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अध्याय 6: ध्यान योग

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अब तक कृष्ण ने कर्म और ज्ञान की राह दिखायी थी। इस छठे अध्याय में वे भीतर की सबसे बारीक विद्या खोलते हैं, ध्यान की विद्या। कैसे बैठें, मन को कैसे थामें, और सबसे ज़रूरी बात, मन को अपना शत्रु नहीं, अपना मित्र कैसे बनाएँ। यह पूरी गीता में योगसाधना का सबसे विस्तृत और सबसे कोमल वर्णन है।

असली संन्यासी कौन

कृष्ण ने पहले एक भ्रम मिटाया। बोले, हे अर्जुन, संन्यासी वह नहीं जो केवल आग और कर्म छोड़ बैठे। सच्चा संन्यासी और सच्चा योगी वही है जो अपने कर्म तो करता है, मगर उनके फल की चाह छोड़ देता है। जिसने कर्मफल की डोर छोड़ी, उसी ने भीतर की आग जलायी। जो साधना के आरम्भ में है, उसके लिए कर्म ही सीढ़ी है; और जो शिखर पर पहुँच गया, उसके लिए भीतर का ठहराव ही सीढ़ी बन जाता है।

अपने ही उद्धारक

फिर कृष्ण ने इस अध्याय का सबसे गहरा सूत्र रखा।

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् ।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

अपने आप को अपने ही बल से ऊपर उठाइए, अपने आप को गिरने मत दीजिए। आत्मा ही अपना मित्र है, और आत्मा ही अपना शत्रु।

श्रीमद्भगवद्गीता 6.5

कोई बाहर से आकर उद्धार नहीं करेगा। जिसने अपने मन को अपने वश में कर लिया, उसके लिए वही मन सबसे बड़ा मित्र है। और जिसने नहीं जीता, उसके लिए वही मन शत्रु-सा उसी के विरुद्ध खड़ा हो जाता है। मित्र और शत्रु, दोनों एक ही जगह बैठे हैं, आपके ही भीतर।

ध्यान का आसन

अब कृष्ण ने विधि बतायी, बहुत बारीकी से। बोले, एकांत जगह चुनिए, न बहुत ऊँची न बहुत नीची, और वहाँ स्वच्छ आसन बिछाइए। स्थिर होकर बैठिए, देह, सिर और गर्दन को एक सीध में सम रखिए, और दृष्टि को इधर-उधर भटकने मत दीजिए। मन को एक बिंदु पर टिकाइए, भीतर की गहराई में उतरिए। बोले, यह योग न बहुत खाने वाले को सधता है, न बिलकुल भूखे रहने वाले को; न बहुत सोने वाले को, न रात-रात जागने वाले को। जिसका खाना-पीना, सोना-जागना और काम-काज सब सम है, उसी का दुख यह योग हर लेता है।

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता ।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥

जैसे हवा-रहित जगह में रखा दीपक हिलता तक नहीं, वैसी ही उपमा उस योगी की है जिसने अपने चित्त को साध लिया और आत्मा के योग में ठहर गया।

श्रीमद्भगवद्गीता 6.19

हवा न हो तो दीपक की लौ बिलकुल सीधी, अडोल जलती है। साधे हुए मन की भी यही दशा है। भीतर एक ऐसी शान्ति उतरती है जिसमें बैठकर योगी अपने ही भीतर उस परम को देख लेता है, और फिर उससे कभी डिगता नहीं। उस अवस्था में मिली आनन्द की एक झलक के आगे बड़े से बड़ा सुख फीका पड़ जाता है।

चंचल मन

यहाँ अर्जुन ने वह प्रश्न पूछा जो हर साधक के मन में उठता है।

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् ।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥

हे कृष्ण, यह मन तो बड़ा चंचल है, मथ डालने वाला, बलवान और ज़िद्दी। इसे थामना हमें हवा को मुट्ठी में बाँधने जैसा कठिन लगता है।

श्रीमद्भगवद्गीता 6.34

कृष्ण ने इस ईमानदार शिकायत को झुठलाया नहीं। स्वीकार किया कि हाँ, मन सचमुच चंचल है और इसे थामना कठिन है। मगर फिर उन्होंने वह उपाय दिया जो आज तक हर साधक का सहारा है।

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥

हे महाबाहु, इसमें संदेह नहीं कि मन चंचल है और बड़ी कठिनाई से वश में आता है। मगर हे कौन्तेय, अभ्यास और वैराग्य से यह थम ही जाता है।

श्रीमद्भगवद्गीता 6.35

दो ही साधन हैं। अभ्यास, यानी रोज़, धीरज के साथ, बार-बार मन को लौटा लाना। और वैराग्य, यानी चीज़ों से भीतरी पकड़ ढीली कर देना। ये दोनों साथ चलें, तो सबसे चंचल मन भी एक दिन उसी हवा-रहित दीपक की सीधी लौ-सा ठहर जाता है।

कोई प्रयास व्यर्थ नहीं

अंत में अर्जुन ने एक कोमल आशंका रखी, जो बहुतों के मन में होती है। बोले, और अगर कोई इस राह पर चले, पूरे मन से प्रयास करे, फिर भी बीच में डिग जाए और सिद्धि से पहले ही चूक जाए, तो उसका क्या होगा? क्या उसका सारा परिश्रम व्यर्थ जाएगा, क्या वह दोनों ओर से हाथ धो बैठेगा?

कृष्ण का उत्तर पूरी गीता की सबसे सांत्वना देने वाली पंक्तियों में है। बोले, हे तात, ऐसा कभी नहीं होता। जो भला करने चला है, उसकी कभी दुर्गति नहीं होती, न इस लोक में, न अगले में। ऐसा साधक अच्छे लोकों में कुछ समय बिताकर फिर किसी पवित्र और भाग्यशाली घर में जन्म लेता है, और वहाँ पिछले जन्म का वह अधूरा अभ्यास अपने-आप फिर जाग उठता है। एक बार जो इस राह पर चल पड़ा, वह टूटी हुई कड़ी से आगे ही जुड़ता है, पीछे नहीं गिरता।

फिर कृष्ण ने योगी को तपस्वियों से, शास्त्र जानने वालों से, और केवल कर्म करने वालों से भी ऊँचा बताया। और सबसे ऊँचा उस योगी को कहा जो श्रद्धा और प्रेम से भरकर अपने अंतर में उन्हीं को थामे रहता है। इसी प्रेम की डोर आगे के अध्यायों में भक्ति बनकर खुलने वाली है।

इस अध्याय का सार एक वाक्य में। मन तब तक शत्रु है जब तक उसे थामना न आए, और जिस दिन थामना आ गया, वही मन सबसे बड़ा मित्र बन जाता है। थामने का तरीक़ा कोई जादू नहीं, बस रोज़ का अभ्यास और चीज़ों से भीतरी दूरी। और इस राह पर रखा एक भी कदम कभी व्यर्थ नहीं जाता।

आधार: श्रीमद्भगवद्गीता