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उद्धव गीता

कथा 58 · भागवतम् की कथाएँ

उद्धव गीता

Krishna’s Last Words
स्कन्ध 11, अध्याय 6-29

अगर एक पंक्ति याद रखनी हो, तो वह यह है।

“जो कुछ मन से सोचा, वाणी से कहा, आँखों से देखा और कानों से सुना जाता है, वह सब नाशवान् है, मायामात्र है। अपनी इन्द्रियों की बागडोर थामकर मन को मुझमें जमाइए, और समदृष्टि से इस पृथ्वी पर विचरिए।”

उद्धव-गीता का बीज।

भागवतम् 11.6-29

गंगा की धार उस दोपहर बहती रही, वैसी ही, जैसी कल बही थी। परीक्षित् देर तक चुप रहे, फिर उन्होंने शुकदेव की ओर देखा।

Painterly classical-Indian color illustration on a sunlit Ganga riverbank: the young King Parikshit, crowned and seated in grief, leans toward the serene white-clad ascetic sage Shukadeva; the wide flowing river and a soft midday sky behind them, reeds and a quiet ghat, two figures only in earnest conversation.

”भगवन्, कल से एक बात मन में बैठी है। हम सब एक न एक दिन उनसे बिछड़ते हैं जिन्हें सब में सर्वाधिक चाहते हैं। मेरे पिता गए, मेरे पितामह गए, और अब मेरी अपनी घड़ी सिर पर है। पर मैं तो उनको कभी देख न पाया। जिसने भगवान् को अपनी आँखों के सामने जिया हो, उनके हाथ से जिसने जल पिया हो, उसके लिए वह विदा कैसी होती होगी? क्या उस पीड़ा का भी कोई उत्तर है?”

शुकदेव कुछ देर गंगा की ओर देखते रहे।

”राजन्, यह पीड़ा भगवान् के अनन्यप्रेमी सखा उद्धव ने सही, और उसी पीड़ा में से जो उपदेश निकला, वह सारी उद्धव-गीता है। पर वह उपदेश पीछे आता है। पहले वह विदा सुनिए, जिसके बिना उपदेश का अर्थ ही नहीं खुलता।”

Sweeping color view of the golden sea-city of Dwarka with gilded palaces, latticed windows and ramparts pressed by rising ocean waves; in the distance Brahma (four-faced), Shankara (with crescent and trident) and assembled devas hover in prayer over the city, the late-afternoon sky heavy, signalling the divine descent of 125 years drawing to its close.

द्वारका में वह दिन आ पहुँचा था जिसकी ओर सारी लीला बहती चली आ रही थी। भगवान् को यदुवंश में अवतार लिए एक सौ पचीस वर्ष बीत चुके थे। एक सौ पचीस वर्ष, राजन्, गोकुल की धूल से लेकर समुद्र-किनारे की इस सुनहरी पुरी तक। कुरुक्षेत्र बीत गया था, यदुवंश फैलकर अपने ही बल के मद से दरकने लगा था, और प्रभास के तट पर एक ब्राह्मण-शाप अपनी घड़ी की राह देख रहा था। ब्रह्मा, शंकर और देवता स्वयं द्वारका आकर प्रार्थना कर गए थे कि अब वे अपने धाम लौट चलें। काम पूरा था। समुद्र की लहरें भी, जान पड़ता था, इस पुरी की दीवारों को कुछ ज़्यादा ही पास से छूने लगी थीं।

उस सुबह भगवान् ने उद्धव को बुलवाया।

उद्धव कोई और नहीं थे। वही यदुवंशी, जो बुद्धि में अनन्य थे, द्वारका की हर सभा में जिनकी मति का लोहा माना जाता था, हर वाद में जो तर्क से जीत पाते थे, और जिन्हें लोग ज्ञानी कहते न थकते थे। पर इस एक मनुष्य के भीतर एक ऐसी जगह थी जिसे उनका सारा ज्ञान कभी छू न पाया, और वह जगह केवल एक श्यामसुन्दर मुख के आगे खुलती थी। आज वही उद्धव भीतर से काँप रहे थे, और जानते न थे क्यों।

”आइए, उद्धव। पास बैठिए।”

उद्धव बैठ गए। भगवान् के स्वर में आज कुछ था जो उन्होंने एक सौ पचीस वर्ष में कभी न सुना था। न वह रण की ललकार, न लीला की हँसी। एक ठहराव था, जैसे कोई बहुत लम्बी यात्रा पर निकलने से पहले अपने घर को आख़िरी बार चुपचाप देख रहा हो।

Inside a Dwarka chamber: the dark-blue four-armed-feeling Krishna in yellow silks, peacock-feather crown, speaks gravely with a stilled, faraway gaze to Uddhava who sits before him, hands joined, breath caught, eyes wide with dawning sorrow; through an open window the sea looms close, hinting at the seventh-day deluge.

”उद्धव, ब्राह्मणों के शाप से यह कुल भीतर-भीतर जल चुका है। आपस की फूट और मद इसे ले डूबेंगे। और जिस दिन मैं इस मर्त्यलोक से पग उठाऊँगा, उसी दिन इसके सारे मंगल भी उठ जाएँगे। आज से सातवें दिन समुद्र इस द्वारका को अपने भीतर ले लेगा। एक भी गली, एक भी छत नहीं बचेगी।”

उद्धव की साँस गले में अटक गई। सातवें दिन। यह सोने की पुरी, ये झरोखे, यह घाट जहाँ समुद्र की हवा सदा बहती रही, सात सूर्योदय बाद पानी के नीचे। ”और आप, प्रभु?”

”मेरा भी जाने का समय है, उद्धव। मेरा काम पूरा हुआ।”

तीन शब्द थे, पर वे उद्धव की छाती पर एक-एक पत्थर की तरह गिरे। उनके हाथ अपने आप जुड़ गए, और उनके मुँह से निकला, बहुत धीरे, ”तो मुझे भी अपने साथ ले चलिए।”

भगवान् ने एक पल उन्हें देखा, फिर मुस्कुराए। पर उस मुस्कान में आज कुछ और भी था।

”नहीं, उद्धव। अभी नहीं। आपको कुछ देर यहीं रुकना है। और फिर सब छोड़कर, हर स्वजन-बन्धु से मोह तोड़कर, मन को मुझमें जमाकर, समदृष्टि से इस पृथ्वी पर स्वच्छन्द विचरना है।”

यहाँ भगवान् ने जो कहा, राजन्, वही उद्धव-गीता का बीज है। उन्होंने उद्धव से कहा कि जो कुछ मन से सोचा जाता है, वाणी से कहा जाता है, आँखों से देखा और कानों से सुना जाता है, वह सब नाशवान् है, सपने का खेल है, मायामात्र है। जिसका मन अशान्त है, उसे ही गुण और दोष का यह भेद घेरता है। ”अपनी सब इन्द्रियों की बागडोर अपने हाथ में ले लीजिए, उद्धव। चित्त की वृत्तियाँ रोक लीजिए। फिर अनुभव कीजिए कि यह सारा जगत् आपके अपने भीतर फैला है, और आपकी आत्मा मुझ सर्वात्मा से एक है, अभिन्न।”

उद्धव सुन रहे थे, और भीतर ही भीतर एक प्रश्न उठ रहा था जिसे वे अभी कह न पाए थे। पर भगवान् कहते रहे, और जो कहते रहे उसी का नाम आगे चलकर उद्धव-गीता पड़ा। यह भागवत के ग्यारहवें स्कन्ध में है, अध्याय छह से उनतीस तक, हज़ार से ऊपर श्लोक। एक पूरा मार्ग, सिरे से सिरे तक।

A story-within illustration: the naked wandering Avadhuta Dattatreya, smiling and serene, seated before King Yadu who questions him; around them small vignettes of his teachers from nature appear, the earth being trodden, blowing wind, the deep ocean, blazing fire, and a pigeon caught in a fowler's net beside its young, evoking the twenty-four gurus.

भगवान् ने उद्धव को एक प्राचीन कथा सुनाई, उस त्रिकालदर्शी अवधूत दत्तात्रेय की, जिनसे एक बार राजा यदु ने पूछा था कि आप कोई कर्म तो करते नहीं, फिर बालक-सी निर्भयता और इतनी निपुण बुद्धि कहाँ से पाई। अवधूत ने हँसकर कहा था कि उन्होंने इस संसार में चौबीस गुरु बनाए हैं। पृथ्वी से धैर्य सीखा, जो रौंदी जाकर भी सहती रहती है। वायु से सीखा कि विषयों के बीच रहकर भी उनमें लिपटना नहीं। समुद्र से गम्भीरता, अग्नि से वह रूप जो हर वस्तु को ग्रहण कर के भी अलिप्त रहता है। और कबूतर से, जो अपने बच्चों के मोह में फँसकर जाल में जा गिरा, यह सीखा कि स्नेह की डोर ही सब में महीन फाँस है। चौबीस गुरु, और हर गुरु एक चुप कर देने वाली बात।

फिर भगवान् ने वह हंस-गीत सुनाया, वह उपदेश जो उन्होंने किसी प्राचीन कल्प में हंस का रूप धरकर सनकादि ऋषियों को दिया था, जब उन ऋषियों ने पूछा था कि मन ही जब विषयों से बँधा है, तो वही मन मुक्त कैसे हो। उन्होंने साँख्य की गुत्थियाँ खोलीं, योग की विधि बताई, ज्ञान और वैराग्य का ताना-बाना सुलझाया, प्रकृति के तीनों गुणों का सारा खेल उघाड़कर रख दिया।

और फिर, इतने सारे मार्ग दिखाकर, भगवान् एक पल रुके, और उँगली एक ही पर रखी।

Krishna in radiant blue and gold, one finger raised to point to a single path, his face gentle and resolved, teaching the attentive Uddhava; softly suggested behind them the harder roads of jnana, yoga and sankhya fade while a glowing path of loving surrender, bhakti, shines clearest, intimate twilight chamber light.

”ये सब रास्ते सच्चे हैं, उद्धव। पर ज्ञान का मार्ग कठिन है, उसमें जीवन-भर छानना और समझना पड़ता है। योग उससे भी कठिन। साँख्य की पहेलियाँ और गहरी। पर भक्ति में बस एक ही बात चाहिए, मुझमें मन का पूरा समर्पण। शेष सब अपने आप सध जाता है।”

”और एक बात याद रखिए, उद्धव। मुझसे कोई न कोई नाता बनाए रखिए, किसी भी रूप में, मित्र की तरह ही सही। मित्र से तो मन की हर बात कही जा सकती है। यही नाता आपको हर घड़ी थामे रहेगा।”

यहाँ तक भगवान् कह चुके थे। और यहीं, राजन्, वह प्रश्न जो उद्धव के भीतर इतनी देर से दबा था, बाँध तोड़कर बाहर आ गया। पर वह प्रश्न नहीं था। वह एक पुकार थी।

उद्धव भगवान् के चरणों पर अपना सिर रखे बैठे थे। उन्होंने सिर उठाया। उनकी ठुड्डी काँप रही थी, और कण्ठ में जैसे कोई गाँठ बँध गई हो जिसके आर-पार आवाज़ बड़ी मुश्किल से निकल रही थी।

”योगेश्वर,” वे बोले, ”आप सर्वशक्तिमान् हैं। आप चाहते तो ब्राह्मणों के उस शाप को एक पल में मिटा सकते थे। पर आपने नहीं मिटाया। इसी से मैं समझ गया कि आप अब इस कुल को समेटकर, इस लोक को छोड़कर अवश्य ही चले जाएँगे।”

उनका गला रुँध गया। फिर, मानो किसी बहुत भीतरी जगह से शब्द खींचकर लाते हों, उन्होंने कहा, ”पर सुनिए, प्रभु। यह जो मायामात्र जगत् है, इसे जीत लेने की बात आप मुझे समझाते हैं। बड़े-बड़े ऋषि, जो दिगम्बर रहकर, आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत साधकर, ऊर्ध्व-रेता होकर तपते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं, उनके हृदय निर्मल हो जाते हैं, और वे आपके ब्रह्म-धाम में चले जाते हैं। पर मैं, केशव? मैं तो वह नहीं हूँ। मैं वह नहीं हो सकता।”

उनकी आँखों से अब बूँदें गिरने लगी थीं, पर वे रुके नहीं।

”हम तो उठते-बैठते आपके साथ रहे, प्रभु। सोते-जागते आपके साथ। चलते-फिरते आपके साथ। हमने आपके साथ स्नान किया, आपके साथ खेले, एक थाली में आपके साथ भोजन किया। कहाँ तक गिनाऊँ। हमारी एक-एक साँस आपके साथ बीती। और अब आप कहते हैं कि माया को जीत लो। मैं उन ऋषियों के तप के बल पर इसे कैसे जीतूँ, जिनके पास आपकी ये स्मृतियाँ नहीं?”

उन्होंने भगवान् के मुख की ओर देखा, और उस देखने में एक प्यासे आदमी की प्यास थी।

Emotional color close scene: Uddhava kneeling at Krishna's feet, tears falling, gazing up with a thirsting devotion, wearing Krishna's used flower garland, marked with the sandal-paste Krishna had worn, draped in his master's cloth; Krishna seated calmly above, dark and beautiful with curled locks and a faint sidelong smile, the bond of friend and devotee made visible.

”हम इसे और ही तरह जीतेंगे, प्रभु। हम आपके भक्त, हम आपके जूठन खाने वाले सेवक, हम आपकी पहनी हुई बासी माला पहनकर, आपका उतारा चन्दन लगाकर, आपके वस्त्र ओढ़कर इस माया को जीतेंगे। हम आपके गुणों की चर्चा करेंगे, आपकी मनुष्य-सी लीलाओं को बार-बार कहेंगे, और जो आपने कहा और किया, उसका स्मरण-कीर्तन करते रहेंगे। आपकी वह चाल, वे घुँघराली अलकें, वह तिरछी चितवन, वह हँसी जिसमें परिहास घुला रहता था, इन्हीं की याद में हम डूबे रहेंगे। बस इसी से, और केवल इसी से, हम इस दुस्तर माया को पार कर जाएँगे।”

एक पल को वे रुके। फिर बहुत धीमे, मानो सब में भीतर की बात अन्त में आती है, उन्होंने कहा, ”हमें माया का डर नहीं है, प्रभु। डर है तो केवल आपके वियोग का। आप हमें छोड़िए मत। मुझे भी अपने साथ ले चलिए।”

द्वारका के उस कक्ष में बड़ी देर तक कोई कुछ न बोला। बाहर समुद्र की लहर एक बार किनारे से टकराई, और लौट गई। भगवान् ने हाथ बढ़ाकर उद्धव के काँपते कन्धे पर रखा। उनका स्पर्श गरम था, और जीवित था, और उद्धव ने उस क्षण उस स्पर्श को अपनी हड्डियों तक उतार लिया, क्योंकि वे जानते थे कि गिनने को अब सात ही दिन बचे हैं।

भगवान् ने कुछ देर बाद, बहुत कोमल स्वर में कहा, ”उद्धव, इसीलिए तो मैंने आपको रोका। जो जितना खोता है, वही उसे अधिक ठीक याद रखता है। मेरी कथा किसी एक कण्ठ में बची रहनी चाहिए, और वह कण्ठ आपका है। आपके भीतर जो यह वियोग है, यही आपको मेरा परम सच्चा वक्ता बनाएगा।”

उद्धव कुछ न कह सके। उन्होंने केवल भगवान् के मुख को इस तरह देखा, जैसे एक-एक रेखा को, भौंह की हर बाँक को, होंठ के उस कोने को जहाँ हँसी बैठती थी, सदा के लिए भीतर बसा लेना चाहते हों।

Tender farewell: Krishna bending to lift dust from his own feet and pressing it onto the bowed forehead of Uddhava as a parting blessing; behind, a path leads from golden sea-side Dwarka toward the rising white snow-peaks of the Himalaya and Badrikashrama, the doomed city below and cold mountain heights ahead.

अन्त में भगवान् ने अपने चरणों की धूल उठाई और उद्धव के माथे पर रख दी।

”अब आप बद्रिकाश्रम जाइए, हिमालय की ओर। वहाँ साधना कीजिए, और जहाँ भी जाएँ, मेरी कथा सुनाते रहिएगा।”

उद्धव ने माथा झुकाया, परिक्रमा की, और मुड़ गए। द्वार तक जाकर वे एक बार और रुके, पर पीछे नहीं देखा। यदि देख लेते तो शायद पग आगे न बढ़ते।

बद्रिकाश्रम की ओर। हर पग पर पीछे छूटती द्वारका, जिसे अब सातवें दिन समुद्र निगल जाने वाला था, और सामने हिमालय की चढ़ती हुई ठंडी सफ़ेदी। कहते हैं, उद्धव आज भी वहीं हैं, उस बर्फ़ की चुप्पी में, साधना में लीन। और जो भी भक्त उस ऊँचाई तक पहुँचता है, उद्धव उसे भगवान् की कथाएँ सुनाते हैं, उसी श्यामसुन्दर मुख की, जिसे वे आख़िरी बार आँखों में भरकर चले आए थे।

मन्थन

यहाँ शुकदेव कुछ देर रुके। परीक्षित् बहुत देर चुप बैठे रहे, फिर बोले, ”भगवन्, उद्धव ने वह नहीं माँगा जो मैं माँगता। उन्होंने मुक्ति नहीं माँगी। उन्होंने साथ रहना माँगा।”

”हाँ, राजन्।”

”और भगवान् ने वही नहीं दिया।”

शुकदेव ने सिर हिलाया। ”भगवान् ने उससे बड़ा कुछ दिया। उन्होंने उद्धव को अपनी कथा सौंप दी। सोचिए, राजन्, एक व्यक्ति को वह तप करना पड़ता है जो दिगम्बर ऋषि आजीवन करते हैं, और दूसरे को बस इतना कि वह अपने प्रियतम की हँसी याद रखे। उद्धव ने यही चुना। जिस मुख को वे एक सौ पचीस वर्ष से जानते थे, उसी की याद को उन्होंने अपना मार्ग बना लिया।”

परीक्षित् ने धीरे से पूछा, ”पर इतनी याद, भगवन्, तो उतनी ही गहरी पीड़ा भी होगी।”

शुकदेव की आँखों में वह शान्ति लौट आई। वे तुरन्त कुछ न बोले। गंगा बह रही थी, और दूर किसी वृक्ष पर एक पक्षी एक बार बोला, फिर शान्त हो गया।

”आपने स्वयं कह दिया, राजन्,” वे अन्त में बोले। ”उद्धव को जो वियोग मिला, वही उन्हें भगवान् का परम सच्चा वक्ता बना गया। जो खोता है, वही उसे अधिक ठीक याद रखता है। बद्रिकाश्रम की उस बर्फ़ में आज जो उद्धव बैठे हैं, उनके पास भगवान् नहीं हैं। उनके पास केवल भगवान् की याद है। और देखिए, उसी याद में से यह सारा उपदेश आप तक पहुँचा है।”

परीक्षित् कुछ देर कुछ न कह सके।

”तो जिसे आप मुझे सुना रहे हैं, भगवन्, वह भी किसी के पीछे छूट जाने से बची हुई कथा है।”

शुकदेव मुस्कुराए, और कुछ न कहा। दिन का प्रकाश जल पर थोड़ा और झुक गया था, और गंगा उसी तरह बहती रही, जैसे कोई बात कहकर भी उसे अनकहा छोड़ देता है।

साहित्यिक-संदर्भ

उद्धव-गीता श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध में है, अध्याय छह से उनतीस तक। यह भगवान् श्रीकृष्ण का अन्तिम उपदेश है, स्वधाम लौटने से पहले अपने अनन्यप्रेमी सखा और सेवक उद्धव को दिया गया। भगवद्गीता और उद्धव-गीता दोनों ही श्रीकृष्ण के मुख से निकले उपदेश हैं, मगर एक रण-क्षेत्र में एक योद्धा को मिली, और दूसरी शान्ति के समय एक प्रिय भक्त को, बिछड़ने की घड़ी में। इसी से परम्परा में इन दोनों की तुलना की जाती है।

इस प्रसंग के आरम्भ में भागवत बताता है कि भगवान् को यदुवंश में अवतार लिए एक सौ पचीस वर्ष बीत चुके थे (11.6.25), और कि उनके धाम लौटने पर सातवें दिन समुद्र द्वारका को डुबो देगा (11.7.3)। उद्धव-गीता में साँख्य, योग, ज्ञान और भक्ति, चारों मार्ग खोलकर दिखाए गए हैं, पर भक्ति को सुगम और सहज कहा गया है, और इसी कारण इसे प्रायः भागवत का सार कहा जाता है। राजा यदु और अवधूत दत्तात्रेय के संवाद-रूप में आई चौबीस गुरुओं की कथा, तथा हंस-रूप में सनकादि ऋषियों को दिया गया हंस-गीत भी इसी प्रसंग के भीतर आते हैं। श्रीधर स्वामी की भावार्थ-दीपिका इस अंश की परम्परागत व्याख्या का आधार है।