अन्तिम सौ नाम
नाम नौ सौ एक से एक हज़ार तक। श्रीशिवा, शिवशक्त्यैक्यरूपिणी, ललिताम्बिका।

पाठ जहाँ से उठा था, वहीं लौट कर पूरा होता है। आरम्भ हुआ था ‘श्रीमाता’ से, और अब अन्त आता है ‘ललिताम्बिका’ पर। दोनों छोरों पर वही माँ खड़ी हैं, और बीच के सहस्र नाम उन्हीं के असंख्य रूप दिखा कर फिर माँ पर लौट आते हैं। इस अन्तिम सौ में देवी का स्वरूप उस बिन्दु पर सिमट आता है जहाँ सारी विभूतियाँ एक में विलीन हो जाती हैं।
अन्तिम तीन नाम विशेष ध्यान योग्य हैं। ‘श्रीशिवा’, देवी जो स्वयं मंगलमय शिव-स्वरूपा हैं। ‘शिवशक्त्यैक्यरूपिणी’, शिव और शक्ति की एकता का साकार स्वरूप, जिसमें समूचे श्रीविद्या-दर्शन का सूत्र बैठा है। और अन्त में ‘ललिताम्बिका’, ललिता-माँ, पूरे स्तोत्र का अधिष्ठात्री नाम। नाम-माला की यह संरचना संगीत के ‘सम’ की तरह चलती है, जहाँ आवर्तन वहीं पूरा होता है जहाँ से उठा था, और साधक के लिए समापन ही अगले आवर्तन का आरम्भ बन जाता है।
दसवें खण्ड के पहले नाम देवी को नाद और तत्त्व के मूल में बैठाते हैं। वे आदि-नाद के रूप में विद्यमान हैं, समस्त ध्वनि का मूल स्पन्द जिनका स्वरूप है; वे ब्रह्म-ज्ञान का बोध कराती हैं, सृष्टि-रचना में समर्थ हैं, और सब विषयों में निपुण हैं। श्रीचक्र के बिन्दु-स्थान पर विराजती हुई वे समस्त तत्त्वों से परे भी हैं और स्वयं परम-तत्त्व-रूप भी। ‘तत्’ और ‘त्वम्’ महावाक्य का अर्थ-स्वरूप उन्हीं में खुलता है, और सामवेद का गान उन्हें प्रिय है।
नाम 901–909
आगे देवी का स्वभाव खुलता है, चन्द्रमा-सी शीतल और सौम्य। वे सदाशिव की सहधर्मिणी हैं, उपासना के दक्षिण और वाम दोनों मार्गों में स्थित, और समस्त विपत्तियों का निवारण करने वाली। अपने ही स्वरूप में प्रतिष्ठित, समस्त क्लेशों से मुक्त, स्वभाव से ही मधुर। वे स्वयं प्रज्ञा-स्वरूपा हैं और प्रज्ञा प्रदान भी करती हैं, और ज्ञानी-जन उन्हीं की अर्चना करते हैं।
नाम 910–917
अब आराधना का स्वरूप गहराता है। चैतन्य को ही अर्घ्य रूप में अर्पित कर जिनकी आराधना होती है, जिन्हें चैतन्य रूपी पुष्प प्रिय है। वे सदा उदित, सदा प्रकाशमान और सदा सन्तुष्ट हैं, प्रातःकालीन सूर्य-सी अरुण आभा वाली। दक्षिण और वाम दोनों आचार के उपासक उन्हें आराधते हैं, और उनके कमल-मुख पर मन्द मुस्कान विराजती है। कौल-मार्ग के साधक उन्हें शुद्ध चैतन्य रूप में उपासते हैं; वे केवल, अद्वितीय हैं, और अमूल्य कैवल्य-पद, अर्थात् अन्तिम मुक्ति प्रदान करती हैं।
नाम 918–926
अब स्तुति स्वयं स्तुति की विषय बनती है। उन्हें अपनी स्तुति प्रिय है, और वे ही समस्त स्तुतियों का सार, उनकी वास्तविक विषय-वस्तु हैं; श्रुतियाँ जिनके वैभव की स्तुति करती हैं। श्रेष्ठ मनःशक्ति से सम्पन्न, उच्च-भाव वाली, महती कीर्ति की स्वामिनी, वे महेश की पत्नी महेश्वरी हैं। उनकी आकृति ही मंगलमयी है, उनका दर्शन ही कल्याण, और उनकी देह-कान्ति से समस्त अमंगल दूर हो जाता है।
नाम 927–933
यहाँ देवी का मातृ-रूप विश्व-व्यापी हो उठता है। वे समस्त विश्व की जननी हैं, जिनके गर्भ से सारी सृष्टि उत्पन्न होती, पलती और लौट आती है; जगत् का धारण और पोषण करने वाली माता, विशाल नेत्रों वाली। और साथ ही वे विराग-स्वरूपा, वीतराग हैं, प्रवीण और आत्म-विश्वास से पूर्ण, परम उदार और अत्यन्त दानशील, स्वयं परम आनन्द-स्वरूपा।
नाम 934–940
अब देवी का स्वरूप विराट् और तान्त्रिक हो उठता है। वे मन-रूप में व्याप्त हैं, जिनके केश स्वयं आकाश हैं, जो दिव्य विमान पर आसीन हो देवताओं के साथ विचरण करती हैं, और वज्र धारण करती हैं। वामकेश्वर तन्त्र की अधिष्ठात्री देवी हैं वे, जिन्हें पाँच यज्ञ प्रिय हैं। और सबसे गूढ़ रूप यहीं आता है, जो ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव, इन पाँच प्रेत-रूप शवों से बने मंच पर शयन करती हैं, उन चारों के पश्चात् पाँचवीं शक्ति, पाँच महाभूतों की अधीश्वरी, जिनकी पूजा पाँच उपचारों से होती है।
नाम 941–950
अगले नाम देवी की नित्यता और सौभाग्य पर ठहरते हैं। वे शाश्वत हैं, जिनका ऐश्वर्य शाश्वत है; सुख प्रदान करने वाली, और इतनी सुन्दर कि शम्भु को भी अपने सौन्दर्य से मोहित कर लेती हैं। वे स्वयं धरा, पृथ्वी-माता हैं, और साथ ही हिमवान् की पुत्री; परम धन्य, महान् ऐश्वर्य से सम्पन्न, धर्म-निष्ठ और धर्म की वृद्धि करने वाली।
नाम 951–959
अब स्वर अतीन्द्रिय की ओर मुड़ता है। वे समस्त लोकों से परे हैं, सत्त्व-रज-तम तीनों गुणों से परे, और सब कुछ से परे; समस्त गुण उन्हीं से उद्भूत होते हैं पर वे उनके बन्धन में नहीं आतीं। शान्ति और आनन्द-स्वरूपा वे बन्धूक-पुष्प-सी अरुण कान्ति वाली हैं, सदा बाल-स्वरूप, अपनी ही लीला में रमण करती हुई।
नाम 960–966
यहाँ देवी का सुहाग-रूप उजागर होता है। वे नित्य सौभाग्यवती, सदा-मंगलमयी हैं, सुख प्रदान करने वाली, सुन्दर वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित, नित्य-सुहागिन। सुहागिन स्त्रियों की अर्चना से वे प्रसन्न होती हैं, सर्वत्र देदीप्यमान; जिनका मन शुद्ध है और जो उपासकों के मन को भी शुद्ध करती हैं, और श्रीचक्र के बिन्दु पर अर्पित तर्पण से सन्तुष्ट होती हैं।
नाम 967–974
अन्तिम मोड़ श्रीविद्या के गूढ़तम रहस्यों में उतरता है। वे सबसे पूर्व विद्यमान, आदि-उत्पन्न, तीन पुरों की जननी हैं, जिनकी आराधना दस मुद्राओं से होती है, और जिनके वश में त्रिपुराश्री शक्ति रहती है। वे ज्ञान-मुद्रा के रूप में विद्यमान हैं, ज्ञान-योग से प्राप्य, ज्ञान और ज्ञेय दोनों का स्वरूप; योनि-मुद्रा-रूपा, त्रिखण्डा मुद्रा की अधीश्वरी, तीनों गुणों से युक्त, समस्त प्राणियों की माता।
नाम 975–985
समापन से ठीक पहले देवी करुणा और कृपा की मूर्ति बन कर सामने आती हैं। वे श्रीचक्र के त्रिकोण में निवास करती हैं, निष्पाप और निर्दोष, अद्भुत चरित्र वाली, वांछित समस्त पदार्थ प्रदान करने वाली; अत्यन्त कठोर साधना-अभ्यास से ही जानी जाती हैं, और जिनका स्वरूप छह अध्वाओं से परे है। वे निष्कारण करुणा की साकार मूर्ति हैं, अज्ञान के अन्धकार को दूर करने वाली ज्योतिर्मय दीपिका, जो बालकों और गोपालों तक सब के द्वारा जानी जाती हैं, और जिनका शासन कोई उल्लंघन नहीं कर सकता।
नाम 986–995
और अब सहस्रनाम अपने शिखर पर पहुँचता है। देवी श्रीचक्र में, चक्रों के राजा में निवास करती हैं, तीनों लोकों की परम सुन्दरी श्रीमती त्रिपुरसुन्दरी। फिर आते हैं वे अन्तिम तीन नाम जिनमें सारा सार बैठा है। ‘श्रीशिवा’, श्री से सम्पन्न मंगलमयी शिवा, वह स्वरूप जो देवी को शिव से अभिन्न दर्शाता है, क्योंकि शक्ति शिव की ही मंगलमयी अभिव्यक्ति हैं। फिर ‘शिवशक्त्यैक्यरूपिणी’, शिव और शक्ति की एकता का साकार स्वरूप, जहाँ यह सूत्र खुलता है कि दोनों दो पृथक् तत्त्व नहीं, एक ही परम-तत्त्व के दो पक्ष हैं, प्रकाश और विमर्श; आदि शंकराचार्य की ‘सौन्दर्यलहरी’ का प्रथम श्लोक इसी पर आधारित है, और कांची-कामकोटि-परम्परा में यही मूल वाक्य माना जाता है। और अन्त में ‘ललिताम्बिका’, ललिता-माँ। नौ सौ निन्यानवे नामों की यात्रा यहाँ अपनी पूर्णता पाती है, और देवी एक सरल मातृ-रूप में आ कर प्रतिष्ठित हो जाती हैं। पारम्परिक पाठ में हर नाम के अन्त में ‘नमः’ जुड़ता है, पर इस अन्तिम नाम पर साधक केवल माँ को पुकारता है, और वही पुकार उसकी पूर्णता है।