पहले अध्याय में अर्जुन रथ के बीच ढह गए थे, धनुष हाथ से छूट चुका था। दूसरा अध्याय ठीक वहीं से उठता है, जहाँ कृष्ण पहली बार बोलते हैं और अर्जुन पहली बार सुनने के लिए तैयार होते हैं। कई जानकार कहते हैं कि गीता पढ़नी हो तो यहीं से शुरू कीजिए, क्योंकि आगे के सारे अध्याय इसी एक अध्याय के बीज को ही खोलते हैं। आत्मा की पहचान, कर्म की पहली सीख, और एक ठहरे हुए इंसान की तस्वीर, तीनों यहीं मौजूद हैं।
पहली फटकार, पहली शरण
कृष्ण हमदर्दी की भूमिका नहीं बाँधते, सीधे सामना करते हैं। वे कहते हैं कि यह कमज़ोरी आप जैसे योद्धा को शोभा नहीं देती, इस ओछेपन को छोड़ कर उठिए। पर अर्जुन का सवाल भी सच्चा है, भीष्म और द्रोण तो पूज्य हैं, इन पर बाण कैसे चलाऊँ? इन्हें मार कर मिला राज तो ख़ून में सना होगा। और फिर वह मोड़ आता है जिसके बिना कोई सीख शुरू नहीं होती। अर्जुन कहते हैं कि मेरा मन कायरता से घिर गया है, मुझे धर्म नहीं सूझ रहा, मैं आपकी शरण में हूँ, आप मुझे सिखाइए। यहाँ दोस्त शिष्य बन जाता है, और यहीं से असली गीता खुलती है।
जो कभी नहीं मरता
कृष्ण मानो हल्के से मुस्कुराते हुए पहली सीख देते हैं। वे कहते हैं कि आप उन पर शोक कर रहे हैं जिन पर शोक करने की कोई बात ही नहीं, और साथ में ज्ञान की बातें भी कर रहे हैं। समझदार लोग न मरे हुओं पर रोते हैं, न जीवितों पर। फिर वे सबसे सीधी तस्वीर रखते हैं, इसी एक शरीर में बचपन आता है, जवानी आती है, बुढ़ापा आता है, फिर भी भीतर का मैं वही बना रहता है। मृत्यु भी बस एक और करवट है, जिसमें आत्मा नया शरीर पा लेती है।
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
यह आत्मा न कभी जन्म लेती है, न मरती है, न ऐसा है कि पहले थी और आगे नहीं रहेगी। यह अजन्मी है, नित्य है, शाश्वत है, सबसे पुरानी है, और शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारी जाती। न इसे कोई हथियार काट सकता है, न आग जला सकती है, न पानी भिगो सकता है, न हवा सुखा सकती है।
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥
जैसे इंसान पुराने कपड़े उतार कर नए पहन लेता है, वैसे ही देह में बसने वाली आत्मा पुराना शरीर छोड़ कर नए शरीर में चली जाती है। कृष्ण यहीं वह मान्यता हिला रहे हैं कि शरीर ही हमारी पहचान है। ठंड और गर्मी, सुख और दुख, ये सब इन्द्रियों के छुअन से आते हैं, आते-जाते रहते हैं, इसलिए इन्हें सह लेना सीखिए। जो इन आते-जाते झोंकों में एक-सा बना रहता है, वही सच में टिकता है।
कर्म पर हक़, फल पर नहीं
अब कृष्ण देखने से करने की ओर मुड़ते हैं, और गीता का सबसे मशहूर वचन आता है।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
आपका अधिकार केवल कर्म पर है, उसके फल पर कभी नहीं। न फल को अपने काम का कारण बनाइए, और न ही काम छोड़ बैठने में मन लगाइए। इसे लापरवाही मत समझिए, बात ठीक उल्टी है। जब फल ही निशाना न रहे, तब बस इतना काफ़ी वाला बहाना नहीं चलता, और मेहनत ख़ुद मंज़िल बन जाती है। फ़ैसला पूरा हमारे बस में है, नतीजा आधा हमारा और आधा समय के हाथ।
यहीं कृष्ण योग की दो सीधी पहचान देते हैं। एक, समत्व ही योग है, यानी कामयाबी और नाकामी में एक-सा बने रहना। दो, कर्म में कुशलता ही योग है, यानी काम को इस सफ़ाई से करना कि वह बंधन न बने। कर्म तो होते ही रहेंगे, पर बंधन तभी बनता है जब हम नतीजे से चिपक जाते हैं।
ठहरी हुई समझ वाला इंसान
अर्जुन यहाँ अपना पहला सवाल पूछते हैं, ऐसा ठहरा हुआ इंसान कैसा दिखता है, कैसे बोलता है, कैसे बैठता है, कैसे चलता है? कृष्ण कोई सूखी परिभाषा नहीं देते, पहचान के निशान देते हैं। जो मन में उठी सारी इच्छाएँ छोड़ कर अपने भीतर ही संतोष पा लेता है, वही स्थिर समझ वाला है। दुख आने पर उसका मन डगमगाता नहीं, सुख आने पर तलब नहीं जागती, और भीतर से खिंचाव, डर और गुस्सा जा चुके होते हैं।
कृष्ण एक प्यारी तस्वीर देते हैं। जैसे कछुआ ख़तरा भाँप कर अपने अंग हर तरफ़ से समेट लेता है, वैसे ही यह इंसान अपनी इन्द्रियों को उनके विषयों से समेट लेता है। फिर एक चेतावनी भी देते हैं, यह राह आसान नहीं, अच्छे-ख़ासे साधक का मन भी उमड़ती इन्द्रियाँ ज़बरदस्ती खींच ले जाती हैं। इसलिए इन्द्रियों को क़ाबू में रखिए और ध्यान सबसे ऊँचे बिंदु पर टिकाइए।
गिरावट की सीढ़ी
अब कृष्ण एक बारीक बात खोलते हैं, जो शायद इस अध्याय की सबसे काम की चेतावनी है। पूरी गिरावट किसी बड़े पाप से नहीं, बस मन के किसी चीज़ पर बार-बार मँडराने से शुरू होती है।
ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
विषय पर मन टिकाने से लगाव बनता है, लगाव से इच्छा, और इच्छा से क्रोध। क्रोध से मोह होता है, मोह से याद भटकती है, याद बिगड़ने से समझ नष्ट होती है, और समझ के नष्ट होते ही इंसान ख़ुद डूब जाता है। इलाज भी वही इन्द्रियाँ और वही दुनिया है, बस खिंचाव और चिढ़ को छोड़ कर। ऐसा सधा इंसान दुनिया के बीच रहते, खाते, सुनते और बोलते हुए भी भीतर से शांत रहता है।
सार
कृष्ण आख़िर में एक गहरी तस्वीर देते हैं। जैसे नदियाँ भरे हुए समुद्र में आ कर समा जाती हैं पर समुद्र छलकता नहीं, वैसे ही जिसके भीतर सारी इच्छाएँ आ कर समा जाती हैं और फिर भी वह हिलता नहीं, वही सच्ची शांति पाता है। ममता और अहंकार छोड़ कर चलने वाला यही इंसान उस ठहरी हुई अवस्था में पहुँचता है जहाँ से फिर कोई फिसलन नहीं। इस अध्याय में कृष्ण ने टूटे हुए अर्जुन को पूरी राह का नक्शा थमा दिया है, और आगे के अध्याय बस इसी नक्शे के हिस्से खोलते जाएँगे।
आधार: श्रीमद्भगवद्गीता
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