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उद्धव गीता

द्वारका में वह दिन आ पहुँचा था जिसकी ओर सारी लीला बहती चली आ रही थी। भगवान् को यदुवंश में अवतार लिए एक सौ पचीस वर्ष बीत चुके थे। एक सौ पचीस वर्ष, राजन्, गोकुल की धूल से लेकर समुद्र-किनारे की इस सुनहरी पुरी तक। कुरुक्षेत्र बीत गया था, यदुवंश फैलकर अपने ही बल के मद से दरकने लगा था, और प्रभास के तट पर एक ब्राह्मण-शाप अपनी घड़ी की राह देख रहा था। ब्रह्मा, शंकर और देवता स्वयं द्वारका आकर प्रार्थना कर गए थे कि अब वे अपने धाम लौट चलें। काम पूरा था। समुद्र की लहरें भी, जान पड़ता था, इस पुरी की दीवारों को कुछ ज़्यादा ही पास से छूने लगी थीं।
उस सुबह भगवान् ने उद्धव को बुलवाया।
उद्धव वही यदुवंशी थे जो बुद्धि में अनन्य थे, द्वारका की हर सभा में जिनकी मति का लोहा माना जाता था, हर वाद में जो तर्क से जीत पाते थे, और जिन्हें लोग ज्ञानी कहते न थकते थे। पर इस एक मनुष्य के भीतर एक ऐसी जगह थी जिसे उनका सारा ज्ञान कभी छू न पाया, और वह जगह केवल एक श्यामसुन्दर मुख के आगे खुलती थी। आज वही उद्धव भीतर से काँप रहे थे, और जानते न थे क्यों।
“आइए, उद्धव। पास बैठिए।”
उद्धव बैठ गए। भगवान् के स्वर में आज एक अनसुना ठहराव था। रण की ललकार और लीला की हँसी, दोनों उससे विदा थीं। एक ठहराव था, जैसे कोई बहुत लम्बी यात्रा पर निकलने से पहले अपने घर को आख़िरी बार चुपचाप देख रहा हो।

“उद्धव, ब्राह्मणों के शाप से यह कुल भीतर-भीतर जल चुका है। आपस की फूट और मद इसे ले डूबेंगे। और जिस दिन मैं इस मर्त्यलोक से पग उठाऊँगा, उसी दिन इसके सारे मंगल भी उठ जाएँगे। मेरे इस लोक से चले जाने पर समुद्र इस द्वारका को अपने भीतर ले लेगा। समुद्र उसकी हर गली और छत को ढक लेगा।”
उद्धव की साँस गले में अटक गई। द्वारका भी भगवान् के प्रस्थान के बाद समुद्र में समा जाएगी। “और आप, प्रभु?”
“मेरा भी जाने का समय है, उद्धव। मेरा काम पूरा हुआ।”
तीन शब्द थे, पर वे उद्धव की छाती पर एक-एक पत्थर की तरह गिरे। उनके हाथ अपने आप जुड़ गए, और उनके मुँह से निकला, बहुत धीरे, “तो मुझे भी अपने साथ ले चलिए।”
भगवान् ने एक पल उन्हें देखा, फिर मुस्कुराए। पर उस मुस्कान में आज कुछ और भी था।
“आपको कुछ देर यहीं रुकना है। फिर स्वजन-बन्धुओं का मोह छोड़कर, मन को मुझमें स्थिर कीजिए और समदृष्टि से इस पृथ्वी पर स्वच्छन्द विचरिए।”
यहाँ भगवान् ने जो कहा, राजन्, वही उद्धव-गीता का बीज है। उन्होंने उद्धव से कहा कि जो कुछ मन से सोचा जाता है, वाणी से कहा जाता है, आँखों से देखा और कानों से सुना जाता है, वह सब नाशवान् है, सपने का खेल है, मायामात्र है। जिसका मन अशान्त है, उसे ही गुण और दोष का यह भेद घेरता है। “अपनी सब इन्द्रियों की बागडोर अपने हाथ में ले लीजिए, उद्धव। चित्त की वृत्तियाँ रोक लीजिए। फिर अनुभव कीजिए कि यह सारा जगत् आपके अपने भीतर फैला है, और आपकी आत्मा मुझ सर्वात्मा से एक है, अभिन्न।”
उद्धव सुन रहे थे, और भीतर ही भीतर एक प्रश्न उठ रहा था जिसे वे अभी कह न पाए थे। पर भगवान् कहते रहे, और जो कहते रहे उसी का नाम आगे चलकर उद्धव-गीता पड़ा। यह भागवत के ग्यारहवें स्कन्ध में है, अध्याय छह से उनतीस तक, हज़ार से ऊपर श्लोक। एक पूरा मार्ग, सिरे से सिरे तक।

भगवान् ने उद्धव को एक प्राचीन कथा सुनाई, उस त्रिकालदर्शी अवधूत दत्तात्रेय की, जिनसे एक बार राजा यदु ने पूछा था कि आप कोई कर्म तो करते नहीं, फिर बालक-सी निर्भयता और इतनी निपुण बुद्धि कहाँ से पाई। अवधूत ने हँसकर कहा था कि उन्होंने इस संसार में चौबीस गुरु बनाए हैं। पृथ्वी से धैर्य सीखा, जो रौंदी जाकर भी सहती रहती है। वायु से सीखा कि विषयों के बीच रहकर भी उनमें लिपटना नहीं। समुद्र से गम्भीरता, अग्नि से वह रूप जो हर वस्तु को ग्रहण कर के भी अलिप्त रहता है। और कबूतर से, जो अपने बच्चों के मोह में फँसकर जाल में जा गिरा, यह सीखा कि स्नेह की डोर ही सब में महीन फाँस है। चौबीस गुरु, और हर गुरु एक चुप कर देने वाली बात।
फिर भगवान् ने वह हंस-गीत सुनाया, वह उपदेश जो उन्होंने किसी प्राचीन कल्प में हंस का रूप धरकर सनकादि ऋषियों को दिया था, जब उन ऋषियों ने पूछा था कि मन ही जब विषयों से बँधा है, तो वही मन मुक्त कैसे हो। उन्होंने साँख्य की गुत्थियाँ खोलीं, योग की विधि बताई, ज्ञान और वैराग्य का ताना-बाना सुलझाया, प्रकृति के तीनों गुणों का सारा खेल उघाड़कर रख दिया।
और फिर, इतने सारे मार्ग दिखाकर, भगवान् एक पल रुके, और उँगली एक ही पर रखी।

“ये सब रास्ते सच्चे हैं, उद्धव। पर ज्ञान का मार्ग कठिन है, उसमें जीवन-भर छानना और समझना पड़ता है। योग उससे भी कठिन। साँख्य की पहेलियाँ और गहरी। पर भक्ति में बस एक ही बात चाहिए, मुझमें मन का पूरा समर्पण। शेष सब अपने आप सध जाता है।”
“”
यहाँ तक भगवान् कह चुके थे। और यहीं, राजन्, वह प्रश्न जो उद्धव के भीतर इतनी देर से दबा था, बाँध तोड़कर बाहर आ गया। पर वह प्रश्न नहीं था। वह एक पुकार थी।
उद्धव भगवान् के चरणों पर अपना सिर रखे बैठे थे। उन्होंने सिर उठाया। उनकी ठुड्डी काँप रही थी, और कण्ठ में जैसे कोई गाँठ बँध गई हो जिसके आर-पार आवाज़ बड़ी मुश्किल से निकल रही थी।
“योगेश्वर,” वे बोले, “आप सर्वशक्तिमान् हैं। आप चाहते तो ब्राह्मणों के उस शाप को एक पल में मिटा सकते थे। पर आपने नहीं मिटाया। इसी से मैं समझ गया कि आप अब इस कुल को समेटकर, इस लोक को छोड़कर अवश्य ही चले जाएँगे।”
उनका गला रुँध गया। फिर, मानो किसी बहुत भीतरी जगह से शब्द खींचकर लाते हों, उन्होंने कहा, “पर सुनिए, प्रभु। यह जो मायामात्र जगत् है, इसे जीत लेने की बात आप मुझे समझाते हैं। बड़े-बड़े ऋषि, जो दिगम्बर रहकर, आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत साधकर, ऊर्ध्व-रेता होकर तपते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं, उनके हृदय निर्मल हो जाते हैं, और वे आपके ब्रह्म-धाम में चले जाते हैं। पर मैं, केशव? मैं तो वह नहीं हूँ। मैं वह नहीं हो सकता।”
उनकी आँखों से अब बूँदें गिरने लगी थीं, पर वे रुके नहीं।
“हम तो उठते-बैठते आपके साथ रहे, प्रभु। सोते-जागते आपके साथ। चलते-फिरते आपके साथ। हमने आपके साथ स्नान किया, आपके साथ खेले, एक थाली में आपके साथ भोजन किया। कहाँ तक गिनाऊँ। हमारी एक-एक साँस आपके साथ बीती। और अब आप कहते हैं कि माया को जीत लो। मैं उन ऋषियों के तप के बल पर इसे कैसे जीतूँ, जिनके पास आपकी ये स्मृतियाँ नहीं?”
उन्होंने भगवान् के मुख की ओर देखा, और उस देखने में एक प्यासे आदमी की प्यास थी।

“हम इसे और ही तरह जीतेंगे, प्रभु। हम आपके भक्त, हम आपके जूठन खाने वाले सेवक, हम आपकी पहनी हुई बासी माला पहनकर, आपका उतारा चन्दन लगाकर, आपके वस्त्र ओढ़कर इस माया को जीतेंगे। हम आपके गुणों की चर्चा करेंगे, आपकी मनुष्य-सी लीलाओं को बार-बार कहेंगे, और जो आपने कहा और किया, उसका स्मरण-कीर्तन करते रहेंगे। आपकी वह चाल, वे घुँघराली अलकें, वह तिरछी चितवन, वह हँसी जिसमें परिहास घुला रहता था, इन्हीं की याद में हम डूबे रहेंगे। बस इसी से, और केवल इसी से, हम इस दुस्तर माया को पार कर जाएँगे।”
एक पल को वे रुके। फिर बहुत धीमे, मानो सब में भीतर की बात अन्त में आती है, उन्होंने कहा, “हमें माया का डर नहीं है, प्रभु। डर है तो केवल आपके वियोग का। आप हमें छोड़िए मत। मुझे भी अपने साथ ले चलिए।”
उद्धव के प्रश्नों का उत्तर देते हुए श्रीकृष्ण ने अध्याय 7 से 29 तक आत्मा, माया, कर्म, योग, ज्ञान और भक्ति का विस्तार से उपदेश दिया। संवाद के अन्त में उद्धव का मोह मिट चुका था, यद्यपि विदा की घड़ी में उनकी आँखों से आँसू बहते रहे।
उद्धव ने बार-बार भगवान् के चरणों पर सिर रखा, उनकी परिक्रमा की और उनकी दी हुई खड़ाऊँ अपने सिर पर धारण कर ली। फिर वे बद्रिकाश्रम की ओर चले। वहाँ अलकनन्दा में स्नान और उसका जलपान करके उन्होंने वृक्ष की छाल पहनी, वन से मिलने वाले आहार पर रहे और शीत-उष्ण को समभाव से सहा।
उन्होंने इन्द्रियों और प्राण को संयमित रखा, बुद्धि को स्थिर किया और श्रीकृष्ण से सुने उपदेश में वाणी तथा मन को लगा दिया। भागवत का समापन स्पष्ट है: भगवान् की आज्ञा के अनुसार साधना करके उद्धव ने उनकी परम गति प्राप्त की।
साहित्यिक-संदर्भ
उद्धव-गीता श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध में है, अध्याय छह से उनतीस तक। यह भगवान् श्रीकृष्ण का अन्तिम उपदेश है, स्वधाम लौटने से पहले अपने अनन्यप्रेमी सखा और सेवक उद्धव को दिया गया। भगवद्गीता और उद्धव-गीता दोनों ही श्रीकृष्ण के मुख से निकले उपदेश हैं, मगर एक रण-क्षेत्र में एक योद्धा को मिली, और दूसरी शान्ति के समय एक प्रिय भक्त को, बिछड़ने की घड़ी में। इसी से परम्परा में इन दोनों की तुलना की जाती है।
इस प्रसंग के आरम्भ में भागवत बताता है कि भगवान् को यदुवंश में अवतार लिए एक सौ पचीस वर्ष बीत चुके थे (11.6.25), और कि भगवान् के प्रस्थान के बाद समुद्र द्वारका को अपने भीतर ले लेगा (11.31.23)। उद्धव-गीता में साँख्य, योग, ज्ञान और भक्ति, चारों मार्ग खोलकर दिखाए गए हैं, पर भक्ति को सुगम और सहज कहा गया है, और इसी कारण इसे प्रायः भागवत का सार कहा जाता है। राजा यदु और अवधूत दत्तात्रेय के संवाद-रूप में आई चौबीस गुरुओं की कथा, तथा हंस-रूप में सनकादि ऋषियों को दिया गया हंस-गीत भी इसी प्रसंग के भीतर आते हैं। श्रीधर स्वामी की भावार्थ-दीपिका इस अंश की परम्परागत व्याख्या का आधार है।
यही कथा वहाँ भी
- भगवद् गीता
भगवद्गीता: कुरुक्षेत्र में अर्जुन को उपदेश (भीष्म पर्व) - अनुगीता · अश्वमेध पर्व
अनुगीता: युद्ध के बाद अर्जुन को पुनः उपदेश (अश्वमेध पर्व)