कथा · 4
पुण्य और पावन: शोक से आत्मबोध तक
महेन्द्र पर्वत के गंगा-तट पर दीर्घतपा का आश्रम था। उनके बड़े पुत्र पुण्य को आत्मतत्त्व का निश्चय हो चुका था, जबकि छोटे पुत्र पावन की समझ अभी डगमगाती थी। माता-पिता के देहत्याग ने पावन को शोक में डुबो दिया। तब पुण्य ने उसे बीते जन्मों, असंख्य सम्बन्धों और उस चेतना की ओर देखने को कहा जो हर बदलते रूप की साक्षी है।
महेन्द्र पर्वत के गंगा-तट पर
वसिष्ठ ने कहा, “श्रीराम, बन्धुत्व के विषय में एक प्राचीन इतिहास सुनिए। यह दो मुनिकुमार भाइयों के बीच हुआ संवाद है। एक भाई शोक से व्याकुल था और दूसरे ने उसके सामने जीवन की बहुत लम्बी स्मृति खोल दी।”
जम्बूद्वीप के पर्वत-समूह में महेन्द्र पर्वत अपनी ऊँची शिखर-श्रेणियों के कारण दूर से पहचाना जाता था। उसकी चोटियाँ मानो ब्रह्मलोक की सीमा तक चली गई थीं। कल्पवृक्षों की छाया में देवता, मुनि और किन्नर विश्राम करते। गुफाओं में सामवेद की ध्वनि गूँजती। नीले मेघ पर्वत की चोटियों से लगकर चलते और उनके बीच बिजली चमकती। फूलों से भरी लताएँ शिलाओं पर झुकी रहतीं। कहीं झरनों का कलरव था, कहीं कन्दराओं में सिंहों की गर्जना, कहीं पक्षियों की पुकार और कहीं कल्प तथा कदम्ब के वृक्षों के बीच अप्सराओं का विचरण।
उसी पर्वत के एक विस्तृत रत्नमय शिखर पर मुनियों ने स्नान और जलपान के लिए आकाशगंगा की धारा उतारी थी। सुवर्ण-सी आभा वाले उसके तट पर वृक्ष फूलों और फलों से भरे रहते। पर्वत की मणियों से निकलती ज्योति जल और वन को एक शान्त उजास देती थी। वहीं दीर्घतपा नाम के तपस्वी अपनी पत्नी और दो पुत्रों के साथ रहते थे। उनका जीवन अध्ययन, तप, योग और गंगा-तट की नियमित साधना में बीतता था।
दोनों पुत्र चन्द्रमा जैसे सुन्दर थे। यदि बृहस्पति के पुत्र कच के दो पुत्र होते, तो उनकी जोड़ी ऐसी दिखाई देती। बड़े पुत्र पुण्य आयु और गुण, दोनों में ज्येष्ठ थे। कुछ काल बीतने पर उनका आत्मज्ञान दृढ़ हो गया। पावन मूर्खता की सीमा से निकल चुका था, मगर उसका ज्ञान अभी अधूरा था। वह प्रातःकाल में खुलते कमल की भाँति अर्धप्रबुद्ध था। सत्य की झलक उसे मिली थी और निश्चय को स्थिर होना शेष था।
सौ वर्ष बीतने पर दीर्घतपा का शरीर वृद्ध और जर्जर हो गया। उन्होंने संसार की क्षणभंगुर गति को स्पष्ट देखा और पर्वत की एक गुफा में अपने शरीर का त्याग किया। उनकी पुर्यष्टका ने शरीर को वैसे छोड़ दिया जैसे सर्प अपनी केंचुल उतार देता है। उनकी चेतना राग और द्वेष से रहित आत्मपद में स्थित हुई।
माता का अनुसरण और पुत्रों की भिन्न दशा
दीर्घतपा की पत्नी ने पति का निष्प्राण शरीर देखा। उन्होंने दीर्घकाल से योग का अभ्यास किया था और यह साधना स्वयं पति से सीखी थी। उन्होंने प्राण और अपान को संयत करके अपना स्वस्थ शरीर त्याग दिया। उनकी गति उस भँवरी जैसी थी जो खिले हुए कमल को छोड़ती है, और उस प्रभा जैसी जो अस्त होते चन्द्रमा के पीछे आकाश से ओझल हो जाती है। वे पति के प्राप्त पद का अनुसरण करती हुई दृष्टि से लुप्त हो गईं।
एक ही आश्रम में दो देहें निश्चल पड़ी थीं और दोनों पुत्रों के सामने आवश्यक संस्कारों का दायित्व था। पुण्य ने मन को स्थिर रखा और माता-पिता के और्ध्वदेहिक कर्म पूरे किए। उनकी स्थिरता माता-पिता की साधना और उनकी प्राप्त अवस्था की समझ से आई थी। श्रद्धा के साथ संस्कार करना उसी समझ का स्वाभाविक कर्म था।
पावन की दशा दूसरी थी। माता-पिता के बिना आश्रम का प्रत्येक परिचित स्थान उसे रिक्त दिखाई देने लगा। उसका चित्त शोक से भर गया और वह बड़े भाई के धैर्य का आश्रय न ले सका। वह वनकुञ्जों में भटकता, विलाप करता और आँसू बहाता रहा। जिस अर्धबोध पर वह पहले टिका था, मृत्यु के सामने उसकी पकड़ ढीली पड़ गई।
पुण्य ने संस्कार पूरे किए और छोटे भाई को खोजते हुए वन में पहुँचे। पावन की आँखों से बहती धारा देखकर उन्होंने कहा, “भाई, इस शोक को इतना घना क्यों कर रहे हो? वर्षाकाल के मेघ जैसे जल से भरते हैं, तुम्हारे नेत्र आँसुओं से भर गए हैं। तुम किसका शोक कर रहे हो?”
उन्होंने पावन के दुःख को पूरा स्थान दिया और उसके कारण की जाँच आरम्भ कराई। पुण्य बोले, “तुम्हारे पिता और माता उस मोक्षपद को प्राप्त हुए हैं जो सब प्राणियों का आधार और ज्ञानवानों का स्वरूप है। पिता अपने ही स्वरूप में स्थित हुए हैं। माता ने योग के द्वारा उसी पद का अनुसरण किया है। उनकी गति समझकर विचार करो कि तुम्हारा शोक किस धारणा से उठ रहा है।”
प्रश्न का लक्ष्य उस मानसिक गाँठ की जाँच था जिसमें मन कहता है कि यही मेरी माता हैं, यही मेरे पिता हैं और मेरा पुत्रत्व इसी जन्म तक पूरा है। उन्होंने कहा, “इस एक जन्म के सम्बन्ध को तुमने सम्पूर्ण सत्य मान लिया है। इस भावना के भीतर देह का अन्त तुम्हारे अपने अस्तित्व का एक भाग टूटने जैसा दिखाई देता है। अब सम्बन्ध की सीमा को थोड़ा और व्यापक करके देखो।”
असंख्य माता-पिता और सन्तानें
पुण्य ने पावन के सामने जन्मों की ऐसी गणना रखी जिसे एक जीवन की स्मृति समेट नहीं सकती। उन्होंने कहा, “वत्स, तुम्हारे हजारों माता-पिता हो चुके हैं। जैसे प्रत्येक वन में जल के बहने के अनेक मार्ग होते हैं, वैसे ही जन्मों के प्रवाह में माता-पिता के अनेक युगल आए हैं। उन माता-पिताओं की भी असंख्य सन्तानें हुईं। उस दीर्घ क्रम में तुम अनेक पुत्रों में से एक रहे हो।”

उन्होंने नदी की तरंगों, वृक्ष के पत्तों और ऋतु में आने वाले फलों का स्मरण कराया। नदी में तरंगें उठती हैं और जल में मिल जाती हैं। वृक्ष पर पत्ते, कोंपलें और डंठल आते हैं, फिर समय पूरा होने पर झर जाते हैं। प्रत्येक ऋतु में फल लगते हैं और बीत जाते हैं। जीव के प्रत्येक जन्म में माता, पिता, पुत्र, मित्र और बान्धवों के समूह इसी क्रम से आते और चले जाते हैं।
पुण्य ने पूछा, “यदि स्नेह के कारण माता, पिता और पुत्र शोक के योग्य हैं, तो बीते हुए हजारों माता-पिताओं और सन्तानों के लिए निरन्तर शोक क्यों नहीं उठता? इस जन्म के सम्बन्ध तुम्हारे अनुभव के सामने हैं, इसलिए मन इन्हीं को सम्पूर्ण मान बैठा है। स्मृति थोड़े सम्बन्ध सँभालती है और अनगिनत सम्बन्ध उसके बाहर चले जाते हैं।”
राजसम्पत्ति का उदाहरण देकर उन्होंने वर्तमान जीवन की चमक को भी इसी परिप्रेक्ष्य में रखा। छत्र और चामर से सुशोभित विशाल ऐश्वर्य काल के साथ बदल जाता है और तीन अथवा पाँच दिनों के स्वप्न जैसा बीत सकता है। पुण्य का आग्रह सम्बन्धों की अवधि और उनके आधार को समझने पर था, ताकि परिवर्तन आते ही पावन का मन अपने साथ सब कुछ डुबो न दे।
उन्होंने कहा, “भाई, मन जिनके प्रति बन्धु की भावना करता है, वे बन्धु दिखाई देते हैं। जिनके प्रति शत्रु की भावना बाँधता है, वे शत्रु दिखाई देते हैं। नाम और सम्बन्ध मन के संकेत से विस्तार पाते हैं। शरीर रक्त, मांस, अस्थि और पाँच तत्त्वों का संघात है। इन शरीरों में प्रकाशित चेतना का विचार करो। उसी प्रकाश में अपना और पराया किस आधार पर स्थिर रहेगा?”
पावन के लिए यह उपदेश अभी विचार था। पुण्य ने उसे अनुभव के निकट लाने के लिए पूर्वजन्मों का स्मरण कराया। योगबल और निर्मल बुद्धि से वे अपने और भाई के वासनाक्रम को देखते थे। अब बातचीत सामान्य सिद्धान्त से हटकर उन जन्मों की विशिष्ट भूमि, योनि और अवधि तक पहुँची।
पावन के बीते हुए जन्म
पुण्य बोले, “अनेक पुष्पों और लताओं के बीच तुम मृगपुत्र हुए थे। उस वन में मृगों का बड़ा कुल तुम्हारा अपना था। कमलों से भरे एक तालाब में तुम हाथी के पुत्र हुए और हस्तियों के साथ रहे। एक विशाल वन में वृक्ष के रूप में खड़े रहे। फूल, पत्ते और पास के वृक्ष उस जीवन के साथी थे। नदियों, तालाबों और पोखरों में मत्स्य होकर रहे, जहाँ मत्स्यों का समुदाय तुम्हारा बन्धु था।”
इसके बाद उन्होंने स्थानों की पूरी शृंखला सुनाई। दशार्ण देश में पावन ने काक और वानर के जन्म पाए। तुषार देश में वह राजपुत्र हुआ और एक अन्य जन्म में वनकाक बना। अंग देश में हाथी हुआ। विराज देश में गर्दभ हुआ। मालव देश में सर्प और वृक्ष के जन्म मिले। अंग देश में गृद्ध हुआ। मालव देश के पर्वत पर पुष्पलता बनकर रहा और मन्दराचल पर गीदड़ हुआ। कोशल देश में ब्राह्मण, अंग देश में तीतर और तुषार देश में घोड़ा हुआ।
पुण्य ने आगे कहा, “तुम कीट भी हुए। एक नीच ग्राम में बछड़े के रूप में पन्द्रह महीने रहे। एक वन के तड़ाग में कमल-पुष्प के भीतर भ्रमर हुए। इसी जम्बूद्वीप में सैकड़ों और हजारों बार अनेक योनियों में जन्म लिया। उन सब जीवनों की इच्छाएँ, भय, भोजन, आश्रय और सम्बन्ध उस समय उतने ही निकट लगते थे जितने आज माता-पिता लगते हैं।”
इस सूची ने प्रत्येक जन्म के साथ जुड़े पूरे संसार को सामने रखा। मृग के लिए वन और उसका झुंड, हाथी के लिए कमल-वन और हस्तियों का समुदाय, वृक्ष के लिए ऋतुएँ और निकट के वृक्ष, मत्स्य के लिए जल और मत्स्य-कुल। देह बदलते ही सम्बन्ध की भाषा बदल गई। चेतना ने हर बार उस भाषा को अपना वर्तमान समझा।
पुण्य ने पूछा, “उन मृग-बन्धुओं, हस्ति-बन्धुओं, वृक्षों और मत्स्यों के लिए तुम्हारा शोक कहाँ है? दशार्ण, तुषार, अंग, विराज, मालव, मन्दराचल और कोशल के उन जीवनों में जो निकट थे, उनकी स्मृति मन से जा चुकी है। उस समय उनका स्नेह अपने पूरे अनुभव के साथ उपस्थित था। आज मन एक जन्म की चौखट में खड़ा होकर इसी दृश्य को पूरा संसार मान रहा है।”
पावन सुनता रहा। उसके शोक को पहली बार ऐसी विशाल समयरेखा मिली जिसमें वर्तमान माता-पिता के प्रति प्रेम सुरक्षित था और उनकी देह से बनी सीमा शिथिल होने लगी। पुण्य ने अपने पूर्वजन्म भी बताए। इससे उपदेश उनके साझा संसार-क्रम के भीतर आया।
पुण्य की अपनी स्मृति
पुण्य बोले, “मेरी भी अनेक योनियाँ बीत चुकी हैं। त्रिगर्त देश में मैं तोता हुआ। एक तड़ाग के तट पर हंस रहा और पक्षियों में काक हुआ। बेल और वृक्ष के रूप में भी जन्म पाया। बंग देश में वृक्ष हुआ और वन-पर्वत में बड़े उष्ट्र के रूप में विचरा। पौण्ड्र देश में राजा हुआ। सह्याचल पर्वत की कन्दरा में भेड़िया रहा, उस जन्म में तुम मेरे बड़े भाई थे।”
उन्होंने दो अवधियाँ विशेष रूप से कहीं। “मैं दस वर्ष मृग होकर रहा। एक अन्य मृग-जन्म में पाँच महीने तुम्हारा भाई रहा। आज मैं आयु में तुम्हारा बड़ा भाई हूँ। जन्मों का क्रम देह के साथ सम्बन्धों की दिशा भी बदलता आया है।”
वर्तमान में बड़ा भाई रहा जीव पूर्वजन्म में छोटे भाई का अनुज भी रहा था। राजा, पक्षी, वृक्ष, उष्ट्र, भेड़िया और मृग के जीवन एक ही वासनाक्रम के विविध पड़ाव थे। पुण्य ने अपनी स्मृतियों को किसी श्रेष्ठता के प्रमाण की तरह नहीं रखा। वे स्वयं भी उसी बदलते क्रम से होकर यहाँ पहुँचे थे।
पुण्य ने कहा, “ज्ञान के बिना वासना और कर्म के अनुसार हम कितने जन्मों में घूमे हैं। मुझे उन जीवनों की गति स्मरण है। तुम्हारे और मेरे सैकड़ों माता, पिता, भाई, बन्धु और मित्र काल में चले गए। अब किसका शोक चुनें और किसे छोड़ें? यदि मन प्रत्येक बीते सम्बन्ध को एक साथ पकड़ ले, तो उसके लिए कोई क्षण जीना सम्भव न होगा।”
उनका निर्देश अहंभाव और ममता की उस धारणा को पहचानना था जो सम्बन्ध को आत्मा का स्वामित्व समझती है। स्नेह व्यवहार में रह सकता है। ज्ञानी अपने सामने आए संस्कार पूरे करता है, अतिथि का सत्कार करता है, परिवार की देखभाल करता है और दुःख के क्षण में साथ देता है। भीतर वह किसी व्यक्ति के सत्य को एक देह, एक भूमिका और एक जन्म की अवधि से व्यापक जानता है।
नामों के पीछे एक चेतना
पुण्य बोले, “यह नाम पुण्य है और यह नाम पावन है। इन नामों के सहारे व्यवहार चलता है। अपने चित्त से देखो कि नाम से पहले तुम्हारी अनुभूति क्या है। देह पाँच तत्त्वों से बनी है। विचार आते और चले जाते हैं। स्मृतियाँ कुछ जन्मों को ढँक देती हैं और कुछ को सामने रखती हैं। इन सबका ज्ञान जिस चेतना में हो रहा है, वह हर परिवर्तन के समय उपस्थित है।”
उन्होंने दर्पण का दृष्टान्त दिया। दर्पण में सुन्दर और विकृत, उजले और गहरे, अनेक प्रतिबिम्ब आते हैं। दर्पण उनकी आकृति दिखाते हुए अपनी स्वच्छता में रहता है। आत्मदर्शी पुरुष जीवन के कर्मों में भाग लेते हुए इसी प्रकार साक्षीभाव में स्थित रहता है। कर्म सामने आता है तो उसे पूरा करता है। फल आते हैं तो उन्हें देखता है। वह कर्तापन के अभिमान को स्थायी पहचान बनने से रोकता है।
दीपक का दृष्टान्त भी इसी बात को खोलता है। रात में दीपक अपनी उपस्थिति से प्रकाश देता है और दिखाई देने वाले कार्यों से पृथक रहता है। चेतना की उपस्थिति में शरीर, इन्द्रियाँ और मन अपना-अपना व्यापार करते हैं। ज्ञानी यथाप्राप्त उत्तरदायित्व निभाता है और अपने स्वरूप को उस व्यापार से व्यापक जानता है।
पुण्य ने भाई से कहा, “व्याकुलता छोड़कर उस आत्मा का स्मरण करो जो जन्म, जरा और मृत्यु से रहित है। तुम्हारे भीतर जो शोक उठ रहा है, उसे दबाने का यत्न मत करो। उसके आधार को देखो। माता-पिता की देह चली गई है। जिस चेतना में उनका स्नेह जाना गया, जिस चेतना में उनकी स्मृति उठती है और जिस आत्मपद में वे स्थित हुए, वह अविनाशी आधार है।”
पावन की दृष्टि धीरे-धीरे देह की अनुपस्थिति से हटकर सम्बन्ध के गहरे आधार पर आई। माता-पिता के संस्कार पूरे हो चुके थे। उनकी साधना की परिणति समझ में आने लगी। अनेक जन्मों की स्मृति ने वर्तमान शोक को एक विशाल क्रम में रख दिया। नामों और भूमिकाओं के पीछे एक ही चेतना का विचार उसके अपने अनुभव में उतरने लगा। उसमें आत्मनिश्चय का आरम्भ हुआ।
पावन का बोध और दोनों भाइयों की गति
वसिष्ठ ने श्रीराम से कहा कि पुण्य के इस प्रकार समझाने पर पावन उत्कृष्ट बोध को प्राप्त हुआ। उसके भीतर आत्मतत्त्व का निश्चय स्थिर हुआ। शोक की तरंग के नीचे जो असुरक्षा थी, वह अपने आधार की जाँच में शान्त हो गई। माता-पिता की गति अब उसे आत्मपद की व्यापक दृष्टि में समझ आने लगी।
दोनों भाई ज्ञान और विज्ञान में पारंगत, सिद्ध और आनन्दित होकर उसी वन में विचरते रहे। उनके जीवन का शेष भाग सहज व्यवहार और आत्मनिश्चय में बीता। प्रारब्ध कर्म क्षीण होने पर वे दोनों तेलरहित दीपकों की भाँति शान्त हुए, देह से मुक्त होकर निर्वाणपद को प्राप्त हुए। पावन ने उसी उपदेश में बोध पाया और दोनों भाइयों की यात्रा उसी वन में पूर्ण हुई।
वसिष्ठ ने इस प्रसंग को श्रीराम के लिए सम्बन्ध-विवेक की शिक्षा से जोड़ा। अनन्त जन्मों में बने मित्रों और बान्धवों की गणना असम्भव है। विवेक वर्तमान सम्बन्धों की मर्यादा सँभालता है और स्नेह को भय, स्वामित्व तथा देह की अनिवार्य स्थायित्व-कल्पना से मुक्त करता है। पुण्य ने माता-पिता के सभी संस्कार पूरे किए, भाई के शोक को सुना और फिर उसकी जड़ तक पहुँचे। दर्पण और दीपक की तरह चेतना हर बदलते रूप को प्रकाशित करती रही। उसी पहचान ने दोनों भाइयों के शेष जीवन को आत्मीयता और स्पष्टता दी।