राजा जनक का जागरण

कथा · 11

राजा जनक का जागरण

वे यज्ञ की वेदी पर पाँव रखने ही वाले थे, कि किसी अदृश्य आवाज़ ने एक वाक्य कह दिया और वे वहीं रुक गए, और उसके बाद उनकी पूरी ज़िंदगी अलग हो गई। बाद में जब शुकदेव उनसे मिलने आए, तो जनक स्वयं एक और कथा बन चुके थे।

सरयू पर शाम उतर रही थी, जब राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या ज्ञान बरसों की तपस्या से ही मिलता है?”

वसिष्ठ बोले – “राम, ज्ञान तो किसी एक क्षण में ही मिलता है, बस उस क्षण से पहले भीतर बहुत कुछ तैयार हो चुका होता है। ऐसे ही एक राजा थे, मिथिला के जनक, जिनके जीवन में एक रात आई, एक गीत आया, और सब कुछ बदल गया।”

मिथिला

King Janaka of Mithila in white dhoti and rudraksha mala seated alone at twilight on his palace verandah, gazing over a jasmine garden toward a river and distant temple domes, an oil lamp glowing beside him, his face calm yet inwardly restless; rich painterly classical Indian color illustration, dignified

जनक मिथिला के राजा थे और दिन भर राज-काज में लगे रहते थे, न्याय, सीमाएँ, प्रजा, सब कुछ उनके ही हाथ में था। शाम ढले वे थोड़ी देर अकेले अपने महल के उस बरामदे पर बैठते, जहाँ से बगीचा दिखता था और जिसमें चमेली खिली रहती थी।

बाहर से वे शान्त दिखते थे, पर भीतर एक गहरी प्यास उन्हें बेचैन किए रहती थी।

उन्होंने यह प्रश्न ब्राह्मणों से पूछा था, ऋषियों से पूछा था, ज्ञानियों से पूछा था, और हर एक ने उन्हें कुछ न कुछ बताया भी था, पर भीतर की वह प्यास फिर भी नहीं बुझी थी।

एक रात वे अपने उसी बरामदे पर बैठे थे और बगीचे में चमेली की महक बहुत भारी होकर हवा में तैर रही थी।

तभी दूर से एक गीत उनके कानों तक आया।

वह गीत न तो बहुत मधुर था और न ही बहुत ऊँचा, पर उसके शब्द कुछ ऐसे थे जो जनक ने पहले कभी नहीं सुने थे।

Beyond the moonlit garden, a small group of luminous siddhas gathered near a temple sing together, their song drifting on the night air, while Janaka on his arched verandah tilts his head to listen, heavy jasmine blossoms in the foreground; rich painterly classical Indian color illustration, dignified

बगीचे के परे एक मन्दिर के पास कुछ सिद्ध-गण मिलकर गा रहे थे।

जनक उस गीत में डूबकर ध्यान से सुनने लगे।

“वो जो हर रूप के पीछे है, उसी से सब रूप हैं। वो जो हर शब्द के पीछे है, उसी से सब शब्द हैं। वो जो हर साँस के पीछे है, उसी से सब साँसें हैं। वही तुम हो। वही मैं हूँ। वही सब कुछ है।”

उन शब्दों ने जनक को भीतर तक ठहरा दिया।

उन्होंने यह बात अपने भीतर सँभालकर रख ली, कि वही है जो हर रूप के पीछे है।

मेरा देह एक रूप है, मेरा मन एक रूप है, मेरा राज्य एक रूप है, मेरी पत्नी एक रूप है और मेरी बेटी भी एक रूप है।

तो इन सब रूपों के पीछे आख़िर कौन है?

इसी प्रश्न को लिए जनक ने अपनी आँखें मूँद लीं।

फिर वे उस पर ठहरे जो हर शब्द के पीछे है।

मैं जब बोलता हूँ तो शब्द आते हैं, पर वे शब्द आख़िर कहाँ से आते हैं? मैं अभी जो सोच रहा हूँ, यह सोच भी आख़िर कहाँ से आ रही है?

हर शब्द से पहले एक मौन है और हर सोच से पहले एक चुप्पी है, और उस मौन में आख़िर कौन बैठा है?

उत्तर भीतर से आया, कि मैं हूँ।

पर फिर वह मैं कौन है?

अब वे उस पर ठहरे जो हर साँस के पीछे है।

जनक ने अपनी साँस को सुना और उसे भीतर तक देखा, कि साँस अन्दर जाती है और फिर बाहर आती है।

उन दोनों के बीच एक क्षण ठहरा रहता था, और उसी क्षण में जनक भी ठहर गए।

और तभी उस क्षण कुछ ऐसा हुआ जो शब्दों में नहीं बँधता।

Janaka in deep meditation on his moonlit balcony, eyes closed, face luminous in the instant of awakening as the burden of identity lifts; a radiant translucent witness-self emerges as a glowing aura of golden light behind and around him, jasmine and silence; rich painterly classical Indian color illustration, dignified

जनक के भीतर सब रूप एक हो गए, शब्द भी एक हो गया और साँस भी एक हो गई। उनकी पहचान का जो भार वे ढो रहे थे, वह उठ गया, और उनके पीछे जो साक्षी बैठा था, वही अब उनके सामने आ खड़ा हुआ।

वही तुम हो।

उसी क्षण जनक ने अपने आप को पहचान लिया।

जब उन्होंने आँखें खोलीं, तो वे वही पुराने जनक नहीं रह गए थे।

बाहर सब कुछ वैसा ही था, पर उनके भीतर सब कुछ बदल चुका था।

बगीचे में चमेली अब भी खिली थी, मन्दिर का गीत अब भी गूँज रहा था और हवा अब भी बह रही थी।

पर अब जनक उन सब के भीतर भी थे और उन सब से परे भी, क्योंकि असल में वे उन सब के पीछे खड़े साक्षी थे।

अगली सुबह उन्होंने राज-काज वैसे ही किया जैसे रोज़ किया करते थे। मन्त्री आए और अपनी बातें कहने लगे, जनक उन्हें सुनते रहे, और जब प्रजा का एक व्यक्ति न्याय माँगने आया तो उन्होंने उसकी पूरी बात सुनकर न्याय भी किया।

ऊपर से देखें तो सब कुछ वैसा ही था।

पर भीतर जनक अब कहीं और ही पहुँच चुके थे।

एक मन्त्री ने धीरे से कहा – “महाराज आज बड़े शान्त हैं।”

जनक बोले – “मन्त्री, हम तो हमेशा से ही शान्त थे, बस आज हमें अपनी उस शान्ति का पता चल गया।”

Years later, the liberated King Janaka enthroned beneath a royal parasol in his columned court hall, serenely receiving the young sage Shuka who approaches with reverence; ministers and ascetics arrayed around, oil lamps and a temple glimpsed through the arch; rich painterly classical Indian color illustration, dignified

बहुत बरस बाद, जब ऋषि शुक उनके पास आए, तो उन्हें पहले से ही यह मालूम था कि जनक एक विचित्र राजा हैं। वे राज्य तो चलाते हैं, पर भीतर से राजा नहीं हैं; वे प्रजा से बात तो करते हैं, पर सच में किसी के नहीं हैं; और वे जनक के नाम से जाने तो जाते हैं, पर वे वह जनक हैं ही नहीं।

उस रात जनक मिथिला के एक बरामदे पर बैठे थे, चमेली खिली हुई थी और दूर से एक गीत चला आया था, बस इतना ही काफ़ी हुआ।

राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या मेरे लिए भी ऐसा कोई एक क्षण आएगा?”

वसिष्ठ बोले – “राम, वह क्षण हर एक के लिए आता है, बस यह पता नहीं होता कि वह किस रूप में आएगा। शायद कोई गीत होगा, शायद कोई श्लोक होगा, शायद कोई बात होगी जो तुम किसी रास्ते पर सुनोगे, शायद कोई हवा होगी; या शायद कुछ भी न होगा, बस तुम यूँ ही बैठे होगे और अचानक तुम जान जाओगे।”

राम कुछ देर तक उस बात में डूबे रहे।

सरयू के किनारे चमेली तो नहीं थी, पर किसी फूल की महक हवा में हौले-हौले तैर रही थी।

साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा योग वासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 5.8-12 पर आधारित है। श्रवण मार्ग का यह सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है। सिद्ध-गणों का गीत और जनक का तत्क्षण ज्ञान, यह वैदान्तिक परम्परा में बहुत ख्यात है। भारतीय परम्परा में जनक “जीवन-मुक्त” राजा के पर्याय बन गए।

दर्शन-दृष्टि

जनक एक साधारण दिन के बीच में हैं। कोई बड़ा संकट नहीं, कोई वर्षों का तप नहीं। बस सिद्धों के एक गायन की पंक्तियाँ कानों में पड़ती हैं। वो उन पंक्तियों पर सोचने बैठते हैं, और बैठते-बैठते जाग जाते हैं। उठते वो दूसरे व्यक्ति हैं। कथा यह कहती है कि बोध के लिए तप-काल कोई आवश्यक शर्त नहीं, श्रवण और मनन के एक क्षण में भी पूरी पलट हो सकती है, यदि सुनने वाला तैयार हो।

रमण महर्षि (1879-1950) का अपना जागरण सोलह बरस की उम्र में, मदुरै के एक कमरे में, बिना किसी गुरु, बिना किसी पूर्व-तैयारी के, मृत्यु-भय के एक झटके से हुआ था। उनकी Who Am I? (Nan Yar?, पहली बार 1923 में प्रकाशित) इसी अनुभव का सार है। जनक की कथा का स्वर रमण के अनुभव से बहुत निकट है, कि बोध कोई संचित पुण्य नहीं, एक ठीक क्षण में ठीक प्रश्न का ठीक उत्तर है, और वो उत्तर पहले से भीतर ही होता है।