भाग 1 · दुर्लभ मानव-जन्म

विवेकचूडामणि · Vivekachudamani

भाग 1 · दुर्लभ जन्म · श्लोक 1-13

शुरुआत एक झकझोर देने वाली बात से: इंसान का जन्म दुर्लभ है, और जो इसे पा कर भी अपनी मुक्ति के लिए कुछ न करे, वह अपना ही हत्यारा है। तीखा? शंकराचार्य यहीं से शुरू करते हैं।

13 श्लोक · पढ़ने का समय ~ 20 मिनट · पहले से कुछ ज़रूरी नहीं · आगे-पीछे: विवेकचूडामणि मुख्य पृष्ठ

पहले एक बात

विवेकचूडामणि का मतलब है “विवेक का शिरोमणि-रत्न”, और विवेक यानी असली और नक़ली में फ़र्क कर पाना। यह अद्वैत वेदान्त का एक पूरा manual है, लगभग 580 श्लोकों में, परम्परा से आदि शंकराचार्य की रचना मानी जाती है।

यह पूरी किताब एक बातचीत है, एक शिष्य, जो एक जलते हुए सवाल के साथ आता है, और एक गुरु, जो उसे श्लोक-दर-श्लोक बंधन से मुक्ति तक ले जाते हैं। पर वह बातचीत अभी कुछ श्लोक दूर है। यह पहला भाग एक तरह से किताब का “क्यों” है, यह सब पढ़ने की ज़रूरत ही क्या है?

और शंकराचार्य का जवाब नरम नहीं। वे सीधे आपका कॉलर पकड़ते हैं: इंसान का जन्म बहुत मुश्किल से मिला है; इसे यूँ ही गँवा देना अपने आप को मार डालना है। यह पहला भाग एक चेतावनी है, और एक न्योता।

इसे कैसे पढ़ें

क्रम से। यह भाग एक सीधी दलील है, हर श्लोक पिछले पर बनता है। असली खंभे: श्लोक 2 (दुर्लभ चीज़ों की सीढ़ी), 6 (अकेले कर्म से मुक्ति नहीं), 11 (कर्म मन साफ़ करता है, सच नहीं दिखाता)। हर श्लोक पर anchor है।

1 · मंगलाचरण

सर्ववेदान्तसिद्धान्तगोचरं तमगोचरम् ।
गोविन्दं परमानन्दं सद्गुरुं प्रणतोऽस्म्यहम् ॥1॥

sarva-vedānta-siddhānta-gocaraṁ tam agocaram · govindaṁ paramānandaṁ sad-guruṁ praṇato’smy aham

शब्दार्थ: सर्व-वेदान्त-सिद्धान्त-गोचरं · सब वेदान्त के सिद्धांतों का विषय · अगोचरम् · इन्द्रियों की पकड़ से परे · गोविन्दं · गोविंद · परमानन्दं · परम आनंद · सद्गुरुं · सच्चे गुरु को · प्रणतः अस्मि · मैं प्रणाम करता हूँ।

अर्थ: जो सारे वेदान्त के सिद्धांतों का विषय है, फिर भी इन्द्रियों की पकड़ से परे है, उन गोविंद को, जो परम आनंद-स्वरूप हैं और सच्चे गुरु हैं, मैं प्रणाम करता हूँ।

भावार्थ: किताब अपने पहले शब्द में एक सुंदर विरोधाभास रखती है: गोविंद “गोचर” हैं, सारा वेदान्त उन्हीं की ओर इशारा करता है, और साथ ही “अगोचर”, इन्द्रियों से कभी न पकड़े जा सकने वाले। यानी जिसकी बात पूरी किताब करेगी, वह आँख-कान से नहीं मिलेगा।

और एक बात गौर कीजिए, शंकराचार्य “गोविंद” और “सद्गुरु” को एक ही साँस में कहते हैं। उनके अपने गुरु का नाम भी गोविंदपाद था। तो यह प्रणाम एक साथ भगवान को है और गुरु को, क्योंकि अद्वैत में, आख़िर में, वे दो नहीं।

2 · दुर्लभ चीज़ों की सीढ़ी

जन्तूनां नरजन्म दुर्लभमतः पुंस्त्वं ततो विप्रता तस्माद्वैदिकधर्ममार्गपरता विद्वत्त्वमस्मात्परम् ।
आत्मानात्मविवेचनं स्वनुभवो ब्रह्मात्मना संस्थितिः मुक्तिर्नो शतजन्मकोटिसुकृतैः पुण्यैर्विना लभ्यते ॥2॥

jantūnāṁ nara-janma durlabham ataḥ puṁstvaṁ tato vipratā tasmād vaidika-dharma-mārga-paratā vidvattvam asmāt param · ātmānātma-vivecanaṁ svanubhavo brahmātmanā saṁsthitiḥ muktir no śata-janma-koṭi-sukṛtaiḥ puṇyair vinā labhyate

शब्दार्थ: जन्तूनां · सब प्राणियों में · नरजन्म दुर्लभम् · मनुष्य-जन्म दुर्लभ · पुंस्त्वं · सक्षम होना · विप्रता · ज्ञान-योग्यता · विद्वत्त्वम् · विद्वत्ता · आत्म-अनात्म-विवेचनं · आत्मा और अनात्मा का भेद · स्वनुभव · खुद का अनुभव · ब्रह्मात्मना संस्थितिः · ब्रह्म-रूप में ठहर जाना।

अर्थ: सब प्राणियों में मनुष्य का जन्म दुर्लभ है; उससे भी दुर्लभ सक्षम होना, फिर ज्ञान की योग्यता, फिर वैदिक धर्म-मार्ग पर लगना, फिर विद्वत्ता; और उससे भी आगे, आत्मा और अनात्मा का विवेक, खुद का अनुभव, और ब्रह्म-रूप में ठहर जाना। और मुक्ति? वह तो सौ करोड़ जन्मों के पुण्य के बिना मिलती ही नहीं।

भावार्थ: यह विवेकचूडामणि का सबसे मशहूर श्लोक है, और यह एक सीढ़ी है, हर पायदान पिछले से दुर्लभ। मनुष्य-जन्म, फिर क्षमता, फिर ज्ञान की चाह, फिर अभ्यास, फिर विद्वत्ता, और इन सबके ऊपर तीन और पायदान: विवेक, अनुभव, और ब्रह्म में ठहराव।

शंकराचार्य यह सीढ़ी क्यों दिखाते हैं? डराने को नहीं। एक एहसास जगाने को: आप इस सीढ़ी पर पहले से काफ़ी ऊपर खड़े हैं। मनुष्य-जन्म आपके पास है, पढ़ने-समझने की क्षमता है, और यह पढ़ने की चाह भी, यानी आप ज़्यादातर पायदान चढ़ चुके हैं। बस ऊपर के तीन बाक़ी हैं। इतनी दूर आ कर रुक जाना, यही उनकी असली चिंता है।

3 · तीन दुर्लभ चीज़ें

दुर्लभं त्रयमेवैतद्देवानुग्रहहेतुकम् ।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रयः ॥ 3 ॥

durlabhaṁ trayam evaitad deva-anugraha-hetukam · manuṣyatvaṁ mumukṣutvaṁ mahā-puruṣa-saṁśrayaḥ

शब्दार्थ: दुर्लभं त्रयम् · तीन दुर्लभ चीज़ें · देव-अनुग्रह-हेतुकम् · ईश्वर की कृपा से मिलने वाली · मनुष्यत्वं · मनुष्य होना · मुमुक्षुत्वं · मुक्ति की तड़प · महापुरुष-संश्रय · किसी महान आत्मा की शरण।

अर्थ: ये तीन चीज़ें दुर्लभ हैं, और ईश्वर की कृपा से ही मिलती हैं, मनुष्य होना, मुक्ति की तड़प, और किसी महापुरुष (सच्चे गुरु) की शरण।

भावार्थ: श्लोक 2 की लंबी सीढ़ी को शंकराचार्य यहाँ तीन में निचोड़ देते हैं। और बीच वाली चीज़ पर रुकिए, “मुमुक्षुत्व”, मुक्ति की तड़प।

यह सबसे बारीक है। मनुष्य-जन्म तो लाखों के पास है। गुरु भी मिल सकता है। पर मुक्ति की सच्ची तड़प? वह दुर्लभ है। ज़्यादातर लोग बेहतर नौकरी, बेहतर रिश्ता, थोड़ा और सुख चाहते हैं, पर “मुझे इस पूरे चक्कर से ही छूटना है,” यह चाह कम ही जागती है। और शंकराचार्य कहते हैं, अगर यह तड़प आपके भीतर है, तो जान लीजिए, यह यूँ ही नहीं आई। यह कृपा है।

4 · आत्म-हत्या

लब्ध्वा कथंचिन्नरजन्म दुर्लभं तत्रापि पुंस्त्वं श्रुतिपारदर्शनम् ।
यस्त्वात्ममुक्तौ न यतेत मूढधीः स ह्यात्महा स्वं विनिहन्त्यसद्ग्रहात् ॥ 4 ॥

labdhvā kathaṁcin nara-janma durlabhaṁ tatrāpi puṁstvaṁ śruti-pāra-darśanam · yas tv ātma-muktau na yateta mūḍha-dhīḥ sa hy ātma-hā svaṁ vinihanty asad-grahāt

शब्दार्थ: लब्ध्वा कथंचित् · किसी तरह पा कर · श्रुति-पार-दर्शनम् · शास्त्रों के पार देखने की क्षमता · आत्म-मुक्तौ न यतेत · अपनी मुक्ति के लिए न जुटे · मूढधीः · मंद-बुद्धि · आत्म-हा · आत्म-हत्यारा · असद्-ग्रहात् · असत् को पकड़ने से।

अर्थ: किसी तरह दुर्लभ मनुष्य-जन्म पा कर, उसमें भी क्षमता और शास्त्र-दृष्टि पा कर, जो फिर भी अपनी मुक्ति के लिए नहीं जुटता, वह मंद-बुद्धि आत्म-हत्यारा है; वह असत् को पकड़ कर अपने आप को ही मार डालता है।

भावार्थ: यह किताब का सबसे तीखा श्लोक है, और शंकराचार्य जान-बूझ कर यह शब्द चुनते हैं, “आत्म-हा”, आत्म-हत्यारा।

कैसी हत्या? कोई हथियार नहीं। बस “असद्-ग्रह”, नक़ली को पकड़े रखना, असली को छोड़ देना। जो टिकता नहीं उसी में पूरी ज़िंदगी लगा देना, और जो असली है उसकी ओर मुड़ना ही नहीं। शंकराचार्य कहते हैं, यह धीमी आत्म-हत्या है। कठोर शब्द, पर वे इसे प्यार से कह रहे हैं, एक डॉक्टर की तरह जो बीमारी का नाम साफ़ बता देता है ताकि मरीज़ हिले।

5 · सबसे बड़ा मूर्ख कौन

इतः को न्वस्ति मूढात्मा यस्तु स्वार्थे प्रमाद्यति ।
दुर्लभं मानुषं देहं प्राप्य तत्रापि पौरुषम् ॥ 5 ॥

itaḥ ko nv asti mūḍhātmā yas tu svārthe pramādyati · durlabhaṁ mānuṣaṁ dehaṁ prāpya tatrāpi pauruṣam

शब्दार्थ: इतः · इससे बढ़ कर · मूढात्मा · मूर्ख · स्वार्थे प्रमाद्यति · अपने ही असली हित में लापरवाह · पौरुषम् · क्षमता, सामर्थ्य।

अर्थ: इससे बढ़ कर मूर्ख कौन होंगे, जो दुर्लभ मनुष्य-देह और उसमें भी सामर्थ्य पा कर, अपने ही असली हित में लापरवाही कर बैठे?

भावार्थ: शंकराचार्य एक सीधा सवाल फेंकते हैं, और वह सवाल पाठक को घूरता है। शब्द “स्वार्थ” यहाँ चाबी है, आज की भाषा में “स्वार्थ” का मतलब लालच लगता है। पर यहाँ इसका असली अर्थ है: “स्व-अर्थ”, अपना सच्चा हित, अपना असली भला।

और शंकराचार्य की चोट यह है: हम हज़ार छोटी चीज़ों में बहुत होशियारी दिखाते हैं, पैसा, करियर, हिसाब-किताब। पर जो असल में अपना है, अपना सच्चा हित, उसी में लापरवाह। सबसे बड़ी होशियारी और सबसे बड़ी लापरवाही, एक ही इंसान में, साथ-साथ। ज़रा अपने आप से पूछिए, यह सवाल चुभता है क्या?

6 · अकेले कर्म से मुक्ति नहीं

वदन्तु शास्त्राणि यजन्तु देवान् कुर्वन्तु कर्माणि भजन्तु देवताः ।
आत्मैक्यबोधेन विनापि मुक्तिः न सिध्यति ब्रह्मशतान्तरेऽपि ॥ 6 ॥

vadantu śāstrāṇi yajantu devān kurvantu karmāṇi bhajantu devatāḥ · ātmaikya-bodhena vināpi muktiḥ na sidhyati brahma-śatāntare’pi

शब्दार्थ: वदन्तु शास्त्राणि · शास्त्र पढ़ते रहें · यजन्तु देवान् · देवताओं को यज्ञ चढ़ाएँ · कुर्वन्तु कर्माणि · कर्म करते रहें · आत्म-ऐक्य-बोध · आत्मा की एकता का बोध · ब्रह्म-शत-अन्तरे · ब्रह्मा के सौ जीवन-कालों में भी।

अर्थ: लोग शास्त्र पढ़ते रहें, देवताओं को यज्ञ चढ़ाएँ, कर्म करते रहें, देवताओं को भजते रहें, पर आत्मा की एकता के बोध के बिना मुक्ति नहीं मिलती, ब्रह्मा के सौ जीवन-कालों में भी नहीं।

भावार्थ: यह श्लोक हिम्मत वाला है। शंकराचार्य गिनाते हैं, शास्त्र-पाठ, यज्ञ, कर्मकांड, देव-पूजा, यानी धार्मिक ज़िंदगी की हर पहचानी हुई चीज़। और कहते हैं: ये सब करते रहो, पर अकेले इनसे मुक्ति नहीं।

क्यों? क्योंकि ये सब “करना” हैं, और मुक्ति “जानना” है। एक चीज़ करने से दूसरी चीज़ आ जाएगी, ऐसा नहीं। मुक्ति एक नई चीज़ हासिल करना नहीं है; यह एक पुरानी ग़लतफ़हमी का मिटना है, कि “मैं अलग हूँ।” और ग़लतफ़हमी कितना भी कर्म करने से नहीं मिटती; वह सिर्फ़ साफ़ देख लेने से मिटती है। इसीलिए “ब्रह्मा के सौ जीवन-काल”, यानी कितना भी समय, कितना भी कर्म, काफ़ी नहीं।

7 · “धन से अमरता नहीं”

अमृतत्वस्य नाशास्ति वित्तेनेत्येव हि श्रुतिः ।
ब्रवीति कर्मणो मुक्तेरहेतुत्वं स्फुटं यतः ॥ 7 ॥

amṛtatvasya nāśāsti vittenety eva hi śrutiḥ · bravīti karmaṇo mukter ahetutvaṁ sphuṭaṁ yataḥ

शब्दार्थ: अमृतत्वस्य · अमरता की · न आशा अस्ति · कोई उम्मीद नहीं · वित्तेन · धन से · श्रुतिः · वेद-वचन · कर्मणः मुक्तेः अहेतुत्वं · कर्म का मुक्ति का कारण न होना · स्फुटं · साफ़।

अर्थ: “धन से अमरता की कोई उम्मीद नहीं”, यह वेद का ही वचन है। और इससे साफ़ है कि कर्म मुक्ति का कारण नहीं।

भावार्थ: शंकराचार्य यहाँ शास्त्र को ही गवाह बनाते हैं। उपनिषद् की एक प्रसिद्ध पंक्ति है, “अमृतत्वस्य न आशा अस्ति वित्तेन”, धन से अमरता नहीं ख़रीदी जा सकती।

और शंकराचार्य इससे एक तार्किक कदम आगे जाते हैं: धन क्या है? कर्म का फल। यज्ञ, पूजा, अच्छे काम, इन सबका फल एक तरह का “धन” ही है, चाहे सांसारिक हो या स्वर्ग का। और अगर धन से अमरता नहीं, तो कर्म से भी मुक्ति नहीं। क्योंकि कर्म तो बस और धन कमाता है। मुक्ति किसी और ही जाति की चीज़ है, और इसी किताब का बाक़ी हिस्सा बताएगा वह क्या है।

8 · इसलिए, गुरु के पास जाओ

अतो विमुक्त्यै प्रयतेत्विद्वान् संन्यस्तबाह्यार्थसुखस्पृहः सन् ।
सन्तं महान्तं समुपेत्य देशिकं तेनोपदिष्टार्थसमाहितात्मा ॥ 8 ॥

ato vimuktyai prayatet vidvān saṁnyasta-bāhyārtha-sukha-spṛhaḥ san · santaṁ mahāntaṁ samupetya deśikaṁ tenopadiṣṭārtha-samāhitātmā

शब्दार्थ: विमुक्त्यै प्रयतेत् · मुक्ति के लिए जुटे · संन्यस्त-बाह्यार्थ-सुख-स्पृहः · बाहरी सुखों की चाह छोड़ कर · देशिकं · गुरु को · समुपेत्य · पास जा कर · उपदिष्ट-अर्थ-समाहित-आत्मा · गुरु के बताए अर्थ में मन लगाए हुए।

अर्थ: इसलिए विद्वान मुक्ति के लिए जुट जाए, बाहरी सुखों की चाह छोड़ कर, किसी सच्चे, महान गुरु के पास जा कर, और उनके बताए अर्थ में मन को एकाग्र कर के।

भावार्थ: सात श्लोकों तक शंकराचार्य ने बताया कि क्या काम नहीं करता, कर्म नहीं। धन नहीं। अकेली विद्वत्ता नहीं। आठवें में पहली बार वे बताते हैं कि क्या करना है, और यह दो हिस्सों में है।

एक, “बाहरी सुखों की चाह छोड़ कर।” त्याग पहले। दो, गुरु के पास जाना। अकेले नहीं। यह अद्वैत का एक ज़रूरी बिंदु है: यह रास्ता किताबों से अकेले तय नहीं होता; इसके लिए एक जीवित गुरु चाहिए, जिसने ख़ुद यह जाना हो। पूरी विवेकचूडामणि आगे यही दिखाएगी, एक गुरु, एक शिष्य, और बीच में बहती हुई एक बातचीत।

9 · अपने आप को ख़ुद उठाओ

उद्धरेदात्मनात्मानं मग्नं संसारवारिधौ ।
योगारूढत्वमासाद्य सम्यग्दर्शननिष्ठया ॥ 9 ॥

uddhared ātmanātmānaṁ magnaṁ saṁsāra-vāridhau · yogārūḍhatvam āsādya samyag-darśana-niṣṭhayā

शब्दार्थ: उद्धरेत् आत्मना आत्मानं · अपने आप से अपने आप को उठाए · मग्नं · डूबे हुए · संसार-वारिधौ · संसार के समुद्र में · योग-आरूढत्वम् · योग में जमी हुई स्थिति · सम्यग्-दर्शन-निष्ठया · सही दृष्टि में टिके रह कर।

अर्थ: संसार के समुद्र में डूबे हुए अपने आप को, अपने ही प्रयास से उठाए, सही दृष्टि में टिक कर, योग में जमी हुई स्थिति पा कर।

भावार्थ: श्लोक 8 ने गुरु के पास भेजा था; श्लोक 9 एक संतुलन रखता है, “उद्धरेत् आत्मना आत्मानम्”, अपने आप से अपने आप को उठाओ।

यह गीता (6.5) की भी पंक्ति है, और यह दोनों बातें एक साथ कहती है: गुरु चाहिए, पर गुरु आपकी जगह डूबे हुए को नहीं उठा सकता। गुरु रास्ता दिखाता है; चलना आपको है। एक तैराकी-कोच की तरह, वह सिखा सकता है, पर पानी में हाथ-पैर आपको ही मारने हैं। डूबा हुआ “मैं” और उठाने वाला “मैं”, दोनों आप ही हैं।

10 · कर्म छोड़ कर, आत्म-अभ्यास में

संन्यस्य सर्वकर्माणि भवबन्धविमुक्तये ।
यत्यतां पण्डितैर्धीरैरात्माभ्यास उपस्थितैः ॥ 10 ॥

saṁnyasya sarva-karmāṇi bhava-bandha-vimuktaye · yatyatāṁ paṇḍitair dhīrair ātmābhyāsa upasthitaiḥ

शब्दार्थ: संन्यस्य सर्व-कर्माणि · सब कर्म छोड़ कर · भव-बन्ध-विमुक्तये · संसार-बंधन से छूटने के लिए · यत्यतां · प्रयत्न करें · पण्डितैः धीरैः · विद्वान और धीर लोग · आत्म-अभ्यासे उपस्थितैः · आत्म-अभ्यास में लगे हुए।

अर्थ: संसार के बंधन से छूटने के लिए, सब कर्म छोड़ कर, विद्वान और धीर लोग आत्म-अभ्यास में लग कर प्रयत्न करें।

भावार्थ: “सब कर्म छोड़ कर”, यह कठोर लग सकता है। पर इसे ध्यान से समझिए। शंकराचार्य कर्म के विरोधी नहीं हैं; श्लोक 11 अभी कर्म की एक ज़रूरी भूमिका बताएगा। यहाँ बात “कर्म से चिपकना” छोड़ने की है, इस उम्मीद को छोड़ना कि कर्म ख़ुद मुक्ति दे देगा।

और शब्द “धीर” प्यारा है, धीर यानी जो डगमगाता नहीं। जिसमें ठहराव है। आत्म-अभ्यास के लिए तेज़ी नहीं। ठहराव चाहिए। यह जल्दबाज़ी का काम नहीं।

11 · कर्म मन साफ़ करता है, सच नहीं दिखाता

चित्तस्य शुद्धये कर्म न तु वस्तूपलब्धये ।
वस्तुसिद्धिर्विचारेण न किंचित्कर्मकोटिभिः ॥ 11 ॥

cittasya śuddhaye karma na tu vastūpalabdhaye · vastu-siddhir vicāreṇa na kiṁcit karma-koṭibhiḥ

शब्दार्थ: चित्तस्य शुद्धये · मन की सफ़ाई के लिए · कर्म · काम · वस्तु-उपलब्धये · असली चीज़ को पाने के लिए (नहीं) · वस्तु-सिद्धिः · असली चीज़ का बोध · विचारेण · विचार/जाँच से · कर्म-कोटिभिः · करोड़ों कर्मों से।

अर्थ: कर्म मन की सफ़ाई के लिए है, असली चीज़ को पाने के लिए नहीं। असली चीज़ का बोध विचार से होता है, करोड़ों कर्मों से रत्ती भर नहीं।

भावार्थ: यह पूरे भाग का सबसे ज़रूरी श्लोक है, और यह कर्म को उसकी ठीक-ठीक जगह दे देता है। कर्म का काम है मन को साफ़ करना। एक गंदे शीशे को पोंछना। यह ज़रूरी काम है, बिना साफ़ शीशे के कुछ दिखेगा ही नहीं।

पर, और यहीं मोड़ है, पोंछना और देखना दो अलग काम हैं। शीशा कितना भी पोंछो, उससे शीशे में कुछ “आ” नहीं जाता; पोंछना सिर्फ़ वह हटाता है जो पहले से वहाँ मौजूद चीज़ को ढके था। उसी तरह: कर्म मन साफ़ करता है, पर सच नहीं “बनाता।” सच का बोध तो “विचार” से होता है, सीधी जाँच से, “मैं असल में क्या हूँ” इस सवाल में सच्चे मन से उतरने से। करोड़ों कर्म भी वह काम नहीं कर सकते जो एक ईमानदार विचार कर देता है।

12 · रस्सी और साँप

सम्यग्विचारतः सिद्धा रज्जुतत्त्वावधारणा ।
भ्रान्तोदितमहासर्पभयदुःखविनाशिनी ॥ 12 ॥

samyag-vicārataḥ siddhā rajju-tattvāvadhāraṇā · bhrāntodita-mahā-sarpa-bhaya-duḥkha-vināśinī

शब्दार्थ: सम्यग्-विचारतः · सही जाँच से · रज्जु-तत्त्व-अवधारणा · रस्सी की असलियत का निश्चय · भ्रान्त-उदित · भ्रम से उठा हुआ · महा-सर्प · बड़ा साँप · भय-दुःख-विनाशिनी · डर और दुख को मिटाने वाली।

अर्थ: सही जाँच से ही रस्सी की असलियत का निश्चय होता है, और वही निश्चय भ्रम से उठे उस बड़े साँप के डर और दुख को मिटा देता है।

भावार्थ: अद्वैत की सबसे प्यारी, सबसे जानी-पहचानी तस्वीर, रस्सी और साँप। अँधेरे में एक रस्सी पड़ी है, और वह साँप दिखती है। डर असली लगता है, दिल धड़कता है, पसीना आता है।

अब उस डर को मिटाएगा क्या? रस्सी की पूजा नहीं। साँप के ख़िलाफ़ लड़ाई नहीं (वहाँ साँप है ही नहीं)। सिर्फ़ एक चीज़, रोशनी, और साफ़ देख लेना: “यह तो रस्सी है।” बस। साँप कभी था ही नहीं; वह सिर्फ़ एक ग़लत समझ थी। शंकराचार्य कहते हैं, हमारा सारा संसारी डर इसी रस्सी-साँप जैसा है। और उसका इलाज भी वही, कुछ करना नहीं। साफ़ देख लेना। श्लोक 11 का “विचार” यहाँ एक तस्वीर बन गया।

13 · निश्चय कहाँ से आता है

अर्थस्य निश्चयो दृष्टो विचारेण हितोक्तितः ।
न स्नानेन न दानेन प्राणायमशतेन वा ॥ 13 ॥

arthasya niścayo dṛṣṭo vicāreṇa hitoktitaḥ · na snānena na dānena prāṇāyama-śatena vā

शब्दार्थ: अर्थस्य निश्चयः · चीज़ की असलियत का निश्चय · दृष्टः · देखा गया है · विचारेण · विचार से · हित-उक्तितः · हितैषी की सलाह से · न स्नानेन · न तीर्थ-स्नान से · न दानेन · न दान से · प्राणायम-शतेन · सौ प्राणायामों से।

अर्थ: किसी चीज़ की असलियत का निश्चय विचार से होता है, और हितैषी की सलाह से, न तीर्थ-स्नान से, न दान से, न सौ प्राणायामों से।

भावार्थ: यह पहले भाग का समापन है, और यह श्लोक 11 की बात को पूरे ज़ोर से दोहरा देता है, पर अब उदाहरण गिना कर। तीर्थ-स्नान, दान, प्राणायाम, ये सब अच्छी, पवित्र चीज़ें हैं। पर वे “निश्चय” नहीं दे सकतीं।

क्यों? क्योंकि वे “करना” हैं, और निश्चय “समझना” है। एक गणित का सवाल आपको कितना भी नहा कर, दान कर के नहीं हल होंगे, उसे समझना ही पड़ेगा। उसी तरह “मैं कौन हूँ” का निश्चय भी सिर्फ़ दो चीज़ों से आता है: ख़ुद का सच्चा विचार, और एक हितैषी (गुरु) की सही सलाह। और देखिए, किताब इन्हीं दो को ले कर आगे बढ़ती है। अगला भाग बताएगा: वह विचार करने का हक़दार कौन है, और वह हितैषी गुरु कैसा हो। धागा वहीं से आगे।

पढ़ कर आगे क्या

सीधा अगला पन्ना: भाग 2 · साधन-चतुष्टय, वह विचार करने का हक़दार कौन है? शंकराचार्य चार योग्यताएँ गिनाते हैं, विवेक, वैराग्य, छह भीतरी सम्पत्तियाँ, और मुमुक्षुत्व। यानी इस रास्ते पर चलने से पहले की तैयारी।

और एक सवाल जेब में रखिए: श्लोक 11 कहता है कर्म मन साफ़ करता है, सच नहीं दिखाता। आज के अपने कामों में देखिए, कौनसा काम “शीशा पोंछना” है, और आप कहाँ शीशा पोंछते-पोंछते यह भूल बैठे कि असली काम तो देखना है?

मूल पाठ: विवेकचूडामणि, परम्परा से आदि शंकराचार्य को मान्य (कुछ आधुनिक विद्वान रचयिता पर बहस करते हैं; परम्परा इसे सदा शंकराचार्य का मानती आई है)। देवनागरी पाठ shlokam.org के मानक 580-श्लोक संस्करण से, verbatim।

स्थायी URL: /vivekachudamani/durlabh-janam/

आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-22