छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय 7

छान्दोग्य उपनिषद् · अध्याय सात

नारद का प्रश्न और भूमा-विद्या

छब्बीस खण्ड। शास्त्र-ज्ञान की सीमा और उसके आगे का तत्त्व।

सातवें अध्याय की कथा प्राचीन भारतीय शिक्षा-शास्त्र की सबसे आत्मसमर्पण-योग्य scenes में से एक है। नारद ऋषि, जो स्वयं एक मान्यता-प्राप्त विद्वान हैं, सनत्-कुमार के पास जाते हैं और कहते हैं, “मुझे शिक्षा दीजिए।” सनत्-कुमार कहते हैं, “जो तू जानता है उसके साथ आ, उसके आगे तुझे बताऊँगा।”

नारद की सूची चौंकाने वाली है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, साम-वेद, अथर्ववेद, इतिहास-पुराण (पाँचवाँ वेद), व्याकरण, पितृ-कर्म, गणित, daiva-निधि (कुदरत-शास्त्र), वाद-शास्त्र, एकायन (नीति-शास्त्र), देव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, क्षत्र-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-देव-जन-विद्या। यह सूची एक तरह की वैदिक-encyclopedia है, और नारद कहते हैं कि वो यह सब पढ़ चुके हैं।

फिर एक तरह की brutal-स्वीकृति आती है, “भगवन्, मैं केवल मन्त्र-वित् (text-knower) हूँ, आत्म-वित् (self-knower) नहीं। मैंने आप-जैसे ज्ञानियों से सुना है कि आत्म-वित् ही शोक को पार कर पाता है। तो हे भगवन्, मैं शोक-मय हूँ, मुझे शोक-पार ले जाइए।” सनत्-कुमार का उत्तर एक ही पंक्ति में आता है, “जो-कुछ तूने पढ़ा है, वो सिर्फ़-नाम है।”

उसके बाद के सत्ताईस-अट्ठाईस खण्ड एक तरह की क्रमिक-सीढ़ी हैं। नाम → वाक् → मन → संकल्प → चित्त → ध्यान → विज्ञान → बल → अन्न → आप → तेज → आकाश → स्मर → आशा → प्राण → सत्य → विज्ञान → मनन → श्रद्धा → निष्ठा → कृति → सुख → भूमा। हर कदम पर सनत्-कुमार पूछते हैं, “इससे ऊपर कुछ है?” और हर बार उत्तर हाँ। अन्त में सुख से ऊपर भूमा।

नारद और सनत्-कुमार दोनों पुरातन ऋषियों में हैं। नारद ब्रह्मा के मानस-पुत्र माने जाते हैं, और महाभारत-पुराणों में अक्सर देव-दूत-भूमिका निभाते हैं। सनत्-कुमार ब्रह्मा के पाँच मानस-पुत्रों (सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्-कुमार, सनत्-सुजात) में से एक हैं, और परम्परा कहती है कि वो हमेशा पाँच-वर्षीय बालक के रूप में रहते हैं। नारद की जिज्ञासा का यह दृश्य भारतीय-शिक्षा-शास्त्र में एक archetypal-moment बन गया, और रामकृष्ण परमहंस अक्सर उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशकों में अपने शिष्यों को यह कथा सुनाते थे।

Key passages

7.1.1-3नारद की self-introduction
अधीहि भगव इति होपससाद सनत्कुमारं नारदस्तं होवाच यद्वेत्थ तेन मोपसीद ततस्त ऊर्ध्वं वक्ष्यामीति । स होवाच । ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदं सामवेदमाथर्वणं चतुर्थमितिहासपुराणं पञ्चमं वेदानां वेदं पित्र्य{\म्+}राशिं दैवं निधिं वाकोवाक्यमेकायनं देवविद्यां ब्रह्मविद्यां भूतविद्यां क्षत्रविद्यां नक्षत्रविद्या{\म्+} सर्पदेवजनविद्यामेतद्भगवोऽध्येमि ॥ सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवऽस्मि नात्मवित्श्रुतं ह्येव मे भगवद्दृशेBह्य स्तर{\म्+}सोकं मन्त्रवित्तरति तत्सोऽहं भगवः शोचामि तं मा भगवा{\म्+}शोकस्य पारं तारयत्विति । त{\म्+} होवाच यद्वै किंचैतदध्यगिष्ठा नामैवैतत् ॥
adhīhi bhagava iti hopasasāda sanatkumāraṃ nāradastaṃ hovāca yadvettha tena mopasīda tatasta ūrdhvaṃ vakṣyāmīti । sa hovāca । ṛgvedaṃ bhagavo’dhyemi yajurvedaṃ sāmavedamātharvaṇaṃ caturthamitihāsapurāṇaṃ pañcamaṃ vedānāṃ vedaṃ pitrya{\m+}rāśiṃ daivaṃ nidhiṃ vākovākyamekāyanaṃ devavidyāṃ brahmavidyāṃ bhūtavidyāṃ kṣatravidyāṃ nakṣatravidyā{\m+} sarpadevajanavidyāmetadbhagavo’dhyemi ॥ so’haṃ bhagavo mantravideva’smi nātmavitśrutaṃ hyeva me bhagavaddṛśeBhya stara{\m+}sokaṃ mantravittarati tatso’haṃ bhagavaḥ śocāmi taṃ mā bhagavā{\m+}śokasya pāraṃ tārayatviti । ta{\m+} hovāca yadvai kiṃcaitadadhyagiṣṭhā nāmaivaitat ॥

अर्थ: नारद ने सनत्-कुमार के पास जा कर कहा, ‘भगवन्, मुझे शिक्षा दीजिए।’ सनत्-कुमार ने कहा, ‘जो आप जानता है उसके साथ आ, उससे आगे आपको बताऊँगा।’ नारद ने कहा, ‘भगवन्, मैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास-पुराण (पाँचवाँ-वेद), वेदों-का-वेद (व्याकरण), पितृ-कर्म, गणित, daiva-निधि (कुदरत-शास्त्र), वाद-शास्त्र, एकायन (नीति), देव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, क्षत्र-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-देव-जन-विद्या, यह सब पढ़ चुका हूँ। मगर भगवन्, मैं मन्त्र-वित् (शब्द-जानने वाला) हूँ, आत्म-वित् (self-जानने वाला) नहीं। मैंने आप-जैसे ज्ञानियों से सुना है, आत्म-वित् शोक को पार करता है। तो हे भगवन्, मैं शोक-मय हूँ, मुझे शोक-पार ले जाइए।’ सनत्-कुमार ने कहा, ‘जो-कुछ तूने पढ़ा है, वो सिर्फ़-नाम है।’

संगति: एक beautiful-वाक्य: मन्त्र-वित् = text-knower। आत्म-वित् = self-knower। पहला पहली-condition, मगर पर्याप्त-नहीं। दूसरा transformation। नारद-कथा सब-academic-knowledge की limit बताती है।
7.23.1भूमा ही सुख
यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्तीति भूमैव सुखं भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्य इति भूमानं भगवो विजिज्ञास इति ॥
yo vai bhūmā tatsukhaṃ nālpe sukhamastīti bhūmaiva sukhaṃ bhūmā tveva vijijñāsitavya iti bhūmānaṃ bhagavo vijijñāsa iti ॥

अर्थ: जो भूमा (boundless) है, वही सुख है। अल्प (small/limited) में सुख नहीं। भूमा ही सुख। भूमा को ही जानना चाहिए। ‘भगवन्, मुझे भूमा को जानना है।’

संगति: एक legendary statement। ‘भूमा’ = boundless, infinite, vast। दुनिया-भर के ‘सुख’ सब-limited हैं। असली-सुख सिर्फ़-boundless में। यह वाक्य पूरे-spiritual-quest का foundation है। आज तक हर-yogi इस-पंक्ति को quote करता है।
7.24.1भूमा क्या है
यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत्पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद्विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यं स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि यदि वा न महिम्नीति ॥
yatra nānyatpaśyati nānyacchṛṇoti nānyadvijānāti sa bhūmātha yatrānyatpaśyatyanyacchṛṇotyanyadvijānāti tadalpaṃ yo vai bhūmā tadamṛtamatha yadalpaṃ tanmartyaṃ sa bhagavaḥ kasminpratiṣṭhita iti sve mahimni yadi vā na mahimnīti ॥

अर्थ: जहाँ कुछ-और नहीं देखा जाता, कुछ-और नहीं सुना जाता, कुछ-और नहीं जाना जाता, वो भूमा है। जहाँ कुछ-और देखा-सुना-जाना जाता है, वो अल्प है। जो भूमा है, वो अमृत है। जो अल्प है, वो मर्त्य। ‘भगवन्, यह भूमा किस-में प्रतिष्ठित है?’ ‘अपनी ही महिमा में, या कहीं-नहीं प्रतिष्ठित।’

संगति: Bhuma का सबसे-सटीक description: जहाँ no-other-perception। यानी एकमेव state, अद्वैत-स्थिति। और ‘sve mahimni’ (अपनी ही महिमा में) यह वाक्य बहुत-deep है: ब्रह्म self-sustained है, किसी-और पर depend नहीं।

अध्याय-overview

Khanda 1-15 क्रम-दर-क्रम ascent: नाम, वाक्, मन, संकल्प, चित्त, ध्यान, विज्ञान, बल, अन्न, आप, तेज, आकाश, स्मर, आशा, प्राण।

Khanda 16-23 सत्य, विज्ञान, मनन, श्रद्धा, निष्ठा, कृति, सुख। हर step पर ‘इससे ऊपर?’। आख़िर में सुख से ऊपर भूमा।

Khanda 24-26 भूमा-विद्या का explanation। ब्रह्म-दर्शन।

संगति

“भूमा” शब्द का अर्थ “असीम” है। तेईसवें खण्ड का वाक्य पूरे आध्यात्मिक quest का मूल वाक्य बन गया है, “यो वै भूमा तत् सुखम्। न अल्पे सुखम् अस्ति।” (जो असीम है, वही सुख है। अल्प में सुख नहीं है।) यह एक तरह का दार्शनिक-दावा है, और जीवन-व्यवहार का भी। अधिकांश मानवीय असन्तोष का स्रोत यही है, कि हम अल्प-वस्तुओं में सुख ढूँढते हैं, और न पाकर लौट-लौट कर निराश होते हैं।

चौबीसवें खण्ड का वर्णन “भूमा” को परिभाषित करने का प्रयास है, “जहाँ कुछ-और नहीं देखा जाता, कुछ-और नहीं सुना जाता, कुछ-और नहीं जाना जाता, वो भूमा है।” यह एकमेव-state है, अद्वैत-स्थिति। और एक powerful-phrase है, “स्वे महिम्नि प्रतिष्ठितः” (वो अपनी ही महिमा में स्थित है)। ब्रह्म self-grounded है, किसी-और पर depend नहीं।

नारद-कथा आज भी पठनीय है। हम सब किसी न किसी रूप में नारद हैं, मन्त्र-वित् (किताबें पढ़े हुए) मगर आत्म-वित् नहीं। यह स्वीकृति ही आगे बढ़ने का पहला कदम है, सब-कुछ पढ़ कर भी अगर शोक नहीं गया, तो शायद पढ़ने में कुछ छूट गया है।

स्रोत: मूल देवनागरी sanskritdocuments.org के “chhaandogya.itx” से।

license: मूल text public-domain। हिन्दी टीका lulla.net, CC BY-NC 4.0।