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वासुदेव: समंगा-तट से शुक्र की वापसी

कथा · 36

वासुदेव: समंगा-तट से शुक्र की वापसी

महर्षि भृगु अपने पुत्र शुक्र को मृत मान चुके हैं, तभी काल समंगा नदी के किनारे तप में स्थित वासुदेव को दिखाते हैं। आठ सौ वर्षों की साधना ने उस तपस्वी के मन को शान्त कर दिया है। एक क्षण में लौटी स्मृति अब पिता और पुत्र को मन्दराचल के उस अस्थिपंजर तक ले जाएगी, जहाँ दो शरीर अपने-अपने नियत अन्त की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

काल ने जीवित पुत्र दिखाया

महर्षि भृगु ने मन्दराचल पर अपने पुत्र शुक्र का त्यक्त शरीर देखा था और उसके लिए काल को दोष दिया था। काल ने उनके क्रोध का उत्तर शुक्र के मन की लम्बी यात्रा बताकर दिया। पर्वत पर पड़ा शरीर जीवित नहीं रहा था, पर मन और वासना द्वारा चलने वाला जीवन दूसरे जन्मों में आगे बढ़ चुका था।

काल ने उस यात्रा के वर्तमान पड़ाव का परिचय दिया। शुक्र ने एक ब्राह्मण परिवार में वासुदेव के नाम से जन्म लिया था। वेदों का अध्ययन और इन्द्रियों का संयम करने के बाद वे समंगा नदी के तट पर तप करने चले गए थे।

काल ने कहा, “वे अभी वहीं स्थित हैं। सिर पर जटाएँ हैं, कलाइयों में रुद्राक्ष बँधे हैं और मन अचल है। आठ सौ वर्षों से उनका तप बिना विचलन के चल रहा है।”

काल के निर्देश पर भृगु ने योगदृष्टि खोली। एक ही क्षण में उन्होंने अपने पुत्र के मन की आरम्भ से वर्तमान तक पूरी गति देख ली। स्नेह ने अब तक उनका ध्यान मन्दराचल के निष्प्राण शरीर पर बाँध रखा था और उसी एक घटना को शुक्र की सम्पूर्ण नियति बना दिया था।

भृगु का क्रोध शान्त हुआ। उन्होंने स्वीकार किया कि शोक से उनकी बुद्धि ढक गई थी और काल ने मनमाने ढंग से उनके पुत्र का विनाश नहीं किया था। अब उन्हें दिखाई दे रहा था कि शरीरों की यह शृंखला शुक्र के अपने मन में बसे संकल्पों, वासनाओं और अनुभवों के अनुसार चली है।

काल ने समझाया कि नष्ट होते शरीरों के बीच जीवन की निरन्तरता कैसे अनुभव होती है। स्थूल शरीर कुछ समय के लिए भौतिक साधन देता है। मन से बना अन्तःशरीर संकल्प, स्मृति, वासना और अनुभव की दिशा को लेकर चलता है। भीतर की प्रवृत्ति बदलती है तो उसके सामने आने वाला संसार और उसे अनुभव करने वाला शरीर भी बदल जाता है।

व्यवहार में कर्म और फल मन की प्रवृत्ति के अनुसार प्रकट होते हैं। परम ज्ञान में सभी दृश्य चैतन्य के भीतर रहते हैं और उससे अलग कोई स्वतन्त्र कर्ता नहीं मिलता। काल ने भृगु के सामने दोनों स्तर रखे, ताकि वे शोक, कर्म और ज्ञान को समझ सकें और समय को मनमानी करने वाला शत्रु न मानें।

यह संवाद सन्ध्या तक चला और वसिष्ठ की सभा का उस दिन का उपदेश भी यहीं रुका। अगले प्रातः वसिष्ठ ने कथा आगे बढ़ाई। काल भृगु के आरोप का समाधान कर चुके थे। अब दोनों उस तपस्वी के पास जाने वाले थे, जिसका जीवन भृगु ने योगदृष्टि में देख लिया था।

समंगा की ओर अवतरण

काल और भृगु मन्दराचल के ऊँचे प्रदेश से नीचे उतरे। मार्ग में स्वर्णिम लताओं से भरे पर्वतीय उपवन, देवताओं और सिद्धों के विहार, झरने, पुष्पों से लदे वृक्ष, गाँव और नगर आए। यह यात्रा उन्हें शुक्र के प्रथम शरीर के स्थान से उस नदी की ओर ले जा रही थी, जहाँ उनका वर्तमान शरीर समाधि में बैठा था।

समंगा की लहरों पर गिरे हुए फूल बह रहे थे। उसके तट पर भृगु ने एक कृश और निश्चल तपस्वी को देखा। वासुदेव के भीतर संकल्प और विकल्प की गति शान्त थी। बाहर से ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता था कि दो तेजस्वी अतिथि उनके पास आ गए हैं।

काल ने साधक की ओर संकेत किया। उन्होंने भृगु से कहा, “यह आपके पुत्र हैं।” फिर ऊँचे स्वर में पुकारा, “जागो।”

वह शब्द समाधि की शान्ति तक पहुँचा। वासुदेव ने धीरे-धीरे नेत्र खोले और काल तथा भृगु को देखा। अभी वे उन्हें पहचान नहीं सके। उन्हें लगा कि दो दिव्य पुरुष नदी के तट पर उनके पास पधारे हैं।

वासुदेव उठे, दोनों अतिथियों का आदर किया और एक शिला पर बैठने का निवेदन किया। तीनों तेजस्वी पुरुष साथ बैठे तो उनका दृश्य ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर की स्मृति जगाता था।

वासुदेव ने कहा, “आपके आगमन से मेरे मन का वह आवरण हट गया है, जिसे अध्ययन, तप और उपासना दूर नहीं कर सके। कृपया अपना परिचय और यहाँ आने का कारण बताइए।”

भृगु ने उस पुत्र को देखा, जो उनका आदर कर रहा था, पर सम्बन्ध भूल चुका था। उन्होंने कहा, “आप ज्ञानी हैं। अपने ज्ञान को स्वयं की ओर मोड़िए और स्मरण कीजिए कि आप कौन हैं।”

अनेक शरीरों की स्मृति

वासुदेव ने नेत्र बन्द किए और अन्तर्मुख हो गए। एक क्षण में छिपी हुई शृंखला उनके सामने खुल गई। जन्म और मृत्यु, सुखद और दुःखद अवस्थाएँ, स्वर्ग और नरक, अनेक स्थान और वे सभी शरीर स्मरण में आए, जिनसे होकर उनका मन गुजरा था।

उन्होंने भृगुपुत्र शुक्र के रूप में अपना पूर्व जीवन देखा। मन्दराचल पर छोड़ा गया युवा शरीर याद आया और सामने बैठे ऋषि में पिता की पहचान हुई। वर्तमान नाम वासुदेव अब एक बहुत लम्बी जीवन-धारा के भीतर अपना स्थान पा चुका था।

नेत्र खुलने पर भृगु के प्रति उनका भाव तेजस्वी अतिथि के सम्मान से पिता की पहचान में बदल गया। उन्होंने कहा, “मैंने सुख और दुःख की सभी प्रकार की अवस्थाएँ भोगी हैं। उनकी शृंखला अब स्पष्ट है और मैं आत्मज्ञान में विश्राम पा रहा हूँ।”

स्मृति लौटने से ज्ञान उत्पन्न नहीं हुआ था। आठ सौ वर्षों के तप और पहले से परिपक्व समझ ने वह शान्ति तैयार की थी, जिसमें पूरी यात्रा दिखाई दे सके। स्मरण ने भूला हुआ सम्बन्ध लौटाया और पूर्व शरीर से जुड़े शेष कार्य को सामने रखा।

वासुदेव ने कहा, “पिताजी, मुझे उस शरीर के पास ले चलिए, जिसे मैं मन्दराचल पर छोड़ आया था। मैं उसे देखना चाहता हूँ।”

काल, भृगु और वासुदेव आकाश में उठे। नीचे समंगा का तट दूर होता गया और वे पर्वत की ओर लौट चले। नदी के तपस्वी का रूप धारण किए हुए वासुदेव अपने पूर्व जीवन के स्थान पर पहुँचने वाले थे।

मन्दराचल का अस्थिपंजर

पुराना शरीर सूखकर अस्थिपंजर बन चुका था। वासुदेव उन अवशेषों के सामने खड़े हुए, जिन्हें कभी आभूषणों और सुगन्ध से सजाया गया था, जिनकी सुन्दरता की प्रशंसा होती थी और जिनकी बड़ी सावधानी से रक्षा की जाती थी। इसी रूप ने शुक्र के यौवन, इच्छा, अभिमान, संगीत और भोग को धारण किया था।

अब उन रिक्त स्थानों में कीट चलते थे, जहाँ कभी जीवित अंग थे। कोई चंचल मन उस ढाँचे से सुख खोजने या अपने रूप की रक्षा करने को नहीं कह रहा था। वासुदेव ने पुराने शरीर को सम्बोधित किया और उसकी पिछली शोभा तथा वर्तमान स्थिरता के बीच की दूरी पर विचार किया।

यह देखकर श्रीराम ने प्रश्न किया। शुक्र अपनी लम्बी यात्रा में अनेक शरीर धारण कर चुके थे। उन सबमें इसी शरीर के लिए इतनी विशेष पहचान और स्नेह क्यों जागा?

वसिष्ठ ने बताया कि भृगु से उत्पन्न शरीर इस जीवन-क्रम का सबसे प्रबल और आरम्भिक देह-संस्कार रखता था। लम्बे अभ्यास ने उससे एक विशिष्ट सम्बन्ध बना दिया था। ज्ञान ने बाँधने वाली आसक्ति दूर कर दी, पर उसी रूप से पक चुके शेष कर्म को पूरा होना था।

ज्ञानी व्यक्ति में स्नेह, शिष्टाचार, कर्तव्य और स्वीकृत संस्कारों का पालन दिखाई दे सकता है। उनका बन्धन अधिकार-बुद्धि और वासना से बनता है। इसलिए भृगु का आलिंगन और शुक्र का पुत्रभाव ज्ञान से विचलन उत्पन्न किए बिना घटित हो सकता था।

काल ने विचार के क्रम को रोककर वासुदेव से कहा, “भृगुपुत्र, समंगा-तट के वासुदेव शरीर को छोड़कर इस पुराने शरीर में फिर प्रवेश कीजिए, जैसे कोई राजा अपनी राजधानी में लौटता है।”

फिर उन्होंने शेष दायित्व बताया। पुनर्जीवित शुक्र-शरीर द्वारा भृगुपुत्र को तप करना था, दैत्यों के आचार्य और ग्रहपति का पद ग्रहण करना था। वह शरीर ब्रह्मा के दिन के अन्त तक, अर्थात एक हजार चतुर्युगों तक रहेगा। उसका कार्य पूरा होने पर आगे कोई शरीर नहीं लिया जाएगा।

काल का आदेश त्यक्त रूप के पुराने अभिमान को जगाने के लिए नहीं था। उन्होंने उस देह की पहचान की, जिसके माध्यम से शेष उत्तरदायित्व पूरा होना था। इतना कहकर काल अदृश्य हो गए।

शुक्र की वापसी

वासुदेव ने नियत क्रम पर विचार किया और उसे स्वीकार कर लिया। उन्होंने समंगा के तपस्वी शरीर को छोड़ दिया। वह उखड़ी हुई लता की तरह निष्प्राण होकर गिरा और चेतन सत्ता भृगु से उत्पन्न सूखे शरीर में प्रवेश कर गई।

एक क्षण के लिए एक शरीर नया त्यक्त पड़ा था और दूसरा अभी भी अस्थिपंजर दिखाई दे रहा था। भृगु ने कमण्डलु से जल लिया, उसे मन्त्रों से अभिमन्त्रित किया और शुक्र के पुराने शरीर पर छिड़का।

सूखी नाड़ियाँ भरने लगीं। श्वास चली, शरीर में मांस लौटा और पहले की युवावस्था तथा कान्ति प्रकट हो गई। जो ढाँचा कुछ देर पहले पुनर्जीवन से परे दिखाई देता था, उसमें लौटा हुआ जीवन बैठ गया।

शुक्र उठे, पिता को प्रणाम किया और भृगु के आलिंगन में आए। अनेक जन्मों से चली दूरी समंगा के तट पर आठ सौ वर्षों के तप के बाद इस मिलन तक पहुँची थी। पिता और पुत्र का स्नेह दोनों ज्ञानियों में स्वामित्व का बन्धन बनाए बिना प्रवाहित हुआ।

इसके बाद उन्होंने वासुदेव के त्यक्त शरीर का कर्तव्य पूरा किया। पिता और पुत्र ने स्वीकृत रीति से अन्त्येष्टि की और उस देह का दाह किया, जिसमें लम्बी तपस्या सम्पन्न हुई थी। आत्मज्ञान ने उन्हें शरीर के प्रति उचित सम्मान से विमुख नहीं किया।

भृगु और शुक्र जीवन्मुक्त ऋषियों के रूप में साथ रहे। अनुकूल और प्रतिकूल घटनाएँ उनके जीवन में आ सकती थीं और दोनों उन्हें समान समझ से ग्रहण करते थे। उनका आचरण चलता रहा, पर उससे स्थायी व्यक्तिगत पहचान बनाने की माँग समाप्त हो चुकी थी।

समय आने पर शुक्र दैत्यों के आचार्य और ग्रहपति बने, जैसा काल ने कहा था। भृगु अपने शान्त आत्मस्वरूप में स्थित रहे। समंगा के तपस्वी का प्रयोजन पूरा हुआ, पुराने शरीर ने अपना शेष कार्य सँभाला और दोनों देहों के प्रति उचित संस्कार पूर्ण किए गए।

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