उद्धव गीता

कथा 58 · भागवतम् की कथाएँ

उद्धव गीता

Krishna’s Last Words
स्कन्ध 11, अध्याय 6-29

कृष्ण को 125 साल हो गए थे।

उनका काम पृथ्वी पर पूरा था। महाभारत हो चुका था। द्वारका बस गई थी। उनका कुल फैल चुका था।

एक दिन वो अकेले बैठे। और कुछ सोचा।

”अब समय है। मेरा अवतार पूरा।”

उन्होंने कुछ ऋषियों को भेजा। शाप मँगवाया। (पुरानी कथा है, उन्होंने एक एक ब्राह्मण-छात्र का अपमान करवाया जिसने यदुवंश को शाप दिया।)

मगर उससे पहले, एक last काम था।

उद्धव।

उद्धव कृष्ण का सबसे क़रीबी मित्र था। एक यदुवंशी। एक भक्त।

उद्धव ने अपनी पूरी ज़िंदगी कृष्ण के साथ बिताई थी। हर लीला देखी थी।

अब वो उससे बात करना चाहते थे।

”उद्धव, आ। बैठ।”

उद्धव बैठा।

”एक बात बता। तू ने मेरे साथ इतने साल बिताए। अब मैं जा रहा हूँ। तू क्या करेगा?”

उद्धव के होश उड़ गए। ”आप जा रहे हैं?”

”हाँ। मेरा काम पूरा।”

”तो मैं भी आपके साथ चलूँगा।”

”नहीं। तू यहाँ रहेगा।”

”क्यों? आप के बिना मेरा क्या?”

कृष्ण मुस्कुराए।

”उद्धव, मैं तुझे एक उपदेश देता हूँ। यह तेरी guide बनेगी। यह वही उपदेश है जो मैंने अर्जुन को कुरुक्षेत्र पर दिया था। पर अर्जुन के लिए वो one-shot था, युद्ध के बीच। तेरे लिए मैं इसे विस्तार से दूँगा। शान्ति से।”

और तब कृष्ण ने वो उपदेश दिया जो ”उद्धव गीता” कहलाता है।

मामेकमेव शरणं आत्मानं सर्वदेहिनाम् ।
याहि सर्वात्मभावेन मया स्या ह्यकुतोभयः ॥
(श्रीमद्भागवत 11.12.15)

मुझ एक की ही, सब प्राणियों के आत्मा की, पूरी तरह से शरण में आ जा। तब तू निर्भय हो जाएगा।

यह उपदेश भागवतम् के स्कन्ध 11 में आता है। अध्याय 6 से 29 तक। एक हज़ार से ज़्यादा श्लोक।

कृष्ण ने हर एक चीज़ कवर की। साँख्य। योग। भक्ति। ज्ञान। गुणों का breakdown।

उन्होंने अवधूत और उसके चौबीस गुरुओं की कथा भी सुनाई।

उन्होंने हंस-गीत सुनाया। ब्रह्मा को विष्णु ने जो दिया था।

उन्होंने एक complete spiritual roadmap दिया।

बीच में, उन्होंने एक key point रखी।

”उद्धव, ये सब रास्ते अच्छे हैं। पर सबसे आसान, सबसे शक्तिशाली, एक है।”

”वो क्या?”

”भक्ति।”

”ज्ञान कठिन है। कई पढ़ने पड़ते हैं। योग और कठिन। साँख्य complex।”

”पर भक्ति में बस एक चीज़ चाहिए, मेरे प्रति surrender। सब अपने आप हो जाता है।”

”और एक specific tip। हमेशा मेरे साथ relationship रखना। कोई भी रूप में, अधिकतर मित्र। हम मित्र की तरह बात कर सकते हैं। यह relationship तुझे सब समय शान्ति देगी।”

उद्धव ने सब सुना। उसके पास कोई और प्रश्न नहीं था।

अंत में, कृष्ण ने एक काम किया।

उन्होंने अपनी पाँव की धूल उठाकर उद्धव के सिर पर रखी।

”अब तू बद्रिकाश्रम जा। हिमालय। वहाँ साधना कर। मेरी कथा सुनाते रहना सब को।”

उद्धव की आँखें भर आईं।

उसने कृष्ण को एक last नज़र से देखा।

फिर उसने अपना सिर झुकाया, और चला गया।

बद्रिकाश्रम की तरफ़।

कथा कहती है, उद्धव अभी भी वहीं है। बद्रिकाश्रम में। साधना में। और हर भक्त को, जो वहाँ जाता है, वो कृष्ण की कथाएँ सुनाता है।

मन्थन

उद्धव गीता भागवतम् का एक पूरा हिस्सा है। शायद भगवद् गीता से बड़ा।

और तरीक़े में अलग।

गीता एक युद्ध-मैदान पर दी गई। अर्जुन को। एक specific संकट के समय। short और intense।

उद्धव गीता एक शान्त वक़्त पर। कृष्ण के आख़िरी दिनों में। एक प्रिय मित्र को। विस्तार से।

और इसका तरीक़ा अलग है। यहाँ कृष्ण कई शास्त्रों को cover करते हैं। कई methods।

पर अंत में, वो एक specific recommendation करते हैं, भक्ति।

क्यों? क्योंकि उन्हें पता है कि अधिकांश लोगों के लिए ज्ञान-योग-साँख्य कठिन हैं। भक्ति सब के लिए accessible।

और एक beautiful बात। कृष्ण उद्धव को साथ ले जाने से मना करते हैं।

क्यों? क्योंकि उद्धव का काम अभी ख़त्म नहीं था।

उन्हें कथा फैलानी थी। ताकि कृष्ण के बाद भी, कृष्ण की कथा रहे।

हम सब अपनी ज़िंदगी में किसी न किसी मिशन के लिए हैं। कोई हमें यहाँ छोड़ गया।

और हमारा काम है, उसकी कथा को आगे ले जाना।

अपने तरीक़े से।