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भागवतम् और पुराणलीला, भक्ति और अवतार

भरत और जड़भरत की कथा

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भरत और जड़भरत की कथा

राजा भरत ने अपना सारा राज्य त्याग दिया था और शालग्राम-क्षेत्र में आकर बस गए थे। वहाँ उनका मन दिन-रात केवल भगवान् वासुदेव में लगा रहता। अहिंसा और संयम में वे सब गुणियों में श्रेष्ठ थे, और उनके होठों पर सदा एक ही माला रहती, “हे यज्ञेश! हे अच्युत! हे गोविन्द! हे माधव! हे अनन्त! हे केशव! हे कृष्ण! हे विष्णो! हे हृषीकेश! हे वासुदेव! आपको नमस्कार।” स्वप्न में भी वे इसके सिवा और कुछ न कहते। भगवान् की पूजा के लिए वे केवल समिधा, पुष्प और कुश बटोरते; इसके अतिरिक्त उनका और कोई काम न था।

यहीं एक प्रश्न उठता है, जो महर्षि मैत्रेय ने पराशरजी से पूछा था। ऐसा पुरुष, इतने पवित्र देश में रहकर, निरन्तर हरि का ही स्मरण करता हुआ भी मुक्त क्यों न हुआ, और उसे फिर ब्राह्मण का जन्म क्यों लेना पड़ा? इसका उत्तर एक छोटी-सी घटना में छिपा है।

एक दिन राजा स्नान के लिए नदी-तीर पर गए। स्नान के बाद वे जप में लगे ही थे कि एक हरिणी वन से जल पीने आयी। वह गर्भवती थी और शीघ्र ही बच्चा जनने वाली थी। वह प्यासी हरिणी ज्यों ही जल पी चुकी, त्यों ही पास कहीं सिंह की भयंकर गर्जना गूँज उठी, जिससे सारे प्राणी काँप गए। घबराकर वह अकस्मात् उछलकर ऊँचे तट पर चढ़ गयी, और इस ऊँची छलाँग से उसका गर्भ नदी में गिर पड़ा। लहरों में बहते हुए उस मृग-बालक को राजा भरत ने उठा लिया। इधर गर्भपात और ऊँची छलाँग के आघात से वह हरिणी वहीं गिरकर मर गयी। उसे मरा देख तपस्वी भरत उस बच्चे को अपने आश्रम ले आए।

राजा उस मृग-शावक का दिन-दिन पालन करने लगे, और वह भी उनके स्नेह में पलकर बढ़ने लगा। वह आश्रम के आस-पास घास चरता, कभी वन में दूर तक चला जाता, पर सिंह के भय से फिर लौट आता; साँझ ढले वह भरत की पर्णशाला के आँगन में आ बैठता। धीरे-धीरे उसी मृग में राजा का मन बँध गया। जिसने राज्य, पुत्र और सारे बन्धु-बान्धव छोड़ दिए थे, वही अब एक हिरन के बच्चे पर ममता करने लगे। जब वह लौटने में देर करता, तो वे व्याकुल होकर सोचते, “कहीं किसी भेड़िये ने उसे खा तो नहीं लिया? किसी सिंह के पंजे में तो नहीं पड़ गया? देखो, उसके खुरों के चिह्नों से यह धरती कैसी सुन्दर लग रही है! मेरे जीवन का वह आधार आज कहाँ रह गया?” और जब वह लौटकर अपने सींगों से उनकी भुजा खुजलाता, तो उनका मुख प्रेम से खिल उठता।

इसी मोह में उनकी समाधि टूट गयी। चंचल मृग के पीछे राजा का स्थिर चित्त भी चंचल हो चला; मृग दूर जाता, तो उनका मन भी दूर चला जाता। अन्त-समय आया, तो वह पला हुआ मृग सजल नयनों से पुत्र की भाँति उन्हें ताकता रहा, और राजा भरत उसी में तन्मय होकर प्राण छोड़ गए; मरते समय उन्होंने और कुछ न सोचा। मृत्यु के उसी दृढ़ भाव के कारण वे जम्बूमार्ग के, कालंजर पर्वत के घोर वन में मृग होकर जन्मे, किन्तु ऐसे मृग, जिसे अपने पूर्वजन्म की स्मृति बनी रही। इस जातिस्मरता के कारण वे संसार से उपराम हो गए, अपनी नयी माता को छोड़कर फिर शालग्राम-क्षेत्र में आ गए, और सूखे घास-पात से देह का पोषण करते हुए उस कर्म को भोगकर चुका देने लगे जिससे उन्हें मृग-योनि मिली थी।

जड़भरत

वह देह छोड़कर उन्होंने एक सदाचार-सम्पन्न योगी के पवित्र कुल में ब्राह्मण-जन्म लिया। इस जन्म में भी उन्हें पूर्वजन्म की स्मृति बनी रही। वे समस्त शास्त्रों के मर्म को जानने वाले थे, अपनी आत्मा को प्रकृति से परे देखते थे, और सारे प्राणियों को अपने से अभिन्न मानते थे। उपनयन हो जाने पर भी वे गुरु के पढ़ाने पर वेद-पाठ न करते, किसी कर्म में मन न लगाते, किसी शास्त्र को न पढ़ते। कोई कुछ पूछता तो वे जड़ के समान असंस्कृत, ग्रामीण वचन बोल देते। मैले शरीर, मलिन वस्त्र और अपरिमार्जित दाँतों के कारण नगर के लोग उन्हें सदा तुच्छ समझते। पर यह उनकी अपनी साधना थी। वे जानते थे कि योगी के लिए सबसे बड़ी हानि सम्मान ही है; जो दूसरों से अपमानित होता है, वह शीघ्र सिद्धि पा लेता है। इसी हिरण्यगर्भ-वचन को स्मरण कर वे जान-बूझकर लोगों के सामने जड़ और उन्मत्त-से बने रहते।

पिता के चले जाने पर उनके भाई-बन्धु उनसे खेती-बारी का काम कराने लगे और बदले में सड़ा-गला अन्न दे देते। बैल के समान हृष्ट-पुष्ट, पर काम में जड़-से, वे जो मिल जाता उसी को खा लेते। एक बार राजा पृषत के सेवकों ने उन्हें बलि-पशु बना लिया; रात्रि में विधि-विधान से सजाकर वे उन्हें कालिका के सामने बलि चढ़ाने चले। किन्तु एक परम योगीश्वर को इस प्रकार बलि के लिए उपस्थित देख स्वयं महाकाली प्रकट हुईं; उन्होंने तीखा खड्ग उठाकर उस क्रूरकर्मा सेवक का ही गला काट डाला और अपने पार्षदों सहित उसका रुधिर पान किया।

शिबिका का रहस्य

उन्हीं दिनों सौवीर देश के राजा एक बड़ी जिज्ञासा लिए यात्रा पर निकले थे। इक्षुमती नदी के तट पर कपिल मुनि से उन्हें यह पूछना था कि इस दुःखमय संसार में मनुष्यों का सच्चा श्रेय किसमें है। राजा शिबिका पर सवार थे, और मार्ग में बेगार के लिए जो मजदूर पकड़े गए, उनमें राख में छिपी आग-सा तेजस्वी वह हृष्ट-पुष्ट ब्राह्मण भी था। सेवकों की आज्ञा से जड़भरत भी शिबिका उठाकर चलने लगे। किन्तु वे धरती पर चार हाथ आगे तक देखकर मन्द गति से चलते; बाकी कहार तेज़ चलते, सो शिबिका डगमगाने लगी।

राजा ने झुँझलाकर कहा, “अरे कहार! यह क्या कर रहे हो? सबके साथ बराबर चाल से चलो।” पर गति फिर भी विषम देखकर उन्होंने कहा, “क्यों, इस प्रकार असमान चाल से क्यों चल रहे हो?” कहारों ने जड़भरत की ओर इशारा कर कहा, “हममें से यही एक धीरे-धीरे चलता है।” तब राजा बोले, “आपने अभी थोड़ी ही दूर मेरी शिबिका उठायी है; क्या इतने में ही थक गए? देखने में तो आप खूब हृष्ट-पुष्ट हैं, फिर क्या इतना श्रम भी नहीं सहा जाता?”

जड़भरत ने शान्त स्वर में उत्तर दिया, “न मैं मोटा हूँ, न मैंने आपकी शिबिका उठा रखी है; न मैं थका हूँ, न मुझे कोई श्रम सहना है।” राजा ने कहा, “आप तो प्रत्यक्ष ही मोटे दिखायी देते हैं, और यह शिबिका इस समय भी आपके कन्धे पर रखी है; बोझ ढोने से देहधारी को श्रम होता ही है।” ब्राह्मण बोले, “पहले यह बताइए कि आपको प्रत्यक्ष क्या दिखायी दे रहा है। देखिए, पृथ्वी पर मेरे पैर हैं, पैरों पर जंघाएँ, जंघाओं पर ऊरु, ऊरुओं पर उदर, उदर पर वक्ष, भुजाएँ और कन्धे, और कन्धों पर यह शिबिका। इसमें भला मेरे ऊपर बोझ कहाँ रहा? इस शिबिका में जिसे आपका शरीर कहा जाता है वह रखा है; तो ‘आप वहाँ हैं और मैं यहाँ’, ऐसा कहना ही मिथ्या है। हे राजन्! मैं, आप और सब जीव इन्हीं पंचभूतों से ढोए जा रहे हैं, और ये भूत भी गुणों के प्रवाह में बहे जा रहे हैं; गुण कर्म के वश हैं, और कर्म अविद्या से उपजा है। आत्मा तो शुद्ध, अक्षर, शान्त, निर्गुण और प्रकृति से परे है, सब जीवों में एक ही ओत-प्रोत; उसकी न वृद्धि होती है, न क्षय। फिर मैं ‘मोटा हूँ’ यह कहूँ तो किस आधार पर?”

यह सुनकर राजा शिबिका से उतर पड़े और उनके चरण पकड़ लिए, “अहो द्विजराज! इस शिबिका को छोड़िए और मुझ पर कृपा कीजिए। इस जड़-वेश में आप कौन हैं? किसलिए यहाँ आना हुआ? मुझे बताइए, मैं सुनने को अत्यन्त उत्कण्ठित हूँ।”

अब जड़भरत ने उन्हें परमार्थ का सार सुनाया। राजा ने पूछा था कि मनुष्य का सच्चा श्रेय क्या है। जड़भरत बोले, “श्रेय तो सैकड़ों-हज़ारों हैं, पर वे परमार्थ नहीं। धन को परमार्थ कहें, तो वह धर्म के लिए त्यागा भी जाता है और भोग के लिए खर्च भी; तो वह परमार्थ कैसे हुआ? पुत्र को परमार्थ कहें, तो वह किसी और का, अपने पिता का परमार्थ है, और वह पिता भी किसी का पुत्र; इस प्रकार तो कारण की श्रृंखला कहीं न रुकेगी। राज्य क्षणभंगुर है; यज्ञ-कर्म नाशवान् द्रव्यों से बनता है, इसलिए वह भी नाशवान्; निष्काम कर्म भी मुक्ति का साधन-मात्र है, स्वयं परमार्थ नहीं। परमार्थ तो वह एक आत्मा है, सर्वव्यापी, सम, शुद्ध, निर्गुण, जन्म और वृद्धि से रहित तथा अव्यय। बाँसुरी के छिद्रों में एक ही वायु से जैसे भिन्न-भिन्न स्वर उठते हैं, वैसे ही उपाधियों के कारण एक ही परमात्मा देव और मनुष्य आदि अनेक रूपों में प्रतीत होता है। यह भेद केवल अविद्या के आवरण तक है; आवरण हटते ही वह नहीं रहता।”

जिस भरत का मन एक मृग के मोह में उलझकर मुक्ति से चूक गया था, वही जड़भरत बनकर सौवीर-नरेश को यह आत्म-बोध करा गए, कि ढोने वाला और ढोया जाने वाला, ऊँच और नीच, राजा और कहार, सब अविद्या की ही रचना हैं।

आधार: विष्णुपुराण (गीता प्रेस, गोरखपुर)