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अवधूत के चौबीस गुरु

कथा 57 · भागवतम् की कथाएँ

अवधूत के चौबीस गुरु

जिसने हर चीज़ को गुरु बना लिया
स्कन्ध 11, अध्याय 7-9

परीक्षित् ने रात भर आँख नहीं झपकाई थी। छह दिन बीत चुके थे। उन्होंने शुकदेव की ओर देखा और पूछा।

”भगवन्, कल आपने उद्धव की बात कही थी, जिन्हें भगवान् ने अपना सारा ज्ञान सौंपा। पर मेरे मन में एक काँटा है। ज्ञान पाने के लिए क्या हर किसी को कोई बड़ा गुरु चाहिए? मेरे पास अब गुरु ढूँढने का समय नहीं बचा। जो कुछ सीखना है, इन्हीं चन्द साँसों में सीखना है। क्या इतने थोड़े वक़्त में भी कोई सीख सकता है?”

शुकदेव मुस्कुराए। उनकी आँखों में वह शान्ति थी जो किसी जल्दी को नहीं जानती।

”राजन्, गुरु बाहर ढूँढना ही नहीं पड़ता, अगर भीतर सीखने की प्यास हो। एक बार स्वयं भगवान् ने उद्धव को एक पुरानी बातचीत सुनाई थी, जो महाराज यदु और एक अवधूत के बीच हुई थी। सुनिए।”

Rich painterly classical-Indian color illustration: the crowned King Yadu halts on a forest path and gazes in wonder at a young, radiant naked avadhuta brahmin (Dattatreya) wandering fearlessly, his face serene and joyful as if he has attained everything; warm dawn light, leafy trees, the king's hand raised mid-question.

महाराज यदु ने एक नौजवान ब्राह्मण को देखा, अवधूत, जो तीनों कालों को देखने वाले थे और बिना किसी भय के विचर रहे थे। उनके चेहरे पर ऐसी प्रसन्नता थी जैसे उन्होंने सब पा लिया हो।

यदु रुक गए। ऐसी निश्चिंतता उन्होंने किसी सम्राट के मुख पर भी न देखी थी। उन्होंने धर्म के इस मर्मज्ञ से पूछा।

”ब्रह्मन्, आप कर्म तो करते नहीं, फिर इतनी निपुण बुद्धि आपको कहाँ से मिली, जिसके सहारे आप परम विद्वान् होकर भी बालक की तरह संसार में विचरते रहते हैं? लोग तो आयु, यश या धन की अभिलाषा से ही किसी काम में लगते हैं; आप किसी भी फल की चाह बिना भी प्रसन्न और मुक्त दीख रहे हैं। यह प्रसन्नता कहाँ से?”

अवधूत ने धीरे से कहा।

”मेरे पास बहुत कुछ है, राजन्। मेरी बुद्धि ने बहुत-से गुरुओं का आश्रय लिया है। उन्हीं से शिक्षा लेकर मैं इस जगत् में मुक्त भाव से स्वच्छन्द विचरता हूँ। मेरे चौबीस गुरु हैं।”

”चौबीस गुरु? कौन हैं वे?”

”सुनिए। नाम और शिक्षा, दोनों कहता हूँ।”

”पहला गुरु, पृथ्वी।”

Rich painterly classical-Indian color illustration of Earth as the first teacher: the patient brown earth bearing burdens, being dug and tilled without complaint, with a great mountain and fruit-laden trees bending to serve others; the calm avadhuta standing steadily upon the soil, embodying endurance and selfless service.

”पृथ्वी सब सह लेती है। हम उस पर बोझ लादते हैं, उसे खोदते हैं, चीरते हैं, पर वह न बदला लेती है, न रोती-चिल्लाती है। सब प्राणी अपने-अपने प्रारब्ध के अनुसार जान या अनजान में आघात करते हैं; धीर पुरुष उनकी विवशता समझे, अपना धीरज न खोए, क्रोध न करे, और अपने मार्ग पर ज्यों का त्यों चलता रहे। पृथ्वी के ही रूप पर्वत और वृक्ष से मैंने यह सीखा कि उनकी सारी चेष्टा दूसरों के हित के लिए ही होती है; साधु को भी ऐसे ही परोपकारी होना चाहिए।”

”दूसरा, वायु।”

”हवा हर जगह बहती है, पर कहीं ठहरती नहीं। न ख़ुशबू उसे रोक पाती है, न बदबू उससे चिपकती है। उससे मैंने सीखा कि देह के बीच रहते हुए भी उसके गुण-दोष में लिपटना नहीं चाहिए। और जैसे प्राणवायु आहार-मात्र से सन्तुष्ट हो जाता है, वैसे ही साधक उतना ही भोजन ले जितने से निर्वाह हो जाए, इन्द्रियों को तृप्त करने के लिए बहुत विषय न चाहे।”

”तीसरा, आकाश।”

”आकाश सबको अपने भीतर समेटे है, बादल, धुआँ, धूल, सब उसमें आते-जाते हैं, पर वह किसी से छुआ नहीं जाता। उससे मैंने सीखा कि आत्मा सब में व्याप्त है, अखण्ड है, और फिर भी अछूती।”

”चौथा, जल।”

”पानी निर्मल है, मीठा है, बहता रहता है, और जो उसके पास आता है उसे पवित्र कर देता है। उससे मैंने सीखा कि सन्त का स्वभाव भी ऐसा ही हो, कोमल, स्वच्छ, और दर्शन, स्पर्श तथा नाम-उच्चारण भर से शुद्ध करने वाला।”

”पाँचवाँ, अग्नि।”

”आग जो भी पास आए उसे भस्म कर देती है, पर ख़ुद किसी की मलिनता नहीं ओढ़ती। उसके पास संग्रह के लिए कोई पात्र नहीं, जो मिले उसी से निर्वाह कर लेती है। उससे मैंने सीखा कि ज्ञानी तपस्या से देदीप्यमान रहे, जो ग्रहण करे उससे लिप्त न हो; और जैसे आग कहीं लकड़ी में छिपी रहती है और कहीं प्रकट हो जाती है, वैसे ही साधक कहीं गुप्त रहे, कहीं प्रकट।”

”छठा, चन्द्रमा।”

”चन्द्रमा घटता है, बढ़ता है, कभी पूरा, कभी पतली रेखा। पर चाँद तो वही एक है; घटती-बढ़ती तो केवल कलाएँ हैं। उससे मैंने सीखा कि जन्म और मृत्यु, बचपन और बुढ़ापा, ये सब देह की कलाएँ हैं; भीतर बैठा देखने वाला ज्यों का त्यों रहता है।”

”सातवाँ, सूर्य।”

”एक ही सूर्य अनेक घड़ों के पानी में अलग-अलग झलकता है। नादान समझता है कि कई सूर्य हैं। उससे मैंने सीखा कि एक ही चेतना अनगिनत देहों में झलकती है, और भेद केवल झलक का है, उसका नहीं। और जैसे सूर्य अपनी किरणों से जल खींचता है और समय पर बरसा देता है, वैसे ही योगी समय पर विषय ग्रहण करे और समय आने पर उनका त्याग कर दे, किसी में आसक्त न हो।”

”आठवाँ, कबूतर।”

Rich painterly classical-Indian color illustration of the pigeon family (eighth guru): a fowler's net snares the chicks below a nest in a tree; the mother pigeon, blind with attachment, dives down and is caught, and the father pigeon plunges after her into the net; the hunter waiting nearby, capturing the whole family. Theme of fatal family-attachment.

”एक बार मैंने एक कबूतर का जोड़ा देखा। वर्षों एक घोंसले में रहते, स्नेह के बन्धन में बँधे, अपने बच्चों के पालन में डूबे रहे। एक दिन एक बहेलिये ने बच्चों को जाल में फँसा लिया। माँ मोह में अंधी होकर बच्चों के पास जा गिरी और ख़ुद भी फँस गई; उसे तड़पता देख पिता भी कूद पड़ा। बहेलिया सबको ले गया। उससे मैंने सीखा कि घर-कुटुम्ब का अति-मोह मनुष्य को इसी तरह बाँध लेता है; यह मनुष्य-शरीर मुक्ति का खुला हुआ द्वार है, पर जो इसी में फँसा रहता है वह ऊँचे चढ़कर गिर जाता है।”

”नौवाँ, अजगर।”

”अजगर शिकार के पीछे नहीं दौड़ता। जहाँ है वहीं पड़ा रहता है; जो सामने आ जाए, उसी से पेट भर लेता है, न मिले तो बहुत दिनों तक भूखा भी सन्तोष में पड़ा रहता है। उससे मैंने सीखा कि जो बिना माँगे, बिना चेष्टा के मिल जाए, उसी में निर्वाह कर लेना, चाहे रूखा हो चाहे स्वादिष्ट, और उदासीन रहना।”

”दसवाँ, समुद्र।”

”वर्षा में सैकड़ों नदियाँ उसमें गिरती हैं, फिर भी वह न उमड़ता है; सूखे में नदियाँ सूख जाएँ तो भी वह घटता नहीं। उससे मैंने सीखा कि सुख आए तो फूल मत जाओ, दुख आए तो डूब मत जाओ; भीतर की मर्यादा अडिग रहे, जैसे ज्वार-भाटे से रहित शान्त गहरा समुद्र।”

”ग्यारहवाँ, पतंगा।”

”पतंगा दीये की लौ के रूप पर मोहित होकर उसी में कूद पड़ता है और जल मरता है। उससे मैंने सीखा कि आँखों के रूप-रस में बहक जाना अपनी ही आग में गिरना है; जो मूढ़ रूप-सौन्दर्य पर लट्टू होकर विवेक खो बैठता है, वह पतंगे की तरह नष्ट हो जाता है।”

”बारहवाँ, मधुमक्खी।”

”मधुमक्खी फूल को चोट पहुँचाए बिना ज़रा-ज़रा रस ले लेती है। उससे मैंने सीखा कि भिक्षु छोटे-बड़े हर घर से थोड़ा-थोड़ा माँग ले, किसी पर बोझ न बने, और छोटे-बड़े हर शास्त्र से सार खींच ले।”

”तेरहवाँ, हाथी।”

”नर हाथी काठ की बनी झूठी हथिनी की ओर खिंचकर गड्ढे में जा गिरता है, और दूसरे बलवान हाथियों के हाथों बँध जाता है। उससे मैंने सीखा कि स्पर्श की भूख मनुष्य को इसी तरह जकड़ लेती है; साधक किसी स्त्री को भोग्य-रूप में स्वीकार न करे, क्योंकि वह उसके लिए मूर्तिमती मृत्यु है।”

”चौदहवाँ, शहद निकालने वाला।”

Rich painterly classical-Indian color illustration of the honey-gatherer (fourteenth guru): a man carefully robbing a hive of all its painstakingly gathered honey while the empty-handed bees buzz helplessly around their plundered comb; lesson of the greedy hoarder whose wealth is enjoyed by another.

”एक मनुष्य बड़े जतन से मधुमक्खियों का जोड़ा हुआ सारा शहद निकाल ले जाता है, और मक्खियाँ ख़ाली हाथ रह जाती हैं। उससे मैंने सीखा कि संसार का लोभी पुरुष बड़ी कठिनाई से धन जोड़ता है, न ख़ुद भोगता है, न किसी को देता है; और अन्त में उसका सारा संचय कोई दूसरा ही, उसकी टोह रखने वाला, भोग लेता है, और जोड़ने वाला रीता रह जाता है।”

”पन्द्रहवाँ, हिरन।”

”हिरन शिकारी के मीठे बाजे पर मुग्ध होकर पास चला आता है और बँध जाता है। उससे मैंने सीखा कि कानों को बहलाने वाले स्वर साधक का चित्त चुरा ले जाते हैं; जैसे हिरनी के गर्भ से जन्मे ऋष्यशृंग मुनि गान-नृत्य पर मोहित होकर स्त्रियों के वश में हो गए थे।”

”सोलहवाँ, मछली।”

”मछली काँटे में लगे चारे के स्वाद के लोभ में अपने प्राण गँवा देती है। उससे मैंने सीखा कि भोजन छोड़ देने पर बाक़ी इन्द्रियाँ शीघ्र वश में आ जाती हैं, पर रसना तब और प्रबल हो उठती है; जब तक जीभ वश में न हो तब तक मनुष्य जितेन्द्रिय नहीं, और जिसने रसना जीत ली, उसने सब इन्द्रियाँ जीत लीं।”

”सत्रहवाँ, पिङ्गला।”

Rich painterly classical-Indian color illustration of the courtesan Pingala (seventeenth guru) in the city of Mithila: richly adorned and bejewelled, she stands waiting at her doorway deep into the night hoping a wealthy patron will come; passersby drift away in the moonlit lane, her face weary with broken hope as dispassion dawns within her.

”विदेह नगरी मिथिला में पिङ्गला नाम की एक गणिका थी। एक रात वह सज-सँवरकर अपने घर के द्वार पर खड़ी रही, इस आस में कि कोई धनी आएगा जो उसे धन देगा। रात ढलती रही, आने-जाने वाले आगे बढ़ जाते, आस टूटती-जुड़ती रही, वह कभी बाहर आती कभी भीतर जाती। आधी रात गए उसके भीतर कुछ ठहर गया। उसका मुँह सूख गया, और आस टूटने से उसे गहरा वैराग्य हुआ। उसने सोचा, जिस परमप्रिय स्वामी को छोड़कर वह बरसों इन क्षणभंगुर लोगों की राह तकती रही, वह तो भीतर ही बैठा था, वही सच्चा धन और सुख देने वाला है। उसी रात उसने सारी आशा छोड़ दी, और छोड़ते ही ऐसी निश्चिन्त नींद सोई जैसी पहले कभी न सोई थी। उससे मैंने सीखा कि आशा का त्याग ही परम सुख का द्वार है, और आशा की फाँसी को काटने वाली एकमात्र वस्तु वैराग्य है।”

”अठारहवाँ, कुरर पक्षी।”

”एक कुरर पक्षी अपनी चोंच में माँस का टुकड़ा दबाए उड़ रहा था। बलवान पक्षियों ने उसे घेर लिया और चोंचें मारने लगे। जब तक टुकड़ा उसके पास रहा, वह पिटता रहा; जैसे ही उसने टुकड़ा छोड़ दिया, वह सुख से उड़ चला। उससे मैंने सीखा कि जिस वस्तु से मोह है, वही दुख का कारण है; उसे छोड़ देने में ही चैन है।”

”उन्नीसवाँ, बालक।”

”छोटा बच्चा न बीते हुए का शोक करता है, न आने वाले की चिन्ता। न मान की भूख, न अपमान की चुभन। उससे मैंने सीखा निश्चिन्त रहना, जैसे वह इसी पल में पूरा जीता है।”

”बीसवाँ, कुमारी कन्या।”

”एक कुमारी अकेली घर पर थी, और घर आए मेहमानों के लिए ख़ुद धान कूट रही थी। उसकी कलाइयों की चूड़ियाँ खनक रही थीं। उसे लाज आई कि लोग जान जाएँगे घर में और कोई नहीं। उसने एक-एक कर चूड़ियाँ उतार दीं, हर हाथ में बस एक-एक रहने दी। फिर भी दो-दो टकराकर बजती रहीं। आख़िर हर कलाई पर केवल एक चूड़ी रही, तब खनक थमी। उससे मैंने सीखा कि जहाँ बहुत लोग जुटते हैं वहाँ कलह और शोर होता है; इसलिए साधक अकेला विचरे, मन की एक चूड़ी की तरह।”

”इक्कीसवाँ, बाण बनाने वाला।”

”एक लोहार बाण को घिसने में इतना डूबा था कि राजा की सवारी ढोल-नगाड़ों के साथ उसके सामने से निकल गई और उसे भनक तक न पड़ी। उससे मैंने सीखा कि जिसका मन एक ही ध्येय में ऐसे लग जाए, उसके लिए संसार का कोलाहल मिट जाता है।”

”बाईसवाँ, साँप।”

”साँप अपना बिल नहीं खोदता; दूसरों के बनाए बिल में चुपचाप रह लेता है, अकेला चलता है, एक ठौर नहीं टिकता। उससे मैंने सीखा कि साधु घर न बनाए, अकेला रहे, और किसी एक जगह से न बँधे।”

”तेईसवाँ, मकड़ी।”

”मकड़ी अपने ही भीतर से तार निकालकर जाला बुनती है, उसी में विचरती है, और फिर उसी को अपने भीतर खींच लेती है। उससे मैंने सीखा कि भगवान् इसी तरह अपने में से सृष्टि रचते हैं, उसमें रमते हैं, और फिर अपने में समेट लेते हैं।”

”चौबीसवाँ, भृंगी कीट।”

Rich painterly classical-Indian color illustration of the bhringi wasp (twenty-fourth and last guru): a wasp seals a small captured insect inside its mud nest; the trembling insect meditates day and night on the wasp out of fear, until it is transformed into a wasp itself. Theme: one becomes whatever one constantly contemplates, so meditate on God.

”एक भिरड़ किसी छोटे कीड़े को पकड़कर अपने घोंसले में बन्द कर देती है। वह कीड़ा भय से, फिर एकटक चिन्तन से, रात-दिन उसी भिरड़ का ध्यान करता रहता है, और एक दिन ख़ुद वैसा ही भिरड़ बन जाता है। उससे मैंने सीखा कि मनुष्य जिसका निरन्तर ध्यान करता है, चाहे प्रेम से, चाहे भय से, अन्त में वही हो जाता है। इसीलिए ध्यान भगवान् का धरना चाहिए।”

महाराज यदु ने सिर झुकाया।

”अवधूत, आप के सचमुच चौबीस गुरु हैं।”

अवधूत हँसा, बिना किसी गर्व के।

”चौबीस तो गिनती के लिए कहे, राजन्। गुरु तो असंख्य हैं। जिसकी आँख खुली हो, उसके लिए जगत् का हर प्राणी, हर वस्तु, एक पाठ है। और इन सबके भीतर एक ही गुरु है, जो रूप-रूप में बैठा सिखा रहा है।”

मन्थन

शुकदेव यहाँ ठहर गए।

परीक्षित् कुछ देर चुप रहे, फिर बोले, ”भगवन्, मैं भयभीत था कि गुरु ढूँढने का समय नहीं बचा। पर वह अवधूत तो कह रहा है कि गुरु ढूँढना ही नहीं पड़ता।”

शुकदेव ने धीरे से सिर हिलाया।

Rich painterly classical-Indian color illustration of the frame's close: the serene sage Shukadeva gently speaking to King Parikshit seated on the riverbank at Ganga amid listening sages; soft golden light, the king attentive, conveying that for the awakened seeker the whole world becomes a school and one inner Guru teaches through every form.

”राजन्, अवधूत के पास न ग्रन्थ था, न आश्रम, न कोई बैठा हुआ आचार्य। फिर भी उसने पृथ्वी से सहना सीखा, हवा से अनासक्ति, बालक से निश्चिन्तता, और एक थकी हुई गणिका से यह कि आशा का छूटना ही सुख का द्वार है। जिसके भीतर जिज्ञासा जागती है, उसके लिए सारा जगत् पाठशाला बन जाता है।”

”तो जो कुछ मेरे चारों ओर है,” परीक्षित् ने कहा, ”वह सब इन सात दिनों में भी मुझे सिखा सकता है।”

”सिखा रहा है, राजन्। यह उड़ता पंछी, आपकी अपनी ढलती साँस भी। पर इन सब गुरुओं के पीछे एक ही गुरु बैठा है, जो रूप-रूप में आकर सिखाता है। उसे पहचान लो, फिर बाहर कुछ ढूँढना शेष नहीं रहता।”

परीक्षित् ने आँखें मूँद लीं।

साहित्यिक-संदर्भ

अवधूत के चौबीस गुरुओं की यह कथा श्रीमद्भागवत के एकादश स्कन्ध, अध्याय 7 से 9 में है। भगवान् श्रीकृष्ण इसे उद्धव को सुनाते हैं; भीतर की कथा में अवधूत दत्तात्रेय और महाराज यदु का संवाद है।

चौबीस गुरु, क्रम से, ये हैं: पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंगा, मधुमक्खी, हाथी, शहद निकालने वाला, हिरन, मछली, पिङ्गला, कुरर पक्षी, बालक, कुमारी, बाण बनाने वाला, साँप, मकड़ी, और भृंगी कीट।

नवधा भक्ति की भाँति यह सूची भी आगे की वैराग्य-परम्परा में बार-बार दुहराई गई है, इस एक भाव के साथ कि सीखने के लिए किसी एक आचार्य की प्रतीक्षा अनिवार्य नहीं।

दत्तात्रेय का ढंग

राजा यदु ने अवधूत से पूछा था कि बिना किसी संग्रह, बिना किसी आश्रय के, इतनी प्रसन्नता का स्रोत क्या है। उत्तर एक उपदेश की शक्ल में नहीं आया, एक सूची की शक्ल में आया, चौबीस गुरुओं की, और हर गुरु से एक ही पाठ।

साधारण रीति में गुरु कोई एक विशेष पुरुष होता है। यह कथा उस धारणा को कोमलता से पलट देती है। गुरु कोई भी हो सकता है: पृथ्वी से सहना, समुद्र से धीरज, मधुमक्खी से बिना संग्रह के निर्वाह। एक भिक्षु, एक गणिका, एक बालक, एक मकड़ी, एक मछली, सब इसी सूची में बैठ जाते हैं।

जिज्ञासु के लिए हर वस्तु ग्रन्थ बन जाती है। रत्न यदि धूल में पड़ा हो, तब भी उसे उठा ही लिया जाता है; पाठ जहाँ से मिले, वहीं से ग्रहण कर लेने में लज्जा नहीं।

क्यों यह कथा अभी मायने रखती है

अवधूत के चौबीस गुरु, पृथ्वी, हवा, पानी, सूर्य, चन्द्रमा, साँप, हिरन और बाक़ी सब, यही याद दिलाते हैं कि सीख कहीं भी पड़ी मिल सकती है। जो भीतर जागकर देखता है, उसके लिए भरी सड़क का कोलाहल भी एक पाठ बन जाता है। बस देखने की आँख चाहिए।