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उपनिषद्प्रश्न के भीतर का मौन

अध्याय 7: नारद, सनत्कुमार और भूमा

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सामवेद · छान्दोग्य उपनिषद् · अध्याय 7
सारी विद्याएँ पढ़ चुके नारद अपना शोक लेकर सनत्कुमार के पास आते हैं, और वहाँ से एक सीढ़ी शुरू होती है जो नाम से उठकर भूमा तक जाती है।

आश्रम के आँगन में दोपहर ढल रही है। जो व्यक्ति आकर सामने बैठा है, उसे तीनों लोक जानते हैं: देवर्षि नारद, जिनके लिए न किसी सभा का द्वार बन्द है, न किसी लोक का रास्ता। वे बैठते हैं और पहला वाक्य यही बोलते हैं, “अधीहि भगव”, हमें पढ़ाइए भगवन्। आचार्य सनत्कुमार उत्तर में सीधे पढ़ाना शुरू नहीं करते, एक शर्त रख देते हैं: जो आप जानते हैं, पहले वही लेकर हमारे पास आइए, उसके ऊपर से आगे हम कहेंगे। सुनने में यह वाक्य साधारण लगता है। असल में यहीं तय हो जाता है कि जो सीढ़ी आज चढ़नी है, उसका पहला डंडा वहीं रखा जाएगा जहाँ शिष्य इस समय खड़ा है।

छान्दोग्य उपनिषद् के आठ अध्यायों में यह सातवाँ है, और अपने छब्बीस खण्डों के साथ इस पूरे ग्रन्थ का सबसे लम्बा एक-से-एक संवाद है। ठीक पिछले अध्याय में उद्दालक आरुणि अपने बेटे श्वेतकेतु से नौ बार तत्त्वमसि कह चुके हैं, वहाँ सत् से सृष्टि खुलती है, ऊपर से नीचे की ओर। यहाँ दिशा उलटी है। यहाँ आचार्य सबसे नीचे के डंडे पर हाथ रखते हैं, नाम पर, और हर बार शिष्य के एक ही प्रश्न पर, कि इससे बड़ा कुछ और है क्या, एक डंडा और ऊपर चढ़ा देते हैं। यह अध्याय इसी चढ़ाई का ब्योरा है, और इसका असली विषय विद्या नहीं, शोक है।

इस अध्याय के मुख्य किरदार

नारद: देवर्षि, चारों वेदों और दर्जनों विद्याओं के पारंगत, और इतना सब पढ़कर भी भीतर से बेचैन एक शिष्य।

सनत्कुमार: वह आचार्य जो पढ़ाने से पहले पूछते हैं, और अन्त में अन्धकार का दूसरा किनारा दिखाकर छोड़ते हैं; उपनिषद् उन्हें स्कन्द नाम से भी पुकारता है।

नाम से प्राण तक की चौदह सीढ़ियाँ: नाम, वाक्, मनः, संकल्प, चित्त, ध्यान, विज्ञान, बल, अन्न, आप, तेजस्, आकाश, स्मर, आशा और प्राण, हर एक अपनी बारी पर सामने आती है और अपने से बड़ी को रास्ता दे देती है।

सत्य से सुख तक की सात कड़ियाँ: सत्य, विज्ञान, मति, श्रद्धा, निष्ठा, कृति और सुख, जिनसे उतरकर आचार्य बड़े बोल की जड़ तक पहुँचते हैं।

भूमा: वह असीम, जहाँ दूसरा कुछ देखने, सुनने और जानने को बचता ही नहीं।

अधीहि भगव: एक पढ़े-लिखे आदमी का शोक (खण्ड 1)

वीणा एक ओर रखकर आचार्य सनत्कुमार के सामने भूमि पर बैठे देवर्षि नारद, हाथ जोड़े हुए, कुछ पूछने की मुद्रा में
सब कुछ पढ़ लेने के बाद भी, नारद आचार्य के सामने बैठ जाते हैं।

आचार्य ने जो शर्त रखी थी, नारद उसे पूरा करते हैं, और पूरा करते हुए एक लम्बी सूची खोल देते हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, चौथा अथर्ववेद, पाँचवाँ इतिहास-पुराण, वेदों का वेद, पितरों का विधान, राशि यानी गिनती का शास्त्र, दैव यानी उत्पातों का पढ़ना, निधि, वाकोवाक्य यानी तर्क और शास्त्रार्थ, एकायन यानी नीति, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, और सर्प तथा देवजनों की विद्या। शांकरभाष्य इनमें से कई नामों को खोलकर बताता है, वेदों का वेद व्याकरण है, राशि गणित, देवविद्या निरुक्त, ब्रह्मविद्या शिक्षा-कल्प-छन्द का समुच्चय, क्षत्रविद्या धनुष का शास्त्र। सूची सुनने में सभा जीत लेने वाली है।

और फिर, उसी साँस में, नारद वह वाक्य कहते हैं जिस पर यह पूरा अध्याय टिका है। “सोऽहं भगवो मन्त्रविदेवास्मि”, भगवन्, हम केवल मन्त्रों के जानकार हैं, आत्मा के जानकार नहीं। हमने आप जैसे लोगों से सुन रखा है, “तरति शोकमात्मवित्”, आत्मा को जानने वाला शोक के पार उतर जाता है। तो भगवन्, हम शोक कर रहे हैं। इतना पढ़ने के बाद भी भीतर एक काँटा अटका रह गया है। आप हमें इस शोक के उस पार पहुँचा दीजिए। यह वाक्य किसी अनपढ़ का नहीं है। यह उस आदमी का है जिसके पास हर विषय का उत्तर है, सिवाय अपने।

सनत्कुमार का उत्तर बहुत छोटा है और बहुत बेधने वाला। “यद्वै किञ्चैतदध्यगीष्ठा नामैवैतत्”, जो कुछ आपने पढ़ा है, वह सब नाम ही है। ऋग्वेद नाम है, यजुर्वेद नाम है, इतिहास-पुराण नाम है, तर्क और नीति और नक्षत्र की विद्या, सब नाम हैं। जिस चीज़ की ओर नाम इशारा करता है, उस तक नाम अपने आप नहीं पहुँचाता। सूरज की बनावट का पूरा ब्योरा कण्ठस्थ हो जाने से कोई आदमी सूरज का मालिक नहीं हो जाता। नारद के पास संसार की पूरी सूची थी, संसार नहीं था; और सूची कभी किसी के शोक को नहीं छूती।

यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि आचार्य उस सूची को फेंकते नहीं। वे कहते हैं, नाम की ही उपासना कीजिए। और साथ में फल भी बता देते हैं: जो नाम को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, नाम की पहुँच जहाँ तक है, वहाँ तक वह इच्छा के अनुसार विचर सकता है। यह पहली सीढ़ी का पूरा और ईमानदार मोल है। जितना आप खड़े हैं, उतने का पूरा स्वामित्व पहले ले लीजिए, फिर आगे देखिए। शोक इससे नहीं कटता, पर पैर इससे जमते हैं।

नारद इस फल पर रुकते नहीं। वे वह प्रश्न पूछते हैं जो आगे तेरह बार और दुहराया जाएगा: भगवन्, क्या नाम से भी बड़ा कुछ है? और आचार्य वही उत्तर देते हैं जो आगे तेरह बार और दोहराया जाएगा: हाँ, नाम से बड़ा कुछ है। तब नारद कहते हैं, तो वही हमें बताइए। यही इस अध्याय की चाल है, एक शान्त, अड़ी हुई, कभी न थकने वाली जिज्ञासा, जो हर मिली हुई चीज़ पर हाथ रखकर पूछती है कि इसके ऊपर क्या है।

सार: यह अध्याय एक पढ़े-लिखे आदमी के शोक से खुलता है, और उसका पहला निदान यह है कि जितना पढ़ा गया वह नाम तक ही था। नाम को आचार्य झूठा नहीं ठहराते, उसे पहली सीढ़ी बनाते हैं। असली बात यह है कि नारद वहाँ रुकते नहीं, और यही न रुकना पूरे संवाद का इंजन है।

वाणी और मन: मुट्ठी में दो आँवले (खण्ड 2 और 3)

नाम से बड़ी वाणी है, आचार्य कहते हैं, क्योंकि नाम अपने आप नहीं बोलता, वाणी उसे बुलवाती है। और वाणी जो-जो जनाती है, उसकी सूची नारद की सूची से कहीं लम्बी है। चारों वेद, इतिहास-पुराण, व्याकरण, गणित, तर्क, नीति, सारी विद्याएँ; और उनके साथ द्युलोक और पृथिवी, वायु और आकाश, जल और तेज, देवता और मनुष्य, पशु और पक्षी, घास और वनस्पति, जंगली जानवर, कीड़े, पतंगे, चींटी तक। वाणी इन सबको जनाती है, यानी इन सबको हमारी जानकारी में लाती है, और जब तक कोई चीज़ जनाई न जाए, वह हमारे लिए है या नहीं, कहना कठिन है।

फिर आचार्य एक और परत खोलते हैं, जो पहली से ज़्यादा नाज़ुक है। वाणी धर्म और अधर्म को जनाती है, सत्य और असत्य को, साधु और असाधु को, हृदय को भला लगने वाले और बुरा लगने वाले को। और वे कहते हैं, यदि वाणी न होती, तो न धर्म जनाया जाता, न अधर्म; न सत्य, न असत्य; न भला, न बुरा। यह बात मनुष्य के जीवन के बीचोंबीच जाकर बैठती है। जिस समाज में बोलने की ताकत नहीं रही, वहाँ अच्छे और बुरे का भेद बना नहीं रह पाता, क्योंकि भेद तभी टिकता है जब उसे कहा जा सके। इसलिए, वाणी की उपासना कीजिए, आचार्य कहते हैं।

नारद फिर वही प्रश्न रख देते हैं, और आचार्य फिर एक डंडा ऊपर चढ़ जाते हैं। वाणी से बड़ा मन है। यहाँ उपनिषद् एक ऐसा दृश्य देता है जो एक बार पढ़कर भूलता नहीं: जैसे मुट्ठी में दो आँवले आ जाते हैं, या दो बेर, या दो बहेड़े, वैसे ही मन में वाणी और नाम दोनों समा जाते हैं। यानी जिन दोनों को अब तक हम बड़ा समझ रहे थे, वे किसी तीसरे की हथेली में पड़े हुए हैं। मन जब तक हाथ न खोले, न नाम बाहर आता है, न वाणी।

और मन क्या करता है, यह भी साफ़ कहा गया है। जब मनुष्य मन से सोचता है कि मन्त्र पढ़ें, तब वह पढ़ता है; सोचता है कि कर्म करें, तब करता है; सोचता है कि सन्तान और पशु चाहिए, तब चाहता है; सोचता है कि यह लोक और वह लोक चाहिए, तब चाहता है। पढ़ाई, कर्म, कामना, लोक, सब का पहला बटन मन के पास है। इसीलिए आचार्य इस खण्ड को उस वाक्य पर ले जाकर छोड़ते हैं जो सुनने में लगभग ढीठ लगता है: “मनो ह्यात्मा मनो हि लोको मनो हि ब्रह्म”, मन ही आत्मा है, मन ही लोक है, मन ही ब्रह्म है।

इस वाक्य को उसी जगह रखकर पढ़िए जहाँ यह बोला गया है। यह अन्तिम घोषणा नहीं है, यह तीसरी सीढ़ी का फल-वचन है। उपासना की एक विधि यही है कि जिस डंडे पर आप खड़े हैं, उसे पूरा मान लीजिए, उसमें पूरी श्रद्धा उँडेल दीजिए, तभी उसका सत्य निचुड़कर हाथ में आता है और तभी अगला डंडा दिखाई देता है। नारद यही करते हैं, और फिर वही पूछते हैं, इससे भी बड़ा कुछ? हाँ, आचार्य कहते हैं, है।

सार: वाणी नाम से बड़ी है क्योंकि जो बोला न जा सके वह हमारे लिए दुनिया में आता ही नहीं, और धर्म-अधर्म तक का भेद वाणी के सहारे खड़ा है। मन वाणी से बड़ा है क्योंकि नाम और वाणी दोनों मन की मुट्ठी में पड़े हैं। हर सीढ़ी अपने नीचे वाली को निगलकर बड़ी होती है, यह इस अध्याय का नियम है।

संकल्प और चित्त: इरादा, जिससे लोक जुड़ते हैं (खण्ड 4 और 5)

मन से बड़ा संकल्प है। आचार्य इसका कारण क्रम से दिखाते हैं: पहले मनुष्य संकल्प करता है, तब मन में विचार उठता है, तब वह वाणी चलाता है, और वाणी को वह नाम में चलाता है; नाम में मन्त्र एक हो जाते हैं, और मन्त्रों में कर्म। यानी जिस क्रम को हम अब तक नीचे से ऊपर चढ़ रहे थे, वह ऊपर से नीचे इस तरह उतरता है: संकल्प, मन, वाणी, नाम, मन्त्र, कर्म। जो सबसे पहले उठता है वही सबसे बड़ा है, क्योंकि बाकी सब उसके पीछे-पीछे चलते हैं।

और फिर उपनिषद् संकल्प को मनुष्य के भीतर से उठाकर पूरी सृष्टि पर रख देता है। द्युलोक और पृथिवी ने अपने को संकल्प से साधा, वायु और आकाश ने, जल और तेज ने। उनके सध जाने से वर्षा सधती है, वर्षा के सध जाने से अन्न, अन्न के सध जाने से प्राण, प्राणों के सध जाने से मन्त्र, मन्त्रों के सध जाने से कर्म, कर्मों के सध जाने से लोक, और लोक के सध जाने से सब कुछ। एक कड़ी से दूसरी, दूसरी से तीसरी; और नीचे तक वही एक बात चलती है, कि जुड़ी हुई चीज़ें अपने आप नहीं जुड़ीं, वे साधी गई हैं।

इसका फल भी सुन लीजिए, क्योंकि इस खण्ड में फल की भाषा बदल जाती है। जो संकल्प को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, वह सधे हुए लोकों को पाता है, ध्रुव लोकों को, और स्वयं ध्रुव होकर पाता है; प्रतिष्ठित लोकों को, और स्वयं प्रतिष्ठित होकर; न काँपने वाले लोकों को, और स्वयं न काँपते हुए। यहाँ पहली बार उपासक के मिलने वाले जगत और उसके अपने ढंग को एक ही शब्द में बाँध दिया गया है। जिसका इरादा डगमगाता नहीं, उसका संसार भी उसके नीचे से नहीं खिसकता।

नारद वहीं वही प्रश्न रखते हैं, और चित्त सामने आता है। चित्त संकल्प से बड़ा है, क्योंकि पहले चेतना उस चीज़ पर पड़ती है, तब संकल्प बनता है, तब मन चलता है, तब वाणी। इरादा भी अकेला नहीं उठता, उसके पहले एक जागा हुआ भीतर चाहिए, जो देखे, पकड़े, ठहरे। जिसे हम इरादा कहते हैं वह उसी ठहरी हुई चेतना का अगला कदम है।

और अब उपनिषद् एक ऐसा उदाहरण देता है जिसे कोई भी सभा पहचान लेगी। बहुत पढ़ा हुआ आदमी हो, पर चित्त से खाली हो, तो लोग उसके बारे में कहते हैं, यह है ही नहीं; जो कुछ यह जानता है, उसका क्या मोल; यदि यह सचमुच विद्वान होता तो ऐसा चित्तहीन न होता। और थोड़ा जानने वाला हो, पर चित्तवान् हो, तो लोग उसी को सुनना चाहते हैं, उसी के पास बैठते हैं। जानकारी की मात्रा से नहीं, भीतर की उपस्थिति से आदमी का वज़न बनता है। इसलिए आचार्य कहते हैं, चित्त ही इन सबका एक ठिकाना है, चित्त ही आत्मा है, चित्त ही प्रतिष्ठा है, चित्त की उपासना कीजिए।

सार: संकल्प मन से बड़ा है क्योंकि मन, वाणी, नाम, मन्त्र और कर्म, सब उसके पीछे चलते हैं, और द्युलोक से लेकर अन्न तक सृष्टि भी इसी सधने की श्रृंखला से खड़ी है। चित्त संकल्प से बड़ा है क्योंकि इरादे से पहले एक जागी हुई उपस्थिति चाहिए। बहुत जानकर भी चित्त से खाली आदमी को लोग गिनते ही नहीं, यह इस खण्ड की सबसे तीखी बात है।

ध्यान, विज्ञान और बल (खण्ड 6, 7 और 8)

चित्त से बड़ा ध्यान है, और इसका जो चित्र आचार्य खींचते हैं वह इस अध्याय के सबसे सुन्दर चित्रों में है। पृथिवी मानो ध्यान कर रही है, अन्तरिक्ष मानो ध्यान कर रहा है, द्युलोक मानो ध्यान कर रहा है, जल मानो ध्यान कर रहे हैं, पर्वत मानो ध्यान कर रहे हैं, देवता और मनुष्य भी। जो चीज़ें बड़ी हैं, वे चुप हैं और अपनी जगह ठहरी हैं; उनके ठहरने में ही उनका बड़प्पन है। बड़ी नदी शोर नहीं करती, बड़ा पहाड़ हिलता नहीं।

और यहीं से आचार्य आदमी की ओर मुड़ते हैं। मनुष्यों में जो लोग बड़प्पन तक पहुँचते हैं, वे मानो उसी ध्यान का अंश लिए हुए होते हैं। और जो छोटे रह जाते हैं, वे झगड़ालू होते हैं, चुगली करने वाले, पीठ पीछे बोलने वाले; जबकि जो सचमुच समर्थ हैं, उनमें भी उसी ध्यान का अंश दिखता है। यह इस अध्याय की एक सीधी कसौटी है, और आज भी चलती है: भीतर जिसका ठहराव नहीं, वह छोटी-छोटी बातों पर बिखरता रहता है, और उसका कद कभी नहीं बढ़ता।

ध्यान से बड़ा विज्ञान है। यहाँ विज्ञान का अर्थ है पहचान, विवेक, यह समझ कि जो सामने है वह है क्या। विज्ञान से ही मनुष्य ऋग्वेद को जानता है, यजुर्वेद को, सामवेद को, अथर्ववेद को, इतिहास-पुराण को, व्याकरण को, तर्क को, नीति को, नक्षत्र और भूत और सर्प की विद्याओं को; और इनके साथ द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, जल, तेज, देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी, वनस्पति, कीट-पतंग को; और धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, भला-बुरा, हृदय को भाने वाला और न भाने वाला, तथा अन्न और रस, यह लोक और वह लोक, इन सबको भी। ध्यान भीतर ठहराता है, विज्ञान उस ठहराव को आँख देता है।

और विज्ञान से बड़ा बल है। इस मोड़ पर उपनिषद् एक बहुत निर्मम वाक्य रखता है: “अपि ह शतं विज्ञानवतामेको बलवानाकम्पयते”, सौ समझदारों को भी एक बलवान हिला देता है। बात केवल भुजा की नहीं है। आचार्य आगे बताते हैं कि बल आता है तो आदमी उठता है, उठकर सेवा में लगता है, सेवा करते हुए गुरु के पास जाकर बैठता है, और पास बैठते ही वह देखने वाला होता है, सुनने वाला, मनन करने वाला, समझने वाला, करने वाला, जानने वाला बनता है। यानी वह सारा सिलसिला, जिसे हम विद्या कहते हैं, बल के बिना शुरू ही नहीं होता।

और फिर वही बात बाहर की ओर फैलती है। बल से पृथिवी टिकी है, बल से अन्तरिक्ष, बल से द्युलोक, बल से पर्वत, बल से देवता और मनुष्य, बल से पशु और पक्षी, घास और वनस्पति, जंगली जानवर, कीड़े, पतंगे, चींटी तक; बल से ही सारा लोक खड़ा है। जो चीज़ खड़ी दिखती है, उसे कोई न कोई ताकत हर क्षण खड़ा किए हुए है, यह उस देखने वाले को ही दिखता है जो ठहरकर देखे। इसलिए आचार्य कहते हैं, बल की उपासना कीजिए।

सार: ध्यान चित्त से बड़ा है, और उसकी पहचान चुप्पी और ठहराव है; झगड़ा और चुगली छोटेपन के लक्षण बताए गए हैं। विज्ञान ध्यान से बड़ा है क्योंकि वह ठहरी हुई चेतना को पहचानने की आँख देता है। बल विज्ञान से बड़ा है क्योंकि उठने, सेवा करने और गुरु के पास बैठने की ताकत के बिना समझ का पहला कदम भी नहीं उठता।

अन्न, जल, तेज और आकाश: सीढ़ी बाहर की ओर खुलती है (खण्ड 9 से 12)

बल से बड़ा अन्न है, और इसका प्रमाण देने के लिए उपनिषद् कोई तर्क नहीं करता, एक प्रयोग सामने रख देता है। दस रात कोई न खाए, तो चाहे वह जीवित बचा भी रहे, वह न देखने वाला रह जाता है, न सुनने वाला, न मनन करने वाला, न समझने वाला, न करने वाला, न जानने वाला। और जैसे ही अन्न भीतर जाता है, वही आदमी फिर देखने वाला हो जाता है, सुनने वाला, मनन करने वाला, समझने वाला, करने वाला, जानने वाला। जिस बल पर पिछला खण्ड टिका था, वह बल भी किसी के हाथ में है, और वह हाथ थाली का है।

अन्न से बड़ा जल है, और यहाँ भी दलील खेत से आती है। अच्छी वर्षा न हो, तो प्राण रोगी हो जाते हैं, यह सोचकर कि अब अन्न कम होगा; और अच्छी वर्षा हो जाए, तो प्राण आनन्द में आ जाते हैं, यह सोचकर कि अब अन्न बहुत होगा। फिर आचार्य एक कदम और आगे जाते हैं: यह जो पृथिवी है, जो अन्तरिक्ष है, जो द्युलोक है, जो पर्वत हैं, जो देवता और मनुष्य हैं, जो पशु और पक्षी और घास और वनस्पति और जंगली जानवर और कीड़े और चींटियाँ हैं, यह सब जल ही है, जमा हुआ जल। जो ठोस दिखता है, वह बहते हुए का रुका हुआ रूप है।

जल से बड़ा तेज है, और इसका दृश्य आकाश में खिंचता है। तेज वायु को पकड़कर आकाश को तपाता है। तब लोग कहते हैं, बहुत गरमी है, बहुत तप रहा है, वर्षा होगी। तेज पहले अपने को दिखाता है, फिर जल को छोड़ता है। और फिर ऊपर की ओर तथा तिरछी जाती हुई बिजलियों के साथ गरज दौड़ती है, तब लोग कहते हैं, बिजली चमकी, बादल गरजा, अब वर्षा होगी। फिर वही बात, तेज पहले अपने को दिखाता है, उसके बाद जल आता है। जिस जल को अभी-अभी सबका आधार कहा गया था, वह भी किसी की बारी के बाद आता है।

तेज से बड़ा आकाश है। सूर्य और चन्द्रमा दोनों आकाश में हैं, बिजली आकाश में है, नक्षत्र आकाश में, अग्नि आकाश में। आकाश से ही कोई पुकारता है, आकाश से ही सुनता है, आकाश से ही उत्तर देता है। आकाश में ही कोई रमता है, और आकाश में ही नहीं रमता। आकाश में ही जन्म होता है, और आकाश की ओर ही जन्म होता है। जगह के बिना न कोई चीज़ रह सकती है, न कोई घटना घट सकती है, न आवाज़ जा सकती है; और इसलिए इस सीढ़ी पर खड़ा उपासक खुले, उजले, बिना घुटन वाले, दूर तक फैले लोकों तक पहुँचता है।

यहाँ रुककर एक बात देख लेनी चाहिए। नाम से चलकर हम मन तक गए थे, जो भीतर है; फिर संकल्प, चित्त, ध्यान, विज्ञान तक, जो और भीतर है; और फिर बल, अन्न, जल, तेज, आकाश तक, जो पूरी तरह बाहर है। सीढ़ी भीतर से निकलकर ब्रह्माण्ड में फैल गई है। यह भटकाव नहीं है। आचार्य यह दिखा रहे हैं कि जिसे हम अपना भीतर कहते हैं, वह किन-किन चीज़ों के कन्धे पर बैठा है; और जो सबका कन्धा हो, वही बड़ा है।

सार: अन्न बल से बड़ा है क्योंकि दस रात का उपवास देखने-सुनने-समझने की सारी शक्ति ले जाता है। जल अन्न से बड़ा है और ठोस दिखने वाला सब कुछ जमा हुआ जल कहा गया है; तेज जल से बड़ा है क्योंकि वर्षा से पहले वही अपने को दिखाता है; और आकाश तेज से बड़ा है क्योंकि जगह के बिना कुछ घट ही नहीं सकता। इन चार सीढ़ियों पर खोज भीतर से निकलकर ब्रह्माण्ड तक फैल जाती है।

स्मर, आशा और प्राण: पहिये की नाभि (खण्ड 13, 14 और 15)

आकाश से बड़ा स्मर है, और इसी मोड़ पर पूरी चढ़ाई का रुख़ बदल जाता है। अब तक हर सीढ़ी हमें और बाहर ले जा रही थी। यहाँ आचार्य कहते हैं कि चाहे बहुत लोग बैठे हों, यदि उनके भीतर स्मरण न हो, तो वे कुछ सुनेंगे नहीं, मनन नहीं करेंगे, जानेंगे नहीं; और जब वे स्मरण करेंगे, तब सुनेंगे, तब मनन करेंगे, तब जानेंगे। स्मरण से ही मनुष्य अपने बच्चों को पहचानता है, स्मरण से ही अपने पशुओं को। इतना बड़ा आकाश भी हमारे लिए तभी है जब उसे धारण करने वाली एक कड़ी भीतर सलामत हो।

स्मर से बड़ी आशा है। आचार्य कहते हैं, आशा से सुलगकर ही स्मरण मन्त्र पढ़ता है, कर्म करता है, सन्तान और पशु चाहता है, यह लोक और वह लोक चाहता है। स्मृति अपने आप नहीं जलती; उसके नीचे किसी चाह की आँच चाहिए, किसी आगे की ओर खिंचाव की। जो आदमी किसी चीज़ की ओर बढ़ नहीं रहा, उसकी स्मृति भी धीरे-धीरे बुझ जाती है। और जो आशा को ब्रह्म मानकर उपासना करता है, उसकी सारी कामनाएँ फलती हैं, उसके आशीर्वाद खाली नहीं जाते।

और आशा से बड़ा प्राण है। यहाँ उपनिषद् वह उपमा देता है जो आगे सैकड़ों जगह दुहराई जाएगी: “यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन्प्राणे सर्वँ समर्पितम्”, जैसे तीलियाँ पहिये की नाभि में गड़ी रहती हैं, वैसे ही सब कुछ इस प्राण में गड़ा हुआ है। प्राण से ही प्राण चलता है, प्राण ही प्राण देता है, और प्राण के लिए ही देता है। और फिर वह पंक्ति आती है जो रिश्तों की पूरी दुनिया को एक ही धागे में पिरो देती है: “प्राणो ह पिता प्राणो माता”, प्राण ही पिता है, प्राण ही माता, प्राण ही भाई, प्राण ही बहन, प्राण ही आचार्य, प्राण ही ब्राह्मण।

इस बात को साबित करने के लिए आचार्य एक कड़वा दृश्य रखते हैं। यदि कोई पिता से, माता से, भाई से, बहन से, आचार्य से या ब्राह्मण से ज़रा भी कठोर बोल दे, तो लोग उसे धिक्कारते हैं और कहते हैं, आप पिता के हत्यारे हैं, माता के हत्यारे हैं, भाई के, बहन के, आचार्य के, ब्राह्मण के हत्यारे हैं। और उन्हीं शरीरों में से यदि प्राण निकल चुका हो, तो कोई उन्हें शूल से बेधकर जला भी दे, तब भी कोई नहीं कहता कि आप पिता के हत्यारे हैं। एक ही शरीर, एक ही सम्बन्ध, और फिर भी सारा अन्तर उस एक चीज़ का है जो भीतर से चली गई। इसीलिए आचार्य कहते हैं, प्राण ही ये सब हो जाता है।

और अब पहली बार इस अध्याय में उपासक के बारे में कुछ ऐसा कहा जाता है जो केवल फल नहीं, दर्जा है। जो ऐसा देखता है, ऐसा मानता है, ऐसा जानता है, वह अतिवादी हो जाता है, यानी वह जो औरों से आगे की बात बोलता है। और यदि लोग उससे कहें कि आप अतिवादी हैं, तो उसे कहना चाहिए, हाँ, हम अतिवादी हैं। उसे इसे छिपाना नहीं चाहिए। यह विनय का उल्लंघन नहीं है, यह उस बात के साथ खड़े होने की शर्त है जिसे आप जान चुके हैं।

सार: स्मर आकाश से बड़ा है क्योंकि जो याद न रहे, वह हमारे लिए हुआ ही नहीं। आशा स्मर से बड़ी है क्योंकि स्मृति को आगे की ओर खिंचाव की आँच चाहिए। और प्राण आशा से बड़ा है, पहिये की नाभि में गड़ी तीलियों की तरह सब उसी में गड़ा है; प्राण के निकल जाते ही पिता, माता और आचार्य के नाम भी उस देह पर नहीं टिकते।

बड़े बोल की जड़: सत्य, विज्ञान, मति, श्रद्धा, निष्ठा, कृति, सुख (खण्ड 16 से 22)

यहाँ संवाद वहाँ रुक सकता था। प्राण मिल गया, अतिवादी का दर्जा मिल गया, फल भी मिल गया। पर सनत्कुमार एक और वाक्य जोड़ देते हैं, और उसी से अध्याय का दूसरा आधा भाग खुलता है: “एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति”, सचमुच बड़ा बोल वही बोलता है जो सत्य के बल पर बोलता है। नारद तुरन्त कहते हैं, तो भगवन्, हम सत्य के बल पर ही बड़ा बोल बोलना चाहते हैं। आचार्य कहते हैं, तब सत्य को जानने की इच्छा कीजिए। नारद कहते हैं, भगवन्, हम सत्य को जानना चाहते हैं।

और यहीं पूरी दिशा पलट जाती है। पहले आधे में प्रश्न था, इससे बड़ा क्या है, और उत्तर हर बार ऊपर ले जाता था। अब प्रश्न बदल गया है, अब खोज यह है कि जो सामने है वह किस पर खड़ा है, और उत्तर हर बार नीचे, जड़ की ओर ले जाता है। चढ़ाई अब खुदाई हो गई है। यह एक ही खोज के दो हिस्से हैं, पहले यह देखना कि सबसे ऊपर क्या है, और फिर यह देखना कि सबसे नीचे क्या है।

पहली कुदाल विज्ञान पर पड़ती है। जब मनुष्य जानता है, तभी सत्य बोलता है; बिना जाने सत्य नहीं बोलता; जानकर ही बोलता है। इसलिए विज्ञान को जानने की इच्छा कीजिए। नारद कहते हैं, भगवन्, हम विज्ञान को जानना चाहते हैं। दूसरी कुदाल मति पर: जब मनुष्य मनन करता है, तभी जानता है; बिना मनन किए कोई नहीं जानता। इसलिए मति को जानने की इच्छा कीजिए। सूचना और जानकारी के बीच जो फ़र्क़ है, वह ठीक यहीं बैठा है, और आज की दुनिया में शायद पहले से भी ज़्यादा साफ़ दिखता है।

तीसरी कुदाल श्रद्धा पर पड़ती है। जब मनुष्य श्रद्धा करता है, तभी मनन करता है; बिना श्रद्धा के कोई मनन नहीं करता। जिस बात पर भरोसा ही नहीं, उस पर मन देर तक ठहरता नहीं, और जिस पर ठहरता नहीं, उस पर मनन कैसा। चौथी कुदाल निष्ठा पर: जब मनुष्य निष्ठा में टिकता है, जब वह एक जगह जमकर, गुरु के पास ठहरकर, अपने काम में गड़कर बैठता है, तभी श्रद्धा आती है। भटकते हुए आदमी में श्रद्धा नहीं जमती, क्योंकि श्रद्धा समय माँगती है।

पाँचवीं कुदाल कृति पर, यानी करने पर: जब मनुष्य करता है, तभी टिकता है; बिना किए कोई नहीं टिकता। ठहराव कोरे निश्चय से नहीं आता, हाथ चलाने से आता है। और छठी और आख़िरी कुदाल वहाँ पड़ती है जहाँ शायद ही कोई खोदने की सोचे: सुख पर। जब मनुष्य सुख पाता है, तभी करता है; सुख पाए बिना कोई करता नहीं; सुख पाकर ही करता है। इसलिए सुख को जानने की इच्छा कीजिए। नारद कहते हैं, भगवन्, हम सुख को जानना चाहते हैं।

यह उत्तर बहुत साहस का है और बहुत सच्चा भी। सारे कर्म, सारा तप, सारा अध्ययन, सारी निष्ठा, सबके नीचे एक ही चीज़ बैठी है, किसी न किसी सुख की आशा। आचार्य इस बात पर शर्मिन्दा नहीं होते, उसे छिपाते भी नहीं। वे उसे उठाकर सीधे अगले प्रश्न में डाल देते हैं: तो सुख है क्या? और इसी प्रश्न पर यह अध्याय अपनी सबसे ऊँची जगह पर पहुँचता है।

सार: बड़ा बोल तभी बड़ा है जब सत्य उसे उठाए हुए हो, और सत्य के नीचे विज्ञान, विज्ञान के नीचे मति, मति के नीचे श्रद्धा, श्रद्धा के नीचे निष्ठा, निष्ठा के नीचे कृति, और कृति के नीचे सुख है। पहला आधा अध्याय ऊपर चढ़ता है, दूसरा नीचे खोदता है, और दोनों एक ही जगह मिलते हैं। हर काम की आख़िरी जड़ किसी सुख की आशा है, और यह मानने से ही अगला प्रश्न खुलता है।

भूमा: जहाँ दूसरा कुछ बचता ही नहीं (खण्ड 23 से 26)

सनत्कुमार का उत्तर एक पंक्ति में आता है और वहीं ठहर जाता है: “यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति”, जो भूमा है, असीम है, वही सुख है; अल्प में, छोटे में, सीमित में सुख है ही नहीं। भूमा ही सुख है। इसलिए, आचार्य कहते हैं, भूमा को जानने की इच्छा कीजिए। और नारद, जो अब तक हर बार आगे बढ़ने की माँग कर रहे थे, वही माँग यहाँ भी रखते हैं: भगवन्, हम भूमा को जानना चाहते हैं। यह पूरे संवाद का सबसे ऊँचा डंडा है, और उस पर पैर रखने से पहले नारद ने पन्द्रह डंडे पार किए हैं।

परिभाषा जो आती है, वह किसी विशेषण से नहीं आती, एक स्थिति से आती है: “यत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा”, जहाँ कोई दूसरा दिखाई न दे, दूसरा सुनाई न दे, दूसरा जानने को न बचे, वही भूमा है। और जहाँ दूसरा दिखता है, दूसरा सुनाई देता है, दूसरा जाना जाता है, वह अल्प है। फिर एक और वाक्य, जो पहले वाले को कील की तरह ठोंक देता है: जो भूमा है वह अमृत है, और जो अल्प है वह मरणधर्मा। सारा दुख इसी दूसरे के होने से शुरू होता है, क्योंकि जहाँ दूसरा है, वहाँ दूरी है, और जहाँ दूरी है, वहाँ कमी है।

नारद एक बहुत मानवीय प्रश्न पूछते हैं: भगवन्, वह भूमा किस पर टिका है? आचार्य उत्तर देते हैं, अपनी ही महिमा में; और फिर तुरन्त उसमें छेद भी कर देते हैं, अथवा महिमा में भी नहीं। और इसके बाद वे उस शब्द को जाकर पकड़ते हैं जिसे दुनिया महिमा कहती है। लोग यहाँ गाय और घोड़े को महिमा कहते हैं, हाथी और सोने को, दास और स्त्री को, खेत और हवेली को। आचार्य कहते हैं, हम ऐसा नहीं कहते, क्योंकि यह सब तो एक दूसरे पर टिका हुआ है। जो वस्तु किसी और के सहारे खड़ी हो, वह किसी और की महिमा है, अपनी नहीं।

और तब पर्दा उठता है, तीन बार, तीन भाषाओं में। पहले: वही नीचे है, वही ऊपर, वही पीछे, वही आगे, वही दक्षिण में, वही उत्तर में; वही यह सब कुछ है। फिर आचार्य वही वाक्य अहंकार की भाषा में दुहराते हैं: हम ही नीचे हैं, हम ही ऊपर, हम ही पीछे, हम ही आगे, हम ही दक्षिण में, हम ही उत्तर में, हम ही यह सब कुछ हैं। और फिर, ताकि कोई इसे छोटी हस्ती का दावा समझकर भटक न जाए, वे उसी वाक्य को तीसरी बार आत्मा की भाषा में रखते हैं: आत्मा ही नीचे है, आत्मा ही ऊपर, आत्मा ही पीछे और आगे और दक्षिण और उत्तर में, आत्मा ही यह सब कुछ है।

ऐसा देखने वाले, ऐसा मानने वाले, ऐसा जानने वाले का जो वर्णन आता है, वह इस उपनिषद् के सबसे चमकीले वर्णनों में है। वह आत्मा में ही रमता है, आत्मा में ही खेलता है, आत्मा ही उसका संग है, आत्मा ही उसका आनन्द। वह स्वराट् हो जाता है, अपना राजा आप, और सब लोकों में उसकी इच्छा चलती है। और जो इससे अलग ढंग से जानते हैं, उनका राजा कोई और होता है, उनके लोक घटने-मिटने वाले होते हैं, और किसी लोक में उनकी इच्छा नहीं चलती। परतन्त्रता का इससे साफ़ नाप शायद ही कहीं मिले।

अन्तिम खण्ड में आचार्य सारी सीढ़ी को उलटकर, ऊपर से नीचे, एक साँस में पढ़ जाते हैं। ऐसा देखने वाले के लिए आत्मा से ही प्राण होता है, आत्मा से ही आशा, आत्मा से ही स्मर, आत्मा से ही आकाश, तेज, जल, प्रकट होना और छिप जाना, अन्न, बल, विज्ञान, ध्यान, चित्त, संकल्प, मन, वाणी, नाम, मन्त्र, कर्म, और आत्मा से ही यह सब कुछ। जिन डंडों को नारद एक-एक करके चढ़े थे, वे सब ऊपर पहुँचकर एक ही जड़ से फूटते हुए दिखाई देने लगते हैं।

और तब वह श्लोक आता है जिस पर यह अध्याय अपना सारा वज़न रख देता है: जो देखने वाला है, वह न मृत्यु देखता है, न रोग, न दुख; वह सब देखता है और सब कुछ, हर तरह से पा लेता है। इसके बाद गिनतियों की एक अजब लड़ी चलती है, वह एक होता है, तीन होता है, पाँच, सात, नौ, फिर ग्यारह, फिर एक सौ ग्यारह, और बीस हज़ार। जो एक है, वही अनगिनत रूपों में बहता है, और गिनती उसे घटाती नहीं।

अन्त में मार्ग भी बता दिया गया है, और वह रसोई से शुरू होता है। आहार के शुद्ध होने पर भीतर का सत्त्व शुद्ध होता है, और आगे की पंक्ति कहती है, “सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः”, सत्त्व के शुद्ध होने पर स्मृति अडिग होती है, और स्मृति के हाथ आते ही सारी गाँठें एक साथ खुल जाती हैं। जिसका मैल धुल चुका है, उसी को भगवान् सनत्कुमार अन्धकार का दूसरा किनारा दिखाते हैं। और अन्तिम पंक्ति में उपनिषद् उन्हें एक नया नाम दे देता है, उन्हें स्कन्द कहते हैं, उन्हें स्कन्द कहते हैं। जो शोक में डूबा हुआ आया था, उसे पार लगा देने वाला।

सार: सुख की जड़ खोदने पर भूमा निकलता है, वह असीम जहाँ दूसरा कुछ देखने, सुनने और जानने को नहीं बचता; अल्प मरणधर्मा है, भूमा अमृत। वह किसी और पर नहीं टिका, गाय-घोड़े और खेत-हवेली वाली महिमा उसकी महिमा नहीं। और वही नीचे, ऊपर, आगे, पीछे है, वही आत्मा है, और उसे जानने वाला अपना राजा आप हो जाता है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस अध्याय की सबसे काम की बात शायद वह नहीं है जो सबसे ऊपर लिखी है, बल्कि वह है जो सबसे नीचे। नारद की सूची हमारी अपनी सूचियों से बहुत अलग नहीं है, बस विषय बदल गए हैं। हमारे पास भी नामों का बड़ा संग्रह है, पढ़ी हुई किताबों का, देखे हुए ब्योरों का, याद रखे हुए तर्कों का; और उसी संग्रह के बीच बैठा हुआ वही पुराना काँटा भी है, जिसे नारद ने सीधे-सीधे शोक कहा था। इस अध्याय की पहली सीख यही है कि उस काँटे को छिपाना बन्द कर दीजिए। आचार्य के सामने बैठकर नारद ने पहली बात यही कही थी।

दूसरी सीख उस उतराई में है जो सत्य से सुख तक जाती है। आप जो करना चाहते हैं और कर नहीं पा रहे, उसकी वजह ज़्यादातर ऊपर नहीं होती, नीचे होती है। जानना नहीं हो रहा, तो शायद मनन नहीं हो रहा; मनन नहीं हो रहा, तो शायद भरोसा नहीं बैठा; भरोसा नहीं बैठा, तो शायद कहीं टिककर नहीं बैठे; टिककर नहीं बैठे, तो शायद हाथ से कुछ किया नहीं; और किया नहीं, तो शायद उस काम में कोई सुख ही नहीं मिल रहा। इस सीढ़ी पर एक-एक डंडा नीचे उतरकर देखिए, गड़बड़ किस डंडे पर है, यह अक्सर तीसरे या चौथे पर ही मिल जाती है।

और तीसरी बात, जो सबसे कठिन है। भूमा की परिभाषा में कोई ऊँचा विशेषण नहीं है, केवल एक बात है, कि वहाँ दूसरा कुछ नहीं बचता। जिन क्षणों में हमें सचमुच सुख मिला है, अगर आप उन्हें ध्यान से याद करें, तो वे वही क्षण निकलेंगे जिनमें थोड़ी देर के लिए दूरी मिट गई थी, गाने में, काम में, किसी के साथ में, किसी बच्चे की हँसी में। उपनिषद् इतना ही कहता है कि उस मिट जाने को क्षण भर की बात मत रहने दीजिए, उसकी जड़ तक जाइए। वह जड़ कहीं बाहर नहीं है, और उस तक पहुँचने की पहली शर्त आहार और आचरण की सफ़ाई बताई गई है, जो रसोई और रोज़ के बरताव से शुरू होती है, किसी दूर की तीर्थयात्रा से नहीं।

आधार: छान्दोग्य उपनिषद्, अध्याय 7, खण्ड 1 से 26; मूल पाठ के साथ पढ़ा गया, विवादित स्थलों पर शांकरभाष्य का संकेत।