चिंतन

काम और उसका फल

चिंतन · गीता के साथ एक विराम

काम पूरा हो जाता है, पर मन परिणाम के दरवाज़े पर बैठा रहता है। गीता के दो श्लोकों के पास बैठिए; शायद वे काम छोड़ने के बजाय उसे अधिक ध्यान से देखने की जगह दें।

मान लीजिए आपने किसी के लिए मन लगाकर भोजन बनाया। नमक चखा, रोटी ढकी, थाली सलीके से लगाई। अब सामने वाला पहला कौर उठाता है, और आपकी नज़र उसके चेहरे पर टिक जाती है। उसे स्वाद आया या नहीं? उसने कुछ कहा क्यों नहीं? काम अपने स्थान पर पूरा है, लेकिन मन अब भी उसी का हिसाब माँग रहा है। ऐसी छोटी-सी घड़ी में भी काम और उसके फल का अंतर दिखाई दे सकता है।

यह घर का उदाहरण है, गीता का प्रसंग नहीं। गीता में अर्जुन युद्धभूमि में खड़े हैं; उनके प्रश्न के दाँव कहीं अधिक कठिन हैं। अपने दिन की बात उस पाठ के पास रखते हुए इतना फ़ासला याद रखना ज़रूरी है। समानता हमें पढ़ने का रास्ता दे सकती है, पर दोनों परिस्थितियों को एक कर देने का अधिकार नहीं।

पूरा वाक्य सुनिए

दूसरे अध्याय के सैंतालीसवें श्लोक में कर्म और फल का संबंध सामने आता है। उसी श्लोक का अंतिम हिस्सा अकर्म में आसक्ति से भी बचाता है। इसलिए उसके आधे वाक्य को लेकर काम से हाथ खींच लेना पूरे पाठ को सुनना नहीं होगा। अगले श्लोक में कर्म करते हुए सिद्धि और असिद्धि में समभाव की बात आती है; उस समत्व को योग कहा गया है।

दोनों श्लोक साथ पढ़िए। फल को अपनी इच्छा का पक्का अनुबंध मान लेने और काम की ज़िम्मेदारी निभाने के बीच कुछ जगह खुलती है। उस जगह में क्या किया जा सकता है, यह इस चिंतन का प्रश्न है। यहाँ दिया गया घर का उदाहरण या आगे का अभ्यास कृष्ण के मूल वचनों का अनुवाद नहीं है।

भोजन वाले प्रसंग पर लौटें तो यह जगह शायद इतनी साधारण हो: सामने वाला कहे कि नमक अधिक है, तो अगली बार ध्यान रखें। उसकी प्रतिक्रिया से कुछ सीखें। लेकिन उसी एक प्रतिक्रिया से यह फैसला न कर बैठें कि सारा स्नेह व्यर्थ गया। काम की कमी पहचानी जा सकती है; हर कमी को अपने पूरे व्यक्ति का मूल्यांकन बनाना आवश्यक नहीं।

फल पर ध्यान, फल की ज़िद

किसी काम के असर पर ध्यान देना उपयोगी है। चिट्ठी अस्पष्ट रही तो साफ़ लिखी जा सकती है, मेज़ डगमगाती है तो उसका पाया ठीक किया जा सकता है। अपने काम की जाँच करते समय परिणाम से आँख फेर लेने का सुझाव यहाँ नहीं दिया जा रहा। प्रश्न उस ज़िद का है जिसमें हम पहले ही तय कर लेते हैं कि दुनिया को हमारे प्रयत्न का उत्तर किस ढंग से देना चाहिए।

कभी वह ज़िद प्रशंसा माँगती है, कभी तुरंत सफलता, कभी इतना भर कि हमारी नीयत को बिना समझाए समझ लिया जाए। नीयत अपनी जगह है; दूसरे तक पहुँचा हुआ काम अपनी जगह जाँच माँग सकता है। दोनों को धैर्य से देखने में क्या बदलता है? शायद बातचीत में सफ़ाई कम देनी पड़े और सुनने की जगह कुछ बढ़े। यह एक संभावना है, कोई सुनिश्चित फल नहीं।

आज के एक काम के साथ

आज का कोई छोटा और स्पष्ट काम चुनिए। उसके लिए दो बातें लिख लीजिए: मैं किस हिस्से की ज़िम्मेदारी ले सकता हूँ, और कौन-सा परिणाम मेरे अकेले तय करने से नहीं आएगा। पहली बात में तैयारी, ईमानदारी और आवश्यक सुधार रख सकते हैं। दूसरी में दूसरे व्यक्ति का उत्तर, उसका समय या उसकी पसंद आ सकती है। अपनी स्थिति के अनुसार शब्द बदलिए।

काम हो जाए तो पहली पंक्ति फिर पढ़िए। जो छूटा, उसे पहचानिए; जहाँ सुधार संभव है, कीजिए। दूसरी पंक्ति पढ़ते समय देखें कि कहीं आपने चुपके से उसकी सारी शर्तें भी अपनी मुट्ठी में तो नहीं मान लीं। किसी बड़े निर्णय को इसी छोटे अभ्यास से हल करने की जल्दी न कीजिए। अभी केवल अपने दिन का एक कोना साफ़ देखना है।

फिर गीता के दोनों श्लोकों पर लौटिए। पहली बार कौन-सा शब्द सुनाई दिया था, और अब किस पर नज़र ठहरती है? पाठ के साथ यह लौटना भी पढ़ने का हिस्सा है। रोटी सेंकते समय आँच देखनी होती है; खाने वाले का मन अपनी अलग दुनिया लेकर आता है। दोनों की ख़बर रखते हुए भी हाथ से काम हो सकता है।

गीता का दूसरा अध्याय पढ़िए · पाठ, अनुवाद और चिंतन का अंतर समझिए

आधार और इस चिंतन की सीमा

आधार-संस्करण: इस पुस्तकालय में प्रयुक्त गीताप्रेस महाभारत में भगवद्गीता 2.47–48। तुलना: बीबीटी का स्वतंत्र संस्कृत पाठ और अनुवाद, 2.47 तथा 2.48। दोनों में कर्म, फल और अकर्म का अंतर तथा सिद्धि-असिद्धि में समत्व का निर्देश मिलता है। अलग भाष्यों की पूरी दार्शनिक व्याख्या को एक नहीं माना गया है।

इस प्रस्तुति का दायरा: दो श्लोकों से आरम्भ हुआ मौलिक चिंतन। भोजन, चिट्ठी और लिखने का छोटा अभ्यास पाठकीय उदाहरण हैं; मूल शास्त्र के उद्धरण नहीं। यह अध्याय का पूरा अनुवाद नहीं है।

यह चिंतन अभी हिन्दी में उपलब्ध है। इसी लेख का अंग्रेज़ी संस्करण अभी नहीं है; read the Gita passage in English.

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