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योग सूत्र · पाद 2 · साधन पाद

पतञ्जलि योग सूत्र · Yoga Sutras of Patanjali

पाद 2 · साधन पाद · Sadhana Pada

55 सूत्र। पाद 1 ने मंज़िल दिखाई थी। अब असली सवाल: वहाँ पहुँचा कैसे जाए? और रास्ते में दुख बार-बार क्यों लौट आता है? यहीं अष्टांग योग खुलता है।

55 सूत्र · पढ़ने का समय ~ 85 मिनट · पहले पढ़ें: पाद 1 (समाधि पाद) · साथ में अच्छा लगेगा: गीता का अध्याय 6

आप यात्रा में कहाँ हैं

दूसरा पाद: रास्ता। क्लेश (दुख-कारण), अष्टांग योग के पहले 5 अंग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार)। यह pada साधक के लिए सबसे practical है।

पहले एक बात

पाद 1 एक नक्शा था: समाधि है क्या। पाद 2 असली सफ़र है: वहाँ पहुँचा कैसे जाए, और रास्ते में दुख बार-बार क्यों टकराता रहता है।

पतञ्जलि का तरीक़ा एक अच्छे डॉक्टर जैसा है, पहले बीमारी की पहचान (दुख कहाँ से, क्यों), फिर इलाज (अष्टांग योग के पहले पाँच अंग: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार)। आख़िरी तीन अंग (धारणा, ध्यान, समाधि) पाद 3 में आते हैं, क्योंकि वे भीतर की क्षमताएँ हैं और बाहर की तैयारी के बाद ही असली अर्थ रखते हैं।

यह सबसे काम का पाद है। अगर पाद 1 कहीं-कहीं हवा में लगा, तो पाद 2 आपको सीधा ज़मीन पर ले आता है, हाथ-पैर वाला, रोज़ करने लायक।

इसे कैसे पढ़ें

क्रम से पढ़िए, पहले पहचान, फिर इलाज। असली खंभे: 2.1, 2.3, 2.16, 2.29, 2.30, 2.46, 2.47, 2.49। ये आठ पकड़ में आ गए, तो बाक़ी 47 इन्हीं के इर्द-गिर्द अपने आप जुड़ जाते हैं।

पतञ्जलि पाद 2 की शुरुआत एक छोटे से, निचोड़े हुए नुस्ख़े से करते हैं। पूरा व्यावहारिक योग बस तीन चालों में सिमट जाता है: तप, यानी तकलीफ़ के बीच से काम करते रहने की ताक़त, जो क्षमता गढ़ती है जैसे जिम में मांसपेशी; स्वाध्याय, यानी अच्छी किताबों का अध्ययन जो ध्यान को ऊँचे संकेतों पर लंगर देता है, और साथ ही खुद को देखना कि अभी कौनसा पैटर्न चल रहा है और क्यों; और ईश्वर-प्रणिधान, यानी अहंकार को ड्राइविंग सीट से हटा कर एक बड़े क्रम को सौंप देना। तीनों साथ-साथ चलते हैं, एक के बाद एक नहीं। तप के बिना स्वाध्याय उथला रहता है, स्वाध्याय के बिना तप मशीनी हो जाता है, और ईश्वर-प्रणिधान के बिना दोनों एक अहंकार-यात्रा बन जाते हैं। और इस अभ्यास के दो काम हैं, समाधि को पकाना और क्लेशों को पतला करना। यहीं एक राहत छिपी है: यह परफ़ेक्शन की माँग नहीं रखता। शुरुआती साधक के लिए क्लेश पूरी तरह मिटाए नहीं जा सकते, पर पतले किए जा सकते हैं। एक पतला हुआ क्लेश अभी भी ज़िंदा है, पर अब आपको जकड़ता नहीं। यही असली, पाने लायक लक्ष्य है, और इसी में हिम्मत बँधती है।

अब पतञ्जलि अपना दुख-निदान खोलते हैं, और एक चौंकाने वाली बात कहते हैं: इंसान की हर तकलीफ़ बस पाँच क्लेशों में से किसी एक या इनके मेल से आती है। ये पाँच हैं अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश। अविद्या सबसे नीचे की गलतफ़हमी है, बाक़ी चार की जड़, उनका खेत। यह जड़ है, और बाक़ी चार उसी से उगते हैं; अगर जड़ पर ध्यान न दिया जाए तो तना काटने से कुछ नहीं होता, फिर निकल आता है। ये चार किसी एक हालत में रहते हैं, सोए हुए, पतले, बीच-बीच में टूटे, या पूरी तरह जागे। एक साधक के क्लेश सोए हो सकते हैं, धक्का न लगे तो दिखें ही नहीं; एक ग़ैर-साधक के तेज़; बीच के अभ्यास वाले के टूटे हुए, कभी सोए कभी जागे। और अविद्या है क्या? वह नश्वर को पक्का, अशुद्ध को शुद्ध, दुख को सुख, और जो “मैं” नहीं उसे “मैं” समझ बैठती है। एक रिश्ते को पक्का मान लेना, शरीर को शुद्ध, सुख-खोजने वाली गतिविधियों को सुख का स्रोत, और “मैं यह शरीर-मन हूँ” मान लेना, ये चारों एक ही जड़ से उठती गलतफ़हमियाँ हैं। यह अद्वैत वेदान्त के विवेक की एक छोटी सी जाँच-सूची है: अपनी हर पक्की लगने वाली राय पर ये चार सवाल फेर कर देखिए, कितनी राय हिल जाती हैं।

अब बाक़ी चार क्लेश एक-एक कर खुलते हैं। अस्मिता वह है जो “देखने वाले” और “देखने की ताक़त” को एक ही समझ बैठती है। दृक् माने शुद्ध जागरूकता, यानी पुरुष; दर्शन-शक्ति माने मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, यानी देखने का औज़ार। “मैं देख रहा हूँ” में “मैं” तो जागरूकता है, पर “देखने” का औज़ार मन है, और हम दोनों को एक पोटली में बाँध बैठते हैं। इस गलती को खोलना सबसे महीन काम है, ज़्यादातर साधना यहीं अटकती है। फिर राग, जो भोगे हुए सुख के पीछे रह जाता है, उसकी बची-खुची राख; स्वादिष्ट खाना ख़त्म हो गया, पर “वो वाली डिश फिर चाहिए” वाली खिंच बची रह गई। यह सुख-अनुभव को बुरा नहीं बताता, दिक़्क़त राख में है जो ध्यान को अगली चीज़ पकड़ने में उलझाए रखती है। उसका आईना है द्वेष, जो भोगे हुए दुख के पीछे रह जाता है; बीते दर्द से आज की चिढ़ बनती है, और जिसने एक बार चोट पहुँचाई, उस तरह के लोगों से दूरी ऑटो-मोड पर चलने लगती है। राग और द्वेष मिल कर पसंद-नापसंद की मशीन बना देते हैं; हम सोचते हैं हम आज़ाद चुनाव कर रहे हैं, अक्सर बस पुरानी राख का पीछा कर रहे होते हैं। और पाँचवाँ, अभिनिवेश, जीने से चिपकना, जो अपने आप बहता रहता है और विद्वानों में भी जमा रहता है। यही पतञ्जलि का सबसे ईमानदार सूत्र है: मौत का डर दिमाग़ की समझ से नहीं जाता, बड़े-बड़े विद्वान और संत भी असली ख़तरे के सामने शरीर से चिपक जाते हैं, क्योंकि यह चिपक हर बीते जन्म की याद से हड्डियों तक उतर चुकी है। इसे घुलाने का एक ही रास्ता है, यह साफ़ देख लेना कि “मैं” शरीर नहीं हूँ; उससे पहले यह रहेगा, और ईमानदार साधक इसे एक baseline मान कर चलते हैं।

अब सवाल यह कि इन क्लेशों को हटाया कैसे जाए, और जवाब दो स्तरों पर आता है। सूक्ष्म स्तर पर वे “उल्टी यात्रा” से हटाए जाते हैं, यानी जिस रास्ते से वे बने उसी का उल्टा, रिवर्स में चला कर। साधना में यह दिखता भी है: मोटे विचार पहले शांत होते हैं, सूक्ष्म बाद में, और आख़िर में वे छापें जिनसे सूक्ष्म विचार उपजते हैं। और जागे हुए स्तर पर, जब क्लेश की धारा सच में चल रही हो, राग उठ रहा हो, द्वेष भड़क रहा हो, उसे ध्यान से रोका जाता है। ध्यान यहाँ ख़ास है, एक ठहरी हुई, गवाह-जैसी जागरूकता जो लहर को object बना कर देखती है। एक मज़ेदार बात: जब राग को देखते हैं, वह घुलने लगता है; जब उसके साथ “मैं” जोड़ देते हैं, वह और जम जाता है। सीधी सी बात है, पर पहली नज़र में उल्टी लगती है।

अब पतञ्जलि कर्म की मशीन खोलते हैं। हर काम एक छाप जमा करता है, एक कर्म-गोदाम, जिसमें क्लेशों की जड़ें हैं; ये छापें कभी इस जन्म में भोगी जाती हैं, कभी आगे के जन्मों में। पुनर्जन्म को अक्षरशः न भी मानें, तब भी बात समझ में आती है: आज जो पैटर्न आप अभ्यास करते हैं, वह आगे वाले “आप” का उपलब्ध औज़ार-थैला बनाता है; आज की हर चाल कल का सामान है। जब तक यह जड़ है, उसका पकना तीन रूपों में होता है, किस तरह का जन्म, कितनी उम्र, और कौनसे अनुभव। इसे नियतिवाद समझ लेना आसान है, पर बात बस इतनी है, जो हो चुका उसका नतीजा आप अभी जी रहे हैं, और जो आप अभी कर रहे हैं उसका नतीजा आगे जिएँगे; हाथ अभी भी आपके पास है। और ये फल खुशी देंगे या दुख, यह इस पर है कि उनके कारण नेक थे या ग़लत। बात सरल है, और पतञ्जलि यहाँ उपदेश नहीं दे रहे, वे बस मशीन का काम बता रहे हैं।

अब एक सूत्र आता है जो पहली नज़र में निराशावाद लगता है, पर है नहीं: विवेक वाले के लिए सब कुछ दुख ही है। ध्यान दीजिए, शब्द “विवेकिनः” लगा है, सिर्फ़ विवेक वाले के लिए। आम इंसान हर अनुभव को उसके ऊपरी रूप में लेता है, अच्छा या बुरा या सादा; विवेक वाला देखता है कि हर अनुभव में चार दुख छिपे बैठे हैं, हर सुख बदलेगा और इसी में एक दुख है (परिणाम), सुख के बीच भी एक हल्की चिंता कि यह जाएगा (ताप), हर अनुभव एक छाप छोड़ता है जो आगे की पकड़ बनाता है (संस्कार), और तीनों गुण लगातार आपस में खींचतान में हैं (गुणों की virodha)। यह साफ़-नज़री है, और जब ये चार स्रोत साफ़ दिखने लगते हैं, समझ ही पहली राहत बन जाती है। फिर पतञ्जलि पाँच शब्दों में पूरे योग का सबसे काम का सूत्र रखते हैं: जो दुख अभी नहीं आया है, वही टाला जा सकता है। जो हो चुका उसका कुछ नहीं हो सकता, जो अभी चल रहा है उसका भी नहीं, पर आगे का दुख, जो अभी सिर्फ़ बीज है, वह टाला जा सकता है। योग का पूरा मक़सद आगे-वाले-दुख को रोकना है; बीते को सुधारना या आज से भागना उसका काम है ही नहीं। जैसे किसी software में bug deploy से पहले ठीक करना सस्ता पड़ता है और बाद में महँगा, वैसे ही योग की असली क़ीमत deploy-से-पहले वाले हस्तक्षेप में है; बीमारी आने से पहले की देखभाल और आ जाने के बाद का इलाज, दोनों में फ़र्क है, और योग पहली श्रेणी का है। और इस टाले जा सकने वाले दुख की जड़ क्या है? द्रष्टा और दृश्य का घुल-मिल जाना। दुख का स्रोत बाहरी हालात या कर्म नहीं, बल्कि देखने वाले (शुद्ध जागरूकता) और देखी जाने वाली चीज़ (बाक़ी सब कुछ) के बीच की गलत पहचान है। हम कहते हैं “मेरा मन बेचैन है,” पर असल में “मैं” जागरूकता है और “मन” वह बेचैनी; दोनों को एक कर देना ही संयोग है, और सारा टाला जा सकने वाला दुख यहीं से आता है।

जड़ पकड़ ली, तो अब वह दृश्य है क्या जिससे हम घुल-मिल बैठे हैं। पतञ्जलि पूरी प्रकृति की परिभाषा एक सूत्र में देते हैं: दृश्य वह है जिसकी प्रकृति है रोशनी (सत्व), हलचल (रजस्) और ठहराव (तमस्); जो तत्वों और इन्द्रियों से बना है; और जिसका मक़सद है द्रष्टा को अनुभव देना और आख़िर में उसे मुक्त करना। एक प्यारी बात: प्रकृति का मक़सद ही द्रष्टा है, यह सांख्य का एक सुंदर विचार है, उसका एक काम है, और वह काम है चेतना की सेवा। यह प्रकृति मोटे से सूक्ष्म की ओर एक ढलान पर खुलती है, चार पड़ावों में, मोटा, सूक्ष्म, “बस इशारा भर”, और अनप्रकट; मोटी दिखने वाली चीज़ें, फिर सूक्ष्म तत्व, फिर बुद्धि-स्तर, और आख़िर में मूल प्रकृति, सबका अनप्रकट स्रोत। यह वही ढलान है जो पाद 1 में दिखी थी (1.45, “सूक्ष्म का अंत अनप्रकट पर”)। और दूसरी ओर द्रष्टा? वह सिर्फ़ शुद्ध देखना है, अपने आप में बेदाग़, पर हमें वह सीधे नहीं मिलता, हम उसे मन के cognitions के ज़रिए ही जानते हैं। जैसे एक साफ़ बल्ब अँधेरे में नहीं दिखता और तब दिखता है जब उसकी रोशनी किसी चीज़ पर पड़े, वैसे ही पुरुष शुद्ध है, पर उसका होना cognitions के आईने में दिखता है।

अब पतञ्जलि एक हिम्मत वाला दावा रखते हैं: दृश्य का होना ही उस द्रष्टा के लिए है, सारी प्रकृति का काम पुरुष की सेवा करना है, प्रकृति का अपने आप में कोई अलग मतलब नहीं। व्यावहारिक पढ़ाई यह: दुनिया आपके फ़ायदे के लिए नहीं चल रही, वह अहंकार वाली कल्पना है, पर दुनिया चेतना के फ़ायदे के लिए चल रही है, और आप चेतना का एक ख़ास केंद्र हैं। और जिस पुरुष ने अपना मक़सद पूरा कर लिया, उसके लिए प्रकृति “ग़ायब” हो जाती है, पर खुद ग़ायब नहीं होती, क्योंकि बाक़ी चेतनाओं के लिए उसका काम अभी बाक़ी है; एक मुक्त इंसान और एक आम इंसान का दुनिया देखना, एक ही दुनिया, बिल्कुल अलग अनुभव। यहाँ सबसे कठिन और सबसे चौंकाने वाली बात आती है: पुरुष और प्रकृति का यह संयोग खुद भी एक मक़सद रखता है, यही उन्हें अपना असली रूप पहचनवाता है। यानी यह घुल-मिल जाना ही आख़िर में साफ़ी का इंजन है; बिना उलझन के भेद नहीं दिखेगा, बिना तकलीफ़ के मुक्ति की तड़प नहीं उठेगी, उलझन ही सुलझन का बीज है। और इस संयोग का कारण? छोटा और सटीक, अविद्या। बाक़ी सब, राग, द्वेष, अस्मिता, अभिनिवेश, अविद्या से बने हैं, वही जड़ है; यह 2.4 की ही बात है, बस एक अलग कोण से, क्योंकि यह दोहराने लायक है। और जब अविद्या मिटती है, संयोग मिटता है, यही हट जाना है, और यही द्रष्टा का कैवल्य। फ़ॉर्मूला पूरा हुआ, समस्या (2.17), जड़-कारण (2.24), हल (2.25), एक साफ़-सुथरी निदान-शृंखला। शब्द “कैवल्य” पतञ्जलि की पहचान वाला दुर्लभ शब्द है; मोक्ष, निर्वाण, ये अलग-अलग परम्पराओं के शब्द हैं, पतञ्जलि कैवल्य कहते हैं, यानी “अकेलापन”, पुरुष अपने आप में, बिना प्रकृति की मिलावट के, एक तरह का घर लौट आना।

तो अविद्या हटाई कैसे जाए? बिना टूटे चलने वाला विवेक-ज्ञान ही उसे हटाने का साधन है। यहाँ “अविप्लवा” चाबी है: एक बार की समझ काफ़ी नहीं, लगातार, बिना टूटे चलने वाला विवेक चाहिए, हर पल में पुरुष और प्रकृति का भेद ज़िंदा रखना, और इसीलिए अष्टांग योग एक रोज़ का अभ्यास है, on/off का बटन नहीं। यह आख़िरी समझ एक छलाँग में नहीं आती, सात पड़ावों में आती है, चार बाहरी समझ (दुख, उसका कारण, हटना, और हटाने का साधन, चारों पहचान में आ जाना) और तीन भीतरी आज़ादियाँ (बुद्धि का काम पूरा, गुणों का सिमट जाना, और आख़िर में पुरुष का अपने रूप में ठहर जाना)। और अब एक पुल वाला सूत्र: योग के अंगों का टिका हुआ अभ्यास गंदगी को मिटाता है, और समझ का उजाला विवेक-ज्ञान तक पहुँचता है। यानी विवेक-ज्ञान दूर का लक्ष्य लगता है, पर उस तक का साधन ठोस है, अब हाथ-पैर वाली बात शुरू। और वह साधन है अष्टांग, आठ अंग: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि। यह पूरे भारतीय ध्यान-संसार का सबसे असरदार सूत्र है, आज भी हर गंभीर meditation परम्परा इन्हीं आठ का कोई न कोई रूप इस्तेमाल करती है। और यह एक क्रम है, एक सीढ़ी: पहले दूसरों के साथ बर्ताव (यम), फिर खुद के साथ बर्ताव (नियम), फिर शरीर (आसन), फिर साँस के ज़रिए ऊर्जा (प्राणायाम), फिर इन्द्रियों का बाहर से सिमटना (प्रत्याहार), फिर टिका हुआ मन (धारणा), फिर ध्यान की लगातार धारा, और आख़िर में पूरी डूब (समाधि)। सबसे बाहर से शुरू कर के सबसे भीतर तक, क्योंकि बिना नींव के ऊपरी मंज़िल नहीं बनती। यह पाद बाक़ी (2.30 से 2.55) इनमें से पहले पाँच को खोलेगा, आख़िरी तीन पाद 3 में।

पहला अंग, यम, दूसरों के साथ बर्ताव के पाँच पैमाने हैं: अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह। अहिंसा सिर्फ़ शारीरिक नहीं, शब्दों से और मन से किसी को बेवजह चोट पहुँचाने का इरादा छूट जाना; यह सबसे बुनियादी यम है और इसके बिना बाक़ी चार खोखले हैं। सत्य, तथ्यों में सच्चाई और धोखे के इरादे का न होना, पर अहिंसा से तौला हुआ; अगर सच कहना सीधी हिंसा बन जाए तो चुप रहना बेहतर। अस्तेय, सीधा मतलब चोरी न करना, पर बड़े अर्थ में जो आपका हक़ नहीं उसे न लेना, श्रेय, ध्यान, समय, ऊर्जा, सब इसमें आते हैं। ब्रह्मचर्य, ऊर्जा को बेहोशी में बहने न देना, गृहस्थ के लिए संतुलन और अनासक्ति। अपरिग्रह, चीज़ें इस्तेमाल कीजिए, मालिक मत बनिए, जितना ज़रूरी उतना। यह सूची जान-बूझ कर “क्या न करें” वाली है, पतञ्जलि का तर्क यह कि पहले ग़लत करना रोकिए, तभी सही करना सच्चा होगा; जैसे डॉक्टरी की कसम का पहला नियम, “सबसे पहले, नुक़सान मत करो”, अहिंसा की हू-ब-हू गूँज है। और जब ये यम वर्ग, जगह, समय या हालात की शर्तों के बिना निभाए जाएँ, तब वे “महाव्रत” बन जाते हैं। आम नैतिकता शर्तों वाली होती है, “उससे झूठ नहीं बोलता पर इससे बोल सकता हूँ”; महाव्रत बिना शर्त वाली नैतिकता है। यह ऊँची माँग है, पर मतलब यह कि शर्तों वाली नैतिकता असल में खुद-के-फ़ायदे वाली होती है, अहंकार का एक सजा-धजा रूप, और महाव्रत ही असली अभ्यास है। फिर दूसरा अंग, नियम, खुद के साथ बरते जाने वाले पाँच: शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर-प्रणिधान। यम “क्या न करें” थे, नियम “क्या करें”। शौच बाहरी और भीतरी दोनों की धुलाई, सन्तोष यानी जो है उसके साथ स्वीकार, तप वही 2.1 वाला तकलीफ़ के साथ राज़ी-ख़ुशी जुड़ना, स्वाध्याय यानी अच्छी किताबें और खुद को देखना, और ईश्वर-प्रणिधान वही 1.23 और 2.1 वाला समर्पण। आख़िरी तीन नियम बिल्कुल वही हैं जो 2.1 का क्रिया-योग थे; पतञ्जलि उन्हें दोबारा रेखांकित कर रहे हैं, क्योंकि ये तीनों ही नैतिकता को भीतर के अभ्यास से जोड़ते हैं।

पर यम-नियम निभाएँ कैसे, जब उल्टे आवेग उठते हैं? पतञ्जलि एक बेहद काम का तरीक़ा देते हैं, जिसे आज ही आज़माया जा सकता है: जब हानिकारक आवेग उठें, तो उनके उल्टे को मन में उगाइए। गुस्सा उठ रहा है, करुणा उगाइए; लालच उठ रहा है, उदारता उगाइए। मन एक समय में एक ही हालत पकड़ सकता है, उसमें उल्टा गुण बिठा दीजिए और हलचल अपने आप शिफ़्ट हो जाती है; आधुनिक मनोविज्ञान का “cognitive reframing” इसी का एक रूप है। और यह उल्टे की भावना क्यों ज़रूरी है, यह पतञ्जलि बारीकी से बताते हैं: हिंसा जैसे उल्टे विचार, चाहे खुद किए हों, करवाए हों, या चुपचाप सही ठहराए हों; चाहे लालच, गुस्से या भ्रम से उठे हों; चाहे हल्के हों, मँझले या तेज़, सबका नतीजा दुख और अज्ञान का न ख़त्म होने वाला सिलसिला है। वे इसे नौ कोणों से जाँचते हैं, तीन तरीक़े गुना तीन कारण गुना तीन तीव्रताएँ, यानी 27 संभावनाएँ। और गौर कीजिए, सहमति से की गई हिंसा सबसे महीन है: आप खुद नहीं कर रहे, करवा भी नहीं रहे, पर चुपचाप सहमत हैं, यह भी हिंसा है। “अनन्त फल”, एक छोटी सी हिंसा भी अनगिनत नतीजे चला सकती है, इसीलिए उल्टे की भावना करना ज़रूरी है, सिर्फ़ इच्छा नहीं।

अब पतञ्जलि हर यम का फल बताते हैं, और हर फल एक जाँचा जा सकने वाला दावा है। अहिंसा जम जाए तो उसकी मौजूदगी में दुश्मनी अपने आप छूट जाती है; जिसके पास चोट-न-पहुँचाने का भाव सच में जम गया, उसके आसपास हिंसा का माहौल बदलने लगता है, यही वह “शांत मौजूदगी” है जिसके पास बैठ कर दूसरों का nervous system भी ठंडा हो जाता है। सत्य जम जाए तो काम और उनके फल आपस में सधे रहते हैं; जिसकी बात भरोसे लायक है, उसका कहा ज़मीन पर उतरता है, क्योंकि उसके शब्द में वज़न होता है और दुनिया उस पर हरकत करती है। अस्तेय जम जाए तो सारी संपत्ति खुद चली आती है, एक मज़ेदार उलटबाँसी, जो ले रहा है कम उसे मिल रहा है ज़्यादा; जो कुछ भी बेजा नहीं लेता, उसके चारों ओर भरोसा उगता है, और भरोसा हर तरह की दौलत, पैसा, रिश्ते, सम्मान, खींच लाता है। ब्रह्मचर्य जम जाए तो वीर्य, यानी जीवन-ऊर्जा, मिलता है; ऊर्जा को बेहोशी में बहने न देने से एक उत्साह, एक धार, एक साफ़ी बची रहती है। यह संन्यास का फ़रमान नहीं, गृहस्थ के लिए संतुलन और होशपूर्वक भाग लेना भी ब्रह्मचर्य है, चाबी शब्द अनासक्ति। और अपरिग्रह टिक जाए तो “मैं क्यों, कैसे जन्मा” की साफ़ समझ आती है; जब आप चीज़ों को जमा करना छोड़ देते हैं, तो वह पहचान जो चीज़ों पर खड़ी थी ढीली पड़ जाती है, और “मैं असल में हूँ कौन” का एक गहरा एहसास उभरने लगता है।

अब पाँचों नियमों के फल। शौच से अपने शरीर के प्रति अनासक्ति आती है, और दूसरों के शरीर से बेवजह उलझाव कम होता है; शरीर को साफ़ रखने का गहरा अभ्यास करते-करते शरीर का असली रूप, उसकी नश्वरता और क्षय, साफ़ दिखने लगता है, और एक ठहरी हुई अनासक्ति आती है, शरीर की सेवा कीजिए पर पूजा नहीं। शौच के और भी फल हैं, भीतर की साफ़ी, प्रसन्नता, एकाग्रता, इन्द्रियों पर क़ाबू, और खुद को देख पाने की क्षमता; “सौमनस्य” यानी एक baseline खुशी, साफ़ मन अपने आप खुशमिज़ाज होता है, और जो हमेशा बुझे-बुझे रहते हैं उनमें कहीं न कहीं मन में जमा कूड़ा होता है। सन्तोष से वह खुशी मिलती है जिससे बेहतर कुछ नहीं; जो जितना संतुष्ट है उतना ही सुखी, और एक हद पर यह खुशी “अनुत्तम” हो जाती है, जिसे किसी बाहरी जोड़ से और बेहतर नहीं किया जा सकता। यह Maslow की सीढ़ी को उल्टा कर देता है, ज़रूरतें पूरी करने से नहीं, ज़रूरतें कम करने से सुख बढ़ता है। तप से गंदगी मिटती है और शरीर तथा इन्द्रियों में एक निखार आता है, खिलाड़ियों के training का यही सिद्धांत है। स्वाध्याय से इष्ट-देवता से जुड़ाव मिलता है; परम्परा में मंत्र-जप और शास्त्र-अध्ययन से एक देवता-ऊर्जा से रिश्ता बनता है, और आज की भाषा में जिस आदर्श या व्यक्ति पर आप लगातार मनन करते हैं, वह आपके भीतर के तंत्र में बैठ जाता है। और आख़िरी, सबसे ताक़तवर: ईश्वर-प्रणिधान से समाधि सध जाती है। समर्पण अकेला ही समाधि के लिए काफ़ी है, क्योंकि यही वह चाल है जो अहंकार को ड्राइविंग सीट से उठा देती है; बाक़ी अभ्यास अहंकार को निखारते हैं, समर्पण उसे बदल देता है।

अब तीसरा अंग, आसन, और शायद आधुनिक योगा संस्कृति का सबसे ग़लत समझा गया सूत्र: आसन वह है जो टिका हुआ और आरामदेह हो। पतञ्जलि का आसन ध्यान के लिए बैठक है, न कि जिम वाले मुश्किल पोज़। दो ख़ूबियाँ चाहिए, टिका हुआ (हिल नहीं रही) और आरामदेह (दर्द नहीं हो रहा); दोनों मौजूद हैं तो वह आसन है, एक भी कम तो आसन सधा नहीं। आज के स्टूडियो में लोग peacock pose और handstand करते हैं और सोचते हैं यह “advanced आसन” है, पर पतञ्जलि की भाषा में अगर वह टिका और आरामदेह नहीं, तो आसन है ही नहीं। तो अपने आप से एक छोटा सवाल: आपकी रोज़ की ध्यान-बैठक क्या है, कुर्सी, ज़मीन का गद्दा, कुछ भी, वह टिकी और आरामदेह होनी चाहिए, उसे अपनी असली बुनियाद मानिए। इसे मज़बूत करने के दो तरीक़े हैं, और दोनों साथ चलते हैं: कोशिश का ढीला पड़ना, यानी मांसपेशियों की कसी हुई पकड़ छोड़ देना ताकि बैठक हड्डियों पर टिके न कि मांसपेशियों के ज़ोर पर; और असीम में डूब जाना, यानी ध्यान को शरीर से हटा कर किसी बड़ी, खुली चीज़ पर रखना, आसमान, अंतरिक्ष, ॐ की गूँज, क्योंकि जब ध्यान किसी विशाल जगह पर है तो शरीर अपने आप ठहर जाता है। सिर्फ़ मांसपेशी ढीली करने से शरीर लुढ़क जाएगा, सिर्फ़ ध्यान हटाने से कसा रहेगा, इसलिए दोनों साथ। और ऐसी टिकी बैठक से उल्टी-जोड़ियाँ, गरम-ठंडा, भूख-तृप्ति, तारीफ़-निंदा, अब उतना असर नहीं करतीं; शरीर ठहरा हो तो nervous system ठहरा हो, और तब मानसिक झटके कम, यह शारीरिक नींव का मानसिक फ़ायदा है।

आसन टिक जाए, तब चौथा अंग खुलता है, प्राणायाम: साँस के अंदर-बाहर बहाव में जान-बूझ कर रुकावट डालना। यह “साँस की कसरत” नहीं, यह ख़ास तौर पर वह अभ्यास है जो साँस के सहज बहाव में होशपूर्वक ठहराव डालता है; शब्द “विच्छेद” चाबी है, यह रुकावट है, ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं। और क्रम ज़रूरी है, आसन पहले जमना चाहिए, क्योंकि शरीर डगमगा रहा हो तो साँस से खेलना नुक़सान कर सकता है, इसीलिए कई आधुनिक शिक्षक चेताते हैं कि बिना आसन की नींव के गहरे प्राणायाम ख़तरनाक हैं। यह तीन तरह का होता है, साँस-छोड़ने पर ठहराव (बाह्य कुम्भक), साँस-लेने पर ठहराव (आभ्यन्तर कुम्भक), और कहीं भी अपने आप पूरी रोक (केवल कुम्भक, आगे का अभ्यास); और हर एक को तीन पैमानों से नापा जाता है, देश यानी ध्यान कहाँ है (नाक, गला, हृदय), काल यानी कितनी देर, और सङ्ख्या यानी कितनी बार; अभ्यास पकता है तो साँस लंबी और महीन होती जाती है। फिर एक आगे की अवस्था, चौथा प्राणायाम, जो बाहरी और भीतरी, दोनों दायरों को पार कर जाता है; यहाँ साँस अपने आप थम जाती है और ध्यान दोनों दायरों से छूट जाता है, यह केवल कुम्भक का निखरा रूप है, गहरे ध्यान में अपने आप उभरता हुआ। इन सबका सबसे बड़ा फल यह कि भीतरी रोशनी पर पड़ा परदा घुल जाता है; भीतरी साफ़ी सबमें है पर ढकी हुई, और प्राणायाम उस परदे को धीरे-धीरे घिसता है, यही वजह है कि नियमित अभ्यास करने वाले बताते हैं, मन ज़्यादा साफ़, समस्याओं में तेज़ सूझ, और भावनाओं का उछाल कम। और इसका एक और फल, अगले अंगों तक का पुल: मन धारणा, यानी एकाग्रता, के लायक़ हो जाता है। बिना प्राणायाम के सीधे धारणा की कोशिश में मन डगमगाता रहेगा; यह उसी क्रम की पुष्टि है, पाद 1 वाला “थमना” तभी संभव है जब शरीर और साँस ठहरे हों।

और पाँचवाँ अंग, प्रत्याहार, इस पाद की दहलीज़: जब इन्द्रियाँ अपनी-अपनी चीज़ों से कट जाएँ और चित्त का ही रूप लेने लगें, यह प्रत्याहार है। इन्द्रियाँ आम तौर पर बाहर देखती हैं, आँख बाहर, कान बाहर; प्रत्याहार में वे भीतर मुड़ती हैं और चित्त के साथ एक सुर में आ जाती हैं। एक पहचान का निशान: आप ध्यान में हैं, बाहर शोर है, पर वह दर्ज ही नहीं हो रहा, कान काम कर रहे हैं पर ध्यान उनसे नहीं बह रहा, यही प्रत्याहार है। यह ज़बरदस्ती का कट जाना नहीं, आँखें बंद कर लेना सिर्फ़ बाहरी कटाव है; प्रत्याहार भीतरी है, इन्द्रियाँ अपनी-अपनी चीज़ों से अपने आप अलग हो जाती हैं। और इसके पकने से इन्द्रियों पर सबसे ऊँची महारत मिलती है, वे पूरी तरह आपके हाथ में आ जाती हैं, जब चाहो जुड़ें, जब चाहो हटें; जैसे एक मँझा हुआ संगीतकार अपने साज़ पर ऐसा क़ाबू रखता है कि सुर वह तभी निकालता है जब चाहता है, वैसे ही इन्द्रियाँ भी एक साज़ हैं और प्रत्याहार उन्हें tune करने का अनुशासन। यहीं पाद 2 का सफ़र पूरा होता है, दुख की पहचान (2.3 से 2.27) से लेकर पाँच योग-अंगों तक (2.28 से 2.55), एक पूरी यात्रा। प्रत्याहार वह दहलीज़ है जिसके बाद असली भीतरी काम संभव होता है, और बिना इन्द्रियों पर महारत के वह काम मुमकिन ही नहीं; जहाँ धारणा, ध्यान और समाधि खुलेंगे, उस पाद 3 में मिलते हैं।

पढ़ कर आगे क्या

सीधा अगला पन्ना: पाद 3 (विभूति पाद), धारणा, ध्यान, समाधि का निखार, और उससे उभरने वाली असाधारण क्षमताएँ (सिद्धियाँ)। पाद 3 थोड़ा विवादित है, क्योंकि कई परम्पराएँ सिद्धियों को भटकाव मानती हैं। पतञ्जलि उन्हें बताते भी हैं और आगाह भी करते हैं।

बाहर का एक सुझाव: स्वामी वेद भारती की “Yoga Sutras of Patanjali: With the Exposition of Vyasa”, हिमालयन इंस्टीट्यूट परम्परा का सबसे विस्तृत भाष्य। कई खंड हैं, पर पाद 2 का हिस्सा कमाल का है।

और एक सवाल जेब में रखिए: 2.16 (“हेयं दुःखमनागतम्”) को आज जीना मतलब क्या? आज का कौनसा छोटा सा चुनाव आगे के दुख का बीज बो रहा है, और कौनसा उसे चुपचाप निरस्त कर रहा है?

मूल पाठ: पतञ्जलि योग सूत्र, मानक देवनागरी संस्करण (व्यास-भाष्य परम्परा)।

जिन भाष्यों से मदद ली: व्यास-भाष्य, स्वामी हरिहरानंद आरण्य, Edwin Bryant, स्वामी वेद भारती (हिमालयन इंस्टीट्यूट), B.K.S. Iyengar की “Light on the Yoga Sutras” (ख़ास कर आसन/प्राणायाम वाले हिस्सों के लिए)।

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आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-21