कथा · 18
सुरघु और परिघ: राजधर्म से सहज समाधि तक
कैलास के निकट हेमजट किरातों के राजा सुरघु को राजदण्ड के साथ करुणा और व्यवस्था का कठिन प्रश्न मिला। माण्डव्य के उपदेश से उन्होंने राज्य, शरीर, मन और अहंकार को क्रमशः विचार में रखा। एक हजार वर्ष की तपस्या के बाद पर्णाद कहलाए उनके पुराने मित्र परिघ जब राजसदन पहुँचे, तो दोनों जीवन्मुक्त राजाओं का संवाद जागते हुए प्रत्येक कर्म में बनी रहने वाली आत्मदृष्टि पर ठहरा।
कैलास के नीचे का देश
वसिष्ठ ने श्रीराम से कहा, “उत्तर दिशा का एक प्राचीन वृत्तान्त सुनिए। हिमालय के शिखरों में कैलास प्रतिष्ठित है। उसके आसपास गंगा और अनेक बड़ी नदियाँ बहती हैं। कमलों से भरे सरोवरों के तट पर पशु और पक्षी विचरते हैं। उसी पर्वतीय प्रदेश के नीचे हेमजट नामक किरात रहते थे।”
उन किरातों के राजा सुरघु थे। वे पराक्रमी, सम्पन्न और शास्त्रबुद्धि से युक्त शासक थे। शत्रुओं के दुर्ग जीत चुके थे, अपनी प्रजा की रक्षा जानते थे और राजकार्य की कठिन माँगों से परिचित थे। उनका निवास रत्ननिर्मित राजसदन था।
सुरघु सज्जनों की रक्षा करते और चोरी तथा दूसरे अपराध करने वालों को दण्ड देते थे। निर्णय करते समय निजी द्वेष को स्थान न देने का प्रयत्न रहता। फिर भी एक दिन उनके भीतर प्रश्न उठा। जिन्हें वे दण्ड देते हैं, उन्हें पीड़ा होती है। यदि उचित अवसर पर दण्ड न दिया जाए तो प्रजा अपनी मर्यादा में कैसे रहे और शासन कैसे चले? कृपा और कठोरता के बीच उनका चित्त बार बार घूमने लगा।
वे सोचते, “इन प्राणियों को भी दुःख वैसा ही लगता होगा जैसा मुझे लगता है। यदि सबको धन देकर प्रसन्न कर दूँ, तब अपराध का निग्रह कैसे होगा? यदि प्रत्येक दोष पर कठोरता करूँ, तब उनकी वेदना देखकर मेरे भीतर उठती दया कहाँ जाएगी? आज सुख है और कल दुःख, इस बदलते क्रम में न्याय की सम दृष्टि कैसे मिले?”
यह प्रश्न किसी निजी उदासी से नहीं उपजा था। उसका सम्बन्ध राजधर्म के दो आवश्यक कार्यों, निग्रह और अनुग्रह, से था। अनुचित कर्म रोकना भी था और प्रजा का पालन भी। सुरघु ऐसी बुद्धि चाहते थे जो इष्ट और अनिष्ट, प्रशंसा और अप्रसन्नता, को देखकर अपना सन्तुलन न खोए।
माण्डव्य का आगमन
इसी समय महर्षि माण्डव्य दिशाओं में भ्रमण करते हुए सुरघु के घर आए। राजा ने उनका विधिपूर्वक सत्कार किया। उन्हें लगा कि जिस संशय ने भीतर की शान्ति रोक रखी है, उसके लिए योग्य श्रोता और शिक्षक सामने उपस्थित हैं। उन्होंने विनय से कहा, “भगवन्, महापुरुष का संग मन के गाँठदार संशय को खोल देता है। मेरे द्वारा किए गए निग्रह और अनुग्रह, दोनों से चिन्ता उठती है। कृपा करके वह उपाय बताइए जिससे मेरी बुद्धि सूर्य की किरणों जैसी सम हो और विषमता उसे विचलित न करे।”
माण्डव्य ने उत्तर दिया, “राजन्, उपाय आपके अधीन है और आपके भीतर ही उपलब्ध है। मन में उठी उपाधियाँ विचार से शान्त होती हैं। धूप पड़ने पर कुहरा मिटता है, वैसे ही वैराग्य, श्रवण, मनन, निदिध्यासन और अपने प्रयत्न से मन की जड़ता दूर होती है। आत्मा के विषय में स्पष्ट विवेक ही भीतर के ताप को ठण्डा करता है।”

उन्होंने समझाया कि अन्तर्मुख चित्त बाहरी स्थान बदलने पर निर्भर नहीं रहता। नगर हो अथवा ग्राम, चलना हो अथवा बैठना, साधक अपने अनुभव को जिस अंतःकरण से देखता है, जगत उसी के अनुरूप प्रतीत होता है। तृष्णा से जलते हृदय को सब ओर दावानल दिखाई देता है। आत्मबोध से शीतल हृदय के लिए वही जगत शान्त प्रतीत होता है।
“स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल, वायु, आकाश, पर्वत, नदियाँ, देश और काल का समूचा अनुभव चित्त में जाना जाता है,” माण्डव्य ने कहा। “वट के छोटे बीज से विशाल वृक्ष फैलता है। उसी प्रकार मन में उठी धारणा बाहर विस्तृत जगत की अनुभूति बनती है। सुगन्ध फूल के भीतर रहकर चारों ओर प्रकट होती है। अनुभूति का विस्तार भी चेतना में इसी प्रकार जाना जाता है।”
माण्डव्य ने सुरघु के राजकीय प्रश्न को दबाया नहीं। उन्होंने उसे आत्मविचार की दिशा दी। “विचार कीजिए, मैं कौन हूँ? इन्द्रियाँ क्या हैं? यह जगत क्या है? जन्म और मरण किसके लिए कहे जाते हैं? जब अपने स्वभाव का बोध दृढ़ होगा, तब हर्ष, शोक, क्रोध, राग और द्वेष आपको पर्वत को हिलाती हवा की तरह नहीं डिगा सकेंगे। मन उपस्थित रहेगा, किन्तु उसकी पुरानी प्रवृत्ति बदल जाएगी। काल वही रहता है और ऋतु बदल जाती है। आत्मबोध के बाद मन का व्यवहार भी दूसरी गुणवत्ता ग्रहण करता है।”
उन्होंने सोने को धोकर शुद्ध करने का उदाहरण दिया। जब तक शुद्ध धातु स्पष्ट न हो, धोना आवश्यक रहता है। आत्मतत्त्व का साक्षात्कार होने तक विचार का अभ्यास भी इसी प्रकार चलता है। दृश्य पदार्थों से सम्बन्ध की प्रत्येक धारणा को जाँचते हुए जो अधिष्ठान शेष रहे, उसी में आत्मभाव से स्थित होना है।
उपदेश पूर्ण कर माण्डव्य अपने आश्रम की ओर चले गए। राजा के पास अब एक स्पष्ट प्रश्न-पद्धति थी, जिसका परीक्षण उन्हें स्वयं अपने अनुभव में करना था।
“मैं कौन हूँ?”
सुरघु एक दोषरहित एकान्त स्थान में बैठे। उन्होंने बाहर से भीतर की ओर जाँच आरम्भ की। “मैं मेरु नहीं हूँ और मेरु मेरा नहीं। मैं जगत नहीं हूँ और जगत मेरा नहीं। पर्वत, पृथ्वी और किरातमण्डल अपने अपने कारणों से स्थित हैं। मेरे न रहने पर भी उनका क्रम चलता रहेगा। उनमें मेरा स्थायी स्वामित्व कैसे हो सकता है?”
उन्होंने नगर को देखा। हाथी, घोड़े, मन्दिर, धन, भोग, सेवक, सेना, पत्नी और पुत्र, सभी अपने अपने स्वरूप और प्रयोजन से जुड़े थे। राजपद ने उनके साथ सम्बन्ध बनाया था, पर वह सम्बन्ध संकेत और व्यवहार का था। “मैं राजा हूँ” और “यह मेरा राज्य है”, ये धारणाएँ परिस्थिति से बनी थीं। राज्य की देखभाल उनका कर्तव्य था, फिर भी राज्य को आत्मा का स्वरूप मानने का कोई आधार उन्हें नहीं मिला।
विचार शरीर तक आया। हाथ और पैर अलग अवयव थे। रक्त, मांस और अस्थि पदार्थ थे। कर्मेन्द्रियाँ काम करती थीं और ज्ञानेन्द्रियाँ विषय ग्रहण करती थीं, किन्तु उनकी प्रत्येक क्रिया जानी जा रही थी। शरीर में परिवर्तन होता था और परिवर्तन का ज्ञान उपस्थित रहता था। इस जानने वाले को किसी एक बदलते अवयव में सीमित करना सम्भव न था।

सुरघु ने मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को भी सामने रखा। संकल्प उठता, कुछ देर ठहरता और मिट जाता। निर्णय बनता और नई सूचना से बदल जाता। स्मृति आती और लौट जाती। “मैं” की धारणा इन सबको अपना कहती थी, मगर वह धारणा भी देखी जा सकती थी। जिसको देखा और जाना जा रहा है, वह जानने वाले की पूर्णता कैसे हो सकता है?
जाँच और सूक्ष्म हुई। केवल इतना कहना कि “मैं चेतन जीव हूँ” भी उन्हें पर्याप्त न लगा, क्योंकि ज्ञाता की कल्पना अपने सामने ज्ञेय रखती है। ज्ञान, ज्ञाता और ज्ञेय का भेद जहाँ उठता है, वह भी चेतना में प्रकाशित होता है। इन सबके शान्त होने पर जो निर्विषय चिद्मात्र सत्ता शेष रहती है, सुरघु ने उसी को अपना स्वभाव जाना।
उनके भीतर यह निश्चय स्पष्ट हुआ, “जिस चेतना को पाने के लिए मैं प्रयत्न कर रहा था, वही सदा उपस्थित रही है। देह और राज्य को अपना सम्पूर्ण स्वरूप मानकर मैंने शोक तथा मोह को स्थान दिया। अब दृश्य अपने स्थान पर है और उसका प्रकाशक अपने स्वभाव में स्पष्ट है। अहं और मम से उठने वाला दुःख शान्त हुआ। ग्रहण किसका करूँ और त्याग किसका? सम्पूर्ण अनुभव उसी चेतना में प्रकाशित है।”
यह अनुभूति क्रमबद्ध आत्मविचार से प्राप्त स्वात्मलाभ थी। सुरघु ने अपनी पूरी अनुभूति को जाँचा, सम्बन्धों की उपयोगिता को स्वीकार किया और उनमें आरोपित स्थायी स्वामित्व को छोड़ा। उनके बोध ने राजकीय उत्तरदायित्व को आत्मदृष्टि के साथ जोड़ दिया।
समता में राजकार्य
वसिष्ठ ने कहा कि सुरघु विचार के अभ्यास से परम पद में प्रतिष्ठित हुए। विश्वामित्र ने तप के बल से क्षत्रिय होकर ब्राह्मणत्व पाया था, उसी उपमा से सुरघु के भीतर ज्ञान की परिपक्वता कही गई है। उनके निग्रह और अनुग्रह के कार्य चलते रहे। हर्ष, विषाद और ईर्ष्या निर्णयों को अपने साथ बहा नहीं ले जाते थे।
वे उचित समय पर प्राप्त राज्यकार्य न्यायपूर्वक करते। जल ऊँची और नीची भूमि में बहते हुए अपना जलभाव नहीं छोड़ता। सुरघु भी परिस्थितियों की भिन्नता में आत्मदृष्टि से विच्छिन्न न होते। प्रजा, सेवक और परिवार उनके राजोचित संरक्षण में रहे। उनका व्यवहार शिथिल भी नहीं हुआ और निजी क्रोध की कठोरता से दूषित भी नहीं हुआ।
सुरघु अब जीवन्मुक्त थे। वे चलते, बैठते, श्वास लेते, विषयों को ग्रहण करते और आवश्यक कार्य करते थे। कर्तृत्व तथा भोक्तृत्व का अभिमान उनमें जड़ नहीं पकड़ता था। कमल जल में रहकर उससे लिप्त नहीं होता, वैसे ही राज्य के बीच उनका अन्तःकरण निर्लेप रहा।
वसिष्ठ इस प्रथम क्रम को सुरघु के पूरे जीवन के परिणाम तक ले जाते हैं। बहुत काल बीतने पर उन्होंने शरीर का त्याग किया। बर्फ का कण सूर्य के ताप में जल हो जाता है, नदी समुद्र में मिलकर अलग प्रवाह नहीं रहती और घट टूटने पर घटाकाश महाकाश से अभिन्न जाना जाता है। इन्हीं उपमाओं से सुरघु का ब्रह्म में अवस्थान कहा गया है।
वसिष्ठ इसके बाद समय में पीछे लौटे। आगे का संवाद सुरघु के प्रबुद्ध होने के बाद और उनके जीवनकाल में हुआ था। परिघ जीवन्मुक्त सुरघु से उनके अपने राजसदन में मिले थे।
पारसीक देश का परिघ
श्रीराम ने वसिष्ठ से पूछा कि एक समाधि किसे कहते हैं और चंचल चित्त उसमें कैसे स्थिर होता है। वसिष्ठ ने उत्तर में सुरघु और राजर्षि पर्णाद का संवाद सुनाया। पर्णाद का पहला नाम परिघ था। वे पारसीक देश के पराक्रमी राजा और सुरघु के बहुत पुराने घनिष्ठ मित्र थे।
एक समय परिघ के राज्य में प्रजाजनों के पापरूपी दोष के बीच बड़ी अनावृष्टि हुई। वर्षा रुक गई, अन्न दुर्लभ हुआ और बहुत से लोग भूख, अग्नि तथा आपसी झगड़ों में मरने लगे। परिवार बिखरने लगे और लोग अपने बसे हुए स्थान छोड़कर चले गए।
परिघ ने प्रजा को बचाने के अनेक उपाय किए। उपलब्ध साधन अपर्याप्त रहे और उनके प्रयास विनाश रोक न सके। प्रजा का दुःख देखकर वे गहरे विषाद में डूब गए और राजशक्ति की सीमा उनके सामने कठोर रूप में खुली।

उपाय निष्फल रहे तो परिघ के भीतर वैराग्य उठा। वे शीघ्रता से अपना पूरा राज्य छोड़कर एक दूरस्थ वन की ओर चले गए, जिसे नगरवासी भी नहीं जानते थे।
वन के एक पर्वत की गुफा में उन्होंने इन्द्रियों को संयत कर तप आरम्भ किया। फल भी उपलब्ध न हों तो भूमि पर अपने आप गिरे सूखे पत्ते खाते। उनका आहार इतना दीर्घकाल तक सूखे पत्तों पर रहा कि बड़े तपस्वियों के बीच वे पर्णाद नाम से विख्यात हो गए।

एक हजार वर्ष और पर्णाद नाम
परिघ ने चित्त की वृत्ति आत्मपद में लगाकर एक हजार वर्ष तप और अभ्यास किया। अभ्यास से अन्तःकरण निर्मल हुआ, विषयों की आसक्ति हटी और परमात्मा के अनुग्रह से आत्मज्ञान प्रकाशित हुआ। वे राग और द्वेष से मुक्त, शान्त और जीवन्मुक्त हुए।
पर्णाद अब किसी एक गुफा तक सीमित नहीं रहे। वे सिद्धों और तत्त्वजिज्ञासु मुनियों के बीच स्वेच्छा से विचरने लगे और जम्बूद्वीप में राजर्षि के रूप में प्रसिद्ध हुए। घूमते हुए वे हेमजट देश में सुरघु के रत्ननिर्मित राजसदन पहुँचे।
सुरघु ने पुराने मित्र को देखा तो आसन से उठ खड़े हुए। दोनों ने एक दूसरे का आदर किया, गले मिले और एक ही आसन पर बैठे। एक पर्वत पर साथ स्थित सूर्य और चन्द्रमा जैसी उनकी संयुक्त शोभा थी। ज्ञान ने उनकी पुरानी मित्रता मिटाई नहीं थी। अब उस स्नेह में परस्पर की अवस्था को पहचानने वाली सहजता भी जुड़ गई थी।
परिघ ने कहा, “मित्र, आपके दर्शन से मेरा चित्त अत्यन्त आनन्दित है। पुराने निःसंकोच वार्तालाप, क्रीड़ाएँ और अनेक व्यवहार स्मृति में लौट आए हैं। महर्षि माण्डव्य की कृपा से आपको तत्त्वज्ञान मिला। तप और ईश्वर के प्रसाद से मुझे भी वही विश्रान्ति मिली। दीर्घ समय और दूर देश हमें अलग रखते रहे, फिर आज हम मिल गए।”
उन्होंने सुरघु से अनेक प्रकार की कुशल पूछी। क्या आत्मपद में उनका विश्राम दृढ़ है? क्या शरीर आधि और व्याधि से मुक्त है? क्या प्रजा, सेवक, पुत्र, पत्नी, धन, धान्य, नगर और खेत अपने उचित क्रम में हैं? क्या उनका यश दिशाओं और गाँवों तक पहुँच रहा है? इन प्रश्नों से स्पष्ट है कि परिघ सुरघु को राज्य छोड़ चुके वृद्ध यात्री के रूप में नहीं देखते। उनके सामने ज्ञानवान राजा अपने उत्तरदायित्वों के बीच उपस्थित है।
सुरघु ने मित्र के आगमन को ही अपनी कुशल का श्रेष्ठ फल कहा। “आज आपके दर्शन से पुण्य का फल मिला,” उन्होंने उत्तर दिया। “सज्जनों का मिलना मधुर अमृत के समान है। उनके वचन परमार्थ की ओर बुद्धि को खोलते हैं और जीव को निर्भयता देते हैं। आपके आने से यह राजसदन पवित्र हुआ।”
दोनों ने बहुत समय तक पुराने प्रसंगों, वर्तमान अवस्था और आत्मज्ञान पर विश्वासपूर्ण वार्ता की। तब परिघ ने समाधि के अर्थ को व्यवहार के भीतर ले आने वाला प्रश्न पूछा।
परिघ का प्रश्न
परिघ ने पूछा, “राजन्, संकल्पों से रहित परम विश्राम और विक्षेपों के उपशम की जो समाधि कही जाती है, क्या आप उसका अनुष्ठान करते हैं?”
सुरघु ने प्रश्न के शब्दों को ध्यान से देखा। “भगवन्, आप संकल्परहित परम शान्ति को कल्याणप्रद कहते हैं, यह उचित है। फिर उसे किसी अलग अनुष्ठान के रूप में क्यों पूछते हैं? तत्त्वज्ञ पुरुष मौन रहे अथवा व्यवहार करे, उसका चित्त अपने स्वरूप से असमाहित कैसे होगा?”
उन्होंने बाहरी मुद्रा की सीमा स्पष्ट की। पद्मासन बाँधकर बैठना, हाथों को ब्रह्माञ्जलि में रखना और चुप रहना उपयोगी अनुशासन हो सकते हैं। यदि चित्त आत्मपद में विश्राम नहीं पाता, केवल मुद्रा समाधि सिद्ध नहीं करती। जिस व्यक्ति का चित्त नित्य प्रबुद्ध, तृप्त और शान्त है, जिसे वस्तुस्थिति जैसी है वैसी ज्ञात है और जिसका निश्चय आत्मा में दृढ़ है, उसकी समाहित अवस्था व्यवहार से टूटती नहीं।
“समाधि का सार सत्य का अविचल बोध है,” सुरघु ने कहा। “तृष्णा के तिनकों को जलाने वाला तत्त्वज्ञान, अहंकार का क्षय और ग्रहण-त्याग की अशान्त माँगों का विश्राम, ये उसकी भीतरी पहचान हैं। कोई व्यक्ति बाहर से स्थिर बैठा हो और भीतर आशाओं के साथ दौड़ता रहे, तब उस मौन को पूर्ण समाधि कहना कठिन है।”
उन्होंने अपने अनुभव को कई उपमाओं से खोला। नदी का प्रवाह क्षण भर अपना स्वभाव नहीं भूलता। काल अपनी गति से अलग नहीं होता। वायु चलती हो अथवा स्थिर प्रतीत हो, पवनभाव बना रहता है। अग्नि से उष्णता और बर्फ से शीतलता अलग नहीं की जा सकती। आत्मतत्त्व में प्रतिष्ठित बुद्धि के लिए आत्मदृष्टि इसी प्रकार निरन्तर रहती है।
सुरघु ने कहा, “जिस ओर दृष्टि जाती है, अनुभव उसी चेतना में प्रकाशित होता है। आत्मा से अलग स्वतन्त्र पदार्थ न दिखे तो समाधि से उठना किस अर्थ में कहा जाए? कार्य और कारण, समाधि और उत्थान का विभाग व्यवहार की भाषा में उपयोगी है। आत्मतत्त्व में ऐसा वास्तविक विच्छेद नहीं पहुँचता।”
नींद, विश्राम और एकान्त अपने सामान्य स्थान पर रहते थे। जाग्रत व्यवहार में न्याय करना, अतिथि का सत्कार करना और मित्र से बोलना सुरघु की आत्मदृष्टि को निरस्त नहीं करता था। समाधि उनके लिए जीवन से बाहर रखा समयखंड नहीं रही।
परिघ की पहचान
परिघ ने सुरघु के उत्तर को सुना और कहा, “राजन्, आपका अन्तःकरण पूर्णिमा के चन्द्रमा की तरह शीतल है। आपने परम पद का निश्चय किया है। इष्ट और अनिष्ट, ग्रहण और त्याग, राग और द्वेष के बादल हटे हुए हैं। आपका आशय निर्मल है और आप अपने आप में तृप्त दिखाई देते हैं।”
परिघ ने व्यवहार के बीच बनी उस सजगता को पहचाना। सार और असार का विवेक, इच्छा से मुक्ति और समदृष्टि उस अवस्था की पहचान थे।
सुरघु ने उत्तर दिया, “मुनीश्वर, इस दृश्य जगत में ग्रहण करने योग्य कोई स्वतन्त्र वस्तु दिखाई नहीं देती। जो कुछ दिखता है, वह आभास के रूप में चेतना में जाना जाता है। आभास को पकड़ने की माँग किस आधार पर उठे? उसे घृणा से हटाने का आग्रह भी किस स्थायी वस्तु पर टिके?”
उन्होंने अवधि का विचार किया। कुछ पदार्थ थोड़े समय में नष्ट हो जाते हैं और तुच्छ कहे जाते हैं। कुछ बहुत समय टिकते हैं और महत्त्वपूर्ण समझे जाते हैं। दोनों काल के भीतर उत्पन्न और परिवर्तित होते हैं। अकाल आत्मस्वरूप की पहचान में अल्प और दीर्घ अवधि का यह भेद अपना परम अधिकार खो देता है।
शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध इन्द्रियों को आकर्षित करते हैं। पर्वत विशाल दिखाई देते हैं, समुद्र जल का अपार विस्तार है और वनस्पतियाँ काष्ठ तथा पत्र से बनी हैं। विचार के बिना इन सबमें स्थायी रमणीयता आरोपित होती है। इच्छा उस आरोप को पकड़ती है और भय उसके नष्ट होने की सम्भावना को। विवेक वस्तु को उसकी सीमा में देखता है।
“राग हटने पर तृष्णा कहाँ ठहरे?” सुरघु ने पूछा। “राग, द्वेष, इच्छा और त्याग की आग्रहपूर्ण वृत्तियों से शुद्ध आत्मतत्त्व में स्थित रहिए। जिसके मन से वासना क्षीण हुई, वह उपशम और कल्याण को प्राप्त हुआ।”
उनकी बातचीत इसी निश्चय पर पूर्ण हुई। दो पुराने मित्रों ने अलग मार्गों से आत्मज्ञान पाया था। राजसदन में हुई उनकी भेंट ने स्पष्ट किया कि परिपक्व समाधि मौन और कर्म, दोनों में एक ही आत्मदृष्टि के रूप में बनी रहती है।