सीता रसातल में प्रवेश कर गई थीं, और वहाँ उपस्थित सब वानर तथा मुनि “साधु, साध्वी” कहकर श्रीराम की ओर देख रहे थे। पर श्रीराम अपने काठ के दण्ड (यज्ञ में टेक के लिए धारण की जाने वाली लाठी) पर टिके, आँसुओं से व्याकुल नेत्रों और झुके हुए मुख से, मानसिक पीड़ा में डूबे, अत्यन्त दुखी खड़े थे। चिरकाल तक रोकर, बहुत-से आँसू बहाकर, क्रोध और शोक दोनों से भरे श्रीराम ने कहा, “जो शोक मैंने पहले कभी नहीं भोगा, वह आज मेरे मन को छूने को आतुर है; मेरे देखते-देखते सीता मूर्तिमती लक्ष्मी की भाँति अदृश्य हो गईं। हे वसुधे, हे पूज्य देवी, हमें सीता लौटा दीजिए, अन्यथा हम अपना रोष दिखाएँगे, जैसा कि आप हमारे प्रभाव को जानती हैं। आप तो हमारी सासु ही हैं; मैथिली को पहले जनक ने सोने के हल से भूमि जोतते हुए आप ही से निकाला था। इसलिए या तो सीता को लौटाइए, या मुझे भी अपने भीतर समाने का स्थान दीजिए, ताकि मैं पाताल में या स्वर्ग में उनके साथ रहूँ।”
ब्रह्मा का आश्वासन और रामायण के उत्तर भाग का आरम्भ
क्रोध और शोक से भरे श्रीराम ने यहाँ तक कहा कि यदि पृथ्वी ने सीता को वैसी ही न लौटाया जैसी वे थीं, तो वे पर्वतों और वनों सहित समूची धरती को नष्ट कर देंगे और सारी भूमि को जल में डुबो देंगे। इस प्रकार बोलते हुए ककुत्स्थवंशी श्रीराम से ब्रह्मा ने देवताओं के साथ कहा, “हे राम, हे श्रीराम, हे सुव्रत (उत्तम व्रत वाले), संताप मत कीजिए। हे शत्रुओं का नाश करनेवाले, अपने पूर्व स्वरूप और देवताओं को दिए वचन का स्मरण कीजिए। हे महाबाहो, मैं आपको आपका वह अनुपम स्वरूप स्मरण कराने का साहस तो नहीं करता, पर हे दुर्धर्ष, इस मुहूर्त में आप अपने विष्णु-अवतार को स्मरण कीजिए। निर्मल और साध्वी सीता, जो पहले की भाँति आपमें ही अनुरक्त हैं, आप ही के आश्रय से किए गए तप के बल से सुखपूर्वक नागलोक चली गई हैं। हे वीर, स्वर्ग में उनसे आपका पुनः मिलन निश्चय ही होगा। इस सभा के बीच मैं जो कहता हूँ, उसे सुनिए।”
समझने की कुंजी: नागलोक का यहाँ दो अर्थ है, एक तो पाताल का वही लोक जहाँ भूमि-देवी सीता को लौटा ले गईं, और परम अर्थ में विष्णु का धाम। ब्रह्मा यहाँ श्रीराम को स्मरण करा रहे हैं कि उनका मानव-रूप एक लीला है, और सीता-राम का वास्तविक संयोग दिव्य लोक में है।
ब्रह्मा ने आगे कहा, “हे राम, यह रामायण काव्य, जो आपको समर्पित है और जिसे आपने सुना है, सब काव्यों में परम है; यह आपके जन्म से लेकर सुख-दुख के सब अनुभवों का, और जो आगे होगा उसका भी, विस्तार से वर्णन करता है, इसमें संदेह नहीं। यह आदिकाव्य पूर्णतः आप पर ही प्रतिष्ठित है; आपके अतिरिक्त और कोई नहीं जो काव्य का नायक होकर ऐसा यश पाने योग्य हो। मैंने देवताओं के साथ यह सब पहले ही सुना है, दिव्य, अद्भुत और बिना किसी छिपाव के सत्य वचनों से युक्त। हे पुरुषश्रेष्ठ, हे ककुत्स्थ, अब आप धर्म में स्थिर होकर इस काव्य का शेष भाग सुनिए, जो भविष्य की घटनाओं का वर्णन करता है। इस काव्य का यह शेष भाग ‘उत्तरकाण्ड’ नाम से प्रसिद्ध है; हे महातेजस्वी, ऋषियों के साथ इसे सुनिए। हे वीर, यह उत्तम भाग और किसी के सुनने योग्य नहीं; इसे परम ऋषि वाल्मीकि ने रचा है और इसे केवल आप ही को सुनना चाहिए।”

इतना कहकर त्रिभुवन के स्वामी देव ब्रह्मा अपने सब बन्धु-देवताओं के साथ स्वर्ग को चले गए। ब्रह्मलोक के जो महात्मा ऋषि वहाँ थे, वे श्रीराम के भविष्य की कथा सुनने की इच्छा से, ब्रह्मा की अनुमति पाकर वहीं रुक गए। देवदेव ब्रह्मा के शुभ वचन सुनकर परम तेजस्वी श्रीराम ने वाल्मीकि से कहा, “हे भगवन्, मेरे भविष्य से संबंधित जो उत्तरकाण्ड ब्रह्मलोक के ये ऋषि सुनना चाहते हैं, वह कल सुनाया जाए।” ऐसा निश्चय करके, कुश और लव को साथ लेकर, उस जनसमूह को विदा करके श्रीराम अपनी पर्णशाला में लौट आए। सीता का ही शोक करते-करते उनकी वह रात बीत गई।
सार: सीता के रसातल-प्रवेश से शोकाकुल श्रीराम पृथ्वी पर कुपित हुए, पर ब्रह्मा ने उन्हें उनका विष्णु-स्वरूप स्मरण कराकर स्वर्ग में सीता से पुनर्मिलन का आश्वासन दिया और रामायण के उत्तरकाण्ड को सुनने का प्रस्ताव रखा।
श्रीराम का दीर्घ धर्ममय राज्य और माताओं-स्वजनों का परलोक-गमन
रात बीतने और प्रभात होने पर श्रीराम ने सब महामुनियों को बुलाकर अपने दोनों पुत्रों कुश और लव से कहा, “निःशंक होकर गाओ।” तब महर्षियों और महात्माओं के आसन ग्रहण करने पर उन दोनों ने भविष्य की घटनाओं वाला यह उत्तरकाण्ड काव्य गाया। सत्य के प्रभाव से सीता के भूतल में प्रवेश कर जाने पर श्रीराम यज्ञ की समाप्ति पर अत्यन्त खिन्न थे और इस जगत को शून्य-सा अनुभव करते थे। वैदेही को न देख पाने से और शोक से अत्यन्त पीड़ित होकर उन्हें मन में शान्ति न मिलती थी। सब राजाओं, रीछों, वानरों, राक्षसों और प्रमुख ब्राह्मणों के समूह को विधिपूर्वक यज्ञ समाप्त करके धन-दान देकर विदा करने के पश्चात, कमलनयन श्रीराम सीता को हृदय में धारण किए अपने दोनों पुत्रों के साथ अयोध्या में प्रवेश कर गए।

उन रघुनन्दन ने सीता के अतिरिक्त और कोई पत्नी कभी नहीं ली; प्रत्येक अश्वमेध यज्ञ में जानकी की सोने की प्रतिमा ही पटरानी के रूप में रखी जाती। श्रीराम ने दस हजार वर्षों तक अश्वमेध यज्ञ किए, और उससे दसगुने वाजपेय यज्ञ, जिनमें प्रचुर स्वर्ण-दान होता था। उन श्रीमान ने अग्निष्टोम, अतिरात्र, गोसव और बहुत धन-दान वाले अन्य अनेक यज्ञ भी किए। इस प्रकार राज्य पर स्थित और धर्म में संलग्न उन महात्मा रघुनन्दन का बहुत बड़ा समय बीतता गया। रीछ, वानर और राक्षस श्रीराम की आज्ञा में स्थिर रहते, और राजा प्रतिदिन उन्हें भेंट देकर अनुरक्त रहते। बादल समय पर बरसते, अच्छी फसल होती, दिशाएँ निर्मल रहतीं, और नगर तथा जनपद हृष्ट-पुष्ट लोगों से भरे रहते। श्रीराम के राज्य में कोई असमय नहीं मरता, प्राणियों को कोई व्याधि नहीं होती, और न कोई अनर्थ ही घटता था।
समझने की कुंजी: वाजपेय (एक प्रकार का सोमयाग जिसमें राजसूय-तुल्य ऐश्वर्य प्रकट होता है), अग्निष्टोम (पाँच दिन का सोमयाग), अतिरात्र (पूरी रात चलने वाला सोमयाग), और गोसव (जिसमें राजा एक वर्ष व्रत-नियम धारण करता है), ये सब प्राचीन श्रौत-यज्ञ हैं, जिनका विधान वेदों में है।

दीर्घ समय बीतने पर श्रीराम की यशस्विनी माता कौसल्या अपने पुत्र और पौत्रों से घिरी कालधर्म को प्राप्त हुईं। सुमित्रा और यशस्विनी कैकेयी भी अनेक प्रकार के धर्मकार्य करके उनके पीछे-पीछे त्रिदिव (स्वर्ग) में स्थित हुईं। वे सब महाभागा प्रसन्न होकर स्वर्ग में राजा दशरथ से मिलीं और सब धर्मों का फल पाया। श्रीराम अपनी माताओं के निमित्त समय-समय पर बिना किसी भेदभाव के तपस्वी ब्राह्मणों को महादान देते। धर्मात्मा श्रीराम ने पितरों को प्रिय वस्तुएँ और ब्रह्म-रत्न दान किए तथा परम दुष्कर यज्ञ किए, जिससे पितरों और देवताओं का गौरव बढ़े। इस प्रकार नाना यज्ञों से धर्म को बढ़ाते हुए श्रीराम के बहुत हजार वर्ष सुखपूर्वक बीत गए।
सार: सीता-वियोग में भी श्रीराम ने सीता की स्वर्ण-प्रतिमा को पटरानी मानकर सहस्रों यज्ञ किए और धर्ममय राज्य चलाया; समय आने पर कौसल्या, सुमित्रा और कैकेयी स्वर्ग में दशरथ से जा मिलीं।
गार्ग्य का आगमन और भरत का गन्धर्व-देश पर अभियान

कुछ समय बीतने पर केकय के राजा युधाजित ने अपने गुरु, अंगिरा के पुत्र, अमित प्रभावशाली ब्रह्मर्षि गार्ग्य को महात्मा श्रीराम के पास भेजा। राजा ने प्रीति के उपहार-स्वरूप दस हजार उत्तम घोड़े, कम्बल, रत्न, चित्र-विचित्र उत्तम वस्त्र और शुभ आभूषण श्रीराम के लिए भेजे। महर्षि गार्ग्य का आना और मामा अश्वपति के भेजे उस महान धन का समाचार सुनकर श्रीराम अपने भाइयों के साथ एक कोस आगे जाकर उनकी अगवानी करने गए, और जैसे इन्द्र बृहस्पति का सम्मान करते हैं वैसे ही उन्होंने गार्ग्य का सत्कार किया। उस ऋषि का पूजन करके, वह धन ग्रहण करके, और मामा का प्रत्येक प्रकार से कुशल पूछकर, बैठे हुए उन महाभाग से श्रीराम ने पूछना आरम्भ किया, “हे भगवन्, वाणी जानने वालों में श्रेष्ठ, साक्षात बृहस्पति-से आप यहाँ किस प्रयोजन से पधारे? मामा ने क्या वचन कहा है?”
श्रीराम का कथन सुनकर महर्षि ने अद्भुत-से प्रतीत होने वाले उस कार्य का विस्तार से वर्णन करना आरम्भ किया, “हे महाबाहो, हे नरश्रेष्ठ, आपके मामा युधाजित ने प्रीतिपूर्वक कहा है, यदि रुचे तो सुनिए। सिन्धु नदी के दोनों ओर फल-मूल से शोभित गन्धर्वों का देश है, जो परम सुन्दर प्रदेश है। उसकी रक्षा युद्ध में निपुण, शस्त्रधारी, महाबली शैलूष के तीन करोड़ पुत्र गन्धर्व करते हैं। हे वीर, हे ककुत्स्थ, उन्हें जीतकर गन्धर्वों के उस शुभ नगर को अपने राज्य में मिला लीजिए, जो और किसी से नहीं हो सकता। हे महाबाहो, यह आपको रुचे; मैं आपके अहित में यह नहीं कहता।” ऋषि और मामा दोनों के वचन सुनकर श्रीराम प्रसन्न हुए और “ऐसा ही हो” कहकर भरत की ओर देखा।

श्रीराम ने हाथ जोड़कर विनयपूर्वक उस द्विज से कहा, “हे ब्राह्मणों में ऋषि, भरत के ये दो वीर पुत्र, तक्ष और पुष्कल, मेरे मामा से सुरक्षित और धर्म का पालन करते हुए उस प्रदेश में जाएँगे। भरत को आगे करके, अपनी सेना और अनुचरों के साथ ये दोनों कुमार गन्धर्वराज शैलूष के पुत्रों को मारकर दोनों प्रदेश आपस में बाँट लेंगे। वहाँ दो नगर बसाकर, अपने दोनों पुत्रों को स्थापित करके, यह परम धार्मिक भरत फिर मेरे पास लौट आएगा।” ब्रह्मर्षि से ऐसा कहकर श्रीराम ने सेना और अनुचरों सहित भरत को प्रस्थान की आज्ञा दी और शुभ नक्षत्र में दोनों कुमारों का अभिषेक किया। अंगिरापुत्र गार्ग्य को आगे करके भरत सेना और दोनों कुमारों के साथ चल पड़े। वह दुर्जय सेना इन्द्र की सेना-सी अयोध्या से निकली, और श्रीराम बहुत दूर तक उसके पीछे-पीछे गए। रुधिर के प्यासे मांसभक्षी राक्षस, भयंकर भूत-समूह, और सिंह, व्याघ्र, वराह तथा आकाशचारी पक्षी सहस्रों की संख्या में गन्धर्वपुत्रों का मांस खाने की इच्छा से सेना के आगे-आगे चले। डेढ़ मास मार्ग में बिताकर वह निरोग, सुखी सेना केकय-देश पहुँची।
समझने की कुंजी: सिन्धु नदी के दोनों ओर का यह गन्धर्व-देश आधुनिक उत्तर-पश्चिमी प्रदेश (गांधार, अर्थात आज के पाकिस्तान-अफ़गानिस्तान की सीमा का क्षेत्र) के समतुल्य माना जाता है; तीन करोड़ की संख्या यहाँ विशाल सेना के लिए अतिशयोक्ति है।
सार: मामा युधाजित के परामर्श और गार्ग्य के संदेश पर श्रीराम ने भरत को, उनके पुत्रों तक्ष व पुष्कल के साथ, सिन्धु-तटवर्ती गन्धर्व-देश पर विजय के लिए भेजा।
गन्धर्वों का संहार और तक्षशिला-पुष्कलावत की स्थापना
सेनापति भरत के आगमन का समाचार सुनकर केकयराज युधाजित गार्ग्य के साथ अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे बड़े जनसमूह के साथ निकलकर भरत के साथ शीघ्र ही कामरूपी गन्धर्वों की राजधानी पहुँच गए। भरत और युधाजित द्रुतगामी वीरों के साथ सेना और अनुचरों सहित गन्धर्व-नगर जा पहुँचे। भरत का आना सुनकर महापराक्रमी गन्धर्व युद्ध की इच्छा से निकल पड़े और चारों ओर सिंहनाद करने लगे। तब सात रात तक रोमांचकारी, अत्यन्त भीषण और तुमुल युद्ध चला, और दोनों में से किसी की जय न हुई। तलवारों, शक्तियों और धनुषों रूपी मगरों वाली, मनुष्यों के शवों को बहाती हुई रक्त की नदियाँ चारों ओर बह निकलीं।

तब श्रीराम के अनुज भरत ने क्रुद्ध होकर गन्धर्वों पर काल का संवर्त नामक अत्यन्त भयंकर अस्त्र छोड़ा। उस महाबली संवर्त से मारे जाकर वे तीनों करोड़ गन्धर्व मानो कालपाश में बँधे हों, ऐसे क्षण भर में विदीर्ण हो गए। निमेषमात्र में उन महात्मा गन्धर्वों का ऐसा घोर संहार देखकर देवताओं को भी वैसा युद्ध स्मरण न आया। उन सबके मारे जाने पर कैकेयीपुत्र भरत ने वहाँ दो समृद्ध श्रेष्ठ नगर बसाए, गन्धर्वदेश में तक्ष को तक्षशिला पर और गांधार-प्रदेश में पुष्कल को पुष्कलावत पर स्थापित किया। धन-रत्नों से भरे, उद्यानों और वनों से शोभित, स्पर्धा से एक-दूसरे से बढ़कर सुन्दर, सुनियोजित बाज़ारों, श्रेष्ठ भवनों, सुन्दर विमानों (बहुमंजिले प्रासादों), देवालयों और ताल, तमाल, तिलक तथा बकुल वृक्षों से सुसज्जित, वे दोनों रमणीय नगर स्वर्ग की दिव्य नगरी-से प्रतीत होते थे। उन्हें पाँच वर्ष में भलीभाँति बसाकर महाबाहु रघुनन्दन कैकेयीपुत्र भरत फिर अयोध्या लौट आए।
श्रीमान भरत ने साक्षात दूसरे धर्म-से महात्मा रघुनन्दन को, जैसे इन्द्र ब्रह्मा को प्रणाम करते हैं, वैसे प्रणाम किया, और गन्धर्वों के साथ हुए उस उत्तम महायुद्ध तथा दोनों नगरों की स्थापना का यथावत वर्णन किया। यह सुनकर रघुनन्दन श्रीराम अत्यन्त प्रसन्न हुए।
सार: सात रात के घोर युद्ध के बाद भरत ने काल का संवर्त-अस्त्र छोड़कर तीनों करोड़ गन्धर्वों का संहार किया, फिर तक्ष को तक्षशिला और पुष्कल को पुष्कलावत पर बिठाकर अयोध्या लौट आए।
अंगद और चन्द्रकेतु का अभिषेक
भरत का यह वृत्तान्त सुनकर श्रीराम भाइयों सहित प्रसन्न हुए और लक्ष्मण से अद्भुत-से वचन कहे, “हे सुमित्रानन्दन, आपके ये दोनों पुत्र, अंगद और चन्द्रकेतु, धर्म के ज्ञाता और दृढ़ पराक्रमी हैं; इन्हें अपने-अपने राज्य की रक्षा के योग्य जानकर मैं इनका राज्याभिषेक करूँगा। ऐसा रमणीय और बाधारहित प्रदेश खोजा जाए जहाँ ये दोनों धनुर्धर सुखपूर्वक रहें। हे सौम्य, ऐसा देश ढूँढ़िए जहाँ राजाओं को पीड़ा न हो और आश्रमों का विनाश न हो, ताकि हम आगे किसी अपराध के भागी न बनें।” श्रीराम के ऐसा कहने पर भरत ने उत्तर दिया, “यह कारुपथ नामक प्रदेश रमणीय और सब रोगों से रहित है; वहाँ महात्मा अंगद के लिए नगर बसाया जाए, और महात्मा चन्द्रकेतु के लिए सुन्दर, शोकरहित चन्द्रकान्त नामक प्रदेश।”

भरत का यह वचन श्रीराम ने स्वीकार किया और कारुपथ प्रदेश को अपने अधीन करके वहाँ अंगद के लिए नगर बसाया। श्रीराम का दिया हुआ वह नगर ‘अंगदीया’ अत्यन्त रमणीय और सब ओर से सुरक्षित था। मल्ल-योद्धा चन्द्रकेतु के लिए मल्लभूमि में चन्द्रकान्ता नाम से प्रसिद्ध, स्वर्ग की दिव्य नगरी-सी पुरी बसाई गई। तब अजेय श्रीराम, लक्ष्मण और भरत ने परम प्रसन्न होकर अंगद और चन्द्रकेतु का अभिषेक किया। दोनों कुमारों का अभिषेक करके और दृढ़चित्त उन्हें प्रस्थान कराके वे प्रसन्न हुए, अंगद को पश्चिम-भूमि की ओर और चन्द्रकेतु को उत्तर की ओर भेजा। सुमित्रापुत्र लक्ष्मण आप अंगद के पीछे गए, और चन्द्रकेतु के पार्ष्णिग्राह (पीछे से रक्षा करनेवाले संरक्षक) भरत बने।
अंगद की पुरी में एक पूरा वर्ष रहकर, अपने दुर्जय पुत्र को भलीभाँति स्थापित करके लक्ष्मण फिर अयोध्या लौट आए। भरत भी इसी प्रकार वर्ष-भर से अधिक रहकर अयोध्या लौटकर श्रीराम के चरणों की सेवा करने लगे। सुमित्रापुत्र लक्ष्मण और भरत, दोनों परम धार्मिक, श्रीराम के चरणों में अनुरक्त, उनके गहरे स्नेह के कारण बीतते समय का भी ज्ञान न रख पाते थे। इस प्रकार नगरवासियों के कार्यों में निरन्तर लगे और सदा धर्म का पालन करते हुए उन तीनों के दस हजार वर्ष बीत गए। समस्त मनोरथ पूर्ण हो जाने पर, श्री से युक्त, धर्मपुरी में स्थित वे तीनों भाई भलीभाँति डाली गई आहुतियों से प्रदीप्त तीन यज्ञ-अग्नियों के समान तेज से दीप्त होते रहे।
सार: श्रीराम ने लक्ष्मण के पुत्रों अंगद और चन्द्रकेतु को कारुपथ और मल्लभूमि के राज्यों पर अभिषिक्त किया; इसके बाद भी श्रीराम, भरत और लक्ष्मण के दस हजार वर्ष धर्म-सेवा में बीते।
काल का तपस्वी-वेश में दूत बनकर आना

कुछ समय बीतने पर, जब श्रीराम धर्मपरायण रहकर राज्य कर रहे थे, काल तपस्वी का रूप धरकर राजद्वार पर आया। उसने द्वार पर खड़े धैर्यवान और यशस्वी लक्ष्मण से कहा, “मैं एक बड़े प्रयोजन से आया हूँ, आप मेरे आगमन की सूचना श्रीराम को दीजिए। हे महाबल, मैं महातेजस्वी महर्षि अतिबल का दूत हूँ और किसी कार्यवश श्रीराम का दर्शन करने आया हूँ।” यह सुनकर सुमित्रापुत्र ने तुरन्त उस तपस्वी के आगमन की सूचना श्रीराम को दी। तपस्या से सूर्य-सा तेजस्वी वह दूत, अपने तेज से जलता-सा और मानो किरणों से सबको झुलसाता हुआ, श्रीराम के पास आया और मधुर वाणी में बोला, “आपका कल्याण हो।” महातेजस्वी श्रीराम ने अर्घ्य आदि से उसकी पूजा करके उसका कुशल पूछा, और वह दिव्य सुवर्ण-आसन पर बैठ गया। श्रीराम ने कहा, “हे महामते, आपका स्वागत है। जिसके दूत बनकर आप आए हैं, उसका संदेश कहिए।”
राजसिंह श्रीराम के प्रेरित करने पर उस मुनि ने कहा, “मेरा यह संदेश केवल हम दोनों के बीच एकान्त में कहा जाना चाहिए, यदि आप लोकहित का ध्यान रखते हैं। हे राजन्, यदि मुनिमुख्य के वचन का आदर करते हैं, तो जो भी हमारी बात सुने या हमें देखे, वह आपके द्वारा वध्य हो जाए।” “ऐसा ही हो” प्रतिज्ञा करके श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा, “हे महाबाहो, द्वार पर खड़े रहिए और द्वारपाल को विदा कर दीजिए। हे सौम्य, जो हम दोनों के बीच का यह वचन देखे या सुने, वह निश्चय ही मेरे लिए वध्य होगा।” इस प्रकार लक्ष्मण को द्वार पर नियुक्त करके श्रीराम ने उस मुनि से कहा, “हे मुने, आप निःशंक होकर कहिए कि जिसने आपको भेजा है उसकी क्या इच्छा है; मैं उसे सुनने को उत्सुक हूँ।”
सार: काल ने ‘अतिबल का दूत’ बनकर श्रीराम से एकान्त-वार्ता माँगी और यह शर्त रखी कि जो भी उनकी बात सुने या देखे वह वध्य हो; श्रीराम ने यह प्रतिज्ञा करके लक्ष्मण को द्वार पर पहरे पर बिठा दिया।
काल का ब्रह्मा का संदेश सुनाना
तब काल ने कहा, “हे महासत्त्व राजन्, सुनिए कि मैं किस प्रयोजन से आया हूँ; हे महाबल, मुझे देव पितामह ब्रह्मा ने भेजा है। हे परपुरंजय, हे वीर, सृष्टि के आदि में मैं आपकी माया से उत्पन्न, सबका संहार करनेवाला काल, आपका ही पुत्र था। उस सनातन अव्यक्त भाव से ही आप उत्पन्न हुए। हमारे स्वामी, लोकपति, भगवान ब्रह्मा ने कहलाया है, ‘हे सौम्य, आपने पहले लोकों की रक्षा का जो वचन दिया था, वह पूर्ण हो गया। सृष्टि से पहले अपनी माया से सब लोकों को अपने में समेटकर, महासमुद्र के जल में शयन करते हुए आपने पहले मुझे (ब्रह्मा को) उत्पन्न किया। फिर अपनी माया से जल पर शयन करनेवाले अनन्त नाग को रचकर आपने मधु और कैटभ नामक दो बलशाली प्राणियों को उत्पन्न किया, जिनकी अस्थियों के ढेर से ढकी हुई यह पर्वतों से युक्त मेदिनी बनी।
समझने की कुंजी: ‘मेदिनी’ पृथ्वी का एक नाम है। पुराण-परम्परा के अनुसार मधु और कैटभ की मेदा (चर्बी) तथा अस्थियों से पृथ्वी का तल बना, इसी से उसका यह नाम पड़ा। यह वही विष्णु-माहात्म्य है जिसकी ओर ब्रह्मा यहाँ संकेत कर रहे हैं।
ब्रह्मा ने आगे कहलाया, “अपनी नाभि से सूर्य-सा प्रकाशमान दिव्य कमल उत्पन्न करके, और उसमें से मुझे उत्पन्न करके, आपने प्रजापति का सारा कार्य मुझ पर रख दिया। उस भार को आपको सौंपकर, हे जगत्पति, मैं आपकी ही उपासना करता हूँ; आप ही मुझे तेज देनेवाले हैं, इसलिए आप प्राणियों की रक्षा कीजिए। उस सनातन भाव से ही आप दुर्धर्ष हैं। प्राणियों की रक्षा के लिए ही आपने विष्णुत्व ग्रहण किया। अदिति से वीर्यवान वामन-पुत्र के रूप में जन्म लेकर आपने अवसर आने पर अपने भाई देवताओं का बल बढ़ाया और उनकी सहायता की। हे संसार में श्रेष्ठ, जब मनुष्य रावण से पीड़ित हो रहे थे, तब रावण-वध की इच्छा से आपने मनुष्यों में मन लगाया, और स्वयं ही ग्यारह हजार वर्ष का अपना मानव-निवास नियत किया।
समझने की कुंजी: ‘दस हजार और दस सौ वर्ष’ अर्थात ग्यारह हजार वर्ष। वाल्मीकि-रामायण में श्रीराम का राज्यकाल इसी विशाल अवधि का बताया गया है, जो उनके दिव्य अवतार-रूप का सूचक है, न कि किसी सामान्य मानव-आयु का।

“हे नरश्रेष्ठ, इस प्रकार आप दशरथ के मनोमय पुत्र हुए। मनुष्य-रूप में आपका रहना अब पूर्ण हो चुका है; अब आपके हमारे पास लौटने का समय आ गया है। यदि, हे महाराज, आप फिर से प्रजा की सेवा करना चाहें, तो हे वीर, इच्छा हो तो रहिए, आपका कल्याण हो; और यदि, हे राघव, आपकी इच्छा सुरलोक को जाने की हो, तो देवता विष्णु को अपना स्वामी पाकर सनाथ हो जाएँ।” यह ब्रह्मा का कथन है।” काल के मुख से ब्रह्मा का यह वचन सुनकर श्रीराम सबका संहार करनेवाले उस काल से हँसते हुए बोले, “हे काल, देवदेव ब्रह्मा का यह परम अद्भुत वचन सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। तीनों लोकों के कार्य के लिए ही मेरा मानव-जन्म हुआ है; आपका कल्याण हो, मैं वहीं जाऊँगा जहाँ से आया हूँ। आप जैसा मेरे हृदय की इच्छा थी वैसे ही आ गए, इसमें मुझे कुछ सोचना नहीं। जैसा ब्रह्मा ने कहा है, सबके संहार के समय तक मुझे देवताओं के सब कार्य करते हुए स्थित रहना है।”
सार: काल ने ब्रह्मा का संदेश सुनाया कि श्रीराम वस्तुतः विष्णु हैं, उनका ग्यारह हजार वर्ष का मानव-निवास पूर्ण हो चुका है, और अब लौटने का समय है; श्रीराम ने हँसते हुए सहर्ष स्वीकार किया।
दुर्वासा का आगमन और लक्ष्मण की प्रतिज्ञा-संकट

श्रीराम और काल जब इस प्रकार वार्ता कर रहे थे, तभी भगवान ऋषि दुर्वासा श्रीराम का दर्शन करने की इच्छा से राजद्वार पर आ पहुँचे। उन ऋषिसत्तम ने सुमित्रापुत्र लक्ष्मण से कहा, “मुझे शीघ्र श्रीराम का दर्शन कराइए, इससे पहले कि मेरा प्रयोजन निष्फल हो जाए।” मुनि का कथन सुनकर शत्रुहन्ता लक्ष्मण ने महात्मा का अभिवादन करके कहा, “हे भगवन्, आपके लिए क्या करना है, क्या प्रयोजन है? मैं क्या करूँ? इस समय श्रीराम व्यग्र हैं, हे ब्राह्मण, एक मुहूर्त प्रतीक्षा कीजिए।” यह सुनकर ऋषिश्रेष्ठ दुर्वासा क्रोध से कलुषित हो उठे और मानो नेत्रों से सबको भस्म करते हुए लक्ष्मण से बोले, “हे सुमित्रापुत्र, इसी क्षण मेरे विषय में श्रीराम से निवेदन कीजिए। यदि इसी क्षण आपने ऐसा न किया, तो मैं इस नगर, आपको, इस प्रदेश, भरत, श्रीराम और आपके वंश को शाप दे दूँगा; मैं अपने हृदय में इस क्रोध को और धारण नहीं कर सकता।”
उन महात्मा के घोर-से वचन सुनकर लक्ष्मण ने मन में उस कथन का परिणाम विचारा, और निश्चय किया, “एक मेरी ही मृत्यु हो जाए, पर सबका विनाश न हो।” ऐसा बुद्धि से निश्चय करके उन्होंने दुर्वासा के आगमन की सूचना श्रीराम को दे दी। लक्ष्मण का वचन सुनकर श्रीराम काल को विदा करके तुरन्त बाहर निकले और उन्होंने अत्रि-पुत्र दुर्वासा को देखा। तेज से जलते-से उन महात्मा का अभिवादन करके श्रीराम ने हाथ जोड़कर पूछा, “क्या करना है?” श्रीराम के वचन सुनकर मुनिवर दुर्वासा ने उत्तर दिया, “हे धर्मवत्सल, सुनिए, आज मेरे एक हजार वर्ष के उपवास-व्रत की समाप्ति हुई है; इसलिए, हे अनघ, मैं आपके यहाँ जो भी सिद्ध (पका हुआ) भोजन हो, वह चाहता हूँ।” यह सुनकर राजा श्रीराम ने प्रसन्न मन से उन मुनिमुख्य को जो भोजन तैयार था, वह अर्पित किया। मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा अमृत-सा वह भोजन खाकर, “साधु राम” कहकर अपने आश्रम को लौट गए।
उन मुनिवर के अपने आश्रम चले जाने पर श्रीराम काल के वचनों का स्मरण करके दुखी हो उठे। उस घोर परिणाम का स्मरण करके वे शोक से अत्यन्त संतप्त हो गए; नीचा मुख किए, दीन हृदय से वे एक शब्द भी न बोल सके। फिर बुद्धि से काल के वचनों पर विचार करके, “अब इससे बचने का कोई उपाय नहीं” यह निश्चय करके महायशस्वी श्रीराम मौन हो गए।
सार: दुर्वासा के शाप-भय और ‘सबका विनाश न हो’ की भावना से लक्ष्मण ने स्वयं वध्य होना स्वीकार करके श्रीराम की एकान्त-वार्ता भंग की; श्रीराम काल के वचनों का स्मरण करके मौन और संतप्त हो गए।
लक्ष्मण का त्याग और सशरीर स्वर्गारोहण

राहु से ग्रसे चन्द्रमा-से नीचे मुख किए और शोकग्रस्त श्रीराम को देखकर लक्ष्मण ने प्रसन्नता से मधुर वचन कहे, “हे महाबाहो, मेरे लिए संताप मत कीजिए; पूर्वकृत कर्मों से बँधी काल की गति ऐसी ही है। हे सौम्य, निःशंक होकर मुझे मार दीजिए और अपनी प्रतिज्ञा का पालन कीजिए; हे ककुत्स्थ, जो मनुष्य अपनी प्रतिज्ञा भंग करते हैं वे नरक जाते हैं। हे महाराज राघव, यदि आपकी मुझ पर प्रीति है और मैं आपके अनुग्रह का पात्र हूँ, तो निःसंकोच मुझे मारकर धर्म की वृद्धि कीजिए।” लक्ष्मण के ऐसा कहने पर विचलित-इन्द्रिय श्रीराम ने मन्त्रियों और पुरोहित को बुलाकर उनके बीच सारी घटना, दुर्वासा का आगमन और तपस्वी की शर्त के अनुसार की हुई प्रतिज्ञा, कह सुनाई।
यह धर्म-अर्थ से युक्त वचन सुनकर सब मन्त्री और उपाध्याय चुप रह गए। तब महातेजस्वी वसिष्ठ ने कहा, “हे महायशस्वी श्रीराम, यह आपका वियोग-काल और लक्ष्मण से बिछोह मैंने पहले ही रोमांचकारी रूप में देख लिया था। हे महाबाहो, इन्हें त्याग दीजिए; काल अत्यन्त बलवान है, अपनी प्रतिज्ञा व्यर्थ मत कीजिए। प्रतिज्ञा भंग होने पर धर्म नष्ट हो जाता है, और धर्म के नष्ट होने पर देवर्षियों सहित यह सम्पूर्ण चराचर त्रैलोक्य निःसंदेह विनष्ट हो जाएगा। इसलिए, हे पुरुषश्रेष्ठ, त्रैलोक्य की रक्षा के लिए, आज लक्ष्मण के बिना भी आप इस जगत को स्वस्थ कीजिए।” धर्मार्थ से युक्त उन सबका यह वचन सुनकर श्रीराम ने उस सभा के बीच लक्ष्मण से कहा, “हे सुमित्रापुत्र, धर्म का विपर्यय न हो, इसलिए मैं आपका त्याग करता हूँ; त्याग और वध, सज्जनों के लिए दोनों समान ही हैं।” श्रीराम के ऐसा कहने पर आँसुओं से व्याकुल लक्ष्मण शीघ्र बाहर चले गए और अपने घर न लौटे।

सरयू के तट पर पहुँचकर, आचमन करके, हाथ जोड़कर, सब इन्द्रियों को रोककर, श्वास को भी थामे हुए वे प्राणायाम-योग में स्थित हो गए। श्वास रोके इन्द्रिय-निग्रह के उस योग में लगे लक्ष्मण पर इन्द्रसहित देवताओं और अप्सरा-समूहों ने तथा सब ऋषियों ने पुष्प बरसाए। मनुष्यों को अदृश्य, सशरीर महाबली लक्ष्मण को इन्द्र ने जीवित ही पकड़कर स्वर्ग में प्रवेश किया। तब विष्णु के चौथे भाग को स्वर्ग लौटा आया देखकर सब श्रेष्ठ देवता हर्षित और प्रमुदित होकर रघुनन्दन लक्ष्मण की पूजा करने लगे।
समझने की कुंजी: लक्ष्मण को ‘विष्णु का चौथा भाग’ कहा गया है, क्योंकि परम्परा के अनुसार दशरथ के चारों पुत्र विष्णु के अंश से उत्पन्न थे; इसी से लक्ष्मण का सशरीर लौटना देवताओं के लिए हर्ष का विषय बना।
सार: प्रतिज्ञा और त्रैलोक्य की रक्षा के लिए, वसिष्ठ के परामर्श पर, श्रीराम ने लक्ष्मण का त्याग किया; लक्ष्मण ने सरयू-तट पर प्राणायाम-योग में स्थित होकर सशरीर स्वर्गारोहण किया।
भरत का राज्य अस्वीकार और कुश-लव का अभिषेक
लक्ष्मण को विदा करके दुख और शोक से भरे श्रीराम ने पुरोहितों, मन्त्रियों और नागरिकों से कहा, “अभिषेक की सब सामग्री बिना विलम्ब लाई जाए; आज ही मैं उसी मार्ग पर चलूँगा जिस पर लक्ष्मण गए हैं। धर्मवत्सल वीर भरत को आज ही अयोध्या के अधिपति के रूप में राज्य पर अभिषिक्त करके मैं वन को जाऊँगा।” रघुनन्दन का यह वचन सुनकर सब प्रजा पृथ्वी पर मस्तक झुकाए मानो प्राणहीन हो गई। भरत भी यह सुनकर मूर्छित-से हो गए और राज्य की निन्दा करते हुए बोले, “हे राजन्, मैं सत्य और स्वर्ग के सुख की शपथ खाकर कहता हूँ, हे रघुनन्दन, आपके बिना मैं राज्य नहीं चाहता। हे राजन्, इन कुश और लव का अभिषेक कीजिए, कोसल में वीर कुश का और उत्तर कोसल में लव का। शत्रुघ्न के पास भी द्रुतगामी दूत जाएँ और हमारे प्रस्थान का समाचार शीघ्र दें, विलम्ब न हो।”
भरत का वचन सुनकर और नागरिकों को नीचा मुख किए, दुख से संतप्त देखकर वसिष्ठ ने कहा, “हे वत्स राम, इन प्रजाजनों को धरती पर पड़े देखिए; इनकी इच्छा जानकर ही कार्य कीजिए, इनका अप्रिय मत कीजिए।” वसिष्ठ के वचन से श्रीराम ने प्रजाजनों को उठाकर सब से पूछा, “मैं क्या करूँ?” तब सब प्रजा ने कहा, “हे राम, आप जहाँ जाएँगे, हम भी आपके पीछे चलेंगे। यदि आपकी नागरिकों पर प्रीति और अनुपम स्नेह है, तो हे ककुत्स्थ, हम पुत्र-स्त्री-सहित आपके साथ ही उस सत्पथ (स्वर्ग के मार्ग) पर चलें। हे ईश्वर, हमें तपोवन, दुर्गम भूमि, नदी या समुद्र, जहाँ भी ले चलिए, बस हमें मत त्यागिए। आपके अनुगमन में ही हमारा परम प्रेम और परम वर है; यही हमारी परम इच्छा है।”

नागरिकों की यह दृढ़ भक्ति देखकर श्रीराम ने “बहुत अच्छा” कहा। उसी दिन अपने पार्थिव-जीवन का अन्त देखकर रघुनन्दन ने दोनों महात्मा पुत्रों, कोसल में कुश और उत्तर कोसल में लव, का अभिषेक किया। दोनों अभिषिक्त पुत्रों को गोद में बिठाकर, गले लगाकर, बारम्बार उनके मस्तक सूँघकर, उन्होंने प्रत्येक को एक हजार रथ, दस हजार हाथी और एक लाख घोड़े दिए। बहुत रत्न, बहुत धन और हृष्ट-पुष्ट जनों से युक्त उन दोनों भाइयों कुश और लव को श्रीराम ने उनके अपने-अपने नगरों में भेज दिया। दोनों वीरों का अभिषेक करके और अपने नगरों में प्रस्थान कराके, श्रीराम ने महात्मा शत्रुघ्न के पास दूत भेजे।
सार: भरत ने श्रीराम के बिना राज्य अस्वीकार कर दिया और कुश-लव के अभिषेक का सुझाव दिया; प्रजा ने भी श्रीराम के साथ ही चलने का संकल्प लिया, और श्रीराम ने कुश व लव को दक्षिण व उत्तर कोसल पर अभिषिक्त किया।
शत्रुघ्न का आगमन और वानर-राक्षसों का साथ चलना
श्रीराम के वचन से प्रेरित द्रुतगामी दूत बिना मार्ग में रुके शीघ्र मधुरा पहुँच गए। तीन दिन-रात में मधुरा पहुँचकर उन्होंने शत्रुघ्न को सब कुछ यथावत सुनाया, लक्ष्मण का त्याग, श्रीराम का संकल्प, दोनों पुत्रों का अभिषेक और नागरिकों का साथ जाना। कुश की वह रमणीय नगरी विन्ध्य पर्वत की तलहटी में थी, जिसे बुद्धिमान श्रीराम ने ‘कुशावती’ नाम दिया था, और लव की रमणीय नगरी ‘श्रावस्ती’ प्रसिद्ध हुई। इस प्रकार अयोध्या को निर्जन करके रघुनन्दन श्रीराम और महारथी भरत स्वर्ग जाने को तैयार हो गए हैं, यह सब महात्मा शत्रुघ्न को शीघ्र निवेदित करके दूत रुक गए और बोले, “हे राजन्, शीघ्रता कीजिए।” अपने कुल के अन्त का यह घोर-सा समाचार सुनकर शत्रुघ्न ने सब प्रजा और पुरोहित कांचन को बुलाकर उन्हें सारी घटना और अपनी तथा भाइयों की आसन्न मृत्यु कह सुनाई।

तब वीर शत्रुघ्न ने अपने दोनों पुत्रों का अभिषेक किया, सुबाहु को मधुरा और शत्रुघाती को विदिश मिली। मधुरा की सेना को दो भागों में बाँटकर और दोनों पुत्रों को धन से युक्त करके राजा शत्रुघ्न ने उन्हें वहाँ स्थापित किया। सुबाहु को मधुरा में और शत्रुघाती को विदिश में बिठाकर रघुनन्दन शत्रुघ्न अकेले एक ही रथ से अयोध्या आए। श्रीराम को साक्षात अग्नि-सा प्रदीप्त, बारीक रेशमी वस्त्र धारण किए, अक्षय मुनियों के साथ बैठे देखा। धर्म का विचार करते हुए शत्रुघ्न ने श्रीराम को प्रणाम करके हाथ जोड़कर निवेदन किया, “हे रघुनन्दन, अपने दोनों पुत्रों का अभिषेक करके मैं आपके अनुगमन का निश्चय करके आया हूँ; मुझे ऐसा ही जानिए। हे वीर, इसके आगे कुछ कहना नहीं चाहिए, न कोई आदेश सुनना चाहिए; विशेषकर मुझ-जैसे को आप विघ्न डालना न चाहें।” शत्रुघ्न की वह दृढ़ बुद्धि जानकर रघुनन्दन श्रीराम ने मुस्कुराते हुए “बहुत अच्छा” कहा।
उस वचन की समाप्ति होते ही कामरूपी वानर, रीछ और राक्षसों के अनेक समूह वहाँ आ पहुँचे। सुग्रीव को आगे करके वे सब, स्वर्ग की ओर अभिमुख श्रीराम का दर्शन करने की इच्छा से, एकत्र हुए। देवताओं के पुत्र, ऋषियों के पुत्र और गन्धर्वों के पुत्र भी, श्रीराम के पार्थिव-अन्त को जानकर आ पहुँचे। उन सब वानरों और राक्षसों ने श्रीराम को प्रणाम करके कहा, “हे राजन्, हम आपके अनुगमन के लिए आए हैं। हे पुरुषोत्तम, यदि आप हमारे बिना जाएँगे, तो समझिए मानो आपने यमदण्ड उठाकर हमें मार ही डाला।” इसी बीच महाबली सुग्रीव ने भी वीर श्रीराम को विधिपूर्वक प्रणाम करके निवेदन किया, “हे नरेश्वर, वीर अंगद को राज्य पर अभिषिक्त करके मैं आया हूँ; हे राजन्, मुझे आपके अनुगमन का निश्चय किए हुए जानिए।”
सार: शत्रुघ्न ने अपने पुत्रों को मधुरा व विदिश पर अभिषिक्त करके श्रीराम के साथ चलने का दृढ़ निश्चय किया; सुग्रीव सहित वानर, रीछ और राक्षस भी अंगद को राज्य देकर श्रीराम के साथ स्वर्ग जाने को आ पहुँचे।
विभीषण, हनुमान और जाम्बवान को पृथ्वी पर रहने का आदेश
सुग्रीव का यह वचन सुनकर आनन्द देनेवालों में श्रेष्ठ श्रीराम ने उनकी मित्रता का स्मरण करते हुए कहा, “हे सखा सुग्रीव, सुनिए; मैं आपके बिना देवलोक या उस परम पद को नहीं जाऊँगा।” उन सबके ऐसा कहने पर ककुत्स्थ श्रीराम ने मुस्कुराकर “ऐसा ही हो” कहा, और फिर महायशस्वी राक्षसराज विभीषण से बोले, “हे महावीर्य राक्षसेन्द्र, जब तक प्रजा जीवित रहे, तब तक आप लंका में रहकर राज्य करते रहें। जब तक सूर्य और चन्द्रमा हैं, जब तक यह मेदिनी स्थित है, और जब तक संसार में मेरी कथा रहेगी, तब तक आपका राज्य यहाँ रहे। मित्रता के नाते मैं आपको आदेश देता हूँ, इसे पालन कीजिए; धर्मपूर्वक प्रजा की रक्षा कीजिए, इसका कोई प्रत्युत्तर न दीजिए। हे राक्षसेन्द्र, इतना और कहना चाहता हूँ, इक्ष्वाकु-कुल के आराध्य देव जगन्नाथ की आराधना कीजिए; इन्द्रसहित देवताओं को भी सदा उन्हीं की आराधना करनी चाहिए।” “ऐसा ही हो” कहकर विभीषण ने आज्ञापूर्वक श्रीराम का वचन ग्रहण किया।

उन्हें ऐसा कहकर ककुत्स्थ श्रीराम ने हनुमान से कहा, “आपने जीवित रहने का निश्चय किया है, इसलिए अपनी प्रतिज्ञा व्यर्थ मत कीजिए। हे हरीश्वर, जब तक संसार में मेरी कथाएँ प्रचलित रहें, तब तक आप मेरे वचन का पालन करते हुए परम प्रसन्न होकर रहिए।” यह सुनकर हनुमान परम हर्षित हुए और बोले, “जब तक संसार में आपकी पावन कथा विचरती रहेगी, तब तक मैं आपकी आज्ञा का पालन करते हुए इस पृथ्वी पर स्थित रहूँगा।” इसी प्रकार श्रीराम ने ब्रह्मा के पुत्र वृद्ध जाम्बवान, मैन्द और द्विविद से भी कहा कि वे जाम्बवान सहित, अर्थात विभीषण और हनुमान को मिलाकर ये पाँचों, जब तक कलि का आगमन न हो तब तक पृथ्वी पर जीवित रहें। शेष सब रीछों और वानरों से श्रीराम ने कहा, “ठीक है, जैसा कहा गया है, आप सब मेरे साथ चलिए।”
समझने की कुंजी: श्रीराम ने पाँच को चिरंजीवी रहने का आदेश दिया, विभीषण, हनुमान, जाम्बवान, मैन्द और द्विविद। इनमें हनुमान और विभीषण का चिरंजीवी होना परवर्ती परम्परा में विशेष प्रसिद्ध हुआ; पर वाल्मीकि यहाँ पाँचों को ‘जब तक कलियुग आए’ तब तक पृथ्वी पर रहने को कहते हैं।
सार: श्रीराम ने विभीषण को लंका का राज्य और जगन्नाथ की आराधना का आदेश दिया, तथा हनुमान, जाम्बवान, मैन्द और द्विविद सहित पाँच को कलियुग तक पृथ्वी पर रहने को कहा; शेष वानर-रीछों को साथ चलने की अनुमति दी।
श्रीराम का कोसलवासियों सहित महाप्रस्थान
रात बीतने और प्रभात होने पर विशाल वक्ष वाले, महायशस्वी, कमल-से नेत्र वाले श्रीराम ने पुरोहित से कहा, “मेरा प्रज्वलित अग्निहोत्र ब्राह्मणों के साथ आगे चले, और इस महाप्रस्थान में वाजपेय का छत्र भी अपनी सारी शोभा के साथ आगे रहे।” तब तेजस्वी वसिष्ठ ने महाप्रस्थान से संबंधित समस्त धर्म-विधि शास्त्रोक्त रूप से सम्पन्न की। बारीक वस्त्र धारण किए, परब्रह्म से संबंधित मन्त्रों का उच्चारण करते हुए, हाथों में कुश-घास लिए श्रीराम सरयू की ओर चले। कहीं कुछ न बोलते हुए, सब कर्मों से रहित, सुखहीन वे सूर्य-से दीप्त उस भवन से बाहर निकले।

श्रीराम के दाहिनी ओर कमल पर विराजमान लक्ष्मी थीं, बाईं ओर भूमि-देवी थीं, और आगे मूर्तिमान संकल्प-शक्ति (व्यवसाय) चल रही थी। नाना प्रकार के बाण, अद्भुत और भलीभाँति तना हुआ उत्तम धनुष, और उनके सब अस्त्र मनुष्य-रूप धारण करके चले। ब्राह्मण-रूप में वेद, सबकी रक्षा करनेवाली गायत्री, ओंकार और वषट्कार, ये सब श्रीराम के पीछे चले। महात्मा ऋषि और सब भूमिदेव (ब्राह्मण) उन महात्मा के पीछे खुले हुए स्वर्ग-द्वार तक गए। श्रीराम के पीछे अन्तःपुर की स्त्रियाँ, वृद्ध, बालक, सेवक और दास-दासियाँ भी चलीं। अन्तःपुर सहित भरत और शत्रुघ्न भी अग्निहोत्र के साथ श्रीराम के पीछे चले। रीछ, वानर, राक्षस, नगरवासी जन, मन्त्री, सेवक-समूह, पुत्र, पशु और बन्धु-बान्धव, सब अपने अनुचरों सहित हर्षित-से श्रीराम के पीछे चले।
तब सब प्रजा, हृष्ट-पुष्ट जनों से युक्त, गुणों से अनुरक्त होकर श्रीराम के पीछे चली। स्त्री-पुरुष, पक्षी, पशु और बन्धु, सब निष्पाप होकर हर्षित श्रीराम के पीछे हो लिए। सरयू में स्नान करके हृष्ट-पुष्ट प्रसन्न सब वानर ‘किलकिला’ शब्द करते हुए श्रीराम में अनुरक्त होकर चले। वहाँ कोई दीन, लज्जित या दुखी न था; सब हर्षित और प्रसन्न थे, यह सब परम अद्भुत था। श्रीराम का प्रस्थान देखने की इच्छा से जो भी जनपदवासी आया, वह भी श्रीराम को देखते ही उनके पीछे स्वर्ग को चल पड़ा। जो भूत नगर में अदृश्य रूप से रहते थे, वे भी स्वर्ग जाते श्रीराम के पीछे हो लिए। स्थावर और जंगम, जिन्होंने भी श्रीराम को देखा, सब उनके पीछे चल पड़े। उस समय अयोध्या में अत्यन्त सूक्ष्म प्राणी भी ऐसा न दिखा जो श्रीराम के पीछे न चला हो; तिर्यक्-योनि के प्राणी भी सब श्रीराम में अनुरक्त होकर पीछे गए।
एक उप-कथा: इस प्रसंग को आगे चलकर भागवत-कार ने भी स्मरण किया है: जिन कोसलवासियों ने श्रीराम का सत्य के साथ स्पर्श किया, या उन्हें देखा, या उनके साथ बैठे, या उनके पीछे चले, वे सब उसी परम स्थान को गए जहाँ योगी जाते हैं। यह वाल्मीकि के वर्णन की पुष्टि करता है कि श्रीराम का स्पर्श-दर्शन-संग मात्र ही मुक्ति-दायक हुआ।
सार: अग्निहोत्र, वेद, गायत्री और अपने मूर्तिमान अस्त्रों को आगे करके श्रीराम सरयू की ओर महाप्रस्थान पर चले; भाई, अन्तःपुर, समस्त प्रजा, पशु-पक्षी और सूक्ष्म प्राणी तक, अयोध्या का प्रत्येक जीव हर्षित होकर उनके पीछे हो लिया।
सरयू में प्रवेश और श्रीराम का विष्णु-तेज में लौटना

डेढ़ योजन पश्चिम की ओर जाकर रघुनन्दन श्रीराम ने पश्चिम-मुखी, पवित्र जल वाली सरयू नदी को देखा। भँवरों से व्याकुल उस नदी के साथ-साथ चलते हुए प्रजासहित राघव उस स्थान पर पहुँचे। उसी मुहूर्त में लोकपितामह ब्रह्मा सब देवताओं और महात्मा ऋषियों से घिरे वहाँ आए, जहाँ ककुत्स्थ श्रीराम स्वर्ग जाने को उद्यत थे; वे करोड़ों दिव्य विमानों से घिरे थे। आकाश दिव्य तेज से व्याप्त था, स्वयंप्रकाश, पुण्यकर्मा, स्वर्गवासियों के तेज से वह अनुपम ज्योति से भर गया था। सुखद, सुगन्धित पवित्र वायु बहने लगी, और देवताओं ने महान जलधारा-सी पुष्पवृष्टि की।
तब सैकड़ों वाद्य बज रहे थे और स्थान गन्धर्वों तथा अप्सराओं से भरा था, ऐसे में श्रीराम सरयू के जल में पैदल प्रवेश करने लगे। तब पितामह ब्रह्मा ने अन्तरिक्ष से वाणी कही, “हे विष्णु, आइए, आपका कल्याण हो; हे राघव, सौभाग्य से आप लौट आए। हे महाबाहो, अपने देव-समान भाइयों के साथ अपने उसी स्वरूप में प्रवेश कीजिए, अथवा जो रूप चाहें वह धारण कीजिए, हे महातेजस्वी। आप विष्णु-स्वरूप में, या सनातन आकाश-रूप में प्रवेश कीजिए। हे देव, आप ही लोकों की गति हैं; आपको कोई पूरी तरह नहीं जानता, सिवा उस विशाललोचना माया के, जो आपकी पूर्व-पत्नी सीता थीं। आप अचिन्त्य, महान भूत, अक्षय और अजर हैं; जो रूप चाहें वह स्वयं धारण कीजिए।”

ब्रह्मा का वचन सुनकर महामति श्रीराम ने निश्चय करके भाइयों सहित सशरीर ही विष्णु-तेज में प्रवेश किया। तब देवता विष्णुमय उस देव की पूजा करने लगे, और साध्य, मरुद्गण तथा इन्द्र व अग्नि को आगे करके सबने उनकी अर्चना की। जो दिव्य ऋषि-समूह, गन्धर्व, अप्सराएँ, सुपर्ण, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव और राक्षस थे, और जो सब देवताओं से उत्पन्न होकर उन्हीं से निकले थे, वे सब पुष्ट, प्रमुदित और मनोरथ-पूर्ण हो गए; निष्पाप तीनों लोकों को देखकर देवताओं ने “साधु, साधु” कहा।
तब महातेजस्वी विष्णु (श्रीराम) ने ब्रह्मा से कहा, “हे सुव्रत, इन जनसमूहों को भी आप लोक (दिव्य धाम) देने योग्य हैं; ये सब यशस्वी जन गहरे स्नेह से मेरे पीछे आए हैं। मेरे भक्त और मेरे लिए अपने प्राण तक त्यागनेवाले ये सब मेरे अनुग्रह के योग्य हैं।” विष्णु का यह वचन सुनकर लोकगुरु प्रभु ब्रह्मा ने कहा, “यहाँ आए हुए ये सब ‘सान्तानक’ नामक लोक को जाएँगे, जो ब्रह्मलोक के समीप और ब्रह्मा के सब गुणों से युक्त है। जो प्राणी इस प्रकार आपका स्मरण करते हुए अन्तिम श्वास छोड़ेगा, वह भक्ति से अपना मानव-देह त्यागकर सान्तानक में निवास करेगा। तिर्यक्-योनि का भी जो प्राणी आपका स्मरण करते हुए प्राण त्यागेगा, वह भी इसी फल को पाएगा।”

सब देवताओं के देखते-देखते वे अपने पितरों से जा मिले। देवेश के ऐसा कहने पर सब गोप्रतार (सरयू-तट का एक तीर्थ-घाट) पर पहुँचे। हर्ष के आँसुओं से विह्वल वे सब सरयू में उतरे, और जो-जो जल में अवगाहन करके प्रसन्नतापूर्वक प्राण त्यागते, वे मानव-देह छोड़कर विमान पर चढ़ जाते। तिर्यक्-योनि के सैकड़ों प्राणी भी सरयू-जल का स्पर्श पाकर, प्रभायुक्त शरीर पाकर, दिव्य रूप से दीप्त देवों-से होकर स्वर्ग गए। जो भी थोड़ा-सा तिर्यक्-योनि का प्राणी आपका ही स्मरण करता हुआ सरयू-जल में प्राण त्यागता, वह उस जल के स्पर्श से देवलोक को जाता। रीछ, वानर और राक्षस भी, जो उसमें उतरे, अपने देह जल में डालकर स्वर्ग में प्रविष्ट हुए; देवताओं से उत्पन्न वानर और रीछ अपनी-अपनी मूल योनि (देवस्वरूप) में लौट गए, और सुग्रीव सूर्यमण्डल में प्रविष्ट हुए। तब लोकगुरु ब्रह्मा, उन सब आए हुओं को स्वर्ग में स्थापित करके, परम हर्षित प्रमुदित देवताओं के साथ उत्कृष्ट स्वर्ग को चले गए।
समझने की कुंजी: गोप्रतार (आज अयोध्या में ‘गुप्तार घाट’ नाम से प्रसिद्ध) वही सरयू-तीर्थ है जहाँ से श्रीराम ने जल में प्रवेश किया। ब्रह्मा द्वारा बताया ‘सान्तानक’ लोक ब्रह्मलोक के निकट का दिव्य धाम है, जहाँ श्रीराम की भक्ति में देह त्यागनेवाले स्थान पाते हैं।
सार: सरयू में प्रवेश करते ही ब्रह्मा की वाणी से श्रीराम भाइयों सहित सशरीर अपने विष्णु-तेज में लौट गए; उनके साथ आए जन, वानर-रीछ और तिर्यक्-प्राणी तक सरयू में देह त्यागकर सान्तानक तथा अन्य दिव्य लोकों को गए।
रामायण के श्रवण-पठन का फल और कथा का समापन

इतना ही, उत्तरकाण्ड-सहित, यह आख्यान है, जिसे ब्रह्मा ने भी पूजा है, जो ‘रामायण’ नाम से विख्यात और मुख्य है, और जिसे वाल्मीकि ने रचा है। तब सब के स्वर्ग चले जाने पर श्रीराम पहले की भाँति विष्णु-रूप में स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित हुए, जिनसे यह सम्पूर्ण चराचर त्रैलोक्य व्याप्त है। इसलिए गन्धर्वों, सिद्धों और परम ऋषियों सहित देवता स्वर्ग में सदा प्रसन्न होकर रामायण काव्य को सुनते हैं।
यह आख्यान आयु बढ़ानेवाला, सौभाग्यकारी और पापनाशक है; रामायण वेद के समान है, इसे बुद्धिमान को श्राद्धों में सुनाना चाहिए। इसे सुनने से पुत्रहीन पुत्र पाता है और निर्धन धन पाता है; जो इसका एक चरण भी पढ़ता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। जो मनुष्य प्रतिदिन पाप करता है, वह भी यदि रामायण का एक श्लोक भी पढ़े, तो पाप से छूट जाता है। रामायण का पाठ करनेवाले को वस्त्र, गौ और स्वर्ण देना चाहिए; पाठक के सन्तुष्ट होने पर सब देवता सन्तुष्ट होते हैं। इस आयुष्य-वर्धक आख्यान, रामायण, को पढ़नेवाला मनुष्य पुत्र-पौत्रों सहित इस लोक में और परलोक में भी महिमा पाता है।
सार: विष्णु-रूप में स्वर्ग-प्रतिष्ठित होकर श्रीराम की कथा का समापन होता है; वाल्मीकि बताते हैं कि रामायण आयु, सौभाग्य और मुक्ति देनेवाला वेद-तुल्य आख्यान है, जिसका एक श्लोक भी पाप का नाश करता है।
मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, उत्तरकाण्ड (गीता प्रेस गोरखपुर)।