कथा · 21
दाम, व्याल और कट: अभ्यास से बना अहंकार
शम्बर के माया-निर्मित तीन सेनापति पुराने कर्म, भय और देह की चिन्ता के बिना युद्ध में उतरे। देवता उन्हें शस्त्रों से रोक न सके। ब्रह्मा ने युद्ध लम्बा खींचने को कहा, ताकि दोहराया हुआ कर्म उनमें “मैं” और “मेरा” जगा दे। वही अभ्यास उन्हें निर्भीकता से पराजय, अनेक जन्मों और अन्ततः अपने ही वृत्तान्त को सुनकर मिली मुक्ति तक ले गया।
रणभूमि में तीन वासनारहित सेनापति
महर्षि वसिष्ठ ने श्रीराम को दाम, व्याल और कट की उत्पत्ति पहले ही समझा दी थी। पाताल के मायावी दैत्यराज शम्बर ने अपनी सेना की रक्षा के लिए इन तीनों को रचा था। उनके पीछे कोई पुराना जन्म, संचित कर्म या निजी जीवन-कथा नहीं थी। देह की रक्षा, मृत्यु का भय, विजय की चाह और पराजय की आशंका अभी उनके भीतर नहीं उठी थी। वे सामने आए कार्य को शम्बर के संकल्प से करते थे, जैसे आधा सोया हुआ बालक बिना कोई प्रयोजन बनाए हाथ-पाँव हिला देता है। दाम शत्रुओं का दमन करने वाला, व्याल साँप की तरह उन्हें घेरने वाला और कट शत्रु के शस्त्रों से अपनी सेना की रक्षा करने वाला था।

शम्बर ने उन्हीं तीनों की अध्यक्षता में अपनी देवविनाशिनी सेना भूलोक की ओर भेजी। समुद्र-तट की झाड़ियों, पर्वतों की कन्दराओं और पाताल के मार्गों से दैत्य ऊपर आए। उनकी भीड़ ने पृथ्वी और अन्तरिक्ष के बीच का आकाश भर दिया। मेरु के निकुञ्जों और गुफाओं से देवसेना उतरी। दोनों दल वन और पर्वतों के बीच ऐसे मिले कि वसिष्ठ ने उस संग्राम को अकाल में आए प्रलय के समान कहा।

युद्ध की आरम्भिक चोट में ही मस्तक धड़ों से अलग होने लगे। कुण्डलों की चमक से कटे हुए सिर सूर्य और चन्द्रमा जैसे दिखाई देते। तलवारों तथा आयुधों के टकराने से चिनगारियाँ टूटते तारों की तरह उड़तीं। पर्वतों पर प्रहार होता, उनकी शिलाएँ टूटतीं और कन्दराएँ सिंहनाद से गूँजतीं। रक्त की धाराओं ने धूल शान्त कर दी। बाण, शूल, शक्ति, गदा, वज्र, पर्वत और उखाड़े हुए वृक्ष आकाश में चल रहे थे। कोई अस्त्र अग्नि का रूप लेता, कोई अन्धकार फैलाता, कोई निद्रा लाता और कोई जागरण। सर्परूप अस्त्र के सामने गरुड़रूप प्रतिकार आता। मृत दैत्यों को शुक्राचार्य की संजीवनी विद्या फिर उठा देती।
दाम ने देवताओं को चारों ओर से घेरकर सिंहनाद किया। व्याल ने उन्हें खींचते हुए उनके निवासों को तोड़ा। कट ने रण के बीच देव-पंक्तियाँ छिन्न-भिन्न कर दीं। ऐरावत पीछे हट गया और घायल देवसेना का बाँध टूट गया। तीनों ने भागते देवताओं का दूर तक पीछा किया। घने आश्रयों में छिपे देवता हाथ नहीं आए तो दाम, व्याल और कट प्रसन्न होकर पाताल लौटे और शम्बर के सामने उपस्थित हुए।

उनकी पहली सफलता सहज युद्धगति से आई। सामने शत्रु दिखता तो प्रहार होता। अपने घाव, आयु या प्रतिष्ठा के विषय में सोचने वाला निजी केन्द्र उनके भीतर अनुपस्थित था। उनके हाथ भय की गणना के बिना चलते थे। वे शम्बर की माया से बने अत्यन्त अज्ञ प्राणी थे। उनकी दशा तत्त्वज्ञान से रहित वासनाशून्यता की थी। पूर्ण आत्मज्ञान से प्राप्त निर्लिप्तता विवेक पर स्थित होती है। व्यक्तिगत वासना का क्रम अभी आरम्भ नहीं हुआ था। इसी आरम्भिक वासनारहित अवस्था में उनकी शक्ति और आगे की दुर्बलता, दोनों का बीज रखा था।

ब्रह्मा ने युद्ध लम्बा करने को कहा
पराजित देवताओं ने कुछ समय विश्राम किया और ब्रह्माजी की शरण ली। उनके शरीरों पर युद्ध के घाव थे। उन्होंने प्रणाम करके शम्बर की नई रचना का पूरा वृत्तान्त कहा। उन्होंने ऐसे योद्धाओं का सामना किया था जिन्हें जीवित रहने की इच्छा बाँधती नहीं थी, इसलिए भय दिखाकर या चोट पहुँचाकर पीछे हटाना सम्भव नहीं हो रहा था।

ब्रह्माजी ने कहा, “शम्बर का वध एक लाख वर्ष के बाद संग्राम के अधिपति श्रीहरि के हाथ से निश्चित है। अभी उस समय की प्रतीक्षा करनी होगी। दाम, व्याल और कट को माया-युद्ध में लगाए रखिए। उनके सामने जाइए, लड़िए और फिर हट जाइए। व्यवहार और युद्ध का अभ्यास बढ़ेगा तो उनके हृदय में अहंकार उसी प्रकार दिखाई देने लगेगा जैसे दर्पण में बार-बार सामने आई वस्तु का प्रतिबिम्ब पड़ता है।”
उन्होंने समझाया कि वासना से बँधा हुआ शक्तिशाली पुरुष भी पकड़ा जा सकता है। जाल में आया पक्षी अपने पंखों के रहते हुए दूसरे के वश हो जाता है। तृष्णा की जंजीर सिंह को भी बाँध लेती है। दाम, व्याल और कट अभी सुख-दुःख तथा आत्मरक्षा की निजी गणना से मुक्त हैं। जब तक यह स्थिति है, अग्नि के सामने मच्छर जितने असमर्थ देवता उन्हें जीत नहीं पाएँगे। जिस दिन वे सोचने लगेंगे कि यह देह मैं हूँ, जय और पूजा मेरी है, जीवन तथा सम्पत्ति मेरी है, उसी दिन बचाए जाने योग्य वस्तुओं का संसार उनके भीतर बन जाएगा।
देवताओं से कहा गया कि वे आयुधों की संख्या बढ़ाने के स्थान पर तीनों को बार-बार व्यवहार में खींचें। सामने आएँ, रण छेड़ें, कभी सन्धि का संकेत करें, कभी पीछे हटें, कभी छिपें और फिर लौटें। हर प्रतिक्रिया स्मृति बनाएगी। स्मृति से अपेक्षा उठेगी। अपेक्षा प्रिय और अप्रिय का भेद गाढ़ा करेगी। तीनों के भीतर शम्बर की आरम्भिक वासना के विपरीत निजी अभिमान का क्रम इसी अभ्यास से तैयार होगा।
इस योजना में स्तुति या झूठी प्रशंसा का कोई प्रसंग नहीं था। देवताओं को युद्ध इतनी देर तक चलाना था कि क्रिया अपने पीछे आदत छोड़े। बार-बार पीछा करने से “मैं पीछा कर रहा हूँ”, बार-बार विजय से “मैं विजेता हूँ” और बार-बार खतरे से “मुझे बचना है” जैसी धारणाएँ तैयार हों। दोहराया हुआ व्यवहार ही उनके भीतर अहंकार जमाता।
ब्रह्मा का छलपूर्ण युद्ध-उपाय अहंकार बनने की प्रक्रिया पर टिका था। निरन्तर किया गया कर्म अपने कर्ता की धारणा बना सकता है। दाम, व्याल और कट तत्त्वज्ञ नहीं थे। उनमें विवेक से शान्त की गई वासना नहीं थी। उनका अतीत रिक्त था। इसलिए युद्ध का दीर्घ अभ्यास नई वासना लिख सकता था। ब्रह्माजी ने देवताओं को आश्वस्त किया कि जैसे ही यह लेख उनके चित्त में स्थिर होगा, असाधारण बल के रहते हुए भी वे जीते जा सकेंगे।
तीन युद्ध और “मैं” की गाँठ
देवता अपने-अपने लोकों में लौटे, कुछ दिन विश्राम किया और अवसर देखकर फिर दुन्दुभियाँ बजाईं। पाताल के असुर ध्वनि सुनकर ऊपर आए। युद्ध का दूसरा दीर्घ क्रम आरम्भ हुआ। देवताओं ने ब्रह्मा की नीति के अनुसार कई उपाय अपनाए। कभी वाणी से चुनौती दी, कभी दान और सन्धि का व्यवहार किया, कभी भय दिखाकर हटे, कभी अपने लोगों को छिपाकर बचाया, कभी असहायों की तरह शरण माँगी, फिर अस्त्र चलाए और अन्तर्धान हो गए।
रणभूमि बार-बार अपना रूप बदलती रही। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जैसी मायाएँ उठीं। कहीं योद्धा डूबते हुए जान पड़ते, कहीं अग्नि से जलते, कहीं वायु में उड़ते और कहीं अतल गर्त में गिरते। एक माया का प्रतिकार हुआ तो उसी जैसी दूसरी उपस्थित हो गई। असली और अभी-अभी रची हुई छवि का अन्तर पहचानना कठिन था। पर्वत, नदियाँ, शस्त्र, सर्प, गरुड़, पिशाच और अनेक शरीर युद्ध के भीतर प्रकट होकर मिटते रहे।
इस लम्बी रणनीति का एक युद्ध अथवा चरण तीस वर्ष चला। दूसरा पाँच वर्ष, आठ महीने और दस दिन तक चला। तीसरा बारह वर्ष चला। इस पूरे समय देवता सामने आते और बचते रहे; दाम, व्याल और कट पीछा करते और हर नए प्रहार का उत्तर देते रहे। जो काम आरम्भ में केवल प्रस्तुत परिस्थिति की गति था, वह अब स्मृति और अभ्यास से जुड़ चुका था।
ये तीन अवधियाँ किसी एक मनुष्य की युद्ध-स्मृति से बहुत बड़ी हैं। कथा इसी विस्तार से दिखाती है कि संस्कार का निर्माण लगातार सूक्ष्म जमाव है। लड़ने की मुद्रा, शत्रु की प्रतीक्षा, अपने प्रहार का परिणाम और अगले युद्ध की तैयारी, सब मिलकर चित्त में कर्ता की जगह बनाते हैं। दीर्घ अभ्यास के बाद उन्हें अपनी बनाई हुई पहचान उतनी ही पुरानी और स्वाभाविक लगने लगी जितनी किसी जन्मे हुए जीव को अपना नाम और परिवार लगता है।
धीरे-धीरे उनके भीतर “अहम्” का निश्चय आया। फिर विचार उठा कि मेरा जीवन बना रहे, मेरा धन हो, मेरा शरीर स्वस्थ, दृढ़ और भोग के योग्य रहे। शरीर के सिर से पाँव तक सुरक्षित रहने की तृष्णा बनी। स्त्री, भोजन और पान के विषय मन में जगह लेने लगे। आशा ने ममता को जन्म दिया। जिनके लिए पहले विजय और पराजय विचार के विषय नहीं थे, वे अब अपने नाम, बल और सुख को बनाए रखने की चिन्ता करने लगे।

इसी परिवर्तन ने युद्ध में उनके हाथ रोकने शुरू किए। पहले प्रहार के सामने तुरन्त प्रहार होता था। अब प्रत्येक आघात के साथ यह आशंका आती कि हमारा शरीर घायल होगा, शत्रु हमें मार देंगे और हमारी वस्तुएँ चली जाएँगी। जीवन बचाने की व्यग्रता ने धैर्य ढक दिया। रण में उनकी गति धीमी हुई। अपने एक शरीर को बचाने वाले ये विशाल योद्धा देवताओं के सामने साधारण सैनिकों जितने दुर्बल दिखाई देने लगे।
अन्ततः वे युद्धभूमि छोड़कर भागे। उनका पलायन देखकर पूरी दैत्यसेना का क्रम टूट गया। असुर पर्वतों, जंगलों, नदियों, समुद्र-तटों, ग्रामों और नगरों की ओर भागे। कोई लोकालोक की दिशा में गिरा, कोई आन्ध्र, द्रविड़, कश्मीर या पारसीक प्रदेशों की ओर; कोई जाल, लता, गुफा या जल में फँसा। आयुध, कवच और वस्त्र बिखर गए। शम्बर की वह सेना, जिसे तीनों की निर्भीकता अचल बना रही थी, उनके भय के साथ ही छिन्न-भिन्न हो गई।
उनकी पराजय अभ्यास से बने कर्ताभाव के कारण आई। बार-बार की क्रिया ने उन्हें अपना कर्ता मानना सिखाया। कर्ता के साथ फल आया, फल के साथ सुरक्षा, और सुरक्षा के साथ भय। पहले वाले शरीर में चोट को “मेरी हानि” कहने वाला आग्रह अनुपस्थित था। अब वही आग्रह हर प्रहार से पहले परिणाम तौलता था। देवताओं की रणनीति ने अभ्यास के भीतर देहाभिमान को पुष्ट होने दिया। उसी गाँठ ने तीनों की रणशक्ति को बाँध दिया।
सातवें पाताल से कश्मीर की तलैया तक
युद्ध से भागे दाम, व्याल और कट शम्बर के क्रोध से भी भयभीत थे। नष्ट सेना के समाचार के साथ उसके पास लौटने का साहस नहीं हुआ। वे अपने लोक से निकलकर सातवें पाताल में पहुँचे, जहाँ यमराज के सेवक नरकों की व्यवस्था सँभालते थे। यमकिंकरों ने शरणागत तीनों को अभय दिया और उन्हें तीन स्त्रियाँ दीं। अब युद्ध से बनी “मैं” और “मेरा” की धारणा परिवार, अधिकार और गृहस्थ जीवन में फैलने लगी।
वे वहाँ दस हजार वर्ष रहे। दस हजार वर्षों के इस निवास में उनका मन कहता रहा, यह मेरी स्त्री है, यह मेरी कन्या है और यह मेरी प्रभुता है। जिस ममता ने रणभूमि में शरीर बचाने की इच्छा जगाई थी, उसने पाताल में सम्बन्धों और पद के चारों ओर नया घेरा बना लिया। उनकी पुरानी प्रचण्डता का स्मरण धुँधला पड़ा और यमकिंकरों के बीच मिला आश्रय ही उनका परिचित संसार बन गया।
एक दिन यमराज महानरकों के किसी कार्य को देखने उस प्रदेश में आए। उस समय उनके साथ छत्र और चामर जैसे राजचिह्न नहीं थे। दाम, व्याल और कट उन्हें पहचान न सके। उन्होंने धर्मराज को साधारण सेवक समझा और प्रणाम नहीं किया। यमराज ने एक भ्रुकुटि चढ़ाई। उसी से तीनों अपनी स्त्रियों, बन्धुओं और प्रियजनों सहित रौरव आदि नरकों की जलती भूमियों में जा पड़े। वे सब अग्नि में वैसे जले जैसे वनाग्नि छोटे वृक्षों को उनके पत्तों और फूलों सहित जला देती है।
हिंसा, बन्धन और क्रूर सेवा के संस्कारों ने फिर नई देहें बनाई। वे राजकिंकर अथवा किरात हुए, फिर कौए, गीध और सुग्गे बने। त्रिगर्त में सूकर हुए, पर्वतों पर मेघ बने और मगध देश में कीट। इसके अतिरिक्त भी अनेक योनियों से गुजरे। हर देह अपने आहार, भय और वातावरण के अनुसार पूर्ण जीवन जैसी लगी। शम्बर की माया से एक क्षण में बने तीन सेनापति अब संचित वासनाओं के कारण जन्म-मरण की लम्बी परम्परा में बँध चुके थे।

अन्त में वे कश्मीर देश के वन में एक छोटी तलैया की मछलियाँ बने। गर्मी और वनाग्नि से जल कम तथा गरम हो गया था। कीचड़ सूख रहा था। वे सेवार के छोटे टुकड़ों की चाह में उसी मैले जल में पड़े थे। वसिष्ठ कहते हैं कि वे ठीक से जी भी नहीं रहे थे और मर भी नहीं रहे थे। देवताओं के निवास तोड़ने वाले तीन महाकाय योद्धाओं की चेतना अब थोड़े-से भोजन और थोड़े-से जल में अटकी हुई थी।
राम ने इस प्रसंग पर पूछा कि जो दाम, व्याल और कट शम्बर की माया से बने थे और वास्तव में असत् कहे गए, उन्हें ये दुःख कैसे मिल सकते हैं। वसिष्ठ ने प्रश्न की दिशा राम और अपनी ओर लौटा दी। व्यवहार में दाम, देवता, असुर, राम और वसिष्ठ सभी बोलते, चलते और अनुभव करते दिखाई देते हैं। तत्त्वदृष्टि में किसी देह की स्वतंत्र सत्ता चिदाकाश से अलग नहीं है। मृगतृष्णा का जल दिखाई देता है, पर उसकी जल-सत्ता नहीं बनती। उसी तरह संवित् जिस रूप को अपना अनुभव मानती है, वह रूप उसके लिए पूरा अनुक्रम बन जाता है।
वसिष्ठ ने सत् और असत् को दो परस्पर असम्बद्ध कोटियाँ मानने से उपजी कठिनाई भी खोली। व्यवहार की कसौटी से राम की सभा और दाम का युद्ध दोनों अनुभव में उपस्थित हैं। आत्मज्ञान की कसौटी से दोनों का अलग पदार्थत्व बाधित होता है। शुद्ध, सर्वगत, शान्त चिदाकाश ही हर रूप को प्रकाशित करता है। चेतना अपने को जिस आकार में जानती है, उसी आकार का अनुभव उठता है। इसलिए माया का पात्र दुःख महसूस करता हुआ दिखाई दे सकता है, और ज्ञानी उस अनुभूति को स्वतंत्र परम सत्य का पद नहीं देता।
माया से बना आरम्भ दुख की अनुभूति को हलका नहीं करता। अनुभव के भीतर वासना कारण और फल का क्रम रचती है। दाम, व्याल और कट ने देह को अपना माना तो उसके बचने और मिटने की शर्तें भी अपनी मान लीं। उसी स्वीकार ने शम्बर की अस्थायी रचना को जन्मों की दीर्घ परम्परा जैसी सत्ता दी।
सारसों के बाद तीन अलग ठिकाने
राम ने पूछा, “मुनिवर, इन तीनों के दुःख का अन्त कब होगा?” वसिष्ठ ने बताया कि नरक में दण्ड मिलने के समय यमराज के सेवकों ने भी यही प्रश्न किया था। धर्मराज ने उत्तर दिया था कि जब ये तीनों आपस में अलग होकर अपने ही वृत्तान्त को सुनेंगे, शम्बर की माया से बने जीवभाव और अपनी मूल वासनारहित चिन्मात्रता को पहचानेंगे, तब यथार्थ तत्त्व का बोध पाकर मुक्त होंगे।
कश्मीर की तलैया में वे बार-बार मछली-योनि से गुजरे। ग्रीष्म में भैंसों और सूअरों ने उस उथले स्थान को रौंदा। समय आने पर मछली की देहें समाप्त हुईं और वे उसी कमल-ताल में सारस बने। श्वेत तथा नील कमलों, सेवार की लताओं, शीतल भँवरों और जल की बूँदें बरसाती मेघ-पंक्तियों के बीच उन्होंने बहुत समय तक विहार किया। इस जीवन में उनका चित्त क्रमशः स्वच्छ हुआ। विचार की क्षमता जागी और तीनों धाराएँ अलग-अलग अन्तिम अवस्थाओं की ओर चलीं।
कश्मीर में पर्वतों और वृक्षों से सुशोभित अधिष्ठान नाम की नगरी थी। उसके मध्य प्रद्युम्न शिखर नाम का छोटा ऊँचा प्रदेश था। उस शिखर पर आकाश को छूती अट्टालिका वाले घर के ईशान कोण में ऊँची दीवार की दरार थी। उसके पास तिनकों का घोंसला था। व्याल वहाँ गौरैया बना। उसकी चीं-चीं ऐसे अल्पपाठी व्यक्ति के निरर्थक उच्चारण जैसी थी जिसने शास्त्र के शब्द तो छू लिए हों, अर्थ तक न पहुँचा हो।
उस समय अधिष्ठान के राजा श्रीयशस्कार थे। उनकी समृद्धि की तुलना इन्द्र से की गई है। उनके राजमहल में एक विशाल लकड़ी के स्तम्भ की पीठ पर छोटा छेद था। दाम उसी छेद में मन्द ध्वनि करने वाला मच्छर बना। विशाल सेना का पुराना सेनापति अब ऐसे सूक्ष्म शरीर में था जिसे महल के निवासी सामान्यतः देख भी न पाते।
नगर में रत्नावली विहार नाम का क्रीड़ागृह भी था। वहाँ राजा का मन्त्री नरसिंह रहता था। उसने श्रुति, युक्ति, गुरु के उपदेश और अपने अनुभव से बन्धन तथा मुक्ति का निश्चय प्राप्त किया था। कट उसी के घर में क्रीड़ा के लिए रखी गई मैना बना। उसका निवास चाँदी के पिंजरे में था। तीनों एक नगर और एक व्यापक कथा से जुड़े थे, फिर भी वे एक छज्जे पर इकट्ठे नहीं बैठे थे। गौरैया दीवार की दरार के पास, मच्छर राजमहल के स्तम्भ में और मैना मन्त्री के घर में थी।
अपना वृत्तान्त सुनने की घड़ी
मन्त्री नरसिंह ने दाम, व्याल और कट का श्लोकबद्ध वृत्तान्त सुनाया। चाँदी के पिंजरे में बैठी मैना ने अपने ही आरम्भ, युद्ध, अहंकार, भय और जन्मों की कथा सुनी। उस श्रवण से कट की चेतना में शम्बर से कल्पित जीवभाव की पहचान खुली। अपरिच्छिन्न आत्मा का स्मरण जागा और वह आवागमन से रहित परम निर्वाण को प्राप्त हुई।
प्रद्युम्न शिखर की गौरैया ने वहाँ रहने वाले लोगों से वही कथा सुनी। व्याल के लिए कोई औपचारिक सभा नहीं हुई। मनुष्यों की बातचीत में अपने पुराने वृत्तान्त की ध्वनि उस छोटे पक्षी तक पहुँची और उसने परम निर्वाण पाया। राजमहल के स्तम्भ की लकड़ी में रहने वाले मच्छर ने भी लोगों को प्रसंगवश पूर्वजन्म के वृत्तान्त से जुड़ी ब्रह्मकथा कहते सुना। दाम की चेतना में पहचान हुई और उसे शान्ति मिली।
तीनों की मुक्ति एक ही क्षण या एक दृश्य में घटित होने की आवश्यकता नहीं थी। यमराज का कथन था कि वे अलग होकर अपना वृत्तान्त सुनेंगे। प्रत्येक ने अपनी वर्तमान देह की सीमा में वही सूत्र पाया। मैना को ज्ञानी मन्त्री का सुव्यवस्थित पाठ मिला। गौरैया ने आसपास के लोगों से सुना। मच्छर तक बातचीत का अंश पहुँचा। ज्ञान की बात सुनने वाले शरीर के आकार पर निर्भर नहीं हुई। उसके लिए चित्त की परिपक्वता और अपनी मिथ्या पहचान की जड़ तक शब्द का पहुँचना आवश्यक था।
यहाँ “अपनी कथा सुनना” बीती घटनाओं की रोचक पुनरावृत्ति नहीं है। वृत्तान्त उन्हें बताता है कि जिस “मैं” को उन्होंने अनादि और स्वाभाविक माना, वह युद्ध के अभ्यास से बना था। उसके पहले उनका कोई निजी इतिहास नहीं था। उसके बाद उसी ने जीवन, धन, शरीर, स्त्री, कन्या, प्रभुता और असंख्य देहों की शृंखला को “मेरा” कहा। सुनते समय कारण का पूरा क्रम सामने आया। बना हुआ अहंकार पहचाना गया और उसके साथ शम्बर से कल्पित सीमित जीवभाव का आग्रह टूट गया।
वसिष्ठ इस परिणाम को शास्त्र, उचित अधिकारी और परिपक्व चित्त के प्रसंग में रखते हैं। अत्यन्त अज्ञ व्यक्ति के लिए “जगत् असत्य है” वाला वाक्य अनुभव बदलने की क्षमता नहीं रखता। पूर्ण ज्ञानी उस समझ में पहले से स्थित होता है। उपदेश उस साधक में फलता है जिसकी बुद्धि कुछ जागी है, जिसने तप, विवेक और अनुभव से सुनने की क्षमता पाई है। दाम, व्याल और कट के लिए असंख्य अवस्थाओं का परिणाम यह हुआ कि अंतिम छोटे शरीरों में वे उस वाक्य को ग्रहण कर सके जिसे प्रारम्भिक प्रचण्डता के समय सुनते तो शायद अर्थ न खुलता।
मच्छर, गौरैया और मैना की देहें उनके पुराने असुर-शरीरों से अत्यन्त छोटी थीं। उनकी सुनने की पात्रता चित्त में बनी हुई पहचान को देखने की परिपक्वता से आई। इसी कारण एक को श्लोकबद्ध पाठ मिला, दूसरे को स्थानीय लोगों की चर्चा और तीसरे को प्रसंगवश कही गई ब्रह्मकथा, फिर भी तीनों माध्यमों ने अपने योग्य फल दिए। शिक्षण का बाहरी समारोह अलग था; भीतर पहचानी जाने वाली गाँठ एक ही देहाभिमान की थी।
दाम, व्याल और कट आरम्भ में शम्बर की माया से बने वासनारहित योद्धा थे, पर उनमें आत्मबोध अनुपस्थित था। दीर्घ युद्धाभ्यास ने देहाभिमान को जगह दी और कभी देवताओं को परास्त करने वाले सेनापति क्रमशः नरक, राजकिंकर, पक्षी, पशु, मेघ और कीट बने; अन्ततः मच्छर, गौरैया और मैना जैसी लघु देहों तक पहुँचे। वसिष्ठ इस पतन को आत्मबोध-विहीन वासनारहित अवस्था की अस्थिरता का उदाहरण बनाते हैं। विवेक से प्रकाशित वासनाक्षय साधक को स्थिर करता है। अभ्यास से आई अस्थायी वासनाशून्यता नए संस्कारों के लिए खुली रह सकती है। इसलिए कथा की मुक्ति वासना के थमने के साथ अपने बने हुए जीवभाव को पहचानने और अपरिच्छिन्न चिदाकाश के बोध को जोड़ती है। अंतिम छोटी देहें चित्त की परिपक्वता को किसी बाहरी आकार या पुराने पद से स्वतंत्र दिखाती हैं।
अहंकार के तीन अर्थ
कथा पूरी होने पर वसिष्ठ ने अहंकार के विषय को विस्तार दिया। देहाभिमान ने तीन वासनारहित योद्धाओं को जन्म-मरण में डाला था, इसलिए “अहंकार” शब्द का अर्थ स्पष्ट करना आवश्यक था। हर “अहम्” समान बन्धनकारी नहीं कहा गया। शिक्षा के क्रम में दो शुद्ध दृष्टियाँ स्वीकार की जाती हैं और तीसरी लौकिक दृष्टि त्याज्य है।
पहली दृष्टि है, “मैं यह सम्पूर्ण विश्व हूँ और कभी नष्ट न होने वाला परमात्मा हूँ; मुझसे अलग कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं।” यह सर्वात्मभाव सीमित व्यक्ति की प्रतिष्ठा नहीं बढ़ाता। वह अपने को सम्पूर्ण चेतना के रूप में समझने की दिशा देता है। दूसरी दृष्टि है, “मैं सब सीमित वस्तुओं से अलग, अत्यन्त सूक्ष्म साक्षी हूँ।” यह विवेक साधक को हाथ-पाँव, नाम और परिस्थिति से अपनी पूरी पहचान बाँधने से रोकता है। दोनों अभ्यास देहात्मबुद्धि को ढीला करते हैं। परिपक्व अवस्था में इन शिक्षात्मक धारणाओं का आग्रह भी शान्त हो जाता है।
तीसरा अहंकार कहता है, “ये हाथ, पैर और यही शरीर मैं हूँ।” इसी से दाम, व्याल और कट का पतन हुआ। शरीर को अपना पूरा स्वरूप मानते ही उसके सुख को बनाए रखना और उसके नाश से डरना अनिवार्य लगने लगा। “मैं” से “मेरा” की शाखाएँ निकलीं। धन, सम्बन्ध, पद, विजय और भोजन उसी वृक्ष पर जुड़े। युद्ध का निर्भय योद्धा अपने नाश की कल्पना से काँपने लगा और बाद की हर देह को नई तरह से बचाने में लग गया।
वसिष्ठ ने राम को शुभ उद्यम से पीछे न हटने को कहा। अभ्यास ने इन तीनों को बाँधा था; सुविचारित अभ्यास चित्त को शुद्ध भी कर सकता है। आत्मज्ञान की ओर प्रयत्न, सत्शास्त्र का विचार, गुरु की सेवा और सज्जनों की संगति इसके साधन हैं। सज्जन की पहचान उन्होंने उसके प्रभाव से बताई: जिसके साथ रहने से लोभ, मोह और क्रोध प्रतिदिन घटें और जिसका आचरण शास्त्रसम्मत हो, वही इस अर्थ में सज्जन है।
शुभ उद्यम की शक्ति समझाने के लिए वसिष्ठ ने नन्दी, बलि से पीड़ित देवताओं, राजा मरुत्त के यज्ञ में संवर्त, विश्वामित्र, उपमन्यु, श्वेत ऋषि और सावित्री के उदाहरण स्मरण कराए। इन प्रसंगों का संयुक्त आशय स्पष्ट है। दृढ़ और शास्त्रसम्मत प्रयत्न अपना फल देता है। वसिष्ठ राम को जन्म-मरण और दुःख की मूल भ्रान्ति दूर करने वाले आत्मज्ञान को सर्वोत्तम प्रयत्न का विषय बनाने को कहते हैं।
अभ्यास का क्रम स्पष्ट है। साधक पहले देह तक सीमित तीसरे अहंकार को विवेक से छोड़ता है। सर्वात्मभाव या शुद्ध साक्षीभाव की दृष्टि से श्रवण, गुरुसेवा और सात भूमिकाओं में आगे बढ़ता है। अन्त में उन सहायक धारणाओं को भी छोड़कर अपरिच्छिन्न आत्मा में स्थित होता है। दाम, व्याल और कट की कथा में बार-बार किया गया कर्म पहले अज्ञान में बन्धन बना; परिपक्व विवेक के साथ अपने ही वृत्तान्त का श्रवण अन्ततः मुक्ति का द्वार बना।