
प्राकार की दीवार से कूदकर हनुमान जी अशोक-वाटिका के भीतर उतरे। महातेजस्वी पवनपुत्र ने एक क्षण मन ही मन सोचा और सीता तक पहुँचने का संकल्प बाँधकर रावण के भवन की रक्षा-दीवार से वाटिका के घेरे में छलाँग लगाई। दीवार पर खड़े होकर उन्होंने वसन्त के आरम्भ में फूले हुए साल, अशोक, चम्पक और उद्दालक वृक्ष देखे; नागकेसर देखे; और बंदर के मुख-सी लाल मंजरियों वाले आम के पेड़ देखे, जो सैकड़ों लताओं से लिपटे थे। राम के धनुष से छूटे बाण के समान वे उस उपवन में जा गिरे।
अशोक-वाटिका का दर्शन और शिंशपा वृक्ष
वाटिका के भीतर घुसकर बलवान हनुमान ने उस अद्भुत उपवन को देखा। वहाँ पक्षियों का कलरव था, चारों ओर सोने-चाँदी के वृक्ष थे, हिरनों के झुंड घूमते थे, और लाल-लाल पुष्पों से वाटिका उगते सूर्य-सी लाल जान पड़ती थी। मस्त कोयलें और भौंरे वहाँ सदा बसते थे; मद से उन्मत्त मोर बोल रहे थे।

उछलते-फलाँगते कपिवर इधर-उधर दौड़े। उनके वेग से वृक्ष काँप उठे और भाँति-भाँति के फूल झड़ गए। पत्तों और फूलों से ढककर हनुमान अशोक-वाटिका के बीच फूलों के पर्वत-से सुशोभित हुए। सब चराचर प्राणी उन्हें वृक्षों के झुरमुट में दौड़ता देखकर समझे, “यह तो साक्षात् वसन्त है।”
उन्होंने मणियों से जड़ी और सोने-चाँदी से मढ़ी मनोहर भूमियाँ देखीं। उत्तम जल से भरी बावलियाँ देखीं, जिनकी सीढ़ियाँ बहुमूल्य मणियों की थीं, जिनके तल स्फटिक (पारदर्शी रत्न) के थे और तट पर सोने के वृक्ष लगे थे। उनमें कमल और कुमुद खिले थे, चकवे शोभा बढ़ा रहे थे, और हंस-सारस की ध्वनि गूँज रही थी। एक ओर बादल-सा ऊँचा पर्वत देखा, जिसकी चोटियाँ ऊपर उठी थीं और जो चारों ओर अन्य शिखरों से घिरा था। उस पर्वत से उतरती एक नदी देखी, मानो प्रिय की गोद से रूठकर उछलकर गिरी हो; और फिर लौटती हुई धारा, मानो प्रसन्न होकर प्रियतम के पास फिर आ गई हो।

तब महाकपि ने एक सुनहरी शिंशपा (अशोक की एक जाति का वृक्ष) देखी, जो असंख्य लताओं से लिपटी थी, पत्तों से ढकी थी, और चारों ओर स्वर्ण-वेदियों से घिरी थी। पत्तों से ढकी उसी शिंशपा पर चढ़कर महावेगवान हनुमान ने मन में सोचा, “यहीं से मैं विदेहराजकुमारी वैदेही को देखूँगा, जो राम के दर्शन को तरस रही होंगी और शोक से व्याकुल होकर इधर-उधर भटक रही होंगी।” वे विचार करते रहे कि सीता सन्ध्या-वन्दना या स्नान के लिए इस शीतल जल वाली नदी के तट पर अवश्य आएँगी, और फूली-पत्तों से घनी उस शिंशपा में छिपकर सारी वाटिका पर दृष्टि रखने लगे।
समझने की कुंजी। “अशोक” का अर्थ ही है “शोक-रहित”। जिस वाटिका का नाम शोक मिटाने वाला है, वहीं सीता शोक में डूबी मिलेंगी। वाल्मीकि इस विरोधाभास को बार-बार छूते हैं।
सार: समुद्र लाँघकर लंका पहुँचे हनुमान अशोक-वाटिका में प्रवेश करते हैं, उसका कोना-कोना छानते हैं, और एक पत्तों-भरी शिंशपा पर छिपकर सीता की प्रतीक्षा करने लगते हैं।
सीता का प्रथम दर्शन
शिंशपा पर बैठे हनुमान सीता को ढूँढ़ते हुए सारी भूमि पर दृष्टि घुमाते रहे। तभी उन्होंने थोड़ी दूरी पर एक भव्य चैत्य-प्रासाद (मन्दिर-सा ऊँचा भवन) देखा, जो बीच में हज़ार खम्भों पर टिका था, कैलास-सा श्वेत और निर्मल था, मूँगे की सीढ़ियों और तपे सोने की वेदियों से युक्त था।

उसी के समीप उन्होंने राक्षसियों से घिरी एक स्त्री देखी, जो उपवास से कृश थी, दीन दिखती थी, बार-बार आहें भर रही थी, और शुक्लपक्ष के आरम्भ की चन्द्र-रेखा-सी निर्मल थी। मैली एक ही पीली साड़ी पहने, धूल से सनी, सब आभूषणों से रहित, वह कमल-रहित पंकिल कमल-सरोवर-सी जान पड़ती थी; मंगल-ग्रह से पीड़ित रोहिणी-सी पीड़ित थी; आँसुओं से भीगे मुख वाली, झुंड से बिछुड़ी और कुत्तों से घिरी हिरनी-सी थी। एक ही लम्बी काली वेणी जाँघ तक लटकती थी, मानो वर्षा के अन्त में बादल हटने पर हरी वृक्ष-पंक्ति से ढकी पृथ्वी हो।
उस विशाल नेत्रों वाली, अत्यन्त मलिन और कृश स्त्री को देखकर हनुमान ने युक्तियों से अनुमान किया, “यही सीता हैं।” उन्होंने सोचा, “जिस रूप में हमने उस दिन ऋष्यमूक पर्वत के ऊपर से रावण द्वारा हरी जाती हुई देवी को देखा था, ठीक उसी रूप की यह अंगना है।” फिर हनुमान को आभूषण पहचानने में देर न लगी। राम ने किष्किन्धा से चलते समय सीता के अंगों पर जो आभूषण बताए थे, वे ही आभूषण उन्होंने देखे; यद्यपि बहुत दिनों तक न माँजे जाने के कारण मलिन हो गए थे, उनका आकार वही था।
एक उप-कथा: हनुमान को याद आया कि जब रावण सीता को आकाश-मार्ग से ले जा रहा था, तब सीता ने अपने आभूषण और पीला उत्तरीय (दुपट्टा) ऋष्यमूक पर्वत पर बैठे वानरों के बीच गिरा दिया था। सोने की पाँत-सा वह उत्तरीय वृक्ष में अटका मिला था। वही चिह्न अब पहचान का आधार बने।
हनुमान ने मन में कहा, “जिस उत्तरीय को इन्होंने तब गिराया था, उसकी टेर वही है। ये सोने-से अंगों वाली राम की प्रिय और सती पत्नी हैं, जो दृष्टि से ओझल होने पर भी राम के मन से ओझल नहीं हुईं। इन्हीं के लिए राम चार वेदनाओं से तप रहे हैं, एक असहाय रक्षणीया स्त्री के लोप पर करुणा से, अपने आश्रित पर वत्सलता से, अपनी पत्नी के खो जाने पर शोक से, और प्रिया के प्रति प्रेम से।” इस प्रकार सीता को देखकर पवनपुत्र हर्षित हुए, मन ही मन राम तक पहुँचे और उस प्रभु की प्रशंसा की।
सार: हज़ार-खम्भों वाले मन्दिर के पास, राक्षसियों के बीच बैठी, कृश और मलिन सीता को हनुमान आभूषणों और रूप से पहचान लेते हैं और हर्षित होते हैं।
हनुमान का विलाप और राम के पराक्रम का स्मरण
प्रशंसा-योग्य सीता और गुणों से मनोहर राम, दोनों की प्रशंसा करके हनुमान फिर चिन्ता में डूब गए। आँसू-भरी आँखों से उन्होंने विलाप किया, “यदि लक्ष्मण के बड़े भाई राम की मान्या प्रिया सीता भी दुःख से इतनी आर्त हैं, तो निश्चय ही काल का प्रवाह दुरतिक्रम (लाँघने में अति कठिन) है। राम और बुद्धिमान लक्ष्मण के पराक्रम को जानने वाली देवी वर्षा के आगमन पर गंगा की भाँति अधिक विचलित नहीं होतीं।”
नवस्वर्ण-सी आभा वाली, समस्त लोक को प्रिय लक्ष्मी-सी उस देवी को देखकर हनुमान ने सोचा, “इन्हीं विशाल नेत्रों वाली के लिए महाबली वाली मारा गया; रावण के समान पराक्रमी कबन्ध गिराया गया; भयंकर पराक्रमी राक्षस विराध संग्राम में मारा गया; जनस्थान में अग्नि-शिखा-से बाणों से चौदह हज़ार राक्षस संहार किए गए; खर मारा गया, त्रिशिरा गिराया गया, महातेजस्वी दूषण भी राम के हाथों मारा गया। इन्हीं के निमित्त सुग्रीव को वालि से सुरक्षित दुर्लभ वानर-राज्य मिला; और इन्हीं विशाल नेत्रों वाली के लिए मैंने समुद्र लाँघा और यह लंका-नगरी छान डाली। यदि राम इनके लिए समुद्र-पर्यन्त पृथ्वी, या समूचे जगत् को उलट दें, तो भी उचित ही है।”
“यह जनक की पुत्री हैं, पति-व्रत में अडिग। हल की नोक से खेत जोते जाते समय भूमि फोड़कर उठी थीं, खेत की पराग-सी धूल से ढकी हुई। ये दशरथ की ज्येष्ठ पुत्रवधू हैं। समस्त भोग त्यागकर, कष्टों की परवाह न करके, पति-स्नेह के बल इन्होंने निर्जन वन में प्रवेश किया था। फल-मूल से सन्तुष्ट रहने वाली, पति-सेवा में लीन यह सोने-सी अंगों वाली देवी, जो वन में भी भवन-सा सुख पाती थीं, आज यहाँ यह यातना भोग रही हैं।”
“पति ही स्त्री का परम भूषण है, आभूषण से भी बढ़कर। उसी से रहित होने के कारण सजने-योग्य होते हुए भी ये नहीं सज पातीं। पाला पड़े कमल-पौधे-सी कान्ति-रहित, बिछुड़ी चकवी-सी दीन हो गई हैं। फूलों के भार से झुकी अशोक-वृक्षों की डालियाँ इनके शोक को और बढ़ाती हैं; और शिशिर बीतकर वसन्त आ जाने से शीतल किरणों वाला चन्द्रमा भी इन्हें सहस्र-किरण सूर्य-सा प्रचण्ड लगता है।” इस प्रकार सब प्रयोजन विचारकर, और यह निश्चय करके कि “यही सीता हैं”, महाबली कपि-श्रेष्ठ उस वृक्ष पर दृढ़ बैठे रहे।
सार: हनुमान सीता की पतिव्रता-महिमा को याद करते हैं और गिनाते हैं कि उन्हीं के लिए वाली, कबन्ध, विराध, खर-दूषण-त्रिशिरा और जनस्थान के चौदह हज़ार राक्षस संहार हुए।
चन्द्रोदय, राक्षसियाँ और राम-लक्ष्मण को प्रणाम
तभी दिन के अन्त में निर्मल चन्द्रमा कुमुद-समूह-सा उदित हुआ, मानो नीले जल में तैरता हंस नभ में चढ़ रहा हो। उसने अपनी शीतल किरणों से, मानो हनुमान की सहायता करते हुए, सीता को स्पष्ट दिखाया। तब हनुमान ने पूर्णचन्द्र-सी मुख वाली सीता को देखा, जो शोक के भार से दबी थीं, मानो भार से जल में डूबती नौका हो।

सीता को देखने की चेष्टा करते हुए हनुमान ने उनके पास बैठी घोर दर्शन वाली राक्षसियाँ देखीं। कोई एक आँख वाली, कोई एक कान वाली, कोई कान को ही शरीर पर ओढ़ने वाली, कोई बिना कान की, कोई गाय-हाथी-घोड़े के कान वाली; किसी की नाक हाथी की सूँड़-सी, किसी की नाक माथे पर; किसी के पैर हाथी या घोड़े के, कोई एक हाथ-एक पैर वाली, कोई बिना पैर की; किसी का सिर और गला अत्यन्त बड़ा, किसी के स्तन और पेट अत्यन्त बड़े; किसी की जीभ लम्बी, कोई बकरी-हाथी-गाय-सूअर के मुख वाली, कोई घोड़े-ऊँट-गधे के मुख वाली। ये धूम्र-रंग के बाल वाली, विकृत-मुख राक्षसियाँ निरन्तर मद्य पीती थीं, मांस-रक्त खाती थीं, और अपने शरीर पर मांस-रक्त मलती थीं। इनके बीच, उस सुन्दर तने वाले वृक्ष के नीचे, हनुमान ने उस अनिन्द्य देवी राजकुमारी को देखा।
श्रीमान् हनुमान ने जनकात्मजा सीता को देखा, कान्ति-हीन, मानो पृथ्वी पर गिरा तारा; शोक से सन्तप्त; बालों में मैल भरे; पर पति के प्रति चरित्र की महिमा से ऊँची। उत्तम आभूषणों से रहित होते हुए भी वे पति की वत्सलता से अलंकृत थीं। राक्षसराज द्वारा रोकी गई, बन्धुओं से अलग, वे झुंड से जुदा सिंह-बँधी हथिनी-सी, या शरद् के बादलों से ढकी चन्द्र-रेखा-सी थीं। मैल से सने अंगों वाली होकर भी, स्वाभाविक कान्ति से ढकी, वे पंक में सनी मृणाल-सी “शोभा भी पाती थीं, शोभा भी नहीं पाती थीं।” मैथिली को देखकर पवनपुत्र को अतुल हर्ष हुआ। हर्ष के आँसू बहाते हुए उन्होंने राम को प्रणाम किया, फिर राम और लक्ष्मण को मन में नमस्कार करके पत्तों की ओट में छिप गए।
सार: चन्द्रोदय से सीता का स्पष्ट दर्शन होता है; पास बैठी विकृत-रूपा राक्षसियों को देखकर हनुमान राम-लक्ष्मण को मन में प्रणाम करके फिर छिप जाते हैं।
रावण का आगमन
हनुमान इसी प्रकार वाटिका को देख रहे थे कि रात्रि बीतने को आई। रात के अन्त में उन्होंने वेद-वेदांगों के ज्ञाता ब्रह्मराक्षसों के घरों से वेद-घोष सुना। तभी मंगल-वाद्यों और कानों को प्रिय स्तुतियों से महाबली दशग्रीव रावण जगाया गया। माला और वस्त्र अस्त-व्यस्त किए जागते ही प्रतापी राक्षसेन्द्र ने वैदेही का स्मरण किया। मद से उन्मत्त वह राक्षस काम से अत्यन्त विवश था, और उस काम को मन में छिपा न सका।

समस्त आभूषणों से सजा, अनुपम शोभा धारण किए रावण अशोक-वाटिका के मार्गों को देखता हुआ भीतर घुसा। मन्द-मन्द चलते हुए, सीता में आसक्त-मन वह दुष्ट दशग्रीव शोभायमान हो रहा था। उसके पीछे केवल सौ रमणियाँ चल रही थीं, जैसे इन्द्र के पीछे देव-गन्धर्व-स्त्रियाँ चलती हैं। कोई सोने की डंडी वाली दीपिकाएँ लिए थी, कोई चँवर, कोई ताड़-पत्र के पंखे; कोई सोने की झारी में जल लिए आगे चल रही थी, तो कोई पीछे गद्दियाँ लिए। नींद और मद से इनकी आँखें झुक रही थीं, मालाएँ खिसक गई थीं, चन्दन-लेप मिट गया था, और मुख पसीने से भीग गए थे।
हनुमान ने वाटिका के द्वार के पास आते हुए उस रावण को देखा, जिसने अनुपम कर्म किए थे और जिसका बल-पौरुष अचिन्त्य था; जो काम-गर्व-मद से युक्त, लाल-लम्बी आँखों वाला, धनुष-रहित कामदेव-सा था; जो अपना श्वेत उत्तरीय सँभाल रहा था। तब पत्तों की ओट में छिपकर हनुमान ने रावण को पहचानने का यत्न किया। चारों ओर देखते हुए कपिकुंजर हनुमान ने रावण की रूप-यौवन-सम्पन्न श्रेष्ठ रानियाँ भी देखीं। मद-मत्त, विचित्र आभूषणों वाला, नुकीले कानों वाला विश्रवा-पुत्र राक्षसाधिप तारों के बीच चन्द्रमा-सा स्त्रियों से घिरा था। यह पहचानकर कि “यह वही महाबाहु रावण है जो रात नगर के बीच उत्तम भवन में सोया था”, महातेजस्वी हनुमान उस डाल से नीचे उतरे और रावण के तेज से दबकर पत्तों की घनी ओट में छिप गए। सीता को देखने को उत्सुक रावण उनकी ओर बढ़ा।
सार: रात्रि के अन्त में जागा रावण काम से विवश होकर सौ रमणियों के साथ वाटिका में आता है; हनुमान उसे पहचानकर पत्तों में छिप जाते हैं।
सीता का काँपना और रावण का निकट आना

उसी क्षण रूप-यौवन-सम्पन्न, उत्तम आभूषणों से सजे राक्षसाधिप रावण को देखते ही अनिन्द्य राजकुमारी वैदेही पवन में हिलते केले-वृक्ष-सी काँप उठीं। जाँघों से उदर और भुजाओं से वक्षःस्थल ढककर वे विशाल नेत्रों वाली रोती हुई बैठ गईं।
दशग्रीव ने राक्षसियों से रक्षित वैदेही को देखा, दीन, दुःख से आर्त, समुद्र में डूबती नौका-सी। खुली भूमि पर बैठी संशित-व्रता सीता वृक्ष से कटी, भूमि पर गिरी डाली-सी थीं। मैल को ही आभरण-सा धारण किए, सजने-योग्य होकर भी असज्जित, पंक में सनी मृणाल-सी वे शोभा भी पाती थीं और नहीं भी। संकल्प-रूपी घोड़ों से जुते मनोरथ-रथ पर चढ़कर वे मानो विदितात्मा राजसिंह राम के पास जा रही हों। अकेली, रोती हुई, ध्यान-शोक में लीन, दुःख का कोई अन्त न देखती हुई, वे राम की अनुगामिनी थीं। मन्त्र से अभिमन्त्रित नागराज-वधू-सी छटपटाती, धूम्र-केतु से पीड़ित रोहिणी-सी पीड़ित, सदाचारी कुल में जन्मी और धार्मिक कुल में ब्याही होकर भी वे दुष्कुल में उत्पन्न-सी मलिन दिख रही थीं।
राम के पराभव से रावण के विनाश की कामना करती हुई, हाथ जोड़े मानो देवता से प्रार्थना करती हुई, रोती हुई, राम के प्रति अत्यन्त अनुरक्त उस मैथिली को रावण अपने ही विनाश के लिए लुभाने लगा।
सार: रावण को देखते ही सीता काँपती और रोती हैं; वाल्मीकि उनकी दशा को अनेक उपमाओं में चित्रित करते हैं, और रावण उन्हें अपने ही नाश के लिए लुभाने बढ़ता है।
रावण का प्रलोभन
उस दीन, निरानन्द, तपस्विनी सीता से रावण मधुर और भाव-भरे वचन कहने लगा: “हे गज-सूँड़-सी जाँघों वाली! स्तन और उदर ढककर आप मुझसे भय के कारण मानो अपने को ओझल कर लेना चाहती हैं। हे विशाल नेत्रों वाली! मैं आपको चाहता हूँ; आप मुझे आदर दें। हे सीता! मुझसे उठा आपका भय जाता रहे, यहाँ इच्छानुसार रूप बदलने वाला कोई मनुष्य या राक्षस नहीं है।”
“हे भीरु! परस्त्री के पास जाना या बल से उसका हरण करना, यह राक्षसों का स्वधर्म है, इसमें सन्देह नहीं। फिर भी, हे मैथिली, जब तक आप मुझे न चाहें, मैं आपको छूऊँगा नहीं। मुझ पर विश्वास करें; शोक के वश न हों। एक ही वेणी रखना, भूमि पर सोना, सदा ध्यान में रहना, मैला वस्त्र पहनना, बिना अवसर के उपवास करना, ये सब आपके योग्य नहीं। हे मैथिली! मुझे पाकर भाँति-भाँति की मालाएँ, चन्दन-अगुरु, दिव्य वस्त्र-आभूषण, बहुमूल्य पेय, शय्या, आसन, गीत-नृत्य-वाद्य भोगिए। आप स्त्री-रत्न हैं; इस मलिन दशा में न रहें।”
“यह आपका सुन्दर यौवन बीता जा रहा है; जो बीत गया वह नदी की धारा-सा फिर नहीं लौटता। विश्वकर्ता ने आपको रचकर मानो रूप-रचना से ही विराम ले लिया, क्योंकि आपके समान रूप वाली कोई दूसरी नहीं। हे वैदेही! आपको पाकर साक्षात् पितामह ब्रह्मा भी संयम न रख पाएँ। पति-निष्ठा का यह मोह छोड़िए और मेरी अग्रमहिषी बनिए। नाना राज्यों से बल-पूर्वक लाए गए सब रत्न, और मेरा राज्य भी, मैं आपको देता हूँ। समूची पृथ्वी जीतकर आपके लिए मैं आपके पिता जनक को दे दूँगा। तीनों लोकों में मेरे समान बली कोई नहीं; युद्ध में देव-असुर भी बार-बार मुझसे पराजित हुए हैं।”
“राम तपस्या, बल, पराक्रम, धन, तेज या यश में मेरे तुल्य नहीं। राम चीर पहने वन में भटकता है; न जाने जीवित है या नहीं। मेघों से ढकी चाँदनी को बगुले जैसे नहीं देख पाते, वैसे ही राम आपको देख भी न सकेगा। जैसे विष्णु ने तीन डगों में असुरों से दीप्त सम्पदा छीनी, वैसे ही राम मेरे हाथ से आपको नहीं छुड़ा सकेगा। आइए, पीजिए, विहार कीजिए, भोग भोगिए; अपने बन्धुओं को धन और पृथ्वी बाँट दीजिए। कुसुमित वृक्षों से भरे, भौंरों से गूँजते समुद्र-तट के उपवनों में सोने के हारों से सजी होकर मेरे साथ विहार कीजिए।”
सार: रावण सीता को मधुर वचनों से, राज्य-धन-भोग के प्रलोभन से, और राम को तुच्छ बताकर अग्रमहिषी बनने को फुसलाता है।
सीता का तृण की ओट से उत्तर
उस रौद्र राक्षस के वचन सुनकर आर्त सीता ने दीन स्वर में धीरे से उत्तर दिया। दुःख से आर्त, रोती, काँपती, पतिव्रता सीता पति का ही चिन्तन करती हुई, अपने और रावण के बीच एक तृण रखकर बोलीं, “मुझसे अपना मन हटाइए और अपनी ही स्त्रियों में उसे रमाइए।”
“जैसे पापी सिद्धि की याचना नहीं कर सकता, वैसे ही आप मुझे पाने के योग्य नहीं। पतिव्रता द्वारा निन्दित अकार्य मुझसे नहीं हो सकता; मैं उत्तम कुल में जन्मी और पवित्र कुल में ब्याही हूँ।” यह कहकर, और रावण की ओर पीठ करके, यशस्विनी वैदेही ने फिर कहा, “मैं दूसरे की पतिव्रता पत्नी हूँ; आपकी विवाहिता नहीं हो सकती। हे निशाचर! भली प्रकार धर्म पर दृष्टि रखिए और सत्पुरुषों का व्रत आचरिए। जैसे आपकी स्त्रियाँ रक्षणीय हैं, वैसे ही दूसरों की स्त्रियाँ भी। अपने को आदर्श बनाकर अपनी ही स्त्री में रमिए। अपनी पत्नी से असन्तुष्ट, चपल-इन्द्रिय, निकृष्ट-बुद्धि पुरुष को परस्त्री पराभव की ओर ले जाती है।”
“यहाँ या तो सत्पुरुष नहीं हैं, या आप उनका अनुसरण नहीं करते, क्योंकि आपकी बुद्धि विपरीत और आचारहीन है। अधर्म में रत, मन को न जीत सकने वाले राजा को पाकर समृद्ध राष्ट्र और नगर भी नष्ट हो जाते हैं। उसी प्रकार आपको पाकर रत्न-राशि से भरी लंका भी आप एक के अपराध से शीघ्र नष्ट हो जाएगी।”
“मैं ऐश्वर्य या धन से लुभाई नहीं जा सकती; जैसे प्रभा सूर्य से अभिन्न है, वैसे ही मैं राघव से अनन्या हूँ। उस लोकनाथ की सत्कृत भुजा का आश्रय लेकर मैं किसी और की भुजा का आश्रय कैसे लूँ? जैसे विदितात्मा, व्रत-स्नात ब्राह्मण को ही विद्या उचित है, वैसे ही मैं उसी धरापति की उचित पत्नी हूँ। हे रावण! भली प्रकार मुझ दुःखिनी को राम से मिला दीजिए, जैसे वन में मद-मत्त हथिनी को गजराज से मिलाया जाता है।”

“यदि आप अपनी लंका को बचाना और घोर बन्धन से बचना चाहते हैं, तो पुरुषर्षभ राम से मित्रता कीजिए। वे सर्व-धर्मज्ञ और शरणागत-वत्सल हैं; यदि जीवित रहना चाहते हैं तो उन्हें प्रसन्न कीजिए। संयत होकर मुझे उन्हें लौटा दीजिए, इसी में आपका कल्याण है; अन्यथा परम विपत्ति पाएँगे। छोड़ा हुआ वज्र अपराधी को बख्श दे, यमराज भी अपराधी को बहुत काल तक छोड़ दें, पर क्रुद्ध हुआ लोकनाथ राघव आप-जैसे को नहीं छोड़ेगा। आप शीघ्र ही राम के धनुष का वज्र-गर्जन-सा महानाद सुनेंगे। राम-लक्ष्मण के नाम-चिह्नित बाण ज्वलित-मुख सर्पों-से इस नगरी पर बरसेंगे और एक भी स्थान बिना ढके न छोड़ेंगे। जैसे विनतापुत्र गरुड़ सर्पों को, वैसे ही राम-रूपी महान् गरुड़ राक्षसेन्द्र-रूपी सर्पों को उखाड़ देगा।”
“जनस्थान में राक्षस-सेना के संहार और वहाँ अपनी जड़ खो देने पर, उसका बदला लेने में असमर्थ होकर ही, हे राक्षस, आपने यह नीच कर्म किया। जब वे नर-सिंह दोनों भाई शिकार को गए थे, तब उनके सूने आश्रम में घुसकर, हे अधम, आप मुझे हर लाए। बाघों के सामने कुत्ता नहीं ठहर सकता, वैसे ही राम-लक्ष्मण की गन्ध पाकर भी आप उनके सामने नहीं ठहर सकेंगे। शीघ्र ही मेरे स्वामी राम सौमित्रि लक्ष्मण के साथ, जैसे सूर्य उथले जल को सोख लेता है, वैसे ही बाणों से आपके प्राण हर लेंगे। कैलास पर कुबेर के घर भागिए या वरुण की सभा में जाइए, काल-हत वृक्ष-से आप दशरथपुत्र राम के बाणों से अवश्य प्राण-हीन होंगे।”
सार: सीता तृण की ओट लेकर रावण को धर्म का उपदेश देती हैं, राम के पराक्रम का स्मरण कराती हैं, और शरणागत होकर उन्हें लौटा देने में ही रावण का कल्याण बतलाती हैं।
रावण की धमकी और दो माह की अवधि
सीता के कठोर वचन सुनकर राक्षसेश्वर रावण ने अप्रिय उत्तर दिया: “जो पुरुष स्त्रियों के प्रति जितना मृदु होता है, स्त्रियाँ उससे उतनी ही अनुकूल होती हैं; पर आपके विषय में मैं जितने प्रिय वचन कहता हूँ, उतना ही अपमानित होता हूँ। आप पर उठा प्रेम ही मेरे क्रोध को रोक रहा है, जैसे कुशल सारथी कुमार्ग पर दौड़ते घोड़ों को रोकता है। इसी कारण, हे वराननी, वध-योग्य होते हुए भी मैं आपको मरवाता नहीं।”
क्रोध से भरकर रावण ने आगे कहा: “जो बारह माह की अवधि मैंने रखी है, उसके दो माह मुझे और रुकना है; उसके बाद, हे वरवर्णिनी, आप मेरी शय्या पर आएँ। दो माह बाद भी यदि आप मुझे पति रूप में न चाहेंगी, तो मेरे रसोइए मेरे प्रातः-भोजन के लिए आपको खण्ड-खण्ड काट देंगे।”
राक्षसेन्द्र द्वारा धमकाई जाती जानकी को देखकर, उसी प्रकार बल से हरी गई देव-गन्धर्व-कन्याएँ खिन्न और उद्विग्न-नेत्र हो उठीं। कोई होंठों के संकेत से, कोई आँखों और मुख से, उन्होंने सीता को आश्वस्त किया। उनसे आश्वस्त होकर सीता ने रावण से, अपने हित और अपने सतीत्व तथा पति के पराक्रम के गर्व से भरा वचन कहा: “निश्चय ही इस नगरी में आपका हितैषी कोई नहीं, जो आपको इस निन्दनीय कर्म से रोके। तीनों लोकों में आपके सिवा कौन धर्मात्मा राम की पत्नी मुझे, शची को इन्द्र की भाँति, मन से भी चाहेगा? हे राक्षसाधम, अमित-तेजस्वी राम की पत्नी से ऐसा पाप-वचन कहकर आप कहीं भागकर भी उसके फल से न बचेंगे। राम हाथी हैं और आप, हे नीच, खरगोश कहलाते हैं। आप यहाँ इक्ष्वाकुनाथ की निन्दा करते लज्जित नहीं होते, क्योंकि उनकी दृष्टि के सामने आप नहीं पड़ते। आश्चर्य है कि मुझ पर कुदृष्टि डालते आपकी ये क्रूर आँखें भूमि पर नहीं गिर पड़ीं! धर्मात्मा दशरथ-पुत्र की पत्नी से ऐसा कहते आपकी जीभ क्यों न झड़ गई?”
“राम की आज्ञा न होने से, और अपनी तपस्या की रक्षा के कारण ही, हे दशग्रीव, मैं आपको भस्म नहीं करती, यद्यपि मेरा तेज आपको भस्म करने में समर्थ है। बुद्धिमान राम की पत्नी होने से मैं आपके द्वारा हरी नहीं जा सकती थी; मेरा यह हरण तो आपके विनाश के लिए विधाता का विधान है। शूर और धनद के भाई होने का गर्व रखते हुए भी, सेना से सुसज्जित होकर भी, आपने राम को आश्रम से दूर कर मेरा चोरी से हरण क्यों किया?”
सीता का वचन सुनकर रावण ने क्रोध से क्रूर नेत्र घुमाकर जानकी को देखा। नील-मेघ-सा, विशाल भुजा-गले वाला, सिंह-चाल-पराक्रम वाला, ज्वलित-जीभ और उग्र-नेत्र वाला; काँपते मुकुट से ऊँचा; उत्तम माला और चन्दन-लेप से सजा; लाल माला-वस्त्र पहने, तपे केयूरों से युक्त, कमर में बड़ी नीली मेखला बाँधे रावण मन्थन के समय वासुकि से लिपटे मन्दराचल-सा दिख रहा था।
क्रोध से लाल आँखें किए, सर्प-सा फुफकारते हुए रावण ने कहा: “हे अभागे, निर्धन व्यक्ति में अनुरक्त स्त्री! आज मैं आपको वैसे ही नष्ट कर दूँगा जैसे सूर्य अपने तेज से सन्ध्या को मिटाता है।” यह कहकर शत्रुओं को रुलाने वाले रावण ने वहाँ खड़ी सब घोर-दर्शना राक्षसियों को, एक आँख-एक कान वाली, गाय-हाथी के कान वाली, हाथी-घोड़े के पैर वाली, अत्यन्त बड़े सिर-गले और स्तन-उदर वाली, लम्बी जीभ-नख वाली, बिना नाक की, सिंह-गाय-सूअर के मुख वाली राक्षसियों को, बार-बार आदेश दिया: “अनुकूल या प्रतिकूल आचरण से, साम-दान-भेद से, और दण्ड दिखाकर भी, अलग या मिलकर, इस प्रकार करें कि जानकी शीघ्र मेरे वश में हो जाए।”
काम-क्रोध से भरकर जानकी पर बार-बार गरजते रावण को रोकने के लिए मन्दोदरी और कनिष्ठ रानी धान्यमालिनी ने पास आकर उसे आलिंगन किया और कहा: “हे महाराज, मुझसे क्रीड़ा कीजिए; इस पीली और दीन मानवी से आपको क्या प्रयोजन? जो अनिच्छुक स्त्री को चाहता है, उसका शरीर सन्ताप ही पाता है; पर जो इच्छुक स्त्री को चाहता है, उसे परम प्रीति मिलती है।” इन वचनों से और मन्दोदरी के खींचे जाने पर, मेघ-सा वह बली रावण हँसता हुआ लौट गया। पृथ्वी को मानो काँपाता हुआ वह दशग्रीव ज्वलित-सूर्य-सा अपने भवन में चला गया। देव-गन्धर्व-नाग-कन्याएँ रावण को घेरकर उस उत्तम भवन में प्रविष्ट हो गईं। धर्मपरायण, काँपती, फिर भी अडिग मैथिली को घोर धमकी देकर, काम से मोहित रावण उसे अकेली छोड़कर अपने भवन में लौट गया।
समझने की कुंजी (संख्या)। रावण ने सीता को कुल बारह माह की अवधि दी थी; अब उसमें दो माह शेष हैं। यह अवधि आगे की कथा में बार-बार लौटती है और सीता के मन में मृत्यु-चिन्ता जगाती है।
सार: रावण क्रोध में दो माह की अन्तिम अवधि देकर वध की धमकी देता है और राक्षसियों को सीता को वश में करने का आदेश देता है; मन्दोदरी उसे खींचकर भवन ले जाती है।
राक्षसियों का फुसलाना
मैथिली से वैसा कहकर और राक्षसियों को आदेश देकर शत्रुओं को रुलाने वाला रावण उस वाटिका से निकल गया, ऐसा परम्परा कहती है। राक्षसेन्द्र के अन्तःपुर में लौटते ही भीम-रूपा राक्षसियाँ सीता की ओर दौड़ीं और अत्यन्त कठोर वचनों से बोलीं।
एकजटा नाम की राक्षसी ने क्रोध से लाल आँखें किए कहा: “ब्रह्मा के मानस-पुत्र पुलस्त्य, छह प्रजापतियों में चौथे, विख्यात हैं। उनके मानस-पुत्र तेजस्वी महर्षि विश्रवा हुए, जो प्रजापति-सम कहे जाते हैं। उन्हीं के पुत्र, हे विशाल नेत्रों वाली, शत्रुओं को रुलाने वाले रावण हैं। आप उन राक्षसेन्द्र की पत्नी बनने योग्य हैं।” फिर हरिजटा ने बिल्ली-सी आँखें फाड़कर क्रोध से कहा: “जिसने बारह आदित्य, ग्यारह रुद्र, आठ वसु, दो अश्विनीकुमार, ये तैंतीस प्रमुख देव और देवराज इन्द्र तक जीत लिए, उस शूर, बली, संग्राम से न लौटने वाले रावण की पत्नी आप क्यों नहीं बनना चाहतीं?”
विकटा बोली: “जिसके भीम पराक्रम से नाग-गन्धर्व-दानव बार-बार युद्ध में हारे, वही आपके पास आया है। हे अधमे, सर्व-समृद्ध महात्मा राक्षसेन्द्र रावण की पत्नी होना आप क्यों नहीं चाहतीं?” दुर्मुखी ने कहा: “जिसके भय से सूर्य प्रचण्ड नहीं तपता, वायु ठहर जाता है, वृक्ष फूल बरसाते हैं, पर्वत और बादल इच्छानुसार जल छोड़ते हैं, हे आयत-नयने, उस राजराज नैऋत-राज रावण की पत्नी बनने का विचार आप क्यों नहीं करतीं? हे सुस्मिते, यथार्थ कही गई यह सलाह प्रसन्न मन से मान लीजिए, अन्यथा जीवित न रहेंगी।”
सार: एकजटा, हरिजटा, विकटा और दुर्मुखी राक्षसियाँ रावण की वंश-महिमा और बल बखानकर सीता को उसकी पत्नी बनने के लिए फुसलाती और धमकाती हैं।
सीता का दृढ़ उत्तर और राक्षसियों का संत्रास
तब विकृत-मुख राक्षसियों ने अनहोनी कठोरता से सीता को अप्रिय वचन कहे: “हे सीता, बहुमूल्य शय्याओं वाले, सर्व-प्राणियों के मन को हरने वाले अन्तःपुर में रावण के साथ रहना आप क्यों स्वीकार नहीं करतीं? मनुष्य की पत्नी बनना ही बहुत मानती हैं, राम से मन हटा लीजिए, अन्यथा कभी जीवित न रहेंगी। राज्य-भ्रष्ट, असफल, सदा व्याकुल राम को आप केवल इसलिए चाहती हैं कि आप मनुष्य हैं।”

राक्षसियों के वचन सुनकर कमल-नयनी सीता ने आँसू-भरी आँखों से कहा: “यह लोक-निन्दित, पापमय बात जो आप सब मिलकर कहती हैं, यह मेरे मन में क्षण-भर भी नहीं टिकती। मानवी राक्षस की पत्नी होने योग्य नहीं। चाहें तो सब मिलकर मुझे खा डालें, पर आपकी बात मैं कभी न मानूँगी। दीन हो या राज्य-हीन, जो मेरा पति है वही मेरा गुरु है; जैसे सुवर्चला सूर्य की, वैसे ही मैं उसकी नित्य अनुरक्ता हूँ। जैसे शची इन्द्र की, अरुन्धती वसिष्ठ की, रोहिणी चन्द्र की, लोपामुद्रा अगस्त्य की, सुकन्या च्यवन की, सावित्री सत्यवान् की, श्रीमती कपिल की, मदयन्ती सौदास की, केशिनी सगर की और भीम-पुत्री दमयन्ती निषध-राज नल की पतिव्रता रहीं, वैसे ही मैं इक्ष्वाकु-श्रेष्ठ राम की पतिव्रता हूँ।”
सीता का उत्तर सुनकर रावण के आदेश-अनुसार क्रोध से भरी राक्षसियाँ कठोर वचनों से डराने लगीं। हनुमान शिंशपा वृक्ष में बिना बोले छिपे रहकर सीता को धमकाती उन राक्षसियों को सुनते रहे। भय से काँपती सीता पर चारों ओर से टूटकर, क्रोध में वे अपने जलते-लटकते होंठ चाटने लगीं और फरसे उठाकर बोलीं, “यह राक्षसाधिप रावण को पति रूप में पाने योग्य नहीं।” भीम राक्षसियों से डराई जाती वह सुन्दरी आँसू पोंछती हुई शिंशपा के पास आ खड़ी हुईं, शोक में डूबी।
तब विनता नाम की भयंकर, क्रुद्ध-मुख, धँसे-पेट वाली राक्षसी बोली: “हे सीता, पति-स्नेह तो आपने पर्याप्त दिखा दिया; पर हर बात की अति विपत्ति लाती है। हे मैथिली, मेरी हितकारी बात मानिए, सर्व-रक्षसों के रक्षक, इन्द्र-से पराक्रमी रावण को पति बनाइए। मानव और दीन राम को छोड़कर दक्ष, त्यागशील, सबको प्रिय वचन बोलने वाले रावण की शरण लीजिए। हे वैदेही, दिव्य अंगराग और आभूषणों से सज्जित होकर आज से तीनों लोकों की ईश्वरी बनिए, अग्नि की स्वाहा या इन्द्र की शची-सी। मेरी यह बात न मानेंगी तो हम सब इसी क्षण आपको खा जाएँगी।”
तब लटकते स्तनों वाली विकटा मुट्ठी उठाकर बोली: “हे महामूढ़ मैथिली! रावण के विषय में आपके अनेक अनुचित वचन हमने करुणा और कोमलता से सह लिए। हे भीरु, स्त्रियों का यौवन अस्थिर है, रावण के साथ इच्छानुसार रमिए, रमणीय उपवन-पर्वत घूमिए; सहस्रों स्त्रियाँ आपकी सेवा में रहेंगी। रावण को पति बनाइए, अन्यथा, हे मैथिली, मैं आपका हृदय उखाड़कर खा जाऊँगी।”

तब क्रूर-दर्शना चण्डोदरी बड़ा शूल घुमाकर बोली: “रावण द्वारा हरकर लाई गई इस हिरनी-सी नेत्रों वाली, भय से काँपते स्तनों वाली को देखकर मेरे मन में बड़ी लालसा उठी है कि इसका कलेजा-तिल्ली, फूला हुआ हृदय और सब अंग-सिर खा जाऊँ।” फिर प्रघसा बोली: “इसका गला दबा दें, देर क्यों? फिर राजा से कह दें कि मानवी मर गई।” अजामुखी बोली: “इसे काटकर सब बराबर पिंड बना लें और बाँट लें; मुझे विवाद रुचिकर नहीं।” शूर्पणखा ने कहा: “जल्दी मद्य और भाँति-भाँति की मालाएँ लाएँ; अजामुखी की बात मुझे भी रुचती है। सर्व-शोक-नाशक सुरा शीघ्र लाई जाए, मानव-मांस खाकर हम निकुम्भिला में नृत्य करेंगी।” इस प्रकार विरूपा राक्षसियों से धमकाई जाती देव-कन्या-सी सीता धैर्य छोड़कर रोने लगीं।
सार: सीता पतिव्रता-स्त्रियों के उदाहरण देकर दृढ़ता से इनकार करती हैं; राक्षसियाँ उन्हें खा जाने की धमकी देती हैं, और सीता रोने लगती हैं। हनुमान सब चुपचाप सुनते रहते हैं।
सीता का विलाप
उन अनेक कठोर-क्रूर वचन कहती असौम्य राक्षसियों के बीच जनकात्मजा सीता रो पड़ीं। अत्यन्त त्रस्त होकर, आँसुओं से रुँधे स्वर में मनस्विनी वैदेही बोलीं: “मानवी राक्षस की पत्नी होने योग्य नहीं; चाहें तो सब मिलकर मुझे खा डालें, पर आपकी बात मैं न मानूँगी।” रावण की फटकार से मानो शोक-ग्रस्त, राक्षसियों के बीच घिरी सीता को चैन न मिला। झुंड से बिछुड़ी, भेड़ियों से पीड़ित हिरनी-सी वे भय से सिकुड़कर अधिक काँपने लगीं।
फूली अशोक की बड़ी डाल थामकर, शोक से भग्न-मन सीता पति का स्मरण करने लगीं। नेत्रों के जल से अपने उरोज भिगोती, दुःख का अन्त न पाती वे आहें भरकर विलाप करने लगीं, “हा राम! हा लक्ष्मण! हा मेरी सास कौसल्या! हा सुमित्रा!” वे बोलीं: “विद्वानों का कहा यह लोक-प्रवाद सत्य है कि स्त्री हो या पुरुष, बिना समय मृत्यु दुर्लभ है; तभी तो इन क्रूर राक्षसियों से पीड़ित और राम से बिछुड़ी, दुःखी होकर भी मैं क्षण-भर जी रही हूँ। अल्प-पुण्य और कृपण मैं, झंझा-वात से आहत समुद्र के बीच भरी नौका-सी, अनाथ-सी नष्ट हो जाऊँगी। उन पति को न देख पाती, राक्षसियों के वश में पड़ी, मैं जल से कटे तट-सी शोक से क्षीण हो रही हूँ।”
“वही धन्य हैं जो कमल-दल-से नेत्र वाले, सिंह-चाल वाले, कृतज्ञ, प्रिय बोलने वाले मेरे नाथ राम को देखते हैं। विदितात्मा राम से बिछुड़ी मेरा जीवन तीखा विष चखने-सा दुस्सह है। पिछले किसी जन्म में मैंने कैसा महापाप किया था कि अब यह घोर, अति-दारुण महादुःख भोग रही हूँ! इस महान् शोक से घिरी मैं जीवन त्यागना चाहती हूँ, पर राक्षसियों के पहरे में राम तक पहुँच नहीं पाती। धिक्कार है मनुष्य-जन्म को, धिक्कार है परवशता को, कि अपनी इच्छा से जीवन त्यागना भी सम्भव नहीं!”
सार: धमकियों से व्याकुल सीता राम-लक्ष्मण-कौसल्या-सुमित्रा को पुकारती हुई फूट-फूटकर रोती हैं और मृत्यु की कामना करती हैं, पर परवशता के कारण वह भी सम्भव नहीं।
सीता का गहरा शोक और राम की प्रतीक्षा
आँसू-भरे मुख से यही कहती, सिर झुकाए, बाला जनकात्मजा भूमि पर लोटती हुई, उन्मत्त-सी, प्रमत्त-सी, भ्रान्त-चित्त-सी, थकान मिटाने को लोटते बछेड़े-सी विलाप करने लगीं: “इच्छानुसार रूप बदलने वाले रावण ने मारीच के छल से प्रमत्त हुए राघव के संरक्षण से मुझे बल-पूर्वक, चीखती हुई को हर लिया। राक्षसियों के वश में पड़ी, दारुण रूप से धमकाई जाती, चिन्ता और शोक से आर्त मैं अब जीना नहीं चाहती।”
“महारथी राम के बिना राक्षसियों के बीच रहते हुए मुझे न जीवन से प्रयोजन है, न धन से, न आभूषणों से। मेरा यह हृदय लोहा-सा कठोर अथवा अजर-अमर है, जो इतने दुःख से भी नहीं फूटता। धिक्कार है मुझ अनार्या को, जो उसके बिना भी क्षण-भर जी रही हूँ। बायें पैर से भी मैं इस निशाचर को न छूऊँ, फिर इस निन्दित रावण को चाहूँ, यह कैसे? यह मेरा प्रत्याख्यान नहीं समझता, न अपने को, न अपने कुल को जानता; क्रूर स्वभाव से मुझे पाने को लालायित है। काट दिया जाऊँ, चीर दिया जाऊँ, अग्नि में जला दिया जाऊँ, रावण के पास कभी न जाऊँगी।”
“क्या कारण है कि कृतज्ञ, दयालु, सदाचारी राम मुझे लेने नहीं आते? कहीं मेरे सौभाग्य के क्षय से वे निर्दय तो नहीं हो गए? जिन्होंने अकेले ही जनस्थान में चौदह हज़ार राक्षस मारे, वे मुझे क्यों नहीं लेने आते? अल्प-पराक्रमी रावण ने मुझे रोक रखा है, यद्यपि मेरे स्वामी रावण को रण में मारने में समर्थ हैं। दण्डकारण्य में जिन्होंने विराध को मारा, वे राम मुझ तक क्यों नहीं पहुँचते? चाहे यह लंका समुद्र के बीच दुर्जय हो, पर राम के बाणों की गति यहाँ नहीं रुकेगी।”
“मुझे लगता है कि लक्ष्मण के बड़े भाई राम मुझे यहाँ जानते ही नहीं; जान लेते तो वे तेजस्वी इस अपमान को कैसे सहते? जो गृध्रराज जटायु यह समाचार राम को दे सकते थे, वे भी रावण के साथ युद्ध में मारे गए। वृद्ध होकर भी मुझे बचाने को रावण-वध में जुटे जटायु ने बड़ा कर्म किया। यदि राघव मुझे यहाँ जान लें, तो आज ही क्रुद्ध होकर बाणों से लोक को राक्षस-रहित कर दें, लंका जला दें, समुद्र सुखा दें, और नीच रावण का यश-नाम मिटा दें। तब मेरी ही भाँति, मारे गए स्वामियों वाली राक्षसियाँ घर-घर रोएँगी।”
“राम-लक्ष्मण लंका छानकर राक्षसों का विनाश करेंगे; उनके देखे शत्रु क्षण-भर भी न जिएगा। लाल किनारों वाली आँखों वाले शूर राम जब मुझे रावण के घर जानेंगे, तब राम-बाणों से जली, मुख्य राक्षसों के मारे जाने और कान्ति के बुझ जाने से लंका शोक-भरी हो जाएगी। चिता-धूम से ढके मार्गों और गृध्र-मण्डलों से सजी यह नगरी शीघ्र श्मशान-सी हो जाएगी। मुझ पर किए इस अधर्म से जल्द ही महान् उत्पात होगा; पर ये पिशिताशन राक्षस धर्म नहीं समझते।”
“निश्चय ही पापी रावण के मारे जाने पर यह दुर्जय लंका विधवा युवती-सी सूख जाएगी। राम-दूत किसी वेगवान वानर द्वारा, रावण के रक्षा करते हुए भी, यह लंका जला दी जाएगी, ऐसा मेरा भाव कहता है। राक्षस मुझे प्रातः-भोजन के लिए अवश्य काट देंगे; प्रिय-दर्शन राम के बिना मैं क्या करूँ? लाल किनारों वाली आँखों वाले राम को न देख पाती, अति-दुःखी मैं पति के बिना शीघ्र वैवस्वत यम को देखूँगी।”
“राम और लक्ष्मण मुझे जीवित नहीं जानते; जानते तो समूची पृथ्वी छान डालते। कहीं ऐसा तो नहीं कि लक्ष्मण के अग्रज वह वीर मेरे ही शोक से देह त्यागकर देवलोक चले गए? धन्य हैं वे देव-गन्धर्व-सिद्ध और महर्षि, जो मेरे वीर कमल-नयन राम को देखते हैं। अथवा धर्म-कामी, परमात्मा से एक हुए उन राजर्षि राम को अब मुझ पत्नी से प्रयोजन ही न रहा हो। दृष्टि के सामने रहने पर प्रीति होती है, ओझल पर सौहार्द नहीं रहता, पर कृतघ्न ही प्रेम मिटाते हैं, राम कभी नहीं मिटाएँगे।”
“क्या मुझमें कोई दोष है, या यह मेरे भाग्य का क्षय है, कि मैं उत्तम-योग्य राम से बिछुड़ी हूँ? अक्लिष्ट-चरित्र, शूर, शत्रु-संहारक महात्मा राम से बिछुड़ी मुझे जीवन से मृत्यु ही श्रेयस्कर है। अथवा शस्त्र त्यागकर, मूल-फल खाकर वन में विचरते वे नरश्रेष्ठ भाई अहिंसा-व्रती हो गए हों; अथवा दुरात्मा रावण ने छल से उन शूर भाइयों को मरवा दिया हो।” फिर भी वह बोलीं: “ऐसे समय में मैं हर प्रकार मरना चाहती हूँ, पर इस अत्यन्त दुःख में भी मेरी मृत्यु नहीं विधान में। धन्य हैं वे जितेन्द्रिय, सत्य-सम्मत महात्मा मुनि, जिनके लिए प्रिय-अप्रिय नहीं, न प्रिय छिनने का दुःख, न अप्रिय मिलने की पीड़ा; उन महात्माओं को नमस्कार। मुझ अभागिन को विदितात्मा प्रिय राम ने ही त्याग दिया, और मैं पापी रावण के वश में पड़ी प्राण त्याग दूँगी।”
सार: सीता गहरे शोक में राम के न आने के अनेक कारण सोचती हैं, कि वे जानते नहीं, कि देह त्याग दी, कि छल से मारे गए, और अन्ततः प्राण त्यागने का निश्चय करती हैं।
त्रिजटा का स्वप्न और शुभ शकुन
सीता द्वारा अपने घोर निश्चय की बात सुनकर, क्रोध से भरी कुछ राक्षसियाँ दुरात्मा रावण को सूचना देने चलीं। तब भीम-दर्शना राक्षसियों ने सीता के पास आकर फिर वही कठोर, निरर्थक और अपने ही अनर्थ की बात कही: “हे अनार्ये, पाप-निश्चय वाली सीता! आज इसी क्षण राक्षसियाँ इच्छानुसार आपका मांस खा लेंगी।”
उन वीभत्स स्त्रियों से धमकाई जाती सीता को देखकर, अभी-अभी नींद से जागी वृद्ध राक्षसी त्रिजटा बोली: “अरे अभागियों, अपने को खा डालिए, सीता को न खा सकेंगी! ये जनक की प्रिय पुत्री और दशरथ की पुत्रवधू हैं। आज मैंने एक घोर, रोमांचकारी स्वप्न देखा है, जो राक्षसों के विनाश और इनके पति के अभ्युदय की ओर संकेत करता है।” त्रिजटा के यों कहने पर अभी क्रोध में डूबी सब राक्षसियाँ भयभीत होकर बोलीं: “बताइए, रात आपने कैसा स्वप्न देखा?”

उनके मुख से निकली बात सुनकर त्रिजटा ने प्रातः-काल के स्वप्न का वर्णन किया: “हाथीदाँत की दिव्य पालकी, हज़ार घोड़ों से जुती, आकाश में चलती हुई देखी; उस पर स्वयं चढ़कर श्वेत माला-वस्त्र पहने राम लक्ष्मण के साथ यहाँ आए। श्वेत वस्त्र पहने सीता को भी मैंने समुद्र से घिरे श्वेत पर्वत पर बैठा देखा। सूर्य से प्रभा-सी, सीता राम से मिल गईं। फिर लक्ष्मण-सहित राम चार दाँतों वाले पर्वत-से महागज पर चढ़े दिखे; दोनों भाई श्वेत माला-वस्त्र पहने, अपने तेज से सूर्य-से चमकते जानकी के पास आ खड़े हुए। आकाश में खड़े उस गज पर, पति के संग, जानकी कन्धे पर बैठीं; फिर पति की गोद से उछलकर कमल-नयनी ने हाथों से चन्द्र-सूर्य को छुआ। तब दोनों कुमारों और सीता को लिए वह गजोत्तम लंका के ऊपर जा खड़ा हुआ।
“एक और स्वप्न में राम श्वेत माला-वस्त्र पहने, आठ श्वेत बैलों के रथ पर, अपनी पत्नी सीता और लक्ष्मण के साथ यहाँ आए। फिर सत्य-पराक्रमी राम सूर्य-से दिव्य पुष्पक विमान पर चढ़कर, भाई लक्ष्मण और पत्नी सीता के साथ, उत्तर दिशा की ओर प्रस्थान करते दिखे। विष्णु-से पराक्रमी राम मुझे स्वप्न में लक्ष्मण और सीता के साथ ऐसे दिखे। महातेजस्वी राम को देव-असुर-राक्षस कोई नहीं जीत सकता, जैसे पापियों से स्वर्ग नहीं जीता जाता।
एक उप-कथा: गीता प्रेस संस्करण यहाँ स्वप्नाध्याय (स्वप्न-शास्त्र) का सन्दर्भ देता है, गाय, बैल या हाथी पर चढ़ना, भवन या पर्वत-शिखर पर चढ़ना, और हाथों से सूर्य या चन्द्र-मण्डल को छूना स्वप्न में अति-शुभ माने गए हैं, और महान् राज्य की प्राप्ति के सूचक हैं। इसी से त्रिजटा अपने स्वप्न को राम की विजय का चिह्न मानती है।
“रावण मुझे आज मुण्डित-सिर, तेल में नहाया, लाल वस्त्र पहने, मद-मत्त और सुरा पीता, कनेर की मालाओं से सजा, पुष्पक विमान से भूमि पर गिरा दिखा। फिर मुण्डित-सिर, काले वस्त्र पहने, लाल माला-लेप किए वह एक स्त्री द्वारा गधों के रथ पर खींचा जाता दिखा। तेल पीता, हँसता, नाचता, भ्रान्त-चित्त, व्याकुल-इन्द्रिय वह गधे पर चढ़कर शीघ्र दक्षिण दिशा को गया। फिर भय से मोहित रावण गधे से सिर के बल भूमि पर गिरा दिखा। अचानक उठकर, घबराया, भयार्त, मद से विह्वल, उन्मत्त-सा, दिगम्बर वह बहुत दुर्वचन बकता दिखा। फिर दुर्गन्ध, असह्य, घोर, नरक-से अन्धकार और मल-पंक में घुसकर वह डूब गया। दक्षिण दिशा को जाकर वह बिना कीचड़ के सूखे सरोवर में घुसा; गले में बाँधकर लाल वस्त्र पहने, कीचड़-सने अंगों वाली एक काली स्त्री दशग्रीव को दक्षिण की ओर खींच ले गई। उसी स्वप्न में महाबली कुम्भकर्ण भी दिखा। रावण के सब पुत्र मुण्डित-सिर, तेल में नहाए दिखे। दशग्रीव सूअर पर, उसका ज्येष्ठ पुत्र मेघनाद घड़ियाल पर, और कुम्भकर्ण ऊँट पर चढ़कर दक्षिण को गए। वहाँ अकेले विभीषण श्वेत छत्र, श्वेत वस्त्र-माला और श्वेत चन्दन-लेप किए, शंख-दुन्दुभि और नृत्य-गीत से सम्मानित होकर, चार मन्त्रियों के साथ पर्वत-से चार-दाँत वाले गज पर आकाश में खड़े दिखे।
“गीत-वाद्य से युक्त एक बड़ी सभा भी जुटी, जिसमें लाल वस्त्र-माला पहने तेल पीते राक्षस थे। यह रमणीय लंका-नगरी अपने घोड़ों-रथों-हाथियों समेत समुद्र में गिरी, टूटे गोपुर-तोरणों वाली देखी। रावण की रक्षा होते हुए भी राम के वेगवान वानर-दूत द्वारा लंका जली दिखी। भस्म-राख से भरी लंका में सब राक्षस-स्त्रियाँ तेल पीकर, मद में बड़े शोर से हँसती दिखीं। कुम्भकर्ण आदि सब राक्षस-श्रेष्ठ नीच लाल वस्त्र पहने गोबर के सरोवर में जा घुसे।
“इसलिए यहाँ से हट जाइए; देखिए, राघव सीता को पा लेंगे और परम-अमर्षी वे आप सब को राक्षसों समेत मरवा देंगे। राम अपनी प्रिय और मान्या पत्नी को, जो वनवास में साथ रही, फटकारा या धमकाया जाना कभी न सहेंगे। इसलिए क्रूर वचन बस कीजिए; अब मधुर वचन ही कहे जाएँ। हम वैदेही से क्षमा माँगें, यही मुझे रुचता है। जिस दुःखिनी का ऐसा स्वप्न दिखता है, वह अनेक दुःखों से छूटकर परम प्रिय वस्तु पाती है। धमकाई गई होने पर भी इनसे क्षमा माँगिए; अधिक तर्क से क्या? राघव से राक्षसों पर घोर भय आ खड़ा हुआ है। जनकात्मजा मैथिली प्रणाम-मात्र से प्रसन्न हो जाएँगी, और आप सब को महान् भय से बचाने में समर्थ हैं।”
“फिर, इस विशाल नेत्रों वाली के अंगों में मुझे कोई अमंगल-सूचक सूक्ष्म चिह्न भी नहीं दिखता। मेरी समझ में, स्नान-शृंगार के अभाव से केवल कान्ति की कमी-भर है, दुःख नहीं। मैं तो वैदेही की अर्थ-सिद्धि, राक्षसेन्द्र का विनाश और राघव की विजय निकट आती देखती हूँ। इसका शुभ-सूचक यह कि कमल-दल-सी इसकी बायीं आँख फड़क रही है, यह परम प्रिय समाचार सुनने का चिह्न है। बिना किसी कारण इस सौम्या वैदेही की बायीं भुजा भी थोड़ी रोमांचित होकर फड़कती है। और हाथी-सूँड़-सी इसकी उत्तम बायीं जाँघ भी काँपकर मानो कह रही है कि राघव सामने आ खड़े हैं। शाखा पर अपने घोंसले में बैठा एक पक्षी बार-बार उत्तम मधुर स्वर बोलकर, शुभ-समय की सूचना देता हुआ, हर्षित होकर मानो सीता को बार-बार आनन्दित होने को कह रहा है।”
तब पति की विजय की आशा से हर्षित होकर वह लज्जाशील बाला बोलीं: “यदि यह सत्य निकला, तो मैं अवश्य आप सब की रक्षक बनूँगी।”
सार: वृद्ध राक्षसी त्रिजटा अपने स्वप्न का वर्णन करती है, जिसमें राम की विजय और रावण का विनाश स्पष्ट है; वह राक्षसियों को सीता से क्षमा माँगने को कहती है, और सीता के अंगों पर शुभ शकुन दिखाती है। हर्षित सीता उन्हें रक्षा का वचन देती हैं।
सर्ग 28 , मृत्यु की ओर बढ़ता एक मन, और शकुनों का आगमन
रावण की धमकी जब फिर-फिर सीताजी के कानों में गूँजने लगी, तो वनप्रान्त में सिंह के पंजे में पड़ी हाथी की कन्या जैसी वे काँप उठीं। राक्षसियों के घेरे में, बार-बार डराई जाती हुई, किसी निर्जन घोर वन में छोड़ दी गई बालिका के समान वे विलाप करने लगीं।
उनके वचन में एक गहरी मर्मवेदना थी। “संसार के सन्त ठीक ही कहते हैं,” उन्होंने अपने मन से कहा, “कि अकाल-मृत्यु (समय से पहले की मृत्यु) नहीं आती। तभी तो मैं, पुण्यहीना, इस प्रकार निन्दित होकर भी क्षणभर जीवित हूँ। यदि अभी मैं प्राण त्याग दूँ तो इसमें मेरा कोई दोष नहीं; क्योंकि इस अप्रिय-दर्शन वाले राक्षस के हाथों मैं वध-योग्य ठहराई जा चुकी हूँ। उस पर अपना प्रेम मैं वैसे ही नहीं उँडेल सकती, जैसे द्विज (वेदाधिकारी) किसी अद्विज को मन्त्र नहीं दे सकता।”
उन्हें भय था कि श्रीराम के आने से पूर्व ही यह नीच रावण अपने तीखे शस्त्रों से उनके अंग काट डालेगा, जैसे कोई चिकित्सक गर्भस्थ निर्जीव शिशु के अंग काटकर निकालता है। उन्होंने रोते हुए कहा, “हाय राम! हाय लक्ष्मण! हाय सुमित्रा! हाय राम की माता कौसल्या, और मेरी अपनी माताओ! मैं अल्पभाग्या भँवर में फँसी नौका-सी डूब रही हूँ। मेरा पतिव्रत्य व्यर्थ गया, मेरी तपस्या निष्फल हुई, मानो कृतघ्न को की गई सेवा हो।”
“वे दोनों तेजस्वी राजकुमार, श्रीराम और लक्ष्मण, मेरे ही कारण उस मायावी मृग के रूपधारी के हाथों मारे गए होंगे। पिता की आज्ञा पूरी कर, चौदह वर्ष का व्रत निभाकर, निर्भय और कृतार्थ होकर जब आप लौटेंगे, तब बड़ी-बड़ी आँखों वाली अनेक स्त्रियों के साथ रमण करेंगे; और मैं, जिसने आप ही में चित्त जोड़ रखा है, व्यर्थ ही तप और व्रत करके अपने इस अभागे जीवन को धिक्कारती हुई त्याग दूँगी।”

“विष या तीखे शस्त्र से मैं शीघ्र ही प्राण त्याग दूँ, किन्तु इस राक्षस के घर में न कोई विष देने वाला है, न शस्त्र देने वाला।” यह सोचकर शोक से सन्तप्त सीताजी ने अपनी वेणी (केश-बन्ध की रस्सी) उठा ली। “इसी वेणी की रस्सी से अपना गला बाँधकर मैं शीघ्र यमराज के पास चली जाऊँगी।” उन्होंने उस अशोक-वृक्ष की एक शाखा पकड़ी और खड़ी हो गईं। पर जैसे ही वे श्रीराम, लक्ष्मण और अपने राजकुल का स्मरण करती हुई वहाँ खड़ी हुईं, उनके शरीर पर अनेक शुभ शकुन प्रकट होने लगे, वही शकुन जो लोक में शोक मिटाने वाले माने जाते हैं, और जो पहले भी उन्हें सफलता के सूचक के रूप में दिखाई दिए थे।
समझने की कुंजी , वेणी और आत्मघात का संकल्प: वेणी अर्थात् केश गूँथने की लम्बी डोरी। वाल्मीकि यहाँ अतिशयोक्ति नहीं रचते; सीताजी की पीड़ा इतनी सच्ची है कि वे उसी डोरी को फाँसी बना लेने को उद्यत हो जाती हैं। ठीक उसी क्षण शकुनों का आना कथा का मोड़ है; निराशा के चरम पर आशा की पहली रेखा।
सार: रावण की धमकियों से टूटी सीताजी मृत्यु का निश्चय कर वेणी से गला बाँधने को उठती हैं, और उसी क्षण उनके अंगों पर शुभ शकुन प्रकट होने लगते हैं।
सर्ग 29 , शुभ शकुनों का स्पन्दन, और सीताजी का हर्ष
जैसे लक्ष्मीवान् पुरुष के पास सेवक स्वयं चले आते हैं, वैसे ही उस व्यथित, हर्षहीन और मन से दीन सीताजी के शरीर पर शुभ निमित्त (शकुन) उमड़ पड़े।

उनकी बाईं आँख, जो टेढ़ी पलकों की पंक्तियों से ढकी, बीच में काली, चारों ओर श्वेत और किनारों पर ताम्र थी, मछली के स्पर्श से काँपते कमल-सी बार-बार फड़कने लगी। उनकी बाईं भुजा, जो उत्तम चन्दन और अगर के लेप योग्य थी और जिसे चिरकाल तक प्रियतम श्रीराम ने तकिया बनाया था, सहसा स्पन्दित हो उठी। उनकी सुन्दर, पुष्ट बाईं जाँघ, गजराज की सूँड़-सी, काँपकर मानो सामने श्रीराम के खड़े होने की सूचना देने लगी। खड़ी हुई सीताजी का स्वर्णवर्ण वस्त्र, जो हल्की धूल से मलिन-सा था, उनके अंग से कुछ खिसक गया; यह भी शुभ का संकेत था।
इन और ऐसे ही दूसरे शकुनों से, जो पहले भी सच निकले थे, सीताजी वैसे ही पुलकित हो उठीं जैसे वायु और धूप से कुम्हलाया बीज वर्षा पाकर फिर जी उठता है। उनका मुख, बिम्बफल-से ओठ, सुन्दर आँखें, टेढ़ी पलकें, उज्ज्वल दाँत, राहु के मुख से छूटे पूर्ण चन्द्र-सा चमक उठा। शोक से मुक्त, थकान से निवृत्त, ज्वर शान्त, मन हर्ष से उद्भासित, आर्या सीता शुक्ल पक्ष में उदित चन्द्र वाली रात्रि-सी शोभा पाने लगीं।
समझने की कुंजी , बायाँ अंग फड़कना: भारतीय शकुन-शास्त्र में स्त्री के बाएँ अंगों का स्पन्दन शुभ माना जाता है (पुरुष के लिए दायाँ)। वाल्मीकि एक-एक करके बाईं आँख, बाईं भुजा, बाईं जाँघ का फड़कना गिनाते हैं; यही क्रम सीताजी के मन को निराशा से आशा की ओर मोड़ता है।
सार: बाईं आँख, भुजा और जाँघ के फड़कने और वस्त्र खिसकने को शुभ जानकर सीताजी का शोक मिट जाता है और मुख चन्द्र-सा खिल उठता है।
सर्ग 30 , हनुमानजी का अन्तर्द्वन्द्व, बोलूँ या न बोलूँ
पराक्रमी हनुमानजी ने वृक्ष पर बैठे-बैठे यह सब ठीक-ठीक सुन लिया था; सीताजी का विलाप, त्रिजटा का स्वप्न, और राक्षसियों की धमकियाँ। देवों के नन्दन-वन की किसी देवी-सी उस देवी को एकटक देखते हुए वे नाना प्रकार के विचारों में पड़ गए।
उन्होंने मन ही मन सोचा, “जिन्हें हज़ारों-लाखों वानर सब दिशाओं में ढूँढ़ते रहे, वही सीता मुझे यहाँ मिल गई हैं। गुप्तचर के रूप में नियुक्त होकर, छिपकर शत्रु का बल आँकते हुए, मैंने राक्षसों की सापेक्ष शक्ति, यह लंकापुरी, और रावण का प्रभाव, सब देख लिया। अब उचित है कि पति-दर्शन की अभिलाषिणी, उस अप्रमेय और सर्वभूत-दयालु श्रीराम की पत्नी को मैं सान्त्वना दूँ। शोक से जिनकी चेतना धुँधली है, ऐसी इस सती को बिना ढाढ़स बँधाए लौट जाऊँ तो मेरा जाना दोषपूर्ण होगा। मेरे चले जाने पर, उद्धार का कोई उपाय न देखकर जानकी प्राण त्याग सकती हैं।”
पर साथ ही उन्हें संशय भी था। “राक्षसियों के सामने बोलना ठीक नहीं। यदि इस रात के शेष में मैंने इन्हें ढाढ़स न बँधाया तो ये अवश्य प्राण त्याग देंगी। और यदि श्रीराम पूछें कि सीता ने क्या सन्देश दिया, तो बिना बात किए मैं क्या उत्तर दूँगा? बिना सन्देश लिए लौटूँगा तो वे क्रोध से मुझे जला डालेंगे। फिर मैं अत्यन्त छोटे शरीर वाला, ऊपर से वानर; यदि संस्कृत में बोलूँ तो ये मुझे रावण समझकर डर जाएँगी; इन्हें तो अयोध्या के आसपास बोली जाने वाली मानवी भाषा में ही समझाना होगा। पर मेरा वानर-रूप और मानवी वाणी दोनों देखकर ये पहले से डरी हुई और भी भयभीत हो उठेंगी; चिल्ला उठीं तो शस्त्रधारी राक्षसियाँ टूट पड़ेंगी, राक्षस इकट्ठे हो जाएँगे, और मैं घिर जाऊँगा। मैं उनका वध तो कर सकता हूँ, पर थककर समुद्र पार न कर पाऊँगा; या वे मुझे पकड़ लेंगी और सीता मेरे प्रयोजन को बिना जाने रह जाएँगी।”
“युद्ध सदा सन्देहास्पद होते हैं; कौन बुद्धिमान संशययुक्त कार्य में बिना सोचे कूदता है? सीता से खुलकर बोलूँ तो भारी दोष, न बोलूँ तो उनका प्राणत्याग। समय और स्थान के विरुद्ध जाने पर सिद्ध-प्राय कार्य भी ऐसे नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्योदय पर अन्धकार। जो दूत स्वयं को चतुर मानते पर हैं नहीं, वे राजा-मन्त्रियों के निश्चित किए कार्यों को भी बिगाड़ देते हैं।” अन्ततः उन्होंने निश्चय किया, “उस प्रशंसनीय स्वामी श्रीराम के गुण गाता हुआ, मधुर शब्दों में, धर्मयुक्त सुन्दर सन्देश सुनाऊँगा, ऐसे कि सीता विश्वास कर लें और भयभीत न हों।” यह सोचकर वृक्ष की डालियों के बीच बैठे महाप्रभावशाली हनुमानजी ने मधुर और सत्य वचन कहना आरम्भ किया।
एक उप-कथा: इसी आत्म-संवाद में वाल्मीकि एक मार्मिक बात रखते हैं; हनुमानजी कहते हैं कि वे संस्कृत (वेदी ब्राह्मण-शैली की वाणी) में नहीं, अयोध्या के आसपास की मानवी बोलचाल की भाषा में बोलेंगे, ताकि सीताजी उन्हें रावण न समझ बैठें। यह दूतकर्म में भाषा और स्वर के विवेक का अनूठा उदाहरण है।
सार: हनुमानजी सब सुनकर बहुत सोच-विचार करते हैं कि बोलें या न बोलें, और अन्ततः श्रीराम के गुण गाते हुए मानवी भाषा में मधुर वचन कहने का निश्चय करते हैं।
सर्ग 31 , रघुवंश की कथा, और सीताजी की दृष्टि हनुमानजी पर

इतना विचार कर महाबुद्धिमान हनुमानजी ने सीताजी के सुनते-सुनते मधुर वाणी में कहा, “इक्ष्वाकु-वंश में दशरथ नामक एक परम यशस्वी राजा हुए, जो रथ-गज-अश्वों के स्वामी, पुण्यशील और महाकीर्तिमान थे। राजर्षियों में गुणश्रेष्ठ, तप में ऋषियों के समान, बल में इन्द्र-तुल्य; अहिंसा में रत, घृणी (दयावान्), सत्यपराक्रमी; चारों समुद्रों तक की पृथ्वी पर विख्यात, स्वयं सुखी और दूसरों को सुख देने वाले।”
“उनके प्रिय ज्येष्ठ पुत्र, चन्द्र-सम मुख वाले, धनुर्धरों में श्रेष्ठ, राम नाम से प्रसिद्ध हुए। वे अपने चरित्र के, अपने जनों के, समस्त प्राणि-लोक के और धर्म के रक्षक थे। सत्यप्रतिज्ञ वृद्ध पिता के वचन के अनुसार वे वीर अपनी पत्नी और भाई लक्ष्मण के साथ वन को गए। उस महावन में आखेट करते हुए उन्होंने अनेक कामरूपी (इच्छानुसार रूप बदलने वाले) शूर राक्षसों को मारा। जनस्थान का संहार और खर-दूषण का वध सुनकर रावण ने माया से मृगरूपी राक्षस द्वारा श्रीराम को छलकर जानकी का हरण कर लिया।”
“उन देवी सीता को खोजते हुए श्रीराम को वन में सुग्रीव नामक वानर मित्र मिला। बालि को मारकर पुरंजय श्रीराम ने महात्मा सुग्रीव को वानर-राज्य दिया। सुग्रीव की आज्ञा से कामरूपी वानर हज़ारों की संख्या में सब दिशाओं में उस देवी को खोजने निकले। सम्पाति, पक्षिराज, जटायु के बड़े भाई, के वचन से, उस बड़ी आँखों वाली देवी के लिए, मैं वेगपूर्वक सौ योजन (आठ सौ मील) चौड़ा समुद्र लाँघ आया। श्रीराम के मुख से सुने रूप, वर्ण और लक्षण वाली ही जिन्हें मैंने यहाँ पाया है, वही सीता हैं।” इतना कहकर वह वानर-श्रेष्ठ चुप हो गए।
यह सुनकर जानकी को परम विस्मय हुआ। अपने बिखरे केशों से ढका मुख ऊपर उठाकर वह भीरु उस शिंशपा (अशोक की एक प्रकार की) वृक्ष की ओर देखने लगीं, जिस पर हनुमानजी बैठे थे। वानर का वचन सुनकर, समस्त दिशाओं और उपदिशाओं में ताकती हुई, सर्वात्मना श्रीराम का स्मरण करती हुई वे परम हर्ष से भर उठीं। तिरछे, ऊपर और नीचे देखती हुई उन्होंने सुग्रीव के मन्त्री, वायुपुत्र, अचिन्त्य-बुद्धि हनुमानजी को देखा, मानो पूर्व दिशा में उदित सूर्य हों।
समझने की कुंजी , सौ योजन का समुद्र: वाल्मीकि लंका और मुख्यभूमि के बीच के समुद्र को सौ योजन चौड़ा कहते हैं, जिसे गीता प्रेस लगभग आठ सौ मील (करीब तेरह सौ किलोमीटर) के बराबर बताता है। यह दूरी कथा में हनुमानजी की छलाँग के असाधारण पराक्रम का माप है।
सार: हनुमानजी दशरथ से लेकर अपनी समुद्र-लंघन तक की पूरी कथा सुनाते हैं, और सीताजी ऊपर देखकर शिंशपा-वृक्ष पर बैठे उदित-सूर्य-से हनुमानजी को देख लेती हैं।
सर्ग 32 , स्वप्न या सत्य? सीताजी का सन्देह

शाखाओं की ओट में छिपे, बिजली के समूह-से पिंगल (भूरे) तथा श्वेत वस्त्र वाले हनुमानजी को देखकर सीताजी का मन डगमगा गया। विनम्र और प्रियवादी, खिले अशोक-पुष्पों के समूह-सी आभा वाले, तपाए स्वर्ण-से नेत्रों वाले उस वानर को देखकर वे सहसा मन्द-मन्द स्वर में सिसकने लगीं और उन्हें विस्मय हुआ। फिर “यह तो वानर का भयानक, दुरासद रूप है,” ऐसा सोचकर, इसे दुर्निरीक्ष्य मानकर, वे मूर्छित-सी हो गईं और भय से व्याकुल होकर करुण विलाप करने लगीं, “राम! राम! लक्ष्मण!”
विनम्र मुद्रा में आए हनुमानजी को देखकर मैथिली ने सोचा, “कहीं यह स्वप्न तो नहीं!” बुद्धिमानों में श्रेष्ठ वायुपुत्र को देखकर वह फिर मूर्छित-सी हुईं और देर बाद होश में आकर विचारने लगीं, “आज मैंने यह विकृत स्वप्न देखा है; शास्त्रों में वानर का दर्शन निन्दित कहा गया है। राम और लक्ष्मण का तथा मेरे पिता जनक का कल्याण हो! किन्तु यह स्वप्न नहीं हो सकता; शोक और दुःख से पीड़ित मुझे नींद ही नहीं आती। उस चन्द्रमुख प्रियतम से वियुक्त मुझे सुख ही कहाँ? जिसका मैं सदा ‘राम-राम’ कहती हूँ, उसी की अनुरूप बात मैं सुन रही हूँ, वही देख भी रही हूँ।”
“क्या यह मनोरथमात्र है? पर मनोगत छवि का तो रूप नहीं होता, और यह वानर तो स्पष्ट रूप वाला है और मुझसे बात भी कर रहा है।” अन्ततः उन्होंने श्रद्धापूर्वक प्रार्थना की, “वाचस्पति (बृहस्पति) सहित इन्द्र को, स्वयम्भू ब्रह्मा को, और हुताशन (अग्नि) को नमस्कार! इस वनवासी ने मेरे सामने जो कुछ कहा है, वह सत्य ही हो, अन्यथा नहीं।”
समझने की कुंजी , मनोरथ बनाम प्रत्यक्ष: सीताजी का तर्क सूक्ष्म है; मन की कल्पना (मनोरथ) निराकार होती है, पर सामने बैठा वानर साकार है और बोल रहा है; अतः यह केवल कल्पना नहीं। यही विवेक उन्हें भ्रम से सत्य की ओर ले जाता है, और वे देवताओं से वचन के सच होने की प्रार्थना करती हैं।
सार: सीताजी हनुमानजी को कभी स्वप्न, कभी कल्पना समझकर डरती हैं, फिर तर्क से उन्हें प्रत्यक्ष मानकर बृहस्पति, इन्द्र, ब्रह्मा और अग्नि से वचन के सच होने की प्रार्थना करती हैं।
सर्ग 33 , हनुमानजी का प्रश्न, और सीताजी की आत्मकथा
शिंशपा-वृक्ष से उतरकर, मूँगे-से मुख वाले, विनम्र वेश वाले, सीताजी की दशा देख व्यथित हनुमानजी ने सिर पर अंजलि रखकर मधुर वाणी में पूछा, “कमलदल-सी आँखों वाली, मलिन रेशमी वस्त्र पहने, वृक्ष की शाखा थामे आप कौन हैं? आपकी आँखों से शोक के आँसू क्यों झर रहे हैं? देवों, असुरों, नागों, गन्धर्वों, राक्षसों, यक्षों या किन्नरों में से आप कौन हैं? क्या आप ग्यारह रुद्रों, मरुतों या आठ वसुओं में से कोई देवी हैं? या चन्द्रमा से बिछुड़ी, स्वर्ग से गिरी रोहिणी हैं? या क्रोध-मोह से वसिष्ठ को रुष्ट कर गिरीं कल्याणी अरुन्धती हैं? आपका पुत्र, पिता, भाई या पति, कौन इस लोक से परलोक गया, जिसके लिए आप शोक करती हैं?”
“पर रोने, गहरी साँसें लेने, धरती छूने और किसी राजा का नाम लेने से मैं आपको देवी नहीं मानता। आपके अंग-लक्षणों से जान पड़ता है कि आप किसी भूपाल की महिषी और किसी राजा की कन्या हैं। यदि आप वही सीता हैं जिनका रावण ने जनस्थान से बलपूर्वक हरण किया, तो मुझे बताइए, आपका कल्याण हो! आपकी दीन दशा, अतिमानुष रूप और तप-चिह्नित वेश से निश्चय ही आप श्रीराम की महिषी हैं।”
राम के नाम से हर्षित होकर वैदेही ने उत्तर दिया, “मैं पृथ्वी के राजसिंहों में मुख्य, शत्रुसेना-नाशक दशरथ की पुत्रवधू हूँ। महात्मा विदेहराज जनक की पुत्री, बुद्धिमान श्रीराम की पत्नी, सीता नाम से प्रसिद्ध हूँ। राघव के घर में मनुष्योचित भोग भोगती बारह वर्ष रही। तेरहवें वर्ष राजा ने उपाध्याय (वसिष्ठ) सहित श्रीराम का युवराज-अभिषेक करना चाहा। पर अभिषेक की तैयारी के समय कैकेयी ने पति से कहा, ‘जब तक राम का अभिषेक न रुके, मैं अन्न-जल नहीं लूँगी; यदि आपका दिया वचन झूठा न हो, तो राम वन को जाएँ।’”
“वरदान का स्मरण कर सत्यवादी राजा कैकेयी का यह क्रूर वचन सुनकर मूर्छित हो गए। होश में आकर वृद्ध राजा ने रोते हुए ज्येष्ठ यशस्वी पुत्र से राज्य माँगा। पर अभिषेक से भी प्रिय पिता का वचन मानकर श्रीराम ने उसे स्वीकार किया। जो दान देते थे, पर लेते नहीं; जो सत्य बोलते, असत्य कभी नहीं; ऐसे प्राणपण-सत्यपराक्रमी श्रीराम ने अपने बहुमूल्य उत्तरीय त्यागकर, मन से राज्य त्यागकर, मुझे अपनी माता को सौंप दिया। पर मैं उनके आगे ही वन को चल पड़ी; उनके बिना मुझे स्वर्ग भी रुचता नहीं। महाभाग सुमित्रानन्दन लक्ष्मण भी कुश और चीर पहनकर अपने अग्रज के पीछे चलने को तैयार हो गए।”
“हम तीनों दृढ़व्रत होकर अदृष्टपूर्व, गम्भीर वन में घुस गए। दण्डकारण्य में रहते समय उन अमित-तेजस्वी श्रीराम की पत्नी मैं, दुरात्मा रावण के द्वारा हर ली गई। उसने मुझे दो मास जीवित रहने का अवसर दिया है; इन दो मासों के बाद मैं प्राण त्याग दूँगी।”
सार: हनुमानजी सीताजी से उनका परिचय पूछते हैं, और सीताजी कैकेयी के वर से लेकर अपने हरण और रावण की दी दो मास की अवधि तक अपनी पूरी कथा सुना देती हैं।
सर्ग 34 , दूत का परिचय, और फिर वही सन्देह

शोक पर शोक से अभिभूत सीताजी का वचन सुनकर वानर-श्रेष्ठ हनुमानजी ने ढाढ़स बँधाते हुए कहा, “देवि! मैं श्रीराम के सन्देश से, उनका दूत बनकर आपके पास आया हूँ। श्रीराम कुशल हैं, उन्होंने आपको अपनी कुशल कही है। वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ दाशरथि राम ने आपकी कुशल पूछी है। महातेज लक्ष्मण ने भी, जो आपके स्वामी के प्रिय अनुचर हैं, शोक से सन्तप्त होकर आपको सिर झुकाकर प्रणाम कहा है।”
उन दोनों नर-सिंहों की कुशल सुनकर सीताजी का सारा शरीर पुलकित हो उठा। “वह लौकिक कहावत कल्याणकारी जान पड़ती है,” वे बोलीं, “कि सौ वर्ष बाद भी जीवित मनुष्य के पास आनन्द आ ही जाता है!” उस मिलन में दोनों को अद्भुत प्रीति हुई और विश्वस्त होकर वे बातचीत करने लगे।
पर ज्यों-ज्यों हनुमानजी पास सरकते गए, त्यों-त्यों सीताजी उन्हें रावण ही समझने लगीं। “हाय, धिक्कार है, मैंने इससे यह सब कह डाला! कहीं रूप बदलकर आया यह वही रावण तो नहीं!” यह सोचकर शोक से क्षीण सीताजी अशोक-शाखा छोड़कर वहीं धरती पर बैठ गईं। महाबाहु हनुमानजी ने जनकात्मजा को प्रणाम किया, पर भय से त्रस्त सीताजी ने उनकी ओर आँख न उठाई।
लम्बी साँस लेकर वे मधुर स्वर में बोलीं, “यदि आप मायावी रावण ही हैं और कपटी रूप धरकर मुझे फिर सन्ताप दे रहे हैं, तो यह उचित नहीं। जनस्थान में परिव्राजक (संन्यासी) का वेश धरकर आए वही रावण आप हैं। उपवास से क्षीण, दीन मुझे फिर सताना शोभा नहीं देता, हे कामरूपी निशाचर! अथवा शायद मेरी यह आशंका सच नहीं, क्योंकि आपके दर्शन से मेरे मन में प्रीति उपजी है। यदि आप सचमुच श्रीराम के दूत होकर आए हैं तो आपका कल्याण हो; मैं आपसे श्रीराम की बातें पूछूँगी, क्योंकि उनकी कथा मुझे प्रिय है। हे सौम्य! मेरे प्रिय श्रीराम के गुण कहिए; जैसे नदी का वेग किनारे को काट ले जाता है, वैसे आप मेरा चित्त हर रहे हैं।”
“आह, इस स्वप्न की मिठास, कि चिरकाल से हरी हुई मैं श्रीराम का भेजा वानर अपनी आँखों देख रही हूँ! पर स्वप्न में वानर देखने से तो सौभाग्य नहीं मिलता, और मुझे तो मन की प्रसन्नता मिली है; अतः यह स्वप्न नहीं। क्या यह चित्त-मोह है, या वातज विकार, या मृगतृष्णा? पर नहीं, मैं अपने को और इस वानर को, दोनों को पहचान रही हूँ; अतः यह उन्माद भी नहीं।” राक्षसों के कामरूपी होने से, और वानरों के समुद्र लाँघ पाने में सन्देह से, सीताजी ने हनुमानजी को रावण ही मान लिया और चुप हो गईं।
सीताजी का निश्चय जानकर हनुमानजी श्रोत्र-सुखद वचनों से उन्हें हर्षित करते हुए बोले; श्रीराम के स्वरूप, तेज, सत्य और मधुर वाणी, विष्णु-तुल्य पराक्रम, चातुर्वर्ण्य की रक्षा, सबका वर्णन किया, और फिर अपना परिचय दिया, “देवि! मुझे सुग्रीव का सचिव, पवनपुत्र हनुमान जानिए। समुद्र लाँघकर, दुरात्मा रावण के सिर पर मानो पैर रखकर मैं लंका में घुसा हूँ। मैं वैसा नहीं हूँ जैसा आप समझ रही हैं; यह आशंका त्याग दीजिए और मेरे वचन पर श्रद्धा कीजिए।”
सार: हनुमानजी श्रीराम और लक्ष्मण का कुशल-समाचार देते हैं, पर पास आते देख सीताजी फिर उन्हें रावण समझ बैठती हैं; तब हनुमानजी अपना सच्चा परिचय देकर श्रद्धा रखने को कहते हैं।
सर्ग 35 , श्रीराम-लक्ष्मण के लक्षण, और हनुमानजी की पूरी कथा

श्रीराम की कथा सुनकर वैदेही ने मधुर वाणी में कहा, “आपका श्रीराम से सम्पर्क कहाँ हुआ? लक्ष्मण को आप कैसे जानते हैं? वानरों और मनुष्यों का मेल कैसे हुआ? जिससे मुझे शोक न घेरे, इसके लिए श्रीराम और लक्ष्मण के चिह्न फिर से विस्तार से बताइए। उनका संस्थान (डील-डौल) और रूप कैसा है, जाँघें और भुजाएँ कैसी हैं?”
हनुमानजी ने यथातथ्य वर्णन आरम्भ किया, “श्रीराम कमलनेत्र, पूर्णचन्द्र-मुख, जन्म से रूप और दाक्षिण्य से सम्पन्न हैं। तेज में सूर्य-समान, क्षमा में पृथ्वी-समान, बुद्धि में बृहस्पति-समान, यश में इन्द्र-समान। प्राणि-लोक और स्वजनों के रक्षक, अपने चरित्र और धर्म के रक्षक, परंतप। चातुर्वर्ण्य के रक्षक, मर्यादाओं के कर्ता और कराने वाले। ब्रह्मचर्य-व्रत में स्थित, साधुओं के उपकार जानने वाले, यजुर्वेद, धनुर्वेद, वेद और वेदांगों में निष्ठित। चौड़े कन्धे, महाबाहु, शंख-सी ग्रीवा, शुभ मुख, ताम्र नेत्र; दुन्दुभि-सा गम्भीर स्वर, चिकनी त्वचा, श्याम वर्ण, सुविभक्त अंग।”
“वे अनेक शुभ-लक्षणों से युक्त हैं; तीन अंगों में स्थिर, तीन में दीर्घ, तीन में सम, तीन में उन्नत, तीन में ताम्र, तीन में स्निग्ध, तीन में गम्भीर; तीन वलियों वाले, चार-चार अंग सम, चौदह अन्य अंग जोड़ों में सम, चार दाढ़ें तीखी, सिंह-व्याघ्र-गज-वृषभ-सी चार चालें, उत्तम ओठ-ठोड़ी-नासिका, पाँच स्निग्ध अंग, आठ दीर्घ अंग; दस कमल-से अंग, दस विशाल अंग, तीन से व्याप्त (तेज, यश, कीर्ति), दो श्वेत अंग, छह में उन्नत, नौ में सूक्ष्म; तीन कालों में धर्म-अर्थ-काम का सेवन करने वाले। सत्य-धर्म में रत, श्रीमान्, देश-काल-विभाग के ज्ञाता, सर्वलोक-प्रिय।”
“उनके वैमात्र भाई सौमित्रि लक्ष्मण भी अनुराग, रूप और गुणों में उनकी प्रतिकृति हैं; श्रीराम स्वर्णछवि नहीं, श्याम हैं, और लक्ष्मण स्वर्णवर्ण हैं।” फिर हनुमानजी ने मिलन की कथा कही, “आपको खोजते वे दोनों नर-व्याघ्र हमसे ऋष्यमूक पर्वत के पास मिले, जहाँ बालि के भय से डरे सुग्रीव बैठे थे। सुग्रीव की आज्ञा से मैंने अंजलि बाँधकर उनसे पहुँचकर, उन्हें कन्धे पर बैठाकर सुग्रीव के पास पहुँचाया। आपस की बातचीत से दोनों में गहरी प्रीति हुई। बालि ने सुग्रीव की पत्नी रुमा को छीन उन्हें निकाल दिया था; यह सुनकर श्रीराम ने सुग्रीव को सान्त्वना दी, और लक्ष्मण ने आपके वियोग का शोक सुग्रीव से कहा।”

“रावण द्वारा हरण के समय आपके जो आभूषण पृथ्वी पर गिरे थे, उन्हें वानर-यूथपतियों ने हर्षित होकर श्रीराम को दिखाया; पर आपका ठिकाना वे नहीं जानते थे। वे आभूषण मैंने ही पहले उठाए थे। उन्हें छाती से लगाकर देव-स्वरूप श्रीराम बहुत विलाप करते रहे, बार-बार रोते-तप्त होते रहे; उनका विलाप हमारे शोक की अग्नि को और भड़काता रहा। श्रीराम ने प्रतिज्ञापूर्वक बालि को रणभूमि में मारकर सुग्रीव को सब ऋक्ष-वानरों का राजा बनाया।”
“राज्य पाकर सुग्रीव ने महावानरों को बुलाकर दसों दिशाओं में भेजा। हम विन्ध्य पर्वत में खोते हुए शोक में डूबे रहे, और कार्य की निराशा तथा सुग्रीव के भय से प्रायोपवेशन (अनशन कर प्राण त्यागने) को बैठ गए। तभी अंगद के विलाप में आपका नाश, बालि-वध और जटायु-मरण सुनकर जटायु के बड़े भाई पक्षिराज सम्पाति आए। भाई के वध की बात सुनकर दुःखी सम्पाति ने बताया कि आप रावण के घर रहती हैं। उसी से उत्साहित होकर हम अंगद के नेतृत्व में समुद्रतट पर पहुँचे।”
“समुद्र देख वानर-सेना घबरा गई; तब मैं तीव्र भय हटाकर सौ योजन छलाँग गया और रात में राक्षसों से भरी लंका में घुसा। रावण और आप दोनों को मैंने देखा। हे मैथिली! देवर्षियों की प्रेरणा से मेरे पिता केसरी ने गोकर्ण तीर्थ पर शम्बसादन नामक असुर को मारा था; वायुदेव से उस केसरी की भार्या के द्वारा मैं उत्पन्न हुआ, और अपने ही कर्मों से ‘हनुमान’ नाम से लोक में विख्यात हूँ। आपके विश्वास के लिए मैंने स्वामी के गुण कहे हैं; शीघ्र ही श्रीराम आपको यहाँ से ले जाएँगे।”
उपयुक्त प्रमाणों और पहचान-चिह्नों से आश्वस्त सीताजी अतुल हर्ष को प्राप्त हुईं और टेढ़ी पलकों वाली आँखों से आनन्द के आँसू बहाने लगीं। उनका मुख राहु से छूटे चन्द्र-सा शोभा पाने लगा। अब उन्होंने हनुमानजी को स्पष्टतः वानर ही माना, और कुछ नहीं।
एक उप-कथा: हनुमानजी अपने जन्म की कथा सुनाते हैं; गोकर्ण के समुद्रतट पर देवर्षियों की प्रेरणा से उनके पिता केसरी ने जनता को सताने वाले शम्बसादन असुर का वध किया; उसी केसरी की भार्या से वायुदेव के अंश से हनुमानजी का जन्म हुआ। यह आत्मपरिचय सीताजी का विश्वास दृढ़ करने में अन्तिम कड़ी बनता है।
सार: हनुमानजी श्रीराम-लक्ष्मण के अंग-लक्षण और किष्किन्धा-मिलन से लेकर सम्पाति-वचन और अपने जन्म तक की समस्त कथा कहते हैं, जिससे सीताजी उन्हें सच्चा दूत मान लेती हैं।
सर्ग 36 , श्रीराम की मुद्रिका, और सीताजी का कुशल-प्रश्न

सीताजी का विश्वास और दृढ़ करने को महातेज हनुमानजी ने फिर विनम्र वचन कहे, “हे महाभागे! मैं वानर हूँ और बुद्धिमान श्रीराम का दूत। देखिए, श्रीराम के नाम से अंकित यह देव-मुद्रिका (अँगूठी), जो उन महात्मा ने आपके विश्वास के लिए मुझे दी और मैं लाया हूँ। आश्वस्त हो जाइए, आपका कल्याण हो; आपके दुःखों का फल अब समाप्त हुआ।”
स्वामी के कर से सुशोभित उस मुद्रिका को लेकर, मानो स्वयं पति आ गए हों, जानकी आनन्दित हो उठीं। लज्जाशील वह बाला, स्वामी के सन्देश से हर्षित और परम सन्तुष्ट होकर महाकपि की प्रशंसा करने लगीं, “हे वानरश्रेष्ठ! आप विक्रान्त, समर्थ और प्राज्ञ हैं, जो अकेले इस राक्षस-नगरी को रौंद आए। सौ योजन चौड़ा, मगरों का घर यह समुद्र आपने गोखुर-सा लाँघ लिया। आपको मैं साधारण वानर नहीं मानती, क्योंकि आपको रावण से भी न त्रास है न सम्भ्रम। आप मुझसे बात करने योग्य हैं, यदि आपको आत्मज्ञ श्रीराम ने भेजा है; और दुर्धर्ष श्रीराम बिना परखे, किसी के पराक्रम जाने बिना, किसी को मेरे पास नहीं भेजेंगे।”
फिर उन्होंने व्याकुल होकर अनेक प्रश्न पूछे, “सौभाग्य से धर्मात्मा, सत्यप्रतिज्ञ श्रीराम और महातेज लक्ष्मण कुशल हैं। पर यदि श्रीराम कुशल हैं, तो वे क्रोध से समुद्र-मेखला वाली पृथ्वी को युगान्त-अग्नि-सी क्यों नहीं जला डालते? वे दोनों तो देवताओं को भी वश में कर सकते हैं; तो भी मेरे दुःखों का अन्त नहीं आया; लगता है मेरे ही दुःख का अन्त नहीं।”

“क्या श्रीराम व्यथित नहीं होते, सन्तप्त नहीं होते? क्या वे पुरुषोत्तम भावी कर्तव्य करते हैं? क्या वे दीन-घबराए तो नहीं? क्या मित्रों के प्रति साम और दान, तथा शत्रुओं के प्रति दान-दण्ड-भेद की नीति बरतते हैं? क्या वे देवों का प्रसाद चाहते और पुरुषार्थ तथा दैव दोनों पर आश्रित रहते हैं? कहीं प्रवास के कारण उनका मुझसे स्नेह तो नहीं छूट गया? क्या वे मुझे इस संकट से उबारेंगे? सुखयोग्य श्रीराम मेरे वियोग रूपी महान विपत्ति में हताश तो नहीं हो गए? क्या कौसल्या, सुमित्रा और भरत की कुशल उनके कानों तक पहुँचती है? कहीं मेरे शोक से उनका कमल-सा सुगन्धित स्वर्ण-मुख जलाशय सूखने पर धूप में मुरझाए कमल-सा तो नहीं कुम्हला गया?”
“धर्म के नाम पर राज्य त्यागते, और मुझे पैदल वन ले जाते समय जिन्हें न भय हुआ न शोक, क्या वे श्रीराम अब भी हृदय में धैर्य रखते हैं? उनकी माता, पिता या कोई और मुझसे बढ़कर तो दूर, मेरे समान भी उनका प्रिय नहीं रहा। मैं भी तभी तक जीना चाहती हूँ जब तक प्रिय का समाचार सुनती रहूँ।” इतना महान् और मधुरार्थ वचन कहकर, हनुमानजी की रामकथामय वाणी और सुनने को सीताजी मौन हो गईं।
तब हनुमानजी ने सिर पर अंजलि रखकर कहा, “कमलनयन श्रीराम आपको यहाँ नहीं जानते, इसी से वे आपको शीघ्र नहीं ले जा सके, जैसे इन्द्र अपनी शची को ले गए थे। मेरा वचन सुनते ही राघव हरि-भालुओं की विशाल सेना लेकर शीघ्र आएँगे। बाणों से दुर्धर्ष समुद्र को पाटकर वे लंका को राक्षसहीन कर देंगे। मार्ग में यदि मृत्यु, देव या महान् असुर भी खड़े हों, तो उन्हें भी मार डालेंगे।”
“आपके वियोग के शोक से भरे श्रीराम सिंह से घायल हाथी-से चैन नहीं पाते। मन्दर, मलय, विन्ध्य, सुमेरु और दर्दुर पर्वतों की तथा मूल-फल की शपथ, आप शीघ्र ही श्रीराम का उदित-पूर्णचन्द्र-सा मुख देखेंगी। आप उन्हें प्रस्रवण पर्वत पर ऐरावत की पीठ पर बैठे इन्द्र-से देखेंगी। श्रीराम न माँस लेते हैं, न मधु; पाँचवें प्रहर (सन्ध्या) में वन्य फल और सुसंस्कृत हविष्य-अन्न ही खाते हैं। आपमें चित्त लगाए वे शरीर से डंस, मच्छर, कीट या सरीसृप तक नहीं हटाते। नित्य ध्यानपरायण, नित्य शोकमग्न, सोते हुए भी ‘सीता’ कहकर चौंक पड़ते हैं। फल-फूल या स्त्री-मनोहर वस्तु देखकर ‘हाय प्रिये!’ कहकर आहें भरते हैं। वे महात्मा राजकुमार केवल आपके उद्धार के लिए ही प्रयत्नशील हैं।”
रामकीर्तन से जिनका शोक मिटा, पर श्रीराम के शोक को सुनकर जो समान दुःखी हुईं, वह वैदेहसुता शरद के आरम्भ की उस रात-सी हो गईं जो आधी उजली, आधी मेघों से ढके चन्द्र से अँधेरी हो।
समझने की कुंजी , पाँचवाँ प्रहर: दिन को पाँच भागों में बाँटा गया है; प्रातः, संगव (पूर्वाह्न), मध्याह्न, अपराह्न और सायाह्न। श्रीराम के “पाँचवें प्रहर में भोजन” का अर्थ है, दिनभर निराहार रहकर सन्ध्या-समय ही वन्य फल और हविष्य खाना; यह उनकी तपोनिष्ठा और सीता-वियोग की गहराई दोनों दिखाता है।
सार: हनुमानजी श्रीराम की नाममुद्रिका सौंपते हैं; सीताजी हर्षित होकर स्वामी और स्वजनों की कुशल पूछती हैं, और हनुमानजी श्रीराम की विरह-दशा का सविस्तार वर्णन कर उन्हें ढाढ़स बँधाते हैं।
सर्ग 37 , पीठ पर ले चलने का प्रस्ताव, और सीताजी का अस्वीकार
हनुमानजी का वचन सुनकर पूर्णचन्द्र-मुखी सीताजी ने धर्म-अर्थ-सम्मत उत्तर दिया, “हे वानर! आपने जो कहा कि श्रीराम मुझमें ही चित्त लगाए शोकपरायण हैं, वह विष-मिश्रित अमृत है। चाहे कोई विस्तृत ऐश्वर्य में हो या दारुण विपत्ति में, काल उसे रस्सी से बाँधकर खींच ले जाता है। प्राणियों का विधान अटल है; देखिए, लक्ष्मण, श्रीराम और मैं, सब विपत्तियों से व्याकुल हैं। नौका डूबने पर तैरते थके पुरुष-से श्रीराम इस शोक-समुद्र का पार कैसे पाएँगे? राक्षसों का वध, रावण का संहार और लंका का विध्वंस कर मेरे पति मुझे कब देखेंगे?”
“उन्हें कहिए कि शीघ्रता करें; मेरा जीवन तो इसी संवत्सर (बारह मास की अवधि) तक है। दसवाँ मास बीत रहा है, क्रूर रावण की दी अवधि में केवल दो मास शेष हैं। विभीषण ने भाई रावण से मेरी वापसी के लिए बहुत आग्रह किया, पर वह नहीं माना; काल उसे संग्राम में घेर चुका है। विभीषण की ज्येष्ठ कन्या कला ने अपनी माता के भेजे जाने पर मुझे बताया कि अविन्ध्य नामक एक मेधावी, विद्वान्, वृद्ध, रावण-सम्मानित राक्षस ने रावण को चेताया था कि मुझे न लौटाने पर श्रीराम से राक्षसों का नाश होगा; पर दुरात्मा ने वह हितवचन नहीं सुना।”
“मुझे आशा है, हे वानरश्रेष्ठ! कि मेरे पति मुझे शीघ्र पाएँगे; मेरा अन्तरात्मा शुद्ध है और उनमें अनेक गुण हैं। उत्साह, पौरुष, सत्त्व, अनृशंसता (निर्दयता का अभाव), कृतज्ञता, विक्रम और प्रभाव, सब श्रीराम में हैं। जिसने जनस्थान में बिना भाई की सहायता के चौदह हज़ार राक्षस मारे, उससे कौन शत्रु न काँपेगा? वे पुरुष-श्रेष्ठ विपत्तियों से तुलने योग्य नहीं; उनका प्रभाव मैं वैसे ही जानती हूँ जैसे शची इन्द्र का। वे बाण-रश्मि वाले राम-सूर्य शत्रु-राक्षस रूपी जल को सोख लेंगे।”
आँसू भरे मुख से इस प्रकार बोलती शोक-क्षीण सीताजी से हनुमानजी ने कहा, “मेरा वचन सुनते ही श्रीराम हरि-भालुओं की विशाल सेना लेकर लंका आ धमकेंगे। अथवा, हे अनिन्दिते! आज ही मैं आपको इस दुःख से छुड़ा देता हूँ; आप मेरी पीठ पर चढ़ जाइए। मैं तो रावण-सहित समूची लंका को पीठ पर ढो सकता हूँ; फिर आपको समुद्र पार ले जाना क्या कठिन? आज ही मैं आपको प्रस्रवण-स्थित श्रीराम के पास पहुँचा दूँगा, जैसे अग्नि हवि को इन्द्र तक पहुँचाती है। मेरी पीठ पर चढ़िए, देवि! विकल्प मत कीजिए; रोहिणी जैसे चन्द्र से, वैसे आप श्रीराम से मिलने की इच्छा कीजिए।”

यह सुनकर हर्ष से रोमांचित मैथिली बोलीं, “हनुमान! इतनी दूर मुझे कैसे ले चलेंगे? यह तो आपका वानर-स्वभाव ही है, हे यूथप! छोटे शरीर वाले आप मुझे मेरे राजपति के पास कैसे ले जाएँगे?” इस प्रश्न को हनुमानजी ने अपना पहला अपमान-सा माना। “यह श्यामनयना मेरा सत्त्व और प्रभाव नहीं जानती; तो वैदेही मेरा इच्छानुसार रूप देख ले,” यह सोचकर अरि-मर्दन हनुमानजी ने अपना स्वरूप दिखाया। वे उस वृक्ष से कूदकर सीता का विश्वास बढ़ाने को बढ़ने लगे, और सुमेरु-मन्दर-से, दीप्त अग्नि-सी आभा वाले होकर सीताजी के सामने खड़े हो गए। पर्वत-से, ताम्र-मुख, वज्र-सी दाढ़ों-नखों वाले महाबली हनुमानजी ने कहा, “इस समूची लंका को, उसके पर्वत-वन, अट्टालिका-प्राकार-तोरण और स्वामी रावण सहित ढो ले जाने का सामर्थ्य मुझमें है। अतः मन स्थिर कीजिए, विकल्प छोड़िए, और श्रीराम-लक्ष्मण को शोकमुक्त कीजिए।”
पर्वत-से हनुमानजी को देखकर कमलनयनी जनकात्मजा ने कहा, “हे महाकपि! मैं आपका सत्त्व-बल जानती हूँ; आपकी गति वायु-सी और तेज अग्नि-सा अद्भुत है। कोई साधारण वानर भला समुद्र-पार इस भूमि तक कैसे आता? आपकी गमन-शक्ति और मुझे ले जाने की सामर्थ्य मैं मानती हूँ; पर मेरे कार्य की सिद्धि भी तो ठीक से सोची जानी चाहिए। आपके वायु-वेग में मैं मूर्छित हो सकती हूँ, या समुद्र के ऊपर आपकी पीठ से गिर सकती हूँ; गिरकर मगर-मच्छों से भरे समुद्र में जल-जन्तुओं का भोजन बन जाऊँगी। फिर स्त्री को पीठ पर ले जाते देख आप पर सन्देह होगा, राक्षस पीछे पड़ेंगे; शस्त्रधारियों से घिरे आप निरायुध मुझे बचाएँगे या उनसे लड़ेंगे? भयभीत होकर मैं पीठ से गिर सकती हूँ; या वे मुझे छीन लें या मार डालें; युद्ध में जय-पराजय अनिश्चित है।”

“वे पापी राक्षस मुझे ऐसी गुप्त जगह रख दें जहाँ न वानर जानें न श्रीराम, तो आपका यह प्रयत्न व्यर्थ हो जाएगा। आप सब राक्षसों को मार भी डालें, तो श्रीराम का यश घट जाएगा। और स्वामी की भक्ति को आगे रखकर मैं श्रीराम के अतिरिक्त किसी और का शरीर स्वेच्छा से छूना नहीं चाहती। रावण के अंग-स्पर्श में तो मैं अनाथ, विवश और परवश थी, कुछ कर न सकी। यदि श्रीराम स्वयं रावण को राक्षसों सहित मारकर मुझे यहाँ से ले जाएँ, तो वही उनके योग्य होगा। उनके पराक्रम मैंने सुने और देखे हैं; देव, गन्धर्व, नाग, राक्षस मिलकर भी संग्राम में उनकी समता नहीं कर सकते। अतः, हे वानरवीर! शीघ्र मेरे प्रिय श्रीराम को, लक्ष्मण और यूथपों सहित, यहाँ ले आइए, और चिरकाल से शोक-क्षीण मुझे हर्षित कीजिए।”
समझने की कुंजी , सीताजी का अस्वीकार: सीताजी का इनकार दुर्बलता नहीं, तीन सुविचारित कारणों पर टिका है; मार्ग का व्यावहारिक संकट (गिरना, राक्षसों का पीछा), श्रीराम का यश (उनका पराक्रम ही रावण को दण्ड दे, यही उचित), और पातिव्रत्य की मर्यादा (श्रीराम के सिवा किसी का स्वेच्छा-स्पर्श नहीं)। वाल्मीकि यहाँ सीता को धीर और विवेकशील नायिका के रूप में गढ़ते हैं।
सार: हनुमानजी सीताजी को अपनी पीठ पर बैठाकर ले चलने का प्रस्ताव देते हैं और विशाल रूप दिखाते हैं, पर सीताजी व्यावहारिक संकट, श्रीराम के यश और पातिव्रत्य के कारणों से अस्वीकार कर देती हैं और स्वयं श्रीराम को लाने का आग्रह करती हैं।
सर्ग 38 , काक-प्रसंग की पहचान, और चूड़ामणि की भेंट
सीताजी के वचन से सन्तुष्ट होकर वाक्य-विशारद हनुमानजी ने कहा, “हे शुभदर्शने देवि! आपने जो कहा वह उचित है, साध्वियों के विनय और स्त्री-स्वभाव के अनुरूप। स्त्री होने से आप सौ योजन चौड़ा समुद्र मेरी पीठ पर पार न कर सकेंगी। और दूसरा कारण, कि श्रीराम के अतिरिक्त किसी का संसर्ग मैं नहीं चाहती, वह भी उस महात्मा की पत्नी के योग्य है; आपके सिवा और कौन स्त्री ऐसा वचन कहेगी? लंका में घुसना कठिन, समुद्र पार करना कठिन, और मुझमें यह सामर्थ्य था; इसी से तथा श्रीराम के प्रिय की इच्छा और आपके प्रति स्नेह से मैंने वह प्रस्ताव रखा था, अन्य किसी कारण से नहीं। यदि आप मेरे साथ नहीं चल सकतीं, तो कोई अभिज्ञान (पहचान-चिह्न) दीजिए, जिससे श्रीराम जान लें कि मैं सचमुच आपसे मिला।”
आँसुओं से रुँधे स्वर में सीताजी ने वह श्रेष्ठ अभिज्ञान सुनाया; चित्रकूट पर्वत के पूर्वोत्तर चरण में, मन्दाकिनी से अदूर, सिद्धों के बसे प्रदेश में, नाना पुष्पों से सुगन्धित उपवनों में जल में क्रीड़ा कर भीगी सीताजी श्रीराम की गोद में बैठ गई थीं। तभी माँस का लोभी एक काक (कौआ) उन्हें चोंच मारने लगा; ढेला उठाकर सीताजी ने उसे रोका, पर वह बार-बार झपटता रहा। वस्त्र की डोरी कसते समय जब उनका वस्त्र खिसका, तब श्रीराम ने हँसकर उन्हें देखा; वे लज्जित और कुपित हुईं। थककर श्रीराम की गोद में बैठीं, और श्रीराम ने हर्ष से उन्हें सान्त्वना दी; उन्होंने आँसू पोंछती सीताजी को काक से पीड़ित जाना।
थकान से सीताजी श्रीराम की गोद में और श्रीराम सीता की गोद में बारी-बारी सो रहे थे। तभी वही काक फिर आया और जागती सीताजी की छाती को नखों से फाड़ डाला। रक्त की बूँदों से श्रीराम जाग पड़े और सर्प-से फुफकारते हुए बोले, “हे गजनासोरु! किसने आपकी छाती घायल की? कुपित पंचमुखी सर्प से कौन खेलता है?” देखा तो वही काक रक्त-रँगे तीखे नखों से सीता की ओर मुख किए बैठा था। वह काक इन्द्र का पुत्र था, जो वायु-सी गति से स्वर्ग से उतरा था।
तब महाबाहु श्रीराम ने क्रोध से आँखें घुमाकर कुश की एक सींक ब्रह्मास्त्र से अभिमन्त्रित कर उस पक्षी पर छोड़ी, जो काल-अग्नि-सी प्रज्वलित हो उठी। आकाश में वह सींक काक का पीछा करने लगी; रक्षा चाहता वह तीनों लोक घूमा, पिता इन्द्र और सब महर्षियों से त्यक्त होकर अन्ततः श्रीराम की ही शरण में लौटा। शरण्य श्रीराम ने वध-योग्य होने पर भी, भूमि पर गिरे शरणागत की दया से रक्षा की; पर ब्रह्मास्त्र व्यर्थ नहीं हो सकता था, अतः उसे लक्ष्य बताने को कहा। काक ने अपनी दाहिनी आँख दे दी और प्राण बचा लिए; श्रीराम और राजा दशरथ को प्रणाम कर वह अपने स्थान लौट गया।
“उस काकमात्र के लिए आपने ब्रह्मास्त्र चलाया,” सीताजी ने मानो श्रीराम के सम्मुख ही कहा, “तो जिसने मुझे हरा, उसे आप कैसे सह रहे हैं? हे नरश्रेष्ठ! अहैतुक दया परम धर्म है; यह मैंने आप ही से सुना है। मैं आपको महावीर्य, समुद्र-सा गम्भीर, इन्द्र-सम जानती हूँ। तो भी समर्थ होकर वे दोनों परंतप मेरी सुध न लें, यह मेरा ही कोई महान् दुष्कृत है। अस्त्रवेत्ताओं में श्रेष्ठ, बलवान् श्रीराम! आप राक्षसों पर अस्त्र क्यों नहीं चलाते? न नाग, न गन्धर्व, न देव, न मरुद्गण, कोई संग्राम में श्रीराम का वेग नहीं रोक सकता; तो वे तीखे बाणों से राक्षसों का क्षय क्यों नहीं करते? वीर लक्ष्मण भी अग्रज की आज्ञा लेकर मुझे क्यों नहीं छुड़ाते?”
यह करुण सजल वचन सुनकर हनुमानजी बोले, “आपके शोक से श्रीराम सब ओर से विमुख हैं; मैं सत्य की शपथ खाता हूँ; और श्रीराम के दुःख से लक्ष्मण भी सन्तप्त हैं। आप किसी प्रकार खोज ली गई हैं; अब शोक का समय नहीं। इसी मुहूर्त से अपने दुःखों का अन्त निकट देखिए। वे दोनों महाबली नर-व्याघ्र राजकुमार आपके दर्शन को उत्सुक होकर सब लोकों को भस्म कर देंगे; रावण को सबन्धु मारकर श्रीराम आपको अपनी पुरी ले जाएँगे। अब बताइए, श्रीराम, लक्ष्मण, सुग्रीव या किष्किन्धा में जुटे वानरों से क्या सन्देश कहना है?”
तब सीताजी ने श्रीराम और लक्ष्मण के लिए कुशल-प्रश्न तथा अपने प्रणाम कहलवाए; लक्ष्मण के अनेक गुणों का स्मरण किया; जो माला, रत्न, स्त्रियाँ, राज्य और सुख त्यागकर श्रीराम के पीछे वन आए, जिनसे सुमित्रा सुपुत्रवती कहलाईं, जो श्रीराम के साथ पिता-सा बरताव और मुझसे माता-सा आचरण करते हैं, जो हरण के समय की बात जानते तक न थे, जो मितभाषी, यशस्वी और श्रीराम के परम प्रिय हैं, जिन्हें देख श्रीराम स्वर्गीय पिता को भी विस्मृत कर देते हैं। “ऐसे लक्ष्मण से इस प्रकार पूछिए कि मेरे दुःखों का क्षय हो। इस कार्य के निर्वाह में आप ही प्रमाण हैं; आपके प्रयत्न से ही श्रीराम मेरे लिए यत्नशील होंगे।”
“मेरे स्वामी वीर श्रीराम से बार-बार कहिए, ‘मैं एक मास और जीवित रहूँगी, हे दशरथनन्दन! मास के ऊपर नहीं जीऊँगी; मैं सत्य कहती हूँ। पापकर्मा रावण ने मुझे बन्दी बनाकर राक्षसियों से सताया है; हे वीर! जैसे विष्णु ने वराह-रूप में पृथ्वी को पाताल से उद्धारा, वैसे आप मुझे उबारिए।’” फिर उन्होंने वस्त्र में बँधा दिव्य चूड़ामणि (शिरोमणि) खोलकर हनुमानजी को दिया, “यह श्रीराम को दे दीजिए।” वह अनुपम मणि लेकर हनुमानजी ने उसे अपनी अँगुली में पहना, क्योंकि (मूल लघुरूप लौटा लेने पर) उनकी भुजा उसके लिए मोटी थी। मणि लेकर, सीताजी की प्रदक्षिणा कर, प्रणत होकर वे एक ओर खड़े हो गए; सीता-दर्शन के हर्ष से उनका मन श्रीराम और शुभलक्षण लक्ष्मण की ओर दौड़ गया। उस बहुमूल्य मणि को पाकर, जिसे जनकपुत्री ने अपने तप के प्रभाव से (राक्षसियों की दृष्टि से बचाकर) धारण किए रखा था, सन्तुष्ट-मन हनुमानजी लौटने को तैयार हो गए।
एक उप-कथा , काक-प्रसंग: चित्रकूट पर इन्द्र का पुत्र जयन्त काक का रूप धरकर सीताजी की छाती चोंच से घायल कर बैठा। श्रीराम ने कुश की सींक को ब्रह्मास्त्र से अभिमन्त्रित कर छोड़ा; तीनों लोक घूमकर, सब से त्यक्त होकर वह काक श्रीराम की ही शरण आया। ब्रह्मास्त्र व्यर्थ न होने के कारण उसने अपनी दाहिनी आँख देकर प्राण बचाए। यही गोपनीय प्रसंग सीताजी श्रीराम के लिए पहचान-चिह्न बनाती हैं, क्योंकि इसे केवल वे दोनों जानते थे।
सार: सीताजी पहचान-चिह्न के रूप में चित्रकूट का काक-प्रसंग सुनाती हैं, लक्ष्मण और श्रीराम के लिए कुशल-सन्देश तथा एक मास की अवधि कहलवाती हैं, और अन्त में अपना दिव्य चूड़ामणि हनुमानजी को सौंप देती हैं।
सर्ग 39 , मणि का मर्म, और वानर-बल का आश्वासन
मणि देकर अश्रु-गद्गद वाणी में सीताजी बोलीं, “यह अभिज्ञान श्रीराम यथार्थतः पहचानते हैं। इसे देखकर वे तीन का स्मरण करेंगे; मेरी माता, राजा दशरथ और मुझे; क्योंकि यह मेरी माता ने मेरे श्वशुर के सामने मुझे दहेज में दिया था। हे हरिसत्तम! अब अधिक उत्साह से सोचिए कि इस कार्य में आगे क्या करना है। इस कार्य के निर्वाह में आप ही प्रमाण हैं; जो प्रयत्न मेरे दुःख का क्षय करे, वही विचारिए। हनुमान! यत्न कर मेरे दुःख का क्षय कीजिए।”
“तथास्तु” कहकर, सिर झुकाकर वैदेही को प्रणाम कर, भीमविक्रम हनुमानजी जाने को उद्यत हुए। उन्हें प्रस्थित जानकर देवी फिर सजल स्वर में बोलीं, “हनुमान! श्रीराम और लक्ष्मण दोनों को मेरी कुशल कहिए; सुग्रीव, उनके मन्त्रियों और सब वृद्ध वानरों को धर्मसम्मत कुशल कहिए। और ऐसा प्रयत्न कीजिए कि महाबाहु श्रीराम मुझे इस दुःख-समुद्र से पार उतार लें। मेरी बात ऐसे रखिए कि यशस्वी श्रीराम मुझे जीवित ही पा लें; अपने वचन से मेरी सहायता का पुण्य कमाइए। नित्य-उत्साही दाशरथि मेरे कहे वचन सुनकर मेरे उद्धार के लिए और भी पौरुष बढ़ाएँगे; मेरा सन्देश सुनते ही वे विधिवत् पराक्रम का निश्चय करेंगे।”
सीताजी का वचन सुनकर हनुमानजी ने सिर पर अंजलि रखकर कहा, “हे जनकनन्दिनी! श्रीराम हरि-भालुओं के श्रेष्ठ वीरों सहित शीघ्र आकर, युद्ध में शत्रुओं को जीतकर आपका शोक हर लेंगे। मनुष्यों, असुरों या देवों में मैं किसी को नहीं देखता जो उनके बाण-वर्षण के आगे टिक सके; वे आपके लिए तो सूर्य, इन्द्र और यम तक को रण में सह लेंगे। आपके निमित्त श्रीराम की विजय निश्चित है।”
यह उचित, सत्य और सुभाषित वचन सुनकर जानकी ने उन्हें बहुत माना, और हनुमानजी को जाते देख स्नेहपूर्ण वचन कहे, “हे वीर! यदि आप ठीक समझें तो किसी सुरक्षित स्थान में एक दिन विश्राम कर, हे अरिन्दम, कल प्रस्थान करें। आपकी निकटता से मुझ अल्पभाग्या को क्षणभर इस महाशोक से छुटकारा मिलेगा। आपके लौट जाने पर यह विरह-शोक मुझे और जलाएगा; और तब तो आपके पुनः लौटने में भी सन्देह हुआ तो मेरे प्राणों का भी सन्देह है। यह बड़ा सन्देह मेरे सामने खड़ा रहता है; आपके सहायक वानर-भालू, या वे दोनों राजकुमार, इस दुस्तर महासमुद्र को कैसे पार करेंगे? इस लोक में समुद्र लाँघने की शक्ति तो केवल तीन प्राणियों में है; गरुड़, वायु और आप। हे कार्यविद्! इस दुरतिक्रम कार्य के लिए आप क्या समाधान देखते हैं?”
“वैसे यदि अकेले आप ही मुझे छुड़ा लाएँ तो भी समर्थ हैं, पर उसका यश आप ही को मिलेगा, श्रीराम को नहीं। यदि श्रीराम समूची सेना से रावण को रणभूमि में जीतकर, लंका को सेनाओं से आक्रान्त कर, मुझे लौटा ले जाएँ, तो वही उनके योग्य होगा। अतः आप ऐसा कीजिए कि वे आहव-शूर महात्मा अपने अनुरूप पराक्रम दिखाएँ।”
यह अर्थयुक्त, विनम्र और तर्कपूर्ण वचन सुनकर हनुमानजी ने अन्तिम उत्तर दिया, “देवि! हरि-भालुओं के स्वामी, सत्यसम्पन्न सुग्रीव आपके उद्धार का निश्चय कर चुके हैं। वे करोड़ों वानरों से घिरे शीघ्र आएँगे। उनकी आज्ञा में ऐसे वानर खड़े हैं; विक्रमशाली, सत्त्ववान्, महाबली, मन के संकल्प-सी गति वाले, जिनकी गति ऊपर-नीचे या तिरछे कहीं नहीं रुकती, जो बड़े कार्यों में भी हताश नहीं होते। उन्होंने समुद्र-पर्वत सहित पृथ्वी की एक से अधिक बार प्रदक्षिणा की है। उनमें मुझसे श्रेष्ठ और मेरे समान वानर हैं; सुग्रीव के पास मुझसे हीन कोई नहीं। जब मैं ही यहाँ आ गया, तो वे महाबली कितनी सहजता से आएँगे! श्रेष्ठ जन दूत बनाकर नहीं भेजे जाते, हीन ही भेजे जाते हैं।”
“अतः सन्ताप छोड़िए, देवि! आपका शोक मिटे। वे यूथपति एक ही छलाँग में लंका आ पहुँचेंगे। उदित होते सूर्य-चन्द्र-से वे दोनों नर-सिंह श्रीराम-लक्ष्मण मेरी पीठ पर बैठकर बड़े दल सहित आपके पास आएँगे, और बाणों से लंका को उड़ा देंगे। राक्षसराज को सपुत्र-अमात्य-बन्धु मारकर रघुनन्दन आपको लेकर अपनी पुरी लौटेंगे। तब तक धैर्य रखिए, काल की प्रतीक्षा कीजिए; शीघ्र ही आप प्रज्वलित अग्नि-से श्रीराम को देखेंगी। रावण के मारे जाने पर आप श्रीराम से वैसे ही मिलेंगी जैसे रोहिणी चन्द्र से। हे मैथिली! शीघ्र आप शोक का पार देखेंगी और रावण को बलपूर्वक श्रीराम के हाथों मारा हुआ देखेंगी।”
समझने की कुंजी , समुद्र-लंघन के तीन समर्थ: सीताजी का सूक्ष्म संशय है कि वानर-सेना और राजकुमार यह दुस्तर समुद्र कैसे पार करेंगे, क्योंकि लाँघने की शक्ति तो केवल गरुड़, वायु और हनुमानजी में है। हनुमानजी इसका उत्तर वानर-वीरों के असाधारण बल और संकल्प-गति से देते हैं; यही संवाद आगे सेतुबन्ध की भूमिका रचता है।
सार: मणि का मर्म बताकर सीताजी समुद्र-लंघन पर संशय रखती हैं; हनुमानजी वानर-वीरों के बल का आश्वासन देकर भरोसा दिलाते हैं कि श्रीराम स्वयं आकर रावण को मारेंगे और उन्हें ले जाएँगे।
सर्ग 40 , तिलक और काक के दो और स्मृति-चिह्न, और विदा
महात्मा वायुपुत्र का वचन सुनकर देव-कन्या-सी सीताजी ने अपने हित का वचन कहा, “हे वानर! आप-जैसे प्रियवक्ता को देखकर मैं वैसे ही हर्षित होती हूँ जैसे आधी पकी फसल वाली पृथ्वी वर्षा पाकर। आप ऐसा कीजिए कि शोक से क्षीण इन अंगों से मैं उस पुरुष-व्याघ्र श्रीराम का आलिंगन कर सकूँ; मुझ पर इतनी दया कीजिए।”
“और श्रीराम को मेरी ओर से एक और अभिज्ञान दीजिए; काक के रूप में आए इन्द्रपुत्र की एक आँख जिस सींक ने क्रोध से नष्ट की थी, उसकी याद दिलाइए। (कहिए) ‘जब मेरा (सीता का) पहले लगाया तिलक मिट गया था, तब आपने मेरे कपोल पर मनःशिला (एक प्रकार का गेरू) से तिलक लगाया था; उसे आप अवश्य स्मरण करें। हे महेन्द्र-वरुण-तुल्य! आप बलवान् होकर भी राक्षसों के बीच रहती हुई हरी गई सीता को कैसे सह रहे हैं? यह दिव्य चूड़ामणि मैंने भली-भाँति सुरक्षित रखा है; इसे देखकर मैं, हे निष्पाप, विपत्ति में भी आपको देखने-सी प्रसन्न होती रही। समुद्र-जल से उत्पन्न यह मणि मैं आपको भेजती हूँ। शोक में डूबी मैं एक मास से अधिक नहीं जी सकूँगी; हे शत्रुसूदन, एक मास और जीवन धारण करूँगी, उसके आगे आपके बिना नहीं जीऊँगी। यह राक्षसराज घोर है, मुझ पर इसकी दृष्टि भी सुखद नहीं; और आपके विलम्ब की बात सुनूँ तो क्षणभर भी न जी सकूँ।’”
यह करुण सजल सन्देश सुनकर महातेज हनुमानजी ने कहा, “मैं सत्य की शपथ खाता हूँ, देवि; आपके शोक से श्रीराम सब ओर से विमुख हैं, और श्रीराम के दुःख से लक्ष्मण भी सन्तप्त हैं। आप किसी प्रकार खोज ली गई हैं; अब शोक का समय नहीं। इसी मुहूर्त से अपने दुःखों का अन्त निकट देखिए। वे दोनों अनिन्द्य नर-व्याघ्र राजकुमार आपके दर्शन को उत्सुक होकर लंका को भस्म कर देंगे; रावण को सबन्धु संग्राम में मारकर राघव आपको अपनी पुरी ले जाएँगे। अब आप ऐसा कोई अभिज्ञान और दीजिए जिसे श्रीराम ही पहचानें और जो उन्हें प्रीति उपजाए।”
सीताजी बोलीं, “मणि रूपी श्रेष्ठ अभिज्ञान तो मैं दे ही चुकी। इसे ध्यान से देखकर, हे वीर हनुमान, आपका वचन श्रीराम के लिए श्रद्धेय हो जाएगा। श्रीराम के पास पहुँचकर मेरे शोक के इस तीव्र वेग और इन राक्षसियों की धमकियों की बात कहिए; आपका मार्ग शुभ हो, हे हरिप्रवीर!”
वह श्रेष्ठ मणि लेकर, देवी को सिर झुकाकर प्रणाम कर, श्रीमान् हनुमानजी जाने को तैयार हुए। महान् वेग वाले, उत्पात (छलाँग) के लिए उत्साहित, बढ़ते हुए उस यूथपति को देख आँसू भरे मुख से, दीन, गद्गद वाणी में जनकात्मजा ने कहा, “हनुमान! सिंह-से दोनों भाई श्रीराम-लक्ष्मण और सामन्तों सहित सुग्रीव, सबको मेरी कुशल कहिएगा, और ऐसा प्रयत्न कीजिएगा कि महाबाहु श्रीराम मुझे इस दुःख-समुद्र से पार उतारें।” राजकुमारी से अपना प्रयोजन जानकर, सीता-दर्शन का कार्य सिद्ध होने से परम हर्षित, कार्य का थोड़ा-सा शेष देखकर वह कपि अपने मन से उत्तर दिशा की ओर बढ़ चले।
समझने की कुंजी , तीन अभिज्ञान: सीताजी श्रीराम को तीन-स्तरीय पहचान देती हैं; (1) चूड़ामणि, जो वस्तु-प्रमाण है; (2) काक-प्रसंग, जो गुप्त घटना का प्रमाण है; और (3) मनःशिला से कपोल पर तिलक लगाने की स्मृति, जो दोनों के बीच के अति-निजी क्षण का प्रमाण है। तीनों मिलकर श्रीराम के मन में किसी सन्देह की गुंजाइश नहीं छोड़ते।
सार: सीताजी काक-प्रसंग और कपोल पर मनःशिला-तिलक के दो स्मृति-चिह्न और देती हैं, अपनी दशा श्रीराम तक पहुँचाने का आग्रह कर विदा देती हैं, और हनुमानजी कृतार्थ होकर उत्तर दिशा की ओर लौट चलते हैं।
मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, सुन्दरकाण्ड (गीता प्रेस गोरखपुर)।