सहज शुरुआत, स्पष्ट समझ
अपनी साँस से मुलाक़ात
साँस तो साथ रहती है; उसकी ख़बर लेने की फ़ुर्सत कम मिलती है। प्राण योग की परम्परा में व्यापक अर्थ रखता है, उसे केवल भीतर आने वाली हवा कह देने से बात अधूरी रह जाती है। यहाँ शुरुआत उस अनुभव से कीजिए जो अभी उपलब्ध है: आराम से बैठना, साँस को पहचानना और बेवजह का ज़ोर छोड़ देना।
आसन के बाद का प्रसंग
योगसूत्र 2.49-50 में आसन के बाद श्वास-प्रश्वास की गति और देश, काल, संख्या का प्रसंग आता है। यह क्रम बताता है कि प्राणायाम ध्यानपूर्वक सीखा जाने वाला अनुशासन है। यहाँ शुरुआती अभ्यास के लिए स्थिर कुर्सी और आरामदेह बैठना चुना गया है।
पूरक, रेचक और कुम्भक
श्वास भीतर लेने को पूरक, बाहर छोड़ने को रेचक और रोकने को कुम्भक कहते हैं। शब्द परिचित हों तब भी रोकने की अवधि अपने आप तय न करें। इस दर्शिका के तीनों आरम्भिक अभ्यास कुम्भक के बिना हैं।
गिनती का लिहाज़, सहजता का भी
जहाँ समान गिनती दी है, उससे क्रम समझने में मदद मिलती है। मगर गिनती पूरी करने के लिए साँस को खींचना या बेचैनी सहना मुनासिब नहीं। जब ज़रूरत हो, हाथ नीचे रख दीजिए और साँस को अपनी रवानी में लौटने दीजिए।
योगसूत्र 2.49-50 और नीचे दिए हठयोग तथा आधुनिक शिक्षण-संदर्भ।
श्वास को नियंत्रित करने से बेचैनी, चक्कर या साँस फूलना हो तो रुककर सामान्य श्वास पर लौटें। पहले सामान्य सावधानियाँ पढ़ लें।
सहज शुरुआत
सहज श्वास का अवलोकन
पहले जो चल रहा है, उसे देखिए
बैठिए और आती-जाती साँस को पहचानिए। देखने के लिए उसे बदलना आवश्यक नहीं।
तैयारी
आराम से बैठें। पैर पूरे सहारे पर हों, हाथ जाँघों पर रखें और आँखें खुली या नज़र हल्की नीची रखें।
कैसे करें
- अगली साँस भीतर आते और बाहर जाते हुए देखें। उसकी गति या गहराई न बदलें।
- जबड़ा और कंधे ढीले होने दें। अधिक हवा भरने की कोशिश न करें।
- ध्यान भटके तो यह पहचानकर धीरे साँस के स्पर्श पर लौट आएँ।
- अंत में तलवों और कुर्सी के सहारे को फिर महसूस करें।
श्वास और मात्रा
कुछ सहज श्वास तक रहें। न कोई निश्चित गिनती, न साँस रोकना।
अभ्यास को समझिए
अभ्यास में मन का भटकना भी दिखाई देता है। उसे देखकर लौट आना इस आरम्भिक अभ्यास का हिस्सा है। यहाँ किसी विशेष अनुभव, शून्यता या विचाररहित दशा को पैदा करने का निर्देश नहीं है।
इस दर्शिका के लिए तैयार आरम्भिक अभ्यास।
सहज शुरुआत
अनुलोम-विलोम की सहज शुरुआत
नासिकाओं का क्रम बदलना · बिना कुम्भक
स्पर्श हल्का हो और साँस शांत। एक पूरा चक्र ध्यान से करना तेज़ी से कई चक्र करने से अधिक उपयोगी शुरुआत है।
तैयारी
सीधे बैठें। बायाँ हाथ जाँघ पर रखें। दाएँ हाथ की तर्जनी और मध्यमा भीतर मोड़ें। अंगूठे से दायीं नासिका और अनामिका व छोटी उँगली से बायीं नासिका को हल्का बंद करें। इस हाथ की स्थिति को विष्णु मुद्रा कहते हैं।
कैसे करें
- अंगूठे से दायीं नासिका बंद करके बायीं से साँस लें।
- अनामिका और छोटी उँगली से बायीं नासिका बंद करें। अंगूठा हटाकर दायीं से साँस छोड़ें।
- दायीं से साँस लें। फिर उसे बंद करके बायीं से साँस छोड़ें।
- यह एक चक्र हुआ। उँगलियों का दबाव हल्का और साँस की गति सहज रहे; बीच में साँस न रोकें।
श्वास और मात्रा
सहज, समान गिनती पर 4 चक्र से शुरू करें। गिनती निभाने के लिए साँस को खींचें नहीं।
अभ्यास को समझिए
नाड़ीशोधन और अनुलोम-विलोम नाम अलग शिक्षण-परम्पराओं में कुछ भिन्न क्रमों के लिए भी मिलते हैं। यहाँ केवल नासिकाओं को बारी-बारी बदलने का सरल रूप दिया है। इसे अनुपात, बन्ध या कुम्भक वाले पूर्ण पारम्परिक क्रम का स्थानापन्न न मानें।
स्वामी सत्यानन्द सरस्वती, आसन प्राणायाम मुद्रा बन्ध, नाड़ीशोधन प्रकरण: आधुनिक शिक्षण-संदर्भ। यहाँ दिया प्रारम्भिक रूप कुम्भक के बिना है।
सहज शुरुआत
शीतली और सीत्कारी
मुख से सहज पूरक, नासिका से रेचक
जीभ की सहज नली से श्वास भीतर लें और नाक से धीरे छोड़ें। जीभ न मुड़े तो उसके लिए भी सरल विकल्प है।

तैयारी
सीधे और सहज बैठें। हाथ ढीले रखें। यदि स्वाभाविक रूप से सम्भव हो तो जीभ के दोनों किनारे मोड़कर छोटी नली बनाएँ।
कैसे करें
- मुड़ी हुई जीभ को होंठों के बीच थोड़ा बाहर लाएँ।
- उस नली से धीरे साँस भीतर लें।
- मुख बंद करके दोनों नासिकाओं से सहज साँस छोड़ें। बीच में न रोकें।
- जीभ न मुड़े तो सीत्कारी का विकल्प लें: दाँत हल्के अलग रखें, जीभ उनके पीछे रहे और दाँतों के बीच से साँस लें। फिर मुख बंद करके नाक से छोड़ें।
श्वास और मात्रा
4 चक्र से शुरू करें।
अभ्यास को समझिए
शीतली और सीत्कारी के नाम हवा के मुख से प्रवेश की अलग विधियों को बताते हैं। पारम्परिक हठयोग के वर्णन में आगे कुम्भक भी आता है। इस दर्शिका का आरम्भिक रूप उस अंश को छोड़ता है; इसे किसी रोग या बुखार का उपचार न मानें।
हठयोगप्रदीपिका 2.54-58: सीत्कारी और शीतली का पारम्परिक संदर्भ। यहाँ कुम्भक हटाकर सहज आरम्भिक रूप दिया है।
योग्य शिक्षक के साथ
बलपूर्वक विधियों का
अलग अनुशासन है।
कपालभाति और भस्त्रिका यहाँ समझने के लिए दी हैं। इनके वेग, चक्रों की संख्या या अवधि का स्वयं अनुसरण करने वाला क्रम इस दर्शिका में नहीं है। परिचित नाम होना पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं है।
NCCIH का शुरुआती योग-मार्गदर्शन बलपूर्वक श्वास से बचने की सलाह देता है।
कपालभाति
शुद्धिक्रिया का संदर्भ
हठयोगप्रदीपिका में कपालभाति षट्कर्मों के प्रसंग में आती है। प्रचलित शिक्षण में छोटे, सक्रिय रेचक के बाद पूरक अपने आप होता है। घेरण्डसंहिता में इसी नाम के कई रूप हैं, जिनमें जल से की जाने वाली क्रियाएँ भी हैं। इसलिए केवल नाम समान होने से विधि समान नहीं हो जाती।
उच्च रक्तचाप, हृदयरोग, हर्निया, गर्भावस्था, हाल की पेट की शल्यचिकित्सा, ग्लूकोमा, चक्कर, दबाव से बढ़ती अम्लता या श्रोणितल की समस्या हो तो चिकित्सक और योग्य प्रशिक्षक की स्वीकृति के बिना न करें।
हठयोगप्रदीपिका 2.35; घेरण्डसंहिता 1.55-60। यहाँ गति, आवृत्ति या अवधि का अभ्यास-निर्देश नहीं दिया गया है।
भस्त्रिका
धौंकनी जैसी सक्रिय श्वास
भस्त्रिका में भीतर और बाहर, दोनों दिशाओं की श्वास सक्रिय होती है। धौंकनी की उपमा इसी गति के लिए है। इसे कपालभाति का दूसरा नाम समझना ठीक नहीं। पारम्परिक क्रम में आने वाले अन्य अंश और उनकी उपयुक्तता प्रत्यक्ष शिक्षण में समझनी चाहिए।
उच्च रक्तचाप, हृदयरोग, हर्निया, गर्भावस्था, हाल की पेट की शल्यचिकित्सा, ग्लूकोमा, घबराहट के दौरे, चक्कर या श्वसन-रोग हो तो चिकित्सक और योग्य प्रशिक्षक की स्वीकृति के बिना न करें।
हठयोगप्रदीपिका 2.44 तथा 2.59-67। इस परिचय से गति, चक्र-संख्या या अवधि तय न करें।
स्रोत और शिक्षण-संदर्भ
व्यायाम की सामान्य सलाह और परम्परा के वर्णन अलग प्रयोजनों के लिए दिए हैं। शास्त्रीय वर्णन अपने आप चिकित्सकीय प्रमाण नहीं बन जाता। कुछ स्रोत-कड़ियाँ अंग्रेज़ी में हैं।
- योग: प्रभाव और सावधानियाँ
NCCIH का सामान्य मार्गदर्शन: शुरुआती अभ्यास, अनुकूल बदलाव और सुरक्षा।
- हठयोगप्रदीपिका
स्वात्माराम का ग्रंथ; पंचम सिंह का अनुवाद। अध्याय 2, विशेषकर 35, 44 और 54-67। पारम्परिक संदर्भ को आधुनिक चिकित्सकीय प्रमाण से अलग पढ़ें।
- घेरण्डसंहिता
संस्कृत पाठ, 1.55-60: कपालभाति के भिन्न रूप। केवल नाम से विधियों को एक न मानें।
- आसन प्राणायाम मुद्रा बन्ध
स्वामी सत्यानन्द सरस्वती, चौथा संशोधित संस्करण, 2009; नाड़ीशोधन प्रकरण। कड़ी प्रकाशक की शिक्षण-सामग्री की ओर है।
- पतञ्जलि योगसूत्र
संस्कृत पाठ: 1.12-14, 2.46 तथा 2.49-50। अभ्यास, आसन और प्राणायाम की प्रस्तावना के संदर्भ।