महिमा और अवस्था-त्रय
नाम एक-सौ-छियासठ से दो-सौ-चौहत्तर तक।

तीसरे खण्ड में देवी का वही रूप उभरता है जिसे भास्करराय अपने सौभाग्य-भास्कर में परा-संवित् कहते हैं, सब दोषों से रहित और सब दोषों को हरने वाली। यहाँ नाम जोड़ों में चलते हैं। एक ओर देवी के स्वरूप का निषेध-वाचक वर्णन है, दूसरी ओर भक्त के भीतर उसी दोष का नाश। यही ललिता का स्वभाव है, जो वे स्वयं नहीं हैं वही वे अपने उपासक से हर लेती हैं।
पहली माला एक ही लय पर चलती है। पहले देवी का अपना निर्मल स्वरूप, फिर उसी निर्मलता का दान। वे स्वयं पाप से सर्वथा रहित हैं, और भक्तों के समस्त पापों को मिटा देती हैं। उनमें क्रोध का लेश नहीं, इसीलिए वे उपासक के भीतर का रोष शान्त कर देती हैं। न उनमें किसी वस्तु की लालसा है, न वे किसी का लोभ रहने देती हैं।
नाम 166,171
यही जोड़ी आगे और गहराती है। देवी में कोई संशय या द्वंद्व नहीं, और वे भक्त के सब संशय मिटा देती हैं। उनका कोई जन्म या उद्भव नहीं, और वे जन्म-मरण के बन्धन को काट देती हैं। उनमें न मन की कल्पना है, न कोई भेद-बुद्धि, और किसी बाधा से वे अविचलित रहती हैं। जो भिन्नता का भाव वासनाओं से उपजता है, उसे भी वे भक्त से दूर कर देती हैं।
नाम 172,179
अब नकार की माला अपने शिखर पर पहुँचती है। देवी अविनाशी हैं, उनका कभी नाश नहीं, और वे साक्षात् मृत्यु का मथन कर देती हैं। वे क्रिया में लिप्त हुए बिना स्थित रहती हैं, कुछ भी संग्रह नहीं करतीं, परम निःस्पृह। उनकी कोई तुलना नहीं, और बीच में एक कोमल चित्र उभर आता है, उनके केश नील-कान्ति वाले, श्याम और चमकीले।
नाम 180,185
इसके बाद देवी की दुर्गमता और दुर्गा-रूप का गायन है। उनका कभी क्षय नहीं होता, उनकी मर्यादा अटल है, उन तक पहुँचना बड़े यत्न से ही सम्भव। वे साक्षात् दुर्गा हैं, दुर्गति का नाश करने वाली, समस्त दुःखों को मिटाने और सुख देने वाली। पापी उन तक नहीं पहुँच पाते, और दुराचार को वे शान्त कर देती हैं, स्वयं हर दोष से रहित।
नाम 186,195
अब सकार-माला आती है, जहाँ देवी का सर्व-व्यापी ऐश्वर्य गाया जाता है। वे सर्वज्ञ हैं, उनकी करुणा सघन और अपार, उनके समान या उनसे अधिक कोई नहीं। वे सब शक्तियों से युक्त हैं, समस्त मंगल की मूल, परम गति देने वाली। चर-अचर सारा जगत् उन्हीं की स्वामिनी का है, और वे उसी जगत् में व्याप्त भी हैं।
नाम 196,203
यहाँ देवी तन्त्र, मन्त्र और यन्त्र का स्वरूप ठहरती हैं। वे समस्त मन्त्रों की सार-स्वरूपा हैं, सब यन्त्रों की आत्मा, सब तन्त्रों का रूप। फिर मनोन्मनी आती हैं, शिव की वह उन्मनी शक्ति जहाँ मन वृत्तियों से ऊपर उठ जाता है। वे महेश्वर की शक्ति माहेश्वरी हैं, सब देवियों में महानतम महादेवी, और सम्पदा की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी।
नाम 204,210
अब महा-शब्द से आरम्भ होने वाले नामों की लम्बी माला खुलती है। देवी शिव की प्रिया हैं, विराट् रूप वाली, परम पूजनीय, घोरतम पापों को भी मिटाने वाली। वे महामाया हैं, समस्त जगत्-प्रपंच का आधार-भूत आवरण, और महासत्त्वा, परम शुद्ध सत्ता।
नाम 211,216
यहाँ देवी के ऐश्वर्य, वीर्य, बल, बुद्धि और सिद्धि का गायन है। वे महान् शक्ति-स्वरूपा हैं, असीम आनन्द और प्रीति, भोग और ऐश्वर्य की स्वामिनी। उनका वीर्य महान्, बल अपरिमित, बुद्धि सर्वोच्च, और वे परम सिद्धियों से सम्पन्न हैं। योगियों के भी ईश्वर की वे ईश्वरी ठहरती हैं।
नाम 217,225
अब महा-माला उपासना की ओर मुड़ती है। देवी कुलार्णव और ज्ञानार्णव जैसे महान् तन्त्रों में उपास्य हैं, पञ्चदशी श्रीविद्या-मन्त्र की मूर्ति, और श्रीचक्र के रूप में स्थित महायन्त्र। वे महान् आसन पर विराजती हैं, महायाग की क्रमबद्ध विधि से आराधित होती हैं, और साक्षात् महाभैरव शिव के द्वारा भी पूजित।
नाम 226,231
महा-माला अपने शिखर तक चढ़ती है। महाकल्प के अन्त में महेश्वर जब प्रलयंकर महाताण्डव करते हैं, तब देवी उसकी अविचल साक्षी हैं। वे महाकामेश्वर शिव की पटरानी, उनकी महिषी हैं, और अन्ततः महात्रिपुरसुन्दरी, तीनों पुरों में परम सुन्दर परा-शक्ति।
नाम 232,234
अब चकार से सजी माला आती है, जहाँ श्रीविद्या और श्रीचक्र का विस्तार है। देवी चौंसठ उपचारों से पूजित होती हैं, चौंसठ कलाओं की स्वरूपा, और चौंसठ करोड़ योगिनी-गणों से सेवित। वे मनु और चन्द्रदेव द्वारा उपासित श्रीविद्या-स्वरूपा हैं, और चन्द्रमण्डल के मध्य में निवास करती हैं।
नाम 235,240
यहाँ देवी का सौन्दर्य और उनका सर्व-स्वामित्व साथ-साथ गाया जाता है। उनका रूप मनोहर, मुस्कान मोहक, और मस्तक पर सुन्दर चन्द्रमा की कला। वे चर-अचर समस्त जगत् की स्वामिनी हैं, और चक्रराज श्रीचक्र को अपना निवास बनाकर वहीं विराजती हैं।
नाम 241,245
अब देवी का परिचित रूप उभरता है, पर्वतराज हिमवान् की पुत्री पार्वती, कमल-से विशाल नेत्रों वाली, पद्मराग मणि-सी लाल कान्ति वाली। फिर एक गूढ़ चित्र आता है, वे पाँच प्रेतों के आसन पर विराजती हैं, और ये पाँच शक्ति से रहित ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश और सदाशिव हैं। पर वही पाँच जब अपनी-अपनी शक्ति सहित होते हैं, तब देवी ही पञ्च-ब्रह्म-स्वरूपा ठहरती हैं।
नाम 246,250
अब वर्णन भीतर मुड़ता है, देवी के शुद्ध चैतन्य-स्वरूप की ओर। वे चित्-स्वरूपा हैं, परम आनन्द, घनीभूत विज्ञान की एकरस मूर्ति। वे ध्यान, ध्याता और ध्येय, तीनों रूपों में प्रकाशित होती हैं, और धर्म-अधर्म दोनों का अतिक्रमण करने वाली, समस्त विश्व ही जिनका रूप है।
नाम 251,256
अब अवस्था-त्रय और तुरीय का दर्शन है। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति, इन तीनों अवस्थाओं में जीव के रूप में देवी ही विराजती हैं। जागते जीव की वे जाग्रत हैं, स्वप्न में सूक्ष्म शरीर वाले तैजस का अधिष्ठान, और गहरी नींद में सुषुप्ति की अभिमानी प्राज्ञ-चेतना से अभिन्न। और चौथी तुरीय अवस्था में वे आत्मा का परम साक्षात्कार हैं, फिर भी इन सब अवस्थाओं से परे, सबसे रहित।
नाम 257,263
खण्ड के अन्त में देवी के पाँच कृत्य एक संकल्प में समा जाते हैं। वे सृष्टि की रचयित्री हैं और सृष्टि के समय ब्रह्मा-रूप, जगत् की रक्षिका और पालन हेतु गोविन्द-रूप, संहार करने वाली और प्रलय में रुद्र-रूप, सब वस्तुओं का तिरोधान कराने वाली परमेश्वरी। अन्त में वे सदाशिव-स्वरूपा अनुग्रह देती हैं, और सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोधान तथा अनुग्रह, इन पाँचों कृत्यों में सदा तत्पर रहती हैं।