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रन्तिदेव की करुणा

कथा 49 · भागवतम् की कथाएँ

रन्तिदेव की करुणा

अड़तालीस दिन की भूख, और एक चुल्लू पानी
स्कन्ध 9, अध्याय 21

रन्तिदेव कोई साधारण दानी न थे। उनके दरबार में आया हुआ कभी ख़ाली हाथ नहीं लौटा। पर उनके मन में देने का कोई गर्व न था, जैसे कोई हाथ अपने ही शरीर को भोजन कराते हुए एहसान नहीं जताता।

वे संग्रह और ममता से रहित थे। दैववश जो कुछ आता, उसी का उपभोग करते, और जो कुछ माँगने वाले के आगे रख देते, इसलिए दिनोंदिन उनकी पूँजी घटती जाती।

जो कुछ मिल जाता उसे भी वे बाँट देते और स्वयं भूखे रह जाते। बड़े धैर्यशाली थे, और अपने परिवार के साथ इस तरह दुख भी सह लेते।

एक बार ऐसे दिन आए कि लगातार अड़तालीस दिन उन्हें पीने को जल तक न मिला। उनकी कलाइयाँ पतली पड़ती गईं, गाल बैठ गए, पर आँखों की वह शान्ति वैसी की वैसी रही।

उनचासवें दिन प्रातःकाल उन्हें कहीं से थोड़ा-सा भोजन मिला।

थोड़ा-सा घी, खीर, हलवा, और एक चुल्लू भर ठंडा पानी।

अड़तालीस दिन की भूख-प्यास के बाद जैसे ही रन्तिदेव का परिवार भोजन के लिए बैठता है, द्वार पर एक भूखा ब्राह्मण आ खड़ा होता है।
अड़तालीस दिन की भूख-प्यास के बाद जैसे ही रन्तिदेव का परिवार भोजन के लिए बैठता है, द्वार पर एक भूखा ब्राह्मण आ खड़ा होता है।

रन्तिदेव अपने परिवार के साथ भोजन के सामने बैठ गए। उनका परिवार बड़े संकट में था, भूख और प्यास के मारे वे सब काँप रहे थे। वे पहला कौर उठाने ही वाले थे।

उसी क्षण द्वार पर एक छाया आ खड़ी हुई। एक ब्राह्मण, धूल में सना, थका, भूख से लड़खड़ाता।

“हे राजन्, मैं भूखा हूँ। मुझे कुछ खाने को दीजिए।”

रन्तिदेव हर प्राणी में भगवान् के दर्शन करते हुए अपना बचा हुआ भोजन एक भूखे शूद्र अतिथि को भी बाँट देते हैं।
रन्तिदेव हर प्राणी में भगवान् के दर्शन करते हुए अपना बचा हुआ भोजन एक भूखे शूद्र अतिथि को भी बाँट देते हैं।

रन्तिदेव हर प्राणी में श्रीभगवान् के ही दर्शन करते थे। उन्होंने बड़ी श्रद्धा और आदर के साथ उसी अन्न में से एक भाग उठाकर ब्राह्मण को सौंप दिया।

ब्राह्मण भोजन करके आशीष देता हुआ चला गया।

रन्तिदेव ने बचा हुआ भोजन फिर अपनी ओर खिसकाया। तभी द्वार पर दूसरा अतिथि आ खड़ा हुआ, एक शूद्र।

“राजन्, मुझे भी कुछ खाने को मिल जाए।”

रन्तिदेव ने भगवान् का स्मरण करते हुए उस बचे हुए अन्न में से कुछ भाग उसके हाथ में रख दिया। वह भी तृप्त होकर लौट गया।

अब थाली में जो थोड़ा-सा बचा था, उसे उन्होंने अपनी ओर सरकाया ही था कि एक और अतिथि आ पहुँचा, अपने कुत्तों के साथ।

“राजन्, मैं और मेरे ये कुत्ते बहुत भूखे हैं। हमें कुछ खाने को दीजिए।”

थाली में बचा अन्न रन्तिदेव ने एक भूखे शूद्र को दिया, और तभी अपने कुत्तों सहित एक और अतिथि द्वार पर आ पहुँचा।
थाली में बचा अन्न रन्तिदेव ने एक भूखे शूद्र को दिया, और तभी अपने कुत्तों सहित एक और अतिथि द्वार पर आ पहुँचा।

रन्तिदेव ने अत्यन्त आदरभाव से जो कुछ बचा था, सब-का-सब उसे दे दिया, और भगवन्मय होकर उन कुत्तों और उनके स्वामी के रूप में आए हुए भगवान् को नमस्कार किया।

अब केवल वह एक चुल्लू पानी बचा था, और वह भी केवल एक ही मनुष्य के पीने भर का।

उनका गला सूखा हुआ था, होंठ पपड़ा गए थे। वे उसी जल को आपस में बाँटकर पीना ही चाहते थे।

तभी एक और स्वर द्वार से आया। एक चांडाल, हाँफता हुआ।

“मैं अत्यन्त नीच हूँ, राजन्। मुझे जल पिला दीजिए। मेरा कंठ सूख रहा है।”

चांडाल की वह करुणापूर्ण वाणी, जिसके उच्चारण में भी वह अत्यन्त कष्ट पा रहा था, सुनकर रन्तिदेव दया से अत्यन्त संतप्त हो उठे। उन्होंने एक बार उस जल को देखा, जिस पर उनके प्राण टिके थे, और एक बार उस प्यासे को।

तभी उनके सूखे होंठ हिले, और एक प्रार्थना उठी, माँगने के लिए नहीं, जैसे भीतर से अपने आप बह निकली हो।

“मैं भगवान् से आठों सिद्धियों से युक्त परम गति नहीं चाहता। और तो क्या, मैं मोक्ष की भी कामना नहीं करता।”

“मैं चाहता हूँ तो केवल यही कि मैं समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित होकर उनका सारा दुख स्वयं सह लूँ, जिससे किसी भी प्राणी को दुख न रहे।”

“यह दीन प्राणी जल पीकर जी जाए, इसके जीवन की रक्षा हो जाए, और मेरी भूख-प्यास की पीड़ा, शरीर की शिथिलता, दीनता, ग्लानि, शोक, विषाद और मोह, ये सब-के-सब इसी के साथ शान्त हो जाएँ। बस मैं इतने से ही सुखी हो जाऊँ।”

अड़तालीस दिन के उपवास के बाद भी रन्तिदेव ने अपना सारा जल प्यासे चांडाल को उँडेल दिया, स्वयं जल बिना ही।
अड़तालीस दिन के उपवास के बाद भी रन्तिदेव ने अपना सारा जल प्यासे चांडाल को उँडेल दिया, स्वयं जल बिना ही।

इतना कहकर, जल के बिना स्वयं प्राण त्यागते हुए भी, उन्होंने सारा जल उस चांडाल के हाथों में उँडेल दिया। स्वभाव से ही इतने करुणापूर्ण थे कि अपने को रोक न सके।

अड़तालीस दिन के उपवास के बाद, अब उनके पास अन्न और जल सहित कुछ भी नहीं था। केवल खाली हथेलियाँ और एक प्यासे की तृप्ति।

वे जो अतिथि आए थे, सब भगवान् की रची हुई माया के ही भिन्न-भिन्न रूप थे। परीक्षा पूरी हो जाने पर अपने भक्तों की अभिलाषा पूर्ण करने वाले तीनों लोकों के स्वामी, ब्रह्मा, विष्णु और महेश, उनके सामने प्रकट हो गए।

रन्तिदेव ने उनके चरणों में नमस्कार किया। उन्हें कुछ लेना तो था नहीं। भगवान् की कृपा से वे आसक्ति और स्पृहा से भी रहित हो गए थे, और परम प्रेममय भक्तिभाव से अपने मन को भगवान् वासुदेव में तन्मय कर दिया। कुछ भी नहीं माँगा।

उन्हें भगवान् के सिवा और किसी भी वस्तु की इच्छा न थी। उन्होंने अपने मन को पूर्णरूप से भगवान् में लगा दिया, और त्रिगुणमयी माया जागने पर स्वप्न-दृश्य के समान नष्ट हो गई।

रन्तिदेव के अनुयायी भी उनके संग के प्रभाव से योगी हो गए, और सब भगवान् के ही आश्रित होकर नारायण-परायण परम भक्त बन गए। रन्तिदेव की आँखों में राज-सिंहासन की चमक नहीं, हर भूखे और हर प्यासे के लिए वही पुरानी पुकार बसी रहती थी।

साहित्यिक-संदर्भ

रन्तिदेव की कथा श्रीमद्भागवत के नवम स्कन्ध, इक्कीसवें अध्याय में है। अड़तालीस दिन के उपवास के बाद उन्हें मिला थोड़ा-सा भोजन और जल वे एक-एक कर भूखे-प्यासे अतिथियों को दे देते हैं। ‘न त्वहं कामये राज्यं’ (9.21.12) उनका प्रसिद्ध स्तवन है, जिसमें वे राज्य, स्वर्ग और मोक्ष तक की कामना छोड़कर केवल दुखी प्राणियों के कष्ट के निवारण की प्रार्थना करते हैं।

दर्शन-दृष्टि

कथा का एक सूक्ष्म पर मार्मिक संकेत यह है कि अंतिम घड़ी में आए अतिथियों में एक चांडाल भी है, और रन्तिदेव उसे भी उसी प्रसन्नता और आदर से जल देते हैं जैसे पहले ब्राह्मण को भोजन दिया था। उनकी करुणा जन्म और कुल के भेद नहीं जानती।

यही इस श्लोक की गहराई है, कि दुखी प्राणी का दुख ही रन्तिदेव को दिखता है, उसका वर्ण या रूप नहीं। भागवत की दृष्टि में करुणा वही सच्ची है जो किसी को पराया नहीं मानती।

यह कथा आज भी क्यों ठहरती है

रन्तिदेव अड़तालीस दिन भूखे रहे, और जब अंत में भोजन मिला, अपने ही टूटते शरीर से पहले उन्हें द्वार पर आए भूखे की पीड़ा दिखी। जो अपने आख़िरी कौर और आख़िरी घूँट तक को किसी और की भूख और प्यास के आगे रख दे, वही करुणा रन्तिदेव की है। आज भी जो अकाल और विपत्ति में अपना पेट काटकर दूसरों को खिलाते हैं, उनमें वही पुरानी पुकार बहती है।

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