कथा · 07
कौआ भुशुण्ड: युगों का साक्षी
मेरु पर्वत के एक कल्पवृक्ष पर एक कौआ रहता है, जो कई कल्पों से जी रहा है। वसिष्ठ जी ख़ुद उससे मिलने गए। बहुत कुछ पूछा। वो जो जवाब मिले, वो असाधारण थे।
मेरु पर्वत की एक चोटी पर एक कल्पवृक्ष है। उसकी एक डाली पर एक कौआ रहता है। नाम भुशुण्ड। साधारण कौआ नहीं। यह कौआ कई-कई कल्पों से जी रहा है।
इसने पृथ्वी को कई बार डूबते देखा, कई बार उठते देखा। इंद्र को आते-जाते देखा। ब्रह्मा को कई बार सृष्टि नए सिरे से रचते देखा। मनु आए, गए। नदियाँ बनीं, सूख गईं। पहाड़ उठे, बिखरे।
एक दिन वसिष्ठ जी ने सोचा, “इस कौए से मिलना चाहिए। इसकी कथा सुननी चाहिए।” वसिष्ठ जी अपनी योग-शक्ति से उड़े। आकाश में, बादलों के ऊपर। मेरु पर्वत पर पहुँचे। कल्पवृक्ष की डाली पर भुशुण्ड बैठा था।
भुशुण्ड ने वसिष्ठ जी को देखा। पंख थोड़े फैलाए। बोला, “स्वागत है, ऋषिवर। बैठिए।”
वसिष्ठ जी ने प्रणाम किया। एक टहनी पर बैठ गए।
पहला प्रश्न: तुम कैसे जीते हो?
“भुशुण्ड, तुमने इतना समय कैसे बिताया? कोई थकता है, कोई मरता है। तुम कैसे जीते रहे?”
भुशुण्ड हँसा। उसकी हँसी हवा सी थी।
“ऋषिवर, मेरी कहानी छोटी है। मैं सात माताओं की साँस से जन्मा।”
“सात माताएँ?”
“हाँ। सप्तमातृका। सात देवियाँ। उन्होंने एक दिन मिलकर साँस छोड़ी, और उस साँस से मैं पैदा हुआ। वो मेरी माँ हैं। उन्होंने मुझे एक वर दिया।”
“क्या?”
“मैं तब तक जीऊँगा, जब तक मैं अपनी प्राण-धारा को संतुलन में रखूँगा।”
वसिष्ठ जी ने ध्यान से सुना।
“प्राण-धारा कैसी?”
“मैं कुम्भक करता हूँ। साँस को रोकता हूँ। बहुत धीरे से छोड़ता हूँ। और बहुत धीरे से लेता हूँ। मेरी प्राण कहीं नहीं भागती। न इच्छा से उद्वेलित होती है, न भय से सिकुड़ती।
“मनुष्य की साँस इच्छाओं से तेज़ होती है, भय से रुकती है। मेरी साँस इच्छा-रहित है, भय-रहित है। बस बहती है।”
दूसरा प्रश्न: मन?
वसिष्ठ जी ने पूछा, “और मन? मन तो सबसे चंचल है।”
भुशुण्ड ने पंख फिर थोड़े हिलाए।
“मन प्राण के साथ चलता है। दो पहिए हैं एक गाड़ी के। प्राण और मन। एक रुके, तो दूसरा रुक जाए। एक भागे, तो दूसरा भागे।
“मैंने प्राण को थामा। मन अपने आप थम गया।
“मैंने कई इंद्र देखे। कोई गर्व से चूर, कोई भय से कांपते। उनमें से कोई नहीं टिक पाया, क्योंकि उनके मन में लहरें थीं। एक नया युग आता, पुराना इंद्र चला जाता। नया आता, पुराने को भूल जाता।”
कल्पों के स्मरण
“भुशुण्ड, तुमने जो देखा है, वो मुझे बताओ। एक-दो कल्पों की कथा सुनाओ।”
भुशुण्ड ने आँखें मूँदीं। फिर खोलीं।
“एक कल्प में मनुष्य लंबे होते थे। बहुत लंबे – बीस फुट तक। उनकी आयु भी लंबी थी, हज़ारों साल। वो धीरे चलते थे, धीरे बोलते थे। पृथ्वी पर हरियाली ही हरियाली थी। सूखा कभी नहीं होता था।
“दूसरे कल्प में उल्टा था। मनुष्य बौने थे, बच्चे जैसे। आयु छोटी, मुश्किल से सौ साल। मगर वो बहुत तेज़ थे। एक दिन में बहुत कुछ कर लेते।
“एक कल्प में देवता पृथ्वी पर आते-जाते थे। मनुष्यों के साथ बैठते, बातें करते। मनुष्य उन्हें देख सकते थे। दूसरे कल्प में आसमान बंद हो गया। न देवता दिखते, न उतरते।
“एक कल्प में अनाज खूब उगता था, मेहनत नहीं करनी पड़ती। दूसरे में मनुष्य भूख से मरते थे, फसल मुश्किल से होती।
“हर कल्प अपने भीतर पूरा है। हर कल्प अपने को अंतिम मानता है। मगर कोई अंतिम नहीं है। चक्र चलता रहता है।”
वसिष्ठ जी ने पूछा, “और तुम?”
“मैं देखता रहता हूँ। न रोता हूँ, न हँसता हूँ। बस देखता हूँ।”
अकेलापन?
“तुम्हें अकेलापन नहीं लगता? इतना समय अकेले?”
भुशुण्ड ने सिर हिलाया।
“नहीं। पेड़ मेरा साथी है। हवा मेरी साथी है। मेरी अपनी प्राण मेरी साथी है। और जब-तब आप जैसे ऋषि आ जाते हैं।
“असली अकेलापन तब होता है जब अपने ही साथ नहीं हो। मैं अपने साथ हूँ। तो अकेला कैसे?”
वसिष्ठ जी कुछ देर चुप रहे।
मृत्यु का भय?
“तुम्हें कभी मृत्यु से डर लगता है?”
“नहीं। क्योंकि मैं देह नहीं हूँ। यह कौए की देह जब चाहेगी, गिर जाएगी। मैं नहीं गिरूँगा।
“मैंने अपनी पुरानी देहें भी देखी हैं। यह कौए वाली देह मेरी पहली नहीं। पहले मैं और कुछ था। उससे पहले और कुछ। हर देह बस एक रहने का घर थी। घर बदलते रहते हैं, रहने वाला वही रहता है।”
“तुम्हें अपनी पिछली देहें याद हैं?”
“हाँ। ध्यान करूँ तो दिखती हैं। मगर मैं ज़्यादा देखता नहीं हूँ। बेकार है। जो है वो है।”
सबसे बड़ी सीख
वसिष्ठ जी ने आख़िर पूछा, “भुशुण्ड, तुम्हारी इतनी लंबी आयु से एक सीख तो होगी। मेरे लिए क्या?”
भुशुण्ड कुछ देर चुप। फिर बोला।
“एक बात। दीर्घ जीवन का रहस्य लंबाई में नहीं है। शांति में है। एक मनुष्य भी अगर मन को थाम ले, तो उसका एक दिन भी मेरा एक कल्प से अधिक हो सकता है।
“मेरे कल्प मेरे लिए जल्दी बीत जाते हैं। क्योंकि मेरा मन शांत है। शांत मन के लिए समय छोटा है।
“उद्वेलित मन के लिए एक रात पूरी रात लंबी होती है। शांत मन के लिए एक कल्प भी एक रात की तरह।
“असली बात लंबाई की नहीं। गहराई की है।
“और दूसरी बात – साँस। साँस को थाम लो, मन थम जाएगा। मन थमा, तो सब थम गया। प्राणायाम सबसे सीधा रास्ता है।”
वसिष्ठ जी ने उठकर भुशुण्ड को प्रणाम किया।
“भुशुण्ड, मैं तुम्हें भूलूँगा नहीं।”
“मैं भी आपको नहीं। आगे फिर मिलेंगे, किसी और कल्प में।”
वसिष्ठ जी उड़े। मेरु पर्वत से नीचे। फिर अपने आश्रम तक।
राम को यह कथा सुनाते हुए वसिष्ठ जी बोले, “हे राजकुमार, समय की लंबाई नहीं, मन की गहराई मायने रखती है। एक भुशुण्ड हम सबके भीतर है। वो हिस्सा जो कभी मरता नहीं, बस देखता रहता है।
“और प्राणायाम बहुत बड़ा रास्ता है। साधारण लगता है, मगर इसमें सब भरा है। जो प्राण को साध ले, वो मन को भी साध लेता है।”
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