कथा · 5
गाधि का चाण्डाल-स्वप्न: दो मुहूर्त और अनेक वर्ष
कोशल के ब्राह्मण गाधि ने विष्णु से उनकी माया देखने का वर माँगा। बाद में तालाब में डुबकी लगाते ही उन्होंने अपनी मृत्यु, चाण्डाल-जन्म, परिवार, राजपद और अग्नि-प्रवेश तक का पूरा जीवन देखा। जल से उठे तो दो मुहूर्त भी पूरे न हुए थे। कठिन प्रश्न तब उठा, जब दूर देशों के लोगों ने उसी जीवन को अपना इतिहास बताकर सुना दिया।
माया देखने का वर
वसिष्ठ श्रीराम से कहते हैं कि संसार के रूप में दिखाई देने वाली माया का विस्तार मापा नहीं जा सकता। चित्त अपने ही संकल्पों से जितने रूप ग्रहण करता है, अनुभव उतनी ही दिशाओं में फैलता जाता है। यह बात समझाने के लिए वे कोशल देश के गाधि का इतिहास सुनाते हैं। गाधि वेदों में प्रवीण, विवेकी, गुणवान और आरम्भ से वैराग्य की ओर झुके हुए ब्राह्मण थे। सुनी हुई व्याख्या से उनकी जिज्ञासा शान्त नहीं हुई। वे माया को प्रत्यक्ष देखना चाहते थे।
एक समय गाधि किसी अभीष्ट साधना का निश्चय करके वन में गए। वहाँ उन्हें खिले हुए कमलों से भरा एक तालाब मिला। उन्होंने ठान लिया कि भगवान विष्णु का दर्शन होने तक जल से बाहर नहीं आएँगे। वे गले तक पानी में डूबे रहे। दिन और रात बीतते गए। सूर्य ढलता तो तालाब के कमल सिकुड़ते, प्रभात होता तो फिर खिल उठते। इसी क्रम में आठ मास व्यतीत हो गए। तप से शरीर कृश हो चुका था, पर नियम शिथिल नहीं पड़ा।
आठवें मास के बाद श्रीहरि उनके सामने प्रकट हुए। उन्होंने कहा, “विप्र, जल से उठिए और मनचाहा वर माँगिए। आपके नियमरूपी वृक्ष पर फल आ चुका है।”
गाधि ने हाथ जोड़कर निवेदन किया, “भगवन्, असंख्य जीवों के हृदय-कमलों के मध्य आप भ्रमर की तरह विराजते हैं। त्रिलोकी जिन कमलों की भाँति खिलती है, आप उनके आश्रय हैं। मेरी इच्छा आपकी उस अद्भुत माया को देखने की है, जिससे यह जगत रचा हुआ दिखाई देता है।”
विष्णु ने उत्तर दिया, “तुम मेरी माया देखोगे। उसे देखने के बाद उसका त्याग भी करोगे।” इतना कहकर वे अन्तर्धान हो गए। गाधि प्रसन्न होकर जल से बाहर निकले। चलते, बैठते, स्वाध्याय करते और अपने नित्य कर्म निभाते समय उनके मन में वही वर बना रहता। वे प्रतीक्षा करते कि माया का दर्शन किस रूप में आएगा।
कुछ समय बाद वे उसी तालाब में स्नान करने उतरे। अघमर्षण की विधि से पापों के क्षय का मन्त्र स्मरण करते हुए उन्होंने डुबकी लगाई। जल के भीतर उनके ध्यान का क्रम उलट गया। मन्त्र भूल गया, वर्तमान स्थान की पहचान हट गई और चेतना के सामने दूसरा दृश्य खुल गया।
उन्होंने अपने को अपने ही घर में मृत पड़ा देखा। शरीर निश्चेष्ट था, मुख की कान्ति उतर चुकी थी और बन्धु चारों ओर बैठकर रो रहे थे। माँ ने उन्हें पकड़ रखा था। परिवार के लोग उस देह को उठाकर श्मशान ले गए, चिता पर रखा और अग्नि को सौंप दिया। फिर घर लौटकर उन्होंने क्रियाकर्म किया। गाधि केवल मृत्यु का दृश्य नहीं देख रहे थे। उस अनुभव में मृत शरीर उन्हीं का था, शोक करने वाले उन्हीं के अपने थे और दाह के साथ उनका पुराना जीवन सचमुच समाप्त हो चुका था।
भूतमण्डल में कटंज का जीवन
उस अन्त के तुरन्त बाद अनुभव ने नया आरम्भ ग्रहण किया। गाधि ने अपने को भूतमण्डल की सीमा पर बसे चाण्डालों के एक गाँव में, एक चाण्डाल स्त्री के गर्भ में पाया। गर्भवास का कष्ट आया, फिर जन्म हुआ। बालक साँवला था और उसके अंग कोमल थे। माँ ने उसे स्नेह से पाला। बारह वर्ष की अवस्था तक वह समुदाय के कामों में हाथ बँटाने लगा। सोलह वर्ष की आयु में उसके कन्धे पुष्ट हो चुके थे और शरीर उभरते मेघ की तरह विशाल दिखाई देता था। उसका नाम कटंज था।

वह कुत्तों को साथ लेकर एक वन से दूसरे वन में शिकार करता फिरता और असंख्य मृग मारता। जंगल के कुंज उसके विश्राम-स्थान थे, पर्वत की गुफाओं में वह सोता और पत्तों की ओट में छिपता। कर्णाभूषण, जूही की मालाएँ, केवड़े के पुष्प और आम की बौर से बने वनवासी अलंकरण उसके परिचित संसार का भाग थे। वह अपने समुदाय के व्यवहार में पूरी तरह रमा हुआ शिकारी था।
यौवन आने पर उसने एक चाण्डाल कन्या से विवाह किया। उनके पुत्र हुए और परिवार बढ़ा। पहले वह स्त्री और बच्चों के साथ गृहस्थ रहा, फिर आयु ढलने लगी। दुर्भिक्ष और मृत्यु ने उसके बन्धुओं को एक-एक करके छीन लिया। कभी लोगों से भरा रहने वाला घर उजड़ गया। वृद्ध शिकारी अकेला रह गया और शोक से उसका मन भारी हो उठा।
उसने अपनी जन्मभूमि छोड़ दी। बहुत से स्थानों में भटकते हुए वह उत्तर दिशा के सम्पन्न कीरदेश पहुँचा। उसकी राजधानी चौड़े मार्गों, रत्नों, वस्त्रों, लताओं और उत्सव-सामग्री से सजी हुई थी। जब यह थका हुआ पथिक वहाँ पहुँचा, उसी समय राज्य का सिंहासन रिक्त था। राजा का देहान्त हो चुका था और उत्तराधिकारी चुनने के लिए मंगल-हाथी नगर में घूम रहा था।
राज्य के लोगों ने हाथी को इस संकेत के साथ छोड़ा था कि वह जिस पुरुष को स्वीकार करे, वही नया राजा माना जाए। वह विशाल हाथी पथिक के पास आया, उसे सूँड से उठाया और आदर के साथ अपने गण्डस्थल पर बैठा लिया। नगाड़े और तुरहियाँ बज उठीं। मन्त्री और नागरिक एकत्र हुए। उन्होंने उसे स्नान कराया, आभूषण और राजवस्त्र पहनाए, फिर विधिपूर्वक अभिषेक किया। राजमहल में उसका नाम गालव रखा गया। भूतमण्डल का वृद्ध चाण्डाल अब कीरदेश का अधिपति था।

आठ वर्ष का राज्य और अग्नि
गालव ने आठ वर्ष तक राज्य किया। उसके मन्त्री व्यवस्था सँभालते रहे, दिशाओं में उसकी आज्ञा चली और वह अन्तःपुर तथा राजसभा के वैभव में रहने लगा। धीरे-धीरे उसका पूर्व जीवन स्मृति के पीछे चला गया। दया, दाक्षिण्य और शौर्य जैसी राजोचित वृत्तियाँ उसके व्यवहार में दिखाई देने लगीं। राजपद अब अभिनय नहीं रहा था। वह उसकी दिनचर्या और पहचान बन चुका था।
एक दिन उसके मन में आया कि राजा के तेज को वस्त्रों और आभूषणों की आवश्यकता क्या है। उसने अलंकरण उतार दिए और अपने सहज श्याम शरीर में, अकेला, अन्तःपुर से बाहर आ खड़ा हुआ। उसी समय चाण्डालों का एक दल मार्ग से निकला। उनमें लाल नेत्रों और सफेद बालों वाला एक बूढ़ा नेता था। उसने राजा को पहचान लिया और अपने समुदाय के पुराने गायक कटंज को अत्यन्त अपनत्व से पुकारा।
वृद्ध ने कहा, “भाई, इतने दिनों से कहाँ थे? हमें छोड़कर यहाँ सुख भोग रहे हो। तुम्हारा कण्ठ मधुर था; राजा ने तुम्हारे गायन से प्रसन्न होकर बहुत धन दिया होगा।” राजा ने नेत्र और हाथ के संकेत से उसे चुप रहने को कहा। बूढ़ा अर्थ न समझा और निकट आता गया। उसने अपने पूर्व परिचित से मिलने की सहज प्रसन्नता में बात जारी रखी।

झरोखों में बैठी स्त्रियों, मन्त्रियों और सेवकों ने वार्ता सुन ली। उन्हें ज्ञात हुआ कि जिस पुरुष को मंगल-हाथी ने चुना और जिसे आठ वर्ष तक उन्होंने राजा माना, वह चाण्डाल समुदाय में जन्मा कटंज था। अन्तःपुर में शोक फैल गया। नगर में बात पहुँची तो सामाजिक भय ने विकराल रूप ग्रहण कर लिया। ब्राह्मण, क्षत्रिय, मन्त्री और नागरिक विचार करने लगे कि राजा के साथ भोजन, स्पर्श और व्यवहार से वे दूषित हो गए हैं और साधारण प्रायश्चित्त से शुद्धि सम्भव नहीं होगी।
नगर के चारों ओर चिताएँ बनाई गईं। लोग अपने पुत्र, पत्नी और बन्धुओं को छोड़कर अग्नि में प्रवेश करने लगे। आकाश धुएँ से भर गया, दिशाओं में विलाप सुनाई दिया और राज्य की व्यवस्था टूट गई। जिन लोगों ने आठ वर्ष तक राजा पर विश्वास किया था, वे अब उसके जन्म को ऐसी विपत्ति मान रहे थे जिससे उन्हें मृत्यु ही बचा सकती थी। उनकी सामूहिक धारणा पूरे नगर के लिए घातक शक्ति बन गई।

गालव ने अन्तःपुर से यह विपत्ति देखी। उसने सोचा कि उसके जीवन से इतना अनर्थ उठ रहा है तो मृत्यु ही उचित है। उसने भी चिता बनवाई और जलती हुई अग्नि में प्रवेश कर गया। ज्यों ही ज्वाला ने उसके शरीर को छुआ, तालाब में डुबकी लगाए गाधि का सिर जल से बाहर निकला। उनका ब्राह्मण शरीर उसी स्थान पर था। स्नान की विधि अधूरी थी। बाहर के समय में लगभग दो मुहूर्त बीते थे, जबकि भीतर जन्म से वृद्धावस्था, आठ वर्ष का राज्य और अग्नि में मृत्यु तक का दीर्घ जीवन घट चुका था।

दोनों समय-क्रम एक ही क्षण में उनके सामने थे। तालाब के कमल, किनारा और अधूरा अनुष्ठान बता रहे थे कि वे कहीं गए ही नहीं; चाण्डाल-जीवन की स्मृतियाँ बता रही थीं कि उन्होंने पूरा जन्म जिया है। बचपन की देह, वन में घूमते कुत्ते, परिवार का बढ़ना और उजड़ना, राजमहल की दिनचर्या तथा अग्नि की तपन किसी दूर सुनी कथा की तरह नहीं आती थीं। वे सब उनके अपने अनुभव की निरन्तर कड़ियाँ थीं। इसी कारण जल से उठ जाना संशय का अन्त नहीं बना। असली उलझन अब आरम्भ हुई: चेतना इतनी छोटी अवधि में जीवन की पूरी काल-व्यवस्था कैसे रच सकती है, और उस रचना की आत्मीयता जागने के बाद भी इतनी प्रबल क्यों बनी रहती है?
गाधि तत्काल पूरी तरह सावधान नहीं हुए। दिन ढलने पर वसिष्ठ के आश्रम की सभा भी विराम लेती है। अगले प्रातः कथा फिर आरम्भ होती है। गाधि ने जल से निकलकर अपने को सँभाला, शेष स्नान, तर्पण और नित्य कर्म पूरे किए। उन्हें स्मरण आया कि ब्राह्मण जीवन में वे अविवाहित हैं। उनके माता-पिता बाल्यकाल में ही गुजर चुके थे और मातृकुल के बन्धु दूर रहते थे। चाण्डाल पत्नी, पुत्र, कुटुम्ब और राजपरिवार उस वर्तमान जीवन के सम्बन्ध नहीं थे। फिर भी उनका अनुभव साधारण स्वप्न की धुँधली स्मृति जैसा नहीं था। हर घटना उन्हें बीते जीवन की तरह स्पष्ट याद थी।
अतिथि की बात और पहली जाँच
गाधि कुछ दिन अपने आश्रम में रहे। एक दिन थका हुआ ब्राह्मण अतिथि वहाँ आया। गाधि ने फल, फूल, रस और भोजन से उसका सत्कार किया। दोनों ने सन्ध्यावन्दन और जप किया, फिर रात को शय्या पर बैठे बातचीत करने लगे। प्रसंगवश गाधि ने पूछा कि वह इतना दुर्बल और थका हुआ क्यों है।
अतिथि ने कहा, “उत्तर दिशा में कीर नाम का एक विशाल, समृद्ध देश है। मैं वहाँ के लोगों से सम्मान पाता हुआ एक मास रहा। बातचीत में मुझे मालूम हुआ कि उस देश में आठ वर्ष तक एक चाण्डाल राजा रहा था। जब उसका जन्म-वृत्तान्त खुला तो नागरिक अग्नि में प्रविष्ट हुए और अन्त में राजा भी जल गया। उस देश में रहने के कारण मुझे अपने आचरण पर ग्लानि हुई। मैं वहाँ से निकलकर प्रयाग गया और प्रायश्चित्त किया। आज मेरा तीसरा चान्द्रायण पूरा हुआ है। पारणा के बाद यहाँ पहुँचा हूँ, इसलिए शरीर कृश और थका हुआ है।”
गाधि ने बात फिर पूछी। अतिथि ने वही उत्तर दिया। उस रात गाधि को नींद नहीं आई। जल में देखा हुआ जीवन उनके भीतर ही घटा था, फिर यह आगन्तुक उसी राज्य और उसी आठ-वर्षीय राजा का समाचार कहाँ से लाया? प्रातः अतिथि चला गया तो गाधि ने निश्चय किया कि वे स्वयं उन स्थानों को देखेंगे।
वे पहले भूतमण्डल की सीमा पर उस गाँव में पहुँचे, जहाँ अपने चाण्डाल-जन्म का अनुभव हुआ था। उन्होंने पुराना घर देखा। दीवारें टूट चुकी थीं, छप्पर का कुछ भाग गिर गया था और भीतर घरेलू वस्तुओं के अवशेष पड़े थे। पशुओं की सफेद हड्डियाँ, जर्जर पात्र और वे स्थान जहाँ भोजन, मद्यपान तथा बालकों के खेल की स्मृति जुड़ी थी, उन्हें पहचान में आए। दृश्य ने उनके मन में वैराग्य और विस्मय दोनों बढ़ा दिए।
उन्होंने गाँववालों से पूछा, “क्या यहाँ पहले कोई विशालकाय चाण्डाल रहता था?”
लोगों ने उत्तर दिया, “यहाँ कटंज नाम का एक चाण्डाल हुआ था। उसका बड़ा परिवार था। काल ने उसके पुत्र, पौत्र, मित्र और बन्धु नष्ट कर दिए। वह देश छोड़कर कीरदेश गया, वहाँ आठ वर्ष राजा रहा और पहचान खुलने पर अग्नि में प्रवेश कर गया।”
गाधि एक व्यक्ति की बात पर नहीं रुके। वे बार-बार अलग लोगों से पूछते और वही क्रम सुनते। उन्होंने गाँव में एक मास बिताया। जिन क्रियाओं को अपना अनुभव मानते थे, उनके चिह्न और जनस्मृति सामने थे। फिर वे वहाँ से चले। नदियाँ, पर्वत, जंगल और बहुत से प्रदेश पार करके वे हिमालय के मध्य से होते हुए उत्तर के कीरदेश पहुँचे।
नगर में उन्होंने महल, मार्ग, भवन, बगीचे और वे स्थान देखे जिन्हें राजरूप में भोगा हुआ समझते थे। नागरिकों से पूछा तो उत्तर मिला, “यहाँ मंगल-हाथी ने एक चाण्डाल को राजा चुना था। उसने आठ वर्ष राज्य किया। जन्म खुलने पर लोग अग्नि में जले और वह भी चिता में प्रविष्ट हुआ। उस घटना को अब बारह वर्ष बीत चुके हैं।” अनेक लोगों ने यही बात कही। गाधि ने सेना को महल से निकलते देखा, राजपरिवार की स्त्रियों को पहचाना और उन भवनों पर दृष्टि डाली जिनसे उनका अनुभव जुड़ा था। बाहरी प्रमाण बढ़ते गए और उनका संशय भी गहरा होता गया।
गाधि नगर छोड़कर पर्वत की एक गुफा में जा बैठे। उन्होंने अन्न त्याग दिया और केवल चुल्लूभर पानी पीते हुए विष्णु की आराधना की। इस कठोर नियम में डेढ़ वर्ष बीत गया। तब भगवान उनके सामने प्रकट हुए और बोले, “गाधि, तुमने मेरी माया और उससे बना संसार-जाल देख लिया। अब क्या चाहते हो?”

विष्णु के सामने पहला संशय
गाधि ने निवेदन किया, “भगवन्, जल के भीतर मुझे दो मुहूर्त के समय में अनेक वर्षों का जीवन दिखाई दिया। वह स्वप्न जैसा था, फिर उसके घर, गाँव, राज्य और लोगों की स्मृति बाहर भी मिली। मन में उत्पन्न चाण्डाल-शरीर का जन्म और नाश दूर देशों में इतिहास की तरह कैसे उपस्थित हुआ?”
विष्णु ने कहा कि दृश्य संसार उस चित्त का अनुभव है जो तत्त्वज्ञान के अभाव में वासनाओं से व्याकुल रहता है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश और उनके भीतर फैले असंख्य पदार्थ चित्त में वैसे स्थित रहते हैं जैसे बीज में शाखा, पत्ता, फूल और फल की सम्भावना रहती है। बीज फूटता है तो छिपा विस्तार सामने आता है। चित्त दृश्य की ओर स्पन्दित होता है तो काल, स्थान और वस्तुओं का विस्तृत क्रम अनुभव में प्रकट होता है।
भगवान ने गाधि के हर प्रमाण को उसी क्रम में रखा। मृत ब्राह्मण देह, चाण्डाल-गर्भ, कटंज का घर, भूतमण्डल, कीरनगर और लोगों के कथन, सब चित्त की रचना के भीतर अनुभूत हुए। घर और नगर का दिखाई देना, तथा अनेक लोगों से एक-सा उत्तर सुनना, अनुभव को व्यवहार में ठोस बनाता है। फिर भी प्रत्येक प्रमाण चेतना में ही जाना जाता है। अपनी संगति के कारण कोई दृश्य माया की सीमा से बाहर नहीं चला जाता।
विष्णु ने उन्हें अपने ब्राह्मणोचित कर्म करने और चित्त को स्थिर करने का उपदेश दिया। वे अन्तर्धान हो गए। गाधि का प्रश्न फिर भी समाप्त नहीं हुआ। अनुभव इतना स्पष्ट था कि उसे केवल शब्दों से छोड़ देना उनके लिए सम्भव नहीं हुआ। वे छः महीने तक फिर भूतमण्डल और कीरदेश में घूमे। उन्होंने लोगों से प्रश्न किए और पुनः वही इतिहास सुना।
दूसरी जाँच के बाद गाधि पर्वत पर लौटे और विष्णु की आराधना की। थोड़े समय में भगवान फिर प्रकट हुए। गाधि ने कहा, “प्रभो, आपने इसे माया कहा, पर दोनों देशों के लोग कटंज का वही वृत्तान्त बताते हैं। महात्माओं का वचन मोह हटाता है। कृपा करके समझाइए कि बहुत से लोगों की एक-सी स्मृति भी भ्रम के भीतर कैसे रह सकती है।”
कटंज कौन था
विष्णु ने इस बार प्रश्न की गाँठ सीधे खोली। उन्होंने कहा कि भूतमण्डल में कटंज नाम का एक चाण्डाल पहले सचमुच हुआ था। उसका रूप वैसा ही था जैसा गाधि ने देखा। उसका कुटुम्ब नष्ट हुआ, वह दूसरे देश गया, कीरदेश का अधिपति बना और अन्त में अग्नि में प्रवेश कर गया। गाधि उस पुरुष का पुनर्जन्म नहीं थे। जल में डूबे उनके मन ने कटंज के आचार और जीवन-क्रम को अपना मानकर अनुभव किया था। “यह कटंज चाण्डाल और था,” विष्णु ने स्पष्ट किया।
गाधि ने जिस घर को “मेरा घर”, जिस स्त्री को “मेरी पत्नी” और जिन पुत्रों को “मेरा परिवार” समझा, उनमें आत्मीयता का अभिमान चित्त ने जोड़ा। उसी अभिमान ने दूसरे का इतिहास आत्मकथा बना दिया। मन कभी देखी हुई वस्तु भूल जाता है और कभी न देखी हुई वस्तु को पूर्वदृष्ट की तरह सामने रख देता है। स्वप्न, मनोरथ, ज्वर और संनिपात में यह शक्ति आसानी से दिखाई देती है। त्रिकालदर्शी योगी को भविष्य का दृश्य वर्तमान की तरह स्पष्ट हो सकता है। गाधि के अशान्त चित्त में अतीत कटंज का रूप ऐसी ही वर्तमान प्रतिभा बन गया।

लोगों की एक-सी गवाही पर विष्णु ने कहा कि समान संस्कार समान प्रतिभास उत्पन्न कर सकते हैं। रस्सी को सर्प मानने वाला एक मन दूसरे मन की भूल को असम्भव नहीं बनाता। बहुत से बालक एक साथ खेलते हुए एक ही कल्पित नगर की रचना कर सकते हैं। सैनिकों की एक-सी जय, भय या लाभ की धारणा उन्हें एक साथ युद्ध में लगा देती है। सामूहिक अनुभव की संगति व्यवहार के स्तर पर प्रभावी होती है, फिर भी उसका आधार संकल्प और काल की मान्यता में रहता है।
काल भी इस व्यवस्था से अलग खड़ी कोई वस्तु नहीं है। सूर्य की गति, चन्द्रमा की कला और जन्म से जुड़ी गणना के सहारे वर्ष, ऋतु और युग का बोध बनता है। स्वप्न में थोड़ी देर अनेक वर्षों जैसी लग सकती है। रोगी को छोटा समय दीर्घ अनुभव होता है, सुख में बीता बड़ा समय छोटा जान पड़ता है। गाधि के लिए दो मुहूर्त में कटंज का जीवन खुला; कीरदेश के लोगों की स्मृति में वही इतिहास अपने वर्षों और बारह-वर्षीय दूरी के साथ व्यवस्थित था। विष्णु दोनों को चित्त और संस्कार के एक ही व्यापक क्षेत्र में रखते हैं।
इस उत्तर में घटना की पूरी गम्भीरता बनी रहती है। कटंज का जीवन, नगर का विनाश, लोगों का भय और गाधि की व्याकुलता अपने-अपने अनुभव में परिणाम उत्पन्न करते हैं। भगवान गाधि से कहते हैं कि बार-बार दृश्य की जाँच करते रहने से संशय का मूल नहीं कटेगा। संशय उस चित्त में घूम रहा है जो हर नये प्रमाण को अपने पुराने आग्रह के साथ ग्रहण करता है। अब जाँच की दिशा बाहर के घरों और नगरों से हटाकर उसी ग्रहण करने वाले मन की ओर करनी होगी।
ऋष्यमूक पर दस वर्ष
विष्णु ने गाधि से कहा, “उठो। पर्वत के कुंज में दस वर्ष तक अखिन्न बुद्धि से चित्त-निरोध का अभ्यास करो। तब अनन्त ज्ञान प्राप्त होगा।” यह आदेश कथा को एक निर्णायक दिशा देता है। गाधि को नया दृश्य माँगने, कटंज के परिवार को खोजने या कीरदेश की स्मृतियों को फिर परखने के लिए नहीं भेजा गया। उन्हें संकल्पों की उस गति को समझना था, जो दूसरे के जीवन को अपना बना लेती है और फिर अपने बनाए प्रमाणों के पीछे दौड़ती है।
गाधि ऋष्यमूक पर्वत गए। उन्होंने सब संकल्पों का त्याग करके मन और इन्द्रियों के संयम का अभ्यास किया। दस वर्ष की तपस्या के बाद उन्हें आत्मज्ञान प्राप्त हुआ। वे अपनी पारमार्थिक सत्ता में प्रतिष्ठित हुए, भय और शोक से मुक्त हुए और जीवन्मुक्त अवस्था में विचरण करने लगे।
इन दस वर्षों में कोई नया चमत्कार नहीं घटा। गाधि ने पहले आठ मास विष्णु के दर्शन के लिए जल में तप किया था और बाद में डेढ़ वर्ष अपने अनुभव की व्याख्या पाने के लिए कठोर आराधना की थी। ऋष्यमूक का नियम अलग उद्देश्य से आरम्भ हुआ। अब साधना का केन्द्र निरन्तर चित्त-संयम और देखने वाली वृत्ति की शान्ति था। कटंज की स्मृति, बाहरी गवाहियों और समय की असंगति ने जिस भय को जन्म दिया था, उसका आधार इसी शान्ति में खुला। कथा की सबसे लम्बी साधना का फल अपने स्वरूप में स्थिरता था।
अगले सर्ग में वसिष्ठ श्रीराम को बताते हैं कि यह आख्यान माया की विषमता दिखाने के लिए कहा गया। दो मुहूर्त और अनेक वर्षों का अन्तर, निजी अनुभव और सार्वजनिक इतिहास का मेल, तथा एक जीवन का दूसरे मन में अपना बनकर उठना, सब चित्त की चपलता के रूप हैं। संसार-चक्र की नाभि चित्त है। नाभि स्थिर हो तो चक्र की गति रुकती है। सत्संग, शास्त्र-विचार और निरन्तर अभ्यास से चित्त आत्मपद में विश्राम पाता है। गाधि की कथा का उत्तर इसी अभ्यास में पूरा होता है।