कथा · 24
दम, व्याल, कट: तीन भाई, तीन ग़लतियाँ
तीन राक्षस-भाई हर युद्ध हारते थे। हर एक ने अपना अलग तरीक़ा निकाला – दबाना, बहाना, छुपाना। तीनों फेल। क्यों?
एक ज़माने में तीन राक्षस-भाई थे। दम, व्याल, और कट। तीनों ताक़तवर। तीनों चालाक। मगर तीनों हर बार देवताओं से हार जाते थे।
एक दिन सब बैठे। बात की। “हम क्यों हारते हैं? कोई कमज़ोरी है हमारे भीतर। उसे ढूँढना पड़ेगा।”
दम बोला, “हमारे भीतर इच्छाएँ हैं। क्रोध है। लोभ है। यह हमें भटकाते हैं। मैं इन्हें दबाऊँगा।”
व्याल बोला, “नहीं भाई। दबाने से फटेंगे। मैं इन्हें बहाऊँगा। हर इच्छा को निकाल दूँगा। तब भीतर ख़ाली रहेगा।”
कट बोला, “तुम दोनों ग़लत हो। दबाओगे, तो छुपी हुई फूटेंगी। बहाओगे, तो और बढ़ेंगी। मैं इन्हें छुपाऊँगा। बाहर शांत रहूँगा। भीतर जो हो, होने दूँगा।”
तीनों ने अपना-अपना तरीक़ा अपनाया।
दम ने सख़्त नियम बनाए। हर इच्छा को रोका। क्रोध आया – दबाया। भूख लगी – दबाई। प्यार जागा – दबाया। बाहर से वो शांत दिखता था।
मगर भीतर एक प्रेशर बढ़ता गया। दबी हुई चीज़ें उग्र हो गईं। एक रात नींद में, सब एक साथ फूट पड़ीं। दम पागल हो गया। पागलपन में युद्ध में कूदा। मारा गया।
व्याल ने उल्टा किया। हर इच्छा को बाहर निकाला। क्रोध आया – लड़ पड़ा। भूख आई – खाता रहा। प्यार आया – बहाया। उसकी एक सीमा नहीं रही।
मगर एक अजीब बात हुई। इच्छाएँ ख़त्म नहीं हुईं। और बढ़ीं। एक खाने की इच्छा से दस बनीं। एक प्यार से बीस। उसकी ज़िंदगी एक धारा बन गई – बस इच्छाओं की। एक दिन वो भी बिखर गया। मारा गया।
कट ने सबसे चालाक तरीक़ा अपनाया। बाहर शांत रहा। भीतर सब होने दिया, मगर दुनिया को नहीं दिखाया। मुस्कुराकर बात करता। मीठे शब्द बोलता। भीतर ज़हर भरा होता।
एक दिन ज़हर इतना भर गया कि कट ख़ुद ही बीमार हो गया। उसकी आँखों की रोशनी चली गई। फिर शरीर। मारा गया।
तीनों भाई गए। देवताओं ने जश्न मनाया।
एक छोटा देवपुत्र पास के पेड़ पर बैठा था। उसने जश्न देखा, फिर अपने पिता से पूछा, “पिताजी, इन तीनों ने अलग-अलग तरीक़े किए। फिर भी सब हारे। क्यों?”
पिता ने कहा, “बेटा, तीनों ने एक जैसा काम किया – अपने मन से लड़े। दम ने दबाकर। व्याल ने बहाकर। कट ने छुपाकर। मगर लड़ाई हमेशा हारी जाती है।”
“तो क्या करना चाहिए?”
“देखना। लड़ना मत। बस देखना। जब क्रोध आए, उसे आते देखो। जाते देखो। जब लोभ आए, उसे देखो। मत दबाओ, मत बहाओ, मत छुपाओ। बस देखो।”
“क्या होता है फिर?”
“देखी हुई चीज़ बढ़ नहीं सकती। पकड़ी हुई चीज़ ही बढ़ती है। दबाओ – पकड़ा। बहाओ – पकड़ा। छुपाओ – पकड़ा। सिर्फ़ देखो – पकड़ नहीं रहे।”
देवपुत्र ने सिर हिलाया। फिर अपने मन में दम, व्याल और कट तीनों को देखा। समझ गया – तीनों उसके भीतर भी हैं। मगर अब वो लड़ने नहीं जा रहा था।
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, हम सब के भीतर ये तीन राक्षस बैठे हैं। दम-वाला, व्याल-वाला, कट-वाला। पहली कोशिश तीनों जैसी होती है। मगर असली काम चौथा है – देखना। बाकी सब ग़लतियाँ हैं।”
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