लुल्ला परिवारLulla Family
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देवीशक्ति, रक्षा और रूपांतरण

ललिता सहस्रनाम, खण्ड 10

श्री ललिता सहस्रनाम · खण्ड दस (अन्तिम)

अन्तिम सौ नाम

नाम नौ सौ एक से एक हज़ार तक। श्रीशिवा, शिवशक्त्यैक्यरूपिणी, ललिताम्बिका।

ललिता और शिव एक विशाल कमल-वलय पर साथ विराजमान हैं, शिव के हाथ में त्रिशूल और मस्तक पर चन्द्रकला है, चारों ओर जल में कमल और दीप तैर रहे हैं।

पाठ जहाँ से उठा था, वहीं लौट कर पूरा होता है। आरम्भ हुआ था ‘श्रीमाता’ से, और अब अन्त आता है ‘ललिताम्बिका’ पर। दोनों छोरों पर वही माँ खड़ी हैं, और बीच के सहस्र नाम उन्हीं के असंख्य रूप दिखा कर फिर माँ पर लौट आते हैं। इस अन्तिम सौ में देवी का स्वरूप उस बिन्दु पर सिमट आता है जहाँ सारी विभूतियाँ एक में विलीन हो जाती हैं।

अन्तिम तीन नाम विशेष ध्यान योग्य हैं। ‘श्रीशिवा’, देवी जो स्वयं मंगलमय शिव-स्वरूपा हैं। ‘शिवशक्त्यैक्यरूपिणी’, शिव और शक्ति की एकता का साकार स्वरूप, जिसमें समूचे श्रीविद्या-दर्शन का सूत्र बैठा है। और अन्त में ‘ललिताम्बिका’, ललिता-माँ, पूरे स्तोत्र का अधिष्ठात्री नाम। नाम-माला की यह संरचना संगीत के ‘सम’ की तरह चलती है, जहाँ आवर्तन वहीं पूरा होता है जहाँ से उठा था, और साधक के लिए समापन ही अगले आवर्तन का आरम्भ बन जाता है।

दसवें खण्ड के पहले नाम देवी को नाद और तत्त्व के मूल में बैठाते हैं। वे आदि-नाद के रूप में विद्यमान हैं, समस्त ध्वनि का मूल स्पन्द जिनका स्वरूप है; वे ब्रह्म-ज्ञान का बोध कराती हैं, सृष्टि-रचना में समर्थ हैं, और सब विषयों में निपुण हैं। श्रीचक्र के बिन्दु-स्थान पर विराजती हुई वे समस्त तत्त्वों से परे भी हैं और स्वयं परम-तत्त्व-रूप भी। ‘तत्’ और ‘त्वम्’ महावाक्य का अर्थ-स्वरूप उन्हीं में खुलता है, और सामवेद का गान उन्हें प्रिय है।

नाम 901 से 909

901नादरूपिणीआदि नाद के रूप में विद्यमान, समस्त ध्वनि का मूल स्पन्द
902विज्ञानकलनाब्रह्म ज्ञान का बोध कराने वाली
903कल्यासृष्टि रचना में समर्थ
904विदग्धासब विषयों में निपुण
905बैन्दवासनाश्रीचक्र के बिन्दु स्थान पर विराजने वाली
906तत्त्वाधिकाछत्तीस तत्त्वों से भी परे
907तत्त्वमयीस्वयं परम तत्त्व रूपा; भास्करराय के अनुसार साक्षात् शिव
908तत्त्वमर्थस्वरूपिणीतत् और त्वम् महावाक्य का अर्थ स्वरूप, शिव भी और जीव भी
909सामगानप्रियाजिन्हें सामवेद का गान प्रिय है

आगे देवी का स्वभाव खुलता है, चन्द्रमा-सी शीतल और सौम्य। वे सदाशिव की सहधर्मिणी हैं, उपासना के दक्षिण और वाम दोनों मार्गों में स्थित, और समस्त विपत्तियों का निवारण करने वाली। अपने ही स्वरूप में प्रतिष्ठित, समस्त क्लेशों से मुक्त, स्वभाव से ही मधुर। वे स्वयं प्रज्ञा-स्वरूपा हैं और प्रज्ञा प्रदान भी करती हैं, और ज्ञानी-जन उन्हीं की अर्चना करते हैं।

नाम 910 से 917

910सौम्याचन्द्रमा सी शीतल और सौम्य
911सदाशिवकुटुम्बिनीसदाशिव की सहधर्मिणी
912सव्यापसव्यमार्गस्थाउपासना के दक्षिण और वाम दोनों मार्गों में स्थित
913सर्वापद्विनिवारिणीसमस्त विपत्तियों का निवारण करने वाली
914स्वस्थाअपने ही स्वरूप में प्रतिष्ठित, समस्त क्लेशों से मुक्त
915स्वभावमधुरास्वभाव से ही मधुर
916धीरास्वयं प्रज्ञा स्वरूपा और प्रज्ञा देने वाली
917धीरसमर्चिताज्ञानी जनों के द्वारा अर्चित

अब आराधना का स्वरूप गहराता है। चैतन्य को ही अर्घ्य रूप में अर्पित कर जिनकी आराधना होती है, जिन्हें चैतन्य रूपी पुष्प प्रिय है। वे सदा उदित, सदा प्रकाशमान और सदा सन्तुष्ट हैं, प्रातःकालीन सूर्य-सी अरुण आभा वाली। दक्षिण और वाम दोनों आचार के उपासक उन्हें आराधते हैं, और उनके कमल-मुख पर मन्द मुस्कान विराजती है। कौल-मार्ग के साधक उन्हें शुद्ध चैतन्य रूप में उपासते हैं; वे केवल, अद्वितीय हैं, और अमूल्य कैवल्य-पद, अर्थात् अन्तिम मुक्ति प्रदान करती हैं।

नाम 918 से 926

918चैतन्यार्घ्यसमाराध्याचैतन्य को ही अर्घ्य रूप में अर्पित कर जिनकी आराधना होती है
919चैतन्यकुसुमप्रियाजिन्हें चैतन्य रूपी पुष्प प्रिय है
920सदोदितासदा उदित, सदा प्रकाशमान
921सदातुष्टासदा सन्तुष्ट रहने वाली
922तरुणादित्यपाटलाप्रातःकालीन सूर्य सी अरुण आभा वाली
923दक्षिणादक्षिणाराध्यादक्षिण और वाम दोनों आचार के उपासकों के द्वारा आराधित
924दरस्मेरमुखाम्बुजाजिनके कमल मुख पर मन्द मुस्कान विराजती है
925कौलिनी केवलाकौल मार्ग के साधकों की उपास्य शुद्ध चैतन्य, और केवल, अद्वितीय
926अनर्घ्यकैवल्यपददायिनीअमूल्य कैवल्य पद, अन्तिम मुक्ति देने वाली

अब स्तुति स्वयं स्तुति की विषय बनती है। उन्हें अपनी स्तुति प्रिय है, और वे ही समस्त स्तुतियों का सार, उनकी वास्तविक विषय-वस्तु हैं; श्रुतियाँ जिनके वैभव की स्तुति करती हैं। श्रेष्ठ मनःशक्ति से सम्पन्न, उच्च-भाव वाली, महती कीर्ति की स्वामिनी, वे महेश की पत्नी महेश्वरी हैं। उनकी आकृति ही मंगलमयी है, उनका दर्शन ही कल्याण, और उनकी देह-कान्ति से समस्त अमंगल दूर हो जाता है।

नाम 927 से 933

927स्तोत्रप्रियाजिन्हें अपनी स्तुति प्रिय है
928स्तुतिमतीसमस्त स्तुतियों का सार और वास्तविक विषय
929श्रुतिसंस्तुतवैभवाश्रुतियाँ जिनके वैभव की स्तुति करती हैं
930मनस्विनीश्रेष्ठ मनःशक्ति से सम्पन्न
931मानवतीउच्च भाव वाली, महती कीर्ति की स्वामिनी
932महेशीमहेश की पत्नी महेश्वरी
933मङ्गलाकृतिःजिनकी आकृति ही मंगलमयी है, जिनका दर्शन ही कल्याण

यहाँ देवी का मातृ-रूप विश्व-व्यापी हो उठता है। वे समस्त विश्व की जननी हैं, जिनके गर्भ से सारी सृष्टि उत्पन्न होती, पलती और लौट आती है; जगत् का धारण और पोषण करने वाली माता, विशाल नेत्रों वाली। और साथ ही वे विराग-स्वरूपा, वीतराग हैं, प्रवीण और आत्म-विश्वास से पूर्ण, परम उदार और अत्यन्त दानशील, स्वयं परम आनन्द-स्वरूपा।

नाम 934 से 940

934विश्वमातासमस्त विश्व की जननी
935जगद्धात्रीजगत् का धारण और पोषण करने वाली माता
936विशालाक्षीविशाल नेत्रों वाली
937विरागिणीविराग स्वरूपा, वीतराग
938प्रगल्भाप्रवीण और आत्मविश्वास से पूर्ण
939परमोदारापरम उदार और अत्यन्त दानशील
940परामोदास्वयं परम आनन्द स्वरूपा

अब देवी का स्वरूप विराट् और तान्त्रिक हो उठता है। वे मन-रूप में व्याप्त हैं, जिनके केश स्वयं आकाश हैं, जो दिव्य विमान पर आसीन हो देवताओं के साथ विचरण करती हैं, और वज्र धारण करती हैं। वामकेश्वर तन्त्र की अधिष्ठात्री देवी हैं वे, जिन्हें पाँच यज्ञ प्रिय हैं। और सबसे गूढ़ रूप यहीं आता है, जो ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव, इन पाँच प्रेत-रूप शवों से बने मंच पर शयन करती हैं, उन चारों के पश्चात् पाँचवीं शक्ति, पाँच महाभूतों की अधीश्वरी, जिनकी पूजा पाँच उपचारों से होती है।

नाम 941 से 950

941मनोमयीमन के रूप में व्याप्त
942व्योमकेशीजिनके केश स्वयं आकाश हैं
943विमानस्थादिव्य विमान पर आसीन, देवताओं के साथ विचरण करने वाली
944वज्रिणीवज्र धारण करने वाली
945वामकेश्वरीवामकेश्वर तन्त्र की अधिष्ठात्री देवी
946पञ्चयज्ञप्रियाजिन्हें पाँच यज्ञ प्रिय हैं
947पञ्चप्रेतमञ्चाधिशायिनीब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर और सदाशिव, पाँच प्रेत रूप शवों के मंच पर शयन करने वाली
948पञ्चमीउन चारों के पश्चात् पाँचवीं शक्ति; भास्करराय के अनुसार पाँचवें, सदाशिव की पत्नी
949पञ्चभूतेशीपाँच महाभूतों की अधीश्वरी
950पञ्चसङ्ख्योपचारिणीगन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य, पाँच उपचारों से पूजित

अगले नाम देवी की नित्यता और सौभाग्य पर ठहरते हैं। वे शाश्वत हैं, जिनका ऐश्वर्य शाश्वत है; सुख प्रदान करने वाली, और इतनी सुन्दर कि शम्भु को भी अपने सौन्दर्य से मोहित कर लेती हैं। वे स्वयं धरा, पृथ्वी-माता हैं, और साथ ही हिमवान् की पुत्री; परम धन्य, महान् ऐश्वर्य से सम्पन्न, धर्म-निष्ठ और धर्म की वृद्धि करने वाली।

नाम 951 से 959

951शाश्वतीशाश्वत, सदा रहने वाली
952शाश्वतैश्वर्याजिनका ऐश्वर्य शाश्वत है
953शर्मदाशर्म अर्थात् सुख देने वाली
954शम्भुमोहिनीशम्भु को भी अपने सौन्दर्य से मोहित कर लेने वाली
955धरास्वयं धरा, पृथ्वी माता
956धरसुताहिमवान् की पुत्री
957धन्यापरम धन्य, महान् ऐश्वर्य से सम्पन्न
958धर्मिणीधर्म में निष्ठ रहने वाली
959धर्मवर्धिनीधर्म की वृद्धि करने वाली

अब स्वर अतीन्द्रिय की ओर मुड़ता है। वे समस्त लोकों से परे हैं, सत्त्व-रज-तम तीनों गुणों से परे, और सब कुछ से परे; समस्त गुण उन्हीं से उद्भूत होते हैं पर वे उनके बन्धन में नहीं आतीं। शान्ति और आनन्द-स्वरूपा वे बन्धूक-पुष्प-सी अरुण कान्ति वाली हैं, सदा बाल-स्वरूप, अपनी ही लीला में रमण करती हुई।

नाम 960 से 966

960लोकातीतासमस्त लोकों से परे
961गुणातीतासत्त्व, रज और तम, तीनों गुणों से परे
962सर्वातीतासब कुछ से परे
963शमात्मिकाशान्ति और आनन्द स्वरूपा
964बन्धूककुसुमप्रख्याबन्धूक पुष्प सी अरुण कान्ति वाली
965बालासदा बाल स्वरूपा, खेलती हुई बालिका
966लीलाविनोदिनीअपनी ही लीला में रमण करने वाली

यहाँ देवी का सुहाग-रूप उजागर होता है। वे नित्य सौभाग्यवती, सदा-मंगलमयी हैं, सुख प्रदान करने वाली, सुन्दर वस्त्र-आभूषणों से सुसज्जित, नित्य-सुहागिन। सुहागिन स्त्रियों की अर्चना से वे प्रसन्न होती हैं, सर्वत्र देदीप्यमान; जिनका मन शुद्ध है और जो उपासकों के मन को भी शुद्ध करती हैं, और श्रीचक्र के बिन्दु पर अर्पित तर्पण से सन्तुष्ट होती हैं।

नाम 967 से 974

967सुमङ्गलीनित्य सौभाग्यवती, सदा मंगलमयी
968सुखकरीसुख करने वाली, सुख की कर्त्री
969सुवेषाढ्यासुन्दर वस्त्र आभूषणों से सुसज्जित
970सुवासिनीनित्य सुहागिन, जिनके पति सदा जीवित हैं
971सुवासिन्यर्चनप्रीतासुहागिन स्त्रियों की अर्चना से प्रसन्न होने वाली
972आशोभनासर्वत्र देदीप्यमान, सदा सुन्दर
973शुद्धमानसाजिनका मन शुद्ध है, और जो उपासकों के मन को भी शुद्ध करती हैं
974बिन्दुतर्पणसन्तुष्टाश्रीचक्र के बिन्दु पर अर्पित तर्पण से सन्तुष्ट होने वाली

अन्तिम मोड़ श्रीविद्या के गूढ़तम रहस्यों में उतरता है। वे सबसे पूर्व विद्यमान, आदि-उत्पन्न, तीन पुरों की जननी हैं, जिनकी आराधना दस मुद्राओं से होती है, और जिनके वश में त्रिपुराश्री शक्ति रहती है। वे ज्ञान-मुद्रा के रूप में विद्यमान हैं, ज्ञान-योग से प्राप्य, ज्ञान और ज्ञेय दोनों का स्वरूप; योनि-मुद्रा-रूपा, त्रिखण्डा मुद्रा की अधीश्वरी, तीनों गुणों से युक्त, समस्त प्राणियों की माता।

नाम 975 से 985

975पूर्वजासबसे पूर्व विद्यमान, आदि उत्पन्न
976त्रिपुराम्बिकातीन पुरों की जननी
977दशमुद्रासमाराध्यासंक्षोभिणी से त्रिखण्डा तक दस मुद्राओं से आराधित
978त्रिपुराश्रीवशङ्करीजिनके वश में त्रिपुराश्री शक्ति रहती है
979ज्ञानमुद्राज्ञान मुद्रा के रूप में विद्यमान
980ज्ञानगम्याज्ञान योग से प्राप्य
981ज्ञानज्ञेयस्वरूपिणीज्ञान और ज्ञेय दोनों का स्वरूप
982योनिमुद्रायोनि मुद्रा रूपा, नौवीं मुद्रा
983त्रिखण्डेशीत्रिखण्डा मुद्रा की अधीश्वरी
984त्रिगुणातीनों गुणों से युक्त, गुणों की आधार प्रकृति
985अम्बासमस्त प्राणियों की माता

समापन से ठीक पहले देवी करुणा और कृपा की मूर्ति बन कर सामने आती हैं। वे श्रीचक्र के त्रिकोण में निवास करती हैं, निष्पाप और निर्दोष, अद्भुत चरित्र वाली, वांछित समस्त पदार्थ प्रदान करने वाली; अत्यन्त कठोर साधना-अभ्यास से ही जानी जाती हैं, और जिनका स्वरूप छह अध्वाओं से परे है। वे निष्कारण करुणा की साकार मूर्ति हैं, अज्ञान के अन्धकार को दूर करने वाली ज्योतिर्मय दीपिका, जो बालकों और गोपालों तक सब के द्वारा जानी जाती हैं, और जिनका शासन कोई उल्लंघन नहीं कर सकता।

नाम 986 से 995

986त्रिकोणगाश्रीचक्र के त्रिकोण में निवास करने वाली
987अनघानिष्पाप और निर्दोष
988अद्भुतचारित्राअद्भुत चरित्र वाली
989वाञ्छितार्थप्रदायिनीवांछित समस्त पदार्थ प्रदान करने वाली
990अभ्यासातिशयज्ञाताअत्यन्त कठोर साधना अभ्यास से ही जानी जाने वाली
991षडध्वातीतरूपिणीजिनका स्वरूप छह अध्वाओं, पद, भुवन, वर्ण, तत्त्व, कला और मन्त्र से परे है
992अव्याजकरुणामूर्तिःनिष्कारण करुणा की साकार मूर्ति
993अज्ञानध्वान्तदीपिकाअज्ञान के अन्धकार को दूर करने वाली ज्योतिर्मय दीपिका
994आबालगोपविदिताबालकों और गोपालों तक सब के द्वारा जानी जाने वाली
995सर्वानुल्लङ्घ्यशासनाजिनका शासन कोई उल्लंघन नहीं कर सकता

और अब सहस्रनाम अपने शिखर पर पहुँचता है। देवी श्रीचक्र में, चक्रों के राजा में निवास करती हैं, तीनों लोकों की परम सुन्दरी श्रीमती त्रिपुरसुन्दरी। फिर आते हैं वे अन्तिम तीन नाम जिनमें सारा सार बैठा है। ‘श्रीशिवा’, श्री से सम्पन्न मंगलमयी शिवा, वह स्वरूप जो देवी को शिव से अभिन्न दर्शाता है, क्योंकि शक्ति शिव की ही मंगलमयी अभिव्यक्ति हैं। फिर ‘शिवशक्त्यैक्यरूपिणी’, शिव और शक्ति की एकता का साकार स्वरूप, जहाँ यह सूत्र खुलता है कि दोनों दो पृथक् तत्त्व नहीं, एक ही परम-तत्त्व के दो पक्ष हैं, प्रकाश और विमर्श; आदि शंकराचार्य की ‘सौन्दर्यलहरी’ का प्रथम श्लोक इसी पर आधारित है, और कांची-कामकोटि-परम्परा में यही मूल वाक्य माना जाता है। और अन्त में ‘ललिताम्बिका’, ललिता-माँ। नौ सौ निन्यानवे नामों की यात्रा यहाँ अपनी पूर्णता पाती है, और देवी एक सरल मातृ-रूप में आ कर प्रतिष्ठित हो जाती हैं। पारम्परिक पाठ में हर नाम के अन्त में ‘नमः’ जुड़ता है, पर इस अन्तिम नाम पर साधक केवल माँ को पुकारता है, और वही पुकार उसकी पूर्णता है।

नाम 996 से 1000

996श्रीचक्रराजनिलयाचक्रों के राजा श्रीचक्र में निवास करने वाली
997श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरीतीनों लोकों की परम सुन्दरी श्रीमती त्रिपुरसुन्दरी
998श्रीशिवाश्री से सम्पन्न मंगलमयी शिवा, शिव से अभिन्न
999शिवशक्त्यैक्यरूपिणीशिव और शक्ति की एकता का साकार स्वरूप, प्रकाश और विमर्श एक
1000ललिताम्बिकाललिता माँ, पूरे स्तोत्र का अधिष्ठात्री नाम

स्रोत: ब्रह्माण्ड-पुराण, ललितोपाख्यान। मूल पाठ sanskritdocuments.org/doc_devii/lalita1000.itx से। नाम-अर्थ भास्करराय के ‘सौभाग्य-भास्कर’ भाष्य के अनुसार।

अनुज्ञप्ति: मूल पाठ सार्वजनिक-सम्पत्ति। हिन्दी संगति lulla.net, CC BY-NC 4.0।