कथा · 24
भास और विलास: दो मित्रों का आत्मविचार
सह्य पर्वत पर महर्षि अत्रि के आश्रम में भास और विलास साथ बड़े हुए। पिता के वियोग के बाद शोक ने दोनों को वन के अलग-अलग एकान्तों में पहुँचा दिया। दिन, मास और वर्ष बीत गए; वृद्धावस्था आ गई, फिर भी विशुद्ध ज्ञान प्राप्त न हुआ। बहुत समय बाद मिले इन दो मित्रों की बातचीत कुशल-समाचार से आरम्भ होती है और संसार, मन, देहाभिमान तथा आत्मज्ञान की गहरी पड़ताल बन जाती है।
सह्य पर्वत पर अत्रि का आश्रम
वसिष्ठ ने श्रीराम से कहा, “मन ही मन को विवेक से देखे और ‘मैं’ तथा ‘मेरा’ के आग्रह को छोड़े। जब तक संकल्पमय मन अपनी सत्ता बनाए रखता है, जगत से मिलने वाला दुःख भी बना रहता है। इस विषय में सह्य पर्वत पर रहने वाले भास और विलास का प्राचीन वृत्तान्त सुनो।”
सह्य पर्वत का विस्तार तीनों लोकों को छूता हुआ बताया गया है। उसके ऊँचे भाग देवताओं के निवास से शोभित थे, तलहटी में मनुष्य बसते थे और धरती के भीतर नागों का प्रदेश माना जाता था। कहीं निर्मल झरनों की गूँज थी, कहीं बाँसों में प्रवेश करती हवा मधुर स्वर भरती थी। फूलों से लदे वृक्ष, कमलों से भरे सरोवर, खनिजों की चमक, रत्नमयी शिलाएँ और मोतियों के स्थान उसकी ढलानों को उजला करते थे। गुफाओं में सिद्ध रहते, विद्याधर आकाशमार्ग से आते-जाते, चन्दन के वृक्षों से सर्प लिपटे रहते और शिखरों पर सिंहों की गर्जना सुनाई देती।
उसी पर्वत की उत्तरी ओर, फलों के भार से झुके वृक्षों और स्वच्छ जलधाराओं के बीच महर्षि अत्रि का विशाल आश्रम था। उसकी रमणीयता ब्रह्मलोक, स्वर्ग और शिव के नगर की याद दिलाती थी। वहाँ आने वाले सिद्धों का श्रम दूर हो जाता था। आश्रम के वृक्षों पर नए पल्लव निकलते, आम की मंजरी महकती और सरोवरों में कमल खिले रहते। तप और अध्ययन के लिए वह एक शान्त, सुव्यवस्थित स्थान था।
उस आश्रम में शास्त्रों के ज्ञाता शुक्र और बृहस्पति नाम के दो तपस्वी रहते थे। वे अपने आकाशचारी नामधारियों जैसे विद्वान थे। कुछ समय बाद दोनों के घर एक-एक निर्मल पुत्र हुआ। एक बालक का नाम विलास और दूसरे का भास था।
एक मन के दो मित्र
भास और विलास अपने पिताओं के लगाए लता-वृक्षों की लंबी नई शाखाओं की तरह आश्रम में बढ़ने लगे। दोनों में सहज और गहरा स्नेह था। वे परस्पर मिल-जुलकर रहते, साथ के जीवन में प्रसन्न रहते और एक-दूसरे की उपस्थिति को अपने दिन का स्वाभाविक अंश मानते थे।
वसिष्ठ उनके प्रेम को समझाने के लिए दो सूक्ष्म उपमाएँ देते हैं। तिल के भीतर तेल अलग दिखता नहीं, फिर भी उसी में रहता है। फूल और उसकी सुगन्ध भी एक-दूसरे से अलग अनुभव नहीं होते। भास और विलास का मेल ऐसा ही था। दोनों के मन इतने समान थे कि देखने वाले को एक मन दो भागों में बँटकर दो शरीरों में स्थित जान पड़ता। स्नान, मानसिक अनुशासन और आश्रम की दिनचर्या में भी दोनों की गति एक जैसी थी।
थोड़े ही काल में दोनों ने बाल्यावस्था पार की और युवावस्था में प्रवेश किया। वे उदित होते सूर्य और चन्द्रमा के समान प्रकाशवान जान पड़ते थे। उनका पारस्परिक स्नेह उसी आश्रम-जीवन में दृढ़ बना रहा।
फिर वृद्धावस्था से क्षीण हुए उनके पिता शुक्र और बृहस्पति शरीर छोड़कर परलोक चले गए। दोनों पुत्र शोक से अभिभूत हो गए।
जल से निकले कमल की तरह उनके मुख की कान्ति जाती रही। देह सन्तप्त हुई, उत्साह क्षीण पड़ा और मन व्यथा में डूब गया। उन्होंने विधिपूर्वक दाह और और्ध्वदैहिक क्रियाएँ पूरी कीं। फिर अपने बड़ों के गुणों को याद करते हुए करुण वाणी में विलाप किया। वसिष्ठ यहाँ मनुष्य के सामाजिक और पारिवारिक धर्म की ओर भी ध्यान दिलाते हैं। बड़े ज्ञानी भी प्रियजन के वियोग पर लोकसम्मत संस्कारों की उपेक्षा नहीं करते।
शोक में बीतते वर्ष
पिता-वियोग का ताप भीतर गहराता गया। भास और विलास के शरीर ऐसे सूखने लगे जैसे ग्रीष्म की दावाग्नि में जड़ से चोटी तक झुलसे दो वन-वृक्ष। घर, खेत, धन और परिचित वस्तुओं से उनका मन विरक्त हो गया। वे समूह से बिछुड़े दो मृगों की तरह अलग-अलग वन में अपना समय बिताने लगे।
शोक, वैराग्य और विछोह के बीच उनके रास्ते अलग हुए। दोनों वन के अलग-अलग एकान्तों में साधना करने लगे।
दिन बीते, फिर मास और वर्ष। दोनों अपने-अपने एकान्त में तप करते रहे। धीरे-धीरे वृद्धावस्था ने उन्हें घेर लिया। समय ने बाल और देह बदल दिए, पर जिस विशुद्ध ज्ञान की उन्हें आवश्यकता थी, वह अभी प्राप्त नहीं हुआ था। लम्बा तप और बीतती आयु आत्मज्ञान के लिए अपर्याप्त रहे।
बहुत समय के बाद प्रारब्ध के संयोग से दोनों वृद्ध तपस्वी फिर मिले। वर्षों का अन्तर उनके बीच था, पर स्नेह की पहचान अक्षुण्ण थी। विलास ने सामने खड़े भास को देखा तो उनकी वाणी में सम्मान, राहत और पुराने अपनत्व का भाव एक साथ उतर आया।

वन में हुई भेंट
विलास ने कहा, “प्रिय भास, मेरे जीवनरूपी उत्तम वृक्ष के फल, मेरे हृदय में सदा रहने वाले अमृत-सागर, आपका स्वागत है। मुझसे अलग होकर आपने इतने दिन कहाँ बिताए? आपकी तपस्या सफल हुई? संसार के सन्ताप से आपकी बुद्धि शीतल हुई? आपने जानने योग्य आत्मतत्त्व को जाना? आपकी विद्या फली? आप सकुशल हैं?”
विलास के अभिवादन में साधना का पूरा समाचार समाया था। उन्होंने निवास और कुशल के साथ तप, मन की शीतलता, विद्या की सार्थकता और आत्मप्राप्ति के विषय में पूछा।
भास ने आदर से उत्तर दिया, “माननीय साधु, आज मेरा आगमन सचमुच शुभ हुआ, क्योंकि सौभाग्य से आपका दर्शन मिला। आपके मिलने से हृदय प्रसन्न है। फिर भी इस दुःखमय संसार में चक्कर काटते हुए हम लोगों की कुशल कैसे कही जाए?”
विलास के प्रश्न में स्नेह था। भास के उत्तर में वही स्नेह आत्मपरीक्षण की कठोर सच्चाई के साथ उपस्थित हुआ। वे उस कसौटी को सामने रखते गए जिस पर साधना की सफलता परखी जा सकती है।
कुशल का कठिन अर्थ
भास ने कहा, “जब तक जानने योग्य परमात्मतत्त्व का यथार्थ ज्ञान न हो, मन में उठने वाले काम और संकल्प शान्त न हों और संसार-सागर पार न किया जाए, तब तक अपनी कुशल कैसे मानूँ? जब तक चित्त की आशाएँ वैराग्य और आत्मविचार की धार से पूरी तरह न कटें, आत्मज्ञान न उदित हो और समभाव स्थिर न हो, तब तक कुशल कहाँ?”
उनके लिए संसार बार-बार लौटने वाली व्याधि था और ज्ञान उसकी महौषधि। यथार्थ उपचार रोग को शान्त करता है; उसी प्रकार शास्त्र के शब्द को आत्मानुभव तक ले जाने के लिए चित्त की दिशा, आशा की पकड़ और देह के साथ बँधी हुई पहचान को देखना आवश्यक है।
भास ने जीवन की गति को एक वृक्ष के रूप में रखा। यौवनरूपी जल सूखने लगता है। काल की वायु जर्जर जीवन-वृक्ष को हिलाती है, भोगरूपी फूल और दिनरूपी पत्ते झरते जाते हैं। आयु सूखते सरोवर से उड़ते राजहंस की तरह चली जाती है और लौटकर नहीं आती। इस परिवर्तन के बीच तृष्णा देवालय पर फहराती पताका की तरह बढ़ती रह सकती है। देह क्षीण होती है, चाह अपनी पुरानी आदत से चलती रहती है।
उन्होंने मन को मदोन्मत्त हाथी कहा। उस हाथी ने परम पुरुषार्थ के लिए लगाए विवेकरूपी खूँटे को उखाड़ फेंका है। तृष्णारूपी हथिनी के आकर्षण में वह दूर-दूर भटकता है। कभी वही मन चिन्ता के महासागर में पड़ा तिनका है। कर्मों की तरंगें उसे उठाती हैं, चिन्ता के भँवर घुमाते हैं और काम, क्रोध, द्वेष तथा भय की लहरें उसे विश्राम नहीं लेने देतीं।
बुद्धि की दशा भी भास की दृष्टि से छिपी नहीं थी। “मैंने यह किया, यह कर रहा हूँ और आगे यह करूँगा” जैसी कल्पनाओं का जाल बुद्धिरूपी पक्षी को बाँध लेता है। उपलब्धि, भूमिका और कर्म की स्मृति मिलकर कर्ता का एक भारी रूप बना देती हैं। वही रूप मित्र और शत्रु, लाभ और हानि, अपना और पराया जैसी धारणाओं को बार-बार जगाता है।
भास ने देह को एक गहरे कुएँ जैसा भी कहा। उसमें भोगरूपी सर्प, आशारूपी काँटे और तृष्णारूपी जल है। देहरूपी पर्वत की कन्दराओं में विषयों के भयावह आकर्षण बसे हैं। जीव बाहरी क्रियाओं में घूमता रहता है और आयु बीतती जाती है। मन का विषयों की ओर दौड़ना तथा आत्मरूपी चिन्तामणि से दूर रहना उसकी विपत्ति को बढ़ाता है।
उन्होंने आगे कहा कि अहंकाररूपी कीचड़, देहाभिमान की मांसल पकड़ और सुख की कल्पना भीतर के कमल को मलीन कर देते हैं। देह के साथ “मैं” का भाव जुड़ते ही जन्म-मरण और दुःख की पूरी श्रृंखला अपनी लगने लगती है। जिस मन में यह आग्रह ढीला पड़ता है, वह देह के परिवर्तन को दूर से देख सकता है। साक्षीभाव में स्थित व्यक्ति शरीर की दशा को जानता है और उस दशा से आत्मा का स्वरूप नापने की भूल नहीं करता।
भास की वाणी सावधान विवेक से निकली थी। वे अपने सामने खड़े प्रिय मित्र को बताते हैं कि सच्ची कुशल भीतर के अज्ञान के क्षय, आशा की पकड़ के शमन, आत्मज्ञान और समता से पहचानी जाएगी। उम्र, तप का बाहरी रूप और लोगों का सम्मान इस प्रश्न का उत्तर नहीं देते।
अभ्यास से निर्मल ज्ञान
वसिष्ठ ने श्रीराम से कहा कि भास और विलास ने इस प्रकार संसार की असारता और अपनी साधना के विषय में एक-दूसरे से गम्भीर प्रश्न किए। उनके बीच हुई पूछताछ ने साधना की वास्तविक स्थिति को स्पष्ट किया। उसके बाद समय और अभ्यास का क्रम चला।
कुछ काल बीतने पर विवेकपूर्ण ध्यानाभ्यास और संसार से वैराग्य के द्वारा उन्हें निर्मल ज्ञान प्राप्त हुआ। समय आने पर दोनों मोक्षपद को पहुँचे। संवाद में उठा प्रश्न अभ्यास से परिपक्व हुआ और विशुद्ध ज्ञान ने उनकी दीर्घ यात्रा पूर्ण की।
वसिष्ठ इसके बाद देह और आत्मा के सम्बन्ध पर विचार खोलते हैं। देह जड़ है और आत्मा चेतन। दोनों के बीच जो तादात्म्य अनुभव होता है, वह अज्ञान से आरोपित सम्बन्ध है। जल और पत्थर पास रह सकते हैं, फिर भी एक का स्वरूप दूसरा नहीं हो जाता। जल में दिखाई देता प्रतिबिम्ब जल का पदार्थ नहीं बन जाता। इसी तरह शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा व्यवहार में साथ दिखाई देते हुए भी एक ही सत्ता नहीं हो जाते।
सुख और दुःख शुद्ध चेतना अथवा जड़ शरीर में अलग-अलग अपने आप नहीं उठते। देह और आत्मा के तादात्म्य की धारणा से वे “मेरे” अनुभव के रूप में पकड़े जाते हैं। अहंता, ममता और आसक्ति इस पकड़ को दृढ़ करती हैं। वसिष्ठ इन्हें जरा, मरण और मोह के वृक्षों की जड़ कहते हैं।
भीतरी आसक्ति घट जाने पर मनुष्य शरीर-यात्रा के लिए न्याययुक्त कर्म कर सकता है। कर्तापन के आग्रह से मुक्त होकर कर्म अपने उचित क्रम में होते हैं। भीतर विषयासक्ति बनी रहे तो वन का एकान्त और कठिन तप भी मन को मुक्त नहीं करते। भास और विलास की दीर्घ यात्रा इसी शिक्षण को कथा का मानवीय रूप देती है। उनकी मुक्ति विशुद्ध ज्ञान और भीतर की आसक्ति के क्षय की सिद्धि है।