कथा · 20
सुरघु: किरात राजा से ऋषि तक
पहाड़ी कबीले का राजा सोता नहीं था। हर रात फ़ैसले उसे डराते। एक ऋषि आए, एक सवाल पूछा – और राजा फिर कभी नहीं डरा।
हिमालय के एक छोर पर किरात कबीले रहते थे। पहाड़ी लोग। शिकारी। योद्धा। उनके राजा थे सुरघु।
सुरघु अच्छे राजा थे। न्याय करते थे। प्रजा को सँभालते थे। मगर एक मुसीबत थी – रात को नींद नहीं आती।
दिन भर के फ़ैसले उन्हें खाते। “वो आदमी जिसे मैंने सज़ा दी, क्या वो सच में दोषी था?” “जो लड़ाई मैंने जीती, क्या उसका कुछ बेहतर तरीक़ा था?” “जिस सेना को मैंने भेजा, क्या उसमें मेरे लोग बेकार मारे गए?”
हर रात ये प्रश्न उठते। नींद टुकड़े-टुकड़े होकर आती।
एक दिन ऋषि माण्डव्य उनके राज्य में पधारे। सुरघु ने सुना। दौड़कर उनके पास गए। पाँव छुए।
“महाराज, मेरी मदद करो। मैं जागता रहता हूँ।”
माण्डव्य ने उन्हें देखा। बोले, “बैठो।”
दोनों एक पेड़ के नीचे बैठ गए। माण्डव्य ने पूछा, “तुम्हें कौन परेशान करता है?”
“मेरे फ़ैसले। मेरी ज़िम्मेदारियाँ।”
“तुम कौन हो?”
“मैं… मैं राजा हूँ।”
“राजा क्या है?”
“जो राज्य चलाता है।”
“राज्य क्या है?”
सुरघु रुक गए। “राज्य… ज़मीन। प्रजा। सेना।”
“अगर ज़मीन गई, क्या तुम राजा रहोगे?”
“नहीं।”
“अगर प्रजा गई?”
“नहीं।”
“अगर सेना गई?”
“नहीं।”
“तो राजा क्या है? एक बैज? एक नाम? एक विचार?”
सुरघु चुप।
“बेटा, तुम राजा नहीं हो। तुम राजा का अनुभव कर रहे हो। यह बहुत बड़ा अंतर है।”
“मगर मेरे फ़ैसले सच हैं।”
“फ़ैसले सच होंगे। मगर ‘फ़ैसला लेने वाला’ एक विचार है। फ़ैसला बहता है। विचार बैठा रहता है, और रोता रहता है।”
सुरघु ने गहरी साँस ली।
“तो मुझे क्या करना है?”
“राज चलाओ, मगर ख़ुद को राजा मत मानो। फ़ैसले लो, मगर ‘मैंने यह फ़ैसला लिया’ मत कहो। शरीर अच्छा काम करेगा, अगर ‘मैं’ बीच से हट जाए।”
सुरघु को बात समझ नहीं आई। मगर माण्डव्य के साथ कुछ दिन बिताए। ध्यान सीखा। एक रात पहली बार पूरी नींद आई।
हफ़्तों बाद कुछ बदला। सुरघु राज्य चलाते रहे। मगर अब फ़ैसले उन्हें खाते नहीं थे। जो होना था, होता था। उनके भीतर कोई “लेने वाला” नहीं था। बस घटनाएँ।
एक बार सीमा पर पड़ोसी राजा परिघ ने आक्रमण किया। युद्ध हुआ। सुरघु जीते। परिघ हारे, मगर मरे नहीं। दोनों राजा युद्ध के बाद मिले।
परिघ ने पूछा, “तुम इतने शांत कैसे रहते हो? जीतकर भी, हारकर भी?”
सुरघु ने हँसकर कहा, “क्योंकि कोई जीत नहीं रहा, कोई हार नहीं रहा। बस एक खेल हुआ।”
परिघ ने ध्यान दिया। फिर बैठे, बात की। फिर एक दिन सब छोड़कर वो भी ऋषि बन गए।
दोनों राजा बाद में आत्म-ज्ञान के साथी बन गए।
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, राज सिंहासन पर भी बैठा जा सकता है, और फिर भी बंधन में नहीं रहा जा सकता। बस एक काम करना है – जो कर रहा है, उसे ख़ुद से अलग देखना।”
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