विवेकचूडामणि
भाग 1 · दुर्लभ मानव-जन्म · श्लोक 1-13
सब प्राणियों में मनुष्य का जन्म सबसे दुर्लभ है, और जो इसे पा कर भी अपनी मुक्ति की ओर न मुड़े, शंकराचार्य उसे अपने ही असली हित का घातक कहते हैं। यह पहला भाग एक चेतावनी भी है और एक निमन्त्रण भी, और यहीं से समूचा प्रकरण आरम्भ होता है।
पहले एक बात
विवेकचूडामणि का अर्थ है “विवेक का शिरोमणि-रत्न”, और विवेक यानी नित्य और अनित्य में, सत् और असत् में, असली और नक़ली में भेद कर पाना। यह अद्वैत वेदान्त का एक सम्पूर्ण प्रकरण-ग्रन्थ है, लगभग 580 श्लोकों में, परम्परा से आदि शंकराचार्य की रचना मानी जाती है।

पूरा ग्रन्थ एक गुरु और एक शिष्य के बीच की बातचीत है। शिष्य मुक्ति की गहरी तड़प ले कर आता है, और गुरु उसे श्लोक-दर-श्लोक बन्धन से मुक्ति तक ले जाते हैं। वह संवाद कुछ श्लोक आगे आरम्भ होगा। यह पहला भाग उससे पहले की भूमि तैयार करता है, और बताता है कि यह सारी खोज क्यों आवश्यक है।
ग्रन्थ अपने पहले ही शब्द में एक गम्भीर रहस्य रख देता है। शंकराचार्य उन गोविन्द को प्रणाम करते हैं जो सारे वेदान्त के सिद्धान्तों का विषय हैं, फिर भी इन्द्रियों की पकड़ से सदा परे हैं। जिसकी चर्चा पूरा ग्रन्थ करेगा, वह आँख-कान का विषय नहीं। और ध्यान दीजिए, वे “गोविन्द” और “सद्गुरु” को एक ही श्वास में कहते हैं। उनके अपने गुरु का नाम भी गोविन्दपाद था। तो यह प्रणाम एक साथ भगवान को है और गुरु को, क्योंकि अद्वैत में, अन्ततः, वे दो नहीं।
1 · मंगलाचरण
सर्ववेदान्तसिद्धान्तगोचरं तमगोचरम् ।
गोविन्दं परमानन्दं सद्गुरुं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥1॥
अब शंकराचार्य एक सीढ़ी रचते हैं, जिसका हर पायदान पिछले से दुर्लभ है। सब प्राणियों में मनुष्य का जन्म दुर्लभ है; उससे भी दुर्लभ सामर्थ्य का होना, फिर ज्ञान की योग्यता, फिर वैदिक धर्म-मार्ग पर लगना, फिर विद्वत्ता; और इन सबके ऊपर तीन और पायदान, आत्मा और अनात्मा का विवेक, स्वयं का अनुभव, और ब्रह्म-रूप में ठहर जाना। और मुक्ति? वह तो सौ करोड़ जन्मों के पुण्य के बिना मिलती ही नहीं। यह सीढ़ी इसलिए दिखाई जाती है कि मनुष्य अपनी स्थिति पहचान ले। जिसके पास मनुष्य-जन्म है, समझने की क्षमता है, और इन वचनों की ओर मुड़ने की चाह है, वह अनेक पायदान पहले ही चढ़ चुका है। ऊपर के तीन ही शेष हैं। इतनी दूर आ कर रुक जाना, यही शंकराचार्य की चिन्ता है।
2 · दुर्लभता की सीढ़ी
जन्तूनां नरजन्म दुर्लभमतः पुंस्त्वं ततो विप्रता तस्माद्वैदिकधर्ममार्गपरता विद्वत्त्वमस्मात्परम् ।
आत्मानात्मविवेचनं स्वनुभवो ब्रह्मात्मना संस्थितिः मुक्तिर्नो शतजन्मकोटिसुकृतैः पुण्यैर्विना लभ्यते ॥2॥
उस लम्बी सीढ़ी को शंकराचार्य अब तीन में समेट देते हैं। ये तीन वस्तुएँ दुर्लभ हैं और ईश्वर की कृपा से ही मिलती हैं, मनुष्य होना, मुक्ति की तड़प, और किसी महापुरुष की शरण। इनमें बीच की वस्तु, मुक्ति की तड़प, सबसे सूक्ष्म है। मनुष्य-जन्म तो असंख्य प्राणियों को मिलता है, गुरु भी मिल सकता है, पर मुक्ति की सच्ची तड़प विरली है। अधिकांश मन बेहतर जीविका, बेहतर सम्बन्ध, थोड़ा और सुख चाहते हैं; पर “इस सम्पूर्ण आवागमन से ही छूटना है”, यह चाह कम ही जागती है। शंकराचार्य कहते हैं, जिसके भीतर यह तड़प उठ आई है, उसके लिए यह यूँ ही नहीं आई। यह कृपा है।
3 · तीन दुर्लभ वस्तुएँ
दुर्लभं त्रयमेवैतद्देवानुग्रहहेतुकम् ।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः ॥ 3 ॥
अब ग्रन्थ का सबसे तीक्ष्ण श्लोक आता है, और शंकराचार्य जान-बूझ कर एक कठोर शब्द चुनते हैं, आत्म-हा, आत्म-घाती। किसी प्रकार दुर्लभ मनुष्य-जन्म पा कर, उसमें भी सामर्थ्य और शास्त्र-दृष्टि पा कर, जो फिर भी अपनी मुक्ति के लिए नहीं जुटता, वह मन्द-बुद्धि अपने ही आप को मार डालता है। यह घात किसी हथियार से नहीं होता। यह असत् को पकड़े रहने से होता है, नक़ली को थामे रखना और असली को छोड़ देना। जो टिकता ही नहीं उसी में पूरा जीवन लगा देना, यही धीमी आत्म-हत्या है। शब्द कठोर हैं, पर वे करुणा से कहे गए हैं, उस वैद्य की भाँति जो रोग का नाम स्पष्ट बता देता है कि रोगी चेत जाए।
4 · आत्म-घात
लब्ध्वा कथंचिन्नरजन्म दुर्लभं तत्रापि पुंस्त्वं श्रुतिपारदर्शनम् ।
यस्त्वात्ममुक्तौ न यतेत मूढधीः स ह्यात्महा स्वं विनिहन्त्यसद्ग्रहात् ॥ 4 ॥
फिर एक सीधा प्रश्न आता है। इससे बढ़ कर मूर्ख और कौन होगा, जो दुर्लभ मनुष्य-देह और उसमें भी सामर्थ्य पा कर, अपने ही असली हित में प्रमाद कर बैठे? इस श्लोक की कुंजी “स्वार्थ” शब्द है। आज की भाषा में यह लालच जैसा सुनाई देता है, पर यहाँ इसका असली अर्थ है स्व-अर्थ, अपना सच्चा हित, अपना असली प्रयोजन। शंकराचार्य की चोट यह है कि मनुष्य सहस्र छोटी वस्तुओं में बड़ी चतुराई दिखाता है, धन में, जीविका में, हिसाब-किताब में; पर जो वस्तुतः उसका अपना है, उसी में प्रमादी रहता है। सबसे बड़ी चतुराई और सबसे बड़ी असावधानी, एक ही मनुष्य में साथ-साथ बसती हैं।
5 · सबसे बड़ा मूर्ख कौन
इतः को न्वस्ति मूढात्मा यस्तु स्वार्थे प्रमाद्यति ।
दुर्लभं मानुषं देहं प्राप्य तत्रापि पौरुषम् ॥ 5 ॥
अब शंकराचार्य धार्मिक जीवन की हर परिचित क्रिया गिनाते हैं। लोग शास्त्र पढ़ते रहें, देवताओं को यज्ञ चढ़ाएँ, कर्म करते रहें, देवताओं को भजते रहें, पर आत्मा की एकता के बोध के बिना मुक्ति नहीं मिलती, ब्रह्मा के सौ जीवन-कालों में भी नहीं। इसका कारण यह है कि ये सब “करना” हैं, और मुक्ति “जानना” है। मुक्ति कोई नई वस्तु अर्जित करना नहीं, यह तो एक पुराने भ्रम का मिटना है, इस भ्रम का कि “मैं ब्रह्म से अलग हूँ।” और भ्रम कितने भी कर्म से नहीं मिटता; वह केवल स्पष्ट दर्शन से मिटता है। इसीलिए कितना भी समय और कितना भी कर्म पर्याप्त नहीं।
6 · अकेले कर्म से मुक्ति नहीं
वदन्तु शास्त्राणि यजन्तु देवान् कुर्वन्तु कर्माणि भजन्तु देवताः ।
आत्मैक्यबोधेन विनापि मुक्तिः न सिध्यति ब्रह्मशतान्तरेऽपि ॥ 6 ॥
इसी बात पर शंकराचार्य अब श्रुति को ही साक्षी बना लेते हैं। बृहदारण्यक उपनिषद् में मैत्रेयी के संवाद की प्रसिद्ध पंक्ति है, धन से अमरता की कोई आशा नहीं। और इससे स्पष्ट है कि कर्म मुक्ति का कारण नहीं। शंकराचार्य इससे एक तार्किक पग आगे बढ़ते हैं। धन क्या है? कर्म का फल। यज्ञ, पूजा, सत्कर्म, इन सबका फल एक प्रकार का धन ही है, चाहे लौकिक हो या स्वर्ग का। और जब धन से अमरता नहीं, तो कर्म से भी मुक्ति नहीं, क्योंकि कर्म तो बस और धन उपजाता है। मुक्ति किसी और ही कोटि की वस्तु है।
7 · धन से अमरता नहीं
अमृतत्वस्य नाशास्ति वित्तेनेत्येव हि श्रुतिः ।
ब्रवीति कर्मणो मुक्तेरहेतुत्वं स्फुटं यतः ॥ 7 ॥
सात श्लोकों तक यह बताया गया कि किनसे मुक्ति नहीं होती, कर्म से, धन से, अकेली विद्वत्ता से। अब पहली बार शंकराचार्य बताते हैं कि करना क्या है, और इसके दो अंग हैं। विद्वान मुक्ति के लिए जुट जाए, बाहरी सुखों की चाह छोड़ कर, किसी सच्चे महान गुरु के पास जा कर, और उनके बताए अर्थ में मन को एकाग्र कर के। पहला अंग है बाहरी सुखों की चाह का त्याग, यह पहले आता है। दूसरा है गुरु की शरण, अकेले नहीं। यह अद्वैत का एक मर्म है, यह मार्ग केवल पुस्तकों से अकेले तय नहीं होता; इसके लिए एक जीवित गुरु चाहिए, जिसने स्वयं इसे जाना हो। आगे की पूरी विवेकचूडामणि यही दृश्य रचती है, एक गुरु, एक शिष्य, और बीच में बहता हुआ एक संवाद।
8 · इसलिए गुरु की शरण में
अतो विमुक्त्यै प्रयतेत्विद्वान् संन्यस्तबाह्यार्थसुखस्पृहः सन् ।
सन्तं महान्तं समुपेत्य देशिकं तेनोपदिष्टार्थसमाहितात्मा ॥ 8 ॥
पर गुरु की शरण के साथ शंकराचार्य एक सन्तुलन भी रख देते हैं। संसार के समुद्र में डूबे हुए अपने आप को, अपने ही प्रयत्न से उठाओ, सम्यक् दर्शन में टिक कर, योग में जमी हुई स्थिति पा कर। यही भाव गीता में भी आता है, और इसमें दोनों बातें साथ कही गई हैं। गुरु आवश्यक है, पर गुरु शिष्य के स्थान पर डूबे हुए को नहीं उठा सकता। गुरु मार्ग दिखाता है; चलना तो साधक को ही है। डूबा हुआ “मैं” और उठाने वाला “मैं”, दोनों एक ही आत्मा हैं।
9 · अपने आप को स्वयं उठाओ
उद्धरेदात्मनात्मानं मग्नं संसारवारिधौ ।
योगारूढत्वमासाद्य सम्यग्दर्शननिष्ठया ॥ 9 ॥
संसार के बन्धन से छूटने के लिए, सब कर्म छोड़ कर, विद्वान और धीर लोग आत्म-अभ्यास में लग कर प्रयत्न करें। “सब कर्म छोड़ कर” वचन कठोर प्रतीत हो सकता है, पर शंकराचार्य कर्म के विरोधी नहीं हैं; अगला श्लोक कर्म की एक आवश्यक भूमिका बताएगा। यहाँ संकेत कर्म से चिपके रहना छोड़ने का है, इस आशा को छोड़ना कि कर्म स्वयं ही मुक्ति दे देगा। “धीर” शब्द मनोहर है। धीर वह है जो डगमगाता नहीं, जिसमें ठहराव है। आत्म-अभ्यास के लिए शीघ्रता नहीं, स्थिरता चाहिए। यह जल्दबाज़ी का काम नहीं।
10 · कर्म से ऊपर उठ कर आत्म-अभ्यास में
संन्यस्य सर्वकर्माणि भवबन्धविमुक्तये ।
यत्यतां पण्डितैर्धीरैरात्माभ्यास उपस्थितैः ॥ 10 ॥
और अब वह श्लोक जो कर्म को उसका ठीक-ठीक स्थान दे देता है। कर्म चित्त की शुद्धि के लिए है, तत्त्व को पाने के लिए नहीं; तत्त्व का बोध विचार से होता है, करोड़ों कर्मों से रत्ती भर नहीं। कर्म का काम है एक मलिन दर्पण को पोंछना, और यह आवश्यक काम है, बिना स्वच्छ दर्पण के कुछ दिखेगा ही नहीं। पर पोंछना और देखना दो भिन्न क्रियाएँ हैं। दर्पण कितना भी पोंछो, उससे उसमें कुछ “आ” नहीं जाता; पोंछना केवल वह मल हटाता है जो पहले से वहाँ मौजूद बिम्ब को ढके था। उसी प्रकार कर्म चित्त को शुद्ध करता है, पर तत्त्व को बनाता नहीं। तत्त्व का बोध तो सीधी जाँच से होता है, “मैं वस्तुतः क्या हूँ”, इस प्रश्न में सच्चे मन से उतरने से। करोड़ों कर्म भी वह काम नहीं कर सकते जो एक ईमानदार विचार कर देता है।
11 · कर्म मन शुद्ध करता है, तत्त्व नहीं दिखाता
चित्तस्य शुद्धये कर्म न तु वस्तूपलब्धये ।
वस्तुसिद्धिर्विचारेण न किंचित्कर्मकोटिभिः ॥ 11 ॥
इस “विचार” को शंकराचार्य अब अद्वैत के सबसे प्रिय दृष्टान्त में ढाल देते हैं, रस्सी और साँप। सम्यक् विचार से ही रस्सी की असलियत का निश्चय होता है, और वही निश्चय भ्रम से उठे उस बड़े साँप के भय और दुःख को मिटा देता है। अँधेरे में एक रस्सी पड़ी है, और वह साँप दिखाई देती है। भय वास्तविक प्रतीत होता है, हृदय धड़कता है, पसीना आता है। उस भय को मिटाएगा क्या? न रस्सी की पूजा, न साँप से कोई युद्ध, क्योंकि साँप वहाँ है ही नहीं। केवल एक वस्तु इसे मिटाती है, प्रकाश, और उसमें यह स्पष्ट देख लेना कि “यह तो रस्सी है।” बस इतना। शंकराचार्य कहते हैं, हमारा सारा सांसारिक भय इसी रस्सी-साँप जैसा है, और उसका उपचार भी वही, कुछ करना नहीं, बस स्पष्ट देख लेना।
12 · रस्सी और साँप
सम्यग्विचारतः सिद्धा रज्जुतत्त्वावधारणा ।
भ्रान्तोदितमहासर्पभयदुःखविनाशिनी ॥ 12 ॥
और अब पहले भाग का समापन, जो श्लोक 11 की बात को पूरे बल से दोहराता है, पर अब उदाहरण गिना कर। किसी वस्तु के तत्त्व का निश्चय विचार से होता है, और हितैषी के वचन से, न तीर्थ-स्नान से, न दान से, न सौ प्राणायामों से। तीर्थ-स्नान, दान, प्राणायाम, ये सब उत्तम और पवित्र क्रियाएँ हैं, पर वे “निश्चय” नहीं दे सकतीं, क्योंकि ये सब “करना” हैं और निश्चय “समझना” है। एक गणित का प्रश्न कितना भी स्नान कर लेने, दान दे देने से हल नहीं होता; उसे समझना ही पड़ता है। उसी प्रकार “मैं कौन हूँ” का निश्चय भी केवल दो वस्तुओं से आता है, स्वयं का सच्चा विचार, और एक हितैषी गुरु का सम्यक् वचन। इन्हीं दो को ले कर ग्रन्थ आगे बढ़ता है।
13 · निश्चय कहाँ से आता है
अर्थस्य निश्चयो दृष्टो विचारेण हितोक्तितः ।
न स्नानेन न दानेन प्राणायमशतेन वा ॥ 13 ॥
आगे का सूत्र
अगला पन्ना: भाग 2 · साधन-चतुष्टय। उस विचार का अधिकारी कौन है? शंकराचार्य चार योग्यताएँ गिनाते हैं, विवेक, वैराग्य, छह भीतरी सम्पत्तियाँ (शमादि षट्क), और मुमुक्षुत्व। यही इस मार्ग पर चलने से पूर्व की तैयारी है।