कथा · 03
पुण्य और पावन: दो भाई, दो दृष्टियाँ
पिता-माँ की मृत्यु पर एक भाई फूट-फूट कर रोया, दूसरा शांत बैठा रहा। फिर एक ने दूसरे को समझाया कि शोक का असली घर कहाँ है।
एक वन में एक ऋषि रहते थे। उनके दो बेटे थे – बड़े का नाम पुण्य, छोटे का पावन। दोनों का बचपन बहुत साधारण था। पिता वेदपाठ सिखाते, माँ भोजन बनाती, और दोनों भाई आपस में ख़ूब लड़ते-झगड़ते। मगर एक-दूसरे के बिना खाते भी नहीं थे।
समय बीता। पिता बूढ़े हो चले। एक दिन साँस छोड़ गए। माँ ने भी कुछ ही महीनों बाद देह त्याग दी।
अब वन में दोनों भाई अकेले रह गए।
पावन रोज़ रोता। कभी पिता की कुटिया में जाकर बैठ जाता, कभी माँ की लकड़ी की चूड़ियाँ पकड़कर आँसू बहाता। उसका दुख टलता ही नहीं था।
पुण्य उसे देखता रहा। फिर एक दिन उसके पास बैठा। बोला, “भाई, ज़रा सुन।”
“क्या?”
“तू रो किसके लिए रहा है?”
“पिता-माँ के लिए।”
“वो तुझसे कब अलग हुए?”
“अब अभी, मरकर!”
पुण्य मुस्कुराया। “नहीं भाई। ज़रा सोच। तू और मैं, हम दोनों कितने जन्मों से एक-दूसरे को जानते हैं? कितने पिता हमारे रहे होंगे? कितनी माएँ? कितनी पत्नियाँ, कितने बच्चे? हर बार हम मिले, हर बार हम बिछुड़े। हर बार दुख हुआ।”
पावन शांत हुआ।
पुण्य ने जारी रखा। “अगर हर बिछड़न पर तू ऐसे ही रोएगा, तो आँसू कब खत्म होंगे? यह जो शरीर मर गए, यह तो लहरें थीं। समुद्र अभी भी है। समुद्र कभी मरता नहीं।”
“समुद्र क्या?”
“वो जो तुझे और मुझे, पिता को और माँ को, सब को धारण करता है। उसी से सब आते हैं, उसी में सब लौट जाते हैं। शुद्ध चेतना। आत्मा।”
पावन ने पूछा, “वो आत्मा कैसी है?”
“वो न जन्म लेती है, न मरती है। वो हमेशा एक जैसी है। जब तू इस शरीर में आया, तो आत्मा वही रही। जब तू दूसरे शरीर में था, तब भी वही थी। पिता-माँ, हम, सब एक ही चेतना के अलग-अलग रूप हैं।”
“तो जो मरा, वो क्या?”
“बस एक रूप गिर गया। चेतना कहीं नहीं गई। वो आज भी है, यहीं है।”
पावन बहुत देर तक चुप रहा। फिर धीरे से बोला, “भैया, तूने मेरा दुख हलका कर दिया।”
पुण्य ने उसका कंधा थपथपाया।
दोनों भाई वन में रहते रहे। पुण्य ने पावन को धीरे-धीरे और सिखाया। एक दिन पावन भी पिता की तरह तपस्वी बन गया।
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राजकुमार, यह कथा हर उस व्यक्ति की है जो किसी अपने को खोता है। दुख मिटता है ज्ञान से। और ज्ञान का पहला सबक यही है – आत्मा एक है, अनेक नहीं।”
← सब कथाएँ