे।

समझने की कुंजी (स्थान): हिमवान हिमालय का प्राचीन नाम है। “हिमवान के पार उत्तर का प्रदेश” यहाँ कोई भौगोलिक देश नहीं; यह एक पुण्य-लोक का प्रतीक है जहाँ पाप और शोक नहीं पहुँचते, स्वर्ग के समान। परिव्राजक का अर्थ है घूमता हुआ संन्यासी, जो किसी एक स्थान पर बँधकर नहीं रहता।

सार: वानप्रस्थ तप से, परिव्राजक त्याग से, और भीतरी अग्नि में आहुति देने वाला योगी ब्रह्म तक पहुँचता है। यह कर्म-भूमि भले-बुरे के मिश्रण की है; पुण्य और योग वाले उस निर्मल उत्तरी लोक में जन्म पाते हैं।

सदाचार के नियम

अब युधिष्ठिर ने पितामह से आचरण के नियम सुनने की इच्छा की। भीष्म ने कहा कि जो बुरे आचरण, बुरे कर्म, दुष्ट बुद्धि और अति-उतावलेपन वाले हैं, वे दुर्जन कहलाते हैं; और जो आचरण तथा रीति की पवित्रता से पहचाने जाते हैं, वे सज्जन हैं। उन्होंने नित्य-जीवन के अनेक सूक्ष्म नियम गिनाए, जो उस युग की दिनचर्या का दर्पण हैं।

भीष्म ने कहा कि बड़ी सड़कों पर, गोशालाओं में, या धान से भरे खेतों में मल-मूत्र नहीं त्यागना चाहिए। आवश्यक कर्म निपटाकर नदी-जल में स्नान और देवताओं को जल-अर्घ्य देना सब मनुष्यों का धर्म है। सूर्य की सदा उपासना करनी चाहिए, सूर्योदय के बाद नहीं सोना चाहिए, प्रातः-सायं की प्रार्थना पूर्व और पश्चिम मुख होकर करनी चाहिए। पाँच अंग धोकर पूर्वमुख होकर मौन भोजन करना चाहिए; भोजन की निन्दा कभी न करे, और भोजन के बाद हाथ धोकर उठे। रात्रि में गीले पैरों से नहीं सोना चाहिए। भीष्म ने कहा कि देवर्षि नारद ने इन्हें सदाचार के लक्षण बताया।

हर दिन किसी पवित्र स्थान, बैल, देव-प्रतिमा, गोशाला, चौराहे, पवित्र ब्राह्मण और पुण्य-वृक्ष की प्रदक्षिणा करनी चाहिए। भोजन में अतिथि, सेवक और बन्धु में भेद नहीं करना चाहिए; सेवकों के साथ समानता प्रशंसनीय है। प्रातः-सायं दो बार भोजन देवताओं का विधान है; बीच में फिर खाना विहित नहीं, और जो इस नियम से खाता है उसे उपवास का पुण्य मिलता है। भीष्म ने कहा कि ब्राह्मण के पात्र का बचा अन्न अमृत के समान, माता के स्तन-दूध के समान है; सत्पुरुष उसे खाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

भीष्म ने भोजन-शिष्टाचार का एक कोमल चित्र दिया कि जब किसी को भोजन परोसें तो पूछें, “पर्याप्त है?”; जल देते समय पूछें, “तृप्ति हुई?”; और मधु-दूध-चावल या जौ का मीठा माँड देते समय पूछें, “ठीक है?” मांस के विषय में संयम बताया कि जिसने किसी व्रत में मांस त्यागा हो वह यजुर्वेद के मन्त्रों से पवित्र किया मांस भी न खाए, और रीढ़ के पास का मांस तथा यज्ञ में न मारे पशु का मांस भी त्याग दे।

भीष्म ने नैतिक मर्म कहा कि सूर्य की ओर मुख करके मूत्र न त्यागे, अपना मल न देखे, स्त्री के साथ एक शय्या पर न लेटे, उसके साथ भोजन न करे। उन्होंने कहा कि गुरुजनों को सम्बोधित करते समय उनका नाम लेना या तुच्छ-सम्बोधन करना निन्दनीय है, यद्यपि समान या छोटों के लिए ऐसा करना दोष नहीं। पापियों के हृदय उनके पापों को प्रकट कर देते हैं; जो सत्पुरुषों से अपने जाने-बूझे पाप छिपाते हैं, उनका नाश होता है। एक पाप दूसरे पाप से छिपाया जाए तो नए पाप उपजते हैं, किन्तु एक पुण्य दूसरे पुण्य से ढका जाए तो पुण्य बढ़ता है। जैसे राहु अपने नियत समय पर चन्द्र के पास आता है, वैसे ही पाप मूर्ख मनुष्य के पास लौट आते हैं।

भीष्म ने अन्त में कहा कि बुद्धिमानों ने कहा है कि सब प्राणियों की धार्मिकता मन का गुण है; इसलिए मन में सबका हित सोचना चाहिए। धर्म का आचरण अकेले ही किया जा सकता है, उसमें किसी सहायक की आवश्यकता नहीं। धर्म ही मनुष्य का उद्गम है, धर्म ही देवताओं का अमृत है; मृत्यु के बाद मनुष्य धर्म से ही नित्य सुख भोगते हैं।

समझने की कुंजी (अवधारणा): राहु ग्रहण का कारक माना जाता है; जैसे राहु चन्द्र को निश्चित समय पर ग्रसता है, वैसे ही पाप अपने समय पर कर्ता के पास लौटता है, यह बार-बार आने वाला उपमान है। अर्घ्य अतिथि या देवता को आदर-स्वरूप दिया जाने वाला जल और सामग्री है।

सार: सदाचार छोटे-छोटे नित्य-नियमों से बनता है, स्नान-सन्ध्या से लेकर भोजन और वाणी तक। पाप छिपाने से बढ़ता है, पुण्य छिपाने से; और धर्म ही मनुष्य का मूल तथा परलोक का स्थायी सुख है।

अध्यात्म: सृष्टि, इन्द्रियाँ, बुद्धि और आत्मा

युधिष्ठिर ने पूछा कि वह क्या है जिसे “अध्यात्म” कहते हैं? यह चर और अचर वस्तुओं वाला विश्व किससे रचा गया, और प्रलय में किसमें लौट जाता है? भीष्म ने कहा कि यह विषय अत्यन्त सुखद और कल्याणकारी है। पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और तेज, ये पाँच “महाभूत” कहलाते हैं, और ये ही सब रची हुई वस्तुओं के उद्गम तथा प्रलय हैं। जिससे ये उत्पन्न होते हैं, उसी में लौटते हैं, समुद्र की लहरों की भाँति जो उसी में शान्त हो जाती हैं जिससे उठती हैं। जैसे कछुआ अपने अंगों को फैलाता और फिर समेट लेता है, वैसे ही परमात्मा सब वस्तुओं को रचता और फिर अपने में समेट लेता है।

भीष्म ने इन्द्रियों का सूक्ष्म नक्शा खींचा कि शब्द, श्रवण और सब छिद्र आकाश से; स्पर्श, क्रिया और त्वचा वायु के; रूप, नेत्र और पाचन अग्नि के; रस, द्रव और जिह्वा जल के; और गन्ध, नासिका तथा शरीर पृथ्वी के तीन-तीन गुण हैं। पाँच महाभूत, छठा मन, सातवीं बुद्धि, आठवीं आत्मा। इन्द्रियाँ बोध के लिए हैं, मन उनमें अनिश्चय उत्पन्न करता है, बुद्धि सबको निश्चय में बदलती है, और आत्मा साक्षी रूप में बिना कर्म किए स्थित रहती है।

भीष्म ने आत्मा और बुद्धि के सूक्ष्म भेद को उपमानों से खोला। जैसे मच्छर और गूलर का फल साथ दिखें फिर भी भिन्न रहें, या मछली और जल साथ रहकर भी भिन्न रहें, वैसे ही बुद्धि और आत्मा सदा संयुक्त दिखती हुई भी स्वभाव से भिन्न हैं। गुण आत्मा को नहीं जानते, पर आत्मा सब गुणों को जानती है, उनकी साक्षी रहती है। जैसे ढका दीपक आवरण के छिद्र से किरणें फेंककर वस्तुओं को प्रकट करता है, वैसे ही आत्मा इन्द्रियों, मन और बुद्धि के द्वारा वस्तुओं को जानती है, यद्यपि वे स्वयं जड़ और चेतना-रहित हैं।

भीष्म ने तीन गुणों के फल फिर गिनाए कि सत्त्व से सुख, रजस् से दुख, और तमस् से मोह उपजता है। आनन्द, सन्तोष, उल्लास, शान्ति, ये सत्त्व के लक्षण हैं। असन्तोष, हृदय-दाह, शोक, लोभ, प्रतिशोध, ये रजस् के। अपयश, मोह, भ्रम, निद्रा और जड़ता, ये तमस् के। जैसे जल-पक्षी जल के ऊपर चलता हुआ भी भीगता नहीं, वैसे ही ज्ञानी संसार में प्राणियों के बीच रहता हुआ भी निर्लिप्त रहता है। ऐसा मनुष्य गुणों को रचता है पर स्वयं उनसे प्रभावित नहीं होता, जैसे मकड़ी अपने धागे रचती है पर उनमें फँसती नहीं।

भीष्म ने एक सुन्दर रूपक दिया कि जो विशाल नदी पार करनी हो, उसे केवल दूसरा तट देखकर सुख नहीं मिलता; पर सत्य के ज्ञाता के लिए बात उलटी है, सत्य का मात्र ज्ञान ही उसे सुख दे देता है, और जैसे ही वह ज्ञान फल देने लगता है, मनुष्य मानो दूसरे तट पर पहुँच गया। जो आत्मा को सब सांसारिक वस्तुओं से मुक्त और एकमात्र जानते हैं, वे परम ज्ञान पाते हैं।

समझने की कुंजी (अध्यात्म-तत्त्व): अध्यात्म का अर्थ है आत्मा-सम्बन्धी विद्या, अर्थात शरीर-इन्द्रिय-मन-बुद्धि के भीतर बैठी आत्मा का ज्ञान। आठ तत्त्वों का क्रम याद रखने योग्य है: पाँच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश), फिर मन (इच्छा और सन्देह का स्थान), बुद्धि (निश्चय करने वाली), और आत्मा (केवल साक्षी, अकर्ता)। मकड़ी और जल-पक्षी के उपमान निर्लिप्तता समझाने के लिए हैं।

सार: पाँच महाभूत सृष्टि और प्रलय के मूल हैं; मन, बुद्धि और आत्मा क्रमशः सन्देह, निश्चय और साक्षित्व के स्तर हैं। आत्मा गुणों को जानती है पर गुण उसे नहीं; ज्ञानी जल-पक्षी की भाँति संसार में निर्लिप्त रहता है। सत्य का ज्ञान ही पार उतरना है।

ध्यान-योग की सीढ़ियाँ

भीष्म ने कहा कि अब वे ध्यान-योग के विषय में बताएँगे। महान ऋषि इसका ज्ञान पाकर इसी जीवन में नित्य सिद्धि पाते हैं। ये मुक्ति के अभिलाषी, योग के ज्ञाता, संसार के दोषों से मुक्त होकर पुनर्जन्म के लिए नहीं लौटते। वे शीत-उष्ण, सुख-दुख आदि द्वन्द्वों के प्रभाव से मुक्त, सदा अपने मूल स्वरूप में स्थित, बिना किसी से विवाद वाले एकान्त में, पूर्ण हृदय-शान्ति के अनुकूल स्थानों में रहते हैं।

भीष्म ने योगी की मुद्रा बतायी कि वह वाणी को रोककर, काठ के टुकड़े की भाँति बैठकर, सब इन्द्रियों को दबाकर, मन को ध्यान के सहारे परमात्मा से अविभाज्य रूप से जोड़ देता है। उसे कान से शब्द का, त्वचा से स्पर्श का, नेत्र से रूप का, जिह्वा से रस का, और नासिका से गन्ध का बोध नहीं रहता। बुद्धिमान योगी पाँच इन्द्रियों को मन में समेटे, और फिर भटकते मन को इन्द्रियों सहित बुद्धि में स्थिर करे।

भीष्म ने मन की चंचलता के दो उपमान दिए। ध्यान-पथ पर पहली बार लगा मन बादलों के बीच क्रीड़ा करती चपल बिजली-सा कौंधता है, और कमल-पत्ते पर पड़ी जल की बूँद-सा हर दिशा में लुढ़कता है। थोड़ी देर टिककर फिर वायु के पथ में भटककर वायु-सा चंचल हो जाता है। योगी इससे निरुत्साहित हुए बिना, परिश्रम की हानि की चिन्ता बिना, आलस्य और द्वेष छोड़कर फिर मन को ध्यान में लगाए।

भीष्म ने एक और दृष्टान्त दिया कि जैसे धूल, भस्म या जली गोबर का ढेर एक बार जल छिड़कने पर सूखा ही रहता है और पूरी तरह भीगने के लिए बार-बार छिड़कना पड़ता है, वैसे ही योगी को धीरे-धीरे, बार-बार अभ्यास से अपनी सब इन्द्रियों को क्रमशः विषयों से लौटाकर वश में लाना चाहिए। जिसने मन और इन्द्रियों को वश कर लिया, उसका सुख न परिश्रम से मिलता है, न भाग्य से। ऐसे ही योगी अत्यन्त धन्य निर्वाण को प्राप्त होते हैं।

समझने की कुंजी (योग-अवधारणा): यहाँ ध्यान का अर्थ है इन्द्रियों को विषयों से लौटाकर (प्रत्याहार), मन को एक बिन्दु पर एकाग्र करना (धारणा), और अन्ततः उसी में लीन हो जाना (समाधि)। निर्वाण यहाँ बुझ जाने का अर्थ नहीं रखता; इसका अर्थ है सब क्लेशों का शान्त हो जाना, ब्रह्म में विलय की परम शान्ति।

सार: योगी एकान्त में इन्द्रियों को रोककर मन को परमात्मा में स्थिर करता है। मन बिजली और कमल-पत्ते की बूँद-सा चंचल है, पर भस्म को बार-बार भिगोने जैसे धैर्यपूर्ण अभ्यास से वश में आता है, और तब निर्वाण की वह शान्ति मिलती है जो परिश्रम या भाग्य से अप्राप्य है।

जप करने वालों का मार्ग: सांख्य और योग

युधिष्ठिर ने कहा कि पितामह ने चारों आश्रम, राजधर्म, अनेक आख्यान और नीति सुनाई, पर एक सन्देह बाकी है। वे जानना चाहते थे कि मन्त्रों का मौन जप करने वालों को क्या फल मिलता है, उनकी मृत्यु के बाद कौन-सी गति होती है। क्या ऐसा “जप करने वाला” सांख्य के नियमों का पालक माना जाए, या योग के, या कर्म के, या मानसिक यज्ञ के?

भीष्म ने कहा कि इस प्रसंग में यम, काल और एक ब्राह्मण का प्राचीन इतिहास उद्धृत किया जाता है। मुक्ति के साधन जानने वाले ऋषियों ने दो मार्ग बताए हैं, सांख्य और योग। इनमें सांख्य, जिसे वेदान्त भी कहते हैं, में जप के सम्बन्ध में त्याग (संन्यास) का उपदेश है, और वेद-वचन कर्मों से निवृत्ति, शान्ति और ब्रह्म से सम्बन्धित हैं। दोनों मार्गों में, जप की भाँति, इन्द्रिय-संयम और मन को बाहरी विषयों से लौटाकर स्थिर करना आवश्यक है; साथ ही सत्य, अग्नि-रक्षण, एकान्त-निवास, ध्यान, तप, आत्म-संयम, क्षमा, परोपकार, अल्पाहार, और अनासक्ति।

भीष्म ने जप-व्रत का विस्तार दिया कि जो ब्रह्मचर्य-व्रती जप करने वाला निवृत्ति के मार्ग पर चलता है, वह कुश-घास पर बैठकर, हाथ में कुश लेकर, शिखा को कुश से बाँधकर, कुश से घिरकर और कुश को ही वस्त्र बनाकर बैठे। सब सांसारिक चिन्ताओं को प्रणाम करके उन्हें विदा कर दे, फिर मन के सहारे समता पाकर मन को मन में ही स्थिर कर ले। परम कल्याणकारी गायत्री का जप करते हुए वह बुद्धि से केवल ब्रह्म का ध्यान करे, और फिर उसे भी छोड़कर एकाग्र समाधि में लीन हो जाए। गायत्री के बल पर यह समाधि स्वयं आ जाती है। ऐसा साधक न अपने को कर्ता मानता है, न भोक्ता; अन्त में प्राण-वायुओं को त्यागकर ब्रह्म-शरीर में प्रवेश करता है, या सीधे ब्रह्म-लोक में जाकर फिर जन्म नहीं लेता।

युधिष्ठिर ने प्रश्न किया कि क्या यही जप करने वालों की एकमात्र गति है, या कोई और भी है। भीष्म ने एक कठोर सत्य खोला कि नहीं, अनेक जप करने वाले नरक में भी गिरते हैं। जो आरम्भ में विधि के अनुसार आचरण नहीं करता, जो विधान पूरा नहीं कर पाता, जो श्रद्धाहीन है, अपने कर्म से असन्तुष्ट है, उसमें आनन्द नहीं लेता, अथवा हृदय में अभिमान लिए विधि का पालन करता है, या दूसरों का अपमान करता है, वह नरक जाता है। जो मोह या फल की इच्छा से जप करता है, उसे वही मिलता है जिस पर मन लगा था, पर मुक्ति नहीं।

युधिष्ठिर ने पूछा कि जब जप करने वाला उस परम तत्त्व का स्पर्श कर लेता है जो अपने ही स्वरूप में है, जो अवर्णनीय और अचिन्त्य है, और जो “ॐ” अक्षर में वास करता है, तब वे फिर देह धारण करके जन्म क्यों लेते हैं? भीष्म ने कहा कि सच्चे ज्ञान और प्रज्ञा के अभाव में जप करने वाले भाँति-भाँति के नरक पाते हैं; जप का विधान निश्चय ही श्रेष्ठ है, पर ये उसके दोष हैं।

युधिष्ठिर ने जप करने वाले को मिलने वाले “नरक” का स्वरूप पूछा। भीष्म का उत्तर अत्यन्त सूक्ष्म और तेजस्वी था। उन्होंने कहा कि उच्च-आत्मा देवताओं के जो लोक हैं, भाँति-भाँति के रंग और रूप वाले, स्वर्ण-कमलों से सजे उद्यान, चार लोकपालों, शुक्र, बृहस्पति, मरुतों, विश्वेदेवों, साध्यों, अश्विनों, रुद्रों, आदित्यों और वसुओं के निवास, ये सब, परमात्मा के लोक की तुलना में, नरक कहलाते हैं। वह परम लोक भय-रहित, अकृत (अपने स्वभाव में स्थित), किसी पीड़ा या प्रिय-अप्रिय के द्वन्द्व से रहित, तीन गुणों से परे, सुख-दुख और रोग से मुक्त है। वहाँ काल अपने भूत-वर्तमान-भविष्य रूपों में केवल प्रयोग के लिए उठता है, पर वहाँ काल शासक नहीं; वह परम प्रदेश काल और स्वर्ग दोनों का शासक है। जो जप करने वाला अपनी आत्मा में सब समेटकर वहाँ पहुँच जाता है, उसे फिर कोई शोक नहीं छूता।

समझने की कुंजी (सांख्य और योग): सांख्य ज्ञान-प्रधान मार्ग है, जिसमें प्रकृति और पुरुष के भेद को जानकर मुक्ति मिलती है; यहाँ इसे वेदान्त और निवृत्ति (कर्मों से हटना) से जोड़ा गया है। योग क्रिया और साधना-प्रधान मार्ग है। जप का अर्थ है मन्त्र की मौन आवृत्ति, विशेषकर गायत्री मन्त्र की। ध्यान देने योग्य बात यह है कि देवलोकों को भी “नरक” कहा गया, अर्थात परम मोक्ष की तुलना में स्वर्ग भी अधूरा और परिवर्तनशील है।

सार: मुक्ति के दो मार्ग हैं, सांख्य (ज्ञान-निवृत्ति) और योग (साधना)। गायत्री-जप करने वाला, अकर्ता-अभोक्ता भाव से, ब्रह्म में लीन होता है; पर श्रद्धाहीन, अभिमानी या फलेच्छु जप करने वाला नरक पाता है। परम लोक की तुलना में सब देवलोक भी नरक-तुल्य हैं, क्योंकि वे काल के अधीन हैं।

इक्ष्वाकु और जप करने वाले ब्राह्मण का आख्यान

पेड़ के नीचे जप में लीन शान्त ब्राह्मण के सामने श्रद्धा से खड़े राजा इक्ष्वाकु; उपवन के किनारे काल, मृत्यु और यम की छाया-सी आकृतियाँ भाग्य पर विवाद करती हुई

युधिष्ठिर ने उस विवाद को विस्तार से सुनाने को कहा जो काल, मृत्यु, यम, इक्ष्वाकु और एक ब्राह्मण के बीच हुआ था। भीष्म ने आख्यान आरम्भ किया। एक बहुत प्रसिद्ध और पवित्र आचरण वाला ब्राह्मण था, जो जप करने वाला था, छह वेदांगों का ज्ञाता, कुशिक-वंशी और पिप्पलाद का पुत्र। हिमवान की तलहटी में रहकर वह गायत्री का मौन जप करते हुए घोर तप करता रहा। उसके सिर पर एक हजार वर्ष बीत गए। तब गायत्री-सावित्री देवी ने प्रकट होकर कहा, “हम आप पर प्रसन्न हैं।” पर वह ब्राह्मण जप में लीन रहा, देवी से एक शब्द भी न बोला। देवी को उस पर करुणा और प्रसन्नता हुई।

जप समाप्त करके वह ब्राह्मण उठा और देवी के चरणों में सिर झुकाया। उसने कहा कि सौभाग्य से देवी प्रसन्न हुईं और दर्शन दिए; यदि सचमुच प्रसन्न हैं तो वर यह माँगता है कि उसका हृदय जप में सदा आनन्द ले। सावित्री ने कहा, “जो चाहें माँगिए, सब वैसा ही होगा।” ब्राह्मण ने कहा कि उसकी जप की इच्छा प्रति क्षण बढ़ती रहे, और उसके मन का समाधि में लीन होना और पूर्ण हो। देवी ने मधुर वचन कहे, “ऐसा ही हो।” और जाते-जाते वर दिया कि आप उस नरक में नहीं जाएँगे जहाँ बड़े-बड़े ब्राह्मण जाते हैं; आप उस ब्रह्म-लोक में जाएँगे जो अकृत और निर्दोष है। साथ ही उन्होंने एक भविष्यवाणी कर दी कि साक्षात धर्म आपके पास आएँगे, और काल, मृत्यु तथा यम भी; आपके और उनके बीच धर्म के एक प्रश्न पर विवाद होगा।

देवी अपने धाम लौट गईं। ब्राह्मण एक हजार दिव्य वर्षों तक जप में लगा रहा, क्रोध को रोके, सत्य में दृढ़, द्वेष से मुक्त। जब उसका व्रत पूरा हुआ, तब धर्म प्रसन्न होकर साक्षात प्रकट हुए और बोले कि वे धर्म हैं, उसे देखने आए हैं; उसने अपने जप का फल जीत लिया है, और वह देवताओं के सब लोकों से ऊपर चढ़ सकता है; अब वह अपने प्राण त्यागकर जहाँ चाहे जाए।

यहाँ कथा एक अप्रत्याशित मोड़ लेती है। ब्राह्मण ने कहा कि उन लोकों से उसे क्या काम? धर्म जहाँ चाहें जाएँ, पर वह इस शरीर को नहीं त्यागेगा, जो सुख-दुख दोनों का स्थान है। धर्म ने बार-बार कहा कि शरीर तो त्यागना ही होगा, स्वर्ग चढ़िए। ब्राह्मण बार-बार अड़ा रहा कि वह अपने इस शरीर के बिना स्वर्ग में रहना नहीं चाहता; उसे जप में जो आनन्द है, वही पर्याप्त है। जब धर्म कुछ न मना सके, तब उन्होंने कहा कि देखिए, यम, काल और मृत्यु आ रहे हैं।

विवस्वान-पुत्र यम, काल और मृत्यु, तीनों उस ब्राह्मण के पास आए। यम ने कहा कि उसके सुसम्पन्न तप और पवित्र आचरण का उच्च फल उसकी प्रतीक्षा कर रहा है। काल ने कहा कि वह जप के अनुरूप उच्च फल जीत चुका है, और अब स्वर्ग चढ़ने का समय है; मैं काल हूँ और आपके पास आया हूँ। मृत्यु ने कहा कि मुझे मृत्यु जानिए, अपने यथार्थ रूप में; काल की प्रेरणा से आपको ले जाने आई हूँ।

ब्राह्मण ने अद्भुत शान्ति से कहा कि सूर्य-पुत्र यम, उच्च-आत्मा काल, मृत्यु और धर्म, सबका स्वागत है; वह उनके लिए क्या करे? उसने उन्हें पाद्य-जल और अर्घ्य देकर सत्कार किया। ठीक उसी समय राजा इक्ष्वाकु, जो तीर्थ-यात्रा पर निकले थे, उस स्थान पर आ पहुँचे जहाँ ये सब देवता एकत्र थे। राजर्षि इक्ष्वाकु ने सबको सिर झुकाकर प्रणाम किया और कुशल पूछी। ब्राह्मण ने राजा को आसन, पाद्य-जल और अर्घ्य देकर कहा कि आपका स्वागत है, महाराज; अपनी सब इच्छाएँ कहिए, मैं अपने तप-बल से आपके लिए क्या करूँ?

यहाँ से वह सूक्ष्म वाक्-युद्ध आरम्भ होता है जो इस आख्यान का केन्द्र है। राजा ने कहा कि वह राजा है और ब्राह्मण छह कर्मों का पालक; वह कुछ धन दे सकता है, बताइए कितना दूँ। ब्राह्मण ने कहा कि ब्राह्मण दो प्रकार के हैं और धर्म भी दो प्रकार का, कर्म में प्रवृत्ति और कर्म से निवृत्ति; उसने तो दान-स्वीकार से विरति ले रखी है, अतः वह कुछ नहीं लेगा। उलटे वह राजा से पूछता है कि आपका हित किसमें है, मैं अपने तप से क्या दूँ?

राजा ने कहा कि वह क्षत्रिय है और “दीजिए” शब्द कहना नहीं जानता; क्षत्रिय तो केवल “युद्ध दीजिए” कह सकता है। ब्राह्मण ने मुस्कुराते हुए कहा कि जैसे आप अपने धर्म से सन्तुष्ट हैं, वैसे ही मैं अपने से; हम-आप में थोड़ा ही अन्तर है, जैसा चाहें कीजिए। राजा ने तब वह पकड़ा जो ब्राह्मण ने स्वयं कहा था, “मैं अपने सामर्थ्य से जो दूँ, माँगिए।” अतः राजा ने माँगा कि मुझे आप अपने जप का फल दीजिए।

ब्राह्मण ने तुरन्त उलट दिया कि आप तो कहते थे कि आपकी वाणी केवल युद्ध माँगती है; तो आप मुझसे युद्ध क्यों नहीं माँगते? राजा ने कहा कि ब्राह्मण वाणी के वज्र से सज्जित हैं और क्षत्रिय भुजबल से; इसलिए हमारे-आपके बीच यह वाक्-युद्ध छिड़ गया है। ब्राह्मण ने कहा कि आज यही उसका भी संकल्प है; तो बताइए, मैं अपने सामर्थ्य से आपको क्या दूँ, विलम्ब न कीजिए। राजा ने फिर वही माँगा कि एक हजार वर्ष के जप का फल मुझे दीजिए।

ब्राह्मण ने कहा कि लीजिए, मेरे जप का परम फल; आधा बिना संकोच ले लीजिए, या चाहें तो पूरा फल ले लीजिए। राजा का उत्तर इस आख्यान का मर्म खोलता है। उसने कहा कि अब उसे उस फल की आवश्यकता नहीं रही जिसे उसने माँगा था; वह जा रहा है, पर बताइए कि वह फल है क्या। ब्राह्मण ने कहा कि उसे फल का ज्ञान ही नहीं; उसने तो जप कभी किसी फल की इच्छा से किया ही नहीं, फिर फल का ज्ञान कैसे हो? पर जो भी फल उसने अर्जित किया है, वह राजा को दे दिया है, और धर्म, काल, यम तथा मृत्यु इस दान के साक्षी हैं।

अब दोनों एक धर्म-संकट में फँस गए। राजा कहता है कि अज्ञात फल लेकर वह क्या करेगा; यदि ब्राह्मण फल नहीं बताते तो वह फल उन्हीं का रहे, उसे नहीं चाहिए। ब्राह्मण कहता है कि अब वह कोई और वचन स्वीकार नहीं करेगा; उसने फल दे दिया, अब राजा और ब्राह्मण दोनों के वचन सत्य रहें। और फिर ब्राह्मण सत्य की एक लम्बी, तेजस्वी महिमा गाता है। उसने कहा कि जो असत्य में रत है उसके न यह लोक है न अगला; वह अपने पितरों को नहीं तार सकता, सन्तान का भला कैसे करेगा? यज्ञ, दान, उपवास और व्रत भी मनुष्य को पाप और नरक से उतना नहीं बचाते जितना सत्य।

ब्राह्मण ने कहा कि सत्य ही एक अविनाशी ब्रह्म है, सत्य ही अविनाशी तप, सत्य ही अविनाशी यज्ञ, सत्य ही अविनाशी वेद। सत्य से ही धर्म और आत्म-संयम उपजते हैं। सत्य से ही वायु बहती है, सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से अग्नि जलती है, सत्य पर ही स्वर्ग टिका है। एक बार सत्य और सब धार्मिक कर्मों को तराजू के दो पलड़ों पर रखा गया, तो जिस पलड़े में सत्य था वही भारी निकला। उसने राजा से कहा कि आप असत्य से क्यों कलंकित होना चाहते हैं; आपने “दीजिए” कहा, उसे झूठा मत कीजिए। जो वचन देकर नहीं देता और जो माँगकर नहीं लेता, दोनों असत्य से कलंकित होते हैं।

राजा फिर भी अड़ा कि क्षत्रिय का धर्म युद्ध और रक्षा है, दान देना है, लेना नहीं; तो वह ब्राह्मण से कैसे ले? ब्राह्मण ने कहा कि उसने राजा को कभी विवश नहीं किया, न उसके घर गया; राजा स्वयं आकर माँगने लगा, तो अब क्यों नहीं लेता? इसी संकट में धर्म ने प्रकट होकर कहा कि दोनों जानें कि मैं स्वयं धर्म हूँ; आप दोनों में विवाद न हो; ब्राह्मण को दान का फल मिले और राजा को सत्य का। स्वर्ग ने भी अपने मूर्त रूप में आकर कहा कि यह विवाद बन्द हो; आप दोनों पुण्य में समान हैं। पर राजा ने कहा कि उसे स्वर्ग से कोई काम नहीं; स्वर्ग जहाँ से आया वहीं लौट जाए।

एक उप-कथा: इसी विवाद के बीच दो अत्यन्त कुरूप, फटे वस्त्रों वाले पुरुष आए, एक-दूसरे के कन्धे पर हाथ रखे, परस्पर झगड़ते हुए, “आप पर मेरा कुछ बकाया नहीं; उलटे मैं आपका ऋणी हूँ।” वे राजा के पास आए। एक का नाम विरूप, दूसरे का विकृत। विरूप ने कहा कि वह विकृत को एक गाय के दान का पुण्य लौटाना चाहता है, क्योंकि पहले विकृत ने उसे शुद्ध-हृदय से एक गाय-दान का फल दिया था; उससे उसने दो कपिला गाएँ खरीदकर एक दरिद्र ब्राह्मण को दान कीं, और अब वह विकृत को दुगुना फल लौटाना चाहता है। पर विकृत कहता है कि जो उसने दे दिया वह दे दिया, अब वह कुछ वापस नहीं लेगा। राजा ने विकृत को दण्ड-योग्य कहा कि देने को तैयार से जो नहीं लेता, वह अनुचित करता है। पर अन्त में जब राजा ने दोनों को उनके-उनके लक्ष्य पर भेज दिया, तब विरूप ने रहस्य खोला कि वे दोनों वस्तुतः काम और क्रोध हैं; उन्होंने ही राजा को इस आचरण की ओर प्रेरित किया था; और काल, धर्म, मृत्यु तथा इन दोनों ने मिलकर इस घर्षण के द्वारा राजा की परीक्षा ली थी। यह उप-कथा “देने और लेने” के उसी धर्म-संकट का दर्पण थी जिसमें राजा और ब्राह्मण फँसे थे।

उस उप-कथा को सुनकर राजा का संकट सुलझ गया। उसने सोचा कि यदि वह ब्राह्मण का दिया हुआ नहीं लेता तो महान पाप से कैसे बचेगा। उसने कहा कि क्षत्रिय-धर्म पर धिक्कार, जिसका सिद्धान्त ऐसा संकट लाता है; पर वह केवल इसलिए लेगा कि देने और लेने के दोनों धर्म समान हो जाएँ। उसने वह हाथ, जो कभी दान-स्वीकार के लिए नहीं फैला था, अब फैलाया। ब्राह्मण ने कहा कि यदि उसने गायत्री-जप से कोई फल जीता है, तो वह सब राजा स्वीकार करे। राजा ने भी अपने हाथ पर जल की बूँदें गिराकर अपना अर्जित फल ब्राह्मण को दिया, ताकि दोनों के बीच समता हो।

भीष्म ने कहा कि इस प्रकार उन्होंने युधिष्ठिर को बताया कि जप करने वाले को क्या फल और क्या गति मिलती है। गायत्री का जप करने वाला परम ब्रह्मा के पास जाता है, या अग्नि अथवा सूर्य के लोक में प्रवेश करता है। यदि वह वहाँ आसक्ति के साथ रहता है तो उन लोकों के गुण ग्रहण कर लेता है; पर यदि आसक्ति-रहित होकर, उस भोग के प्रति भी अविश्वास रखकर, केवल उस परम और अविनाशी तत्त्व को चाहता है, तो वह उसी में प्रवेश करता है, अमृत के भी अमृत में, इच्छा-रहित और पृथक-चेतना से मुक्त अवस्था में। वह ब्रह्म-स्वरूप हो जाता है, द्वन्द्वों से मुक्त, सुखी, शान्त और पीड़ा-रहित।

युधिष्ठिर ने आगे का अन्त पूछा। भीष्म ने कहा कि ब्राह्मण ने धर्म, यम, काल, मृत्यु और स्वर्ग, सबकी पूजा की, और राजा से कहा कि मेरे जप का फल पाकर आप उच्च पद पर आरूढ़ हों; आपकी अनुमति से मैं फिर जप आरम्भ करूँ, क्योंकि सावित्री देवी ने वर दिया था कि मेरी जप-निष्ठा सतत बनी रहे। राजा ने कहा कि यदि ब्राह्मण का जप-फल उसे देकर निष्फल हो गया हो और वह फिर जप करना चाहता हो, तो दोनों आधा-आधा करके चलें। ब्राह्मण ने कहा कि चलिए हम दोनों अपने फलों में समान हो जाएँ और उसी अन्तिम गति को प्राप्त करें जो हमारी है।

उनके इस संकल्प को जानकर देवराज इन्द्र, देवताओं और लोकपालों सहित वहाँ आए। साध्य, विश्वेदेव, मन्त्र, नदियाँ, पर्वत, समुद्र, तीर्थ, तप, योग के विधान, वेद, सामगान, सरस्वती, नारद, पर्वत, विश्वावसु, हाहा-हूहू, गन्धर्व चित्रसेन अपने परिवार सहित, नाग, मुनि, प्रजापति, और अचिन्त्य सहस्र-शीर्ष विष्णु स्वयं वहाँ आए। आकाश में दुन्दुभियाँ और तुरही बजीं, दिव्य पुष्पों की वर्षा हुई, अप्सराएँ चारों ओर नाचने लगीं। स्वर्ग ने मूर्त रूप में आकर ब्राह्मण से कहा कि आपने सिद्धि पा ली, आप धन्य हैं; और राजा से कहा कि आपने भी सिद्धि पाई।

तब उन दोनों ने, एक-दूसरे का भला करके, इन्द्रियों को विषयों से समेट लिया। उन्होंने प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान, इन पाँच वायुओं को हृदय में स्थिर किया, मन को प्राण और अपान में एकाग्र किया, फिर दोनों वायुओं को उदर में रखकर दृष्टि नासिका के अग्र भाग पर, और फिर भौंहों के बीच टिकाई। बहुत धीरे-धीरे वायु को भौंहों के मध्य के बिन्दु पर लाकर, शरीर को पूर्णतः निश्चल कर, स्थिर दृष्टि से लीन हो गए। आत्मा को वश में करके उन्होंने उसे मस्तिष्क में स्थापित किया। तब ब्राह्मण के मस्तक का शिखर भेदकर महान तेज की एक ज्वाला स्वर्ग की ओर उठी। सब प्राणियों के शोक-स्वर चारों ओर सुनाई दिए, और स्तुति-गान के बीच वह तेज ब्रह्मा में प्रवेश कर गया।

महान पितामह ब्रह्मा ने आगे बढ़कर उस तेज का, जो एक बित्ता ऊँचा रूप धारण किए था, स्वागत किया और कहा, “पधारिए।” फिर उन्होंने कहा कि सचमुच जप करने वाले योगियों के समान ही गति पाते हैं। योगी की गति तो इन सब (एकत्र देवताओं) के सम्मुख प्रत्यक्ष दिखाई पड़ती है; जप करने वालों के लिए इतना विशेष है कि उनके लिए स्वयं ब्रह्मा आगे बढ़कर उन्हें ग्रहण करते हैं। “मुझमें वास कीजिए,” यह कहकर ब्रह्मा ने उस तेज में फिर चेतना भरी, और ब्राह्मण सब चिन्ताओं से मुक्त होकर सृष्टिकर्ता के मुख में प्रवेश कर गया। राजा इक्ष्वाकु भी उसी प्रकार ब्रह्मा में प्रवेश कर गए।

एकत्र देवताओं ने स्वयम्भू ब्रह्मा को प्रणाम करके कहा कि जप करने वालों के लिए सचमुच बहुत श्रेष्ठ गति निश्चित है; आपने इन दोनों को समान कर दिया, समान सम्मान दिया, और समान गति। योगियों और जप करने वालों के लिए जो परम गति है, वह आज हमने देखी; ये दोनों सब लोकों को लाँघकर जहाँ चाहें जा सकते हैं। ब्रह्मा ने कहा कि जो महान स्मृति (वेद) और मनु आदि की शुभ स्मृतियाँ पढ़ेगा, और जो योग में लगा रहेगा, वह भी इसी प्रकार मृत्यु के पश्चात मेरे लोक पाएगा। यह कहकर वह देवश्रेष्ठ वहीं अन्तर्धान हो गए, और सब देवता धर्म का सम्मान करके प्रसन्न-हृदय अपने-अपने धाम लौट गए।

समझने की कुंजी (वंश और पात्र): इक्ष्वाकु सूर्यवंश के आदि-राजा हैं, राम के पूर्वज; यहाँ वे राजर्षि रूप में आते हैं। सावित्री-गायत्री वेद-माता मानी जाती हैं, गायत्री-मन्त्र की अधिष्ठात्री देवी। विरूप और विकृत वास्तव में काम और क्रोध के छद्म-रूप थे, जो राजा की परीक्षा के लिए लाए गए। पाँच वायुएँ, प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, शरीर की प्राण-शक्ति के पाँच विभाग हैं; इन्हें क्रमशः हृदय, नासिका-अग्र और भ्रू-मध्य में स्थिर करना योगियों की देह-त्याग की विधि है।

सार: ब्राह्मण ने फलेच्छा बिना जप किया, इसलिए फल का ज्ञान भी न रखा; राजा ने सत्य-निष्ठा से उसका दान स्वीकार किया। काम और क्रोध ने छद्म-वेश में दोनों की परीक्षा ली। अन्ततः दोनों समान गति पाकर ब्रह्मा में लीन हुए, और सिद्ध हुआ कि निष्काम जप योग के समान ही परम गति देता है।

मनु और बृहस्पति: ज्ञान और कर्म का विवाद

युधिष्ठिर ने ज्ञान-योग, वेदों और व्रतों के फल पूछे, और यह कि जीव-आत्मा को कैसे जाना जाए। भीष्म ने प्रजापति मनु और महर्षि बृहस्पति के संवाद का प्राचीन आख्यान सुनाया। बृहस्पति, जो मनु के शिष्य थे, ने गुरु को प्रणाम करके पूछा कि विश्व का कारण क्या है, यज्ञादि के विधान कहाँ से प्रवाहित हुए, ज्ञान के फल क्या कहे जाते हैं, और वह क्या है जिसे वेद भी प्रकट नहीं कर पाए। उन्होंने कहा कि उन्होंने ऋक्, साम, यजु, छन्द, ज्योतिष, निरुक्त, व्याकरण, संकल्प और शिक्षा सब पढ़े, पर उन पाँच महाभूतों के स्वरूप का ज्ञान नहीं जो हर वस्तु की रचना में प्रवेश करते हैं।

मनु का उत्तर श्रेय और प्रेय के भेद को खोलता है। उन्होंने कहा कि जो प्रिय हो वह सुख कहलाता है, जो अप्रिय वह दुख। “इससे सुख पाऊँ और दुख टालूँ”, इस भाव से सब धार्मिक कर्म प्रवाहित होते हैं। किन्तु ज्ञान-प्राप्ति का प्रयत्न सुख और दुख दोनों से बचने के भाव से उपजता है। वेदों में यज्ञादि के जो विधान हैं वे सब इच्छा से जुड़े हैं; पर जो इच्छा से मुक्त हो जाता है, वही ब्रह्म पाता है। जो सुख की इच्छा से भाँति-भाँति के कर्म-पथ पर चलता है, उसे नरक जाना पड़ता है।

बृहस्पति ने कहा कि मनुष्य की आकांक्षाएँ प्रिय (जिसका अन्त सुख) पाने और अप्रिय (जो दुख लाता) टालने में लगी रहती हैं, और यह पाना-टालना कर्मों से ही होता है। मनु ने उत्तर दिया कि कर्मों से मुक्त होकर ही मनुष्य ब्रह्म में प्रवेश करता है। कर्म के विधान उन्हीं को लुभाते हैं जिनके हृदय इच्छा से मुक्त नहीं। बाहरी कर्म क्षणभंगुर फल देते हैं; और जो शाश्वत फल है, उसके लिए मन से फल का त्याग ही एकमात्र साधन है।

मनु ने ज्ञान की श्रेष्ठता एक सुन्दर उपमा से समझाई। उन्होंने कहा कि जैसे रात बीतने और अन्धकार का आवरण हटने पर नेत्र अपने स्वामी को मार्ग दिखाता है, वैसे ही बुद्धि जब ज्ञान से युक्त होती है तो टालने योग्य सब बुराइयों को देख लेती है। साँप, नुकीली कुश की नोक, और गड्ढे, मनुष्य देख लेने पर टाल देता है; जो उन पर पैर रखता या गिरता है, वह अज्ञान से करता है। यही ज्ञान के फलों की अज्ञान के फलों पर श्रेष्ठता है।

मनु ने उस परम तत्त्व का संकेत दिया कि वह रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श और रूप से मुक्त है, इन्द्रियों से अग्राह्य, अव्यक्त, वर्ण-रहित, एक है। उसने अपने प्राणियों के लिए पाँच प्रकार के विषय रचे। वह न स्त्री है, न पुरुष, न नपुंसक; न सत्, न असत्, न सत्-असत्। केवल वे ही उसे देखते हैं जो ब्रह्म को जानते हैं।

समझने की कुंजी (श्रेय और प्रेय): यहाँ मूल विवाद यह है कि कर्म सुख-दुख के चक्र में बाँधते हैं, जबकि ज्ञान उस चक्र से बाहर निकालता है। बृहस्पति कर्म-पक्ष रखते हैं, मनु ज्ञान-पक्ष। मनु कहते हैं कि निष्काम कर्म आत्मा को शुद्ध करके अन्ततः ज्ञान-मार्ग का द्वार खोलता है।

आत्मा का स्वरूप: चन्द्रमा और राहु का दृष्टान्त

जिज्ञासुओं को उपदेश देते मनु आकाश की ओर संकेत करते हैं, जहाँ काला सर्प-असुर राहु चमकते पूर्ण चन्द्रमा को निगल रहा है: ग्रहण में ढका पर अछूता चन्द्रमा आत्मा का प्रतिबिम्ब है

मनु ने सृष्टि का क्रम बताया कि उस शाश्वत और अविनाशी एक से पहले आकाश उपजा, आकाश से वायु, वायु से तेज, तेज से जल, जल से विश्व, और विश्व से उसमें होने वाली सब वस्तुएँ। प्रलय में सब वस्तुएँ पहले जल में, फिर तेज में, फिर वायु में, फिर आकाश में लौटती हैं। जो मुक्ति चाहते हैं उन्हें आकाश से लौटना नहीं पड़ता; वे ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। वह ब्रह्म न उष्ण है न शीत, न मृदु न तीव्र, न खट्टा न कसैला, न मीठा न कड़वा; शब्द, गन्ध, रूप से रहित, आयाम-रहित।

मनु ने इन्द्रिय-संयम का सूत्र दिया कि त्वचा को स्पर्श से, जिह्वा को रस से, नासिका को गन्ध से, कान को शब्द से और नेत्र को रूप से लौटाकर ही मनुष्य अपनी आत्मा को इन्द्रियों, मन और गुणों से स्वतन्त्र देख पाता है। उन्होंने आत्मा और शरीर का भेद दृष्टान्तों से खोला। जैसे लकड़ी में अग्नि होती है पर चीरने से नहीं दिखती, और एक लकड़ी को दूसरी से रगड़ने पर प्रकट होती है, वैसे ही आत्मा शरीर में रहती है पर शरीर चीरने से नहीं दिखती; योग से इन्द्रियों और आत्मा को जोड़कर ही परमात्मा दिखता है। जैसे स्वप्न में मनुष्य अपने शरीर को भूमि पर पड़ा अपने से भिन्न देखता है, वैसे ही मृत्यु के बाद वह अपना शरीर छोड़कर दूसरे रूप में जाता है।

मनु ने एक मार्मिक रूपक दिया कि जैसे ज्वलित अग्नि के सामने रखी वस्तु उस ताप-प्रकाश से एक रंग ले लेती है, वैसे ही आत्मा का रूप शरीर से अपना रंग लेता दिखता है, यद्यपि वह वस्तुतः वैसा नहीं। मृत्यु पर मनुष्य शरीर को पाँच महाभूतों में छोड़कर वैसा ही नया रूप धारण करता है; प्रत्येक तत्त्व अपने सजातीय में मिल जाता है, कान आकाश में, गन्ध-इन्द्रिय पृथ्वी में, रूप तेज में, रस जल में, स्पर्श वायु में।

मनु ने आत्मा की अदृश्यता को चन्द्रमा से समझाया। जैसे कोई हिमवान की दूसरी ओर या चन्द्रमा की पीठ नहीं देख पाता, फिर भी उन्हें असत् नहीं कहता, वैसे ही आत्मा इन्द्रियों से अग्राह्य होकर भी असत् नहीं है। जैसे अमावस्या पर चन्द्रमा का स्थूल रूप अदृश्य होता है पर नष्ट नहीं होता, और फिर नया स्थान पाकर चमकने लगता है, वैसे ही शरीर से मुक्त आत्मा अदृश्य होकर भी नष्ट नहीं होती और नया शरीर पाकर फिर प्रकट होती है। जैसे राहु का चन्द्र के पास आना-जाना स्पष्ट नहीं दिखता, वैसे ही आत्मा का एक शरीर छोड़ दूसरे में जाना नहीं दिखता। और जैसे अमावस्या पर अदृश्य चन्द्र भी नक्षत्रों से अलग नहीं होता, वैसे ही शरीर से अलग आत्मा भी अपने कर्म-फल से अलग नहीं होती।

समझने की कुंजी (अवधारणा): आत्मा को कभी अग्नि-छिपी-लकड़ी, कभी अमावस्या-का-चन्द्र, कभी राहु-ग्रसित-चन्द्र से समझाया गया है। तीनों का एक ही मर्म है, अदृश्य का अर्थ अनुपस्थित नहीं। पाँच महाभूतों में पाँच इन्द्रियों का लौटना यह दिखाता है कि शरीर तत्त्वों का संयोग मात्र है, आत्मा उससे परे।

सार: सृष्टि आकाश से पृथ्वी तक क्रम से उपजती और प्रलय में उलटे क्रम से लौटती है। आत्मा इन्द्रियों से अग्राह्य पर नित्य है, चन्द्रमा की भाँति अदृश्य होकर भी विद्यमान; मृत्यु पर वह तत्त्वों को छोड़कर नया रूप लेती है, पर अपने कर्म-फल से कभी अलग नहीं होती।

मन, बुद्धि और शोक का उपचार

मनु ने मन और बुद्धि का सोपान-क्रम बताया कि इन्द्रियों से ऊपर मन, मन से ऊपर बुद्धि, बुद्धि से ऊपर आत्मा, और आत्मा से ऊपर परम (महान) है। अव्यक्त से आत्मा, आत्मा से बुद्धि, बुद्धि से मन उपजा। जब मन इन्द्रियों से जुड़ता है तब वह शब्दादि विषयों को ग्रहण करता है। जो इन विषयों को और सब व्यक्त को त्याग देता है, और मूल प्रकृति से उपजी सब वस्तुओं से मुक्त हो जाता है, वही अमरत्व भोगता है।

मनु ने शोक का उपचार बताया, जो विपत्ति-काल में राजा के लिए विशेष मूल्यवान है। उन्होंने कहा कि शारीरिक और मानसिक शोक के उठने पर योग नहीं सधता, इसलिए शोक पर बार-बार न सोचना चाहिए। शोक का उपचार उस पर बार-बार चिन्तन करने से बचना है; जब उसे बार-बार सोचा जाता है तो वह आक्रामक होकर बढ़ता है। मानसिक शोक को विवेक से और शारीरिक शोक को औषधि से दूर करना चाहिए। शोक में मनुष्य को बच्चे की भाँति आचरण नहीं करना चाहिए। बुद्धिमान को यौवन, सौन्दर्य, आयु, धन-संचय, स्वास्थ्य और प्रियजनों के साथ की इच्छा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ये सब क्षणभंगुर हैं।

मनु ने जोड़ा कि जो शोक पूरे समुदाय को छूता हो उसके लिए अकेले शोक न करे; बिना शोक किए, यदि अवसर दिखे, उपचार करे। जीवन में दुख की मात्रा सुख से कहीं अधिक है। जो मनुष्य सुख और दुख दोनों से बचता है, वही ब्रह्म को प्राप्त होता है, और ऐसे ज्ञानियों को कभी शोक नहीं करना पड़ता। सांसारिक सम्पत्तियाँ शोक लाती हैं; उन्हें कमाने, रखने और खोने, तीनों में दुख है, इसलिए उनके नाश का भी शोक न करे।

मनु ने ब्रह्म-प्राप्ति की विधि दी कि जब बुद्धि कर्म के गुणों से मुक्त होकर, बाहरी विषयों से लौटकर, मन की ओर मुड़ती है, तब वह समाधि में लीन होकर ब्रह्म को जानती है। अज्ञान से प्रवाहित बुद्धि पर्वत-शिखर से बहती नदी की भाँति बाहरी विषयों की ओर दौड़ती है; पर मन में समेटकर निर्गुण चिन्तन में लीन हुई बुद्धि कसौटी पर स्वर्ण के स्पर्श की भाँति ब्रह्म का ज्ञान पा लेती है। इन्द्रियों के द्वार बन्द करके बुद्धि को मन में समेटना चाहिए। जैसे गहरी, स्वप्न-रहित निद्रा (सुषुप्ति) में पाँच इन्द्रियाँ अपने कार्यों से मुक्त रहती हैं, वैसे ही परम ब्रह्म प्रकृति से ऊपर, उसके सब गुणों से मुक्त स्थित है।

समझने की कुंजी (शोक-उपचार): भीष्म युधिष्ठिर को, जो युद्ध के बाद शोक से भरे थे, यह सूत्र दे रहे हैं कि शोक को बार-बार मन में दोहराने से वह बढ़ता है। मानसिक दुख का उपचार विवेक है, शारीरिक का औषधि। यही विपत्ति-काल में राजा के मन को स्थिर रखने की कुंजी है। सुषुप्ति गहरी स्वप्न-रहित निद्रा है, जिसमें इन्द्रियाँ शान्त रहती हैं, यहाँ ब्रह्म की निर्गुण अवस्था का उपमान।

सार: इन्द्रिय, मन, बुद्धि, आत्मा, परम, यह आरोही क्रम है। शोक को बार-बार सोचने से वह बढ़ता है; मानसिक शोक विवेक से और शारीरिक औषधि से शान्त होता है। जो सुख-दुख दोनों से ऊपर उठ जाता है, वही ब्रह्म पाता है।

कर्म से ज्ञान तक, और काल से परे विष्णु

मनु ने ज्ञान-वृक्ष की जड़ें खोलीं कि ज्ञान से इच्छा उपजती है, इच्छा से संकल्प, संकल्प से कर्म, और कर्म से फल। इसलिए फल कर्म पर, कर्म बुद्धि पर, बुद्धि ज्ञान पर, और ज्ञान आत्मा पर आश्रित है। जब ज्ञान, फल, बुद्धि और कर्म का नाश हो जाता है, तब जो परम परिणाम मिलता है, वही ब्रह्म-ज्ञान कहलाता है। उन्होंने तत्त्वों का तारतम्य बताया कि जल पृथ्वी से बड़ा, तेज जल से, वायु तेज से, आकाश वायु से, मन आकाश से, बुद्धि मन से, और काल बुद्धि से बड़ा है। और दिव्य विष्णु, जिनका यह विश्व है, काल से भी बड़े हैं। वे आदि-मध्य-अन्त से रहित हैं, इसलिए अपरिवर्तनीय; वे सब शोक से परे हैं क्योंकि शोक की सीमाएँ होती हैं।

मनु ने कहा कि उसी विष्णु को परम ब्रह्म कहा गया है। उन्हें जानकर जो विवेकी काल की शक्ति वाली हर वस्तु से मुक्त हो जाते हैं, वे मुक्ति पाते हैं। जो कुछ हम देखते हैं वह सब गुणों में प्रकट है; जो ब्रह्म है, गुण-रहित होने से, इन सब से परे है। कर्म से निवृत्ति परम धर्म है, और वही अमरत्व तक ले जाता है। ऋक्, यजु और साम का आश्रय शरीर है, वे जिह्वा के अग्र से प्रवाहित होते हैं, परिश्रम के बिना नहीं मिलते, और नाशवान हैं; पर ब्रह्म इस प्रकार अर्जित नहीं होता। ऋक्, साम, यजु, सबका आरम्भ है, और जिसका आरम्भ है उसका अन्त भी; पर ब्रह्म आदि-रहित कहा गया है, इसलिए अनन्त और अपरिवर्तनीय।

मनु ने अन्तिम सूत्र दिया कि जैसे लकड़ी में बसी अग्नि से वायु दूर रहती है, वैसे ही जो विषयेच्छा से व्याकुल हैं वे परम तत्त्व से दूर रहते हैं। जो सब सांसारिक वस्तुओं का नाश करने में लगता है, वह ब्रह्म-शरीर में विलीन हो जाता है। सूर्य उदय होकर किरणें फैलाकर सगुण हो जाता है, और अस्त होकर किरणें समेटकर निर्गुण; वैसे ही मनुष्य सब आसक्तियाँ त्यागकर, तप में लगकर, अन्ततः उस अविनाशी, गुण-रहित ब्रह्म में प्रवेश करता है, जो जन्म-रहित, सबकी शरण, स्वयम्भू, आदि-मध्य-अन्त-रहित, और परम सत्य है। उसे जानकर मनुष्य अमरत्व पाता है।

समझने की कुंजी (काल से परे): यहाँ काल (समय) को बुद्धि से भी ऊँचा रखा गया है, और विष्णु को काल से भी ऊपर। इसका अर्थ है कि परम तत्त्व समय के परिवर्तन-चक्र से बाहर है। निर्गुण ब्रह्म और सगुण विष्णु यहाँ एक ही परम सत्ता के दो पहलू हैं, गुण-रहित और गुण-सहित।

सार: ज्ञान-इच्छा-संकल्प-कर्म-फल की शृंखला है; इसके नाश से ब्रह्म-ज्ञान मिलता है। तत्त्वों के तारतम्य के शिखर पर विष्णु हैं, जो काल से भी परे, आदि-अन्त-रहित और परम ब्रह्म हैं। कर्म-निवृत्ति परम धर्म है, जो अमरत्व देता है।

कृष्ण-नारायण: सृष्टि का स्रोत और वराह-अवतार

ब्रह्माण्ड-सागर से उठते महाबली वराह, विष्णु का वराह-अवतार, दाँत पर गोल पृथ्वी सँभाले, कमल-नयन और उफनते जल के सामने तेजस्वी

युधिष्ठिर ने उस कमल-नयन, अविनाशी, सबके रचयिता, स्वयं किसी से न रचे गए, विष्णु के विषय में विस्तार से सुनना चाहा, जिन्हें नारायण, हृषीकेश, गोविन्द और केशव कहते हैं। भीष्म ने कहा कि उन्होंने यह विषय जमदग्नि-पुत्र राम (परशुराम), देवर्षि नारद, और कृष्ण-द्वैपायन (व्यास) से सुना है; असित-देवल, वाल्मीकि और मार्कण्डेय गोविन्द को परम और सर्वाधिक अद्भुत कहते हैं।

भीष्म ने सृष्टि-क्रम सुनाया कि उस परम पुरुष ने अपनी इच्छा से पाँच महाभूत, वायु, तेज, जल, आकाश और पृथ्वी रचे। पृथ्वी रचकर वे जल की सतह पर लेट गए। जल पर तैरते हुए उन्होंने सर्वप्रथम “चेतना” (अहंकार-तत्त्व) रची, जो सब प्राणियों का आधार है, साथ ही मन। फिर उस परम पुरुष की नाभि से सूर्य-सा तेजस्वी एक अत्यन्त सुन्दर कमल उगा, और उस कमल से तेज से दिशाओं को भरते हुए दिव्य ब्रह्मा, सब प्राणियों के पितामह, प्रकट हुए।

ब्रह्मा के प्रकट होते ही तमोगुण से मधु नामक एक भयंकर असुर जन्मा, जो ब्रह्मा को मारने के भयानक कर्म में लगा। ब्रह्मा के हित के लिए उस परम दिव्यता ने उस उग्र असुर का वध किया, और इसी वध से वे “मधुसूदन” (मधु का वध करने वाले) कहलाए।

इसके बाद ब्रह्मा ने इच्छा-मात्र से सात पुत्र रचे, दक्ष को मिलाकर, अर्थात मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और दक्ष। मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। दक्ष की पहले तेरह कन्याएँ हुईं, जिनमें ज्येष्ठ दिति थी; कश्यप उन तेरह के पति बने। दक्ष ने फिर दस कन्याएँ धर्म को दीं, जिनसे वसु, रुद्र, विश्वेदेव, साध्य और मरुत हुए। फिर सत्ताईस कन्याएँ सोम को दीं। कश्यप की अन्य पत्नियों से गन्धर्व, अश्व, पक्षी, गौ, किम्पुरुष, मत्स्य और वृक्ष-वनस्पति हुए। अदिति से आदित्य हुए, जिनमें विष्णु ने वामन रूप में जन्म लिया और गोविन्द कहलाए। दिति से असुर हुए, दनु से दानव।

भीष्म ने युग-क्रम बताया कि मधुसूदन ने दिन-रात, ऋतुएँ, प्रातः-सायं, बादल और सब स्थिर-चर वस्तुएँ रचीं। फिर कृष्ण ने अपने मुख से सौ श्रेष्ठ ब्राह्मण, दोनों भुजाओं से सौ क्षत्रिय, जंघाओं से सौ वैश्य, और दोनों पैरों से सौ शूद्र रचे। चार वर्ण रचकर उन्होंने ब्रह्मा (धातृ) को सब प्राणियों का स्वामी बनाया। उन्होंने यम को पितरों और पापियों का शासक, कुबेर को निधियों का स्वामी, वरुण को जल का स्वामी, और इन्द्र को देवताओं का प्रमुख बनाया। उन दिनों मनुष्य जब तक चाहते जीते थे, यम का भय न था; प्रजा संकल्प-मात्र से उत्पन्न होती थी। त्रेता में स्पर्श से, द्वापर में मैथुन-प्रथा आरम्भ हुई, और कलियुग में मनुष्य विवाह करके जोड़ों में रहने लगे।

भीष्म ने कहा कि देवर्षि नारद, जो सब लोकों के साक्षी हैं, ने कहा है कि कृष्ण ही परम ईश्वर हैं। वह कमल-नयन कोई साधारण मनुष्य नहीं, वे अचिन्त्य हैं।

एक उप-कथा: युधिष्ठिर ने पूछा कि विष्णु ने पशु का रूप किसलिए धारण किया। भीष्म ने वराह-अवतार की कथा सुनाई, जो उन्होंने मार्कण्डेय के आश्रम में कश्यप से सुनी थी। प्राचीन काल में मद से चूर मुख्य दानव और सहस्रों असुर देवताओं की समृद्धि से ईर्ष्यालु हो उठे। दानवों से पीड़ित देवता और ऋषि सब दिशाओं में भाग खड़े हुए। पृथ्वी भयंकर दानवों के भार से दबकर मानो नीचे की गहराइयों में धँसने लगी। आदित्य ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा ने कहा कि उन्होंने पहले ही व्यवस्था कर दी है; अदृश्य-रूप विष्णु ने वराह (सूअर) का रूप धारण किया है और पृथ्वी के नीचे हजारों में बसे उन दानवों का वध करेंगे। तब वराह-रूप विष्णु पाताल में घुसकर दिति के पुत्रों पर टूट पड़े। दानवों ने मिलकर उस वराह को घेरकर हर ओर से खींचा, पर अपने विशाल बल से भी उसे हिला न सके, और भय से भर गए। तब वह परमात्मा योग में लीन होकर ऐसी भयंकर गर्जना करने लगे कि दसों दिशाएँ गूँज उठीं और सब प्राणी काँप गए। उस गर्जना से दानव निष्प्राण होकर गिरने लगे, और वराह ने अपने खुरों से उन्हें विदीर्ण कर डाला। उस गर्जना के कारण विष्णु “सनातन” कहलाए। यह जानने पर देवता ब्रह्मा के पास आए कि यह कैसा नाद है जिसने सबको स्तब्ध कर दिया; और ब्रह्मा ने कहा कि यही वह परम ईश्वर हैं, सब प्राणियों की आत्मा, योगियों में श्रेष्ठ, कृष्ण, सब विघ्नों के नाशक; वही काल हैं, वही विधाता, और वही सबको धारण करते हैं।

समझने की कुंजी (वंश और संख्या): सात ब्रह्म-पुत्र (मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, और कहीं वसिष्ठ/दक्ष) सप्तर्षि कहलाते हैं, सब प्रजापतियों के मूल। चार युग, सत्य (कृत), त्रेता, द्वापर और कलि, में मनुष्य की उत्पत्ति का ढंग क्रमशः संकल्प, स्पर्श, मैथुन और विवाह बताया गया है, जो धर्म के क्रमशः क्षीण होने का प्रतीक है। वराह विष्णु का तीसरा अवतार माना जाता है, जो पृथ्वी को संकट से उबारते हैं।

सार: कृष्ण-नारायण सृष्टि के मूल हैं; जल पर शयन, नाभि-कमल से ब्रह्मा, मधु-वध, सप्तर्षि और वर्ण-रचना सब उन्हीं से। वराह-रूप धारण कर उन्होंने पृथ्वी को दानवों के भार से उबारा। वे काल से परे परम ईश्वर हैं, कोई साधारण मनुष्य नहीं।

प्रजापति, सप्तर्षि, और गुरु-शिष्य का मोक्ष-संवाद

युधिष्ठिर ने प्रथम प्रजापतियों और दिशाओं में बसने वाले ऋषियों के विषय में पूछा। भीष्म ने आदि के सात ब्रह्म-पुत्रों का नाम लिया, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ, जो पुराणों में सप्तर्षि कहलाए। उन्होंने बारह आदित्यों, अश्विनों, वसुओं, रुद्रों और मरुतों के नाम और वंश गिनाए। फिर बताया कि किस दिशा में कौन-से ऋषि बसते हैं, पूर्व में अंगिरा के पुत्र और सप्तर्षि, दक्षिण में अगस्त्य आदि, पश्चिम में एकत-द्वित-त्रित और सारस्वत आदि, और उत्तर में अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम, भरद्वाज, विश्वामित्र और जमदग्नि। उन्होंने कहा कि जो प्रातः उठकर इन देवताओं और ऋषियों के नाम स्मरण करता है, वह अपने जाने-अनजाने सब पापों से शुद्ध हो जाता है।

फिर युधिष्ठिर ने मुक्ति-देने वाले उस परम योग के विषय में पूछा। भीष्म ने एक गुरु और उसके शिष्य के मोक्ष-संवाद का प्राचीन आख्यान सुनाया। एक तेजस्वी, सत्य में दृढ़, इन्द्रिय-जयी गुरु थे। एक बुद्धिमान शिष्य ने उनके चरण स्पर्श कर हाथ जोड़कर पूछा कि मैं कहाँ से हूँ, आप कहाँ से; अन्तिम कारण क्या है; और जब सब प्राणियों में मूल उपादान एक ही है, तो उनकी उत्पत्ति और विनाश इतने भिन्न ढंगों से क्यों होते हैं।

गुरु ने कहा कि यह विषय वेदों में भी अप्रकट है और चिन्तन का परम विषय है; इसे अध्यात्म कहते हैं। वासुदेव विश्व का परम कारण हैं, वेदों के उद्गम (ॐ), सत्य, ज्ञान, यज्ञ, त्याग, आत्म-संयम और धर्म-स्वरूप। वासुदेव काल का चक्र हैं, आदि-अन्त-रहित; उन्हीं पर आश्रित यह विश्व पहिए की भाँति घूमता है। उन्होंने प्रकृति से क्रमशः बुद्धि, चेतना, आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी, ये आठ मूल प्रकृति बताए, जिन पर विश्व टिका है। इन आठ से पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच विषय, और सोलहवाँ मन उपजा।

गुरु ने आत्मा का स्वरूप वही उपमानों से खोला कि नौ द्वारों वाला यह पवित्र भवन (शरीर) इन्हीं तत्त्वों से बना है, और इन सब से ऊपर आत्मा उसमें व्याप्त रहती है, इसलिए वह “पुरुष” कहलाती है। जैसे दीपक छोटी-बड़ी सब वस्तुओं को प्रकट करता है, वैसे ही आत्मा सब प्राणियों में ज्ञान-तत्त्व रूप में रहती है। कान को सुनने को, नेत्र को देखने को प्रेरित करने वाली आत्मा ही है; इन्द्रियाँ कर्ता नहीं, आत्मा ही कर्ता है। जैसे लकड़ी में अग्नि है पर चीरने से नहीं दिखती, और रगड़ने से प्रकट होती है, वैसे ही शरीर में आत्मा है जो योग रूपी उपाय से ही दिखती है। स्वप्न में जैसे आत्मा सूक्ष्म इन्द्रियों सहित शरीर छोड़कर विचरती है, वैसे ही मृत्यु पर वह एक शरीर छोड़कर दूसरे में प्रवेश करती है, अपने ही कर्मों से बँधी।

भीष्म ने इसी क्रम में कहा कि सब प्राणी, चार वर्गों में बँटे, अव्यक्त जन्म और अव्यक्त मृत्यु वाले हैं। जैसे एक छोटे, बिना खिले अश्वत्थ-पुष्प में विशाल वृक्ष छिपा रहता है और बाहर आने पर ही दिखता है, वैसे ही जन्म अव्यक्त से होता है। जैसे जड़ लोहा चुम्बक की ओर दौड़ता है, वैसे ही स्वभाव से उपजी प्रवृत्तियाँ नए जीवन में आत्मा की ओर दौड़ती हैं। आत्मा नित्य, अविनाशी, हर प्राणी में, मन का कारण, और गुण-रहित है।

भीष्म ने संसार-चक्र का सुन्दर रूपक दिया कि अव्यक्त बुद्धि (इच्छाओं सहित) उस चक्र की नाभि है, व्यक्त शरीर उसके अरों का समूह, और बोध तथा कर्म उसकी परिधि। रजोगुण से प्रेरित आत्मा उसकी अध्यक्षता करती है, उसके घूमने की साक्षी रहती हुई। जैसे तेली अपने यन्त्र में तिलहन पीसते हैं, वैसे ही अज्ञान से उपजे परिणाम रजोगुण से भीगे इस विश्व-चक्र को पीसते हैं। पर जैसे वायु धूल उड़ाती है किन्तु स्वयं उससे मलिन नहीं होती, वैसे ही आत्मा इन प्रवृत्तियों से अछूती रहती है। ज्ञानी को जानना चाहिए कि जीवन और आत्मा का सम्बन्ध वायु और धूल जैसा ही पृथक है।

भीष्म ने अन्तिम सूत्र दिया कि जैसे आग से झुलसे बीज अंकुर नहीं फोड़ते, वैसे ही यदि दुख का सब कारण सच्चे ज्ञान की अग्नि से भस्म हो जाए, तो आत्मा पुनर्जन्म के बन्धन से छूट जाती है। इस प्रकार उस दिव्य ऋषि ने अपने शिष्य के मन का सन्देह दूर किया।

समझने की कुंजी (नौ द्वार और संसार-चक्र): शरीर को “नौ द्वारों का नगर” कहा गया है, अर्थात दो नेत्र, दो कान, दो नासिका-छिद्र, मुख, और दो निचले मल-मूत्र-द्वार। संसार-चक्र का रूपक, नाभि (अव्यक्त बुद्धि), अरे (व्यक्त शरीर), परिधि (कर्म-फल), यह दिखाता है कि जीव कैसे कर्म और इच्छा के पहिए में बँधकर घूमता है, और आत्मा उस घूमते चक्र का निर्लिप्त साक्षी है।

सार: सप्तर्षि सब प्रजापतियों के मूल हैं और दिशाओं के साक्षी। वासुदेव काल-चक्र और परम कारण हैं; आठ मूल प्रकृति और सोलह विकार उन्हीं से उपजे। आत्मा नौ-द्वारों के नगर में रहकर भी उस चक्र का निर्लिप्त साक्षी है; ज्ञान की अग्नि से दुख के बीज जलते ही पुनर्जन्म छूट जाता है।

तीन गुण, स्त्री-पुरुष, और ब्रह्मचर्य का मार्ग

भीष्म ने कर्म-मार्ग और ज्ञान-मार्ग की तुलना की कि कर्म में लगे कर्म को ही श्रेष्ठ मानते हैं, ज्ञान में लगे ज्ञान को। जो अधिक बुद्धिमान हैं वे कर्म से निवृत्ति का मार्ग दोनों, स्वर्ग और मोक्ष, में श्रेष्ठ मानते हैं। निवृत्ति को महान विवेकी ही धारण करते हैं, और वही आचरण प्रशंसनीय है। उन्होंने कहा कि जैसे स्वर्ण लोहे से मिलकर अपनी शुद्धि खो देता है और चमकता नहीं, वैसे ही ज्ञान सांसारिक आसक्ति जैसे दोषों के साथ रहकर अपना तेज नहीं फैलाता। जो लोभ, इच्छा और क्रोध के वश अधर्म करता है, वह पूर्ण विनाश पाता है।

भीष्म ने शरीर और भोजन का यथार्थ चित्र दिया कि जब हर शरीर पाँच महाभूतों और तीन गुणों से बना है, तो किसकी पूजा करें और किसे किन शब्दों से दोष दें? केवल मूर्ख ही इन्द्रिय-विषयों में आसक्त होते हैं, यह न जानते कि उनके शरीर केवल विकार हैं। जैसे मिट्टी का घर मिट्टी से ही लीपा जाता है, वैसे ही मिट्टी से बना यह शरीर मिट्टी के ही विकार भोजन से टिकता है। मधु, तेल, दूध, मक्खन, मांस, नमक, गुड़, अन्न, फल और मूल, सब पृथ्वी और जल के ही विकार हैं। वन-वासी मुनि स्वादिष्ट भोजन की इच्छा त्यागकर केवल शरीर-धारण के लिए सादा, नीरस भोजन लेते हैं; वैसे ही संसार-रूपी वन में रहने वाले को रोगी की औषधि की भाँति जीवन-निर्वाह के लिए भोजन लेना चाहिए।

भीष्म ने तीन गुणों के फल फिर गिनाए कि सत्त्व से सन्तोष, आनन्द, निश्चय, बुद्धि और स्मृति; रजस् से इच्छा, क्रोध, भ्रम, लोभ, मोह, भय और थकान; और तमस् से उदासी, शोक, असन्तोष, घमण्ड, अभिमान और दुष्टता उपजते हैं। उन्होंने कहा कि इन गुणों का तारतम्य परखकर मनुष्य को एक-एक दोष पर क्रम से चिन्तन करना चाहिए, कि कौन-सा दोष प्रबल है, कौन क्षीण, कौन हट गया, और कौन बाकी है।

युधिष्ठिर ने पूछा कि मोक्ष के अभिलाषी कौन-से दोष त्यागते हैं, कौन-से क्षीण करते हैं, कौन बार-बार लौट आते हैं और इसलिए हटाए नहीं जा सकते, और किन पर बुद्धि से विचार करना चाहिए। भीष्म ने एक तीखा रूपक दिया कि जैसे इस्पात की कुल्हाड़ी इस्पात की जंजीर काटकर स्वयं भी टूट जाती है, वैसे ही शुद्ध-आत्मा मनुष्य तमोगुण से उपजे और आत्मा के साथ जन्मे सब दोषों का नाश करके शरीर से अपना सम्बन्ध तोड़ लेता है। उन्होंने कहा कि सत्त्व ही वह गुण है जिससे शुद्ध-आत्मा मोक्ष पाते हैं, इसलिए रजस् और तमस् से उपजे सब गुण त्याग देने चाहिए; और जब सत्त्व रजस्-तमस् से मुक्त होता है तो और भी देदीप्यमान हो उठता है।

भीष्म ने जन्म और पुनर्जन्म की शृंखला बताई कि माया में लिपटकर मनुष्य ज्ञान से गिरते हैं, क्रोध करते हैं; क्रोध से इच्छा, इच्छा से लोभ, मोह, अभिमान और स्वार्थ, स्वार्थ से कर्म, कर्म से स्नेह-बन्धन, बन्धन से शोक, और जन्म-मृत्यु की बाध्यता उपजती है। जन्म की बाध्यता से गर्भ-वास आता है, जो मल-मूत्र-कफ और रक्त से दूषित है। तृष्णा से अभिभूत जीव-आत्मा क्रोधादि से बँध जाती है, फिर भी इन कष्टों से निकलना चाहती है।

इसी सन्दर्भ में भीष्म ने सांख्य की पारिभाषिक दृष्टि से कहा कि सृष्टि-प्रवाह को आगे बढ़ाने के साधन के रूप में स्त्री को क्षेत्र और पुरुष को क्षेत्रज्ञ कहा गया है, गुणों की दृष्टि से। इसी कारण विवेकी को विशेष रूप से स्त्री-विषय में आसक्त नहीं होना चाहिए। शास्त्र कहते हैं कि स्त्रियाँ रजोगुण में डूबी, इन्द्रियों का शाश्वत मूर्त रूप हैं, और विवेक-हीनों को मोहित कर देती हैं। उन्होंने पुनर्जन्म-दृष्टि से यह भी कहा कि जैसे शरीर में उपजे, पर शरीर का अंग न होने वाले जन्तुओं को मनुष्य त्याग देता है, वैसे ही विवेकी को सन्तान को भी, जो अपनी मानी जाती है पर वस्तुतः अपनी नहीं, उतना ममता-बन्धन नहीं देना चाहिए, क्योंकि ये भी पूर्व-कर्मों के अनुसार ही उपजते हैं।

भीष्म ने ब्रह्मचर्य को मोक्ष का परम साधन बताया। उन्होंने कहा कि मनुष्यों में जो द्विज हैं, और द्विजों में जो वेद-ज्ञ हैं, वे श्रेष्ठ हैं। जैसे बिना मार्गदर्शक के अन्धा मार्ग पर अनेक कष्ट पाता है, वैसे ही ज्ञान-हीन संसार में अनेक विघ्न पाता है। ब्रह्मचर्य (संयम या योग का धर्म) ब्रह्म-प्राप्ति का साधन है, सब धर्मों में श्रेष्ठ। यह पाँच प्राण, मन, बुद्धि और दसों इन्द्रियों के सम्बन्ध से मुक्त है, इसलिए इन्द्रिय-बोध से परे; इसे केवल शब्द से सुना जा सकता है, रूप से नहीं देखा, केवल बुद्धि से ही पाया जा सकता है। जो इसे पूर्णतः पालता है वह ब्रह्म पाता है, जो आधा-आधा वह देवत्व, और जो उपेक्षा से वह ब्राह्मणों में जन्म लेकर विद्या से श्रेष्ठता पाता है।

भीष्म ने इस संयम की कठिनाई और उपाय बताए कि जो इसे धारण करे वह रजोगुण को उठते ही दबा दे; स्त्री से बात न करे, अनावृत स्त्री पर दृष्टि न डाले, क्योंकि स्त्री-दर्शन दुर्बल-मन वालों को काम से भर देता है। यदि व्रत-काल में मन में काम जागे तो प्रायश्चित-स्वरूप कृच्छ्र-व्रत करे और तीन दिन जल में रहे; यदि स्वप्न में इच्छा जागे तो जल में डुबकी लगाकर अघमर्षण के तीन ऋक् तीन बार मन में दोहराए। बुद्धिमान को विस्तृत और प्रबुद्ध मन से रजोगुण से उपजे सब पापों को मन में जला देना चाहिए।

भीष्म ने शरीर-शास्त्र का सूक्ष्म वर्णन भी दिया कि भोजन से उपजे रस धमनियों के जाल से होकर वायु, पित्त, कफ, रक्त, त्वचा, मांस, अस्थि, मज्जा और पूरे शरीर का पोषण करते हैं। दस मुख्य नाड़ियाँ हैं जो पाँच इन्द्रियों के कार्य में सहायक हैं, और उनसे हजारों सूक्ष्म नाड़ियाँ निकलती हैं। हृदय की ओर जाने वाली “मनोवहा” नामक एक नाड़ी है, जो शरीर के हर भाग से इच्छा से उपजा वीर्य खींचती है। उन्होंने कहा कि भोजन का रस, मनोवहा नाड़ी, और कल्पना से उपजी इच्छा, ये तीन वीर्य के मूल कारण हैं, जिसके अधिष्ठाता-देव इन्द्र हैं, और इसी से वह वेग “इन्द्रिय” कहलाता है।

भीष्म ने अन्तिम सूत्र दिया कि जो केवल शरीर-धारण के लिए कर्म करता है, मन से तीन गुणों को समता में लाता है, और अन्तिम क्षण में प्राण-वायुओं को मनोवहा नाड़ी में ले आता है, वह पुनर्जन्म से छूट जाता है। मन ही ज्ञान पाता है, मन ही सब वस्तुओं का रूप लेता है; इसलिए मन को (मन-रूप में) मिटाने के लिए केवल निष्पाप कर्म करने चाहिए। जो परिपक्व बुद्धि वाला है वह पूर्व-जन्मों के शुभ-फल से अपनी इच्छाओं को नष्ट कर देता है, और शरीर तथा इन्द्रियों के बन्धन लाँघकर, बाधाओं भरे मार्ग पार करते यात्री की भाँति, मोक्ष के अमृत का स्वाद पाता है।

समझने की कुंजी (क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ): सांख्य की शब्दावली में क्षेत्र वह “खेत” है जिसमें सृष्टि उगती है, और क्षेत्रज्ञ उसका “जानने वाला”। यहाँ इन्हें सृष्टि-प्रक्रिया के प्रतीक रूप में लिया गया है। यह प्रसंग वैराग्य का उपदेश है, मनुष्य के मूल्य का आकलन नहीं; इसका भाव यह है कि मोक्ष-मार्गी को किसी भी इन्द्रिय-विषय में, चाहे वह कितना ही प्रिय हो, गहरा आसक्त नहीं होना चाहिए। मनोवहा मन से जुड़ी वह नाड़ी है जिसके द्वारा कल्पना और इच्छा शरीर पर प्रभाव डालती हैं। कृच्छ्र एक कठोर प्रायश्चित-व्रत है।

सार: कर्म से ज्ञान श्रेष्ठ, और ज्ञान से निवृत्ति। सत्त्व ही मोक्ष का सोपान है, रजस् और तमस् त्याज्य। जन्म-मृत्यु की शृंखला क्रोध-इच्छा-लोभ-कर्म से बँधती है। ब्रह्मचर्य परम साधन है, जो इन्द्रिय-बोध से परे, केवल बुद्धि से ग्राह्य है; इसे धैर्यपूर्ण संयम और निष्काम कर्म से ही साधा जाता है।

इन्द्रिय-जय और मोक्ष की अन्तिम सीढ़ी

भीष्म ने अन्त में इन्द्रियों को जीतने का उपाय शास्त्र-दृष्टि से बताया। उन्होंने कहा कि जो प्राणी सदा बुराई से भरे इन्द्रिय-विषयों में आसक्त हो जाते हैं, वे असहाय हो जाते हैं; पर जो आसक्त नहीं होते, वे परम गति पाते हैं। बुद्धिमान को, संसार को जन्म, मृत्यु, जरा, शोक, रोग और चिन्ताओं से अभिभूत देखकर, मोक्ष के लिए प्रयत्न करना चाहिए। वह वाणी, मन और शरीर से शुद्ध हो, अभिमान से मुक्त, शान्त-आत्मा, ज्ञानी, और भिक्षा-जीवन में किसी सांसारिक वस्तु से अनासक्त रहकर सुख खोजे।

भीष्म ने एक सूक्ष्म चेतावनी दी कि यदि करुणा के कारण मन फिर आसक्ति में पड़ने लगे, तो यह देखकर कि विश्व कर्मों का ही परिणाम है, करुणा के प्रति भी उदासीनता दिखानी चाहिए। जो भी भला या बुरा कर्म किया जाए, उसका फल कर्ता ही भोगता है, इसलिए वाणी, मन और कर्म से केवल भले कर्म करने चाहिए। जो अहिंसा, सत्य-भाषण, सब प्राणियों के प्रति ईमानदारी, और क्षमा का आचरण करता है और कभी प्रमादी नहीं होता, वही सुख पाता है। इसलिए मनुष्य को बुद्धि से, मन को प्रशिक्षित करके, सब प्राणियों के प्रति शान्ति-भाव पर स्थिर करना चाहिए।

भीष्म ने वाणी का धर्म बताया कि जो शुभ वचन या निर्दोष धर्म चाहता है, वह केवल वही सत्य बोले जो द्वेष या निन्दा से रहित हो; न कठोर, न क्रूर, न दुष्ट, न बकवास से भरा। उन्होंने कहा कि सम्पूर्ण विश्व वाणी में बँधा है। जो रजोगुण की प्रवृत्तियों से प्रेरित होकर कर्म करता है, वह संसार में दुख पाता और अन्ततः नरक में डूबता है; इसलिए शरीर, वाणी और मन में आत्म-संयम का अभ्यास करना चाहिए।

भीष्म ने एक तीखा रूपक दिया कि अज्ञानी, जो संसार का बोझ ढोते हैं, उन डाकुओं के समान हैं जो चुराई भेड़ों का बोझ लादे रहते हैं और राजा के पहरे वाले मार्गों से डरते रहते हैं; और जैसे डाकुओं को सुरक्षा चाहिए तो लूट का माल फेंकना पड़ता है, वैसे ही मनुष्य को कल्याण चाहिए तो रजस् और तमस् से प्रेरित सब कर्म त्यागने पड़ते हैं।

भीष्म ने मोक्ष की अन्तिम सीढ़ियाँ क्रम से रखीं। उन्होंने कहा कि धैर्यवान और शुद्ध-आत्मा मनुष्य पहले अपनी बुद्धि को वश में करे, फिर बुद्धि से मन को, और फिर मन से इन्द्रिय-विषयों को। मन के वश में आते और इन्द्रियों के संयत होते ही इन्द्रियाँ देदीप्यमान होकर ब्रह्म में प्रवेश करती हैं। जब इन्द्रियाँ मन में समेट ली जाती हैं, तब ब्रह्म उसमें प्रकट होता है; और जब इन्द्रियाँ नष्ट होकर आत्मा शुद्ध-अस्तित्व की अवस्था में लौटती है, तब वह ब्रह्म-रूप मानी जाती है।

भीष्म ने योग के आचरण की मर्यादा बतायी कि योगी को अपनी योग-शक्ति का प्रदर्शन कभी नहीं करना चाहिए, न उसे जीविका का साधन बनाना चाहिए; उलटे वह टूटे अन्न-कण, पकी फलियाँ, तेल निकाली खली, साग, अधपके जौ, भुनी दालों का आटा, और भिक्षा में मिले फल-मूल पर ही निर्वाह करे। देश-काल के अनुसार, उचित परीक्षण के बाद, व्रत और उपवास का पालन करे; आरम्भ किए व्रत को बीच में न छोड़े। जैसे कोई धीरे-धीरे अग्नि सुलगाता है, वैसे ही ज्ञान से प्रेरित कर्म को क्रमशः बढ़ाए, जिससे ब्रह्म उसमें सूर्य की भाँति धीरे-धीरे प्रकाशित हो।

भीष्म ने अन्तिम तत्त्व कहा कि अज्ञान, जिसका आश्रय ज्ञान है, जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति, तीनों अवस्थाओं पर अपना प्रभाव फैलाता है। दुष्ट-हृदय मनुष्य आत्मा का ज्ञान नहीं पाता क्योंकि वह उसे इन तीन अवस्थाओं से जुड़ा मान लेता है, यद्यपि वह वस्तुतः इन सब से परे है। पर जब वह उन सीमाओं को पहचान लेता है जिनके भीतर तीन अवस्थाओं से संयोग और वियोग प्रकट होते हैं, तब वह आसक्ति से मुक्त होकर मोक्ष पाता है। ऐसा बोध पाते ही मनुष्य जरा और मृत्यु के परिणामों से ऊपर उठ जाता है और उस शाश्वत, मृत्यु-रहित, अपरिवर्तनीय, अविनाशी ब्रह्म को प्राप्त होता है।

समझने की कुंजी (तीन अवस्थाएँ): जाग्रत (जागना), स्वप्न (सपना) और सुषुप्ति (गहरी निद्रा), ये चेतना की तीन अवस्थाएँ हैं। मोक्ष-दृष्टि यह है कि आत्मा इन तीनों की साक्षी है, इनमें से कोई नहीं; जो इस भेद को पहचान लेता है वही मुक्त होता है।

सार: इन्द्रिय-विषयों में अनासक्ति, अहिंसा, सत्य और संयत वाणी मोक्ष के द्वार हैं। बुद्धि से मन, मन से इन्द्रियों को वश करते ही इन्द्रियाँ ब्रह्म में लीन होती हैं। योगी अपनी शक्ति का प्रदर्शन न करे, सादा निर्वाह करे, और तीनों अवस्थाओं से परे आत्मा को पहचानकर शाश्वत, मृत्यु-रहित ब्रह्म को प्राप्त हो।

मूल: महाभारत (कृष्णद्वैपायन व्यास), शान्ति पर्व, आपद्धर्म तथा मोक्षधर्म उपपर्व, अध्याय 129-353; पाठान्तर में गीता प्रेस का क्रम रखा गया है।

आधार: महाभारत, वेदव्यास (गीता प्रेस, गोरखपुर)