राजा वासुदेव: शून्य के दर्शन

कथा · 37

राजा वासुदेव: शून्य के दर्शन

राजा का ध्यान इतना गहरा गया कि उन्होंने पूरा अस्तित्व पार कर लिया। आख़िर में जो मिला, वो शून्य था। मगर शून्य के नीचे कुछ और भी था।

राजा वासुदेव एक छोटे से राज्य के स्वामी थे। ज़्यादा बड़े राजा नहीं, मगर बहुत साधना करते थे। हर सुबह दो घंटे, हर शाम दो घंटे, ध्यान।

एक दिन उनका ध्यान बहुत गहरा हुआ।

उनकी चेतना देह से बाहर निकली। महल के ऊपर। फिर नगर के ऊपर। फिर राज्य के।

उन्होंने पूरा भारतवर्ष देखा। फिर पूरी पृथ्वी।

उनकी चेतना और बढ़ी। पृथ्वी छोटी हो गई। एक नीले गोले जैसी।

आगे – सूर्यमंडल। सूरज, चाँद, ग्रह।

आगे – तारामंडल।

आगे – आकाशगंगा।

आगे – असंख्य आकाशगंगाएँ।

आगे – कुछ भी नहीं।

केवल अंधेरा। न तारा, न प्रकाश, न समय। पूर्ण शून्य।

राजा डरे। ऐसा कुछ भी नहीं था। सब चीज़ें ख़त्म।

उन्होंने ख़ुद को टटोला। अपनी देह नहीं थी। अपना नाम नहीं था। अपनी पहचान नहीं थी। बस एक देखने वाली चेतना थी।

“क्या यह मृत्यु है?”

एक आवाज़ आई। उन्हीं के भीतर से।

“नहीं। यह शून्य है। मगर शून्य अंत नहीं है। शून्य के नीचे और कुछ है। ध्यान दे।”

राजा ने ध्यान दिया।

शून्य के भीतर कुछ था। एक बहुत हल्की सी हलचल। एक बहुत धीमी सी धारा।

“यह क्या है?”

“यह वो है जो शून्य को धारण करता है। शून्य भी कुछ है, अकेला नहीं रह सकता। उसे कोई पकड़े हुए है। वो जो पकड़े है – वो असली है।”

राजा ने उसे ढूँढना शुरू किया।

वो खोज में और गहरा गया।

एक मीठा सा अनुभव हुआ। न शून्य, न ब्रह्मांड। बस एक स्थिर सत्ता। जिसमें सब कुछ था और कुछ नहीं था।

राजा ने उस सत्ता को छुआ। मगर “छुआ” शब्द ग़लत है। वो सत्ता बन गए।

एक पल के लिए, सब अंतर मिट गया।

फिर वो धीरे-धीरे लौटे। शून्य से होकर। आकाशगंगाओं से होकर। पृथ्वी से होकर। राज्य से होकर। महल से होकर। अपनी देह में।

आँखें खोलीं।

हाथ काँप रहे थे। मगर भीतर से वो बहुत स्थिर थे।

उन्होंने अपने मंत्री को बुलाया। बोले, “मैं ने आज कुछ देखा।”

“क्या, महाराज?”

“शून्य। और शून्य के नीचे जो है। दोनों।”

मंत्री ने कुछ नहीं समझा। मगर राजा का चेहरा अलग था।

उस दिन से वासुदेव ने राज्य उसी तरह चलाया। मगर उनके भीतर कुछ नया था। उन्हें अब किसी चीज़ से डर नहीं लगता था। न मृत्यु से, न हानि से, न अपमान से।

क्योंकि उन्होंने शून्य देखा था, और शून्य के नीचे जो है – वो भी देखा था।

उन्हें पता था – जो है, वो हमेशा रहेगा। जो नहीं है, वो कभी नहीं था। बीच की हर चीज़ बस आती-जाती लहरें हैं।

एक दिन एक नौजवान साधक उनसे मिलने आया। पूछा, “महाराज, मुझे शून्य से डर लगता है।”

राजा ने मुस्कुराकर कहा, “बेटा, शून्य डराने वाला नहीं है। शून्य के नीचे जो है, वो माँ है। सब को पकड़े है। एक बार उसे जान लो, तो कोई शून्य फिर नहीं डरा सकता।”

वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, ध्यान में जो दिखता है, उसका अंत शून्य नहीं है। शून्य भी एक चरण है। उसके नीचे शुद्ध सत्ता है। उस सत्ता को जान लो, और जीवन-मरण दोनों खेल बन जाते हैं।”

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