तीसरे खण्ड में देवी का वही रूप उभरता है जिसे भास्करराय अपने सौभाग्य-भास्कर में परा-संवित् कहते हैं, सब दोषों से रहित और सब दोषों को हरने वाली। यहाँ नाम जोड़ों में चलते हैं। एक ओर देवी के स्वरूप का निषेध-वाचक वर्णन है, दूसरी ओर भक्त के भीतर उसी दोष का नाश। यही ललिता का स्वभाव है, जो वे स्वयं नहीं हैं वही वे अपने उपासक से हर लेती हैं।
पहली माला एक ही लय पर चलती है। पहले देवी का अपना निर्मल स्वरूप, फिर उसी निर्मलता का दान। वे स्वयं पाप से सर्वथा रहित हैं, और भक्तों के समस्त पापों को मिटा देती हैं। उनमें क्रोध का लेश नहीं, इसीलिए वे उपासक के भीतर का रोष शान्त कर देती हैं। न उनमें किसी वस्तु की लालसा है, न वे किसी का लोभ रहने देती हैं।
नाम 166 से 171
166निष्पापापाप से सर्वथा रहित
167पापनाशिनीभक्तों के समस्त पापों को मिटा देने वाली
168निष्क्रोधाजिनमें क्रोध का लेश नहीं, क्योंकि उनका कोई द्वेष्य नहीं
169क्रोधशमनीउपासक के भीतर का रोष शान्त करने वाली
170निर्लोभाकिसी वस्तु की लालसा से रहित, परम उदार
171लोभनाशिनीभक्त में लोभ न रहने देने वाली, जो लोभ सब गुणों को नष्ट करता है
यही जोड़ी आगे और गहराती है। देवी में कोई संशय या द्वंद्व नहीं, और वे भक्त के सब संशय मिटा देती हैं। उनका कोई जन्म या उद्भव नहीं, और वे जन्म-मरण के बन्धन को काट देती हैं। उनमें न मन की कल्पना है, न कोई भेद-बुद्धि, और किसी बाधा से वे अविचलित रहती हैं। जो भिन्नता का भाव वासनाओं से उपजता है, उसे भी वे भक्त से दूर कर देती हैं।
नाम 172 से 179
172निःसंशयाजिनमें कोई संशय या द्वंद्व नहीं
173संशयघ्नीभक्त के सब संशय मिटा देने वाली
174निर्भवाजिनका कोई जन्म या उद्भव नहीं
175भवनाशिनीजन्म मरण के बन्धन को काट देने वाली
176निर्विकल्पामन की कल्पना से रहित; भास्करराय के अनुसार विकल्प वह धारणा है जिसका कोई वास्तविक विषय नहीं
177निराबाधाकिसी बाधा से अविचलित; सीप में चाँदी के भ्रम जैसी कोई भूल उनके स्वरूप में नहीं
178निर्भेदाभेद बुद्धि से रहित, स्वयं अखण्ड और अभिन्न
179भेदनाशिनीवासनाओं से उपजे भिन्नता के भाव को भक्त से दूर करने वाली
अब नकार की माला अपने शिखर पर पहुँचती है। देवी अविनाशी हैं, उनका कभी नाश नहीं, और वे साक्षात् मृत्यु का मथन कर देती हैं। वे क्रिया में लिप्त हुए बिना स्थित रहती हैं, कुछ भी संग्रह नहीं करतीं, परम निःस्पृह। उनकी कोई तुलना नहीं, और बीच में एक कोमल चित्र उभर आता है, उनके केश नील-कान्ति वाले, श्याम और चमकीले।
नाम 180 से 185
180निर्नाशाअविनाशी, जिनका कभी नाश नहीं
181मृत्युमथनीसाक्षात् मृत्यु का मथन कर देने वाली, भक्त को अमरता देने वाली
182निष्क्रियाविहित या निषिद्ध किसी क्रिया में लिप्त हुए बिना स्थित
183निष्परिग्रहाकुछ भी संग्रह न करने वाली, परम निःस्पृह
184निस्तुलाजिनकी कोई तुलना नहीं
185नीलचिकुरानील कान्ति वाले श्याम चमकीले केशों वाली
इसके बाद देवी की दुर्गमता और दुर्गा-रूप का गायन है। उनका कभी क्षय नहीं होता, उनकी मर्यादा अटल है, उन तक पहुँचना बड़े यत्न से ही सम्भव। वे साक्षात् दुर्गा हैं, दुर्गति का नाश करने वाली, समस्त दुःखों को मिटाने और सुख देने वाली। पापी उन तक नहीं पहुँच पाते, और दुराचार को वे शान्त कर देती हैं, स्वयं हर दोष से रहित।
नाम 186 से 195
186निरपायाजिनका कभी क्षय नहीं होता
187निरत्ययाजिनकी मर्यादा अटल है, अतिक्रमण और दोष से रहित
188दुर्लभाबड़े यत्न से ही प्राप्त होने वाली, योगियों के लिए भी दुर्लभ
189दुर्गमाजिन तक पहुँचना कठिन है
190दुर्गासाक्षात् दुर्गा, दुर्गति का नाश करने वाली; भास्करराय दुर्गम दैत्य के वध से यह नाम जोड़ते हैं
191दुःखहन्त्रीसमस्त दुःखों को मिटाने वाली
192सुखप्रदाइस लोक, परलोक और मोक्ष, तीनों का सुख देने वाली
193दुष्टदूरापापी जिन तक नहीं पहुँच पाते
194दुराचारशमनीशास्त्र विरुद्ध दुराचार को शान्त कर देने वाली
195दोषवर्जिताराग द्वेष आदि हर दोष से रहित
अब सकार-माला आती है, जहाँ देवी का सर्व-व्यापी ऐश्वर्य गाया जाता है। वे सर्वज्ञ हैं, उनकी करुणा सघन और अपार, उनके समान या उनसे अधिक कोई नहीं। वे सब शक्तियों से युक्त हैं, समस्त मंगल की मूल, परम गति देने वाली। वे चर-अचर सारे जगत् की स्वामिनी हैं, और उसी जगत् में व्याप्त भी हैं।
नाम 196 से 203
196सर्वज्ञासब कुछ जानने वाली सर्वज्ञ
197सान्द्रकरुणासघन और अपार करुणा वाली
198समानाधिकवर्जिताजिनके समान या जिनसे अधिक कोई नहीं
199सर्वशक्तिमयीसब शक्तियों से युक्त, समस्त दिव्य शक्तियों का समुच्चय
200सर्वमङ्गलासमस्त मंगल की मूल, हृदय की हर शुभ कामना देने वाली
201सद्गतिप्रदापरम गति देने वाली, स्वर्ग से मोक्ष तक
202सर्वेश्वरीचर अचर सारे जगत् की स्वामिनी
203सर्वमयीउसी समस्त जगत् में व्याप्त, पृथ्वी से शिव तक सब तत्त्व जिनमें हैं
यहाँ देवी तन्त्र, मन्त्र और यन्त्र का स्वरूप ठहरती हैं। वे समस्त मन्त्रों की सार-स्वरूपा हैं, सब यन्त्रों की आत्मा, सब तन्त्रों का रूप। फिर मनोन्मनी आती हैं, शिव की वह उन्मनी शक्ति जहाँ मन वृत्तियों से ऊपर उठ जाता है। वे महेश्वर की शक्ति माहेश्वरी हैं, सब देवियों में महानतम महादेवी, और सम्पदा की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी।
नाम 204 से 210
204सर्वमन्त्रस्वरूपिणीसमस्त मन्त्रों की सार स्वरूपा
205सर्वयन्त्रात्मिकासब यन्त्रों की आत्मा
206सर्वतन्त्ररूपासब तन्त्रों का रूप, जिनमें सब मार्ग नदियों सा आकर मिलते हैं
207मनोन्मनीशिव की उन्मनी शक्ति, जहाँ मन वृत्तियों से ऊपर उठ जाता है
208माहेश्वरीमहेश्वर की शक्ति माहेश्वरी
209महादेवीसब देवियों में महानतम, जिनका शरीर अपरिमेय है
210महालक्ष्मीसम्पदा की अधिष्ठात्री, विष्णु की महान् लक्ष्मी
अब महा-शब्द से आरम्भ होने वाले नामों की लम्बी माला खुलती है। देवी शिव की प्रिया हैं, विराट् रूप वाली, परम पूजनीय, घोरतम पापों को भी मिटाने वाली। वे महामाया हैं, समस्त जगत्-प्रपंच का आधार-भूत आवरण, और महासत्त्वा, परम शुद्ध सत्ता।
नाम 211 से 216
211मृडप्रियामृड अर्थात् सुख देने वाले सात्त्विक शिव की प्रिया
212महारूपाविराट् रूप वाली, अन्य सब रूपों से परे परम रूप
213महापूज्यापरम पूजनीय, शिव आदि के द्वारा भी पूजित
214महापातकनाशिनीघोरतम पापों को भी मिटाने वाली
215महामायासमस्त जगत् प्रपंच का आधारभूत आवरण, जो ब्रह्मा तक को मोहित करती है
216महासत्त्वापरम शुद्ध सत्ता; सत्त्व अर्थात् अस्तित्व, बल और सत्य
यहाँ देवी के ऐश्वर्य, वीर्य, बल, बुद्धि और सिद्धि का गायन है। वे महान् शक्ति-स्वरूपा हैं, असीम आनन्द और प्रीति, भोग और ऐश्वर्य की स्वामिनी। उनका वीर्य महान्, बल अपरिमित, बुद्धि सर्वोच्च, और वे परम सिद्धियों से सम्पन्न हैं। योगियों के भी ईश्वर की वे ईश्वरी ठहरती हैं।
नाम 217 से 225
217महाशक्तिःमहान् शक्ति स्वरूपा, समस्त विश्व की ऊर्जा
218महारतिःअसीम आनन्द और प्रीति, जिनमें ऋषि संसार से अधिक रस पाते हैं
219महाभोगाभोग और विस्तार की स्वामिनी
220महैश्वर्यामहान् ऐश्वर्य की स्वामिनी
221महावीर्यामहान् वीर्य और पराक्रम वाली
222महाबलाअपरिमित बल से सम्पन्न
223महाबुद्धिःसर्वोच्च बुद्धि वाली, जिन्हें जान लेने पर कुछ जानना शेष नहीं रहता
224महासिद्धिःअणिमा आदि परम सिद्धियों से सम्पन्न
225महायोगेश्वरेश्वरीयोगियों के भी ईश्वर की ईश्वरी
अब महा-माला उपासना की ओर मुड़ती है। देवी कुलार्णव और ज्ञानार्णव जैसे महान् तन्त्रों में उपास्य हैं, पञ्चदशी श्रीविद्या-मन्त्र की मूर्ति, और श्रीचक्र के रूप में स्थित महायन्त्र। वे महान् आसन पर विराजती हैं, महायाग की क्रमबद्ध विधि से आराधित होती हैं, और साक्षात् महाभैरव शिव के द्वारा भी पूजित।
नाम 226 से 231
226महातन्त्राकुलार्णव और ज्ञानार्णव जैसे महान् तन्त्रों में उपास्य
227महामन्त्रापञ्चदशी श्रीविद्या मन्त्र की मूर्ति
228महायन्त्राश्रीचक्र के रूप में स्थित महायन्त्र
229महासनामहान् आसन पर विराजमान; भास्करराय के अनुसार पृथ्वी से लेकर छत्तीस तत्त्व ही उनका आसन हैं
230महायागक्रमाराध्यामहायाग की क्रमबद्ध विधि से आराधित, चौंसठ योगिनियों की पूजा
231महाभैरवपूजितासाक्षात् महाभैरव परमशिव के द्वारा पूजित
महा-माला अपने शिखर तक चढ़ती है। महाकल्प के अन्त में महेश्वर जब प्रलयंकर महाताण्डव करते हैं, तब देवी उसकी अविचल साक्षी हैं। वे महाकामेश्वर शिव की पटरानी, उनकी महिषी हैं, और अन्ततः महात्रिपुरसुन्दरी, तीनों पुरों में परम सुन्दर परा-शक्ति।
नाम 232 से 234
232महेश्वरमहाकल्पमहाताण्डवसाक्षिणीमहाकल्प के अन्त में महेश्वर के प्रलयंकर महाताण्डव की अविचल साक्षी
233महाकामेशमहिषीमहाकामेश्वर शिव की पटरानी
234महात्रिपुरसुन्दरीतीनों पुरों में परम सुन्दर पराशक्ति; भास्करराय के अनुसार त्रिपुर माता, मान और मेय का नगर है
अब चकार से सजी माला आती है, जहाँ श्रीविद्या और श्रीचक्र का विस्तार है। देवी चौंसठ उपचारों से पूजित होती हैं, चौंसठ कलाओं की स्वरूपा, और चौंसठ करोड़ योगिनी-गणों से सेवित। वे मनु और चन्द्रदेव द्वारा उपासित श्रीविद्या-स्वरूपा हैं, और चन्द्रमण्डल के मध्य में निवास करती हैं।
नाम 235 से 240
235चतुष्षष्ट्युपचाराढ्याचौंसठ उपचारों से पूजित
236चतुष्षष्टिकलामयीचौंसठ कलाओं की स्वरूपा
237महाचतुष्षष्टिकोटियोगिनीगणसेविताचौंसठ करोड़ योगिनी गणों से सेवित
238मनुविद्यामनु द्वारा उपासित श्रीविद्या स्वरूपा, श्रीविद्या के बारह उपासकों में पहले
239चन्द्रविद्याचन्द्रदेव द्वारा उपासित श्रीविद्या स्वरूपा
240चन्द्रमण्डलमध्यगाचन्द्रमण्डल के मध्य में निवास करने वाली
यहाँ देवी का सौन्दर्य और उनका सर्व-स्वामित्व साथ-साथ गाया जाता है। उनका रूप मनोहर, मुस्कान मोहक, और मस्तक पर सुन्दर चन्द्रमा की कला। वे चर-अचर समस्त जगत् की स्वामिनी हैं, और चक्रराज श्रीचक्र को अपना निवास बनाकर वहीं विराजती हैं।
नाम 241 से 245
241चारुरूपाअत्यन्त मनोहर रूप वाली
242चारुहासामोहक मन्द मुस्कान वाली
243चारुचन्द्रकलाधरामस्तक पर सुन्दर चन्द्रकला धारण करने वाली
244चराचरजगन्नाथाचर अचर समस्त जगत् की स्वामिनी
245चक्रराजनिकेतनाचक्रराज श्रीचक्र को अपना निवास बनाने वाली
अब देवी का परिचित रूप उभरता है, पर्वतराज हिमवान् की पुत्री पार्वती, कमल-से विशाल नेत्रों वाली, पद्मराग मणि-सी लाल कान्ति वाली। फिर एक गूढ़ चित्र आता है, वे पाँच प्रेतों के आसन पर विराजती हैं, और ये पाँच शक्ति से रहित ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश और सदाशिव हैं। पर वही पाँच जब अपनी-अपनी शक्ति सहित होते हैं, तब देवी ही पञ्च-ब्रह्म-स्वरूपा ठहरती हैं।
नाम 246 से 250
246पार्वतीपर्वतराज हिमवान् की पुत्री
247पद्मनयनाकमल से विशाल नेत्रों वाली
248पद्मरागसमप्रभापद्मराग मणि सी लाल कान्ति वाली
249पञ्चप्रेतासनासीनाअपनी शक्ति से रहित ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश और सदाशिव, इन पाँच प्रेतों के आसन पर विराजमान
250पञ्चब्रह्मस्वरूपिणीअपनी शक्ति सहित उन्हीं पाँच ब्रह्मों की स्वरूपा
अब वर्णन भीतर मुड़ता है, देवी के शुद्ध चैतन्य-स्वरूप की ओर। वे चित्-स्वरूपा हैं, परम आनन्द, घनीभूत विज्ञान की एकरस मूर्ति। वे ध्यान, ध्याता और ध्येय, तीनों रूपों में प्रकाशित होती हैं, और धर्म-अधर्म दोनों का अतिक्रमण करने वाली, समस्त विश्व ही जिनका रूप है।
नाम 251 से 256
251चिन्मयीशुद्ध चैतन्य की स्वरूपा
252परमानन्दापरम आनन्द की स्वरूपा
253विज्ञानघनरूपिणीघनीभूत विज्ञान की एकरस मूर्ति
254ध्यानध्यातृध्येयरूपाध्यान, ध्याता और ध्येय, तीनों रूपों में प्रकाशित
255धर्माधर्मविवर्जिताधर्म और अधर्म दोनों का अतिक्रमण करने वाली
256विश्वरूपासमस्त विश्व ही जिनका रूप है
अब अवस्था-त्रय और तुरीय का दर्शन है। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति, इन तीनों अवस्थाओं में जीव के रूप में देवी ही विराजती हैं। जागते जीव की वे जाग्रत हैं, स्वप्न में सूक्ष्म शरीर वाले तैजस का अधिष्ठान, और गहरी नींद में सुषुप्ति की अभिमानी प्राज्ञ-चेतना से अभिन्न। वे आत्मा का परम साक्षात्कार हैं, फिर भी इन सब अवस्थाओं से परे, सबसे रहित।
नाम 257 से 263
257जागरिणीजाग्रत अवस्था में जागते जीव के रूप में स्थित
258स्वपन्तीस्वप्न अवस्था में स्वप्न देखने वाले जीव के रूप में स्थित
259तैजसात्मिकासूक्ष्म शरीर वाले तैजस का अधिष्ठान, स्वप्न द्रष्टा जीवों का समष्टि रूप
260सुप्तासुषुप्ति अवस्था में गहरी नींद के जीव के रूप में स्थित
261प्राज्ञात्मिकासुषुप्ति की अभिमानी प्राज्ञ चेतना से अभिन्न
262तुर्यातीनों अवस्थाओं से परे चौथी अवस्था, आत्मा का परम साक्षात्कार
263सर्वावस्थाविवर्जिताइन सब अवस्थाओं से परे, सबसे रहित; तुरीय से भी परे
खण्ड के अन्त में देवी के पाँच कृत्य एक संकल्प में समा जाते हैं। वे सृष्टि की रचयित्री हैं और सृष्टि के समय ब्रह्मा-रूप, जगत् की रक्षिका और पालन हेतु गोविन्द-रूप, संहार करने वाली और प्रलय में रुद्र-रूप, सब वस्तुओं का तिरोधान कराने वाली परमेश्वरी। अन्त में वे सदाशिव-स्वरूपा अनुग्रह देती हैं, और सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोधान तथा अनुग्रह, इन पाँचों कृत्यों में सदा तत्पर रहती हैं।
नाम 264 से 274
264सृष्टिकर्त्रीसमस्त सृष्टि की रचयित्री
265ब्रह्मरूपासृष्टि के समय ब्रह्मा रूप
266गोप्त्रीसमस्त जगत् की रक्षिका
267गोविन्दरूपिणीपालन के लिए गोविन्द रूप
268संहारिणीजगत् का संहार करने वाली
269रुद्ररूपाप्रलय में रुद्र रूप
270तिरोधानकरीसब वस्तुओं का तिरोधान कराने वाली, दीप बुझने सा पूर्ण लय
271ईश्वरीतिरोधान करने वाली ईश्वर रूप परमेश्वरी
272सदाशिवासदाशिव स्वरूपा, जब शुद्धतम सत्त्व प्रधान होता है
273अनुग्रहदाअनुग्रह देने वाली, लय के बाद जगत् को फिर प्रकट करने वाली
274पञ्चकृत्यपरायणासृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोधान और अनुग्रह, पाँचों कृत्यों में सदा तत्पर