प्रह्लाद की प्रार्थना

कथा 45 · भागवतम् की कथाएँ

प्रह्लाद की प्रार्थना

Calming the Anger that Even Gods Could Not
स्कन्ध 7, अध्याय 9

नृसिंह ने हिरण्यकशिपु को मारा। उसका सीना चीर डाला।

मगर उनकी क्रोध-अग्नि शान्त नहीं हुई।

वो अभी भी गर्ज रहे थे। उनकी आँखें जल रही थीं। उनकी अयाल हवा में लहर ले रही थी।

खून उनके मुँह से बह रहा था।

देव आसमान से देख रहे थे। डर रहे थे।

ब्रह्मा ने सोचा, ”शायद मैं रोक सकूँ।” वो आए। पर नृसिंह की आँखों के सामने नहीं जा पाए। वहीं रुक गए।

शिव आए। ”नमस्कार, नरसिंह।” पर नरसिंह ने मुड़कर नहीं देखा।

लक्ष्मी आईं। उनकी पत्नी। उनके अवतार थे नृसिंह। पर लक्ष्मी भी नहीं जा पाईं।

इन्द्र। वायु। चन्द्र। सब आए।

कोई नहीं रुक पाया।

क्रोध इतना तीव्र था कि किसी का पास जाना मना।

उन्होंने एक छोटे से बच्चे को आगे भेजा।

प्रह्लाद। पाँच साल का।

”बच्चे, तू कोशिश कर। तू उसका भक्त। शायद तू को बात मिल जाए।”

प्रह्लाद डर नहीं रहा था। उसके अंदर डर था ही नहीं।

वो नंगे पाँव, छोटे शरीर के साथ, आगे बढ़ा।

एकान्तिनः सम्यगभीप्सते परं ।
नायं ममाजन्म जयाजयौ हृदि ॥

जो एकमुख्य भक्त है, वो सिर्फ़ परम चाहता है। न तो जन्म-मरण, न जय-पराजय उसके हृदय में।

नृसिंह ने अभी भी मुड़कर नहीं देखा। पर प्रह्लाद पास आता गया।

जब वो काफ़ी पास पहुँच गया, उसने हाथ जोड़े।

”भगवान।”

नृसिंह की आँखें एक पल को रुकीं।

”भगवान, मेरी बात सुनिए।”

नृसिंह ने सिर मोड़ा। उनकी आँखों में अभी भी क्रोध। पर एक हलकी सी सॉफ्टनेस।

प्रह्लाद ने एक प्रार्थना शुरू की। यह प्रार्थना भागवतम् का एक खूबसूरत हिस्सा है।

”आप मेरे पिता को मारा, यह ज़रूरी था। उन्होंने पाप किए। पर आप का ग़ुस्सा शान्त नहीं हुआ। क्यों?”

”क्योंकि आप ख़ुद एक role में हैं। एक avatar में। यह role आप ने अपने भक्त के लिए लिया। मैं उस भक्त के बहाने का कारण हूँ। अब बस। मुझे प्यार से देखिए।”

”मैं आपसे कुछ नहीं माँगता। न राज्य, न दूसरा अवतार, न मुक्ति। बस एक चीज़।”

”मेरे पिता को क्षमा करें।”

नृसिंह चौंके।

”क्षमा? तेरे पिता ने तुझे मारने की कोशिश की। तू अभी भी क्षमा माँग रहा है?”

”हाँ। वो मेरे पिता हैं। और एक राक्षस-कुल में जन्म लेना उनकी ग़लती नहीं थी। वो वैकुण्ठ के द्वारपाल थे, शाप से राक्षस बने।”

”अब उनका शाप पूरा। उन्हें अपनी सद्गति दीजिए।”

नृसिंह की आँखें भर आईं।

उन्होंने प्रह्लाद को गले लगाया।

”बेटा, तू ने जो माँगा, वो दिया।”

”तेरे पिता हिरण्यकशिपु को मैंने मुक्ति दी। वो अब वैकुण्ठ में हैं।”

”और तू, मेरा सबसे प्रिय भक्त, मुझ से क्या चाहिए?”

प्रह्लाद ने सोचा। फिर बोला।

”मेरा मन हमेशा आपके चरणों में रहे। बस।”

नृसिंह ने हाथ रखा उसके सिर पर। और तब उनका क्रोध शान्त हुआ।

उन्होंने अपना उग्र रूप वापस लिया। फिर विष्णु बने। चार-हाथ। नीला रंग। शान्त।

बाक़ी देव अब पास आ सके।

सब ने हाथ जोड़े।

और प्रह्लाद? वो उस दिन से असुरों का राजा बना। पर उसका मन हमेशा भगवान के पास।

मन्थन

प्रह्लाद की प्रार्थना भागवतम् का एक radical moment है।

एक पाँच साल का बच्चा। एक भयानक रूप के सामने। और एक request।

मगर जो request, वो किसी ने नहीं की होगी।

”अपने हत्यारे पिता को क्षमा।”

ज़्यादातर लोग बदला माँगते हैं। यह बच्चा क्षमा माँग रहा है।

और दूसरी बात। वो अपने लिए कुछ नहीं माँगता। न राज्य, न मुक्ति। बस ”आपके चरणों में मन।”

यही pure भक्ति है।

जब हम भगवान से कुछ माँगते हैं, हम एक तरह से business कर रहे हैं। ”आप यह दीजिए, मैं वो दूँगा।”

प्रह्लाद कोई business नहीं कर रहा। वो बस अपने पिता के लिए क्षमा माँग रहा है, और अपने लिए continuous remembrance।

और इसी request पर नरसिंह का क्रोध शान्त हुआ।

जो ब्रह्मा-शिव-लक्ष्मी से नहीं हुआ, वो एक छोटे बच्चे की pure intention से हुआ।

यह कथा कह रही है, अगर हम सच में चाहते हैं भगवान का ग़ुस्सा शान्त करना, अपनी ज़िंदगी का drama रुकाना, तो हमें अपने ego से नीचे आना होगा।

एक बच्चे जैसा बनना होगा। माँगते वक़्त छोटे रहना होगा।