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राजा जनक: सिद्धगीत से स्थिर प्रज्ञा तक

कथा · 8

राजा जनक: सिद्धगीत से स्थिर प्रज्ञा तक

वसन्त के एक दिन विदेह के राजा जनक अपने अनुचरों को दूर रखकर पर्वत-शिखर के पुष्पित उपवन में विचर रहे थे। तमाल-कुञ्ज से अदृश्य सिद्धों के अनेक उपदेशात्मक गीत सुनाई दिए। उनसे उपजा निर्वेद उसी क्षण किसी चमत्कारी परिणति पर नहीं ठहरा; दिन के कर्तव्य, रात के एकान्त और गहरे आत्मविचार से उनका विवेक क्रमशः स्थिर हुआ।

वसन्त का उपवन

वसिष्ठ ने श्रीराम से कहा, “जो मनुष्य श्रुति, स्मृति और सदाचार के अनुकूल व्यवहार करते हुए अपने कर्म को कर्तव्य समझकर पूरा करता है, पर उसकी उपलब्धि के लिए वासना नहीं पालता, वह मुक्त है। कार्य का फल पुष्ट हो अथवा नष्ट हो, जिसकी दृष्टि सम रहती है, उसके भीतर हर्ष और शोक से उठने वाले द्वन्द्व दिन के प्रकाश में अन्धकार की तरह मिट जाते हैं।”

इस प्रस्तावना के बाद उन्होंने विदेह के राजा जनक का प्रसंग सुनाया। जनक पराक्रमी थे। उनकी पुरानी आपत्तियाँ शान्त हो चुकी थीं और राज्य की सम्पदा दिनोंदिन बढ़ रही थी। उनका हृदय उदार था; याचक उनके द्वार से निराश नहीं लौटते थे और वे प्रजा के पालन में तत्पर रहते थे। इस सम्पन्नता के बीच ही उनके विवेक की परीक्षा आरम्भ हुई।

वसन्त-ऋतु का एक दिन था। छोटी-छोटी लताएँ फूलों से भर गई थीं, कोयलों का स्वर सुनाई दे रहा था और मंजरियों की राशि से उपवन पीला दिखाई देता था। हवा मन्द, सुगन्धित और शीतल थी; वह केसर में बसे पराग, सुगन्ध और मकरन्द के कण साथ लिए बह रही थी। राजा ने सभी अनुचरों को दूर रहने का आदेश दिया और क्रीडाशैल के शिखरों पर उगे लतागृहों में अकेले विचरण करने लगे।

वहीं तमाल-वृक्ष की एक झाड़ी में कुछ सिद्ध छिपे हुए थे। पर्वतों की कन्दराओं में विचरने वाले वे सिद्ध एकान्त स्थानों में निवास करते थे। जनक उन्हें देख नहीं रहे थे, पर उनके मुख से एक के बाद एक उपदेशात्मक गीत निकले। उन वचनों का विषय श्रोता के हृदय में परमात्मभाव जगाना था। जनक ने उन्हें ऐसी एकाग्रता से सुना मानो वे वचन उन्हीं पर अनुग्रह करने के लिए कहे जा रहे हों।

तमाल-कुञ्ज के अनेक स्वर

कुछ सिद्ध बोले, “इन्द्रियों के द्वारा दृष्टा जब दृश्य विषय से मिलता है, तब सुख की प्रतीति बुद्धि में उठती है। उस प्रतीति को उसके मूल तक परखा जाए तो सहज आनन्द का निश्चय प्रकट होता है। आत्मतत्त्व के शोधन से वही असीम भूमारूप में उद्घाटित होता है। हम निश्चय-समाधि से उस विशुद्ध आत्मा की उपासना करते हैं।”

दूसरे सिद्धों ने कहा, “वासनासहित दृष्टा, दर्शन और दृश्य की त्रिपुटी शान्त होने पर जो विशुद्ध ज्ञान प्रकाशित होता है, हम उस आत्मा की उपासना करते हैं।” किसी अन्य समूह का कथन था, “अस्ति और नास्ति, इन दोनों मतों के बीच जो उनके साक्षी के रूप में सदा विद्यमान रहता है और सब प्रकाशित होने योग्य वस्तुओं को प्रकाश देता है, हमारी उपासना उसी परमात्मा की है।”

फिर एक स्वर उठा, “जिसमें सब है, जिसका सब है, जिससे सब हैं, जिसके लिए और जिसके द्वारा सब है, तथा जो स्वयं सब कुछ है, वही परम सत्य आत्मा है।” दूसरे सिद्धों ने उसी भाव को वाणी के विस्तार में देखा: “अकार से हकार तक समस्त वर्णों के रूप में जो निरन्तर उच्चरित हो रहा है, वह हमारा अपना आत्मस्वरूप है।”

इसके बाद उपदेश ने मनुष्य की खोज का रुख हृदय की ओर किया। सिद्ध बोले, “हृदय-गुफा में विराजमान दीप्तिमान परमेश्वर को छोड़कर किसी दूसरे आश्रय की कामना करना वैसा है जैसे हाथ में आए कौस्तुभ को त्यागकर तुच्छ रत्न खोजे जाएँ। सम्पूर्ण आशाओं के त्याग पर हृदयस्थित ज्ञान का फल, ब्रह्म, प्राप्त होता है। तब आशारूपी विष-बेल की मूल-परम्परा कट जाती है।”

एक सिद्ध का वचन और कठोर था: “जो भोग्य पदार्थों की नीरसता जान लेने पर भी अपने मन को बार-बार उन्हीं में बाँधता है, वह विवेकहीन होकर गधे जैसी जड़ता में पड़ता है।” दूसरे ने कहा, “इन्द्र ने जैसे वज्र से पर्वतों पर प्रहार किया था, उसी प्रकार बार-बार उठने और गिरने वाली इन्द्रियरूपी सर्प-वृत्तियों को विवेक से वश में करना चाहिए।”

अन्तिम उपदेश उपशम पर ठहरा: “शान्ति के पवित्र सुख को प्राप्त करो। उत्तम शम, अर्थात मनोनिग्रह, से सम्पन्न मनुष्य का विशुद्ध चित्त ही शान्त होता है। जिसका चित्त शान्त हो गया, उसी को अपने परमानन्दमय स्वरूप में दीर्घ और स्थिर स्थिति मिलती है।”

जनक ने आत्मा, साक्षी, आशा, इन्द्रिय, विवेक और शम पर कई सिद्धों के क्रमिक उपदेश सुने। उन वचनों से वे शीघ्र निर्वेद को प्राप्त हुए। यहाँ निर्वेद उस भरोसे के टूटने की दशा है जो क्षणभंगुर वस्तुओं से स्थायी तृप्ति की आशा करता रहता है।

ऊँचे महल में अकेला राजा

जनक उपवन से लौटे। साथ आए लोगों को घर की ओर ले गए, परिवार और परिचरों को उनके अपने स्थानों पर भेजा, फिर अकेले अपने ऊँचे महल पर चढ़ गए। वहाँ उन्होंने लोक की वर्तमान दशा पर दृष्टि डाली और अपने भीतर उठे विचार को खुलने दिया।

गुप्त सिद्धों के गीत सुनकर एकान्त में विचार करते राजा जनक

“यह कैसी दशा है,” उन्होंने सोचा, “जन्म, जरा, रोग और मृत्यु के कारण लोक बार-बार कष्ट के चक्र में घूम रहा है, और मैं भी उसी में पड़ा हूँ। जिस काल का कोई अन्त नहीं, उसके सामने मेरा जीवन कितना छोटा अंश है। केवल इस जीवन की अवधि तक रहने वाला राज्य भी कितना अल्प है। फिर इतनी-सी उपलब्धि पर निश्चिन्त बैठना कैसी बुद्धिमानी है?”

उनकी दृष्टि अपने ही विश्वास पर लौटी। “इस जगत में ऐसी कौन-सी वस्तु है जो नित्य निर्विकार रह सके? जो दूर कही जाती है, वह भी मन में ही उपस्थित होती है। प्रतिवर्ष, प्रतिमास, प्रतिदिन और प्रतिक्षण मिलने वाले सुख अपने साथ दुःख का बीज रखते हैं। आज जो बड़े लोगों में प्रधान हैं, कुछ समय बाद उनका स्थान भी बदल जाता है। फिर मेरा चित्त संसार की महत्ता पर इतना विश्वास क्यों रखता है?”

उन्होंने मोह को उस काले मेघ के समान देखा जो सूर्य का प्रकाश ढक देता है। “मैं बुद्धिमान कहलाता हूँ, फिर आत्मा के प्रकाश को ढकने वाला यह मोह मेरे सामने कैसे आ खड़ा हुआ? ये भोग मेरे किस अर्थ में हैं, ये बन्धु मेरे किस अर्थ में हैं? बालक कल्पित भय से व्याकुल हो जाता है; उसी तरह मैं ममता के कल्पित सम्बन्ध से अपने को व्याकुल करता रहा हूँ।”

आस्था के साथ उसकी कीमत भी दिखाई दी। “भोग और सम्बन्धियों में बाँधी हुई यह आस्था जरा और मृत्यु की सहचरी है और मन को निरन्तर उद्वेग में रखती है। सम्पत्ति बनी रहे अथवा चली जाए, उसके प्रति मेरा आग्रह क्यों हो? जल में उठे बुलबुले की शोभा की तरह इसका रूप भी टिकता नहीं।”

जनक ने पुराने राजाओं को स्मरण किया। उनके वैभव, भोग और स्नेही सम्बन्धी अब कहाँ थे? जो कभी प्रत्यक्ष थे, वे अब केवल स्मृति के विषय थे। पूर्वकल्पों में रचे गए जगत मिट चुके थे। लाखों इन्द्र काल में समा गए, करोड़ों ब्रह्मा चले गए, अनेक सृष्टि-परम्पराएँ आईं और चली गईं, असंख्य भूपाल धूल की तरह उड़ गए। इतने उदाहरण सामने होने पर अपने छोटे जीवन और राज्य को स्थायी मानना उन्हें विवेकहीन लगा।

विचार आगे बढ़ा: “दिन आते और चले जाते हैं, पर मैंने उस एक नित्य सत्य का साक्षात्कार नहीं किया। जिन सुन्दर वस्तुओं में मैंने दृढ़ स्नेह रखा, वे नष्ट होती दिखाई दीं। मनुष्य जिस पदार्थ पर अपना आश्वासन टिकाता है, उसी के बदलने पर उसके दुःख का द्वार खुलता है। बाल्य में अज्ञान, यौवन में विषयों की आकांक्षा और बाद की अवस्था में परिवार के निर्वाह की चिन्ता उसे घेरे रहती है। वह अपने उद्धार का साधन कब करे?”

राजसूय और अश्वमेध जैसे सैकड़ों यज्ञ भी अधिक से अधिक महाकल्प तक भोगे जाने वाले स्वर्ग का फल दे सकते हैं। महाकाल के सामने वह अवधि भी अल्प है; विज्ञान और आनन्द से पूर्ण नित्य ब्रह्म उससे परे है। पृथ्वी, स्वर्ग और पाताल में ऐसा कोई प्रदेश नहीं जहाँ आपत्तियाँ जीव को छूती न हों। मानसिक व्यथा चित्त के भीतर पले सर्प के समान है और शरीर की व्याधि उसी सीमित देह-प्रदेश में उपजती है।

धन, घर और सम्बन्ध यदि चित्त के परम आश्रय बना दिए जाएँ तो उन्हें पाने में श्रम, बचाने में चिन्ता और खोने में पीड़ा जुड़ती है। जनक ने इसका दूसरा पक्ष भी देखा: यदि वियोग मनुष्य को साधु-संग, तपस्या, ज्ञान, विवेक और वैराग्य की ओर ले जाए, तो वही आपत्ति कल्याण का आरम्भ बन सकती है। समुद्र में प्रतिबिम्बित चन्द्रमा की तरह यह जगत मन के परिणाम में दिखाई देता है; उसमें “यह मेरा है” का आग्रह कहाँ से आया?

मन नाम का चोर

जनक का विचार अब बाहरी पदार्थों से हटकर उस मन पर केन्द्रित हुआ जो उन्हें अपना कहता था। “मैंने आशाओं से बँधी इन वृत्तियों को बहुत भोग लिया। बाहरी रूप से रमणीय लगने पर भी वे मन को ऊँचा उठाती, नीचे गिराती और संताप देती रही हैं। अब उनसे विश्राम लेने का समय है। मेरे पारमार्थिक धन को चुराने वाला चोर यही मन है। यथार्थ ज्ञान से इसकी झूठी सत्ता को शान्त करना होगा।”

सिद्धों के उपदेश उनके स्मरण में थे। जैसे सूर्य की धूप में ओस गल जाती है, वैसे ही यथार्थ ज्ञान मन के आग्रह को ब्रह्मतत्त्व में विलीन कर सकता है। “यह देह मैं हूँ, यह विस्तृत धन और राज्य मेरा है, इन धारणाओं का नाश विवेक से होगा। ध्यान के अभ्यास से बलवान मन की चंचलता शान्त होगी। तब इच्छाओं को विराम देकर आत्मस्वरूप में स्थिर रह सकूँगा।”

मध्याह्न हो चला था। उसी समय प्रधान प्रतिहार उनके पास आया। उसने कहा, “महाराज, आपकी भुजाओं पर पृथ्वी का भार टिका है। उठिए और राजधर्म के योग्य व्यवहारों का सम्पादन कीजिए। स्नानभूमि में पुष्प, कपूर और केसर मिले जल की व्यवस्था है। कमल-सरोवरों के तट, देवताओं के पूजागृह, दक्षिणा के योग्य ब्राह्मण और भोजनभूमि में आपकी प्रतीक्षा करती कान्ताएँ, सब अपने समय पर उपस्थित हैं। महापुरुष अपने कर्म में काल का अतिक्रमण नहीं करते।”

जनक ने उसका निवेदन सुना, पर उनका विचार अभी पूरा नहीं हुआ था। वे संसार की दशा का परीक्षण करते रहे। राजाओं के चित्त को पहचानने में कुशल प्रतिहार ने आदर और संकोच से फिर कुछ नहीं कहा।

पहला निष्कर्ष त्याग की ओर गया। “यह क्षणभंगुर राज्य कितने दिन का है? इसके मायामय आडम्बर से मुझे क्या प्रयोजन? इसे छोड़कर एकान्त में प्रशान्त महासागर की तरह शान्त रहूँ। हे चित्त, भोगों के आस्वादन की ओर तुम्हारी तीव्र दौड़ ने जन्म, जरा और जड़ता की ही भूमि तैयार की है। जिन अवस्थाओं में तुम भ्रम से सुख देखते हो, उन्हीं से आगे बड़ा दुःख उठता है।”

इतना विचार कर जनक मौन हो गए। चित्त की चपलता थमी तो वे चित्र में अंकित पुरुष की तरह अचल रहे। उस ठहराव में त्याग की इच्छा की भी परीक्षा हुई। “किसी क्रिया से मेरा क्या प्रयोजन है, और निष्क्रिय बैठ रहने से क्या सिद्ध होगा? जो उत्पन्न होता है वह नष्ट होता है। यह दिखाई देने वाला शरीर कर्म करे अथवा स्थिर रहे, सर्वत्र समभाव से स्थित विशुद्ध चेतना की इससे क्या हानि है?”

विचार ने उन्हें एक अधिक संयत निश्चय तक पहुँचाया। “मैं अप्राप्त वस्तु की इच्छा नहीं करता और प्राप्त वस्तु को ठुकराता भी नहीं। करने और न करने से जो फल मिलता है वह परिवर्तनशील है। इसलिए यह शरीर उठे और क्रम से प्राप्त कर्तव्य का पालन करे। निष्क्रिय रहकर इसे सूखने देना निष्फल होगा।”

उसी दिन का कर्तव्य, उसी रात का मनन

वसिष्ठ ने कहा, “रघुनन्दन, इस प्रकार विचार करके राजा जनक उठे। उन्होंने अनासक्त भाव से यथाप्राप्त कर्तव्यों का सम्पादन किया। देवताओं, ब्राह्मणों और दूसरे पूजनीय जनों का पूजा, दान और यथोचित सम्मान से सत्कार करते हुए उस दिन का सारा कार्य भली-भाँति पूरा किया। फिर ध्यान को अपना विनोद बनाकर अकेले ही रात बिताई।”

रात बीतने लगी। विषयों से उपजी थकान से रहित मन को एकाग्र करके जनक ने उसे फिर समझाया: “हे चंचल चित्त, आत्मा का सुख शम के आश्रय में है। विक्षेप से रहित शान्ति में ही सारभूत आत्मसुख मिलता है। तुम जितने विकल्प रचते हो और जितना विषय-चिन्तन सींचते हो, संसार की अनुभूति उतनी ही शाखाओं में बढ़ती जाती है। विषयभोग की इच्छा के साथ आन्तरिक व्यथाएँ भी बढ़ती हैं।”

आत्मविचार के बाद रात्रि में स्थिर ध्यान करते जनक

“संसार की चंचल सृष्टि और शान्ति के सुख को विचार की तुला पर रखकर देखो। यदि तुम्हें विषय-प्रपञ्च में सार दिखाई देता है तो उसी का आश्रय लो; यदि विवेक उसे अस्थिर दिखाता है तो शान्तस्वरूप ब्रह्म में स्थित होओ। कोई दृश्य पहले से न होकर प्रकट हो जाए अथवा वर्तमान दृश्य नष्ट हो जाए, उसके उदय और नाश के कारण हर्ष या विषाद में मत पड़ो।”

जनक ने मन से पूछा कि सत्य और असत्य के बीच वास्तविक सम्बन्ध कैसे बन सकता है। यदि दृश्य जगत की सत्ता मन की कल्पना पर टिकी है, तो उससे आत्मा का बन्धन किस आधार पर हो? और यदि मन तथा दृश्य दोनों को स्थायी मान लिया जाए, तब भी उनके बदलने पर हर्ष और विषाद क्यों आवश्यक हों? इस विवेचन में वे उस आन्तरिक व्यथा की जड़ देख रहे थे जो हर परिवर्तन को अपना लाभ या अपनी हानि मानती है।

“विवेक और वैराग्य से उस आत्मानन्द को जगाओ जो चंचलता के नीचे मौन पड़ा है। जड़ दृश्य में कोई ऐसी उपलब्धि नहीं जो तुम्हें परम परिपूर्णता दे सके। अभ्यास और वैराग्य के बल से धैर्य ग्रहण करो और चपलता छोड़ो।” इस तरह रात के अन्तिम भाग तक विचार चलता रहा। सिद्धगीत का श्रवण मनन में उतरा, मनन कर्तव्य के बीच परखा गया और ध्यान ने उसे स्थिरता दी।

विदेह का जीवन्मुक्त राजा

इसके बाद जनक ने अपने राज्य के सभी काम सँभाले। उनके भीतर ममता और आसक्ति का पुराना मोह फिर नहीं उठा। अनुकूल परिस्थिति उन्हें उन्मत्त नहीं करती थी और प्रतिकूल परिस्थिति उन्हें शोक में नहीं डुबोती थी। मन जाग्रत रहते हुए भी सुषुप्ति जैसी निर्विक्षेप शान्ति में स्थिर था। उन्होंने दृश्य जगत को मन से पकड़ने का प्रयत्न नहीं किया और उसे अस्वीकार करने की हठ भी नहीं रखी। वे वर्तमान में निश्चिन्त होकर स्थित रहे।

आत्मविवेक के निरन्तर अनुसंधान से उनका ज्ञान विशुद्ध हुआ। समस्त प्राणियों के आत्मस्वरूप परमात्मा को जानकर उन्होंने चिन्मय परमात्मा में स्थित पदार्थों को आत्मभूत देखा। संसार का व्यवहार प्रकृति के क्रम से चलता रहा और राजा उसमें समचित्त रहे। वे लोगों को प्राणों के समान प्रिय थे, सभी प्राणियों का सम्मान करते थे और विदेह का शासन सँभालते हुए हर्ष तथा विषाद के वश में नहीं हुए।

वसिष्ठ ने उन्हें जीवन्मुक्त कहा। जनक बीते हुए समय की चिन्ता नहीं करते थे, आने वाले समय की कल्पनाओं में नहीं भटकते थे और वर्तमान में प्राप्त कार्य का प्रसन्नतापूर्वक अनुसरण करते थे। राज्य के बीच रहते हुए सिद्धों का श्रवण, वस्तुओं की नश्वरता पर सूक्ष्म विचार, मन के दावों की परीक्षा, ध्यान और कर्तव्य के भीतर अनासक्ति, इन सबने मिलकर उनकी प्रज्ञा को स्थिर किया था।

वसिष्ठ ने श्रीराम को बताया कि परमात्मतत्त्व पर तब तक विचार करना चाहिए जब तक यथार्थ ज्ञान का फल स्पष्ट न हो जाए। सत्पुरुषों की संगति और शास्त्र के अभ्यास से बुद्धि को निर्मल, तीक्ष्ण और स्थिर बनाना चाहिए। ऐसी प्रज्ञा मित्र की तरह साथ देती है, अज्ञान के अन्धकार में दीपक बनती है और कठिन समय में नौका की तरह विवेकपूर्ण दिशा देती है।

मनुष्य बाहरी सम्पत्ति जुटाने में जितना प्रयत्न करता है, पहले उतना ही प्रयत्न अपनी बुद्धि के परिष्कार में करे। अनुचित दिशा में लगी बुद्धि राग, द्वेष और लोभ को बढ़ाती है; विवेक और वैराग्य से शुद्ध हुई बुद्धि उन्हीं प्रवृत्तियों को पहचानकर उनका वेग रोकती है। वसिष्ठ ने इसका सरल उदाहरण दिया: जो किसान अन्न की वृद्धि चाहता है, वह बीज से पहले पृथ्वी को हल से जोतकर तैयार करता है। जनक के प्रसंग में यही तैयारी प्रज्ञा का शोधन है।

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