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प्रह्लाद की प्रार्थना

कथा 45 · भागवतम् की कथाएँ

प्रह्लाद की प्रार्थना

वह बालक जिसने भगवान् का क्रोध शान्त किया
स्कन्ध 7, अध्याय 9

हिरण्यकशिपु मारा जा चुका था। उसका विशाल शरीर सभा-भवन की सीढ़ियों पर पड़ा था, और नृसिंह की गोद में जो आँतें उन्होंने माला की तरह गले में डाल रखी थीं, उनसे अब भी लहू की लकीर फ़र्श पर उतर रही थी।

पर जिसके लिए यह वध हुआ था, वह शत्रु तो मर चुका था; क्रोध नहीं मरा।

स्तंभ के सामने खड़े प्रह्लाद हाथ जोड़े भगवान् से अपने हृदय की गहरी प्रार्थना कर रहे थे।
स्तंभ के सामने खड़े प्रह्लाद हाथ जोड़े भगवान् से अपने हृदय की गहरी प्रार्थना कर रहे थे।

नृसिंह अब भी गरज रहे थे। उनकी जीभ बिजली की तरह लपलपा रही थी, भौंहें ऐसी चढ़ी थीं जैसे दो पर्वत आपस में टकरा गए हों, और उनकी अयाल के बाल खून से लथपथ होकर बल्लों की तरह सीधे खड़े थे। हर साँस के साथ एक सिंहनाद उठता, जो दिग्गजों को भी काँपा देता, और सभा-भवन की दीवारों से टकराकर लौट आता।

आकाश में ब्रह्मा, रुद्र आदि देवता ठिठके खड़े थे। यह रूप उनके लिए दर्शन और श्रुति, दोनों में अभूतपूर्व था। सबके पैर थमे थे और उस क्रोध का ओर-छोर किसी को दिखाई नहीं देता था।

ब्रह्मा आगे बढ़े। सृष्टि के रचयिता थे, सोचा होगा कि अपने ही बनाए विधान की भाषा में बात करेंगे तो यह आग बैठ जाएगी। पर नृसिंह की उन जलती आँखों के सामने उनकी अपनी भाषा गले में ही रह गई।

रुद्र आए। प्रलय के स्वामी, स्वयं संहार जिनका स्वभाव है। पर इस संहार के आगे वे भी मौन रह गए।

ब्रह्मा और रुद्र भी नृसिंह के क्रोध के आगे मौन रह गए, लक्ष्मी भी भय से अपने प्रियतम के पास एक डग न बढ़ा सकीं।
ब्रह्मा और रुद्र भी नृसिंह के क्रोध के आगे मौन रह गए, लक्ष्मी भी भय से अपने प्रियतम के पास एक डग न बढ़ा सकीं।

तब देवताओं ने लक्ष्मी से प्रार्थना की। यह तो उन्हीं के स्वामी का अवतार था; पत्नी के सिवा इस आग को और कौन छू सकता था। लक्ष्मी आगे बढ़ीं। पर जैसे ही उन्होंने वह महान् अद्भुत रूप देखा, वे भी भयवश पास तक न जा सकीं। जिस मुख को वे युगों से जानती थीं, उस मुख का ऐसा रूप उनके लिए दर्शन और श्रुति, दोनों में अभूतपूर्व था। अपने ही प्रियतम के पास, भय के मारे, वे एक डग भी न बढ़ा सकीं।

श्री ही जब लौट आईं, तो और किसकी बिसात।

तब ब्रह्मा की दृष्टि अपने ही पास खड़े उस बालक पर पड़ी, जो इस सारे शोर के बीच चुपचाप खड़ा था। हिरण्यकशिपु का पुत्र। प्रह्लाद।

ब्रह्मा उसके पास झुके। “बेटा, आपके पिता पर भगवान् कुपित हुए थे। अब आप ही उनके पास जाकर उन्हें शान्त कीजिए।”

विचित्र बात थी। जिसका पिता अभी-अभी उन्हीं चरणों में मारा गया था, उसी से कहा जा रहा था कि जा, उन्हें मना ले। और बालक ने आँख तक न झपकाई। केवल इतना कहा, “जो आज्ञा,” जैसे यही उसके जीवन का एकमात्र वाक्य हो।

उसके चेहरे पर भय की एक रेखा तक न थी। जिस बालक के मन में कभी भय बसा ही नहीं था, उसके भीतर अब वह कहाँ से आता।

वह अपने छोटे-से शरीर को लिए, नंगे पाँव, उस गरजती हुई ज्वाला की ओर बढ़ चला। उसके पीछे देवता हाथ जोड़े खड़े रह गए, और उन सबकी साँस जैसे एक साथ रुक गई।

नृसिंह के चरणों में साष्टांग लेटे नन्हे प्रह्लाद को देखकर भगवान् का हृदय करुणा से भर आया।
नृसिंह के चरणों में साष्टांग लेटे नन्हे प्रह्लाद को देखकर भगवान् का हृदय करुणा से भर आया।

नृसिंह ने मुड़कर नहीं देखा। बालक रुका नहीं। वह सीधा उन चरणों तक गया, और वहीं पृथ्वी पर साष्टांग लोट गया, दोनों हाथ जोड़े, सिर भगवान् के पैरों के मूल में रखे।

एक नन्हा-सा शरीर, उस उठती हुई आग के ठीक नीचे, धरती से चिपका हुआ।

नृसिंह ने नीचे देखा।

उन धधकती आँखों ने उस छोटे-से देह को देखा जो उनके ही चरणों में पड़ा था, और भगवान् का हृदय दया से भर आया।

प्रह्लाद नृसिंह के चरणों में साष्टांग गिर पड़े, धधकती आँखों वाले भगवान् का हृदय बालक को देख दया से भर आया।
प्रह्लाद नृसिंह के चरणों में साष्टांग गिर पड़े, धधकती आँखों वाले भगवान् का हृदय बालक को देख दया से भर आया।

उन्होंने अपनी विशाल भुजाएँ नीचे कीं, उस नन्हे शरीर को धरती से उठाया, और अपना वह करकमल, वही पंजा जिसने अभी-अभी एक असुर का सीना चीरा था, बालक के सिर पर रख दिया। वही हाथ जो काल-सर्प से भयभीत प्राणियों को अभय देता है।

उस करकमल के स्पर्श के साथ ही प्रह्लाद के भीतर जो थोड़े-बहुत बचे-खुचे अशुभ संस्कार थे, वे झड़ गए। उसी क्षण उसे उस परमतत्त्व का साक्षात्कार हो गया।

बालक का सारा शरीर पुलकित हो उठा। उसने बड़े प्रेम और आनन्द में मग्न होकर भगवान् के चरणकमलों को अपने हृदय में धारण किया। हृदय में प्रेम की धारा बहने लगी, और आँखों से आनन्द के आँसू झरने लगे। वह कुछ देर बोल ही न सका। बस उस मुख की ओर देखता रहा, अपलक, निर्निमेष, जैसे पलक झपकाने में भी यह दर्शन कहीं खो न जाए। फिर भावसमाधि से एकाग्र होकर, मन को समेटकर, उसने प्रेम से गद्गद वाणी में अपनी स्तुति आरम्भ की।

“ब्रह्मा से लेकर बड़े-बड़े देवता, ऋषि और सिद्ध तक, जिनकी बुद्धि सदा सत्त्वगुण में टिकी रहती है, वे भी अपनी इस बहती हुई स्तुति की धारा से, अपने इतने सारे गुणों से, आपको आज तक प्रसन्न न कर सके। फिर मैं, जो इस घोर असुर-जाति में उत्पन्न हुआ हूँ, भला आपको कैसे रिझाऊँगा।”

उसकी आवाज़ बीच-बीच में टूटती, फिर सँभलती। “मैं जानता हूँ, प्रभु। धन, कुलीनता, रूप, तप, विद्या, ओज, तेज, प्रभाव, बल, पौरुष, बुद्धि और योग, इनमें से कोई गुण आपको प्रसन्न नहीं कर सकता। पर आपने गजेन्द्र पर तो केवल भक्ति से प्रसन्न होकर कृपा कर दी थी। आपको गुण नहीं, प्रेम भिगोता है।”

प्रह्लाद नृसिंह के भयावह मुख के आगे निडर खड़े होकर कहते हैं कि उन्हें केवल संसार-बंधन का भय है, स्वयं भगवान् का नहीं।
प्रह्लाद नृसिंह के भयावह मुख के आगे निडर खड़े होकर कहते हैं कि उन्हें केवल संसार-बंधन का भय है, स्वयं भगवान् का नहीं।

फिर उसने अपनी नन्ही हथेली उस आग की ओर उठाई, जिसके सामने त्रिलोक काँप उठा था, और बहुत सहज स्वर में कहा, “परमात्मन्, आपका यह मुख बड़ा भयावना है। यह लपलपाती जीभ, सूर्य जैसी आँखें, चढ़ी हुई भौंहें, बल्लों की तरह सीधे खड़े कान, आँतों की यह माला, खून से लथपथ बाल, और ये नख जिन्होंने अभी-अभी मेरे पिता को फाड़ डाला। इन सबको देखकर मैं तनिक भी नहीं डरता।”

“मैं डरता हूँ तो केवल इस असह्य और उग्र संसार-चक्र से, जिसमें जीव अपने ही कर्मों के पाश में बँधकर इन भयंकर जन्तुओं के बीच डाल दिया गया है। दीनबन्धो, मुझे आप कब अपने उन चरणों की शरण में बुलाएँगे, जहाँ पहुँचकर इस भटकने का अन्त हो जाए।”

नृसिंह की उन आँखों में, जहाँ अभी आग थी, कहीं कुछ ठहरने लगा।

और बालक यहीं नहीं रुका। जिसे अभी-अभी वह परम दर्शन मिला था, जो चाहता तो उसी क्षण इस सारे आवागमन से छूट सकता था, उसका मन कहीं और अटका हुआ था।

“प्रभो,” उसने कहा, और उसका गला फिर भर आया, “बड़े-बड़े मुनि तो प्रायः अपनी ही मुक्ति के लिए निर्जन वन में चले जाते हैं, मौन साध लेते हैं, दूसरों के लिए कुछ नहीं करते। पर मैं इन भूले-भटके, असहाय, दीन जीवों को छोड़कर अकेला मुक्त नहीं होना चाहता।”

“मैं उनके लिए शोक करता हूँ, जो आपके गुणगान से विमुख होकर, माया के झूठे सुख के पीछे, अपने सिर पर सारे संसार का बोझ ढोते फिरते हैं। वे जैसे किसी अँधेरे कुएँ में गिर रहे हों। मैं इन्हें छोड़कर अकेला पार नहीं जाना चाहता। इन्हें भी इस भव-नदी से पार लगा दीजिए।”

जिस आग को सारा त्रिलोक न रोक सका था, वह अब उन नेत्रों में बुझ चुकी थी।

प्रह्लाद हाथ जोड़े भगवान् की स्तुति में लीन, स्वर में भय नहीं, केवल निश्छल भक्ति।
प्रह्लाद हाथ जोड़े भगवान् की स्तुति में लीन, स्वर में भय नहीं, केवल निश्छल भक्ति।

नृसिंहभगवान् का क्रोध शान्त हो गया था। वह उग्र रूप अपने आप समेटने लगा। अयाल बैठ गई, भौंहें खुल गईं, साँस की वह गुर्राहट धीरे-धीरे एक गहरी, शान्त साँस में ढल गई, और बालक के सामने फिर वही करुणामय स्वरूप खड़ा था, जिसकी ओर देखते ही मन को विश्राम मिल जाता है।

भगवान् बड़े प्रेम और प्रसन्नता से बोले, “प्रह्लाद, आपका कल्याण हो। दैत्यश्रेष्ठ, मैं आप पर अत्यन्त प्रसन्न हूँ। जो अभिलाषा हो, माँग लें। मैं तो जीवों की सब इच्छाएँ पूरी करने वाला हूँ। जिसे मेरा दर्शन हो जाता है, उसके हृदय में फिर किसी प्रकार की जलन नहीं रह जाती।”

संसार जिन वरदानों के लिए तरसता है, वे सब बालक के सामने रख दिए गए। पर वह अनन्य प्रेमी था। जिसका मन सदा उन्हीं में लगा हो, उसे इन वस्तुओं से क्या लेना। बड़े-बड़े लोगों को लुभाने वाले वे वरदान सामने रखे जाने पर भी उसने उन्हें न चाहा।

अब बाक़ी देवता धीरे-धीरे पास आ सके। ब्रह्मा, रुद्र, लक्ष्मी, सब हाथ जोड़े खड़े थे, और कोई समझ नहीं पा रहा था कि उनकी सारी शक्ति से भी जो आग बुझ नहीं सकी, उसे इस नंगे पाँव बालक ने खाली हाथ कैसे बुझा दिया।

साहित्यिक-संदर्भ

प्रह्लाद की यह स्तुति श्रीमद्भागवत के सप्तम स्कन्ध, नवम अध्याय में आती है (7·9)। नृसिंह-दर्शन के तुरन्त बाद, जब ब्रह्मा, रुद्र और स्वयं लक्ष्मी तक भगवान् का क्रोध शान्त न कर सके, तब ब्रह्मा ने अपने पास खड़े बालक प्रह्लाद को भेजा, और उसने पृथ्वी पर साष्टांग होकर यह स्तुति की। इसी अध्याय के अन्त में भगवान् ने प्रसन्न होकर वर माँगने को कहा, पर अनन्य प्रेमी प्रह्लाद ने वे वरदान नहीं चाहे (7·9·52-55)। आगे दशम अध्याय में प्रह्लाद इस अस्वीकार का कारण खोलते हैं, कि वर माँगकर वे सेवक के बदले व्यापारी न बन जाएँ।

यह स्तुति, जिसे ग्रन्थ में नारद धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाते हैं, पचपन श्लोकों में फैली है। यहाँ उसके स्वर और मर्म को कथा-रूप में रखा गया है; मूल की एक-एक पंक्ति को नहीं।

परम्परा में

परम्परा में यह स्तुति आज भी सूर्योदय के समय श्रद्धा से पढ़ी जाती है। प्रह्लाद उस सभा में सब में छोटा, सब में निर्बल, और एकमात्र ऐसा था जिसने अपने लिए कुछ न माँगा।

देखते रह जाइए

उस सभा में बड़े-से-बड़े सब खड़े थे, अपनी-अपनी शक्ति लिए, और किसी का पैर आगे न उठा। फिर वह बालक खाली हाथ, नंगे पाँव, उस आग के नीचे जा लेटा, और कुछ माँगने नहीं, औरों के लिए विनती करने। पूछिए अपने-आप से: उसके पास ऐसा क्या था जो उन सबके पास न था।

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