कथा · 05
गाधि का चांडाल-स्वप्न
एक मुनि ने भगवान विष्णु से कहा, “मुझे माया दिखाइए।” अगली डुबकी में, उन्होंने एक पूरा जीवन जी लिया – दूसरे नाम से, दूसरी जात में, दूसरे रिश्तों के साथ। और जब लौटे, तो विष्णु ने कहा, “अभी और देखो।”
मुनि गाधि बहुत पहुँची हुई हस्ती थे। साधारण ब्राह्मण नहीं। बहुत वर्षों तप किया था। शास्त्र पढ़े थे। ध्यान साधा था। उनके आश्रम में कई शिष्य आते थे।
एक दिन भगवान विष्णु प्रसन्न होकर सामने प्रकट हुए। चार भुजाएँ, शंख-चक्र-गदा-पद्म, हलकी पीली रोशनी।
“गाधि, क्या वर चाहिए?”
गाधि ने सोचा। उनके पास सब था – ज्ञान, यश, शिष्य। फिर हाथ जोड़कर बोले, “प्रभु, सब कुछ देख लिया है इस संसार में। बस एक बात बाकी है। आपकी माया। मुझे माया दिखा दीजिए।”
विष्णु मुस्कुराए। एक पल चुप रहे, फिर बोले।
“गाधि, जो माँगा वो मिलेगा। मगर माया देखना सरल नहीं। तुम्हें कुछ अनुभव करना होगा। तथास्तु।”
और अंतर्ध्यान हो गए।
गाधि सोचते रहे, “हुआ क्या? कब दिखेगी माया?”
डुबकी
कुछ देर बाद वो स्नान के लिए नदी पर गए। रोज़ का काम। नदी सुबह की शीतल हवा में बहती थी। पंछी कलरव करते थे।
गाधि ने कमर तक पानी में जाकर खड़े हो गए। हाथ जोड़े। मंत्र पढ़ा। फिर डुबकी लगाई।
पानी में सिर डूबा। एक पल।
डुबकी लगाते ही, अचानक उन्हें होश आया कि वो किसी और जगह हैं।
एक छोटी सी झोपड़ी में। मिट्टी के फर्श पर। बाहर हलकी सी आवाज़ें – बकरियों की, बच्चों की।
एक चांडाल स्त्री उन्हें गोद में लेकर पुचकार रही थी। वो एक बच्चे का शरीर थे। नाम भी कुछ और था। कतंजे।
कतंजे का जीवन
बच्चा बड़ा होने लगा। माँ ने उसे शिकार करना सिखाया। पिता ने धनुष सिखाया। चांडाल जात में पैदा हुआ था कतंजे, तो ब्राह्मण विद्या उससे दूर थी।
दस साल का हुआ। ख़ुद पहली बार शिकार किया – एक छोटा खरगोश। उसका माँस खाया। पहली रोटी ख़ुद कमाई।
पंद्रह का हुआ। एक बड़ा शिकार किया – हिरण। उसके पिता ख़ुश हुए।
बीस का हुआ। पास के चांडाल कबीले की एक लड़की से शादी हुई। नाम सोनाली। बहुत प्यार करती थी।
पहला बच्चा पैदा हुआ। फिर दूसरा। फिर तीसरा। फिर चौथा। फिर पाँचवाँ।
घर भरा-पूरा। मगर ज़िंदगी कठिन थी। शिकार से रोटी मिलती, मगर हमेशा कम। बच्चे थे, पत्नी थी, माँ-पिता थे।
पास के गाँव वाले उसे “चांडाल, चांडाल” कहकर हटा देते। कतंजे को दुख होता मगर वो सहता था।
एक दिन वो बूढ़े पिता के पास बैठा था। पिता बहुत बूढ़े। आँखें कमज़ोर। पिता ने एक कथा सुनाई।
“बेटा, हमारे यहाँ एक मुनि हुए थे, गाधि नाम के। बहुत पहुँचे हुए। उन्होंने भगवान से माया दिखाने को कहा था। पता नहीं उनका क्या हुआ।”
कतंजे को कुछ याद आता हुआ लगा। एक धुँधली सी झलक – वो पानी में डुबकी लगा रहा है। मगर वो याद उसके भीतर डूब-डूब जाती। वो बस अपने जीवन में रह गया।
अकाल
समय और बीता। पिता मरे। माँ मरी। कतंजे की उम्र चालीस की हो गई।
उस साल अकाल पड़ा। बारिश नहीं हुई। शिकार भी नहीं मिलता। जानवर ख़ुद भूखे थे। पेड़ों पर फल नहीं।
कतंजे ने जितना मिल सकता था जुटाया। मगर पाँच बच्चे और दो बड़े – मुश्किल था सबको खिलाना।
पहला बच्चा गया। भूख से। फिर दूसरा। फिर तीसरा। फिर चौथा।
हर बार सोनाली रोई। कतंजे भी रोया। मगर रोने से बच्चे लौटते नहीं।
एक छोटी बेटी बची। पाँच साल की।
सोनाली ने एक रात कहा, “अब तो मेरा भी जी नहीं लग रहा।”
कतंजे ने उसे रोका। मगर सुबह जब उठा, सोनाली ने आग में कूदकर अपनी जान दे दी थी।
कतंजे ने राख देखी। फिर बेटी को सीने से लगाया। बहुत देर तक रोया।
अंतिम क़दम
कुछ दिन बाद कतंजे ने सोचा – “अब क्या बचा है? बेटी भी कमज़ोर है। शायद कल वो भी जाए। मैं भी जा रहा हूँ।”
उसने बेटी को पास के एक मंदिर में छोड़ा। पुजारी से कहा, “बेटी का कुछ कर लेना।” पुजारी ने मान लिया।
कतंजे लौटा अपनी झोपड़ी। आग जलाई। उसके पास खड़ा हो गया।
“मेरा सब चला गया। पत्नी, बच्चे, पिता, माँ। मेरे जैसे चांडाल का क्या जीना? मैं भी जा रहा हूँ।”
उसने पैर बढ़ाया आग की ओर।
जैसे ही आग ने उसे छुआ, सब कुछ धुँधला हो गया।
वापसी
मुनि गाधि की आँख खुली।
वो नदी में थे। डुबकी लगाए हुए। पानी अभी उनके सिर पर था। उन्होंने सिर ऊपर निकाला। साँस ली।
एक पल। बस इतना।
मगर भीतर उन्होंने एक पूरा जीवन जिया था। चालीस साल। पाँच बच्चे, एक पत्नी। शादी, शिकार, अकाल, मृत्यु।
तभी पीछे से आवाज़ आई। विष्णु प्रकट हुए।
“देखी मेरी माया?”
गाधि के होश उड़ गए। वो काँप रहे थे। अभी भी उनके मन में कतंजे का दर्द बचा हुआ था। बच्चों की मौत, सोनाली की चिता, बेटी का चेहरा – सब असली।
“प्रभु, यह क्या हुआ?”
“माया दिखाई। एक डुबकी में पूरा जीवन।”
“और प्रभु, मैंने जो जिया – वो असली था या नकली?”
विष्णु मुस्कुराए। “देखो।”
दूसरा रहस्य
विष्णु ने अपनी आँखों से एक दूर के देश में दिखाया।
एक चांडाल कबीले में लोग रोते थे। उन्होंने अभी-अभी एक आदमी को खोया था। नाम था कतंजे। चालीस की उम्र में, एक झोपड़ी में, ख़ुद को आग में डाला था। पाँच बच्चे, सब मर चुके थे। पत्नी पहले गई थी। बस एक छोटी बेटी बची थी, जो मंदिर में पाली जा रही थी।
गाधि के होश उड़ गए।
“प्रभु, यह…”
“हाँ। तुम्हारा स्वप्न केवल कल्पना नहीं था। मन की रचनाएँ कहीं न कहीं असली भी हो जाती हैं।
“तुमने डुबकी में जो जीवन जिया, वो ठीक उस तरह से कहीं और भी हो रहा था। दो जगहों पर – तुम्हारे मन में, और एक असली कबीले में।
“माया का यही रहस्य है। जो भीतर है, वो बाहर भी है। जो बाहर है, वो भीतर भी है। दोनों एक चेतना के दो रूप।”
गाधि ने हाथ जोड़ लिए।
“प्रभु, अब मुझे माया से छुटकारा भी दीजिए।”
विष्णु ने कहा, “जो जान गया कि माया है, वो माया से बाहर है।
“मगर एक बात याद रखना – माया से बाहर होने का मतलब माया को दबाना नहीं। माया का साक्षी बनना है। जो भी हो रहा है – बाहर हो या भीतर हो – उसे देखो। जब तुम देख रहे हो, तो तुम माया में नहीं हो।”
गाधि ने सिर झुकाया। विष्णु अंतर्ध्यान हो गए।
गाधि नदी से बाहर निकले। उनके कपड़े गीले थे। शरीर ब्राह्मण का था। मगर उनकी आँखों में एक चांडाल का दर्द भी बच गया था।
आगे की ज़िंदगी में वो ब्राह्मण-चांडाल भेद नहीं करते थे। उनके आश्रम में हर जात के लोग आते। कोई पूछता क्यों, तो वो कहते – “मैंने एक डुबकी में चांडाल जीवन जिया है। हम सब एक ही हैं।”
वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, गाधि की कथा हर साधक की कथा है। एक डुबकी, एक पल, एक जीवन। अंतर है तो बस इतना – कौन जागा, कौन सोया रहा।
“और एक बड़ी बात – हम जिसे ‘मेरा जीवन’ कहते हैं, वो शायद किसी और का स्वप्न भी हो सकता है। और हमारा कोई स्वप्न शायद कहीं किसी का असली जीवन।”
← सब कथाएँ