गणपति-अथर्वशीर्ष
अथर्व-वेद की उपनिषद् · गणेश का formal vedic-text · 10 sections + opening और closing शान्ति-पाठ
🟢 पूरा , सभी 14 sections, हर एक का पाँच-block treatment (शब्दार्थ, अर्थ, भावार्थ, संगति)। verified Sanskrit sanskritdocuments.org से।
पहले एक बात
Ganapati Atharvashirsha एक छोटी सी text है, मगर इसकी weight बड़ी है। यह सिर्फ़ एक “स्तुति” नहीं, यह एक उपनिषद् है, यानी इसके पीछे पूरे Atharva-Veda की authority खड़ी है।
दिल्ली के घरों में अक्सर सुबह सुना जाता है, special occasions पर, और Ganesh-Chaturthi के समय। 10-15 मिनट का पाठ है, मगर अगर साथ-साथ अर्थ समझ कर पढ़ें, तो यह एक complete Vedic mini-meditation बन जाती है।
हम यहाँ हर section को धीरे-धीरे खोलेंगे। पहले मूल देवनागरी, फिर IAST transliteration (जो pronounce करने में help करता है), फिर शब्दार्थ, अर्थ, भावार्थ, और संगति।
एक बात clear करते हैं शुरू में: यह text Ganesh को कोई “देवता” नहीं कह रही है। यह कह रही है कि Ganesh वो ब्रह्म ही है, जो सब-कुछ है। यह Vedanta-statement है, बाद में bhakti-tradition में Ganesh-iconography बनी।
इसे कैसे पढ़ें
एक approach: एक सिटिंग में पूरा पढ़ें, थोड़ा रुक-रुक कर, 30 मिनट का अनुभव।
दूसरा approach: एक दिन में एक section, 10 sections पर 10 दिन। हर section पर 10 मिनट। यह slow-reading approach है।
तीसरा approach: सिर्फ़ devanagari को बार-बार read करें, बिना अर्थ देखे। Mantra-quality पकड़ने का यह तरीक़ा है। फिर एक दिन अर्थ देख कर वापस आएँ।
दिल्ली में बहुत-से लोग Ganesh-Chaturthi पर 11 दिन रोज़ एक बार path करते हैं। यह एक specific practice है।
शुरुआत की प्रार्थना
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः ।
व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः । शान्तिः ॥ शान्तिः ॥
bhadraṃ paśyemākṣabhiryajatrāḥ ||
sthirairaṅgaistuṣṭuvāṃsastanūbhiḥ |
vyaśema devahitaṃ yadāyuḥ ||
svasti na indro vṛddhaśravāḥ |
svasti naḥ pūṣā viśvavedāḥ ||
svastinastārkṣyo ariṣṭanemiḥ |
svasti no bṛhaspatirdadhātu ||
oṃ śāntiḥ | śāntiḥ || śāntiḥ ||
भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम , “कानों से शुभ सुनें।” अक्षभि , “आँखों से।” स्थिर अङ्ग , “मज़बूत अंगों से।” व्यशेम , “बिता पाएँ।” इन्द्र, पूषा, तार्क्ष्य (गरुड़), बृहस्पति , चार वैदिक देवता।
देवताओं, हम कानों से शुभ सुनें। आँखों से शुभ देखें। मज़बूत शरीर और settled अंगों से, हम वो आयु बिताएँ जो देवताओं को प्रिय हो। इन्द्र, पूषा, गरुड़ और बृहस्पति, सब हमारा कल्याण करें। शान्ति, शान्ति, शान्ति।
यह अथर्व-वेद की हर उपनिषद् का opening template है। पढ़ने से पहले कानों-आँखों-शरीर सब को settle कर लें, और चार वैदिक देवताओं की अनुमति लें। यह “मैं अकेले पढ़ रहा हूँ” नहीं, “पूरी परंपरा के साथ बैठ रहा हूँ” वाला gesture है। दिल्ली के कीर्तन-समूह में जब सब एक साथ शुरू में “ॐ शान्ति” बोलते हैं, यही energy create होती है।
शान्ति-पाठ Atharva-Veda की specific style है, “भद्रं कर्णेभिः” वाली पंक्ति। यही पंक्ति Mundaka, Mandukya और Prashna Upanishads में भी आती है। तीनों Atharva से हैं, इसलिए shared opening।
गणपति-तत्त्व, “तू ही ब्रह्म है”
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि ॥
त्वमेव केवलं कर्ताऽसि ॥
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि ॥
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि ॥
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि ॥
त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम् ॥ १ ॥
tvameva pratyakṣaṃ tattvamasi ||
tvameva kevalaṃ kartā’si ||
tvameva kevalaṃ dhartā’si ||
tvameva kevalaṃ hartā’si ||
tvameva sarvaṃ khalvidaṃ brahmāsi ||
tvaṃ sākṣādātmā’si nityam || 1 ||
त्वमेव , “तू ही।” प्रत्यक्षं तत्त्वम् , “सामने का तत्त्व।” कर्ता , “बनाने वाला।” धर्ता , “धारण करने वाला।” हर्ता , “हरने वाला।” सर्वं खल्विदं ब्रह्म , “यह सब निश्चय ही ब्रह्म।” साक्षात् , “सीधा-सीधा।”
हरि, ॐ। गणपति, तुझे नमन। तू ही प्रत्यक्ष-तत्त्व है। तू ही अकेला कर्ता है, तू ही धर्ता, तू ही हर्ता। यह सब कुछ निश्चय ही ब्रह्म है, और तू वही है। तू सीधा-सीधा ही नित्य आत्मा है।
पहली ही पंक्ति में Vedanta का central claim है, “तत्त्वमसि” का echo। गणेश को “वो ब्रह्म” कह कर बैठा देना। यह कोई “Ganesh एक देवता हैं” वाला statement नहीं, यह “Ganesh = परम-वास्तविकता” वाला statement है। तीन रूप, कर्ता-धर्ता-हर्ता, यानी ब्रह्मा-विष्णु-शिव की trinity एक ही entity में reside करती है।
“सर्वं खल्विदं ब्रह्म” Chandogya Upanishad की declaration है, यहाँ verbatim quote की गई है। यानी Ganesha Atharvashirsha अकेली खड़ी text नहीं, यह पूरी Vedic-Upanishadic tradition के साथ aligned है।
ऋत और सत्य
ऋतं , “cosmic-order, the right.” सत्यं , “truth, what is.” वच्मि , “मैं बोलता हूँ।”
“मैं ऋत बोलता हूँ। मैं सत्य बोलता हूँ।”
दो शब्द, मगर पूरी declaration। ऋत और सत्य दोनों एक नहीं हैं, वैदिक परंपरा में अलग हैं। ऋत यानी cosmic-order, the way things should be। सत्य यानी what actually is, the way things are। एक ideal है, एक factual। यह छोटी सी पंक्ति कह रही है, “अब आगे जो भी कहूँगा, वो दोनों के साथ aligned होगा।”
दिल्ली के पुराने वकील-judges की एक tradition है, अदालत में बोलने से पहले एक quiet pause। ऋत और सत्य दोनों को honour करने का यह exact verbal-version है। बहुत compressed, मगर बहुत powerful।
सुरक्षा-याचना, हर दिशा से
अव दातारम् ॥ अव धातारम् ॥
अवानूचानमव शिष्यम् ॥
अव पश्चात्तात् ॥ अव पुरस्तात् ॥
अवोत्तरात्तात् ॥ अव दक्षिणात्तात् ॥
अव चोर्ध्वात्तात् ॥ अवाधरात्तात् ॥
सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात् ॥ ३ ॥
ava dātāram || ava dhātāram ||
avānūcānamava śiṣyam ||
ava paścāttāt || ava purastāt ||
avottarāttāt || ava dakṣiṇāttāt ||
ava cordhvāttāt || avādharāttāt ||
sarvato māṃ pāhi pāhi samantāt || 3 ||
अव , “रक्षा कर।” वक्तारम् , “बोलने वाले को।” श्रोतारम् , “सुनने वाले को।” दातारम् , “देने वाले को।” धातारम् , “धारण करने वाले को।” अनूचान , “विद्वान्, गुरु।” शिष्यम् , “शिष्य को।” पश्चात्/पुरस्त्/उत्तर/दक्षिण/ऊर्ध्व/अधर , “पीछे/आगे/उत्तर/दक्षिण/ऊपर/नीचे।” समन्तात् , “हर ओर से।”
मेरी रक्षा कर। बोलने वाले की रक्षा कर, सुनने वाले की भी। देने वाले की, धारण करने वाले की। गुरु की और शिष्य की भी। पीछे से, आगे से, उत्तर से, दक्षिण से, ऊपर से, नीचे से, हर तरफ़ से। हर ओर से मेरी रक्षा कर, बार-बार रक्षा कर।
यह पूरा paragraph एक complete-circle की protection-prayer है। बारह बार “अव” repeat होता है, हर बार थोड़ा-थोड़ा अलग angle से। यह repetition एक specific rhythm बनाता है जो mantra-quality carry करता है। दिल्ली के घरों में जब बच्चे को कोई important काम के लिए भेजा जाता है, माँ की प्रार्थना भी कुछ ऐसी ही होती है, “सब तरफ़ से ख़याल रख”। यह उसी की formal Vedic version है।
जो छह दिशाओं की list है, वो Vedic-cosmology में standard है, “षड्-दिशाएँ”। दिल्ली के पुराने मंदिरों में सूर्य-दिशाओं पर ध्यान दे कर ही नक्शा बनता था। यह geographic-orientation भी spiritual-orientation थी।
पाँच-स्तर का गणपति
त्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः ॥
त्वं सच्चिदानन्दाद्वितीयोऽसि ॥
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ॥
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ॥ ४ ॥
tvamānandamayastvaṃ brahmamayaḥ ||
tvaṃ saccidānandādvitīyo’si ||
tvaṃ pratyakṣaṃ brahmāsi ||
tvaṃ jñānamayo vijñānamayo’si || 4 ||
वाङ्मय , “वाणी-मय।” चिन्मय , “चेतना-मय।” आनन्दमय , “आनन्द-मय।” ब्रह्ममय , “ब्रह्म-मय।” सच्चिदानन्द-अद्वितीय , “सत्-चित्-आनन्द, बिना दूसरे।” ज्ञानमय/विज्ञानमय , “ज्ञान-मय और विज्ञान-मय।”
तू वाणी-मय है, तू चेतना-मय। तू आनन्द-मय, तू ब्रह्म-मय। तू सच्-चित्-आनन्द है, अद्वितीय। तू प्रत्यक्ष ब्रह्म है। तू ज्ञान-मय भी है, विज्ञान-मय भी।
पाँच कोश का formal mapping। Taittiriya Upanishad में अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय की list है। यहाँ ठीक उसी framework में Ganesh को रखा गया है। मगर एक upgrade है, “सच्चिदानन्द-अद्वितीय” वाला statement। यानी Ganesh सिर्फ़ कोश-mapping नहीं, बल्कि वो underlying एकता है जो सब कोशों को carry करती है।
पाँच-कोश-model के लिए तैत्तिरीय उपनिषद् देखें। राम-गीता खण्ड 3 भी इसी पर बैठती है। यह Ganesh Atharvashirsha उन सब का echo है, मगर एक specific देवता पर centered।
सृष्टि, स्थिति, लय, सब तू
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति ॥
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति ॥
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति ॥
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः ॥
त्वं चत्वारि वाक्पदानि ॥ ५ ॥
sarvaṃ jagadidaṃ tvattastiṣṭhati ||
sarvaṃ jagadidaṃ tvayi layameṣyati ||
sarvaṃ jagadidaṃ tvayi pratyeti ||
tvaṃ bhūmirāpo’nalo’nilo nabhaḥ ||
tvaṃ catvāri vākpadāni || 5 ||
सर्वं जगदिदं , “यह पूरा जगत।” त्वत्तः जायते , “तुझ से जन्मा।” त्वत्तः तिष्ठति , “तुझ से ठहरा।” त्वयि लयम् एष्यति , “तुझ में लय होगा।” त्वयि प्रत्येति , “तुझ में लौटेगा।” भूमि/आपः/अनल/अनिल/नभः , “पृथ्वी/जल/अग्नि/वायु/आकाश, पाँच भूत।” चत्वारि वाक्पदानि , “वाणी के चार स्तर।”
यह पूरा जगत तुझ से जन्मा है, तुझ से ही टिका है, तुझ में ही लय होगा, और तुझ में ही लौट कर आ जाएगा। तू ही पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, और आकाश। तू ही वाणी के चार स्तर।
यहाँ “चत्वारि वाक्पदानि” का reference है, जो ऋग्वेद में आता है, “परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी”। पराviqsi वाणी का सूक्ष्मतम स्तर, वैखरी सब से स्थूल (बोला हुआ शब्द)। यह कह कर पूरी language को Ganesh पर map कर दिया गया है। और पाँच-भूत (पञ्च-महाभूत) भी उन्हीं में, यानी सब creation के building-blocks। यह Vedanta के “अद्वैत” claim का concrete-version है।
सर्ग-स्थिति-लय की trinity Bhagavad Gita अध्याय 7 में भी आती है। दिल्ली के engineering-students जो “lifecycle-of-product” समझते हैं, उन्हें यह concept बहुत easily resonate करता है। हर एक चीज़ का create-maintain-dissolve cycle, और सब एक underlying source से।
गुण-अवस्था-काल से परे
त्वं देहत्रयातीतः ॥ त्वं कालत्रयातीतः ॥
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम् ॥
त्वं शक्तित्रयात्मकः ॥
त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम् ॥
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वं इन्द्रस्त्वं अग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुवःस्वरोम् ॥ ६ ॥
tvaṃ dehatrayātītaḥ || tvaṃ kālatrayātītaḥ ||
tvaṃ mūlādhārasthito’si nityam ||
tvaṃ śaktitrayātmakaḥ ||
tvāṃ yogino dhyāyanti nityam ||
tvaṃ brahmā tvaṃ viṣṇustvaṃ rudrastvaṃ indrastvaṃ
agnistvaṃ vāyustvaṃ sūryastvaṃ candramāstvaṃ
brahmabhūrbhuvaḥsvaroṃ || 6 ||
गुणत्रय , “तीन गुण (सत्त्व, रजस्, तमस्)।” अवस्थात्रय , “तीन अवस्थाएँ (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति)।” देहत्रय , “तीन देह (स्थूल, सूक्ष्म, कारण)।” कालत्रय , “तीन काल (भूत, वर्तमान, भविष्य)।” अतीत , “के पार।” मूलाधार , “रीढ़ की हड्डी के बेस का चक्र।” शक्तित्रय , “तीन शक्तियाँ (इच्छा, ज्ञान, क्रिया)।”
तू तीनों गुणों से परे, तीनों अवस्थाओं से परे, तीनों देहों से परे, तीनों कालों से परे। तू नित्य मूलाधार-चक्र में स्थित है। तू तीनों शक्तियों का स्वरूप है। योगी तेरा निरंतर ध्यान करते हैं। तू ही ब्रह्मा, तू ही विष्णु, तू ही रुद्र, तू ही इन्द्र, अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्रमा। तू ही “भूर्भुवःस्वः” (तीन लोक) और ॐ।
यह section पूरे ग्रंथ का heart है। पहले “क्या-क्या से परे” का listing है, तीन गुण, तीन अवस्थाएँ, तीन देह, तीन काल। फिर एक specific anatomical reference, मूलाधार-चक्र, यानी कुण्डलिनी-योग का grounding-point। फिर सब वैदिक देवताओं का list, “तू ही ब्रह्मा, तू ही विष्णु, तू ही रुद्र”। यह radical statement है। हर देवता एक specific aspect है, और सब एक ही entity के facets हैं।
गुणत्रय की formal discussion Bhagavad Gita अध्याय 14 में है। योगी-ध्यान का reference Patanjali Yoga Sutras पाद 1 में। मूलाधार-कुण्डलिनी का foundation Sri-Vidya और Saundarya Lahari से जुड़ा है। यह एक छोटी सी पंक्ति इन सब को एक frame में बाँध देती है।
गणेश-मन्त्र: “ॐ गं”
अनुस्वारः परतरः ॥ अर्धेन्दुलसितम् ॥ तारेण ऋद्धम् ॥
एतत्तव मनुस्वरूपम् ॥
गकारः पूर्वरूपम् ॥ अकारो मध्यमरूपम् ॥
अनुस्वारश्चान्त्यरूपम् ॥ बिन्दुरुत्तररूपम् ॥
नादः सन्धानम् ॥ संहिता सन्धिः ॥
सैषा गणेशविद्या ॥
गणकऋषिः ॥ निचृद्गायत्रीच्छन्दः ॥
गणपतिर्देवता ॥
ॐ गं गणपतये नमः ॥ ७ ॥
anusvāraḥ parataraḥ || ardhendulasitam || tāreṇa ṛddham ||
etattava manusvarūpam ||
gakāraḥ pūrvarūpam || akāro madhyamarūpam ||
anusvāraścāntyarūpam || bindurūttararūpam ||
nādaḥ sandhānam || saṃhitā sandhiḥ ||
saiṣā gaṇeśavidyā ||
gaṇakaṛṣiḥ || nicṛdgāyatrīcchandaḥ ||
gaṇapatirdevatā ||
oṃ gaṃ gaṇapataye namaḥ || 7 ||
गणादिम् , “गण-शब्द का पहला अक्षर, यानी ‘ग’।” वर्णादिम् , “वर्ण-माला का पहला अक्षर, यानी ‘अ’।” अनुस्वार , “ं।” अर्धेन्दु , “आधा-चाँद, यानी ◌्।” तारेण , “तार-स्वर (ॐ) से।” ऋद्धम् , “fortified।” मनुस्वरूपम् , “मन्त्र-स्वरूप।” बिन्दु , “dot।” नादः , “vibration।” गणकऋषिः , “Ganaka ऋषि।” निचृद्गायत्री , “एक specific chandas।”
पहले “ग” बोलें, फिर “अ”। फिर अनुस्वार लगाएँ (ं)। ऊपर आधा-चाँद हो, और तार-स्वर (ॐ) के साथ fortified। यह तेरा मन्त्र-स्वरूप है, “ॐ गं”। “ग” पहला हिस्सा, “अ” बीच का, “ं” आख़िरी, और bindu top-form। नाद ही sandhāna है, और संहिता ही sandhi। यही गणेश-विद्या है। ऋषि गणक, छन्द निचृद्-गायत्री, देवता गणपति। ॐ गं गणपतये नमः।
पूरा section एक mantra-anatomy lesson है। “ॐ गं” का हर component अलग-अलग explain किया गया है। यह specific है, क्योंकि Vedic mantra-practice में हर syllable का अपना weight है। एक mantra के सिर्फ़ शब्द matter नहीं करते, उसकी pronunciation, उसका rhythm, उसका context, सब। दिल्ली के Ganesh-Chaturthi-festivals पर जो मन्त्र पाठ होता है, यह उसी का formal-text है।
दिल्ली के South-Indian Ganesh-temples में रोज़ “ॐ गं गणपतये नमः” के साथ pooja शुरू होती है। यह 108 बार जपा जाता है common practice में। यह छोटा मन्त्र पूरा “Bhakti without dogma” framework में बैठता है, simple, repeatable, accessible।
गणेश-गायत्री
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात् ॥ ८ ॥
tanno dantiḥ pracodayāt || 8 ||
एकदन्ताय , “एक-दाँत वाले को।” विद्महे , “हम जानें।” वक्रतुण्डाय , “टेढ़ी-सूँड वाले को।” धीमहि , “हम ध्यान करें।” तन् नो दन्तिः प्रचोदयात् , “वो दाँत-वाला (Ganesh) हमें प्रेरित करे।”
एक-दाँत वाले को हम जानें, टेढ़ी-सूँड वाले का हम ध्यान करें। वो “दन्ती” हमें प्रेरित करे।
गायत्री-छन्द में Ganesh-version। यह “जान-ध्यान-प्रेरणा” का तीन-step structure carry करता है, जो हर Vedic-गायत्री में होता है। एकदन्त (Ganesh का एक टूटा हुआ दाँत) और वक्र-तुण्ड (curved trunk) उनके distinctive features हैं, और दोनों एक specific symbolism carry करते हैं, टूटा-दाँत यानी sacrifice (Mahabharata लिखने के लिए दाँत तोड़ कर pen बनाया), टेढ़ी-सूँड यानी non-linear path।
गायत्री-मन्त्र Rig-Veda का सबसे famous है। उसी template पर Ganesh, Surya, Durga, हर देवता का गायत्री बनी है। यह “गायत्री-समूह” Vedic practice का heart है। दिल्ली के gurukulas में बच्चे यही गायत्री पहले सीखते हैं।
गणेश का ध्यान-रूप
रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम् ॥
रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम् ॥
रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पैः सुपूजितम् ॥
भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम् ॥
आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम् ॥
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः ॥ ९ ॥
radaṃ ca varadaṃ hastairbibhrāṇaṃ mūṣakadhvajam ||
raktaṃ lambodaraṃ śūrpakarṇakaṃ raktavāsasam ||
raktagandhānuliptāṅgaṃ raktapuṣpaiḥ supūjitam ||
bhaktānukampinaṃ devaṃ jagatkāraṇamacyutam ||
āvirbhūtaṃ ca sṛṣṭyādau prakṛteḥ puruṣātparam ||
evaṃ dhyāyati yo nityaṃ sa yogī yogināṃ varaḥ || 9 ||
एकदन्त/चतुर्हस्त , “एक-दाँत, चार-हाथ।” पाश/अङ्कुश , “lasso, goad।” रद , “tusk।” वरद , “आशीर्वाद देने वाला।” मूषकध्वज , “चूहे की ध्वजा।” रक्त , “लाल।” लम्बोदर , “बड़ा पेट।” शूर्पकर्ण , “सूप-जैसे कान।” आविर्भूत , “manifested।”
एक-दाँत, चार-हाथ, हाथों में पाश और अंकुश, दाँत, और आशीर्वाद-मुद्रा। चूहे की ध्वजा। लाल रंग का, बड़े पेट वाला, सूप-जैसे कान वाला, लाल वस्त्र पहने। लाल चन्दन लगा, लाल पुष्पों से पूजित। भक्तों पर कृपा करने वाला, जगत् का कारण, अच्युत। सृष्टि के आदि में manifested, प्रकृति और पुरुष से परे। जो इस रूप का नित्य ध्यान करे, वह योगियों में श्रेष्ठ योगी है।
यहाँ Ganesh का पूरा iconographic-description आता है, जो हर पूजा-ग्रंथ में reference है। हर detail का अर्थ है, चार हाथ = चारों लक्ष्य (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष), पाश = बंधन (जो हम काट देंगे), अंकुश = guide-stick। लाल रंग = प्रकृति-शक्ति। चूहा = ego (Ganesh ego पर बैठ कर ride करता है, सवारी करता है ego की, victim नहीं)।
यह ध्यान-रूप traditional Hindu-iconography में standard है। दिल्ली के Connaught Place में 2-3 prominent Ganesh-मूर्ति-दुकानें हैं, हर मूर्ति इसी template पर बनती है। मूर्तिकार generations से यही specs follow कर रहे हैं।
गणपति के आठ नाम
नमः प्रमथपतये ।
नमस्तेऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय ।
विघ्ननाशिने शिवसुताय ।
श्रीवरदमूर्तये नमो नमः ॥ १० ॥
namaḥ pramathapataye |
namaste’stu lambodarāyaikadantāya |
vighnanāśine śivasutāya |
śrīvaradamūrtaye namo namaḥ || 10 ||
व्रातपति , “व्रत-समूह का पति।” गणपति , “गण-समूह का पति।” प्रमथपति , “शिव-गण प्रमथों का पति।” लम्बोदर , “बड़े पेट वाला।” एकदन्त , “एक-दाँत।” विघ्ननाशी , “विघ्न नाश करने वाला।” शिवसुत , “शिव का पुत्र।” वरदमूर्ति , “आशीर्वाद-स्वरूप।”
व्रात-पति को नमन। गण-पति को नमन। प्रमथ-पति को नमन। लम्बोदर, एकदन्त को नमस्कार। विघ्न-नाश करने वाले, शिव-पुत्र को। श्री-वरद-मूर्ति को बार-बार नमन।
आठ नाम मगर हर एक अलग angle से। व्रात-पति = सब religious practices का head। गण-पति = सब समूहों का head, यानी community-leader। प्रमथ-पति = शिव-गणों के head। लम्बोदर = वो जो बड़ी capacity carry करता है। एकदन्त = sacrifice का symbol। विघ्न-नाशी = obstacle-remover। शिव-सुत = origin clear। श्री-वरद-मूर्ति = grace का embodiment। यह नाम-list ritual recitation के लिए designed है।
दिल्ली के Ganesh-temples में रोज़ सुबह यह आठ नाम पढ़े जाते हैं अष्टोत्तर-नाम-पूजा में। 108 नाम-collection भी इन्हीं eight से शुरू होती है। यह simple, accessible, repeatable practice है।
फलश्रुति, पाठ का फल
स सर्वतः सुखमेधते ॥ स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते ॥
स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते ॥
सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति ॥
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति ॥
सायं-प्रातः प्रयुञ्जानो अपापो भवति ॥
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति ॥
धर्मार्थकाममोक्षं च विन्दति ॥
इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम् ॥
यो यदि मोहाद्दास्यति स पापीयान् भवति ।
सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत् ॥ ११ ॥
sa sarvataḥ sukhamedhate || sa sarvavighnairna bādhyate ||
sa pañcamahāpāpātpramucyate ||
sāyamadhīyāno divasakṛtaṃ pāpaṃ nāśayati ||
prātaradhīyāno rātrikṛtaṃ pāpaṃ nāśayati ||
sāyaṃ-prātaḥ prayuñjāno apāpo bhavati ||
sarvatrādhīyāno’pavighno bhavati ||
dharmārthakāmamokṣaṃ ca vindati ||
idamatharvaśīrṣamaśiṣyāya na deyam ||
yo yadi mohāddāsyati sa pāpīyān bhavati ||
sahasrāvartanāt yaṃ yaṃ kāmamadhīte taṃ tamanena sādhayet || 11 ||
अधीते , “जो पढ़े।” ब्रह्मभूय , “ब्रह्म-स्थिति।” कल्पते , “योग्य होता है।” सायम्/प्रातर् , “शाम/सुबह।” अपाप , “बिना पाप।” विन्दति , “पाता है।” अशिष्याय न देयम् , “अशिष्य को न दें।” सहस्रावर्तन , “हज़ार बार।”
जो इस अथर्वशीर्ष को पढ़ता है, वो ब्रह्म-स्थिति का योग्य होता है। हर तरफ़ से सुख बढ़ता है, सब विघ्न नहीं बाँधते। पाँच महा-पापों से मुक्त होता है। शाम को पढ़ने से दिन का पाप नाश। सुबह को पढ़ने से रात का पाप नाश। दोनों समय करने से अपाप। हर जगह पढ़ने से अविघ्न। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष चारों पाता है। यह अथर्वशीर्ष अशिष्य को न दें। जो मोह में दे, वो पापी होगा। हज़ार बार आवृत्ति से जो भी इच्छा हो, वो पूरी होती है।
फलश्रुति यानी “क्या मिलेगा”। हर Vedic-text में इस तरह का section होता है, जो पाठक को motivate करता है। मगर इसमें ध्यान देने की बात है, “अशिष्य को न दें” , यह gate-keeping नहीं, यह warning है। एक mantra-text जिसका दुरुपयोग हो सकता है, उसका context-without-foundation transmission useless है। आज के तुरंत-मिले YouTube-mantra-tutorials इस warning को मानते नहीं, मगर tradition में यह respected थी।
फलश्रुति का format Vedic-text की एक standard feature है। Bhagavad Gita के अध्याय 18 में भी “जो यह पढ़ेगा” वाला passage है। यह pattern repeating है।
विशेष-प्रयोग और समाप्ति
चतुर्थ्यामनश्नन् जपति स विद्यावान् भवति ।
स यशोवान् भवति ॥ इत्यथर्वणवाक्यम् ॥
ब्रह्माद्यावरणं विद्यात् न बिभेति कदाचनेति ॥ १२ ॥
यो दूर्वाङ्कुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति ॥
यो लाजैर्यजति स यशोवान् भवति ॥
स मेधावान् भवति ॥
यो मोदकसहस्रेण यजति स वाञ्छितफलमवाप्नोति ॥
यः साज्यसमिद्भिर्यजति स सर्वं लभते स सर्वं लभते ॥ १३ ॥
अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति ॥
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासन्निधौ वा जप्त्वा सिद्धमन्त्रो भवति ॥
महाविघ्नात्प्रमुच्यते ॥ महादोषात्प्रमुच्यते ॥ महापापात् प्रमुच्यते ॥
स सर्वविद्भवति स सर्वविद्भवति ॥
य एवं वेद इत्युपनिषत् ॥ १४ ॥
caturthyāmanaśnan japati sa vidyāvān bhavati ||
sa yaśovān bhavati || ityatharvaṇavākyam ||
brahmādyāvaraṇaṃ vidyāt na bibheti kadācaneti || 12 ||
yo dūrvāṅkurairyajati sa vaiśravaṇopamo bhavati ||
yo lājairyajati sa yaśovān bhavati ||
sa medhāvān bhavati ||
yo modakasahasreṇa yajati sa vāñchitaphalamavāpnoti ||
yaḥ sājyasamidbhiryajati sa sarvaṃ labhate sa sarvaṃ labhate || 13 ||
aṣṭau brāhmaṇān samyaggrāhayitvā sūryavarcasvī bhavati ||
sūryagrahe mahānadyāṃ pratimāsannidhau vā japtvā siddhamantro bhavati ||
mahāvighnātpramucyate || mahādoṣātpramucyate || mahāpāpāt pramucyate ||
sa sarvavidbhavati sa sarvavidbhavati ||
ya evaṃ veda ityupaniṣat || 14 ||
अभिषिञ्चति , “अभिषेक करे।” वाग्मी , “वाणी का स्वामी।” चतुर्थी , “चतुर्थी तिथि।” अनश्नन् , “बिना खाए।” दूर्वाङ्कुर , “दूब-घास का अंकुर।” वैश्रवण , “कुबेर।” लाज , “खील।” मोदक , “लड्डू।” साज्य , “घी सहित।” समिध् , “हवन-समिधा।” सूर्यग्रह , “सूर्य-ग्रहण।” सिद्धमन्त्र , “मन्त्र जो सिद्ध हो गया।”
इसके द्वारा गणपति का अभिषेक करे, वो वाणी का स्वामी होता है। चतुर्थी को बिना खाए जपे, वो विद्यावान और यशस्वी होता है। यह अथर्वण-वचन है। ब्रह्मा से ले कर सब आवरणों को जाने, कभी डर नहीं होता।
जो दूर्वा-अंकुरों से पूजे, कुबेर-समान धनवान। जो खीलों से पूजे, यशस्वी। मेधावी। जो हज़ार लड्डुओं से पूजे, इच्छित फल पाता है। जो घी और समिधा से पूजे, वो सब पाता है, सब पाता है।
आठ ब्राह्मणों को अच्छे से ग्रहण करवा कर, सूर्य-वर्चस्वी होता है। सूर्य-ग्रहण में महा-नदी पर, या मूर्ति के पास, जप कर सिद्ध-मन्त्र होता है। महा-विघ्न, महा-दोष, महा-पाप से मुक्त होता है। वो सर्वज्ञ होता है, सर्वज्ञ होता है। जो ऐसा जानता है, यह उपनिषत् है।
अंतिम तीन sections में specific ritual-prescriptions हैं। हर एक offering का अपना फल है, दूर्वा से समृद्धि, लड्डू से इच्छा-पूर्ति, घी-समिधा से सब-कुछ। आज के दिल्ली में यह सब practices Ganesh-Chaturthi (अगस्त-सितंबर) पर के घरों और pandals में देखे जा सकते हैं। मोदक offered करना, दूर्वा-घास से पूजा करना, खील चढ़ाना, सब इसी text-tradition से आया हुआ है। “सूर्य-ग्रहण” वाला reference बहुत specific है, ग्रहण-काल में जप का specific spiritual-power माना जाता है।
दिल्ली के Vaishno Devi temple में Ganesh-Chaturthi का बड़ा celebration होता है। Lalbaug-cha-Raja (Mumbai-style) Pandal भी Delhi-Lajpat-Nagar में स्थापित होता है। 1.5 दिन से 11 दिन तक यह पूजा चलती है। यह सब ritual-tradition इस text से directly inherited है, बिना break के।
अंतिम शान्ति-पाठ
सह वीर्यं करवावहै ॥
तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ॥
ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा ।
भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः ।
व्यशेम देवहितं यदायुः ॥
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ॥
स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः ।
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ शान्तिः । शान्तिः ॥ शान्तिः ॥
इति श्रीगणपत्यथर्वशीर्षं समाप्तम् ॥
saha vīryaṃ karavāvahai ||
tejasvināvadhītamastu mā vidviṣāvahai ||
oṃ bhadraṃ karṇebhiḥ śṛṇuyāma devā |
bhadraṃ paśyemākṣabhiryajatrāḥ ||
sthirairaṅgaistuṣṭuvāṃsastanūbhiḥ |
vyaśema devahitaṃ yadāyuḥ ||
oṃ śāntiḥ | śāntiḥ || śāntiḥ ||
iti śrīgaṇapatyatharvaśīrṣaṃ samāptam ||
सह नौ अवतु , “हम दोनों की रक्षा हो।” सह नौ भुनक्तु , “हम दोनों का पोषण हो।” सह वीर्यं करवावहै , “हम साथ वीर्य पाएँ।” तेजस्वि-अधीतम् अस्तु , “हमारा अध्ययन तेजस्वी हो।” मा विद्विषावहै , “हम एक-दूसरे से द्वेष न करें।”
दोनों की रक्षा हो, दोनों का पोषण हो। साथ शक्ति पाएँ। हमारा अध्ययन तेजस्वी हो, हम एक-दूसरे से द्वेष न करें। (फिर वही opening शान्ति-पाठ।) यह श्री गणपति-अथर्वशीर्ष यहाँ समाप्त होता है।
सबसे famous उपनिषद्-closing-mantra, “सह नाव अवतु”, जो लगभग सब Upanishadic texts में आती है। यह गुरु-शिष्य की प्रार्थना है, हम साथ रक्षित हों, साथ नौ-शक्ति पाएँ, हमारा अध्ययन तेजस्वी हो, और हम एक-दूसरे से जलें नहीं। यह spiritual-education का foundation है, knowledge as collaborative practice, नहीं individual achievement।
“सह नाव अवतु” Yajur-Veda का closing-mantra है, और इसी से Tattiriya, Katha, Shvetasvatara, और कई अन्य upanishads ख़त्म होती हैं। Ganesh Atharvashirsha Atharva से है, मगर इस universal-closing को adopt करती है। यह pan-Vedic continuity का सूचक है।
साथ में पढ़ें
- सौन्दर्य लहरी , देवी-स्तुति, इसी lineage की
- विष्णु सहस्रनाम , 1000 नाम-स्तुति, parallel format
- हनुमान चालीसा , भक्ति का chai-version
- अन्य उपनिषद् , इसी upanishad-family की
- योग सूत्र पाद 1 , “योगी ध्यायन्ति” वाली पंक्ति का formal-text