अवधूत के चौबीस गुरु
राजा यदु एक दिन घूम रहे थे।
उन्होंने एक नंगा फ़कीर देखा। नौजवान। मगर बहुत peaceful। उसकी आँखों में एक चमक।
”हे आप कौन?”
”अवधूत हूँ। नाम कोई नहीं।”
”आप के पास कुछ भी नहीं? घर नहीं, परिवार नहीं, कपड़े नहीं। फिर भी इतने प्रसन्न क्यों?”
अवधूत ने मुस्कुराकर कहा।
”मेरे पास बहुत कुछ है। मेरे चौबीस गुरु हैं।”
”चौबीस गुरु? कौन-कौन?”
”बैठो। मैं बताता हूँ।”
राजा यदु बैठे।
कपोतोऽजगरः सिन्धुः पतङ्गो मधुकृत्करी ॥
(श्रीमद्भागवत 11.7.33)
पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, चन्द्र, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंगा, मधुमक्खी, हाथी, ये सब मेरे गुरु हैं।
”पहला गुरु, पृथ्वी।”
”पृथ्वी से मैंने सीखा सहन करना। वो सब बर्दाश्त करती है। हम उस पर बोझ डालते हैं, उसे खोदते हैं, उसे fertilizer से भरते हैं, पर वो शान्त रहती है। बदले में हमें अनाज, फल, फूल देती है।”
”दूसरा, वायु।”
”वायु हर जगह जाती है, मगर कहीं रुकती नहीं। न खुश्बू से चिपकती, न बदबू से। मैंने उससे सीखा अनासक्ति।”
”तीसरा, आकाश।”
”आकाश सब को contain करता है, मगर ख़ुद कुछ नहीं पकड़ता। मैंने उससे सीखा एक witness जैसा रहना।”
”चौथा, पानी।”
”पानी हर जगह जाता है, खुद को बदलता है, पर अपनी essence रखता है। मैंने उससे सीखा flexibility।”
”पाँचवाँ, अग्नि।”
”आग सब को जला देती है, पर ख़ुद को धूमिल नहीं करती। मैंने उससे सीखा purity।”
”छठा, चन्द्रमा।”
”चन्द्रमा अलग-अलग कलाओं में दिखता है, मगर real में वही है। मैंने उससे सीखा कि शरीर बदलता है, पर आत्मा नहीं।”
”सातवाँ, सूर्य।”
”सूर्य पानी से reflection बनाता है, मगर वो reflection real नहीं। मैंने उससे सीखा कि चेतना अनगिनत रूपों में दिखती है।”
”आठवाँ, कबूतर।”
”एक बार मैंने एक कबूतर-परिवार देखा। बच्चे जाल में फँसे। माँ ने भागने की बजाय अंदर जाकर ख़ुद को भी फँसा लिया, फिर पिता भी। तीनों मर गए। मैंने उससे सीखा कि अति-attachment भी मार सकती है।”
”नौवाँ, अजगर।”
”अजगर शिकार के लिए नहीं भागता। बस वहीं बैठता है। जो आ जाए, वो खाता है। मैंने उससे सीखा संतोष।”
”दसवाँ, समुद्र।”
”समुद्र में नदियाँ आती हैं, पर वो भरता नहीं। मैंने उससे सीखा कि सच्चा आदमी हर experience को ले लेता है, बिना overflow किए।”
”ग्यारहवाँ, पतंगा।”
”एक पतंगा आग को देखकर उछलकर अपने आप को जलाता है। मैंने उससे सीखा कि सौंदर्य पर fixation मार देती है।”
”बारहवाँ, हाथी।”
”हाथी एक नकली मादा-हाथी देखकर फँस जाता है, और शिकारी पकड़ लेते हैं। मैंने सीखा कि वासना एक trap है।”
”तेरहवाँ, मधुमक्खी।”
”मधुमक्खी हर फूल से थोड़ा-थोड़ा शहद लेती है। एक पर fix नहीं। मैंने सीखा कि साधक को हर शास्त्र से थोड़ा सीखना चाहिए।”
”चौदहवाँ, शहद इकट्ठा करने वाला।”
”वो शहद इकट्ठा करता है। पर एक दिन कोई आता है और सब छीन ले जाता है। मैंने सीखा कि sangraha का अंत loss में।”
”पन्द्रहवाँ, हिरण।”
”हिरण मीठी आवाज़ सुनकर मोह जाता है। शिकारी पकड़ लेते हैं। मैंने सीखा कि sound का addiction भी fatal।”
”सोलहवाँ, मछली।”
”मछली स्वाद के लिए हुक पकड़ती है, और मर जाती है। मैंने सीखा कि taste भी एक जाल।”
”सत्रहवाँ, पिङ्गला (एक वेश्या)।”
”एक वेश्या जो रात भर किसी customer का इंतज़ार करती रही। नहीं आया। थक गई। फिर उसे realize हुआ, ”मैंने इतना समय किसी और के intent पर बिताया।” उसने धंधा छोड़ा। मैंने उससे सीखा कि बाहर की आशा छोड़ने से शान्ति।”
”अठारहवाँ, बच्चा।”
”बच्चा हमेशा present में रहता है। कोई past नहीं, कोई future नहीं। मैंने उससे सीखा।”
”उन्नीसवाँ, कुमारी कन्या।”
”एक कुमारी थी, अकेली घर पर। वो धान पीस रही थी। उसकी चूड़ियाँ टकरा रहीं। शोर हो रहा था। उसे लग रहा था, बाहर लोग सुन रहे होंगे। उसने एक-एक चूड़ी निकाली। पर हर बार दो चूड़ियाँ बजती रहीं। आख़िर में बस एक चूड़ी बची। तब शोर रुका। मैंने सीखा कि अकेला रहना ही शान्त रहना।”
”बीसवाँ, बाण बनाने वाला।”
”एक बाण बनाने वाला अपने काम में इतना डूब गया कि एक राजा का जुलूस उसके सामने से निकल गया, और उसे पता ही नहीं चला। मैंने सीखा कि एकाग्रता क्या होती है।”
”इक्कीसवाँ, साँप।”
”साँप अपना घर नहीं बनाता। दूसरे जीवों के घर में रहता है। एक जगह नहीं रुकता। मैंने सीखा कि अनासक्ति।”
”बाईसवाँ, मकड़ी।”
”मकड़ी अपने मुँह से जाला बनाती है, फिर उसी को निगल लेती है। मैंने सीखा कि सृष्टि और प्रलय एक ही source से।”
”तेईसवाँ, झींगुर।”
”एक झींगुर ने एक पत्थर को इतना देखा, इतना ध्यान किया, कि वो पत्थर बन गया। मैंने सीखा कि जिसका ध्यान करते हो, वो बन जाते हो।”
”चौबीसवाँ, मेरा अपना शरीर।”
”मेरा शरीर एक दिन गिर जाएगा। यह मेरा सबसे important गुरु। यह हर रोज़ मुझे याद दिलाता है कि मैं यह नहीं हूँ।”
राजा यदु ने सिर झुकाया।
”हे अवधूत, आप के पास सच में चौबीस गुरु हैं।”
अवधूत मुस्कुराया।
”नहीं। मेरे पास हज़ार गुरु हैं। ये बस चौबीस example।”
”हर एक चीज़, अगर तुम सही नज़र से देखो, एक गुरु है।”
अवधूत की कथा भागवतम् का एक beautiful teaching है।
एक नंगा फ़कीर। कुछ नहीं था उसके पास। पर वो खुश था।
क्यों? क्योंकि उसके पास चौबीस गुरु थे।
और उसके गुरु कोई बड़े लोग नहीं थे। साँप, मकड़ी, मधुमक्खी।
एक वेश्या भी उसका गुरु थी।
इस कथा का central message है, सीखने के लिए कोई बड़ा teacher नहीं चाहिए। हर एक चीज़ अपने आप में एक lesson है।
बस आपकी आँखें खुली होनी चाहिए।
हम अक्सर सोचते हैं, ”मुझे एक बड़ा गुरु मिले। मुझे एक great teacher मिले।” और इंतज़ार करते हैं।
अवधूत कह रहा है, ”अब भी सीखो। पास की चीज़ों से।”
एक पेड़ धैर्य सिखा रहा है। एक नदी continuity। एक चींटी मेहनत। एक बादल अनासक्ति।
बस देखने का तरीक़ा।
अगली बार जब आप कुछ देखें, सोचिए, ”इससे क्या सीख सकता हूँ?”
शायद आपको पता चले, आपके पास भी चौबीस गुरु हैं।