भास और विलास

कथा · 08

भास और विलास: सात जन्मों की मित्रता

दो बच्चे एक वन में साथ खेले। फिर देह छोड़ी। फिर मिले। फिर बिछुड़े। सात बार। आठवें में पहचान गए कि असल में वो कौन हैं।

बहुत पुरानी बात है। एक वन में एक ऋषि की कुटिया थी। पास ही एक और ऋषि की कुटिया थी। दोनों के बेटे – भास और विलास – साथ खेलकर बड़े हुए। एक-दूसरे के बिना खाते नहीं थे, सोते नहीं थे।

जब बड़े हुए, तो दोनों ने अलग-अलग आश्रमों में अध्ययन के लिए जाने का निश्चय किया। बिछड़ते समय बहुत रोए। फिर भी कहा, “हम मिलते रहेंगे।”

वो मिले। साल-दो साल बाद। फिर एक-दूसरे के आश्रमों में घूमते रहे। जब बूढ़े हुए, तो साथ ही देह त्याग करने का व्रत लिया। एक ही दिन, एक ही समय, दोनों ने प्राण छोड़े।

कथा यहाँ खत्म नहीं हुई।

अगले जन्म में दोनों एक राज्य के दो ब्राह्मण बने। एक का नाम था सुपुण्य, दूसरे का सुश्रुत। दोनों फिर दोस्त बन गए। पहले तो उन्हें पता नहीं था कि वो कौन थे। मगर एक दिन सुपुण्य ने सुश्रुत को देखा, और उसके भीतर एक हलचल हुई। “मैंने इसे कहीं देखा है।”

दोनों दोस्त बने। वर्षों साथ रहे। साथ ही गए।

तीसरे जन्म में वो दो वैश्य बने। व्यापारी। एक उत्तर का, दूसरा दक्षिण का। एक मेले में मिले। तुरंत दोस्ती हो गई। फिर पूरा जीवन साथ बिताया।

चौथे जन्म में वो जुड़वाँ भाई हुए।

पाँचवें में दो हंस।

छठे में दो ऋषि।

सातवें जन्म में वो पहाड़ पर एक साथ ध्यान करते दो साधु बने। इस बार दोनों को धीरे-धीरे याद आने लगा। वो जब आँखें मूँदते, तो पुराने जन्म दिखते। एक-एक करके सब कथाएँ खुलती गईं।

एक दिन भास – अब साधु, मगर मन में पुराना नाम जागा हुआ – विलास से बोला, “भाई, हम कितने जन्मों से साथ हैं।”

विलास हँसा। “सात।”

“मगर अब क्या?”

“अब आख़िरी रात बाकी है। फिर हम दोनों एक हो जाएँगे।”

दोनों ने उस रात साथ ध्यान किया। समाधि लग गई। जब उठे, तो दोनों के भीतर कोई “मैं” और “तू” का अंतर नहीं बचा था। दोनों एक ही चेतना में मिल गए।

वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राजकुमार, जो स्नेह तुम किसी से करते हो, वो कई जन्मों से चला आ रहा है। और कई जन्म आगे जाएगा। मगर अंत में सब प्रेम एक ही चेतना में लौटता है। संबंध मिटते नहीं, पूरे होते हैं।”

सब कथाएँ