देवी माहात्म्य
अध्याय 11 · नारायणी स्तुति · उत्तर चरित्र
शुम्भ गिर चुका था, और महिषासुर के उस विजेता का अन्त होते ही देवों के मुख-कमल खिल उठे। इन्द्र-सहित समस्त सुर, वह्नि को आगे किए, कात्यायनी के सम्मुख हाथ जोड़ कर खड़े हो गए। फिर एक स्वर उठा जो सोलह बार लौटा, हर श्लोक के अन्त में वही पुकार, “नारायणि नमो ऽस्तु ते।” स्तुति से प्रसन्न हो कर देवी ने वर माँगने को कहा, और देवों ने अपने लिए कुछ नहीं, केवल त्रैलोक्य की समस्त बाधा का प्रशमन और वैरियों का विनाश माँगा। अन्त में स्वयं देवी ने अपने आगामी अवतारों की कथा कही, नन्द-गोप के गृह में जन्म से ले कर रक्त-दंतिका, शाकम्भरी, भीमा और भ्रामरी के रूपों तक।
महिषासुर का जो विजेता शुम्भ था, उसका वध होते ही उस रण-भूमि पर इन्द्र-सहित समस्त देव वह्नि को आगे किए आ खड़े हुए। अपना इष्ट सिद्ध हुआ देख कर उनके मुख-कमल खिल उठे, और उन्हीं खिले मुखों की कान्ति से मानो सारी दिशाएँ उज्ज्वल हो गईं। ऐसी प्रसन्नता लिए उन सबने कात्यायनी की स्तुति आरम्भ की।

1
ऋषिरुवाच ।
देव्या हते तत्र महासुरेन्द्रे सेन्द्राः सुरा वह्निपुरोगमास्ताम् ।
कात्यायनीं तुष्टुवुरिष्टलाभाद् विकाशिवक्त्राब्जविकाशिताशाः ॥ 1 ॥
देवों की पहली पुकार विनती की थी। हे प्रपन्नों की पीड़ा हरने वाली देवी, प्रसन्न हों, प्रसन्न हों, आप तो अखिल जगत की माता हैं। हे विश्वेश्वरी, आप ही प्रसन्न हों और इस विश्व की रक्षा करें, क्योंकि चर और अचर, सब की अधीश्वरी आप ही हैं। और यह केवल स्तुति का अलंकार नहीं था, यह उस सत्य का स्मरण था कि जिस सृष्टि की वे रक्षा माँग रहे थे, उसी सृष्टि का आधार भी वही देवी हैं। आप ही अकेली पृथ्वी के रूप में स्थित हो कर जगत को धारण करती हैं, और आप ही जल के रूप में इस सब को सींचती और तृप्त करती हैं; आपका वीर्य अलंघ्य है।
2 · 3
देवा ऊचुः ।
देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतो ऽखिलस्य ।
प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य ॥ 2 ॥
आधारभूता जगतस्त्वमेका महीस्वरूपेण यतः स्थितासि ।
अपां स्वरूपस्थितया त्वयैतद् आप्याय्यते कृत्स्नमलङ्घ्यवीर्ये ॥ 3 ॥
देवों ने आगे कहा कि वही वैष्णवी शक्ति हैं, अनन्त वीर्य वाली, समस्त विश्व का बीज और परम माया, जो इस सारी सृष्टि को मोह में बाँध लेती हैं; और जब वही प्रसन्न हो जाएँ, तो इसी भूमि पर मुक्ति का हेतु भी वही बनती हैं। समस्त विद्याएँ आपके ही भेद हैं, हे देवी, और जगत की समस्त स्त्रियाँ आपका ही रूप। जब एक आप अम्बा ने ही सब कुछ भर रखा है, तो आपकी स्तुति के योग्य कौन सा वचन हो, कौन सी वाणी आप से बढ़ कर ठहरे।

4 · 5
त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या विश्वस्य बीजं परमासि माया ।
संमोहितं देवि समस्तमेतत् त्वं वै प्रसन्ना भुवि मुक्तिहेतुः ॥ 4 ॥
विद्याः समस्तास्तव देवि भेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु ।
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः ॥ 5 ॥
जो स्वयं समस्त भूतों का स्वरूप हैं और स्वर्ग तथा मुक्ति, दोनों की दात्री हैं, उनकी प्रशंसा में भला कौन से परम वचन उनके योग्य ठहरें। इसी विनम्रता के साथ देवों की वाणी उस पुकार तक पहुँची जो अब सोलह बार लौटने वाली थी। सब के हृदय में बुद्धि के रूप में जो विराजती हैं, और स्वर्ग तथा अपवर्ग दोनों जो देती हैं, उन नारायणी को नमन।

6 · 7
सर्वभूता यदा देवी स्वर्गमुक्तिप्रदायिनी ।
त्वं स्तुता स्तुतये का वा भवन्तु परमोक्तयः ॥ 6 ॥
सर्वस्य बुद्धिरूपेण जनस्य हृदि संस्थिते ।
स्वर्गापवर्गदे देवि नारायणि नमो ऽस्तु ते ॥ 7 ॥
अब वह पुकार अविच्छिन्न लौटने लगी, और देवों ने देवी को उनके एक-एक रूप में पहचान कर नमन किया। कला और काष्ठा जैसी काल की सूक्ष्म मापों के रूप में जो सृष्टि का परिणमन कराती हैं, और प्रलय के समय समस्त विश्व को अपने में समेट लेने की शक्ति जो हैं, उन नारायणी को नमन। समस्त मंगलों का भी जो मंगल हैं, कल्याण-रूपा, समस्त प्रयोजनों की सिद्धि करने वाली, शरणागत की शरण, त्रिनयना गौरी, उन नारायणी को नमन। सृष्टि, स्थिति और संहार, तीनों की जो मूल शक्ति हैं, सनातनी, गुणों की आश्रय और गुणमयी, उन नारायणी को नमन। और जो शरण में आए हैं, जो दीन और आर्त हैं, उन सबकी रक्षा में जो सदा तत्पर रहती हैं और सबकी पीड़ा हर लेती हैं, उन नारायणी को नमन।

8 · 9 · 10 · 11
कलाकाष्ठादिरूपेण परिणामप्रदायिनि ।
विश्वस्योपरतौ शक्ते नारायणि नमो ऽस्तु ते ॥ 8 ॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमो ऽस्तु ते ॥ 9 ॥
सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्तिभूते सनातनि ।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमो ऽस्तु ते ॥ 10 ॥
शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे ।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमो ऽस्तु ते ॥ 11 ॥
फिर देवों ने उन्हीं शक्ति-रूपों को नमन किया जो अभी इसी रण में स्वयं देवों के शरीरों से प्रकट हुई थीं। हंस-जुते विमान पर विराजी, ब्रह्माणी का रूप धरे, हाथ में कुश और जल लिए उस देवी को नमन। त्रिशूल, चन्द्र और सर्प धारण किए, महान वृषभ पर सवार, माहेश्वरी के स्वरूप वाली उस देवी को नमन। मयूर और कुक्कुट से घिरी, महाशक्ति धारण किए, निष्पाप कौमारी के रूप में स्थित उस देवी को नमन।

12 · 13 · 14
हंसयुक्तविमानस्थे ब्रह्माणीरूपधारिणि ।
कौशाम्भःक्षरिके देवि नारायणि नमो ऽस्तु ते ॥ 12 ॥
त्रिशूलचन्द्राहिधरे महावृषभवाहिनि ।
माहेश्वरीस्वरूपेण नारायणि नमो ऽस्तु ते ॥ 13 ॥
मयूरकुक्कुटवृते महाशक्तिधरे ऽनघे ।
कौमारीरूपसंस्थाने नारायणि नमो ऽस्तु ते ॥ 14 ॥
शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग धनुष, ये परम आयुध हाथों में लिए, वैष्णवी के रूप में जो प्रकट हुईं, वे प्रसन्न हों; उन नारायणी को नमन। उग्र महाचक्र हाथ में लिए, अपनी दाढ़ से धरती को उठा लेने वाले वराह की शक्ति, कल्याणकारिणी वाराही के रूप में स्थित उस देवी को नमन। और उग्र नृसिंह-रूप धर कर दैत्यों के संहार में जो उद्यत हैं और तीनों लोकों की रक्षा में लगी हैं, उन नारसिंही रूप वाली नारायणी को नमन।

15 · 16 · 17
शङ्खचक्रगदाशार्ङ्गगृहीतपरमायुधे ।
प्रसीद वैष्णवीरूपे नारायणि नमो ऽस्तु ते ॥ 15 ॥
गृहीतोग्रमहाचक्रे दंष्ट्रोद्धृतवसुन्धरे ।
वराहरूपिणि शिवे नारायणि नमो ऽस्तु ते ॥ 16 ॥
नृसिंहरूपेणोग्रेण हन्तुं दैत्यान् कृतोद्यमे ।
त्रैलोक्यत्राणसहिते नारायणि नमो ऽस्तु ते ॥ 17 ॥
किरीट और महान वज्र धारण किए, सहस्र नेत्रों से देदीप्यमान, वृत्र के प्राण हरने वाले इन्द्र की शक्ति, ऐन्द्री के रूप में स्थित उस देवी को नमन। शिव को ही जिसने अपना दूत बनाया, दैत्यों के महाबल को जिसने नष्ट किया, घोर रूप और महानाद वाली उस शिव-दूती को नमन। और विकराल दाढ़ों वाले मुख से युक्त, मुण्डों की माला से विभूषित, चण्ड और मुण्ड का मर्दन करने वाली उस चामुण्डा को नमन।

18 · 19 · 20
किरीटिनि महावज्रे सहस्रनयनोज्ज्वले ।
वृत्रप्राणहरे चैन्द्रि नारायणि नमो ऽस्तु ते ॥ 18 ॥
शिवदूतीस्वरूपेण हतदैत्यमहाबले ।
घोररूपे महारावे नारायणि नमो ऽस्तु ते ॥ 19 ॥
दंष्ट्राकरालवदने शिरोमालाविभूषणे ।
चामुण्डे मुण्डमथने नारायणि नमो ऽस्तु ते ॥ 20 ॥
अन्तिम दो बार देवों ने देवी के समस्त रूपों को एक साथ समेट कर नमन किया। लक्ष्मी, लज्जा, महाविद्या, श्रद्धा, पुष्टि, स्वधा और ध्रुवा, महारात्रि और महामाया, इन सब रूपों में जो व्याप्त हैं, उन नारायणी को नमन। मेधा, सरस्वती, वरा, भूति, बाभ्रवी, तामसी और नियता, हे ईश्वरी, आप प्रसन्न हों; इन्हीं शब्दों के साथ सोलहवीं और अन्तिम बार वह पुकार पूर्ण हुई, “नारायणि नमो ऽस्तु ते।”

21 · 22
लक्ष्मि लज्जे महाविद्ये श्रद्धे पुष्टे स्वधे ध्रुवे ।
महारात्रे महामाये नारायणि नमो ऽस्तु ते ॥ 21 ॥
मेधे सरस्वति वरे भूति बाभ्रवि तामसि ।
नियते त्वं प्रसीदेशे नारायणि नमो ऽस्तु ते ॥ 22 ॥
अब स्तुति का स्वर बदला, और देवी के विश्वरूप का वर्णन उभरा। सब ओर हाथ-पैर, सब ओर नेत्र, शिर और मुख, सब ओर कान, संसार में सब ओर सुनने वाली, हे नारायणि, आपको नमस्कार है। सर्वस्वरूपा, सबकी अधीश्वरी और समस्त शक्तियों से युक्त, हे दुर्गे देवी, हमें समस्त भयों से उबारें; आपको नमन।

23 · 24
सर्वतः पाणिपादान्ते सर्वतो ऽक्षिशिरोमुखे ।
सर्वतः श्रवणघ्राणे नारायणि नमो ऽस्तु ते ॥ 23 ॥
सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते ।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमो ऽस्तु ते ॥ 24 ॥
फिर देवों ने देवी के मुख की, उनके आयुधों की और उनकी घंटा की वन्दना की। तीन नेत्रों से सुशोभित आपका यह सौम्य मुख समस्त भयों से हमारी रक्षा करे; कात्यायनी, आपको नमन। ज्वाला-सा विकराल, अत्यन्त उग्र और समस्त असुरों का नाशक आपका त्रिशूल हमें भय से उबारे; भद्रकाली, आपको नमन। और जो अपने नाद से सारे जगत को भर कर असुरों के तेज को हर लेती है, आपकी वह घंटा हमें पापों से वैसे ही बचाए जैसे माता अपने पुत्रों को।

25 · 26 · 27
एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम् ।
पातु नः सर्वभीतिभ्यः कात्यायनि नमो ऽस्तु ते ॥ 25 ॥
ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम् ।
त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमो ऽस्तु ते ॥ 26 ॥
हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत् ।
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्यो नः सुतानिव ॥ 27 ॥
असुरों के रक्त और मेद से लिपटा, फिर भी आपके हाथ में देदीप्यमान वह खड्ग हमारे कल्याण के लिए हो; चण्डिके, हम आपको प्रणाम करते हैं। प्रसन्न होने पर आप समस्त रोग हर लेती हैं, और रुष्ट होने पर भी भक्त के सब अभीष्ट पूर्ण कर देती हैं; जो आपकी शरण में आते हैं उन पर विपत्ति नहीं आती, बल्कि वे स्वयं औरों के आश्रय बन जाते हैं।

28 · 29
असुरासृग्वसापङ्कचर्चितस्ते करोज्ज्वलः ।
शुभाय खड्गो भवतु चण्डिके त्वां नता वयम् ॥ 28 ॥
रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान् ।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति ॥ 29 ॥
देवों ने कहा कि आज आपने जो धर्म-द्वेषी महा-असुरों का संहार किया, अपनी एक ही सत्ता को अनेक रूपों में मूर्त कर के, ऐसा और कौन कर सकता है, अम्बिके। विद्याओं में, शास्त्रों में, विवेक के दीपकों में और आदि वचनों में आपके समान कौन है; और वही आप ममता-रूपी गहरे अन्धकार में इस समस्त विश्व को भ्रमित भी कर देती हैं।

30 · 31
एतत्कृतं यत्कदनं त्वयाद्य धर्मद्विषां देवि महासुराणाम् ।
रूपैरनेकैर्बहुधाऽऽत्ममूर्तिं कृत्वाम्बिके तत्प्रकरोति कान्या ॥ 30 ॥
विद्यासु शास्त्रेषु विवेकदीपेष्व् आद्येषु वाक्येषु च का त्वदन्या ।
ममत्वगर्ते ऽतिमहान्धकारे विभ्रामयत्येतदतीव विश्वम् ॥ 31 ॥
जहाँ राक्षस हों या उग्र विष वाले नाग, जहाँ शत्रु हों या दस्युओं के दल, जहाँ दावानल हो या समुद्र का मध्य, हर ऐसे संकट में स्थित रह कर आप ही विश्व की रक्षा करती हैं। हे विश्वेश्वरी, आप ही विश्व का पालन करती हैं, विश्वात्मिका हो कर आप ही इस विश्व को धारण करती हैं; विश्व के अधीश्वर भी आपकी वन्दना करते हैं, और जो भक्ति से आपके सम्मुख नम्र होते हैं, वे स्वयं समस्त विश्व के आश्रय बन जाते हैं।

32 · 33
रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्च नागा यत्रारयो दस्युबलानि यत्र ।
दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्वम् ॥ 32 ॥
विश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं विश्वात्मिका धारयसीति विश्वम् ।
विश्वेशवन्द्या भवती भवन्ति विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः ॥ 33 ॥
अन्त में देवों ने अपनी प्रार्थना उस दिन की घटना से जोड़ दी। हे देवी, प्रसन्न हों, और जैसे आज तत्काल असुर का वध हुआ, वैसे ही अरि-भय से नित्य हमारी रक्षा करती रहें; समस्त जगत के पापों को और उत्पात से उपजे महान उपसर्गों को शीघ्र शान्त कर दें। विश्व की पीड़ा हरने वाली, तीनों लोकों के वासियों द्वारा वन्दनीय हे देवी, हम प्रणत जनों पर प्रसन्न हों और समस्त लोकों को वर दें।

34 · 35
देवि प्रसीद परिपालय नो ऽरिभीतेर् नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्यः ।
पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान् ॥ 34 ॥
प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि ।
त्रैलोक्यवासिनामीड्ये लोकानां वरदा भव ॥ 35 ॥
स्तुति से प्रसन्न हो कर देवी ने स्वयं उत्तर दिया। हे सुर-गण, हम वर देने को उद्यत हैं; जो भी जगत के हित का वर आप मन से चाहें, माँग लें, हम वही प्रदान करेंगी। देवों ने अपने लिए कुछ नहीं माँगा। उन्होंने केवल यही विनती की कि हे अखिलेश्वरी, आप तीनों लोकों की समस्त बाधा का प्रशमन यों ही करती रहें और हमारे वैरियों का विनाश करती रहें।

36 · 37
श्रीदेव्युवाच ।
वरदाहं सुरगणा वरं यन्मनसेच्छथ ।
तं वृणुध्वं प्रयच्छामि जगतामुपकारकम् ॥ 36 ॥
देवा ऊचुः ।
सर्वबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम् ॥ 37 ॥
देवों की यह निःस्वार्थ माँग सुन कर देवी ने अपने भावी अवतारों की कथा कहनी आरम्भ की। उन्होंने कहा कि वैवस्वत मन्वंतर के अट्ठाईसवें युग में पुनः शुम्भ और निशुम्भ नाम के दो महा-असुर जन्म लेंगे। तब हम नन्द-गोप के गृह में, यशोदा के गर्भ से जन्म ले कर, विन्ध्याचल में निवास करती हुई उन दोनों का नाश करेंगी; यह योगमाया का वही रूप है जिसकी कथा कृष्ण-जन्म से जुड़ी है।

38 · 39
श्रीदेव्युवाच ।
वैवस्वते ऽन्तरे प्राप्ते अष्टाविंशतिमे युगे ।
शुम्भो निशुम्भश्चैवान्यावुत्पत्स्येते महासुरौ ॥ 38 ॥
नन्दगोपगृहे जाता यशोदागर्भसम्भवा ।
ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी ॥ 39 ॥
इसके पश्चात, देवी ने कहा, हम अत्यन्त रौद्र रूप धर कर पुनः पृथ्वी पर अवतीर्ण होंगी और वैप्रचित्त नामक दानवों का संहार करेंगी। उन उग्र दानवों का भक्षण करते समय हमारे दाँत अनार के फूल की भाँति रक्त से रँग जाएँगे। तब स्वर्ग में देवता और मर्त्यलोक में मनुष्य, दोनों हमें निरन्तर “रक्त-दंतिका” कह कर पुकारेंगे और स्तुति करेंगे।

40 · 41 · 42
पुनरप्यतिरौद्रेण रूपेण पृथिवीतले ।
अवतीर्य हनिष्यामि वैप्रचित्तांस्तु दानवान् ॥ 40 ॥
भक्षयन्त्याश्च तानुग्रान् वैप्रचित्तान् सुदानवान् ।
रक्ता दन्ता भविष्यन्ति दाडिमीकुसुमोपमाः ॥ 41 ॥
ततो मां देवताः स्वर्गे मर्त्यलोके च मानवाः ।
स्तुवन्तो व्याहरिष्यन्ति सततं रक्तदन्तिकाम् ॥ 42 ॥
फिर, देवी ने आगे कहा, सौ वर्ष की अनावृष्टि और जल के सर्वथा अभाव में, मुनियों की स्तुति से, हम बिना किसी योनि के इस भूमि पर प्रकट होंगी। उस समय हम सौ नेत्रों से उन मुनियों को निहारेंगी, और इसी कारण मनुष्य हमें “शताक्षी”, सौ आँखों वाली, कह कर पुकारेंगे। तब वर्षा होने तक हम अपने ही देह से उत्पन्न शाक-वनस्पतियों से समस्त लोक को भर देंगी और सबके प्राण धारण करेंगी।

43 · 44 · 45
भूयश्च शतवार्षिक्यामनावृष्ट्यामनम्भसि ।
मुनिभिः संस्तुता भूमौ संभविष्याम्ययोनिजा ॥ 43 ॥
ततः शतेन नेत्राणां निरीक्षिष्यामि यन्मुनीन् ।
कीर्तयिष्यन्ति मनुजाः शताक्षीमिति मां ततः ॥ 44 ॥
ततो ऽहमखिलं लोकमात्मदेहसमुद्भवैः ।
भरिष्यामि सुराः शाकैरावृष्टेः प्राणधारकैः ॥ 45 ॥
देवी ने कहा कि इसी से उस भूमि पर हम “शाकम्भरी” नाम से विख्यात होंगी, और वहीं “दुर्गम” नामक महा-असुर का वध करेंगी; इसी कारण हमारा नाम “दुर्गा-देवी” प्रसिद्ध होगा। फिर एक और बार हम हिमाचल पर भीम रूप धारण कर मुनियों की रक्षा के लिए राक्षसों का भक्षण करेंगी। तब सब मुनि नम्र हो कर हमारी स्तुति करेंगे, और हमारा नाम “भीमा-देवी” विख्यात होगा।

46 · 47 · 48
शाकम्भरीति विख्यातिं तदा यास्याम्यहं भुवि ।
तत्रैव च वधिष्यामि दुर्गमाख्यं महासुरम् ।
दुर्गादेवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति ॥ 46 ॥
पुनश्चाहं यदा भीमं रूपं कृत्वा हिमाचले ।
रक्षांसि भक्षयिष्यामि मुनीनां त्राणकारणात् ॥ 47 ॥
तदा मां मुनयः सर्वे स्तोष्यन्त्यानम्रमूर्तयः ।
भीमादेवीति विख्यातं तन्मे नाम भविष्यति ॥ 48 ॥
और जब “अरुण” नामक असुर तीनों लोकों में महान बाधा खड़ी करेगा, देवी ने कहा, तब हम असंख्य षट्पद भौंरों से युक्त भ्रामर रूप धारण करेंगी। तीनों लोकों के हित के लिए हम उस महा-असुर का वध करेंगी, और तब लोग हमें सर्वत्र “भ्रामरी” कह कर स्तुति करेंगे। अन्त में देवी ने वह प्रतिज्ञा कही जो युगों तक गूँजती रही, कि इस तरह जब-जब दानवों से उपजी बाधा होगी, तब-तब हम अवतीर्ण हो कर शत्रुओं का संक्षय करेंगी; यह गीता के “यदा यदा हि धर्मस्य” वचन की स्पष्ट गूँज है।



49 · 50 · 51
यदारुणाख्यस्त्रैलोक्ये महाबाधां करिष्यति ।
तदाहं भ्रामरं रूपं कृत्वासंख्येयषट्पदम् ॥ 49 ॥
त्रैलोक्यस्य हितार्थाय वधिष्यामि महासुरम् ।
भ्रामरीति च मां लोकास्तदा स्तोष्यन्ति सर्वतः ॥ 50 ॥
इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविष्यति ।
तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यरिसंक्षयम् ॥ 51 ॥
आगे
अध्याय 12 फल-श्रुति है। इसमें स्वयं देवी इस माहात्म्य के पाठ और श्रवण का फल बताती हैं, कि जो भक्ति से इसे सुनता है, उसकी प्रत्येक विपत्ति में देवी रक्षा करती हैं।