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उद्दालक: मन, प्रणव और सत्ता-सामान्य

कथा · 14

उद्दालक: मन, प्रणव और सत्ता-सामान्य

गन्धमादन की एक दुर्गम कन्दरा में अल्पवय उद्दालक अपने चंचल मन से प्रश्न करते हैं। पाँच इन्द्रियों से आरम्भ हुआ उनका विचार देह, अहंकार और वासना की जड़ तक पहुँचता है। प्रणव के तीन उच्चरित अंशों और अर्धमात्रा के ध्यान से वे उस स्थिरता में प्रवेश करते हैं जो समाधि और व्यवहार, दोनों में समान बनी रहती है।

अधूरी जागृति

वसिष्ठ ने श्रीराम से कहा, “तुम्हारा स्वरूप शुद्ध बोध है और पंचमहाभूतों से बना यह शरीर उसका दृश्य विषय है। इसी बोध से विचार करो और देह में जमी आत्मबुद्धि को शान्त होने दो।”

श्रीराम ने पूछा, “गुरुदेव, उद्दालक ने किस क्रम से यह अभिमान छोड़ा और परम विश्रान्ति पाई?”

वसिष्ठ ने उत्तर दिया, “गन्धमादन पर्वत के एक रमणीय प्रदेश में उद्दालक नाम के ब्राह्मण मुनि रहते थे। उनकी बुद्धि उदार थी, तप में रुचि थी और अन्तःकरण शुभ संस्कारों से सम्पन्न था। अभी युवावस्था भी नहीं आई थी। विवेक का उदय हो चुका था, फिर भी परम पद में उनकी स्थिति दृढ़ नहीं हुई थी। इसलिए उन्हें अर्धप्रबुद्ध कहा गया है।”

शास्त्र के अध्ययन, नियम और तप के परिपाक से उनके भीतर एक आग्रह गहरा होने लगा। एकान्त में बैठकर वे सोचते, “वह कौन-सा पद है जिसे पा लेने पर फिर कुछ पाना शेष नहीं रहता? मन के सारे व्यापार छोड़कर मैं स्थायी विश्राम कब पाऊँगा? इच्छा की तरंगें कब शान्त होंगी? तृष्णा की नदी को विवेक की नौका से कब पार करूँगा? ज्ञान का प्रकाश इस पुराने अज्ञान को कब समाप्त करेगा?”

वे ऐसी स्थिरता चाहते थे जिसमें अनुकूल और प्रतिकूल अनुभव चित्त को हिला न सकें। कभी वे कल्पना करते कि निर्विकल्प समाधि में उनका शरीर शिला जैसा निश्चल हो और वन की चिड़ियाँ उनके मस्तक अथवा वक्ष पर निःशंक बैठ जाएँ। यह उस समय उनकी अभिलाषा थी और साधना अभी उस दशा तक नहीं पहुँची थी।

उद्दालक बार बार ध्यान में बैठते। चित्त किसी दृश्य की ओर दौड़ जाता। बाहरी विषयों से हटाते तो भीतर स्मृति और कल्पना का संसार उठ खड़ा होता। उसे भी रोकते तो मन निद्रा अथवा लय में डूब जाता। चित्त कभी विषयों में भटकता और कभी अचेत-सी जड़ता में डूबता; जाग्रत और निर्मल ध्यान टिक नहीं पा रहा था।

इस अस्थिरता से व्याकुल होकर वे पर्वत पर विचरने लगे। बहुत खोज के बाद गन्धमादन की एक ऐसी कन्दरा मिली जहाँ प्राणियों का आना-जाना नहीं था। पशु और पक्षी वहाँ नहीं पहुँचते थे। देवताओं और गन्धर्वों के लिए भी वह स्थान दुर्लभ कहा गया है। भीतर का वातावरण न बहुत उजला था, न गहरा अँधेरा; न अधिक गरम, न अधिक ठंडा। कार्तिक के सुहावने समय जैसी शीतलता थी और द्वार पर मन्द प्रकाश ठहरा रहता था।

उन्होंने तमाल के पत्तों और कमलों से आसन बनाया, उसके ऊपर मृगचर्म बिछाया और उत्तर की ओर मुख करके स्थिर आसन में बैठ गए। संसार से दूर मिली उस नीरवता में अब उन्हें अपने ही मन की आवाजाही स्पष्ट सुनाई दे रही थी।

कन्दरा में मन से संवाद

उद्दालक ने भीतर कहा, “मन, इतने समय तक भटककर तुम्हें क्या मिला? जिन भोगों को सुख समझकर तुम दौड़ते हो, उनके पीछे चिन्ता, क्षय और फिर नई इच्छा चली आती है। तुम्हारा हर संकल्प अपनी एक डोरी बनाता है। रेशम का कीड़ा जिस तन्तु को स्वयं निकालता है, उसी का कोश उसे घेर लेता है। तुम्हारी वासनाएँ भी ऐसा ही आवरण बुनती हैं।”

फिर उन्होंने पाँच इन्द्रियों का व्यापार देखा। शब्द के आकर्षण में मृग शिकारी के गीत और घण्टी की ध्वनि की ओर खिंचता है। स्पर्श की लालसा हाथी को प्रशिक्षित हथिनी के पीछे बने गर्त तक ले जाती है। स्वाद मछली को काँटे पर लगे चारे में फँसा देता है। रूप पतंगे को लौ तक खींचता है। सुगन्ध के लोभ में भँवरा कमल के भीतर रह जाता है और पंखुड़ियाँ बन्द होने पर वहीं कैद हो जाता है।

“इनमें से प्रत्येक जीव एक विषय के कारण संकट में पड़ता है,” उद्दालक ने मन से कहा, “और तुम पाँचों की ओर एक साथ दौड़ते हो। तुम्हारी शान्ति कैसे टिकेगी?”

इस प्रश्न ने इन्द्रियों के अलग अलग स्वभाव को स्पष्ट किया। नेत्र रूप ग्रहण करते हैं और उनमें तेज का अंश कार्य करता है। श्रवण का सम्बन्ध शब्द और आकाश से है। त्वचा स्पर्श को वायु के माध्यम से जानती है। जिह्वा रस को जल के गुण से ग्रहण करती है। घ्राण में पृथ्वी का गन्ध-गुण प्रकट होता है। प्रत्येक इन्द्रिय अपने विषय में प्रवृत्त होती है। नेत्र सुनते नहीं, कान देखते नहीं और जिह्वा गन्ध नहीं लेती।

कठिनाई वहाँ उठती है जहाँ मन इन स्वाभाविक क्रियाओं को अपने नाम से बाँध लेता है। वह कहता है, “मैं देखता हूँ, मैं सुनता हूँ, मैं स्वाद लेता हूँ।” फिर प्रिय विषय के साथ राग और अप्रिय के साथ द्वेष जोड़ देता है। अनुभव स्मृति बनता है, स्मृति नई चाह जगाती है और चाह अगले कर्म को बाँधती है। वासना से प्रेरित कर्म इसी क्रम को आगे बढ़ाता है। स्वामित्व से मुक्त क्रिया अपना काम पूरा करके शान्त हो सकती है।

उद्दालक ने इन्द्रियों से कहा, “अपना अपना कार्य करो। बीते सुख और दुःख की छाप को अगली क्रिया का स्वामी मत बनने दो। जिस व्यापार में आग्रह नहीं है, वह मन पर नई गाँठ नहीं डालता।”

अहंकार की खोज

अब उनका विचार उस सत्ता की ओर मुड़ा जो हर अनुभव के साथ “मैं” कहती है। उन्होंने पैर के अँगूठे से सिर तक देह को ध्यान से देखा। मांस, रक्त और अस्थियाँ मिलीं; श्वास में वायु मिली; शरीर के रिक्त स्थान में आकाश मिला। चलना प्राण का स्पन्द था, बुढ़ापा और मृत्यु देह के धर्म थे। इनमें स्वतन्त्र अहंकार कहीं नहीं मिला।

उन्होंने मन से पूछा, “यदि नेत्र अपने विषय में जाते हैं, त्वचा स्पर्श ग्रहण करती है और जिह्वा रस का अनुभव करती है, तो इनके बीच वह पृथक सत्ता कहाँ है जो सबको अपना कर्म कहती है? देह जड़ पदार्थों का संघात है। मन का अस्तित्व भी विचार करने पर संकल्पों के प्रवाह के रूप में मिलता है। इस सीमित अहंकार की आकृति, स्थान और मूल क्या है?”

जन्म और मृत्यु पर भी उन्होंने इसी दृष्टि से विचार किया। जन्म उस वस्तु का कहा जाता है जो पहले न थी और फिर प्रकट हुई। मृत्यु में पहले उपस्थित वस्तु का अभाव माना जाता है। चेतना देह के आरम्भ, मध्य और अन्त, तीनों अवस्थाओं को प्रकाशित करती है। मन देह के परिवर्तन को चेतना पर आरोपित करता है और उसी से जीवन तथा मृत्यु के भय का विस्तार होता है।

अहंकार उन्हें उस दूसरे चन्द्रमा जैसा लगा जो आँख के दोष से आकाश में दिखाई देता है, अथवा नाव में बैठे यात्री को चलते हुए तटवर्ती वृक्षों जैसा। बालक अपनी कल्पना से अँधेरे में वेताल देख लेता है और उसी से भयभीत होता है। विवेक उस कल्पना की जाँच करता है तो डर का आधार क्षीण होने लगता है।

उनका विचार देह और मन के परस्पर सम्बन्ध तक पहुँचा। मन संकल्प से देह की पहचान बनाता है, फिर उसी देह के सुख और दुःख से व्याकुल होता है। देह रोग, थकान और क्षय के द्वारा मन को पीड़ा देती है। केवल देह का मिटना इस क्रम को अधूरा छोड़ देता है, क्योंकि वासना सहित मन नई देह की कल्पना कर सकता है। इसलिए उद्दालक ने देह को क्षति पहुँचाने के स्थान पर मन के संकल्प और वासना को समझने का मार्ग लिया।

धीरे धीरे उनका निष्कर्ष स्थिर हुआ। चेतना किसी एक शरीर की सीमा में बन्द नहीं होती। उसका प्रकाश देह, इन्द्रिय और मन के व्यापार को जानता है, फिर भी उनके परिवर्तन से अपना स्वभाव नहीं खोता। इस पहचान के साथ मन का पुराना दावा शिथिल पड़ा। इच्छाओं की भीड़ छँटी और अन्तःकरण प्रणव के ध्यान के योग्य हुआ।

प्रणव का क्रम

उद्दालक ने आँखें आधी मूँद लीं और प्रणव की उपासना आरम्भ की। वे अकार, उकार, मकार और अर्धमात्रा के क्रम में आगे बढ़े। अकार का सम्बन्ध ब्रह्मा से, उकार का विष्णु से, मकार का शिव से और अर्धमात्रा का तुरीय पद से था। श्वास, ध्वनि और भावना एक ही ध्यान-विधान के अंग बने।

अकार के साथ रेचक हुआ। प्राणवायु बाहर निकली और हृदय रिक्त तथा निर्मल अनुभव हुआ। ध्यान में उद्दालक ने शरीर को सूखते देखा और हृदय से उठी अग्नि ने उसकी कल्पित देह को भस्म कर दिया। यह भीतर घटती योगदृष्टि थी। वे किसी चरण में उतनी ही देर रहते जितनी देर अभ्यास सहज रहता।

उकार के गम्भीर स्वर के साथ कुम्भक का क्रम आया। प्राण न बाहर गया, न भीतर चला; उसकी नीचे और ऊपर की गति भी रुक गई। बाँध में स्थिर जल के समान वह आधार में ठहरा। भावना में अग्नि शान्त हुई, सफेद भस्म बची और प्रचण्ड वायु उसे आकाश में बिखेर ले गई।

मकार के उपशान्त स्वर में पूरक हुआ। प्राण भीतर आया और चन्द्रमण्डल तक पहुँची शीतल धारा के रूप में अनुभव हुआ। अमृतमयी किरणें उस भस्म पर बरसीं। उनसे कमलनयन, प्रसन्नमुख, चार भुजाओं वाला नारायण-सदृश तेजस्वी शरीर प्रकट हुआ। इस दृश्य में शरीर के प्रति पुराना अभिमान निष्प्रभावी रहता है। ध्यान शरीर को पवित्र, प्रकाशमान माध्यम के रूप में देखता है।

इसके बाद अर्धमात्रा की ओर चित्त गया। इन्द्रियाँ विषयों से समेटी गईं और प्राणों की गति संयत हुई। चित्त को स्थिर करने पर पहले बाहरी आकर्षण उठा। फिर भीतर प्रकाश दिखाई दिया। प्रकाश के पीछे अन्धकार, निद्रा, अनेक रूपों की झिलमिलाहट, जड़ता और मोह की अवस्थाएँ आईं। उद्दालक ने हर दशा को पहचाना और विवेक से उसका आग्रह छोड़ा।

एक क्षण ऐसा भी आया जब मन किसी अनिर्वचनीय विराम में शान्त हुआ, फिर बाँध से निकलते जल की तरह बाहर की ओर लौट गया। दीर्घ अभ्यास ने उसे पुनः आत्मचेतना की ओर मोड़ा। अन्ततः चित्त ने अपना पृथक मनोभाव छोड़ दिया और साक्षी चेतना में उसी तरह एकरस हुआ जैसे तरंग समुद्र के जल में अपना अलग आकार खो देती है।

वसिष्ठ ने कहा कि इस पद में एक क्षण और एक वर्ष का अनुभव समान हो जाता है। उद्दालक की पहली गहन समाधि छह महीने चली। उस पूरे काल में वे निर्वात स्थान में रखे दीपक जैसे स्थिर रहे।

छह महीने बाद आए अतिथि

समाधि से उठने पर उन्होंने आकाश में सिद्धों और देवताओं के समुदाय देखे। चन्द्रमा जैसे मुख वाली रमणियाँ थीं, मन्दार पुष्पों की धूल से रँगे विमान थे, गन्धर्व, विद्याधर और मुनिगण थे। वे उद्दालक के सामने प्रणाम करके बोले, “भगवन्, हमारे साथ स्वर्ग चलिए। तपस्या का फल दिव्य भोगों में प्राप्त कीजिए। विमान तैयार हैं और स्वर्ग की रमणियाँ आपकी सेवा में उपस्थित हैं।”

उद्दालक ने अतिथियों का यथोचित सत्कार किया, उन्हें प्रणाम किया और शान्त भाव से बैठे रहे। उनके भीतर न कौतूहल उठा, न उपलब्धि का गर्व। उन्होंने विनम्रता से कहा, “सिद्धजन, आप पधारें और अपने मार्ग पर जाएँ।” फिर वे अपने ध्यान में लग गए।

सिद्ध कुछ दिनों तक उनकी प्रतीक्षा, स्तुति और पूजा करते रहे। जब उनके निश्चय में कोई परिवर्तन नहीं आया तो वे लौट गए। उद्दालक ने उस घटना को असाधारण सम्पत्ति की तरह सँभालने की कोई चेष्टा नहीं की। समाधि से प्राप्त दृष्टि उनके सामान्य व्यवहार में उतर चुकी थी।

वे मेरु, मन्दराचल, कैलास, हिमालय और विन्ध्याचल की चोटियों पर गए। द्वीपों, उपवनों, निर्जन वनों, आश्रमों और कन्दराओं में रहे। कहीं ध्यान से एक दिन में उठते, कहीं एक महीने में, कहीं एक वर्ष में और कहीं कई वर्ष बीत जाते।

समाधि अब आसन पर बैठने की अवधि से व्यापक हो चुकी थी। चलते हुए, अतिथि का स्वागत करते हुए और वन से वन जाते हुए भी चित्त उसी चेतना में स्थिर रहता। वसिष्ठ इसे सत्ता-सामान्य की प्राप्ति कहते हैं।

समाधि और व्यवहार की एक भूमि

श्रीराम ने पूछा, “गुरुदेव, सत्ता-सामान्य का स्वरूप क्या है?”

वसिष्ठ ने कहा, “जब दृश्य जगत और उसके संस्कारों का आग्रह शान्त होकर चित्त क्षीण हो जाता है, तब जो स्वयं सिद्ध सत्ता शेष रहती है, वही सत्ता-सामान्य है। बाहरी और भीतरी अनुभव उसी चेतना में उठते हैं और उसी में विश्राम पाते हैं। इस अवस्था में समाधि और उससे उठकर होने वाला व्यवहार एक ही बोध में स्थित रहते हैं।”

इसे तुरीयातीत दृष्टि कहा गया है। ज्ञानी के लिए देह सहित जीवन और देह से परे मुक्ति के आधार में वही सत्ता रहती है। वसिष्ठ ने नारद, ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र का उल्लेख करते हुए कहा कि ज्ञानदृष्टि से सम्पन्न महात्मा इसी सामान्य चेतना में प्रतिष्ठित रहते हैं। आकाश में वायु चले अथवा ठहर जाए, आकाश का विस्तार वैसा ही रहता है। उसी प्रकार ज्ञानी के आचरण और निश्चल ध्यान में आत्मबोध का भेद नहीं पड़ता।

उद्दालक बहुत काल तक प्रारब्ध के अनुसार संसार में रहे। राग और द्वेष का आग्रह शान्त था। करुणा और समदृष्टि उनके व्यवहार में स्वाभाविक थीं। उनके लिए गुफा और जनसमाज, मौन और संवाद, ध्यान और यात्रा एक ही आन्तरिक शीतलता में घटते थे।

अन्तिम कन्दरा

बहुत काल बाद उद्दालक के चित्त में विदेहमुक्ति की इच्छा उठी। वे एक पर्वतीय कन्दरा में गए, पत्तों का आसन बनाया और पद्मासन में आधी मूँदी आँखों से बैठ गए। नौ द्वारों को संयत किया, इन्द्रिय-वृत्तियों को हृदय में समेटा और प्राणों की गति रोक दी। भीतर, बाहर, नीचे और ऊपर जैसे दिशाबोध शान्त हुए। चित्त शुद्ध चिन्मात्र में स्थित हो गया।

कुछ दिनों में प्राण अपने ही आत्मस्वरूप में उपशम को प्राप्त हुए। उद्दालक चित्र में अंकित आकृति जैसे अचल रहे। शरीर छह महीने तक कन्दरा में पड़ा रहा और सूर्य की किरणों से सूख गया। पर्वतीय वायु जब उसकी शिराओं से होकर गुजरी तो तारों जैसी ध्वनि उठी। वह देह उस निर्जन प्रदेश की वीणा बन गई।

कुछ समय बाद देवताओं की स्त्रियाँ और पूज्य देवियाँ अपनी सखियों के साथ वहाँ आईं। उन्होंने शरीर को सुगन्धित पुष्पमाला पहनाई, उसकी पूजा की और उस पर्वतीय एकान्त में नृत्य तथा लीला की। जिस देह में उद्दालक ने कभी अहंकार खोजा था, वह अब वायु का वाद्य और देवियों की पूजा का पात्र थी। उद्दालक की चेतना उससे बहुत पहले अपना स्वामित्व हटा चुकी थी।

वसिष्ठ ने कथा पूरी करके श्रीराम से कहा, “उद्दालक की विवेकपूर्ण चित्तवृत्ति को अपने हृदय में स्थान दो। शास्त्र का श्रवण, गुरु के वचन, पदार्थ का परीक्षण और निरन्तर आत्मविचार बुद्धि को परिपक्व करते हैं। तीक्ष्ण और निर्मल प्रज्ञा उसी पद तक ले जाती है जहाँ मन की पुरानी कल्पनाएँ अपना अधिकार खो देती हैं।”

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