कथा · 7
भुशुण्ड: कल्पवृक्ष पर युगों के साक्षी
इन्द्रसभा में चिरंजीवियों की चर्चा सुनकर वसिष्ठ मेरु के ईशानकोण में स्थित आम्र-कल्पतरु तक पहुँचे। वहाँ शान्त बैठे वायसराज भुशुण्ड ने उन्हें अपना जन्म, अनेक सृष्टियों की स्मृति, प्रलय के बीच स्थिरता और प्राण-अपान की साधना सुनाई। यह आख्यान दीर्घायु के कौतूहल से आगे बढ़कर बदलते जगत में वर्तमान-बोध, समभाव और सजग जीवन की गहरी पड़ताल है।
इन्द्रसभा में सुना हुआ नाम
वसिष्ठ ने श्रीराम से कहा कि वे ब्रह्मा के मानसपुत्र और सप्तर्षियों में एक हैं। एक अवसर पर वे इन्द्र की सभा में बैठे थे। वहाँ देवता और मुनि उन प्राणियों की चर्चा कर रहे थे जिन्होंने असाधारण दीर्घकाल तक जीवन देखा है। सभा में उपस्थित महर्षि शातातप कम बोलते थे, पर शास्त्र और अनुभव दोनों में उनकी प्रतिष्ठा थी। चिरंजीवियों की कथाओं के बीच उन्होंने भुशुण्ड का उल्लेख किया। उनका स्वर प्रशंसा के उत्साह से अधिक किसी जाँची हुई बात की सूचना जैसा था।
शातातप ने कहा, “मेरु पर्वत के ईशानकोण में पद्मरागमणि के समान दमकता एक विशाल शिखर है। उस पर आम का कल्पतरु खड़ा है। उसके दाहिने तने के कोटर में एक सुन्दर घोंसला है। वहीं वीतराग, ऐश्वर्यवान और समय की गति को जानने वाले वायसराज भुशुण्ड रहते हैं। स्वर्ग में भी उनकी बराबरी का कोई दूसरा दीर्घजीवी देखना कठिन है।”
वसिष्ठ ने कुछ समय बाद शातातप से अलग अवसर पर वही बात फिर पूछी। उत्तर पहले वर्णन से मेल खाता था। इससे उन्हें विश्वास हुआ कि मुनि किसी अलंकार के लिए भुशुण्ड की आयु नहीं बढ़ा रहे थे। सभा समाप्त हुई, देवता अपने स्थानों को लौटे और वसिष्ठ के मन में उस पक्षी को देखने की उत्कण्ठा बनी रही। उन्होंने प्रतीक्षा नहीं की। मेरु के उस शिखर की ओर चले और योगबल से शीघ्र ही वहाँ पहुँच गए।

इस आरम्भ में एक विद्वत्सभा में सुना हुआ नाम भुशुण्ड तक पहुँचने की जिज्ञासा जगाता है। वसिष्ठ दूसरी बार पूछकर कथन की संगति देखते हैं, फिर प्रत्यक्ष अनुभव के लिए यात्रा करते हैं। योगवासिष्ठ के लिए प्रमाण का यह क्रम महत्त्वपूर्ण है। सुना हुआ वृत्तान्त, स्मृति में रखी गई बात और सामने मिले जीव का संवाद, तीनों मिलकर कथा के प्रमाण स्थापित करते हैं।
मेरु का ईशान शिखर दूर से ही लाल आभा बिखेर रहा था। पद्मराग, सुवर्णधातु और गेरू के रंग मिलकर दिशाओं को सन्ध्या जैसी आभा देते थे। कहीं इन्द्रनील की नीली चमक उस लालिमा के बीच धुएँ की पतली रेखा जान पड़ती। शिखर इतना ऊँचा था कि तारों से भरे आकाश के पास उठी हुई पर्वत-शिखाएँ उँगलियों की तरह दिखाई देती थीं। गंगा की धाराओं का कलकल स्वर, मेघों की गम्भीर ध्वनि, गन्धर्वों का संगीत और पुष्पों पर मंडराते भ्रमरों का गुंजन वहाँ एक साथ सुनाई दे रहे थे।
देवता शिलाओं पर विश्राम करते, अप्सराएँ लताओं के झूलों पर झूलतीं और पर्वत की गुफाओं में दिव्य युगल रहते थे। बाँसों की पीली देह, गंगा का उजला सूत्र और आकाश का मृगचर्म देखकर वसिष्ठ को पूरा शिखर किसी तपस्वी का रूप लगता था। यह दृश्य निर्जन समाधि और समृद्ध उत्सव को एक ही प्रदेश में रखता है। पर्वत की ऊँचाई के साथ जीवन विरल नहीं हुआ था। वहाँ अनेक लोकों की गतिविधि अधिक सूक्ष्म और अधिक घनी होकर उपस्थित थी।
उसी शिखर पर चूत नाम का आम्र-कल्पतरु फैला था, ऐसा दिव्य वृक्ष जो इच्छित फल देने वाला था। उसका आधार मेरु पर था। सुवर्ण और रजत जैसी कल्पलताएँ उसकी शाखाओं पर फैली थीं। पत्तों की अनेक रंगतें, चमकीले फूल और प्रकाशमान फल पूरे वृक्ष को एक विशाल नगर जैसी छाया देते थे। घनी शाखाएँ आकाश में मण्डप बनातीं और उनके भीतर असंख्य पक्षियों के बसेरे थे।
किसी शाखा पर ब्रह्मा के हंसों का वंश था, कहीं अग्नि के वाहन शुक से निकली परम्परा के तोते। कार्तिकेय के मयूरों की सन्तति अपने कलगीदार बच्चों के साथ रहती थी। ऐसे व्योमपक्षी भी थे जो आकाश में जन्म लेते, वहीं जीवन बिताते और पृथ्वी को छुए बिना समाप्त हो जाते। भरद्वाज, गौरैया, गीध, कोयल, क्रौंच, मुर्गे, नीलकण्ठ, बलाका और अनेक अनाम पक्षियों की अलग सभाएँ थीं। एक चिरंजीवी के आसन के साथ यह वृक्ष पक्षी-लोक की बहुस्तरीय नगरी भी था।
वसिष्ठ ने दाहिने तने की ओर दृष्टि की। फूलों और सुगन्ध से भरे एक विस्तृत कोटर के आसपास कौओं का बड़ा समुदाय बैठा था। वर्षा के घने मेघों के बीच नीलम की गहरी चमक जैसे अलग पहचानी जाए, उसी तरह उनके मध्य भुशुण्ड दिखाई दिए। उनका शरीर श्याम था, आकृति सुडौल और उपस्थिति स्थिर। उनकी प्रौढ़ता जर्जरता की तरह नहीं, लंबे अनुभव से आई शान्ति की तरह व्यक्त होती थी। उत्पत्ति और विनाश के अनेक क्रम देखकर भी उनकी वाणी में थकान नहीं थी।
वसिष्ठ आकाश से उस सभा के पास उतरे। उनके उतरने से उठी हल्की हवा ने कौओं की पंक्तियों में ऐसी लहर पैदा की जैसी शान्त जल पर अचानक हवा पड़ने से उठती है। भुशुण्ड ने उन्हें देखते ही पहचान लिया। त्रिकालदर्शी पक्षी ने अप्रत्याशित आगमन में भी परिचित ऋषि को तुरन्त पहचान लिया। वे पत्तों के बीच से उठे और मधुर स्वर में बोले, “मुनिराज, आपका स्वागत है।”

उन्होंने संकल्प से हाथ प्रकट किए, पुष्पांजलि अर्पित की और स्वयं कल्पवृक्ष का ताजा पत्ता लाकर आसन बनाया। वसिष्ठ लताओं से सजे उस आसन पर बैठे। भुशुण्ड ने अर्घ्य और पाद्य से उनका सत्कार किया। उनके चारों ओर बैठे पक्षी भी आदर से स्थिर हो गए। अतिथि के रूप में एक सप्तर्षि सामने थे, फिर भी भुशुण्ड का व्यवहार घबराहट से भरा नहीं था। शिष्टता और आत्मविश्वास साथ-साथ चलते थे।
भुशुण्ड ने कहा, “बहुत समय बाद आपके दर्शन का सौभाग्य मिला है। आपके आने से यह पक्षी-सभा पवित्र हुई। इन्द्रसभा में चिरंजीवियों पर जो विचार हुआ था, उसी से मैं आपकी स्मृति में आया और उसी कारण आपके चरण यहाँ पहुँचे। मैं आपके प्रयोजन को जानता हूँ, फिर भी आपके मुख से प्रश्न सुनना चाहता हूँ। आपकी वाणी का रस हमारे लिए अलग अनुग्रह है।”
वसिष्ठ ने उनकी कुशल पूछी और कहा, “आपके चित्त में चारों ओर शान्ति का राज्य दिखाई देता है। आप जगत के जन्म, विनाश, विद्या और अविद्या की गति जानते हैं। मेरी जिज्ञासाएँ स्पष्ट कर दीजिए। आपका जन्म किस कुल में हुआ? आपको तत्त्व का ज्ञान कैसे मिला? आपकी आयु कितनी है? पिछले कल्पों के कौन से वृत्तान्त आपको स्मरण हैं? इस वृक्ष को आपका निवास किसने बनाया?”
भुशुण्ड ने इन प्रश्नों को अलग-अलग उत्तरों में तोड़ने की जल्दी नहीं की। उन्होंने निवेदन किया कि उनकी उत्पत्ति समझने के लिए पहले उस दिव्य परिवार को जानना होगा जिससे उनके पिता का सम्बन्ध था। इसके बाद वे ज्ञान, निवास, भाई, प्रलय, स्मृति और दीर्घजीवन की बात क्रम से कहेंगे। इस विनम्र भूमिका में एक कुशल कथाकार की सूझ थी। जीवन की किसी एक उपलब्धि को उसके सम्बन्धों और पूर्वस्थितियों से काटकर समझा नहीं जा सकता।
महादेव की आठ मातृकाएँ
भुशुण्ड ने अपनी वंशकथा महादेव के परिसर से आरम्भ की। उन्होंने शिव के समाधिस्थ रूप, जटाओं में गंगा, मस्तक पर चन्द्रमा, कण्ठ के नील वर्ण, भस्म, सर्प और श्मशान का वर्णन किया। उनके चारों ओर विचित्र मुख और आकृतियों वाले प्रमथगण थे। उसी परिवार में मातृशक्तियों का समुदाय रहता था। वे पर्वतों, आकाश, दूसरे लोकों, गहरे गर्तों और जीवों की देहों तक में विचरण करने वाली प्रचण्ड शक्तियाँ मानी गईं।
उनमें आठ प्रमुख नाम थे: जया, विजया, जयन्ती, अपराजिता, सिद्धा, रक्ता, अलम्बुसा और उत्पला। इन आठों के पीछे अनेक दूसरी मातृकाएँ चलती थीं। सातवीं मातृका अलम्बुसा का वाहन इन्द्रनील पर्वत की तरह गहरे रंग का कौआ था। उसका नाम चण्ड था और वही आगे चलकर भुशुण्ड का पिता हुआ। यह सम्बन्ध कथा का मूल है। चण्ड ब्रह्मा की सेना का पक्षी नहीं, अलम्बुसा की सेवा में रहने वाला वाहन था।
एक अवसर पर मातृकाएँ आकाश में एकत्र हुईं। वे तुम्बुरु नाम से पूजित रुद्रमूर्ति और भैरव की आराधना से जुड़ा उग्र पानोत्सव मना रही थीं। नृत्य, गान, गर्जना, मदिरा और प्रचण्ड उल्लास से पूरा आकाश भर गया। चण्ड और दूसरे वाहन भी अपनी स्वामिनियों के उत्सव में सम्मिलित थे। ब्राह्मणी के रथ को खींचने वाली सात राजहंसियाँ भी वहाँ थीं। उत्सव के उन्माद में वे समुद्रतट के पास चण्ड के साथ रहीं और गर्भवती हो गईं।
मातृकाओं का आचरण उग्र और हिंसक था। वे उमा को अपने वश में करके अनुष्ठान में ले गईं, फिर महादेव के क्रोध पर उनके अंगों का पुनर्गठन कर उन्हें लौटा दिया। दैवी शक्तियों के कोमल और भयानक दोनों रूप उस उत्सव में साथ उपस्थित थे। भुशुण्ड ने इस प्रसंग को अपनी वंशावली के लिए आवश्यक सीमा तक कहा, फिर चण्ड और सात हंसियों की कथा पर लौट आए।
उत्सव के बाद गर्भवती हंसियाँ ब्राह्मणी के पास पहुँचीं और सारी बात कह सुनाई। ब्राह्मणी ने दया से कहा कि गर्भावस्था में वे रथ खींचने का कार्य न करें और अपनी सुविधा से विचरण करें। स्वयं ब्राह्मणी कुछ समय निर्विकल्प समाधि में रहीं। हंसियाँ विष्णु की नाभि से उठे कमल के मूल भाग के पास चली गईं, जहाँ ब्रह्मा के कमल का उद्गम माना गया है। वहीं उनके गर्भ परिपक्व हुए।
सातों हंसियों ने कमल के कोमल पल्लवों पर इक्कीस अण्डे दिए। समय आने पर अण्डों के भीतर जीवन पूर्ण हुआ और वे खुल गए। उनसे चण्ड के इक्कीस पुत्र निकले। वे सभी कौए थे। भुशुण्ड उन इक्कीस भाइयों में एक थे, उनके साथ बीस भाई और थे। धीरे-धीरे पंख निकले, देह बढ़ी और वे आकाश में उड़ने योग्य हुए। इस जन्म में किसी एक अलौकिक शिशु का अकेला प्राकट्य नहीं हुआ। यह एक बड़े सहोदर समुदाय की उत्पत्ति थी।

युवा पक्षी अपनी सातों माताओं के साथ समाधि से उठी ब्राह्मणी के पास गए। उन्होंने श्रद्धा से उनकी आराधना की। ब्राह्मणी प्रसन्न हुईं और अपने अनुग्रह से उन्हें तत्त्व का साक्षात्कार कराया। भुशुण्ड ने वसिष्ठ से स्पष्ट कहा कि ज्ञातव्य का ज्ञान इसी कृपा से मिला और वे भाई जीवन्मुक्त भाव में स्थित हुए। उनकी परिपक्वता, आराधना और ब्राह्मणी का प्रसाद ज्ञान के क्रम को पूरा करते हैं।
ज्ञान मिलने के बाद भाइयों ने शान्त, निर्बाध स्थान में समाधि के अनुकूल जीवन चाहा। वे अपने पिता चण्ड के पास विन्ध्य-प्रदेश पहुँचे। चण्ड ने उन्हें आलिंगन दिया और सबने अलम्बुसा की पूजा की। पिता ने पूछा, “पुत्रों, क्या तुम वासना के तन्तुओं से बुने संसार-जाल से मुक्त हो चुके हो? यदि अभी कोई गाँठ शेष हो तो हम देवी से प्रार्थना करें।” पुत्रों ने उत्तर दिया, “ब्राह्मणी की कृपा से ज्ञातव्य जान लिया है। अब हमें एकान्त में रहने योग्य स्थान चाहिए।”
चण्ड ने मेरु का विस्तार समझाया। उनके वर्णन में पर्वत का आधार पृथ्वी के भीतर सोलह हजार योजन तक उतरता था और उसका शरीर अस्सी हजार योजन ऊँचा स्वर्ग तक उठता था। चारों ओर हिमालय जैसे सात कुलपर्वत उसके सामन्तों की तरह थे। देव, ऋषि, गन्धर्व, किन्नर, अप्सरा, विद्याधर, यक्ष, राक्षस और नाग उसके विभिन्न प्रदेशों में रहते थे। एक ही पर्वत पर बसे होने पर भी उनके नगर इतनी दूर थे कि एक समुदाय दूसरे को देख नहीं पाता था।
चण्ड ने आगे कहा, “मेरु के ईशानकोण में माणिक जैसा विशाल शिखर है। उसके पृष्ठ भाग पर कल्पतरु स्थित है। दाहिने ओर की शाखा पर पीले पल्लव, रत्नों जैसे फूल और चन्द्रमा जैसी उज्ज्वल फलराशि है। जब अलम्बुसा ध्यान में थीं, तब मैंने वहीं मणियों और पुष्प-पंखुड़ियों से एक घोंसला बनाया था। उसके द्वार चिन्तामणि जैसी शलाकाओं से रचे हैं और भीतर शीतलता रहती है। वह देवताओं के लिए भी दुर्गम है। तुम सब वहाँ जाओ। उस निवास में भोग और मोक्ष दोनों के लिए आवश्यक अवकाश मिलेगा।”
पिता ने पुत्रों को स्नेह से विदा किया। भाइयों ने चण्ड और अलम्बुसा को प्रणाम किया, फिर आकाश की ओर उड़ चले। मार्ग में वायुलोक, सूर्य-मण्डल और अमरावती पार करके वे पहले ब्रह्मलोक पहुँचे। वहाँ ब्राह्मणी को पिता का सन्देश सुनाया। देवी ने उन्हें आलिंगन, आज्ञा और आशीर्वाद दिया। फिर वे लोकपालों की नगरियाँ पार करते हुए मेरु के कल्पतरु पर आए और चण्ड के बताए घोंसले में रहने लगे।
इस प्रकार वसिष्ठ के पहले तीन प्रश्नों के उत्तर एक-दूसरे में पूर्ण हुए। कुल का सूत्र चण्ड और सात हंसियों तक गया। ज्ञान का सूत्र ब्राह्मणी की कृपा तक पहुँचा। निवास का सूत्र पिता के पुराने घोंसले और उनके निर्देश से जुड़ा। भुशुण्ड ने अपनी उपलब्धि को अकेले प्रयत्न की वीरगाथा की तरह प्रस्तुत नहीं किया। माता, पिता, देवी, भाई और दीर्घ परम्परा सभी उनके जीवन में सहभागी थे।
घोंसले में रहते हुए कल्पों की लम्बी पंक्तियाँ बीतती गईं। भुशुण्ड के बीस भाई भी दीर्घजीवी, ज्ञानी और बलवान थे। उनकी देहें एक-एक करके समाप्त हुईं। भुशुण्ड के अनुसार वे शरीर छोड़कर शिवपद में स्थित हो गए। वसिष्ठ ने जब कौओं की सभा में उन्हें अकेला प्रधान देखा, तब इसी अनुपस्थिति का कारण पूछा था। दीर्घकाल ने सहोदर समुदाय को धीरे-धीरे विरल कर दिया।
भुशुण्ड ने अपनी स्थिति को शोकहीन कठोरता नहीं कहा। उन्होंने स्वीकार किया कि पक्षी का जीवन संसार की दृष्टि में छोटा और उपेक्षित समझा जाता है। फिर बताया कि उनका सन्तोष आत्मा में स्थिर है। वे किसी प्राप्त वस्तु को व्यर्थ नहीं फेंकते और अप्राप्त वस्तु के लिए दौड़ते नहीं। व्यवहार करते समय सावधान रहते हैं, क्योंकि जगत में प्रत्येक कदम का परिणाम होता है। भीतर उनका मन आशा के पाश, राग के उन्माद और भय के आकस्मिक झटकों से मुक्त रहता है।
कल्पतरु पर रत्नों का प्रकाश इतना था कि दिन और रात का साधारण भेद स्पष्ट नहीं रहता। भुशुण्ड फिर भी कालक्रम जानते थे। वे प्राण की गति और अपने भीतर उठती सूक्ष्म लयों के आधार पर दिन, रात और कल्प के परिवर्तन पहचानते थे। बाहरी घड़ी के अभाव में उनका ध्यान शरीर और चेतना के नियमित स्पन्द को पढ़ता था। इसी अभ्यास का विस्तृत अर्थ बाद के संवाद में खुलना था।
उन्होंने सत्संग को अपने जीवन की विशेष कुशलता माना। वसिष्ठ के आगमन से प्रसन्न होकर कहा कि विषयों का उपभोग ऊपर से कितना ही आकर्षक दिखाई दे, उसका रस क्षणभंगुर है। ज्ञानी का सान्निध्य मन को अपनी दिशा दिखाता है। यह बात कहने वाला पक्षी स्वयं तत्त्वज्ञ था, फिर भी उसने अतिथि को सीख देने की मुद्रा में सीमित नहीं किया। ज्ञान प्राप्त हो जाने के बाद भी दूसरे ज्ञानी का आगमन उसके लिए उत्सव था।
जब प्रलय आता है
वसिष्ठ ने पूछा कि जिस वृक्ष पर भुशुण्ड रहते हैं, वह युगान्त के विकराल उपद्रवों में कैसे बचा रहता है। भुशुण्ड ने पहले उन प्रसंगों को याद किया जब हिरण्याक्ष पृथ्वी को ले गया, मेरु के काँपने की स्थितियाँ आईं, मन्दराचल निकाला गया, देवासुर-संग्राम में सूर्य और चन्द्र तक विचलित हुए, कालनेमि ने मेरु को अपनी भुजाओं में उठाया और गरुड़ के पंखों से लोक काँप उठे। उन प्रचण्ड परिवर्तनों में कल्पतरु अपनी दिव्य स्थिति के कारण अचल रहा।
फिर उन्होंने एक आवश्यक भेद रखा। सामान्य उत्पातों में वृक्ष उनका आश्रय बना रहता है। पूर्ण प्रलय के समय वे घोंसले से निकल जाते हैं। सहस्र महायुगों का क्रम समाप्त होता है, लोक-व्यवहार मिटने लगता है और परिचित पर्वत, दिशा तथा निवास अपना रूप खो देते हैं। तब पुराने घर से चिपके रहना स्थिरता नहीं कहलाता। भुशुण्ड उस समय घोंसले का त्याग करते हैं और समस्त सामान्य कल्पनाओं को शान्त कर आकाश में स्थित होते हैं।
जब बारह आदित्य उठकर पर्वतों को तपाने लगते हैं, वे वारुणी धारणा में अपने को सर्वव्यापक शीतल जल के रूप में अनुभव करते हैं। जब प्रलय-वायु पर्वतराजों को चूर्ण करने लगती है, वे पर्वत जैसी अचलता की धारणा धारण करते हैं। जब मेरु सहित जगत गलकर एक समुद्र हो जाता है, वे वायु-तत्त्व में तादात्म्य रखते हुए उस अपार जल के ऊपर स्थित रहते हैं। इन धारणाओं के सहारे भुशुण्ड हर बदलती अवस्था का सामना करते हैं, उसके मिटते हुए रूप को पकड़े बिना।
अन्ततः वे ब्रह्माण्ड की सीमा पार करके उस अव्याकृत अवस्था की ओर जाते हैं जहाँ स्थूल और सूक्ष्म जगत का व्यवहार शान्त है। वहाँ वे गहरी, एकरस समाधि में तब तक रहते हैं जब तक कमल से उत्पन्न ब्रह्मा फिर सृष्टि का क्रम आरम्भ नहीं करते। नई रचना प्रकट होती है तो भुशुण्ड ब्रह्माण्ड में प्रवेश करते हैं, मेरु के समतुल्य नए विन्यास को पहचानते हैं और उसी रूप में पुनः उपस्थित कल्पतरु तथा अपने आलय तक लौट आते हैं।

वसिष्ठ ने स्वाभाविक प्रश्न किया, “दूसरे सिद्ध योगी भी ऐसा क्यों नहीं करते? वे प्रलय में शरीर छोड़कर मुक्ति पाते हैं, जबकि आप लौटते रहते हैं।” भुशुण्ड ने उत्तर में ईश्वरीय नियामिका शक्ति का उल्लेख किया। प्रत्येक जीव के प्रारब्ध और जगत के समग्र विधान का अपना क्रम है। किसी के लिए शरीर का त्याग पूर्णता का मार्ग बनता है, किसी के लिए दीर्घ साक्षित्व। एक साधना की नकल से सबको एक परिणाम मिलेगा, ऐसा निष्कर्ष उन्होंने नहीं दिया।
कल्पतरु की पुनरावृत्ति भी इसी सूक्ष्मता से समझाई गई। हर प्रलय के बाद नई सृष्टि में पिछले विन्यास से मिलता-जुलता वृक्ष उत्पन्न होता है। स्मृति उसकी रचना, शोभा और स्थान को पहचानती है, इसलिए भुशुण्ड उसे “यही कल्पतरु” कहते हैं। पूर्व शरीर के नष्ट होने और समान रूप के फिर प्रकट होने के बीच प्रत्यभिज्ञा बनी रहती है।
यही बात दिशाओं और पर्वतों पर भी लागू होती है। किसी पुराने सर्ग की उत्तर दिशा और मेरु नए सर्ग में स्थूल रूप से वही पदार्थ नहीं रहते। सूर्य, चन्द्र और नक्षत्रों की व्यवस्था के साथ दिशाएँ फिर निश्चित होती हैं। पर्वत का नया विन्यास पुरानी स्मृति से मिलता है। भुशुण्ड का एकत्व किसी जमी हुई दुनिया पर निर्भर नहीं। बदलते विन्यासों के बीच पहचान की निरन्तरता उनकी कथा का अधिक सूक्ष्म आशय है।
पृथ्वी के वे रूप जो अब स्मृति हैं
वसिष्ठ ने पूछा कि इतने सर्गों को देखने वाले भुशुण्ड को कौन से आश्चर्य विशेष रूप से याद हैं। उत्तर में किसी एक लगातार चलती कालरेखा का इतिहास नहीं आया। अलग-अलग सृष्टियों के दृश्य खुलते गए। उन्होंने ऐसी पृथ्वी देखी जहाँ शिला, वृक्ष, तृण, लता, पर्वत और वन कुछ भी नहीं थे। वह मेरु के नीचे पड़ी थी। एक अवधि में वही भूमि ग्यारह हजार वर्ष तक राख के भारी विस्तार से ढकी रही।
उन्हें वह समय भी याद था जब सूर्य और चन्द्र का प्रादुर्भाव नहीं हुआ था। मेरु के रत्नों से निकलता प्रकाश पृथ्वी के एक भाग को प्रकाशित करता था और दिन का उजाला पर्वत की आभा से अलग पहचाना नहीं जाता था। किसी सृष्टि में असुरों के संघर्ष से पृथ्वी का भीतर का भाग क्षीण हुआ और भागते प्राणियों से भूमि भर गई। चार युग तक असुरों का प्रभुत्व इतना गहरा रहा कि पृथ्वी उनका अन्तःपुर जैसी दिखाई दी।
एक सर्ग में समुद्र ने मेरु को छोड़कर सभी प्रदेशों को ढँक लिया। केवल उस पर्वत पर ब्रह्मा, विष्णु और शिव की उपस्थिति थी। कहीं दो युग तक केवल घना वन रहा और दूसरे प्राणी या नगर नहीं बने। किसी दूसरी रचना में चार युग से अधिक समय तक पर्वत ही पर्वत थे और मनुष्य उनके बीच चलते दिखाई नहीं देते थे। एक पृथ्वी दस हजार वर्ष तक मरे हुए दैत्यों की अस्थियों से बने पर्वतों से भरी रही।
भुशुण्ड ने ऐसा अन्धकार भी देखा जिसमें आकाश के विमानचारी देवता भय से ओझल हो गए और वृक्षविहीन धरती पर प्रकाश विरल हो गया। विन्ध्य के मेरु की बराबरी में बढ़ने और अगस्त्य के दक्षिण जाने का प्रसंग उनकी स्मृति में था। उन्होंने ऐसी सृष्टि देखी जहाँ पृथ्वी और पर्वत का नाम तक शेष नहीं था, देवता तथा सिद्ध आकाश में रहते थे और सूर्य-चन्द्र के बिना भी प्रकाश फैला था। एक जगत में इन्द्र, राजा और ऊँच-नीच के सामाजिक भेद अनुपस्थित थे, फिर भी दिशाएँ अन्धकार में डूबी थीं।
किसी सृष्टि में समुद्र की कल्पना से पहले पृथ्वी वृक्षों से भरी थी और भृगु जैसे मानस पुरुष स्त्री-पुरुष सम्बन्ध के बिना उत्पन्न हुए। किसी काल में सत्ययुग के भीतर भी आचरण उच्छृंखल था और वेद की परम्परा से अपरिचित लोग अपने संकेतों पर व्यवहार चलाते थे। भुशुण्ड के लिए युगों के नाम भी एक जैसे नैतिक परिणाम की गारंटी नहीं थे। उन्होंने कलियुग में सत्ययुग जैसा आचरण और सत्ययुग में कलियुग जैसी अवस्था देखी थी।
इन स्मृतियों का भार संख्या से आता है। उनका प्रयोजन विस्मय से आगे जाता है। हर दृश्य बताता है कि परिचित पृथ्वी भी अनेक सम्भावित विन्यासों में से एक है। पर्वत कभी देर से बनते हैं, समुद्र कभी अनुपस्थित रहता है, प्रकाश का आधार बदल जाता है और समाज की व्यवस्था उलट जाती है। भुशुण्ड के लिए स्थायित्व का केन्द्र दृश्य को जानने वाली सत्ता है।
भुशुण्ड ने वसिष्ठ को देखकर कहा कि ब्रह्मा-पुत्र रूप में यह उनका आठवाँ जन्म है जिसमें दोनों की संगति हुई। दूसरी सृष्टियों में वसिष्ठ आकाश, जल, वायु, पर्वत या अग्नि से उत्पन्न हुए थे। नाम समान रह सकता था, जबकि जन्म का माध्यम, रूप और आचरण बदल जाता था। वर्तमान सर्ग से लगभग समान विन्यास वाले तीन सर्ग उन्हें याद थे। ऐसे दस सर्ग भी स्मरण थे जिनमें देवताओं के आचरण, शरीर, आयु और अधिकार की व्यवस्था एक जैसी रही।

इसके बाद उनकी स्मृति ने पुराण-प्रसिद्ध घटनाओं के बदलते क्रम गिनाए। पाँच सर्गों में पृथ्वी को वराह के स्थान पर कूर्म ने समुद्र से उठाया था। अमृत के लिए वर्तमान समुद्र-मन्थन उस क्रम का बारहवाँ मन्थन था। हिरण्याक्ष तीन बार औषधियों और रसों से भरी पृथ्वी को पाताल ले गया था। रेणुका के पुत्र परशुराम का क्षत्रिय-विनाश छठी ऐसी घटना था। सौ कलियुगों में शुद्धोधन के पुत्र के रूप में नारायण ने सौ बार बुद्ध-दशा ग्रहण की थी।
उनके कथन में शिव तीस बार त्रिपुर का विनाश कर चुके थे। दक्ष के यज्ञ-विध्वंस और इन्द्रों को मिले दण्ड के भी दोहराए हुए क्रम थे। हरि और हर के आठ संग्राम स्मृति में थे। वेदों के पाठ, अंग और अनुष्ठान प्रत्येक युग में अध्येताओं की क्षमता के अनुसार कुछ बदलते रहे। पुराण एक अर्थ रखते हुए भी अलग रचयिताओं और पाठों के कारण नया विस्तार पाते थे। इतिहास फिर कहा जाता था, फिर भुला दिया जाता था और अगली सृष्टि में दूसरे विन्यास के साथ लौटता था।
भुशुण्ड ने एक लाख श्लोकों वाले दूसरे रामायण-नामक ज्ञानशास्त्र को याद किया। वर्तमान संवाद से बनने वाले महारामायण के बारे में कहा कि वाल्मीकि उसे बत्तीस हजार श्लोक में रचेंगे और आवर्ती क्रम में यह उसकी बारहवीं बार रचना होगी। महाभारत नाम के समतुल्य ज्ञानशास्त्र की रचना सातवीं बार होने वाली थी। ये संख्याएँ भुशुण्ड की कथित ब्रह्माण्डीय स्मृति का अंश हैं। इन्हें आधुनिक ग्रन्थ-इतिहास की तिथियों की तरह पढ़ना उस साहित्यिक प्रसंग को बदल देगा।
उसी सूची में निकट त्रेतायुग में विष्णु का ग्यारहवीं बार राम नाम से जन्म होना था। नरसिंह तीन बार हिरण्यकशिपु का वध कर चुके थे। पृथ्वी का भार उतारने के लिए वसुदेव के घर कृष्ण का जन्म उस क्रम में सोलहवीं बार होना था। भुशुण्ड ने परिचित देवताओं और नायकों को एक ही बार घट चुकी घटनाओं के रूप में नहीं देखा। हर सृष्टि अपने साम्य और भेद के साथ कथा को फिर रूप देती थी।
हर मन्वन्तर में उनके मित्र, सम्बन्धी, सेवक और निवास भी बदलते थे। कभी वे विन्ध्य में रहते, कभी दूसरे पर्वतों पर, कभी फिर मेरु के कल्पतरु तक लौटते। पुत्र किसी कल्प में पिता की भूमिका पा सकता था, मित्र शत्रु हो सकता था और सामाजिक लिंग की भूमिकाएँ बदल सकती थीं। भुशुण्ड की स्मृति पुराने सम्बन्धों को वर्तमान की नई स्थितियों में पहचानती और उनके परिवर्तन का सम्मान करती थी।
उनका निष्कर्ष था कि जगत को केवल स्थायी पदार्थ कहने से अनुभव के ये उलटफेर समा नहीं सकते। उसे शून्य कह देने पर दिखाई पड़ने वाला विस्तार और व्यवहार समझ में नहीं आता। चैतन्य में उठी हुई प्रतीति की तरह उसका स्वभाव खुलता है। जल में तरंग का रूप बनता है और उसी जल में विलीन होता है। भुशुण्ड के देखे सर्ग चेतना के इसी व्यापक समुद्र में अलग-अलग तरंगों जैसे थे।
मृत्यु किस मन को खोजती है
इतनी स्मृतियाँ सुनने के बाद वसिष्ठ ने प्रश्न को भुशुण्ड की देह के निकट लाया। “आप संसार में विचरते और व्यवहार करते हुए भी मृत्यु से कैसे बचे रहते हैं? किन दोषों के घटने और किन गुणों के बढ़ने से उसका अधिकार ढीला पड़ता है?” भुशुण्ड ने उत्तर में पहले मन की गाँठों को देखा। उनके अनुसार राग-द्वेष की माला पिरोने वाली वासना जब हृदय में कसकर बँधी रहती है, तब देह और मन निरन्तर क्षय का भार उठाते हैं।
उन्होंने मानसिक व्यथा को देह-वृक्ष काटने वाली आरी कहा। आशा का अनियन्त्रित फैलाव भीतर दाह पैदा करता है। लोभ मन के बिल में बैठे सर्प की तरह अवसर पाकर डँसता है। क्रोध विवेक के जल को सुखा देता है और कामना मनुष्य को कठोर यन्त्र में दबे तिलों की तरह पीड़ित करती है। यह भाषा मृत्यु को बाहर से आने वाले एक क्षण के साथ मन के भीतर चल रहे क्षरण से भी जोड़ती है।
समाहित चित्त को उन्होंने ऐसी स्थिरता कहा जिसे शारीरिक और मानसिक कष्ट आसानी से चूर नहीं कर पाते। व्यवहार चलता रहता है। मनुष्य देता, लेता, बोलता, कमाता और दायित्व निभाता है। भीतर चित्त अपनी पूर्णता के लिए इन क्रियाओं पर आश्रित नहीं रहता। प्रशंसा, सम्पत्ति, स्वर्ग, राज्य और सुख की अस्थिरता पहचानकर वह उस आत्मलाभ में ठहरता है जो हर अवस्था में साथ है।
भुशुण्ड ने तीनों लोकों के वैभव को देखा था। स्वर्ग में देव, गन्धर्व और अप्सराएँ हैं; पृथ्वी पर राजा, पर्वत, नगर और समुद्र; पाताल में नाग तथा असुर। सभी लोकों का सुख परिवर्तनशील है। मृत्यु पर विजय की उनकी व्याख्या मन को उस चेतना में विश्राम देती है जिसमें लोकों का अनुभव प्रकट होता है।
यहाँ “मृत्यु नहीं मारती” को शारीरिक अमरता का त्वरित वादा मानना कथा के शेष भाग से मेल नहीं खाता। भुशुण्ड के बीस ज्ञानी भाई देह छोड़ चुके थे और स्वयं भुशुण्ड नियति के भिन्न विधान की बात कह चुके थे। मृत्यु का भय, परिवर्तन से टूटती पहचान और वासना से होने वाला आन्तरिक क्षय, इन पर उनकी शिक्षा सीधी पड़ती है। उनका विशिष्ट दीर्घजीवन उसी शिक्षा का अद्भुत कथात्मक उदाहरण है, सबके लिए एक यांत्रिक परिणाम नहीं।
देह के भीतर प्राण का नगर
वसिष्ठ के आग्रह पर भुशुण्ड ने अब अपने अभ्यास की संरचना समझाई। उन्होंने देह को एक घर कहा। हड्डियाँ उसकी धरनें, नसें बन्धन, मांस-मिट्टी दीवार और मुख सहित इन्द्रिय-द्वार उसके प्रवेश-पथ हैं। यह प्राचीन उपमा स्थूल घर के भीतर जीवन का व्यवहार सम्भालती अनेक अदृश्य गतियों का परिचय देती है।
इस वर्णन में इड़ा और पिंगला नाम की दो सूक्ष्म नाड़ियाँ दाएँ और बाएँ भाग में स्थित हैं। तीन हृदय-कमल जैसे यन्त्र बताए गए हैं, जिनके साथ बहत्तर हजार नाड़ियाँ और एक सौ एक प्रधान शाखाओं का जाल जुड़ता है। पत्तों की तरह खुलते और सिमटते इन कमलों को प्राण तथा अपान की गति स्पन्दित करती है। इसी वायु के अलग कामों को प्राण, अपान, समान और दूसरे नाम मिलते हैं। आँख झपकना, स्पर्श ग्रहण करना, श्वास चलना, अन्न का पचना और वाणी का निकलना उसी जीवन-शक्ति की विभिन्न क्रियाएँ मानी गई हैं।
इन सबमें दो गतियाँ विशेष रूप से सामने आती हैं। प्राण को ऊपर और बाहर की ओर चलने वाली उष्ण, सूर्यवत शक्ति कहा गया। अपान नीचे और भीतर लौटने वाली शीतल, चन्द्रवत शक्ति है। भुशुण्ड ने उन्हें देहरूपी यन्त्र के दो घोड़े, मन के रथ के दो पहिए और हृदयाकाश के सूर्य-चन्द्र कहा। उनका ध्यान किसी एक साँस तक सीमित नहीं रहता। जागने, स्वप्न देखने और गहरी नींद में भी जीवन की यह लय चलती रहती है।
भुशुण्ड ने नासिका के बाहर बारह अंगुल तक उनके क्षेत्र का उल्लेख किया और कहीं बारह या सोलह अंगुल की परिधि बताई। हृदय से बाहर जाती स्वाभाविक गति को रेचक, बाहर से भीतर लौटती पूर्ति को पूरक और एक गति के शान्त होने तथा दूसरी के उठने से पहले की स्थिरता को कुम्भक की दृष्टि से समझाया। भीतर और बाहर दोनों ओर ऐसी संधियाँ बनती हैं।
भुशुण्ड का मुख्य आग्रह बलपूर्वक साँस रोकने पर नहीं, पहले से चल रही गति को सजगता से पहचानने पर है। वे कहते हैं कि प्राणायाम की मूल लय जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति में सहज चलती है। चलना, बैठना, सोना, जागना, खाना और काम करना इस ध्यान से बाहर नहीं हैं। अभ्यास का विस्तार पूरे जीवन में है। कथा में दिए पारम्परिक शब्द योगदर्शन का अंश हैं और किसी रोग के उपचार या बिना गुरु के कठिन श्वास-रोध का निर्देश नहीं।
जब बाहर जाता प्राण शान्त हो गया हो और भीतर आता अपान अभी उठा न हो, वहाँ एक सूक्ष्म बाहरी सन्धि है। जब अपान की गति समाप्त हो और प्राण का उदय अभी शुरू न हुआ हो, भीतर वैसी ही सन्धि बनती है। साधारण जीवन में ये क्षण बहुत छोटे हैं और निरन्तर आते रहते हैं। भुशुण्ड की साधना उन्हें खींचकर चमत्कार बनाने से अधिक उनके आधार को पहचानती है।

उन्होंने कहा कि प्राण के भीतर चेतना वैसे रहती है जैसे फूल में सुगन्ध। अपान के भीतर वही उपस्थिति जल में माधुर्य की तरह है। गति का आरम्भ उसी से प्रकाशित होता है, अन्त भी उसी में जाना जाता है और दोनों के बीच की स्थिरता भी उसी में दिखाई देती है। मन, बुद्धि, अहंकार, इन्द्रियाँ और देह अपनी-अपनी क्रिया करते हैं, जबकि उन्हें जानने वाला चित्तत्त्व रूपों से सीमित नहीं होता।
इस दृष्टि से रेचक, पूरक और कुम्भक अलग-अलग क्रियाएँ रहते हुए भी एक ही चैतन्य पर आश्रित हैं। श्वास बाहर जाए तो ध्यान उस जाने को जानता है। भीतर लौटे तो आने की अनुभूति उसी प्रकाश में होती है। क्षण भर स्थिरता आए तो उसका ज्ञान भी उपस्थित है। भुशुण्ड इसी अविच्छिन्न जानने वाली सत्ता की उपासना करते हैं। साँस साधन का निकट द्वार है, साध्य चेतना का परिचय है।
उनकी भाषा में प्राण सूर्य और अपान चन्द्र भी हैं। बाहर जाती उष्णता, भीतर लौटती शीतलता, उदय, अस्त और सन्धि के रूपक इस आन्तरिक आकाश को समझाते हैं। सूर्य के अस्त होने से आकाश मिटता नहीं और चन्द्र के उदय से वह बनता नहीं। उसी तरह गतियों के बदलने पर उन्हें धारण करने वाला चैतन्य बना रहता है। इस स्थिर आधार का अनुभव मन को काल के हर छोटे चक्र में विश्राम देता है।
भुशुण्ड ने बताया कि वे इस ध्यान को अलग साधना-काल में रखकर शेष दिन भूलते नहीं। दीर्घ अभ्यास से प्राण और अपान की गति उनका सतत स्मरण बन गई है। फिर ध्यान श्वास की गणना से आगे बढ़कर उस वर्तमान की स्पष्टता में टिकता है जहाँ शरीर काम कर रहा है और चित्त कर्तृत्व के अभिमान से हल्का है। इसी कारण उनकी समाधि बैठने, चलने, जागने और सोने में खण्डित नहीं होती।
दीर्घजीवन की भीतरी रीति
भुशुण्ड ने अपने दीर्घजीवन के कारणों को गिनाते समय श्वास की उपासना को मन के पूरे संस्कार से जोड़ा। बीते हुए सुख-दुःख को बार-बार दोहराने और आने वाले लाभ-हानि की लगातार कल्पना करने की आदत उनके मन में शान्त हो चुकी है। समय पर जो कर्तव्य सामने आता है, उसका निर्वाह फल की बेचैनी से मुक्त होकर करते हैं। वर्तमान उनके लिए सजग कर्म का स्थान है।
इच्छित वस्तु मिलने और अनिच्छित परिस्थिति आने, दोनों में उनके मन की स्थिरता बनी रहती है। राज्य और विपत्ति, गर्मी और हिम, लकड़ी और पर्वत जैसी बहुत अलग वस्तुओं में वे एक ही चेतना का आधार देखते हैं। व्यवहारिक भेद अपनी उपयोगिता रखते हैं, क्योंकि अग्नि को छूने और हिम में बैठने के परिणाम अलग हैं। भीतर “यह केवल मेरा है” की पकड़ ढीली होने से भेद द्वेष और लालच का ईंधन कम कर देते हैं।
वे अपने और पराए, बन्धु और शत्रु की कठोर दीवार मन में नहीं रखते। शरीर श्वास लेता, चलता, खाता, सोता और उठता है। भुशुण्ड इन क्रियाओं को देखते हैं और शरीर के व्यवहार को आत्मा की सम्पूर्ण सीमा नहीं मानते। देह की देखभाल जारी रहती है। उसकी अवस्था से आत्मसम्मान और अस्तित्व का पूरा निर्णय नहीं बनता। इससे वृद्धावस्था, क्षति और परिवर्तन का अनुभव एक व्यापक दृष्टि में स्थान पाता है।
उन्होंने वसिष्ठ से कहा कि सामर्थ्य होते हुए भी वे दूसरों पर आक्रमण से दूर रहते हैं। कोई उन्हें पीड़ा पहुँचाए तो सहनशीलता से अपनी बुद्धि को बचाते हैं। साधनों की कमी में सन्तोष रखते हैं। सभी प्राणियों में चिदात्मा की समान उपस्थिति देखकर उन्हें अपनी देह के समान आदर देते हैं। अहिंसा, सन्तोष और सीधी दृष्टि उनकी दीर्घजीवन-नीति के अनिवार्य गुण हैं।
अहंकार को उन्होंने देह पर चिपकी कीचड़ की तरह छोड़ दिया है। जो कुछ खाते या करते हैं, उसमें “केवल मैं कर्ता हूँ” का दावा नहीं जोड़ते। ज्ञान आने पर विनय और बढ़ती है। संसार की पुरानी वस्तुएँ टूटती, घिसती और फिर नई दिखाई देती हैं। आत्मदृष्टि से उन्हें देखते हुए भुशुण्ड प्रत्येक क्षण में नवीनता अनुभव करते हैं। इसी कारण उनकी विशाल स्मृति वर्तमान को पुराना नहीं बनाती।
सुखी व्यक्ति को देखकर वे प्रसन्न होते हैं और दुःखी को देखकर उनके भीतर करुणा उठती है। सबके हित की कामना करने से मन शत्रुता के दीर्घ रोग से बचा रहता है। सम्पत्ति के बढ़ने या नष्ट होने पर भी अभिमान का नशा नहीं चढ़ता। ये गुण प्राण की साधना से अलग कोई नैतिक परिशिष्ट नहीं हैं। सजग श्वास और समभाव एक-दूसरे को दृढ़ करते हैं। भीतर की सन्धि पहचानने वाला मन बाहर के सम्बन्धों में भी ठहरकर उत्तर देता है।
इसलिए भुशुण्ड की चिरंजीविता का रहस्य केवल कुम्भक की तकनीक कह देना अधूरा होगा। उनकी पूरी जीवन-पद्धति साथ चलती है: वर्तमान में रहना, प्राप्त कर्म करना, फल का ताप घटाना, स्तुति और निन्दा से दूरी, जीवों के प्रति करुणा, अहंकार से हल्का व्यवहार, प्राण-अपान की सतत सजगता और उनके आधारभूत चैतन्य में विश्राम। नियति ने उन्हें जिस असाधारण अवधि तक देह दी, उस अवधि को इन गुणों ने शान्त और सार्थक बनाया।
मध्याह्न की विदाई
भुशुण्ड का उत्तर समाप्त हुआ तो वसिष्ठ ने कहा कि उनकी प्राण-चिन्ता और दीर्घजीवन की कथा सुनने योग्य कथाओं में भूषण है। उन्होंने अनेक दिशाओं में यात्रा की थी, देवताओं और तत्त्ववेत्ताओं की सम्पदा देखी थी, पर भुशुण्ड जैसी स्थिर प्रज्ञा दुर्लभ लगी। फिर उन्होंने दिन की ओर ध्यान दिया। सप्तर्षि-मण्डल में मध्याह्न के कर्तव्य का समय हो रहा था। उन्होंने पक्षिराज से अपने सुन्दर घोंसले में लौटने की अनुमति माँगी।
भुशुण्ड उठे। संकल्प से बने हाथों में सुवर्ण-पल्लव का पात्र लिया, उसमें कल्पतरु के फूलों के केसर और मोती जैसे उजले जल से अर्घ्य तैयार किया। उन्होंने वसिष्ठ का फिर पूजन किया। वसिष्ठ ने स्नेह से कहा कि उन्हें पीछे आने का श्रम न करें और आकाश की ओर चले। अतिथि को विदा करने की मर्यादा से भुशुण्ड भी साथ उड़ते रहे।
वे एक योजन तक वसिष्ठ के पीछे गए। तब ऋषि ने उनका हाथ थामा और प्रेमपूर्वक रोक दिया। कुछ ही देर में दोनों आकाश के अलग प्रदेशों में एक-दूसरे की दृष्टि से ओझल हो गए। भुशुण्ड अपने घोंसले की ओर लौटे। वसिष्ठ उनका स्मरण करते हुए सप्तर्षि-मण्डल पहुँचे, जहाँ अरुन्धती ने उनका स्वागत किया और दूसरे मुनियों से भेंट हुई। मूल कथा में अरुन्धती की भूमिका इसी संक्षिप्त, सम्मानपूर्ण स्वागत तक रहती है।
वसिष्ठ ने श्रीराम को उस भेंट का समय भी बताया। सत्ययुग के प्रथम दो शतक बीत चुके थे, तब वे पहली बार मेरु के कल्पतरु पर भुशुण्ड से मिले थे। राम को कथा सुनाते समय सत्ययुग समाप्त हो चुका था और त्रेतायुग चल रहा था। फिर वसिष्ठ ने एक और स्पष्ट बात कही: आज से आठ वर्ष पहले वे उसी शिखर पर भुशुण्ड से दोबारा मिले थे। पक्षिराज का रूप तब भी जरा से रहित और पहले जैसा था।
दूसरी भेंट का केवल यह तथ्य दिया गया है। उसके भीतर कोई नया संशय-संवाद, अरुन्धती के निधन की स्मृति या भुशुण्ड के अस्तित्व पर दार्शनिक बहस नहीं जोड़ी गई। पहली विस्तृत मुलाक़ात ही कथा का मुख्य शरीर है। आठ वर्ष पहले हुआ दर्शन वसिष्ठ की गवाही को वर्तमान के निकट लाता है और शातातप की प्राचीन सूचना से चली प्रमाण-श्रृंखला को पूरा करता है।
वसिष्ठ ने राम से कहा कि इस वृत्तान्त को सुनकर भीतर विचार करें और जो उचित समझें उसका अनुष्ठान करें। अगले सर्ग के पहले पाँच पद भुशुण्ड की प्राणोपासना को वसिष्ठ के योग-विवेचन से जोड़ते हैं। उसके बाद राम शरीररूपी घर की उत्पत्ति, स्थिति और निवासी के बारे में नया प्रश्न करते हैं। वहाँ से अगला शिक्षण आरम्भ होता है। पूर्ण हुआ भुशुण्ड-वृत्तान्त उस जिज्ञासा की भूमिका बनता है।