रात बीत रही थी और अयोध्या जाग रही थी, पर उसका जागना उत्सव का नहीं, एक अनदेखे अनिष्ट का था। एक ओर राजमहल में अभिषेक की सामग्री सजी थी (गंगा-यमुना के संगम का जल, सोने के घट, श्वेत चँवर, चंद्र-समान छत्र, मत्त गजराज, और वे आठ कन्याएँ जो मंगल-विधि के लिए प्रस्तुत थीं)। दूसरी ओर, अंतःपुर के एकांत में महाराज दशरथ धरती पर पड़े थे, अचेत-से, और उनकी प्रिया रानी कैकेयी उन पर वल्कल का बोझ डाल रही थीं, राजमुकुट के बदले वनवास। यह वह प्रभात था जब अयोध्या का परम-प्रिय राजकुमार राम राजगद्दी की ओर नहीं, दंडकारण्य की ओर मुड़ने वाला था, और उसके इस मुड़ने ने पूरी नगरी को रुला दिया। हम वाल्मीकि के क्रम से, सर्ग 14 से 27 तक, वही सुनाते हैं, जैसा घटा, जैसा कहा गया, बिना घटाए, बिना बढ़ाए।
सत्य की दुहाई और कैकेयी का हठ
महाराज दशरथ को शोक से व्याकुल, अचेत और भूमि पर तड़पते देखकर, पापमति कैकेयी ने कहा, “वर देकर आप ऐसे पड़े क्यों हैं, मानो कोई पाप कर बैठे हों? अपने पूर्वजों की मर्यादा में स्थिर रहिए। धर्म को जानने वाले सत्य को ही परम धर्म कहते हैं, और मैंने सत्य का ही आश्रय लेकर आपको धर्म की याद दिलाई है।”
कैकेयी ने सत्य के दृष्टांत गिनाए। राजा शैब्य ने, बाज (श्येन) से शरण माँगते कबूतर की रक्षा के लिए, अपने ही शरीर का माँस उस पक्षी को तौलकर दे दिया और परम गति पाई। तेजस्वी राजा अलर्क ने वेदपारंगत ब्राह्मण के माँगने पर अपनी आँखें निकालकर बिना खेद के दे दीं। समुद्र (सरिताओं का स्वामी) भी सत्य के व्रत में बँधकर, ज्वार के समय भी अपनी मर्यादा का अतिक्रमण नहीं करता। “सत्य ही एकपद ब्रह्म (ओंकार से सूचित परम तत्त्व) है, धर्म सत्य में ही प्रतिष्ठित है। हे श्रेष्ठ राजन्, यदि आपकी बुद्धि धर्म में है तो सत्य का पालन कीजिए, और मेरा वर सफल कीजिए।”
फिर उसने वही माँग तीन बार दोहराई, “धर्म की कामना से और मेरे अनुरोध से, अपने ज्येष्ठ पुत्र राम को अभी वन भेजिए। मैं तीन बार कहती हूँ। यदि आप यह वचन पूरा न करेंगे, तो आपके सामने ही मैं अपने प्राण त्याग दूँगी।”
निःशंक कैकेयी के इस आग्रह से बँधे राजा वैसे ही असहाय हो गए जैसे इंद्र के बंधन में फँसा बलि। वे रथ के दो पहियों के बीच फँसे बैल की तरह छटपटाए, उनका मुख पाण्डु पड़ गया। बेसुध आँखों से जैसे कुछ देख न पाते हुए, बड़े कष्ट से धैर्य धारण करके उन्होंने कैकेयी से कहा, “हे पापिनी, जो हाथ मैंने मंत्रोच्चार के साथ अग्नि के समक्ष ग्रहण किया था, आपके उस हाथ को और मुझसे उत्पन्न आपके पुत्र भरत को, आपके सहित, मैं छोड़ता हूँ। रात बीत चुकी, सूर्योदय देखकर लोग मुझे राम के अभिषेक की त्वरा देंगे। पर अब मैं जीवित न रहूँगा; राम मेरे न रहने पर इन्हीं अभिषेक की सामग्रियों से मेरा जलक्रिया (श्राद्ध का जल) करें। हे दुराचारिणी, यदि आप राम का अभिषेक रोकेंगी तो पुत्र सहित आप मेरा जलदान मत कीजिएगा।”
दशरथ ने आगे कहा, “जिन लोगों के चेहरों पर मैंने पहले हर्ष देखा है, उन्हें आज आनंदहीन और मुख झुकाए देखना मुझसे न सहा जाएगा।” इतना कहते-कहते वह पुण्य रात्रि, जो चंद्र-नक्षत्रों की माला पहने थी, बीत गई और प्रभात हो आया। तब रोष से भरी, वाक्य-चतुर कैकेयी ने फिर कठोर वचन कहे, “हे राजन्, आप विष और रोग के समान ये बातें क्यों कहते हैं? व्याकुल हुए बिना अपने पुत्र राम को यहाँ बुलाइए।” “मेरे पुत्र भरत को राज्य पर बिठाकर और राम को वनचर बनाकर, जब आप मुझे निष्कंटक कर देंगे, तभी आपका कर्तव्य पूरा होगा।”
तीखे चाबुक से कोड़े खाते उत्तम घोड़े की तरह बार-बार उकसाए जाने पर राजा ने उत्तर दिया, “मैं धर्म के बंधन में बँधा हूँ, मेरी चेतना नष्ट हो गई है। मैं अपने धार्मिक, प्रिय ज्येष्ठ पुत्र राम को देखना चाहता हूँ।”
सार: अभिषेक की सजी हुई सामग्रियों के बीच ही कैकेयी सत्य के नाम पर वही पुराने वर वसूलती है, भरत का राज्य और राम का वनवास। दशरथ टूटते हैं, कैकेयी को धिक्कारते हैं, पर वचन के पाश को काट नहीं पाते।
सुमंत्र का आगमन और राजा की स्तुति
उसी समय सूत-पुत्र (सारथि-मंत्री) सुमंत्र अंतःपुर में आए। महाराज की दशा से अनजान, उन्होंने उन्हें प्रसन्न वचनों से जगाना चाहा। हाथ जोड़कर उन्होंने स्तुति की, “जैसे सूर्योदय पर तेजस्वी समुद्र आनंदित होता है, वैसे ही आप प्रसन्न मन से हमें आनंदित कीजिए। इसी प्रभात-वेला में इंद्र के सारथि मातलि ने इंद्र की स्तुति की थी, जिससे इंद्र ने समस्त दानवों को जीता; वैसे ही मैं आपको जगाता हूँ। हे राजशार्दूल, उठिए, रात्रि देवी बीत गई, आपका कार्य संपन्न हुआ। श्री राम के अभिषेक की सारी सामग्री तैयार है। पौरजन (नगरवासी), जानपद (देहात के लोग) और व्यापारी हाथ जोड़े द्वार पर खड़े हैं। स्वयं भगवान वसिष्ठ ब्राह्मणों सहित खड़े हैं। हे राजन्, राघव के अभिषेक की आज्ञा शीघ्र दीजिए।”
“जैसे रखवाले के बिना पशु बिखर जाते हैं, सेनापति के बिना सेना, चंद्रमा के बिना रात्रि और बैल के बिना गायें, वैसे ही जिस राष्ट्र में राजा न दिखे, उसकी दशा होती है।” सांत्वना-भरे इन सार्थक वचनों को सुनकर महीपति का शोक और गहरा हो उठा। पुत्र-शोक से लाल आँखों वाले राजा ने ऊपर देखकर कहा, “हे सूत, अनुचित समय पर कही गई इन स्तुतियों से आप मेरे मर्म को फिर-फिर काट रहे हैं।”

करुण वचन सुनकर और राजा को दीन देखकर सुमंत्र हाथ जोड़े कुछ पीछे हट गए। जब राजा स्वयं दीनता के कारण कुछ कह न सके, तब मंत्र-कुशल कैकेयी ने सुमंत्र को उत्तर दिया, “हे सूत, राजा रात-भर राम के हर्ष में जागते रहे और थककर निद्रावश हो गए। अतः शीघ्र जाकर यशस्वी राजकुमार राम को ले आइए; इसमें कोई विचार न कीजिए।” सुमंत्र बोले, “हे भामिनी (देवी), राजा का वचन सुने बिना मैं कैसे जाऊँ?” तब राजा ने स्वयं कहा, “हे सुमंत्र, मैं राम को देखना चाहता हूँ, उस सुंदर को शीघ्र ले आइए।”
इसे कल्याणकारी मानकर सुमंत्र हृदय में आनंदित हुए और राजा की आज्ञा से प्रसन्नतापूर्वक निकले। मन में सोचते हुए कि निश्चय ही राम को शीघ्र अभिषेक के लिए बुलाया जा रहा है, वे राघव को देखने की उत्कंठा से बाहर आए।
सार: सुमंत्र अनजाने में राजा की मंगल-स्तुति करते हैं, जो दशरथ के घाव को और गहरा कर देती है। राजा बोल नहीं पाते, कैकेयी उत्तर देती है, और अंततः दशरथ स्वयं राम को बुलवाते हैं।
राम के भवन की ओर सुमंत्र
द्वार पर वसिष्ठ, वामदेव आदि वेदपारंगत ब्राह्मण और राजपुरोहित, तथा अमात्य, सेनापति और श्रेष्ठ व्यापारी, सब अभिषेक की प्रतीक्षा में एकत्र थे। निर्मल सूर्य उदित था, पुष्य नक्षत्र चंद्रमा के साथ था, और सूर्य कर्क राशि में था, ठीक वैसा योग जैसा राम के जन्म के समय था। सोने के जल-घट, सुसज्जित भद्रपीठ (शुभ काष्ठासन), व्याघ्रचर्म से ढका रथ, और गंगा-यमुना के पुण्य संगम का जल तैयार था; नर्मदा आदि पूर्ववाही, पर्वतों से बहती तिर्यग्वाही और गंगा-गंडक-सोन जैसी दूधिया जलधाराओं तथा समुद्रों से लाया गया जल भी रखा था।
राजा को न देखकर, अभिषेक की सामग्री लिए एकत्र हुए लोग आपस में कहने लगे, “हमारी उपस्थिति राजा को कौन सूचित करेगा? सूर्य उदित हो चुका, फिर भी राजा नहीं दिखते।” तभी राजसम्मानित सुमंत्र ने उन सभी से और वहाँ उपस्थित राजाओं से कहा, “महाराज की आज्ञा से मैं राम को लाने जा रहा हूँ। आप सब राजा के, और विशेषकर राम के, पूज्य हैं। मैं ही उनकी कुशल और न आने का कारण पूछता हूँ।”
यह कहकर सुमंत्र राजमार्ग की ओर बढ़े, जहाँ राम के विषय में जनता की हर्ष-भरी बातें गूँज रही थीं। फिर उन्होंने राम का मनोहर भवन देखा, कैलास और इंद्र के भवन की-सी प्रभा लिए, विशाल कपाटों से सुरक्षित, सैकड़ों झरोखों से सजा, मणि-मूँगे के तोरण और सोने की प्रतिमाओं से शोभायमान। चंदन-अगुरु की सुगंध फैलाता, क्रौंच और मयूरों से सुशोभित, वह भवन मेरु-शृंग-सा ऊँचा जान पड़ता था। द्वार के मार्ग पर देहात से आए लोग भेंट लिए, हाथ जोड़े, अपने वाहन दूर छोड़कर खड़े थे। सुमंत्र ने राम के वाहन शत्रुंजय नामक उस उन्नत गजराज को भी देखा। अमात्यों को एक ओर हटाकर वे समृद्ध अंतःपुर में प्रवेश कर गए।
सार: नगरी अभिषेक के हर्ष में डूबी है; सुमंत्र राम के वैभवशाली भवन से होते हुए भीतर बढ़ते हैं, यह वही उल्लास है जो आगे शोक में पलटेगा।
राम का राजसी प्रस्थान
भीतरी द्वार, जहाँ कुंडलधारी युवक प्रास (बरछी) और धनुष लिए पहरे पर थे, और जहाँ अधेड़, गेरुआ-वस्त्रधारी, वेत्रहस्त अध्यक्ष अंतःपुर की रक्षा कर रहे थे, वहाँ से होते हुए सुमंत्र ने द्वारपालों से कहा, “राजकुमार राम से कहिए कि सुमंत्र द्वार पर खड़े हैं।” वे शीघ्र भीतर गए और राम को, जो अपनी प्रिया सहित थे, सूचना दी। राम ने उस सूत को, जो पिता के विश्वासपात्र थे, उसी कक्ष में बुलवा लिया।
सुमंत्र ने राम को देखा, कुबेर-समान, सोने के पर्यंक पर बैठे, उत्तम चंदन से अनुलिप्त, और बगल में चँवर-हस्त सीता के साथ, मानो चित्रा नक्षत्र के साथ चंद्रमा हों। विनयज्ञ सुमंत्र ने सूर्य-समान तेजस्वी, वरदाता राम को नम्रता से प्रणाम किया। हाथ जोड़कर बोले, “हे राम, कौसल्या आप-से पुत्र को पाकर धन्य हैं। आपके पिता महाराज दशरथ रानी कैकेयी सहित आपको देखना चाहते हैं। वहाँ चलिए, विलंब न कीजिए।”
यह सुनकर अति आनंदित राम ने सीता का सम्मान करते हुए कहा, “हे देवी, राजा और देवी (माता कैकेयी) मिलकर मेरे विषय में, मेरे अभिषेक के विषय में, कुछ मंत्रणा कर रहे होंगे। श्यामनयना, चतुर, राजा की प्रिय और मेरी हितैषिणी माता कैकेयी अवश्य राजा को मेरे पक्ष में उकसा रही होंगी। सौभाग्य से महाराज ने प्रिय रानी सहित मेरे हित-साधक सुमंत्र को दूत बनाकर भेजा है। ऐसा दूत आया है, जैसी वहाँ सभा है; निश्चय ही आज राजा मुझे यौवराज्य पर अभिषिक्त करेंगे। मैं शीघ्र जाकर महाराज को देखूँगा; आप अपनी सखियों सहित सुख से रहिए।”
सीता ने पति का सम्मान पाकर, मंगलकामना करती हुई, अपने स्वामी को द्वार तक छोड़ा। राम ने कहा, “राजा को धर्म-संपन्न ब्राह्मणों से युक्त अपने राज्य में राजसूय यज्ञ के लिए भी आपका अभिषेक करना चाहिए, जैसे ब्रह्मा ने इंद्र का किया था। दीक्षित, व्रत-संपन्न, मृगचर्म-धारी और हाथ में कुरंग-शृंग लिए आपको देखकर मैं आपकी सेवा करना चाहती हूँ।”

पर्वत-गुफा से निकलते सिंह की भाँति भवन से निकलकर राम ने पहले ही द्वार पर हाथ जोड़े लक्ष्मण को खड़ा देखा। मध्य द्वार पर मित्रों और बंधुओं से मिले, उन्हें प्रसन्न किया, और फिर अग्नि-समान, व्याघ्रचर्म से सजे उत्तम रथ पर चढ़े। मेघ-गर्जना-सा ध्वनि करता, मणि-स्वर्ण से जड़ा वह रथ उत्तम अश्वों से जुता था, इंद्र की भाँति राम ने उसे हाँका। चित्र-विचित्र चँवर हाथ में लिए लक्ष्मण रथ पर पीछे बैठकर बड़े भाई की रक्षा करने लगे। रथ के चलते ही चारों ओर से जनसमूह का जय-घोष उठा। सैकड़ों-हज़ारों उत्तम अश्व और पर्वत-समान गज राम के पीछे चले; आगे चंदन-अगुरु से सज्जित, खड्ग-धनुष लिए शूर सैनिक और आशीर्वाद देते लोग चले।
मार्ग पर वाद्यों के स्वर, वंदियों की स्तुति और शूरों के सिंहनाद सुनाई दिए। हर्म्यों के झरोखों में खड़ी, आभूषणों से सजी स्त्रियाँ राम पर पुष्प-वर्षा करती हुई कहती थीं, “हे माता के आनंददाता, आपको पिता के राज्य पर अभिषिक्त देखकर आपकी माता कौसल्या आनंदित होंगी।” सीता को वे राम के हृदय की प्रिया, समस्त सीमंतिनियों में श्रेष्ठ मानती थीं, और कहती थीं, “इस देवी ने अवश्य पूर्व-जन्म में महान तप किया, जो रोहिणी की भाँति राम का संयोग पाया।”
राजमार्ग पर राम ने लोगों की बातें सुनीं, “राजकृपा से आज राघव विपुल राजश्री पाएँगे; ये हमारे शासक होंगे, हम सबकी कामनाएँ पूरी होंगी। जब तक यह मनुजाधिप रहेगा, किसी को कोई दुःख न होगा।” राम ने वह स्वच्छ राजमार्ग देखा, जो मत्त गज-गजी, रथ-अश्वों और जनसमूह से भरा, रत्नों और बहुमूल्य वस्तुओं की दुकानों से सुसज्जित था।
सार: राम अभिषेक के विश्वास में, राजसी ठाट से, स्तुति और पुष्प-वर्षा के बीच पिता के भवन की ओर चलते हैं; पाठक जानता है कि यह वैभव क्षणभंगुर है, पर राम और नगरी नहीं जानते।
अयोध्या की शोभा निहारते राजभवन तक
रथ पर बैठे श्रीमान राम ने अयोध्या को निहारा, पताका-ध्वजों से युक्त, अगुरु की सुगंध से सुवासित, नाना प्रकार के जनों से भरी। मेघ-समान श्वेत भवनों से सुशोभित मध्य-मार्ग से होते हुए वे उस उत्तम राजमार्ग पर बढ़े, जो चंदन-अगुरु, उत्तम गंध, क्षौम-कौशेय वस्त्र, बिना छेदे मोती और स्फटिक की दुकानों से शोभायमान था; जिसके दोनों ओर पुष्प और भक्ष्य पदार्थ रखे थे, और चौराहे दही, अक्षत, लाजा, धूप और चंदन से सदा पूजित रहते थे।
मित्रों के अनेक आशीर्वाद सुनते और यथायोग्य सबका सम्मान करते राम आगे बढ़े। लोग कहते थे, “पिता, पितामह और प्रपितामह के चले मार्ग का अनुसरण करते हुए, अभिषिक्त होकर आप उसी पर चलिए। राम के राजा होने पर हम पहले से भी सुखी रहेंगे। यदि राम को अभिषिक्त और राज्य पर प्रतिष्ठित देख लें, तो भोग और मोक्ष की भी हमें आवश्यकता नहीं। हमें इससे प्रिय और कुछ नहीं, जो अमित-तेजस्वी राम का राज्याभिषेक हो।”
आत्म-प्रशंसा की ये बातें उदासीन भाव से सुनते राम बढ़ते रहे। राम के निकल जाने पर भी कोई अपना मन या आँखें उस नरश्रेष्ठ से नहीं हटा पाता था; जो राम को न देख पाता, और जिसे राम न देखते, वह सब लोकों में निंदित होता और स्वयं को धिक्कारता। वह धर्मात्मा चारों वर्णों के, और उनसे बाहर के भी, सब आयु के लोगों पर दया करते थे, इसी से सब उनके अनुरक्त थे। चौराहों, देवपथों, चैत्यों और पाठशालाओं को राजकुमार ने आदरपूर्वक दाहिनी ओर रखा।
मेघ-समूह और कैलास-शिखर-से ऊँचे प्रासाद-शृंगों, रत्नजड़ित श्वेत क्रीड़ा-भवनों वाले राजकुल में पहुँचकर, अपने तेज से जगमगाते राजकुमार ने महेंद्र-भवन-समान पिता के उस भवन में प्रवेश किया, जो धरती के समस्त भवनों में श्रेष्ठ था। धनुर्धारियों से रक्षित पहले तीन कक्ष राम ने रथ पर पार किए, और अंतिम दो कक्ष पैदल। सब लोगों को विनम्रता से लौटाकर वे शुद्ध अंतःपुर में पहुँचे। राम के भीतर पिता के पास जाते ही, सारा जन-समूह आनंदित होकर उनके लौटने की प्रतीक्षा करने लगा, जैसे समुद्र चंद्रोदय की।
सार: राम सम्पूर्ण नगरी का आदर बटोरते, पाँचों कक्ष पार करके पिता के अंतःपुर में पहुँचते हैं। बाहर जनता प्रतीक्षारत है; भीतर वह दृश्य प्रतीक्षा कर रहा है जो सब बदल देगा।
वनवास का आदेश

राम ने पिता को शुभ आसन पर कैकेयी के साथ विषादग्रस्त, दीन और मुख सुखाए हुए देखा। उन्होंने पहले पिता के चरणों में, फिर कैकेयी के चरणों में, सावधान मन से प्रणाम किया। शोकाकुल राजा केवल “राम” इतना ही कह सके; आँसुओं से अंधी आँखों से न उन्हें देख सके, न कुछ बोल सके। राजा का वह अपूर्व, भयावह रूप देखकर राम को भी ऐसा भय हुआ जैसे पाँव से साँप छू जाने पर।
राम ने सोचा, “अन्य दिनों पिता मुझे देखकर क्रोध में भी प्रसन्न हो जाते थे; आज मुझे देखकर वे इतने आयासग्रस्त क्यों हैं? कहीं मुझसे अनजाने कोई अपराध तो नहीं हुआ? कहीं भरत, शत्रुघ्न या माताओं के प्रति कोई अनिष्ट तो नहीं? पिता के विरुद्ध जाकर या उन्हें असंतुष्ट करके मैं एक घड़ी भी जीना न चाहूँगा। जिस पिता से मेरा जन्म हुआ, उस प्रत्यक्ष देवता में कोई भक्तिहीन कैसे रह सकता है?” फिर उन्होंने कैकेयी से ही पूछा, “हे देवी, क्या आपने अभिमान या रोष में पिता से कोई कठोर वचन कह दिया है, जिससे इनका मन व्यथित है? मुझ जिज्ञासु को सच-सच बताइए; यह अपूर्व विकार किस कारण है?”
निर्लज्ज हो चुकी कैकेयी ने धृष्टतापूर्वक उत्तर दिया, “हे राम, राजा न क्रुद्ध हैं, न इन्हें कोई व्यसन है। पर इनके मन में कुछ है जिसे ये आपको दुःख देने के भय से नहीं कहते। आपको प्रिय, पर अप्रिय बात इनकी वाणी से नहीं निकलती। पर इन्होंने मुझे जो वचन दिया है, उसे आपको अवश्य पूरा करना है। वर देकर अब ये साधारण मनुष्य की तरह पछता रहे हैं, और बही हुई नदी पर बाँध बाँधना चाहते हैं। सत्य धर्म का मूल है; राजा आपके लिए उस सत्य को न त्यागें, इसका ध्यान रखिए। यदि आप राजा का कहा, शुभ हो या अशुभ, पूरा करने का वचन दें, तभी मैं सब कहूँगी; अन्यथा ये आपके सामने मुख न खोलेंगे।”
राजा के समक्ष ही व्यथित राम ने कहा, “हाय! धिक्कार है, हे देवी, मुझे ऐसे वचन न कहिए। पिता की आज्ञा से मैं अग्नि में भी कूद सकता हूँ, तीक्ष्ण विष खा सकता हूँ, समुद्र में डूब सकता हूँ। मेरे पिता, गुरु, हितैषी राजा जो चाहें, सो आज्ञा दें; राम दो बार नहीं बोलता।”

तब अनार्या कैकेयी ने उस सरल, सत्यवादी राम से अति कठोर वचन कहे, “पूर्वकाल में देवासुर-संग्राम में, मेरे द्वारा रक्षित आपके पिता ने मुझे दो वर दिए थे। उन्हीं के बदले मैंने आज राजा से भरत का अभिषेक और आपका दंडकारण्य-गमन माँगा है। यदि आप पिता को और स्वयं को सत्यप्रतिज्ञ रखना चाहते हैं, तो मेरा वचन सुनिए; पिता की प्रतिज्ञा के अनुसार आपको नौ और पाँच, यानी चौदह वर्ष वन में रहना है। भरत का अभिषेक उसी सामग्री से होगा जो आपके लिए जुटाई गई है। आप यह अभिषेक छोड़कर जटा-वल्कल धारण कीजिए। भरत इस वसुधा पर शासन करें। राजा ने आपके प्रति करुणा से मुझे ये वर दिए हैं और शोक से वे आपको देख नहीं पाते। हे रघुनंदन, राजा का यह वचन पूरा कीजिए और अपने महान सत्य से नरेश्वर का उद्धार कीजिए।”
कैकेयी के इन कठोर वचनों पर भी राम ने शोक नहीं किया; पर पुत्र-वियोग की पीड़ा से तप्त राजा अत्यंत व्यथित हो गए।
सार: राम पिता की पीड़ा का कारण कैकेयी से ही पूछते हैं, और वह स्पष्ट रूप से दो वरों का सौदा सुना देती है, चौदह वर्ष का वनवास और भरत का राज्याभिषेक। राम विचलित नहीं होते; दशरथ टूट जाते हैं।
राम की स्वीकृति और माता की ओर प्रस्थान

मरण-समान उस अप्रिय वचन को सुनकर भी राम विचलित न हुए और कैकेयी से बोले, “ऐसा ही हो। राजा की प्रतिज्ञा का पालन करते हुए, जटा-वल्कल धारण कर मैं वन में निवास के लिए यहाँ से जाऊँगा। पर इतना जानना चाहता हूँ कि राजा मुझे पहले की तरह अभिनंदित क्यों नहीं करते। हे देवी, इस पूछने पर आप मुझ पर क्रोध न कीजिए। मित्र, गुरु और कृतज्ञ पिता की आज्ञा पाकर मैं निःशंक होकर कौन-सा प्रिय कार्य न करूँगा? एक ही बात मेरे मन को सालती है; राजा स्वयं मुझे भरत के अभिषेक के विषय में नहीं कहते। मैं तो प्रसन्न होकर भरत को राज्य, अपना धन, यहाँ तक कि सीता और प्राण भी, स्वयं दे देता; फिर पिता की आज्ञा और आपकी प्रसन्नता के लिए तो कहना ही क्या। अतः इन लज्जित महीपति को आश्वस्त कीजिए। पर राजा भूमि पर दृष्टि गड़ाए मंद-मंद आँसू क्यों बहाते हैं?”
“मैं अभी, शीघ्र, दंडकारण्य जाता हूँ, ताकि पिता का वचन निर्विवाद रहे और चौदह वर्ष वहाँ रहूँ।” यह सुनकर कैकेयी प्रसन्न हुई और राम को शीघ्रता के लिए उकसाने लगी, “ऐसा ही हो; दूत तेज़ घोड़ों पर भरत को मामा के घर से लाने जाएँगे। आपके वन जाने में अब विलंब उचित नहीं; जब तक आप शीघ्र नगरी से न निकल जाएँगे, राजा न स्नान करेंगे, न भोजन।” राजा ने “धिक्कार है, कितना कष्ट है” कहकर लंबी श्वास भरी और शोक में डूबकर सोने-जड़े पर्यंक पर अचेत गिर पड़े। राम ने राजा को उठाया, और कैकेयी द्वारा फिर उकसाए जाने पर, कोड़े खाए घोड़े की भाँति वन जाने को उद्यत हुए।
उस अनार्या के दारुण वचन सुनकर भी व्यथारहित राम ने कहा, “हे देवी, मैं धन-लोलुप होकर संसार में जीना नहीं चाहता; मुझे ऋषियों के समान निर्मल धर्म में स्थित जानिए। पिता को प्रिय और मुझसे साध्य जो भी था, वह मैंने प्राण देकर भी पूरा कर दिया-सा समझिए। पिता की सेवा और उनका वचन-पालन, इससे बड़ा कोई धर्म नहीं। पूज्य पिता के सीधे न कहने पर भी, आपके वचन से, मैं चौदह वर्ष निर्जन वन में रहूँगा। हे कैकेयि, आपका मुझ पर पिता से भी अधिक अधिकार है, फिर भी आपने ऐसी छोटी बात के लिए राजा से कहा; लगता है आप मुझमें कोई गुण नहीं देखतीं। माता से विदा लेकर और सीता को समझाकर मैं आज ही दंडकवन को जाऊँगा। भरत राज्य का पालन करें और पिता की सेवा करें; यही सनातन धर्म है, इसका आप ध्यान रखें।”
राम के वचन सुनकर शोक से अशक्त पिता ऊँचे स्वर में रो पड़े। अचेत पड़े पिता और अनार्या कैकेयी के चरणों में प्रणाम कर महातेजस्वी राम चल पड़े। आँसुओं से भरी आँखों वाले, अति क्रुद्ध, सुमित्रानंदन लक्ष्मण उनके पीछे चले। अभिषेक के पात्र की प्रदक्षिणा कर, उस पर दृष्टि न डालते हुए राम धीरे-धीरे आगे बढ़े।
राज्य खोने से उनके तेज में कोई कमी न आई, जैसे शीतल किरणों वाले चंद्रमा के क्षीण होने पर भी उसका मनोहर रूप नहीं घटता। वन जाने और वसुंधरा त्यागने को उद्यत होने पर भी उनके चित्त में कोई विकार न दिखा, जैसे द्वंद्वों से ऊपर उठे योगी में। सुंदर छत्र और चँवरों का निषेध कर, अपने जन, रथ और पौरजनों को लौटाकर, अपने दुःख को मन में रोककर और इंद्रियों को संयत कर, आत्मवान राम अप्रिय समाचार सुनाने माता के भवन में गए। मीठे वचनों से सबका सम्मान करते वे धर्मात्मा राम माता के पास पहुँचे, और गुणों में उनके समान, विपुल पराक्रमी लक्ष्मण अपने मन का दुःख दबाए पीछे-पीछे आए। अत्यंत हर्ष-भरे उस भवन में पहुँचकर भी, अपनी अर्थ-विपत्ति देखकर, राम ने प्रियजनों की प्राण-हानि के भय से कोई विकार प्रकट न किया।
सार: राम बिना किसी रोष या शोक के आदेश स्वीकार करते हैं; उन्हें पिता की सत्य-रक्षा से बड़ा कोई धर्म नहीं दिखता। दशरथ अचेत हो जाते हैं, क्रुद्ध लक्ष्मण साथ चलते हैं, और राम पूर्ण संयम के साथ माता को सूचना देने जाते हैं।
कौसल्या का विलाप
हाथ जोड़े पुरुषश्रेष्ठ राम के अंतःपुर से निकलते ही स्त्रियों में महान आर्तनाद उठा। वे रानियाँ बछड़ों से बिछुड़ी गायों की भाँति विलाप करने लगीं, और अपने पति को भी कोसने लगीं, “वही राम, जो बिना कहे ही सारे अंतःपुर का कार्य देखता था, जो हमारी गति और शरण था, आज वनवास को जा रहा है! जो डाँटे जाने पर भी क्रुद्ध न होता था, क्रुद्धों को मनाता था, वह आज जा रहा है! अबुद्धि राजा, जो सब प्राणियों की गति राम को त्याग रहा है, इस जीवलोक में विचरता है!” यह कठोर आर्तनाद सुनकर पुत्र-शोक से तप्त राजा ने लाज और दुःख से अपने को बिस्तर में छिपा लिया।
संयमी राम हाथी की तरह लंबी श्वास भरते, लक्ष्मण सहित माता के भवन में पहुँचे। द्वार पर वृद्ध, अति-पूजित द्वारपाल और अन्य अनेक रक्षक बैठे थे; राम को देखते ही सब उठ खड़े हुए और जय-घोष से उन्हें बधाने लगे। पहले कक्ष को पार कर दूसरे में राजा द्वारा सत्कृत वेदसंपन्न वृद्ध ब्राह्मण, तीसरे में द्वार-रक्षा में लगी स्त्रियाँ, बालक और वृद्ध मिले।
कौसल्या रात-भर समाहित रहकर, प्रभात में पुत्र के हित की कामना से विष्णु की पूजा कर रही थीं। श्वेत क्षौम वस्त्र पहने, व्रत से कृश, वे मंत्रोच्चार के साथ अग्नि में आहुति दिलवा रही थीं। राम ने वहाँ दही, अक्षत, घृत, मोदक, हविष्य, लाजा, श्वेत माल्य, पायस, कृसर और समिधा-पूर्ण कलश देखे। बहुत समय बाद आए पुत्र को देखकर वे अति प्रसन्न होकर, बछेड़े की ओर दौड़ती घोड़ी की भाँति, आगे बढ़ीं। राम बाँहों में लिपटे, और माता ने उन्हें भुजाओं में भरकर सिर सूँघा।
पुत्र-वात्सल्य से कौसल्या ने प्रिय और हितकर वचन कहे, “आप धर्मशील, महात्मा राजर्षियों की आयु, कीर्ति और कुल-योग्य धर्म पाएँ। हे राघव, अपने सत्यप्रतिज्ञ पिता राजा से मिलिए; वह धर्मात्मा आज ही आपको यौवराज्य पर अभिषिक्त करेंगे।”
दिए गए आसन को मात्र छूकर, थोड़ा अंजलि फैलाकर, स्वभाव से विनम्र और गौरव से नत राम ने कहा, “हे देवी, निश्चय ही आप नहीं जानतीं कि महान भय आ पड़ा है। जो मैं कहूँगा, वह आपको, वैदेही और लक्ष्मण को दुःख देगा। मैं दंडकारण्य जाऊँगा; अब इस रत्नजड़ित आसन से क्या? मेरे लिए कुश-आसन (विष्टर) का समय आ गया है। चौदह वर्ष निर्जन वन में मुनियों की तरह कंद-मूल-फल पर जीवन बिताऊँगा, राजसी भोजन छोड़कर। महाराज भरत को यौवराज्य दे रहे हैं और मुझे तापस बनाकर दंडकारण्य भेज रहे हैं। छह और आठ, यानी चौदह वर्ष मैं वन-फल-मूल पर रहूँगा।”

यह अप्रिय समाचार सुनकर देवी कौसल्या वन में कुल्हाड़ी से कटे साल-वृक्ष की डाल की भाँति सहसा गिर पड़ीं, और अचेत पड़ी हुई स्वर्ग से गिरी देवी-सी जान पड़ीं। दुःख के अयोग्य, केले के पेड़-सी गिरी माता को राम ने उठाया, और धूल से सने उनके अंगों को अपने हाथों से पोंछा। तब लक्ष्मण के सुनते हुए कौसल्या ने कहा,
“हे राम, यदि आप मेरे शोक के लिए जन्म न लेते, तो भी मुझे यह दुःख न होता; निःसंतान रहती तो केवल इतना ही मानसिक शोक होता कि मैं वंध्या हूँ, इससे अधिक नहीं। पति के पुरुषार्थ से मैंने कभी कल्याण या सुख नहीं देखा; आशा थी कि पुत्र के राज्य में देखूँगी, पर अब वह भी नहीं। मैं ज्येष्ठा रानी होकर भी अपनी छोटी सौतों के हृदय-छेदक वचन सुनूँगी। आपके पास रहते भी मैं तिरस्कृत हूँ, फिर आपके जाने पर तो मरण ही निश्चित है। मैं पति की अमान्य, सदा अत्यंत निगृहीत, कैकेयी की दासियों के समान या उनसे भी नीची मानी गई हूँ। जो मेरी सेवा या अनुवर्तन करता है, वह भी कैकेयी के पुत्र को देखकर मुझसे न बोलेगा। उस नित्य-क्रुद्ध कैकेयी का खरवादी मुख मैं दुर्गता हुई कैसे देख सकूँगी?”
“आपके जन्म और उपनयन के सत्रह वर्ष मैंने दुःख-नाश की आशा में बिताए, पर यह अक्षय दुःख मुझसे चिरकाल तक न सहा जाएगा। आपके पूर्ण-चंद्र-समान मुख को न देखकर, कृपण जीवन जीते हुए मैं कैसे रहूँगी? व्रत, उपवास और परिश्रम से मैंने दुःख सहकर आपका पालन व्यर्थ किया। निश्चय ही मेरा हृदय लोहे का है, जो इस दुःख से भी नहीं फटता; निश्चय ही मेरा अकाल-मरण नहीं है। मेरे व्रत, दान, संयम और संतान-कामना से किया तप ऊसर में बोए बीज की तरह निष्फल हुआ। यदि कोई गुरु-दुःख से कृश व्यक्ति इच्छानुसार मर सकता, तो मैं आज ही, बछड़े-विहीन गाय-सी, यमलोक चली जाती। आपके बिना मेरा जीवन व्यर्थ है; मैं अति-दुर्बल होकर भी गाय की तरह आपके पीछे वन चलूँगी।” पुत्र की विपत्ति देखकर कौसल्या बंदी पुत्र को देखती किन्नरी की भाँति बहुत विलाप करती रहीं।
सार: कौसल्या के समक्ष राम वनवास का सत्य रखते हैं। वे अपने वैधव्य-तुल्य उपेक्षित जीवन, सौतों के तिरस्कार और निष्फल मातृत्व पर विलाप करती हैं, और राम के साथ वन चलने की बात कहती हैं।
लक्ष्मण का रोष और राम की धर्म-दृष्टि
विलाप करती राम-माता कौसल्या से दीन लक्ष्मण ने समयोचित वचन कहे, “हे आर्ये, मुझे भी यह नहीं रुचता कि राघव राज्यश्री छोड़कर, एक स्त्री के वचन में पड़कर वन जाएँ। विषयों से प्रमत्त, बूढ़े और विपरीत-बुद्धि राजा, कैकेयी से उकसाए जाने पर, कामवश क्या न कहेंगे? मुझे राम का ऐसा कोई अपराध या दोष नहीं दिखता जिसके कारण उन्हें राष्ट्र से निकाला जाए। ऐसा कोई व्यक्ति संसार में नहीं, चाहे वह राम का घोर शत्रु ही क्यों न हो, जो परोक्ष में भी उनका दोष बता सके। देवतुल्य, सरल, संयमी और शत्रुओं के भी हितैषी पुत्र को कौन बिना कारण त्यागेगा? पुनः बालकपन को प्राप्त राजा के ऐसे वचन को राजनीति-ज्ञ कौन पुत्र मन में लाएगा?”

राम की ओर मुड़कर लक्ष्मण बोले, “इससे पहले कि कोई यह जान ले, आप मेरी सहायता से अपने को अभिषिक्त कर राज्य की बागडोर सँभालिए। धनुष लिए मेरे रक्षण में खड़े आपसे, मृत्यु-समान आपके सामने, कौन अधिक पराक्रम दिखा सकता है? यदि अयोध्या आपके विरुद्ध खड़ी होगी तो मैं तीक्ष्ण बाणों से उसे निर्मनुष्य कर दूँगा। भरत के पक्षधर और हितैषी, सबको मारूँगा; कोमल ही तिरस्कृत होता है। यदि कैकेयी से उकसाया हमारा पिता शत्रु-समान आचरण करे, तो उसे भी निःसंकोच बंदी या मार्ग से हटा देना चाहिए। मद से उन्मत्त, कर्तव्य-अकर्तव्य न जानने वाले, कुमार्गगामी गुरु पर भी शासन उचित है।”
“किस बल या हेतु से वह कैकेयी के पुत्र को आपका न्यायतः प्राप्त राज्य देना चाहता है? आपसे और मुझसे परम बैर लेकर भरत को राज्यश्री देने की उसमें क्या शक्ति है?” कौसल्या से लक्ष्मण ने कहा, “हे देवी, धनुष और अपने सत्य-दान-देव-पूजन के पुण्य की शपथ खाकर कहता हूँ कि मैं सच्चे हृदय से अपने ज्येष्ठ भाई का अनुरक्त हूँ। यदि राम प्रज्वलित अग्नि या वन में प्रवेश करेंगे, तो मुझे पहले ही वहाँ प्रविष्ट जानिए। उदित सूर्य की तरह मैं अपने पराक्रम से आपका दुःख हर लूँगा। देवी और राघव मेरा पराक्रम देखें। मैं कैकेयी में आसक्त-मन, कृपण, बूढ़े और बुढ़ापे से निंदित अपने पिता को मार डालूँगा।”
लक्ष्मण के ये वचन सुनकर शोक-विह्वल कौसल्या ने रोते हुए राम से कहा, “पुत्र, आपने भाई की बात सुनी; यदि रुचे तो जो उचित हो, कीजिए। मेरी सौत के अधर्म-वचन सुनकर शोक-तप्त मुझे छोड़कर जाना आपको उचित नहीं। यदि आप धर्मज्ञ और धर्म आचरण चाहते हैं, तो यहीं रहकर मेरी सेवा करते हुए परम धर्म का पालन कीजिए। माता की सेवा करता हुआ कश्यप-पुत्र भी परम तप से स्वर्ग गया। राजा जैसे पूज्य हैं, गौरव से मैं भी वैसी ही हूँ; मैं आपको वन जाने की अनुमति नहीं देती। आपके वियोग में मुझे जीवन और सुख से क्या? आपके साथ तृण खाना भी मेरे लिए श्रेयस्कर है। यदि आप मुझे शोक में छोड़कर वन जाएँगे, तो मैं यहीं अनशन करूँगी, जी न सकूँगी; तब आपको भी लोक-विख्यात नरक भोगना होगा, जैसे सरिताओं के स्वामी समुद्र ने ब्रह्महत्या-समान अधर्म से भोगा।”
धर्मात्मा राम ने धर्मसंगत वचन कहे, “मुझमें पिता का वचन उल्लंघने की शक्ति नहीं; इसी से मैं वन जाना चाहता हूँ। मैं सिर झुकाकर आपकी कृपा माँगता हूँ। वनचारी ऋषि कण्डु ने धर्म जानते हुए भी पिता की आज्ञा से गाय मारी। हमारे ही कुल में सगर के पुत्रों ने पिता की आज्ञा से धरती खोदते हुए महान वध पाया। जमदग्नि-पुत्र परशुराम ने पिता की आज्ञा से अपनी माता रेणुका का वन में सिर काट दिया। इन और अन्य अनेक देवतुल्य पुरुषों ने पिता का वचन निःसंकोच पूरा किया; मैं भी पिता का हित करूँगा। यह कोई अपूर्व, अरुचिकर धर्म मैं नहीं चला रहा; पूर्वजों का ही मार्ग अपना रहा हूँ। पिता का वचन पालते हुए कोई धर्म से नहीं गिरता।”
वचन-वेत्ताओं और धनुर्धरों में श्रेष्ठ राम ने लक्ष्मण से कहा, “हे लक्ष्मण, मैं आपका अनुपम स्नेह, पराक्रम, सत्त्व और दुरासद तेज जानता हूँ। पर मेरी माता सत्य और शम के अभिप्राय को न समझकर महान, अतुल दुःख भोग रही हैं। संसार में धर्म ही परम है, धर्म में सत्य प्रतिष्ठित है, और पिता का यह वचन भी धर्म पर आधारित होने से उत्तम है। पिता, माता या ब्राह्मण को वचन देकर, धर्म में स्थित व्यक्ति को उसे व्यर्थ नहीं करना चाहिए। पिता के वचन और कैकेयी की प्रेरणा से बँधा मैं इस नियोग का उल्लंघन नहीं कर सकता। अतः क्षत्रधर्म पर टिकी यह बुद्धि छोड़िए, धर्म का आश्रय लीजिए, तीक्ष्णता मत दिखाइए; मेरी बुद्धि का अनुसरण कीजिए।”
स्नेहवश भाई को समझाकर, हाथ जोड़े और सिर झुकाए राम ने फिर माता से कहा, “हे देवी, वन जाते मुझे अनुमति दीजिए; मेरे प्राणों की शपथ है, मेरे लिए मंगल-कार्य कीजिए। प्रतिज्ञा पूरी कर मैं फिर नगरी लौटूँगा, जैसे राजर्षि ययाति स्वर्ग से लौटे थे। हे माता, हृदय में शोक रोक लीजिए, शोक न कीजिए; पिता का वचन पालकर मैं वनवास से लौटूँगा। आप, मैं, वैदेही, लक्ष्मण और सुमित्रा, सबको पिता के नियोग में रहना चाहिए, यही सनातन धर्म है। हे अम्ब, हृदय का दुःख रोककर, अभिषेक की सामग्री हटाकर, मेरे इस धर्म्य निश्चय का अनुसरण कीजिए।”
राम के इस सुधर्म्य, धीर और अविह्वल वचन को सुनकर माता पुनर्जीवित-सी होश में आईं और बोलीं, “हे पुत्र, जैसे आपके पिता पूज्य हैं, वैसे ही धर्म और स्नेह से मैं भी। मैं आपको अनुमति नहीं देती; मुझ अति-दुःखी को छोड़कर जाना आपको उचित नहीं। समस्त जीवलोक के सान्निध्य या शासन से अधिक मुझे एक घड़ी का आपका संग प्रिय है।”
माता का यह करुण विलाप सुनकर राम वैसे ही प्रज्वलित हो उठे जैसे अंधकार-गुफा में घुसा महागज, मनुष्यों की मशालों से उकसाया जाता है। धर्म में स्थित राम ने अचेत-प्राय माता और संतप्त लक्ष्मण से वही धर्म्य वचन कहे जो वही कह सकते थे, “हे लक्ष्मण, मैं आपकी नित्य भक्ति और पराक्रम जानता हूँ; पर मेरे अभिप्राय को न समझकर आप माता के साथ मुझे अति-दुःखी कर रहे हैं। आपके बिना जीवन, या स्वधा-अमृत वाले लोक से मुझे क्या? एक घड़ी का आपका संग मुझे समस्त जीवलोक से प्रिय है।”
“धर्म, अर्थ और काम (जो इस जीवलोक में सुख के साधन कहे गए हैं) सब धर्म के अनुगामी होते हैं, जैसे वश्य भार्या धर्म, सुख और संतान देती है। जिसमें ये तीनों न हों, उसे त्याग कर वही करना चाहिए जिससे धर्म हो; धर्महीन अर्थपरायण द्वेष्य होता है, और कामासक्ति भी प्रशस्त नहीं। जो वृद्ध पिता, गुरु और राजा, क्रोध, हर्ष या काम से भी कोई कार्य आदेश दे, उसे धर्म समझकर कौन अक्रूर पुरुष न करेगा? अतः मैं पिता की इस प्रतिज्ञा को पूरा किए बिना नहीं रह सकता; वही हम दोनों के गुरु हैं, और देवी के भर्ता, गति और धर्म हैं। ऐसे धर्मराज पति के जीवित रहते देवी मेरे साथ कैसे चलें, मानो विधवा हों? अतः हे देवी, वन जाते मुझे अनुमति दीजिए और मंगल-कार्य कीजिए, ताकि प्रतिज्ञा पूरी कर मैं ययाति की भाँति लौटूँ। केवल राज्य के लिए मैं महोदय यश को पीछे नहीं फेंक सकता; जीवन इतना अल्प है कि अधर्म से मैं आज यह तुच्छ धरती नहीं चाहता।”
माता को प्रसन्न करते और लक्ष्मण को अपनी धर्म-दृष्टि भली-भाँति समझाते, दंडकारण्य जाने को उद्यत उस नरश्रेष्ठ ने मन ही मन माता की प्रदक्षिणा की।
सार: लक्ष्मण रोष में दशरथ-कैकेयी के विरुद्ध बल-प्रयोग और राज्य-ग्रहण का प्रस्ताव रखते हैं; कौसल्या भी राम को रोकती हैं। राम धैर्य से उत्तर देते हैं; पिता का वचन धर्म पर टिका है, पूर्वज भी ऐसा करते आए हैं, और राज्य से यश-धर्म बड़ा है।
राम का दैव-वाद और लक्ष्मण को सांत्वना
व्यथा से दीन, अत्यंत असहिष्णु, क्रोध से फैली आँखों वाले, क्रुद्ध नागराज-से लक्ष्मण के पास आकर, धैर्य से चित्त सँभालते आत्मवान राम ने कहा, “हे सौमित्र, अपना क्रोध और शोक रोककर, अनुपम धैर्य धारण कर, इस अपमान की उपेक्षा कर, और पिता के वचन-पालन में सहायक होने का परम हर्ष लेकर, जो सामग्री मेरे अभिषेक के लिए जुटी थी, उसे शीघ्र लौटाइए और निर्विघ्न कार्य कीजिए। जैसी त्वरा अभिषेक की सामग्री जुटाने में थी, वैसी ही अभिषेक-निवृत्ति की तैयारी में हो। हमारी जो माता कैकेयी मेरे अभिषेक की चिंता से संतप्त हैं, वे आशंका-रहित हो जाएँ, ऐसा कीजिए; मैं उनकी मन की आशंका-पीड़ा एक घड़ी भी उपेक्षित नहीं कर सकता।”
“मुझे याद नहीं कि मैंने जान-बूझकर या अनजाने अपनी माताओं या पिता का कोई अपराध किया हो। मेरे पिता सदा सत्य, सत्यप्रतिज्ञ और परलोक-भय से डरने वाले हैं; मेरे द्वारा उनका वचन पूरा होने पर वे निर्भय हो जाएँ। जब तक यह अभिषेक का कार्य पूरा न हो, उनके मन में भी सत्य के अपालन का संताप रहेगा, और उनका संताप मुझे भी संतप्त करेगा। अतः हे लक्ष्मण, अभिषेक-विधान समेटकर मैं शीघ्र वन जाना चाहता हूँ। मेरे वनवास से कृतकृत्य होकर कैकेयी आज ही अपने पुत्र भरत को निश्चिंत होकर अभिषिक्त करें। मेरे वल्कल-मृगचर्म और जटा-मंडल धारण कर वन जाने पर ही कैकेयी का मन सुखी होगा।”
“हे सौमित्र, मेरे प्रवासन में दैव को ही देखिए, जिसने यह बुद्धि और सुसमाहित मन कैकेयी में डाला; अतः मुझे उसे क्लेश नहीं देना चाहिए, मैं अविलंब प्रव्रजन करूँगा। मेरे प्रवासन और दिए गए राज्य के पुनः छिन जाने में दैव ही उत्तरदायी है। यदि यह भाव दैव-प्रेरित न होता, तो कैकेयी के मन में मुझे सताने का विचार कैसे आता? आप जानते हैं कि मैंने माताओं में कभी भेद नहीं किया, न कैकेयी ने अपने पुत्र और मुझमें कभी अंतर किया। फिर अभिषेक रोकने और प्रवास के दुर्वच, उग्र वचन कहने का कारण दैव के सिवा क्या हो सकता है? ऐसी सद्गुण-संपन्न राजपुत्री प्राकृत स्त्री की तरह पति के समक्ष मुझे पीड़ित करने वाले वचन कैसे कहती?”
“जो अचिंत्य है, वही दैव है, और वह प्राणियों में भी टाला नहीं जाता; स्पष्ट है कि मुझ पर और उन पर यह विपर्यय आ पड़ा। कौन पुरुष दैव से लड़ने का साहस करे, जिसका कर्म-फल के सिवा कोई चिह्न नहीं दिखता? सुख-दुःख, भय-क्रोध, लाभ-अलाभ, जन्म-मृत्यु, जो भी ऐसा हो, वह दैव का ही कर्म है। उग्र तपस्वी ऋषि भी दैव से प्रेरित होकर काम-क्रोध से नियमों को छोड़ बैठते हैं। आरंभ किए कार्य को छोड़कर जो अकस्मात्, बिना कारण, घटित होता है, वह दैव का कर्म है। इस सत्य-बुद्धि से मन सँभालने पर, अभिषेक रुक जाने पर भी मुझे कोई संताप नहीं।”
“अतः आप भी संताप छोड़कर, मेरा अनुसरण कर, अभिषेक की क्रिया शीघ्र रुकवा दीजिए। इन्हीं अभिषेक के लिए जुटे जल-घटों से मेरा व्रत-स्नान होगा। अथवा राज्य-द्रव्य से युक्त इस जल से क्या? मेरा स्वयं निकाला जल ही व्रत का आरंभ कराएगा। लक्ष्मण, लक्ष्मी के विपर्यय पर संताप मत कीजिए; मेरे लिए राज्य हो या वनवास, वनवास ही महोदय है। हे लक्ष्मण, मेरी छोटी माता कैकेयी और पिता, दोनों पर शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वे दैव के वश हैं; आप जानते हैं कि दैव अमोघ-प्रभाव है।”
सार: राम कैकेयी और पिता को निर्दोष मानकर सारा दायित्व दैव पर डालते हैं। वे लक्ष्मण को क्रोध-शोक छोड़ने और अभिषेक की सामग्री लौटाने को कहते हैं; उन्हीं घटों के जल से वे व्रत-स्नान कर लेंगे।
लक्ष्मण का प्रतिवाद और पराक्रम-वाद
राम के यह कहने पर लक्ष्मण सिर झुकाए, दैन्य और हर्ष के बीच डोलते रहे। फिर भौंहों के बीच भृकुटि चढ़ाकर वह नरश्रेष्ठ बिल में बैठे क्रुद्ध महासर्प की भाँति फुफकारे; उनका वह भृकुटि-युक्त, दुर्निरीक्ष्य मुख क्रुद्ध सिंह के मुख-सा शोभा पाने लगा। हाथी की तरह अग्र-भुजा झटकते, गर्दन को तिरछा और ऊपर झुलाते, आँख के कोर से देखते लक्ष्मण ने कहा,
“अस्थान पर यह महान सम्भ्रम आपमें उठा है, धर्म-दोष के भय से और लोक की शंका मिटाने के लिए। पर आप-जैसा अशौंडीर (निर्बल) नहीं, शौंडीर क्षत्रियर्षभ हैं; आप इस कृपण, अशक्त दैव की प्रशंसा कैसे करते हैं? आपको उन दोनों पापियों (दशरथ और कैकेयी) पर शंका कैसे नहीं? हे धर्मात्मन, क्या आप नहीं जानते कि धर्म का आभास ओढ़े लोग होते हैं? यदि उन दोनों का, जो छल से स्वार्थ साधना चाहते हैं, यही अभिप्राय न होता, तो अभिषेक आरंभ ही न होता; और यदि वर का सौदा सच होता, तो वह तैयारियों से पहले ही दिया जाता।”
“जो आरंभ हुआ वह लोक को अप्रिय है; आपके अतिरिक्त किसी और का अभिषेक मैं नहीं सह सकता; मेरी इस असहिष्णुता को क्षमा कीजिए। वह धर्म भी मुझे द्वेष्य है जिसके मोह में आपकी बुद्धि भटक गई। कैकेयी के वशवर्ती पिता का अधर्म्य, निंदित वचन आप कर्म से रोक सकते हुए भी क्यों पूरा करते हैं? छल से किए इस भेद को आप दैव-कृत मानते हैं, इससे मुझे दुःख होता है, और ऐसी झूठी धर्म-आसक्ति निंदनीय है।”
“आपका यह धर्म-संयोग इस लोक में निंदित है। कामवृत्त, सदा अहितकारी, पिता-नाम धारी इन दो शत्रुओं की कामना को आपके सिवा और कौन मन से भी पूरा करे? यद्यपि आपकी मान्यता है कि उनका यह निश्चय भी दैव-प्रेरित है, तो भी इसकी उपेक्षा करनी चाहिए; ऐसा दैव-निर्णय भी मुझे नहीं रुचता। जो विह्वल और वीर्यहीन है, वही दैव का अनुसरण करता है; आत्म-विश्वासी वीर दैव की उपासना नहीं करते। जो पुरुषार्थ से दैव को रोक सके, वह दैव से कार्य बिगड़ने पर भी अवसन्न नहीं होता।”
“आज लोग दैव और पुरुष के बल को देखेंगे; दैव और मानुष का अंतर आज प्रकट होगा। जिन्होंने आपका राज्याभिषेक दैव से रुका देखा, वे आज मेरे पुरुषार्थ से दैव को परास्त देखेंगे। मद-जल से उद्धत, अंकुश से अवश्य गज की भाँति झपटते दैव को मैं पुरुषार्थ से लौटा दूँगा। समस्त लोकपाल या तीनों लोकों के निवासी भी आज राम का अभिषेक नहीं रोक सकते, फिर पिता क्या? जिन्होंने आपका वनवास समर्थित किया, वे ही चौदह वर्ष वन में रहें। मैं पिता की और कैकेयी की उस आशा को जला दूँगा जो अभिषेक-विघात से पुत्र के राज्य की ओर है। जो मेरे बल का विरोधी होगा, उसके लिए दैव-बल उतना सहायक न होगा जितना मेरा उग्र पराक्रम दुःखदायी होगा।”
“हज़ारों वर्षों के बाद वनवास तब उचित है जब राजर्षियों की रीति से राजा प्रजा को पुत्रों के सुपुर्द कर दे। यदि राज्य में विद्रोह की शंका से, राजा के अनिश्चित रहते, आप राज्य नहीं चाहते, तो भी कोई शंका न कीजिए; मैं समुद्र की तटरेखा की भाँति आपकी और आपके राज्य की रक्षा करूँगा; ऐसा न कर पाऊँ तो वीर-लोक न पाऊँ। आप मंगल-द्रव्यों से अभिषिक्त होइए, उसी कार्य में लगिए; शत्रु-राजाओं को बलपूर्वक रोकने को मैं अकेला ही पर्याप्त हूँ।”

“मेरी ये भुजाएँ शोभा के लिए नहीं, न धनुष आभूषण है, न खड्ग कमर-पट्टी का चिह्न, न बाण किसी आधार के लिए; ये सब शत्रु-मर्दन के लिए हैं। बिजली-सी चमक वाले तीक्ष्ण-धार खड्ग से, चाहे शत्रु वज्रधारी इंद्र ही हो, उसे काट न डालूँ, ऐसा मैं नहीं चाहता। मेरे खड्ग से कटे हस्ती-अश्व-रथियों के अंगों से भूमि दुर्गम हो जाएगी; मारे गए शत्रु दीप्त अग्नि या सविद्युत मेघों की तरह गिरेंगे। गोधा-अंगुलित्राण बाँधे, धनुष उठाए मेरे सामने कौन अपने पुरुषत्व पर गर्व करेगा? अनेक बाणों से एक को और एक बाण से अनेक को मारता हुआ मैं नर-अश्व-गज के मर्म बेधूँगा। आज मेरे अस्त्र-प्रभाव का प्रभाव प्रकट होगा, राजा की अप्रभुता और हे प्रभो, आपकी प्रभुता सिद्ध करने को। चंदन-अनुलेप, केयूर, धन-दान और मित्र-रक्षा के योग्य ये भुजाएँ आज अभिषेक-विघ्नकारियों को रोकने में लगेंगी। कहिए, आज किस शत्रु को मैं प्राण, यश और स्वजनों से वंचित कर दूँ; जैसे यह वसुधा आपके वश हो, वैसा आदेश दीजिए; मैं आपका किंकर हूँ।”
राघव-वंश-वर्धक राम ने लक्ष्मण के आँसू पोंछकर, बार-बार सांत्वना देते हुए कहा, “हे सौम्य, मुझे पिता के वचन में दृढ़ स्थित जानिए; सत्पुरुषों का यही मार्ग है।”
सार: लक्ष्मण दैव-वाद को निर्बलता बताकर पुरुषार्थ की श्रेष्ठता पर ज़ोर देते हैं और अकेले समस्त विरोधियों को रोकने का संकल्प करते हैं। राम उनके आँसू पोंछकर शांत करते हैं; वे पिता के वचन में अटल हैं।
कौसल्या की अंतिम विदा
पिता के आदेश-पालन में दृढ़ राम को देखकर, आँसुओं से रुँधे कंठ से कौसल्या ने धर्म्य वचन कहे, “हाय! दशरथ से मुझमें जन्मा यह दुःख-अनभिज्ञ, सब प्राणियों से प्रिय बोलने वाला धर्मात्मा बाज़ार में बचे अन्न के दानों पर कैसे जिएगा? जिसके भृत्य-दास भी उत्तम अन्न खाते हैं, वही राम वन में मूल-फल कैसे खाएगा? यह कौन मानेगा, और किसे भय न होगा, कि राजा का प्रिय, गुणवान काकुत्स्थ निर्वासित हो रहा है? निश्चय ही इस लोक में दैव ही बलवान है और सब निर्देश देता है, जहाँ आप-सा अभिराम वन जा रहा है।”
“आपके आगमन की चिंता से उपजी यह विशाल शोकाग्नि, मन में जन्मी, आपके आसन्न वियोग की वायु से प्रदीप्त, विलाप के दुःख-समिध से प्रज्वलित, रोने के आँसुओं की आहुति से पुष्ट और चिंता के महाधूम से युक्त, मुझे कृश करके वैसे ही जला देगी, जैसे हेमंत के अंत में दावाग्नि सूखी घास को। जैसे गाय अपने बछड़े के पीछे जाती है, वैसे ही, हे वत्स, जहाँ आप जाएँगे, मैं आपके पीछे आऊँगी।”
माता के यह वचन सुनकर अत्यंत दुःखी माता से राम ने कहा, “कैकेयी से ठगे गए राजा, मेरे अरण्य चले जाने पर, यदि आपसे भी त्यागे जाएँ तो निश्चय ही जीवित न रहेंगे। पति का त्याग स्त्री की नृशंसता है, यह अति-निंदित है; आप मन से भी ऐसा न करें। जब तक मेरे पिता काकुत्स्थ जगतीपति जीवित हैं, उनकी सेवा कीजिए; यही सनातन धर्म है।” शुभदर्शना कौसल्या ने प्रसन्न होकर ‘तथास्तु’ कहा।
राम ने फिर कहा, “पिता का वचन आपको और मुझे, दोनों को पालना है। वे राजा, भर्ता, गुरु, श्रेष्ठ, ईश्वर और हम सबके प्रभु हैं। महावन में नौ और पाँच वर्ष विहार कर, परम-प्रीति से मैं आपके वचन में लौट आऊँगा।” आँसू-भरे मुख से अति-व्याकुल, पुत्र-वत्सला कौसल्या ने कहा, “इन सौतों के बीच रहना मुझे सहन नहीं; हे काकुत्स्थ, यदि पिता की इच्छा से आपकी जाने की ठान है, तो वन्य मृगी की तरह मुझे भी ले चलिए।”
रोती हुई माता से राम ने रोते हुए कहा, “जीवित स्त्री का भर्ता ही उसका देवता और प्रभु है; आज आप पर और मुझ पर राजा का प्रभुत्व है। बुद्धिमान लोकनाथ राजा के रहते हम अनाथ नहीं। भरत भी धर्मात्मा, सब प्राणियों से प्रिय बोलने वाला, धर्मरत है; वह आपकी सेवा करेगा। आप सावधान रहकर ऐसा कीजिए कि मेरे जाने पर पुत्र-शोक से राजा को कष्ट न हो, और यह दारुण शोक उन्हें नष्ट न करे। वृद्ध राजा का हित निरंतर समाहित होकर कीजिए।”
“जो स्त्री व्रत-उपवास में रत होकर भी भर्ता का अनुवर्तन नहीं करती, उसकी पाप-गति होती है; पति-सेवा से ही नारी उत्तम स्वर्ग पाती है। जो किसी और को नमस्कार नहीं करती और देवपूजन से विमुख है, वह भी भर्ता की सेवा से स्वर्ग पाती है; पति का प्रिय-हित करना ही स्त्री का नित्य धर्म है, यही वेद और स्मृति में कहा गया है। मेरे लिए, हे देवी, अग्नि-कार्यों में देवताओं और ब्राह्मणों का पुष्पादि से सत्कार कीजिए। नियमित, संयमित आहार लेती, भर्ता-सेवा में रत होकर मेरे लौटने की प्रतीक्षा कीजिए; मेरे लौटने पर आप परम कामना पाएँगी, यदि धर्मश्रेष्ठ राजा प्राण धारण किए रहें।”
आँसू-भरी आँखों से कौसल्या ने कहा, “हे प्रिय, वीर पुत्र, आपके सुविचारित गमन-निश्चय को मैं बदल नहीं सकती; दैव दुरतिक्रम है। अतः हे विभो, एकाग्र मन से जाइए, आपका सदा कल्याण हो। आपके लौटने पर ही मैं ग्लानि-मुक्त होऊँगी; हे महाभाग, कृतार्थ और व्रत-संपन्न होकर लौटे, पिता का ऋण चुकाए आपको देखकर ही मैं परम सुख से सोऊँगी। दैव की गति दुर्विभाव्य है, हे राघव, जो मेरे प्रतिवाद को टालकर आपको जाने को प्रेरित कर रहा है। अब जाइए, हे महाबाहु, सकुशल लौटकर मीठे सांत्वना-वचनों से मुझे आनंदित कीजिएगा। क्या वह समय आएगा जब मैं आपको जटा-वल्कल धारी, वन से लौटा देखूँगी?” राम को वनवास में दृढ़-निश्चय देखकर देवी ने उन्हें शुभ वचन कहे और स्वस्त्ययन के लिए उद्यत हुईं।
सार: कौसल्या साथ चलने की इच्छा प्रकट करती हैं, पर राम समझाते हैं कि जीवित पति की सेवा ही पत्नी का सनातन धर्म है, और वृद्ध राजा का हित देखना उनका कर्तव्य। माता अंततः मान जाती हैं और विदा का स्वस्त्ययन रचाती हैं।
माता का स्वस्त्ययन और आशीर्वाद
विवेक से उस आयास (वियोग-पीड़ा) को सहकर, शुद्ध जल का आचमन कर, मनस्विनी राम-माता कौसल्या ने राम के मंगल-कार्य किए। उन्होंने कहा, “हे रघूत्तम, आपका गमन रोका नहीं जा सकता; अब जाइए, सत्पुरुषों के मार्ग पर चलिए और वनवास की अवधि पूरी कर शीघ्र लौटिए। जिस धर्म का आप प्रीति और नियम से पालन करते हैं, वही धर्म, हे राघवशार्दूल, आपकी रक्षा करे। जिन देवों को आप चौराहों और मंदिरों में प्रणाम करते हैं, वे महर्षियों सहित वन में आपकी रक्षा करें। बुद्धिमान विश्वामित्र ने आपको जो अस्त्र दिए, वे आपकी रक्षा करें। पिता-माता की सेवा और सत्य से रक्षित होकर आप चिरंजीवी रहें।”
“समिधा, कुश, पवित्र, यज्ञ-वेदियाँ, मंदिर, ब्राह्मणों के स्थंडिल, पर्वत, वृक्ष, क्षुप, हृद, पतंग, पन्नग और सिंह, सब आपकी रक्षा करें। साध्य, विश्वेदेव, मरुद्गण महर्षियों सहित, धाता-विधाता, पूषा-भग-अर्यमा, इंद्रादि लोकपाल, छहों ऋतुएँ, मास, संवत्सर, रात-दिन और मुहूर्त सदा आपका कल्याण करें। वेद, स्मृति और धर्म सब ओर से आपकी रक्षा करें। भगवान स्कंद, बृहस्पति सहित सोम, सप्तर्षि और नारद आपकी रक्षा करें। मेरे द्वारा स्तुत सिद्ध और दिशाओं के स्वामी उस वन में नित्य आपकी रक्षा करें।”
“सब पर्वत, समुद्र, राजा वरुण, द्यौ-अंतरिक्ष-पृथ्वी, चराचर सहित वायु, समस्त नक्षत्र-ग्रह देवताओं सहित, अहोरात्र और संध्या आपकी रक्षा करें। राक्षस, पिशाच, क्रूरकर्मा और मांसभक्षी, इनसे आपको भय न हो। वानर, वृश्चिक, डंक, मच्छर, सरीसृप और कीट आपके वन में न हों। महागज, सिंह, व्याघ्र, रीछ, दाढ़वाले और शृंगी महिष आपके प्रति द्रोह न करें। नर-मांस-भोजी अन्य सब जातियाँ, जिन्हें मैंने यहाँ पूजा है, आपको न मारें। आपके मार्ग शुभ हों, पराक्रम सफल हों, वन की सब संपदाएँ आपके वश हों; हे पुत्र, सुखपूर्वक जाइए। शुक्र, सोम, सूर्य, कुबेर और यम (मेरे द्वारा अर्चित) दंडकारण्यवासी आपकी रक्षा करें। अग्नि, वायु, धूम और ऋषि-मुख से निःसृत मंत्र स्नान-आचमन के समय आपकी रक्षा करें। सर्वलोक-प्रभु ब्रह्मा, भूत-कर्ता और शेष देवता वनवासी आपकी रक्षा करें।”
ऐसा कहकर यशस्विनी कौसल्या ने माल्य, गंध और अनुरूप स्तुतियों से देवगणों की पूजा की। फिर एक महात्मा ब्राह्मण से, विधिपूर्वक, राम के मंगल के लिए अग्नि में आहुति दिलवाई; घृत, श्वेत माल्य, समिधा और सरसों उन्होंने जुटाई। उपाध्याय ने शांति और आरोग्य के लिए हवन कर, बचे हविष्य से बाह्य बलि अर्पित की। फिर मधु, दही, अक्षत और घृत से ब्राह्मणों से राम के वन-स्वस्त्ययन के मंत्र पढ़वाए, और उस द्विजेंद्र को इच्छित दक्षिणा देकर राम से कहा,
“वृत्र-नाश पर सर्वदेव-नमस्कृत सहस्राक्ष इंद्र को जो मंगल मिला, वही आपको मिले। अमृत चाहते गरुड़ को विनता ने जो मंगल दिया, वही आपको मिले। अमृत-मंथन में दैत्यों को मारते इंद्र को अदिति ने जो मंगल दिया, वही आपको मिले। तीन पग रखते अतुल-तेज विष्णु को जो मंगल हुआ, वही आपको मिले, हे राम। ऋषि, सप्त समुद्र, सप्त द्वीप, वेद, तीन लोक और चारों दिशाएँ आपको मंगलों का मंगल दें, हे महाबाहु।”

ऐसा कहकर, पुत्र के मस्तक पर अक्षत और गंध लगाकर, बड़ी आँखों वाली कौसल्या ने सिद्ध-अर्थ, शुभ विशल्यकरणी ओषधि से रक्षा बाँधी और मंत्र जपे। दुःख में डूबी होकर भी, राम का उत्साह न टूटे इसलिए, वे मात्र वाणी से, हर्षित-सी, बिना भाव-मेल के मंत्र बोलती रहीं। फिर सिर झुकाकर, मस्तक सूँघकर, आलिंगन कर उन्होंने कहा, “हे राम, कृतार्थ होकर सुख से जाइए। नीरोग, सर्वसिद्धार्थ, राजमार्गों पर सभी से मेल रखते हुए अयोध्या लौटे आपको मैं सुख से देखूँ। शोक-संकल्प मिटाकर, हर्ष से दीप्त मुख लिए, वन से लौटे आपको उदित पूर्ण-चंद्र-सा देखूँ। पिता का वचन पूरा कर, भद्रासन पर बैठे आपको फिर देखूँ। वन से लौटकर, मंगल-वस्त्रों से सज्जित होकर, सदा मेरी बहू की कामनाएँ पूरी कीजिएगा। मेरे द्वारा अर्चित शिवादि देवगण, महर्षि, भूतगण, सुर-उरग और दिशाएँ चिरकाल आपका हित चाहें।”
विधिवत स्वस्त्ययन पूरा कर, आँसू-भरी आँखों वाली कौसल्या ने राम की प्रदक्षिणा की और बार-बार देखकर आलिंगन किया। माता द्वारा प्रदक्षिणित, माता के चरण बार-बार दबाते, उसके मंगल-तेज से प्रज्वलित महायशस्वी राघव सीता के भवन की ओर चले।
सार: कौसल्या समस्त देवों, दिशाओं, ऋतुओं और प्राणियों से राम की रक्षा की प्रार्थना करती हैं, हवन और रक्षा-बंधन करती हैं, और दुःख दबाकर हर्षित स्वर में आशीर्वाद देती हैं। राम माता की प्रदक्षिणा कर सीता के भवन की ओर बढ़ते हैं।
सीता की जिज्ञासा
कौसल्या को प्रणाम कर, माता से स्वस्त्ययन पाकर, धर्मिष्ठ मार्ग में स्थित राम वन को चल पड़े; अपने गुणों से जन-हृदयों को मथते, अपने सान्निध्य से राजमार्ग को शोभित करते। व्रत-परायणा तपस्विनी वैदेही ने अभी तक वह सब नहीं सुना था जो अभिषेक को रोकने और वनवास का कारण बना; अतः राम का यौवराज्याभिषेक ही उसके हृदय में था। देवपूजन कर, राजधर्म-अभिज्ञ वह राजपुत्री हर्षित-चित्त पति की प्रतीक्षा कर रही थी।
तब राम, लज्जा से कुछ मुख झुकाए, अपने सुसज्जित, हर्षित-जन-पूर्ण भवन में पहुँचे। आसन से उठकर, काँपती हुई सीता ने अपने पति को शोक-तप्त, चिंता से व्याकुल इंद्रियों वाला देखा। उन्हें देखकर धर्मात्मा राम मन का शोक छिपा न सके; वह प्रकट हो गया। उनके विवर्ण मुख, पसीने और असहिष्णुता को देख, दुःख से संतप्त सीता बोलीं, “हे प्रभो, यह क्या है? आज तो बृहस्पति-अधिष्ठित श्रीमान पुष्य नक्षत्र चंद्रमा से युक्त है, जिसे प्राज्ञ ब्राह्मण अभिषेक के लिए शुभ कहते हैं; फिर आप किससे दुर्मन हैं? सैकड़ों शलाकाओं वाले, जल-फेन-से श्वेत छत्र से आपका सुंदर मुख क्यों आच्छादित नहीं दिखता? चंद्र-हंस-से श्वेत उत्तम चँवरों से आपका शतपत्र-नयन मुख क्यों नहीं झलाया जा रहा?”
“वाग्मी और वंदी आज हर्ष से आपकी स्तुति करते नहीं दिखते; सूत-मागध मंगल-वचनों से नहीं गाते। वेदपारंगत ब्राह्मण मूर्धाभिषिक्त के सिर पर विधिपूर्वक मधु और दही नहीं डालते। समस्त प्रजा, श्रेणी-मुख्य, आभूषित पौर-जानपद आपके पीछे चलने को उद्यत नहीं। सोने के आभूषणों से सज्जित, चार स्वस्थ अश्वों वाला मुख्य पुष्परथ आपके आगे क्यों नहीं चलता? सर्व-लक्षण-पूजित, कृष्ण-मेघ-गिरि-सा श्रीमान हस्ती आगे क्यों नहीं दिखता? सोने से चित्रित भद्रासन आगे लिए कोई पुरःसर क्यों नहीं दिखता? जब अभिषेक तैयार है, तब यह क्या; आपके मुख का रंग अपूर्व है और हर्ष नहीं दिखता?”
सार: सीता, घटनाक्रम से अनजान, राम को विषादग्रस्त देखकर एक-एक राजसी चिह्न गिनाती हैं (छत्र, चँवर, स्तुति, हस्ती, रथ) और पूछती हैं कि अभिषेक के शुभ दिन उनका मुख उदास क्यों है।
राम का सीता को समझाना

विलाप करती सीता से रघुनंदन ने कहा, “हे सीते, मेरे पूज्य पिता मुझे वन भेज रहे हैं। हे जानकि, आप कुलीन, धर्मज्ञ और धर्मचारिणी हैं; सुनिए, यह क्रम से आज मुझ पर कैसे आ पड़ा। मेरे सत्यप्रतिज्ञ पिता राजा दशरथ ने पूर्वकाल में माता कैकेयी को दो महान वर दिए थे। आज जब राजा के प्रयत्न से मेरे अभिषेक की तैयारी पूरी हुई, तो उन्होंने उन्हीं वरों के बदले राजा को बाँध लिया और धर्म के आधार पर पूर्णतः वश में कर लिया। मुझे चौदह वर्ष दंडक में रहना है, और भरत को पिता ने यौवराज्य पर नियुक्त किया है। अतः निर्जन वन को जाते हुए मैं आपको देखने आया हूँ।”
“भरत के समक्ष कभी मेरी प्रशंसा मत कीजिएगा; ऋद्धि-युक्त पुरुष दूसरों की स्तुति सहन नहीं करते। उसके सामने मेरे गुण मत कहिएगा, न विशेष रूप से मुझे ऊँचा बताइएगा; उसके अनुकूल आचरण से ही आप उसके साथ रह सकेंगी। राजा ने उसे सनातन यौवराज्य दिया है; अतः हे सीते, उसे और विशेषकर राजा को प्रसन्न रखिएगा। मैं भी पिता की प्रतिज्ञा पालते हुए आज ही वन जाऊँगा; हे मनस्विनी, आप धीर रहें। मेरे वन जाने पर, हे अनघे, आप व्रत-उपवास में रत रहिएगा। प्रातः उठकर, विधिपूर्वक देवपूजन कर, मेरे पिता राजा दशरथ को प्रणाम कीजिएगा। मेरी वृद्ध, संताप-कृश माता कौसल्या को धर्म आगे रखकर सम्मान दीजिएगा। मेरी शेष माताएँ भी नित्य प्रणम्य हैं; स्नेह, प्रणय और भरण-पोषण में सब मेरी समान माताएँ हैं।”
“भरत और शत्रुघ्न, जो मुझे प्राणों से प्रिय हैं, उन्हें आप विशेष रूप से अपने भाई या पुत्र-सम देखिएगा। हे वैदेहि, भरत का कभी अप्रिय मत कीजिएगा; अब वही, मानो, हमारे देश और कुल का राजा है। राजा अच्छे आचरण और निरंतर सेवा से प्रसन्न होते हैं, अन्यथा कुपित। नरेश अहितकारी होने पर अपने औरस पुत्रों को भी त्याग देते हैं, और हितैषी जनों को भी अपना लेते हैं। अतः हे कल्याणि, राजा के संरक्षण में, भरत के अनुकूल, धर्म में रत और सत्यव्रत-परायणा होकर अयोध्या में रहिए। मैं महावन जाता हूँ, हे भामिनी; आपको यहीं रहना है। ऐसे रहिएगा कि किसी को ठेस न पहुँचे; यही मेरी सीख है।”
सार: राम सीता को दो वरों की कथा और चौदह वर्ष के वनवास का सत्य बताते हैं, और उसे अयोध्या में रहकर भरत के अनुकूल आचरण, सास-ससुर की सेवा, तथा भरत-शत्रुघ्न को भाई-पुत्र-सम मानने का उपदेश देते हैं।
सीता का संकल्प
ऐसा कहे जाने पर, प्रिय-वचना और पति की कृपा-योग्य वैदेही ने प्रणयवश ही कुछ क्रुद्ध होकर पति से कहा, “हे राम, यह कैसा हल्का वचन आप बोलते हैं, जिसे सुनकर मुझे हँसी आती है, हे नरवरोत्तम? शस्त्रास्त्र-विद्या जानने वाले वीर राजपुत्रों के लिए यह अयोग्य और अपयश-कारी वचन है, सुनने योग्य नहीं। हे आर्यपुत्र, पिता, माता, भाई, पुत्र और बहू, सब अपने-अपने पुण्य भोगते, अपने-अपने भाग्य का आश्रय लेते हैं; पर भर्ता का भाग्य ही पत्नी पाती है। इसी से मुझे भी, आप के साथ, वन में रहने का आदेश है।”
“स्त्रियों के लिए न पिता, न पुत्र, न आत्मा, न माता, न सखीजन; इस लोक और परलोक में पति ही एकमात्र गति है। हे राघव, यदि आप आज ही दुर्गम वन को चलते हैं, तो मैं कुश-कंटक कुचलती हुई आपके आगे चलूँगी। ईर्ष्या और रोष बाहर कर, जैसे पिए-बचे जल को कोई फेंक देता है, वैसे ही हे वीर, निःशंक होकर मुझे ले चलिए; मुझमें कोई पाप नहीं। प्रासाद-शिखर, विमान या आकाश-गमन से भी, हर अवस्था में भर्ता के चरणों की छाया स्त्री के लिए श्रेष्ठ है।”
“माता-पिता ने मुझे आपके प्रति आचरण विविध प्रकार से सिखाया है; अब मुझे यह कहने की आवश्यकता नहीं कि मैं कैसे रहूँ। मैं उस दुर्गम, नाना मृग-समूहों से भरे, व्याघ्रों से सेवित वन में आपके साथ चलूँगी; पतिव्रत का चिंतन करती, तीनों लोकों की भी परवाह न करती, मैं वन में पिता के घर-सी सुख से रहूँगी। संयम और ब्रह्मचर्य से आपकी नित्य सेवा करती, मधु-गंध-भरे वनों में आपके साथ विहार करूँगी। आप तो वन में दूसरों का भी पालन कर सकते हैं, फिर मुझ अपनी वश्य भार्या का तो कहना ही क्या, हे मानद?”
“मैं आज आपके साथ अवश्य वन चलूँगी; मुझ उद्यत को कोई नहीं रोक सकता, हे महाभाग। मैं नित्य फल-मूल खाऊँगी और आपके साथ रहती कभी आपको दुःख न दूँगी। आपके आगे चलूँगी, आपके भोजन कर लेने पर ही खाऊँगी। आपके साथ निर्भय होकर पर्वत, पल्वल और सरोवर देखना चाहती हूँ; हंस-कारंडवों से भरे, सुपुष्पित कमल-सरोवरों में नित्य अनुव्रता होकर स्नान करूँगी और परम आनंद से विहार करूँगी। आपके साथ हज़ारों या लाखों वर्ष भी बिताऊँ, तो कोई शोक न होगा; आपके बिना स्वर्ग भी मुझे स्वीकार नहीं। हे नरव्याघ्र, आपके बिना स्वर्ग में वास मिले तो भी मुझे न रुचेगा।”
“मैं उस सुदुर्गम, मृग-वानर-गजों से भरे वन में जाऊँगी और आपके चरणों का आश्रय लेकर, आपसे सम्मानित होकर, पिता के घर-सी रहूँगी। अनन्य-भाव से अनुरक्त, आपसे वियुक्त होने पर मरण को निश्चित मुझ को, हे प्रिय, ले चलिए और मेरी याचना पूरी कीजिए; मैं आप पर भार न बनूँगी।” धर्म-वत्सला सीता के ऐसा कहने पर भी नरश्रेष्ठ राम उसे वन ले जाना नहीं चाहते थे; वन-निवास के दुःखों को विस्तार से कहकर वे उसे उसके संकल्प से लौटाने का प्रयत्न करने लगे।
सार: सीता प्रणयवश रोष से कहती हैं कि पति ही स्त्री की एकमात्र गति है, और वन में पति-संग को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ मानती हैं। राम फिर भी उसे ले जाना नहीं चाहते और वन के कष्ट गिनाकर लौटाने का प्रयत्न करते हैं।
वन के काँटे गिनाते राम, और सीता का अटल हृदय
धर्म से प्रेम रखने वाले राम के मन में अब भी यही था कि सीता को वन के दुःख न झेलने पड़ें। आँसुओं से धुँधली आँखों वाली सीता को सान्त्वना देकर उन्होंने फिर से उन्हें लौटाने की मनसा से कहा, “हे सीते, आप महान कुल में जन्मी हैं और सदा धर्म में रत रहती हैं। आप यहीं रहकर धर्म का आचरण कीजिए, जिससे हमारे मन को सुख मिले।”
फिर उन्होंने वनवास के एक-एक संकट गिनाने आरम्भ किए। “हे अबला (कोमल नारी), वन के बहुत-से दोष हैं, उन्हें हमसे सुनिए। वन इस वनवास का विचार ही छोड़ दीजिए; घना वन तो अनेक संकटों से भरा कान्तार (दुर्गम जंगल) कहा जाता है। यह हम आपके हित-बुद्धि से कह रहे हैं; वन में सदा सुख नहीं, हमारी जानकारी में तो वह सदा दुःख ही है।
“पर्वत-झरनों के शोर से और भी ऊँची होती सिंहों की दहाड़ें सुनने में दुःखदायी हैं। निर्भय होकर क्रीड़ा करते मतवाले वन-पशु मनुष्य को देखकर चारों ओर से टूट पड़ते हैं। नदियाँ ग्राहों (मगरमच्छों) से भरी और दलदली हैं, मतवाले हाथी तक उन्हें पार नहीं कर पाते। मार्ग जल-रहित और अत्यन्त ऊबड़-खाबड़ हैं, लताओं-काँटों से ढके और जंगली मुर्गों के शोर से गूँजते। फल खोजने के परिश्रम से थककर रात में अपने-आप गिरे सूखे पत्तों की शय्या पर सोना पड़ता है।
“दिन-रात संयमपूर्वक मन को वश में रखकर वृक्षों से स्वयं गिरे फलों से ही भूख मिटानी पड़ती है। हे मैथिलि (मिथिला की राजकुमारी), शक्ति के अनुसार उपवास करना पड़ता है, सिर पर जटा-भार धारण करना और वल्कल (वृक्ष की छाल के वस्त्र) पहनना पड़ता है। विधिपूर्वक देवताओं और पितरों की पूजा तथा अनायास आ पहुँचे अतिथियों का नित्य सत्कार करना होता है। नियमपूर्वक रहने वालों को प्रातः, मध्याह्न और सायं तीनों समय स्नान करना पड़ता है। अपने हाथों से चुने फूलों से ऋषि-विधि के अनुसार वेदी पर पूजा करनी पड़ती है।
“वहाँ अत्यन्त तेज़ हवा चलती है, घोर अन्धकार रहता है, भूख सदा प्रचण्ड रहती है और बड़े-बड़े भय भी हैं। हे भामिनि (तेजस्विनी), अनेक प्रकार के सर्प गर्व से मार्गों पर रेंगते हैं। नदियों में रहने वाले और नदी की भाँति टेढ़े-मेढ़े चलने वाले साँप राह रोककर पड़े रहते हैं। पतंगे, बिच्छू, कीड़े, डाँस और मच्छर नित्य सताते हैं। काँटेदार वृक्ष, कुश और काश घास अपनी शाखाओं को चारों ओर फैलाए रहते हैं। क्रोध और लोभ का सर्वथा त्याग करना पड़ता है, मन को तप में लगाना पड़ता है, और जिससे डरना चाहिए उससे भी नहीं डरना पड़ता।
“इसलिए वन जाने का विचार छोड़ दीजिए; वन आपके लिए क्षेम (सुरक्षित) नहीं है। सोचने पर हमें तो वन बहुत दोषों से भरा ही दिखाई पड़ता है।” महात्मा राम के इतना कहने पर भी उनकी बात स्वीकार करने को सीता का मन न हुआ, और अत्यन्त दुःखी होकर उन्होंने राम से उत्तर दिया।
सार: राम वन के एक-एक कष्ट गिनाकर सीता को रोकना चाहते हैं, पर धर्मवत्सला सीता का मन डिगता नहीं। यहाँ वाल्मीकि का वन यथार्थ का दुर्गम वन है, कोई रमणीय तपोवन नहीं।
सीता का प्रत्युत्तर: साथ रहूँ तो वन भी स्वर्ग है
राम का यह वचन सुनकर, स्नेह से भरी और आँसू बहाती सीता ने कोमलता से कहा, “हे राघव, वन-निवास के विषय में आपने जो दोष बताए, उन्हें आप मेरे प्रति स्नेह के कारण गुण ही मानिए। हे राघव, हरिण, सिंह, हाथी, बाघ, शरभ (आठ पैरों वाला कल्पित पशु, सिंह से भी बलवान कहा जाता है), चँवर-गाय और अन्य वनचर पशु आपका रूप पहले कभी न देखने के कारण आपको देखते ही भाग खड़े होंगे, क्योंकि सब आपसे डरते हैं।
“माता-पिता की आज्ञा से मुझे आपके साथ अवश्य चलना है, क्योंकि मैं आपकी अर्धांगिनी हूँ और आपके बिना नहीं जी सकती। हे राम, आपसे वियोग होने पर मुझे यहाँ जीवन त्याग ही देना होगा। आप मेरे समीप रहते हुए तो साक्षात इन्द्र भी मुझे अपने बल से नहीं दबा सकते।
“हे महाप्राज्ञ (परम बुद्धिमान), पहले पिता के घर में मैंने ब्राह्मणों से सुना था कि मुझे किसी समय वन में रहना पड़ेगा। शरीर के लक्षण पहचानने वाले ब्राह्मणों से यह सुनकर मैं सदा वनवास के लिए उत्साहित रही हूँ। हे प्रिय, वनवास की वह भविष्यवाणी मुझे सत्य करनी ही है, इसलिए मैं अपने पति आपके साथ चलूँगी, इसमें अन्यथा कुछ नहीं। यह काल अब आ पहुँचा है; ब्राह्मणों का वचन सत्य हो।
“वनवास में अनेक प्रकार के दुःख हैं, यह मैं जानती हूँ; पर वे तो अजितेन्द्रिय (इन्द्रियों को न जीतने वाले) पुरुषों को ही भोगने पड़ते हैं। हे वीर, कुमारी अवस्था में पिता के घर एक शान्त-स्वभाव भिक्षुणी ने मेरी माता के सामने भी यही कहा था कि मुझे आपके साथ वनवास करना होगा। आपके साथ वन में जाने की अभिलाषा मुझे बहुत पहले से है।
“हे राघव, मैं आपके साथ वन-गमन के क्षण की प्रतीक्षा करती रही हूँ; आपका कल्याण हो। हे शुद्धात्मन्, पति के पीछे-पीछे वन जाती हुई मैं प्रेमपूर्वक सब पापों से मुक्त हो जाऊँगी, क्योंकि स्त्री के लिए पति ही परम देवता है। यशस्वी ब्राह्मणों से सुनी यह पवित्र श्रुति है कि जिस पुरुष को इस लोक में पिता-माता ने जल हाथ में लेकर अपने धर्म के अनुसार कन्या दान में दी, परलोक में भी वह स्त्री उसी की पत्नी रहती है।

“हे प्रभो, इसी कारण पहले भी कई बार आपसे मैंने वन ले चलने का अनुरोध किया है। मुझ-जैसी सुशीला, पतिव्रता पत्नी को आप किस कारण इस नगर से ले जाने में असहमत हैं? हे काकुत्स्थ, सुख-दुःख में समान रहने वाली, भक्तिमती, दीन मुझ पतिव्रता को आप साथ ले चलने योग्य ही हैं। यदि आप मुझ दुःखिया को वन ले जाना नहीं चाहते, तो मैं मृत्यु के लिए विष, अग्नि या जल का आश्रय ले लूँगी।”
इस प्रकार सीता ने अनेक प्रकार से वन-गमन के लिए याचना की, फिर भी महाबाहु राम ने उन्हें उस निर्जन वन में ले चलना स्वीकार न किया। तब सीता चिन्ता में डूब गईं और उनकी आँखों से गिरे गर्म आँसुओं से मानो धरती भीगने लगी। उनके इस संकल्प से उन्हें रोकने के लिए आत्मवान राम ने प्रेम से उपजे क्रोध से भरी उस वैदेही को बहुत प्रकार से समझाया।
सार: सीता अपने सतीधर्म, माता-पिता की आज्ञा और बाल्यकाल में सुनी भविष्यवाणी का हवाला देकर साथ चलने का अटल आग्रह करती हैं; वियोग में मृत्यु तक का संकल्प कह देती हैं।
“मेरे राम में पराक्रम नहीं” यह कलंक न लगे
राम के समझाने पर मैथिली सीता ने स्नेह और अभिमान से राघव पर मानो व्यंग्य-बाण चलाया। उन्होंने कहा, “हे राम, क्या मिथिलापति मेरे पिता वैदेह ने आप-जैसे जामाता को पाकर आपको पुरुष-रूप में स्त्री समझ लिया था? यदि आप मुझे साथ न ले गए तो अयोध्या के लोग अज्ञानवश यह झूठ कहेंगे कि ‘सूर्य की भाँति देदीप्यमान होकर भी राम में परम पराक्रम नहीं है।’ यह मेरे लिए दुःख की बात होगी।
“कौन-सी बात सोचकर आप विषाद में पड़े हैं, अथवा आपको किस बात का भय है, जो आप अनन्यपरायणा मुझे त्याग देना चाहते हैं? जैसे सावित्री द्युमत्सेन-पुत्र वीर सत्यवान की अनुगामिनी थीं, वैसे ही मुझे अपने वश में चलने वाली समझिए। हे अनघ (निष्पाप), मैं कुल को कलंकित करने वाली किसी अन्य स्त्री की भाँति मन से भी आपके सिवा किसी और को नहीं देखूँगी; हे राघव, मुझे आपके साथ चलना ही है।
“हे राम, बाल्यावस्था में विवाही और चिरकाल आपके साथ रही अपनी सती पत्नी को क्या आप किसी नट की भाँति स्वयं दूसरों को सौंप देना चाहते हैं? हे अनघ, जिसके वश में और जिसके लिए आप मुझे रहने को कह रहे हैं, आप सदा उसी के वशवर्ती और आज्ञाकारी बने रहें। आप मुझे साथ लिए बिना वन को न जाइए। तप हो, वन हो या स्वर्ग, सब आपके साथ ही मुझे स्वीकार है।
“आपके पीछे चलते हुए वन-मार्गों पर मुझे उद्यान में टहलने या शय्या पर सोने से अधिक श्रम न होगा। कुश, काश, सरकंडे और काँटेदार झाड़ियाँ आपके साथ रहते हुए मेरे तलवों को रुई या कोमल मृगचर्म-सी छुएँगी। आँधी से उठी जो धूल मुझ पर पड़ेगी, हे रमण, उसे मैं अनमोल चन्दन के समान मानूँगी। वन के बीच घास पर आपके साथ लेटूँगी, तो क्या कोमल बिछौनों वाली शय्या उससे अधिक सुखदायी होगी?
“पत्ते, मूल या फल, थोड़ा या बहुत, जो भी आप स्वयं लाकर मुझे देंगे, वह मुझे अमृत-सा लगेगा। वहाँ ऋतु के फूल-फल भोगती हुई मैं न माता को, न पिता को, न घर को याद करूँगी। मेरे साथ रहने से आपको कोई अप्रिय बात न देखनी पड़ेगी, न मेरे कारण शोक होगा, न मैं दुर्भर (भारी) सिद्ध होऊँगी। आपके साथ का निवास स्वर्ग है, आपके बिना का नरक; यही मेरी परम प्रीति जानकर, हे राम, मुझे साथ लेकर वन को चलिए।
“यदि आप मुझे वन ले जाना निश्चय ही नहीं चाहते, तो मैं आज ही विष पी लूँगी, पर शत्रुओं के वश में नहीं जाऊँगी। आपसे बिछुड़कर मैं पीछे जी भी न सकूँगी; हे नाथ, इससे तो आपके सामने ही मर जाना श्रेष्ठ है। मैं इस शोक को क्षण भर भी सहने में असमर्थ हूँ, फिर चौदह वर्ष कैसे सहूँगी?”
इस प्रकार करुण विलाप कर, थकी हुई सीता पति से लिपटकर ऊँचे स्वर में रो पड़ीं। अनेक कठोर वचनों से बिंधी हुई वे चिरकाल से रोके आँसू वैसे ही छोड़ने लगीं, जैसे काठ रगड़ से अग्नि उगलता है। उनकी आँखों से स्फटिक-सा निर्मल जल, सन्ताप से उपजा, दो कमलों से झरते जल की भाँति बहने लगा। पूर्णिमा के निष्कलंक चन्द्र-सा चमकता उनका बड़े नेत्रों वाला मुख जल से निकाले कमल की भाँति गर्म आँसुओं से सूखने लगा। मूर्च्छित-सी दुःखिया सीता को बाँहों में भरकर राम ने उन्हें भरपूर आश्वासन देते हुए कहा।
“हे देवि, आपको कष्ट देकर मिले स्वर्ग में भी मुझे रुचि नहीं। ब्रह्मा की भाँति मुझे किसी ओर से कोई भय नहीं है। हे शुभानने (सुन्दर मुखवाली), आपका पूरा मन न जानने के कारण ही, रक्षा में समर्थ होते हुए भी, मैंने आपका वन-वास स्वीकार नहीं किया था। हे मैथिलि, जब आप मेरे साथ वन में रहने को ही सृजी गई हैं, तो जैसे आत्मज्ञानी अपनी प्रीति नहीं त्याग सकता, वैसे ही मैं आपको नहीं त्याग सकता। हे गजगामिनी, पूर्वकाल में सत्पुरुषों ने जिस धर्म का आचरण किया, उसी का मैं अनुसरण करूँगा; जैसे सुवर्चला (संज्ञा, सूर्य-पत्नी) सूर्य का अनुसरण करती हैं, वैसे ही आप मेरा अनुसरण कीजिए।
“हे जनकनन्दिनि, ऐसा नहीं कि मैं वन न जाऊँ; पिता का सत्य से बँधा वह वचन मुझे वन ले जा रहा है। माता-पिता के वश में रहना ही धर्म है; उनकी आज्ञा का उल्लंघन कर मैं जीना नहीं चाहता। स्वर्ग, धन, धान्य, विद्या, पुत्र और सुख, गुरुजनों की आज्ञा पालने से कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। माता-पिता और गुरु की सेवा के समान न सत्य, न दान-मान, न दक्षिणा-युक्त यज्ञ परलोक में सुख देने वाला है। हे सीते, अब आप मेरे साथ दण्डक-वन चलने के लिए दृढ़ निश्चय कर ही चुकी हैं, इसलिए आपको न ले जाने का मेरा पुराना निश्चय शिथिल हो गया है।
“हे निर्दोष अंगों वाली भीरु, अब आप मेरे साथ वन चलिए और वनवासियों के धर्माचरण में मेरी सहधर्मचारिणी बनिए। हे सीते, आपने सब प्रकार से मेरे और अपने कुल के योग्य ही निश्चय किया है। हे शुभश्रोणि, अब वनवास के योग्य कार्य आरम्भ कीजिए; आपके बिना अब मुझे स्वर्ग भी नहीं रुचता। ब्राह्मणों को रत्न और याचक भिक्षुओं को भोजन दीजिए, और शीघ्रता कीजिए, विलम्ब न कीजिए।
“बहुमूल्य आभूषण, उत्तम वस्त्र, क्रीड़ा की सामग्री, शय्याएँ, वाहन, मेरे और आपके सब साधन, तथा ब्राह्मणों को देने के बाद जो शेष रहे, वह अपने सेवकवर्ग को बाँट दीजिए।” पति की सम्मति जानकर अत्यन्त प्रसन्न देवी सीता शीघ्र ही दान देने में लग गईं, और मनस्विनी यशस्विनी ने धर्मात्माओं को धन-रत्न बाँटने आरम्भ कर दिए।
सार: सीता की दृढ़ता और इस तर्क पर कि साथ न जाने से राम पर “पराक्रमहीन” का कलंक लगेगा, राम अन्ततः साथ ले जाना स्वीकार कर लेते हैं और सीता को सब सम्पत्ति दान में बाँटने को कहते हैं।
लक्ष्मण की याचना: मैं आगे-आगे चलूँगा
राम और सीता का यह संवाद सुनकर, कौसल्या के भवन से राम के साथ आए लक्ष्मण वियोग का शोक न सह सके; उनका मुख आँसुओं से भीग गया। बड़े भाई के चरण कसकर पकड़ते हुए रघुनन्दन लक्ष्मण ने महाव्रती राम और यशस्विनी सीता से कहा, “यदि आपने हरिण और हाथियों से भरे वन जाने का विचार कर ही लिया है, तो धनुष धारण कर मैं आगे-आगे चलते हुए आपके साथ चलूँगा। आपके साथ रहकर मैं पक्षियों और मृग-समूहों के शब्दों से गूँजते रमणीय वनों में विचरूँगा। आपके बिना न मैं देवलोक में जाना चाहता हूँ, न अमरत्व, न लोकों का ऐश्वर्य।”
राम ने अनेक मीठे वचनों से रोका, फिर भी वनवास के लिए दृढ़ लक्ष्मण ने फिर कहा, “जब आपने पहले ही मुझे साथ चलने की अनुमति दे दी थी, तो अब मुझे क्यों रोका जा रहा है? हे अनघ, मैं यह जानना चाहता हूँ कि किस कारण मुझे रोका जा रहा है; मेरे मन में सन्देह है।” हाथ जोड़े, आगे चलने को उत्सुक खड़े धीर लक्ष्मण से महातेजस्वी राम ने कहा, “हे सौमित्र, आप मुझ पर स्नेह रखने वाले, धर्म में रत, धीर, सत्पथ पर स्थिर, मुझे प्राणों के समान प्रिय, वश में रहने वाले और आज्ञाकारी हैं; आप मेरे मित्र भी हैं, इसलिए साथ चलने के सर्वथा योग्य हैं।
“पर हे सौमित्र, यदि आप भी आज मेरे साथ चले गए, तो यशस्विनी कौसल्या और सुमित्रा की सेवा कौन करेगा? जो महाराज पृथ्वी पर वर्षा-सी कृपा बरसाते थे, वे काम-पाश में बँध गए हैं। अश्वपति की पुत्री कैकेयी यह राज्य पाकर अपनी दुःखी सौतों के साथ अच्छा बर्ताव नहीं करेगी। राज्य पाकर कैकेयी में आसक्त भरत भी अत्यन्त दुःखिनी कौसल्या और सुमित्रा का भरण-पोषण नहीं करेंगे। इसलिए हे सौमित्र, आप अपने प्रयत्न से अथवा राजा की अनुग्रह-दृष्टि से यहीं कौसल्या की देखभाल कीजिए; मेरा यह कार्य पूरा कीजिए। इससे मेरे प्रति आपकी भक्ति प्रकट होगी और महान धर्म भी होगा।”
वाणी के मर्मज्ञ लक्ष्मण ने कोमल स्वर में उत्तर दिया, “हे वीर, आपके ही तेज से प्रेरित भरत कौसल्या और सुमित्रा का आदर करेंगे, इसमें सन्देह नहीं। यदि उत्तम राज्य पाकर अहंकार और दुर्बुद्धि से भरत अपनी माताओं की रक्षा न करें, तो उस दुर्बुद्धि क्रूर को मैं मार डालूँगा, उसके पक्षपातियों को भी, चाहे तीनों लोक उसके पक्ष में हों। और जिनके आश्रितों ने हज़ारों गाँव दान में पाए हैं, वे आर्या कौसल्या तो मुझ-जैसे हज़ार को पाल सकती हैं; वे अपना, मेरी माता का और मुझ-जैसों का भरण-पोषण करने में समर्थ हैं। इसलिए मुझे अपना अनुचर बनाइए; इसमें कोई अधर्म नहीं। मैं धनुष लेकर, कुदाल और टोकरी धारण कर, आपको मार्ग दिखाता हुआ आगे-आगे चलूँगा। आपके लिए नित्य कन्दमूल और फल ले आऊँगा; आप वैदेही के साथ पर्वत-शिखरों पर विहार करेंगे, मैं जागते-सोते सब समय आपकी सेवा करूँगा।”
इस वचन से अत्यन्त प्रसन्न राम ने कहा, “हे सौमित्र, जाइए, अपने सब स्वजनों से विदा माँग आइए। और महात्मा वरुण ने जनक के महायज्ञ में राजा को जो दो दिव्य धनुष, दो अभेद्य कवच, अक्षय बाणों वाले दो तरकश और सूर्य-सी निर्मल कान्ति वाली दो स्वर्ण-मण्डित तलवारें दी थीं, और जो जनक ने दहेज में मुझे दीं, वे सब आचार्य वसिष्ठ के घर पूजित होकर रखी हैं; उन्हें शीघ्र ले आइए।” अपने प्रियजनों से विदा लेकर और इक्ष्वाकु-गुरु वसिष्ठ के पास जाकर वनवास के लिए निश्चित लक्ष्मण वे उत्तम अस्त्र ले आए। मालाओं से सजे, दिव्य-रूप में पूजित उन सब अस्त्रों को सुमित्रापुत्र ने राम को दिखाया। लौटे हुए लक्ष्मण से राम ने प्रेम से कहा, “हे सौम्य, आप मेरी इच्छा के अनुसार मुहूर्त भर में ही लौट आए।
“हे परन्तप, अब आपके साथ मैं अपना सारा धन तपस्वी ब्राह्मणों को, गुरुओं में भक्ति रखने वाले श्रेष्ठ ब्राह्मणों को और अपने सब आश्रितों को बाँट देना चाहता हूँ। आप वसिष्ठ-पुत्र आर्य सुयज्ञ को और अन्य शिष्ट ब्राह्मणों को शीघ्र बुला लाइए; उन सबका सत्कार कर मैं वन को प्रस्थान करूँगा।”
सार: लक्ष्मण साथ चलने की हठ करते हैं; राम पहले उन्हें माताओं की सेवा हेतु रोकना चाहते हैं, फिर उनकी भक्ति देख स्वीकार कर लेते हैं और दान के लिए सुयज्ञ आदि ब्राह्मणों को बुलवाते हैं।
सुयज्ञ, त्रिजट और सम्पूर्ण धन का दान
बड़े भाई की आज्ञा शिरोधार्य कर लक्ष्मण शीघ्र सुयज्ञ के घर गए। अग्निशाला में बैठे उस ब्राह्मण को प्रणाम कर उन्होंने कहा, “हे मित्र, दुष्कर कार्य करने वाले राम के भवन में चलकर उसे अपनी आँखों से देखिए।” मध्याह्न की सन्ध्योपासना समाप्त कर सुयज्ञ लक्ष्मण के साथ राम के समृद्ध और रमणीय भवन में गए। वेदज्ञ सुयज्ञ को आया देख राम सीता के साथ हाथ जोड़कर उठे, मानो पूजित अग्नि का स्वागत कर रहे हों।
राम ने सुयज्ञ का सत्कार सोने के उत्तम अंगद (बाजूबन्द), सुन्दर कुण्डल, स्वर्ण-सूत्र में पिरोए मणि, केयूर (बाजू के ऊपर पहना जाने वाला आभूषण), कंकण तथा अनेक अन्य उत्तम आभूषणों से किया। फिर सीता की प्रेरणा से कहा, “हे सौम्य, आपकी पत्नी की सखी सीता उन्हें एक हार, एक स्वर्ण-सूत्र और एक करधनी देना चाहती हैं; इन्हें उन तक पहुँचा दीजिए। वन जाती हुई आपकी पत्नी की सखी आपकी पत्नी के लिए चित्रित अंगद और सुन्दर केयूर भी देना चाहती हैं। वैदेही नाना रत्नों से जड़ा और उत्तम बिछौने वाला एक पलंग भी आपके घर भेजना चाहती हैं। हे द्विजश्रेष्ठ, मेरे मामा ने शत्रुंजय नामक जो हाथी मुझे दिया था, उसे एक सहस्र स्वर्ण-मुद्राओं सहित मैं आपको देता हूँ।” वह सब स्वीकार कर सुयज्ञ ने राम, लक्ष्मण और सीता को मंगलमय आशीर्वाद दिए।
फिर जैसे ब्रह्मा इन्द्र से कहें, वैसे राम ने अपने प्रिय भाई लक्ष्मण से कहा, “हे सौमित्र, ब्राह्मणश्रेष्ठ अगस्त्य (अगस्त्य-पुत्र) और कौशिक (विश्वामित्र-पुत्र), दोनों को बुलाकर रत्नों से उनका सत्कार कीजिए, और हे महाबाहु, जैसे मेघ धरती को जल से सींचता है, वैसे एक-एक सहस्र गायों, स्वर्ण-रजत और बहुमूल्य मणियों से उन्हें तृप्त कीजिए। जो ब्राह्मण नित्य कौसल्या की आशीर्वाद-सहित सेवा करता है, जो तैत्तिरीय शाखा का आचार्य और वेदवित् है, उसे वाहन, दासियाँ, रेशमी वस्त्र और जितने से वह तृप्त हो, उतना धन दिलवाइए।
“चिरकाल से सेवा करने वाले सारथि-मन्त्री आर्य चित्ररथ को बहुमूल्य रत्न, वस्त्र, धन और सब प्रकार के पशु तथा एक सहस्र गायों से सन्तुष्ट कीजिए। जो अनेक दण्डधारी ब्रह्मचारी कठ और कलाप शाखाओं के स्वाध्याय में लगे रहते हैं और महान् लोगों द्वारा भी सम्मानित हैं, उन्हें रत्नों से भरे अस्सी ऊँट, चावल लादे एक सहस्र बैल और खेती के दो सौ बैल दिलवाइए। हे सौमित्र, भोजन में स्वाद के लिए दूध-दही आदि देने वाली एक सहस्र गायें और जुटाइए। जो ब्रह्मचारी व्रत-समाप्ति पर विवाह की इच्छा से कौसल्या की सेवा करते हैं, उन्हें एक-एक सहस्र गायें दिलवाइए, जिससे मेरी माता कौसल्या प्रसन्न हों।”
तब पुरुषश्रेष्ठ लक्ष्मण ने कुबेर की भाँति राम का वह सब धन ब्राह्मणों में बाँटा। आँसू बहाते आश्रितों से राम ने कहा, “मेरे लौटने तक लक्ष्मण का और मेरा यह घर आप सब बारी-बारी से सुरक्षित रखिए।” फिर कोषाध्यक्ष से कहा, “मेरा धन यहाँ लाया जाए।” वहाँ धन का देखने योग्य विशाल ढेर लग गया, जिसे राम ने लक्ष्मण के साथ ब्राह्मणों, बालकों, वृद्धों और दीन-दुखियों में बँटवा दिया।
एक उप-कथा: उन दिनों अयोध्या के पास वन में गर्गवंशी त्रिजट नामक एक दरिद्र ब्राह्मण रहते थे, जो खेत खोदकर जीते और कुदाल-कुल्हाड़ी ढोते थे। उनकी युवती पत्नी ने बच्चों को साथ लेकर कहा, “पति स्त्रियों का देवता है, उन्हें आज्ञा देना उचित नहीं, फिर भी मेरी बात मानिए: कुल्हाड़ी-कुदाल छोड़कर धर्मज्ञ राम के पास जाइए, कुछ अवश्य मिलेगा।” फटी धोती लपेटे त्रिजट राम के भवन की ओर चल पड़े। तेज में भृगु-अंगिरा से समान वे पाँचवें द्वार तक बिना रोके पहुँच गए और राम से बोले, “हे राजपुत्र, मैं निर्धन हूँ पर बहुत बच्चों वाला; मेरी रक्षा कीजिए।” राम ने हँसी से कहा, “मैंने अभी एक सहस्र गायें भी दान नहीं की हैं; आप दण्ड फेंककर जितनी दूरी तक की गायें घेर लें, उतनी पाएँगे।” त्रिजट ने धोती कसकर पूरे बल से दण्ड घुमाकर फेंका; वह सरयू पार कर अनेक सहस्र गायों के झुंड में एक बैल के पास जा गिरा। राम ने उन्हें गले लगाकर उस स्थान से सरयू-तट तक की सब गायें त्रिजट के आश्रम भिजवा दीं, और कहा, “क्रोध न कीजिए, यह तो मेरा हँसी-विनोद था। आप और कुछ चाहें तो माँगिए; मेरा धन ब्राह्मणों के लिए ही कमाया गया है, और आप-जैसों को देने से ही मुझे यश मिलेगा।” सपत्नीक त्रिजट गायों का झुंड पाकर प्रसन्न हुए और राम को यश-बल-सुख बढ़ाने वाले आशीर्वाद दिए।
राम ने अपना समस्त धन यथायोग्य स्वजनों, मित्रों, सेवकों, ब्राह्मणों और भिक्षाजीवी दरिद्रों में बाँट दिया; उस समय अयोध्या में ऐसा कोई न रहा जो सम्मान, दान और सत्कार से तृप्त न हुआ हो।
सार: वन जाने से पूर्व राम और सीता अपना सम्पूर्ण ऐश्वर्य ब्राह्मणों, सेवकों और दीनों को दान कर देते हैं; त्रिजट-प्रसंग राम की उदारता और विनोद-वृत्ति दोनों दिखाता है।
पिता को विदा कहने की राह में नगर का विलाप
सीता के साथ ब्राह्मणों को प्रचुर धन देकर दोनों राघव अपने पिता दशरथ से मिलने चले। उनके पीछे दो सेवकों के हाथों में, मालाओं से सजे और सीता द्वारा चन्दन से पूजित, दोनों भाइयों के अस्त्र शोभा पा रहे थे। मन्दिरों, हवेलियों और सात-मंज़िली भवनों की छतों पर चढ़कर सम्पन्न लोग उदास होकर उन्हें देख रहे थे। गलियाँ भीड़ से भरी थीं, इसलिए लोग छतों से ही दुःखी होकर राम को निहार रहे थे। पैदल चलते, छोटे भाई और सीता सहित राम को देखकर शोक से व्याकुल लोग कहने लगे:
“जिस राम के पीछे कभी चतुरंगिणी सेना चलती थी, वही आज अकेले सीता के साथ चल रहे हैं, और पीछे केवल लक्ष्मण हैं। ऐश्वर्य के सुख और भोगों के भण्डार होकर भी, धर्म के गौरव से प्रेरित होकर, वे पिता का वचन झूठा नहीं करना चाहते। जिन सीता को पहले आकाशचारी प्राणी भी नहीं देख पाते थे, उन्हें आज राजमार्ग पर खड़े लोग देख रहे हैं। अंगराग और रक्त-चन्दन से सजने वाली सीता को वर्षा, गर्मी और सर्दी शीघ्र ही विवर्ण (मलिन) कर देगी।
“आज दशरथ अवश्य किसी अशुभ भाव से बोल रहे हैं; राजा अपने प्रिय पुत्र को कभी वनवास नहीं दे सकता। गुणहीन पुत्र का भी निर्वासन कठिन है, फिर जिसने केवल अपने चरित्र से सारे लोक को जीत लिया, उसका कैसे? इस जगत्पति के दुःख से समस्त जगत वैसे ही पीड़ित है, जैसे जल के घटने से जलचर। ये महातेजस्वी राम मनुष्यों के मूल हैं, और शेष लोग फूल-फल-पत्ते और शाखाएँ; इसलिए, चलो, हम भी अपने उद्यान, खेत और घर छोड़कर लक्ष्मण की भाँति, पत्नियों और बन्धुओं के साथ, सुख-दुःख में समान भागी होकर धर्मात्मा राम के पीछे चलें।
“हमारे छोड़े हुए, धन-धान्य से रहित, धूल से ढके, देवताओं से त्यागे ये घर कैकेयी भोगे। जहाँ राम जाएँगे, वही वन नगर बन जाए, और हमारा छोड़ा यह नगर वन हो जाए। हमारे भय से डरकर साँप अपने बिल, मृग-पक्षी पर्वत-शिखर और हाथी-सिंह वन छोड़ दें। पुत्र और बन्धुओं सहित कैकेयी वही प्रदेश भोगे जहाँ क्रूर पशु-पक्षी रहते हैं; हम सब राघव के साथ वन में सुखपूर्वक रहेंगे।” अनेक लोगों के ये नाना वचन सुनकर भी राम का मन तनिक भी विचलित न हुआ।
मतवाले हाथी की चाल से चलते धर्मात्मा राम कैलास-शिखर-सी आभा वाले माता कैकेयी के भवन की ओर बढ़े, जहाँ पिता ठहरे थे। राजभवन में प्रवेश कर उन्होंने पास ही खड़े उदास सुमन्त्र को देखा। अयोध्या के लोगों को दुःखी देखकर भी अनार्त-रूप (निश्चिन्त) दिखते राम मानो मुस्कराते हुए पिता को देखने और उनकी आज्ञा विधिवत निभाने के लिए आगे बढ़े। पिता को सूचित करने हेतु वे क्षण भर रुके और सुमन्त्र से कहा, “महाराज को मेरे आगमन की सूचना दे दीजिए।”
सार: पिता से विदा माँगने जाते राम के पथ पर पूरी अयोध्या विलाप करती है; प्रजा साथ वन चलने तक की बात कहती है, पर राम का मन अविचल रहता है।
दशरथ की मूर्च्छा और राम का दृढ़ निश्चय
कमल-नयन, श्याम और अनुपम राम ने सूत से कहा, “पिता को मेरी सूचना दे दीजिए।” भीतर जाकर सुमन्त्र ने लम्बी साँसें भरते राजा को देखा, मानो ग्रहण-ग्रस्त सूर्य, राख से ढकी अग्नि, या जल-रहित तालाब हो। हाथ जोड़कर सूत ने जय की आशीर्वाद के साथ मन्द, कोमल, भय से काँपते स्वर में कहा, “हे राजन्, ब्राह्मणों और आश्रितों को सब धन देकर आपके पुरुषश्रेष्ठ पुत्र राम द्वार पर खड़े हैं। सब स्वजनों से विदा लेकर वे आपके दर्शन की इच्छा रखते हैं; वे महावन को जाने वाले हैं, इसलिए किरणों से घिरे सूर्य की भाँति राजगुणों से युक्त उन राजकुमार को देख लीजिए।”
सत्यवादी, गम्भीरता में समुद्र-से और निर्मलता में आकाश-से दशरथ ने कहा, “सुमन्त्र, मेरी जितनी रानियाँ यहाँ हैं, सबको ले आओ; मैं सब पत्नियों से घिरकर राघव को देखना चाहता हूँ।” सुमन्त्र ने रनिवास में जाकर रानियों से राजा की आज्ञा कही। साढ़े तीन सौ युवतियाँ धृतव्रता कौसल्या को घेरकर, राम के वियोग से आँखें लाल किए धीरे-धीरे राजा के पास आईं। पत्नियों को आया देख राजा ने सूत से कहा, “अब मेरे पुत्र को ले आओ।” सुमन्त्र राम, लक्ष्मण और मैथिली को लेकर शीघ्र लौटे।
हाथ जोड़े आते पुत्र को दूर से देखते ही, आर्त राजा स्त्रियों से घिरे आसन से उठ पड़े और वेग से राम की ओर दौड़े, पर उन तक पहुँचने से पहले ही दुःख से मूर्च्छित होकर धरती पर गिर पड़े। राम और महारथी लक्ष्मण तुरन्त उनकी ओर लपके। राजभवन में आभूषणों की झंकार से मिश्रित “हाय! हाय!! राम!!!” का तुमुल नाद उठ खड़ा हुआ। राम और लक्ष्मण ने सीता के साथ राजा को बाँहों में सँभालकर रोते हुए पलंग पर लिटा दिया।
मुहूर्त भर में होश में आए, शोक-सागर में डूबे राजा से हाथ जोड़कर राम ने कहा, “हे महाराज, आप हम सबके स्वामी हैं, मैं आपसे विदा माँगता हूँ। दण्डकारण्य को प्रस्थान करते मुझ पर कृपा-दृष्टि कीजिए। लक्ष्मण को आज्ञा दीजिए और सीता मेरे साथ वन चलें; अनेक सच्चे कारणों से रोकने पर भी ये रुकना नहीं चाहते। हे मानद, शोक त्यागकर हम तीनों, लक्ष्मण, सीता और मुझे, वैसे ही विदा दीजिए जैसे प्रजापति ने अपने पुत्रों सनक आदि को।”
आज्ञा की प्रतीक्षा करते राम को देखकर, कैकेयी से एकान्त में प्रेरित और सत्य-पाश में बँधे राजा रोते हुए बोले, “हे राघव, मैं कैकेयी को वर देकर मोहित हो गया; आप मुझे बन्दी बनाकर आज ही अयोध्या के राजा बन जाइए।” धर्मधुरीण, वाणी-कुशल राम ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया, “हे राजन्, आप एक सहस्र वर्ष और पृथ्वी का पालन करें; मुझे राज्य की लालसा नहीं, मैं वन में रहूँगा। नौ और पाँच, चौदह वर्ष वन में बिताकर, प्रतिज्ञा पूरी कर, मैं फिर आपके चरण ग्रहण करूँगा।”
आँसू बहाते राजा बोले, “हे तात, शुभ, मंगलमय और निर्भय मार्ग पर निश्चिन्त मन से जाइए। हे रघुनन्दन, आप स्वभाव से सत्यनिष्ठ और धर्मप्रिय हैं; आपका वनवास का निश्चय पलटा नहीं जा सकता। फिर भी आज की यह रात किसी भी प्रकार न जाइए; एक दिन के दर्शन से ही मैं सुख पा लूँ। मुझे और अपनी माता को देखते हुए आज की रात रहिए; सब इच्छित भोगों से तृप्त होकर कल प्रातः चले जाइए।
“हे प्रिय पुत्र, आप सर्वथा दुष्कर कार्य कर रहे हैं, क्योंकि मेरे लिए ही आपने वन का आश्रय लिया है। पर हे राम, सत्य की शपथ, यह मुझे प्रिय नहीं; आग को राख-सी ढककर छल करने वाली स्त्री ने मुझे मेरे पथ से भटका दिया।” राम ने कहा, “हे नराधिप, मेरा वनवास का निश्चय अब नहीं डिगेगा। आपने युद्ध में कैकेयी को जो वर दिया था, उसे पूर्णतः निभाकर अपनी सत्यनिष्ठा प्रमाणित कीजिए। मैं चौदह वर्ष वनवासियों के साथ वन में रहूँगा; इसमें कोई आपत्ति न कीजिए। यह पृथ्वी भरत को दे दीजिए।
“मुझे न राज्य चाहिए, न सुख, न पृथ्वी, न ये सब भोग, न स्वर्ग, न जीवन; मैं केवल चाहता हूँ कि आप सत्यवादी रहें, मिथ्यावादी न हों। आपके सत्य और सुकृत की शपथ; आपको जो मलिनता असत्य से लगने वाली है, उसके बदले मैं शाश्वत राज्य, समस्त भोग, सम्पूर्ण पृथ्वी और मैथिली तक नहीं चाहता; आपका वचन सत्य हो। पिता देवताओं का भी देवता कहा गया है; इसलिए पिता के वचन को मैं देव-वचन मानकर पालूँगा। चौदह वर्ष बीतने पर, हे नृपश्रेष्ठ, आप मुझे लौटा हुआ पाएँगे; यह सन्ताप छोड़िए। हे पुरुषश्रेष्ठ, जिसे आँसुओं से भरे सब लोगों को सान्त्वना देनी चाहिए, वही आप विकार को क्यों प्राप्त हो गए? हे प्रभो, मेरे लिए यहाँ क्षण भर भी ठहरना सम्भव नहीं; आपका सन्ताप दूर हो।
“हे देव, उत्कण्ठा न कीजिए; हम वन में, जहाँ शान्त हरिण और नाना पक्षी रहते हैं, सुखपूर्वक विहार करेंगे। पिता देवताओं का भी देवता है, इसलिए मैं पिता का वचन देव-वचन मानकर ही करूँगा। मेरे द्वारा छोड़ी हुई यह पर्वत-खण्डों, नगरों और उपवनों सहित पृथ्वी भरत शासित करें; वे न इसका भोग करें, न गर्व, केवल राजा के लिए कल्याणमयी सीमाओं में रहें। आप पर असत्य का दोष न आए, इसके लिए ही मैं वन जाता हूँ।”
ऐसा कहते राम को गले लगाकर, सन्ताप और दुःख से पीड़ित राजा बिलकुल मूर्च्छित होकर धरती पर गिर पड़े और कोई चेष्टा न कर सके। कैकेयी को छोड़कर वहाँ उपस्थित सब रानियाँ रोने लगीं; सुमन्त्र भी रोते-रोते मूर्च्छित हो गए, और सारा भवन हाहाकार से भर उठा।
सार: राम के दर्शन मात्र से दशरथ मूर्च्छित हो जाते हैं और उन्हें बन्दी बनाकर स्वयं राजा बनने को कहते हैं; राम राज्य की पूर्ण अनिच्छा प्रकट कर पिता की सत्यनिष्ठा को सर्वोपरि बताते हैं।
सुमन्त्र की फटकार और कैकेयी की कठोरता

तब दशरथ का सूत सुमन्त्र सहसा सिर धुनकर, बार-बार साँसें भरकर, हाथ मसलकर, दाँत पीसते हुए, क्रोध से आँखें लाल किए, अशुभ सन्ताप से भरकर, मानो तीखे वाक्-बाणों से कैकेयी का हृदय कँपाते हुए, और अनुपम वज्र-से वचनों से उसके सब मर्म बेधते हुए बोला:
“हे देवि, जिसने अपने पति दशरथ को त्यागा, जो समस्त चराचर जगत के स्वामी हैं, आपके लिए कुछ भी अकार्य नहीं रहा। मैं आपको पतिघातिनी और अन्ततः कुलघातिनी मानता हूँ, जो अपने कर्मों से उस पति को सता रही हैं जो महेन्द्र-सा अजेय, पर्वत-सा अकम्प और समुद्र-सा अक्षोभ्य है। वरदाता पति दशरथ का अपमान न कीजिए; स्त्रियों के लिए पति की इच्छा करोड़ों पुत्रों से बढ़कर है। राजा की मृत्यु पर पुत्र आयु के क्रम से राज्य पाते हैं; इक्ष्वाकु-नाथ के जीते-जी ही आप इस मर्यादा का लोप करना चाहती हैं।
“आपका पुत्र भरत राजा बने, पृथ्वी का शासन करे; हम तो वहीं जाएँगे जहाँ राम जाएँगे। आपके राज्य में कोई ब्राह्मण भी न रहना चाहेगा। यदि आप आज ऐसा मर्यादाहीन कर्म करेंगी, तो हम सब राम के मार्ग पर ही चलेंगे। सब बन्धुओं, ब्राह्मणों और साधुओं से त्यागी जाकर आपको राज्य-लाभ से कौन-सी प्रीति मिलेगी? आश्चर्य है कि ऐसा करते हुए आपके पैरों तले धरती फट नहीं जाती, और महाब्रह्मर्षियों के धिक्कार-दण्ड आपको भस्म नहीं कर देते।
“आम का वृक्ष काटकर नीम को कौन सींचेगा? दूध से सींचने पर भी नीम मीठा नहीं होता। मैं आपका कुल भी आपकी माता के समान ही समझता हूँ; लोकोक्ति है कि नीम से मधु नहीं झरता।”
एक उप-कथा: सुमन्त्र ने कैकेयी की माता की दुर्बुद्धि का स्मरण कराया। किसी वरदाता ने कैकेय-नरेश, कैकेयी के पिता, को सब प्राणियों की बोली समझने का अनुपम वर दिया था, पर इस शर्त पर कि वे इसका भेद किसी को न बताएँ। एक रात शय्या पर किसी पक्षी की बोली सुनकर राजा हँसे। कैकेयी की माता हठ करने लगी, “हँसी का कारण बताइए, चाहे आप जिएँ या मरें।” राजा ने कहा, “बताऊँगा तो तत्काल मेरी मृत्यु हो जाएगी।” फिर भी रानी न मानी। राजा ने वरदाता से सब कह दिया। उस प्रसन्न वरदाता ने कहा, “वह मरे या निकल जाए, पर भेद मत बताइए।” राजा ने तुरन्त उस रानी को त्यागकर कुबेर-सा सुख से जीवन बिताया। सुमन्त्र ने कहा, “आप भी वैसे ही दुर्जनों के पथ पर चलकर मोहवश राजा को कुमार्ग पर प्रेरित कर रही हैं; यह लोकोक्ति सच जान पड़ती है कि पुरुष पिता पर और स्त्रियाँ माता पर जाती हैं।”
सुमन्त्र ने आगे कहा, “ऐसा न कीजिए; राजा जो कहें, वह स्वीकार कीजिए; पति की इच्छा का पालन कर इन प्रजाओं की रक्षिका बनिए। पापियों के बहकावे में आकर लोक-रक्षक, इन्द्र-तुल्य अपने पति को अधर्म में प्रेरित मत कीजिए। ज्येष्ठ, उदार, कर्मठ, स्वधर्म और जीवलोक के रक्षक बलवान राम का राज्याभिषेक हो। यदि राम पिता को छोड़कर वन गए, तो हे देवि, लोक में आपकी बड़ी निन्दा फैलेगी। राम अपना राज्य पालें, आप निश्चिन्त रहिए; इस श्रेष्ठ नगर में राम के सिवा कोई राजा आप पर प्रसन्न न रहेगा। राम के युवराज होने पर महाधनुर्धर दशरथ अपने पूर्वजों का आचरण स्मरण कर वन को चले जाएँगे।” इस प्रकार राजसभा में हाथ जोड़कर सुमन्त्र ने कठोर और कोमल दोनों वचनों से कैकेयी को बार-बार झकझोरा; पर वह देवी न क्षुब्ध हुई, न दुखी, न उसके मुख का रंग बदला।
सार: सुमन्त्र कठोर और कोमल दोनों वचनों से कैकेयी को धर्म-मर्यादा का स्मरण कराता है, उसकी माता का दृष्टान्त देता है; पर कैकेयी टस से मस नहीं होती।
असमंज का दृष्टान्त और सिद्धार्थ की मन्त्रणा
प्रतिज्ञा से बँधे दशरथ ने आँसू भरकर, लम्बी साँस लेकर सुमन्त्र से फिर कहा, “हे सूत, रत्नों से भरी चतुरंगिणी सेना शीघ्र राघव के साथ चलने को तैयार की जाए। वाक्-चतुर रूपजीवा (गणिकाएँ) और महाधनी व्यापारी राजकुमार की सेना की शोभा बढ़ाएँ। जो मल्ल उस पर निर्भर हैं और जिनके बल-परीक्षण में राम आनन्द लेते थे, उन्हें भी अनेक उपहार देकर साथ भेजो। मुख्य अस्त्र, सभ्य-सुसंस्कृत जन, बैलगाड़ियाँ और वन के मर्मज्ञ व्याध काकुत्स्थ के साथ चलें। मृग और हाथी मारता, जंगली मधु पीता, नाना नदियाँ देखता वह राज्य को न याद करेगा। मेरा जो धान्य-कोष और धन-कोष है, दोनों निर्जन वन में रहने जाते राम के साथ चलें। पुण्य-स्थानों में यज्ञ करता, दक्षिणा देता और ऋषियों से मिलता वह सुखपूर्वक वन में रहेगा। महाबाहु भरत अयोध्या का पालन करेंगे; श्रीमान राम सब भोगों सहित भेजे जाएँ।”
दशरथ के यों कहते ही कैकेयी भयभीत हो गई; उसका मुख सूख गया और स्वर रुक गया। खिन्न और भयभीत कैकेयी ने राजा की ओर मुख कर कहा, “हे साधो, मद्य के सार-रहित (शराब का नशीला अंश निकाल लेने पर बचे) झाग-जैसे, धन-विहीन, सूने और अभोग्य राज्य को भरत स्वीकार न करेंगे।” इस अत्यन्त निर्लज्ज और कठोर वचन पर बड़े नेत्रों वाली उस स्त्री से राजा ने कहा, “हे शत्रु-रूपिणी, हे अनार्ये, मुझे यह भार सौंपकर अब ढोते हुए मुझे क्यों कोंच रही हैं? यह कार्य आरम्भ करते समय पहले ही क्यों न रोक दिया?” इन क्रोध-भरे वचनों को सुनकर दुगुनी क्रुद्ध कैकेयी ने कहा, “आपके ही वंश में सगर ने अपने ज्येष्ठ पुत्र असमंज को त्याग दिया था; वैसे ही राम भी बिना किसी सहारे के जाएँ।” यह सुनकर राजा ने केवल “धिक्कार!” कहा; वहाँ उपस्थित सब लज्जित हुए, पर वह तनिक भी विचलित न हुई।
एक उप-कथा: वहाँ राजा के परम सम्मानित वृद्ध, शुचि और उपयुक्त (योग्य) महामात्र सिद्धार्थ ने कैकेयी से कहा, “असमंज खेलते बालकों को पकड़कर सरयू में फेंक देता और उसमें आनन्द लेता था। यह क्रूरता देख क्रुद्ध नागरिकों ने राजा सगर से कहा, ‘हे राष्ट्रवर्धन, या तो आप अकेले असमंज को रखिए, या हमें बचाइए।’ राजा ने त्याग का कारण पूछा तो प्रजा ने उसकी मूर्खता और बालक-हत्या की बात कही। प्रजा को प्रसन्न करने हेतु धार्मिक सगर ने उस अहितकारी पुत्र को सपत्नीक रथ पर चढ़ाकर ‘यह आजीवन निर्वासित रहे’ कहकर निकाल दिया। वह कुदाल-टोकरी लेकर पापी की भाँति दिशा-दिशा भटकता रहा।” सिद्धार्थ ने आगे कहा, “पर राम ने ऐसा कौन-सा पाप किया, जिसके कारण उन्हें राज्य से वंचित किया जा रहा है? हम राघव में कोई दोष नहीं देखते; नवचन्द्र में कलंक खोजना जितना कठिन है, उतना ही राम में दोष पाना। हे देवि, यदि आप कोई दोष देखती हैं तो आज ही ठीक-ठीक बताइए, तब राम वन भेजे जाएँ। निर्दोष और सत्पथ-निरत व्यक्ति का त्याग धर्म-विरुद्ध है; ऐसा करने वाला तो इन्द्र की कान्ति को भी भस्म कर देता है। इसलिए हे शुभानने, राम की राजलक्ष्मी का अपहरण मत कीजिए; लोक की निन्दा से भी बचिए।”
सिद्धार्थ का वचन सुनकर शोक से क्षीण स्वर वाले राजा ने कैकेयी से कहा, “हे पापरूपे, क्या आपको यह हितकारी वचन नहीं रुचते? कष्ट के मार्ग पर चलकर आप न मेरा हित जानती हैं, न अपना; आपकी चेष्टा सत्पथ से दूर और अनुचित है। आज मैं राज्य, सुख और धन त्यागकर अयोध्या की सारी प्रजा सहित राम के पीछे वन जाऊँगा; आप भरत के साथ चिरकाल यह राज्य सुख से भोगिए।”
सार: राम के साथ सेना-कोष भेजने पर कैकेयी असमंज का उदाहरण देकर अड़ती है; मन्त्री सिद्धार्थ असमंज और राम की तुलना को अनुचित बताते हैं और राजा कैकेयी से क्षुब्ध होकर स्वयं वन चलने तक की बात कह देते हैं।
वल्कल का प्रसंग और वसिष्ठ का रोष

महामात्र का वचन सुनकर विनयज्ञ राम ने नम्रता से दशरथ से कहा, “हे राजन्, भोग त्यागकर वन में कन्दमूल पर जीने वाले और सब आसक्ति छोड़ चुके मुझे सेना का क्या प्रयोजन? जो श्रेष्ठ हाथी देकर रस्सी पर मन लगाए, वह मूर्ख है; उत्तम गज को त्याग चुके के लिए रस्सी का क्या मोल? हे सत्पुरुषश्रेष्ठ, वैसे ही मुझे ध्वजिनी (सेना) से क्या? मैं सब कुछ भरत के लिए छोड़ता हूँ; माता कैकेयी की दासियाँ मुझे वल्कल ले आएँ, और मुझ चौदह वर्ष वन में रहने वाले के लिए एक कुदाल और एक टोकरी ले आएँ।”
तब कैकेयी स्वयं वल्कल ले आई और उस जनसमूह के बीच निर्लज्ज होकर राम से बोली, “इन्हें पहन लीजिए।” पुरुषश्रेष्ठ राम ने कैकेयी से वे दो वल्कल लेकर अपने महीन वस्त्र उतार दिए और मुनि-वेश धारण कर लिया। लक्ष्मण ने भी वहीं अपने सुन्दर वस्त्र छोड़कर पिता के सामने दो वल्कल पहन लिए। पर रेशमी वस्त्र पहने सीता उस वल्कल को देखकर वैसे ही डर गईं, जैसे फन्दे को देखकर हिरनी। अत्यन्त खिन्न होकर शुभलक्षणा जानकी ने कैकेयी के दिए कुश-वल्कल को मानो लज्जित होकर हाथ में लिया, और गन्धर्वराज-से अपने पति से कहा, “वन में रहने वाले मुनि वल्कल कैसे बाँधते हैं?” वल्कल पहनने में अनभ्यस्त सीता बार-बार चूक गईं। एक वल्कल गले में डाल और दूसरा हाथ में लेकर वे लज्जित खड़ी रह गईं। तब धर्मधुरीण राम ने पास जाकर स्वयं उनके रेशमी वस्त्र के ऊपर वल्कल बाँध दिया।

सीता पर वल्कल बँधते देख रनिवास की स्त्रियाँ आँसू बहाने लगीं और दुखी होकर तेजस्वी राम से बोलीं, “हे प्रभो, इस मनस्विनी को तो वनवास की आज्ञा नहीं मिली; हे वत्स, आप पिता के वचन से अकेले लक्ष्मण को साथ लेकर वन जाइए, यह कल्याणी तपस्विनी की भाँति वन में रहने योग्य नहीं। हे पुत्र, हमारी याचना मानिए, सीता यहीं रहें; धर्म ही जिसका सदा साथी है, वैसे आप तो रुकना नहीं चाहते।” फिर भी राम सीता के लिए वैसे ही वल्कल बाँधते रहे, जैसी सीता की इच्छा थी और जिनका शील राम से मेल खाता था।
सीता को वल्कल लेते देख राजगुरु वसिष्ठ ने आँखों में आँसू भरकर सीता को रोका और कैकेयी से कहा, “हे दुर्बुद्धि, कुलकलंकिनी कैकेयि, अति बढ़ चुकी आप राजा को छलकर भी मर्यादा पर नहीं ठहरतीं! हे शीलहीने, देवी सीता को वन नहीं जाना चाहिए; वे राम के लिए नियत आसन पर बैठेंगी। गृहस्थों के लिए पत्नी ही उनका आत्मा है; राम का आत्मा होकर सीता ही पृथ्वी का पालन करेंगी। यदि वैदेही राम के साथ वन जाएँगी, तो हम भी पीछे जाएँगे और यह नगर भी जाएगा। रनिवास के रक्षक भी वहीं जाएँगे जहाँ राम सपत्नीक रहेंगे; सम्पूर्ण कोसल-राष्ट्र और सम्पत्ति-सहित अयोध्या भी जाएगी। वल्कल पहने वनचर बने भरत और शत्रुघ्न भी वन में अपने अग्रज का अनुसरण करेंगे।

“तब हे दुर्वृत्ते, प्रजा की अहित-कामी आप अकेली वृक्षों-सहित सूनी, जन-रहित धरती का शासन करना। जिस राष्ट्र में राम राजा न हों, वह राष्ट्र टिकेगा नहीं, और जिस वन में राम रहेंगे, वही राष्ट्र बन जाएगा। पिता की स्वेच्छा से न दी गई पृथ्वी को भरत शासित न करेंगे, और यदि वे राजा के औरस पुत्र हैं, तो आपके साथ पुत्रवत भी न रहेंगे। आप धरती छोड़कर आकाश में उड़ जाएँ तो भी, पूर्वजों का आचरण जानने वाला भरत अन्यथा न करेगा। हे पुत्र-कामिनी, आपने पुत्र का अहित ही किया, क्योंकि लोक में राम का अनुगामी न हो, ऐसा कोई नहीं। हे कैकेयि, आप आज ही देखेंगी कि पशु, सर्प, मृग, पक्षी और सम्मुख झुके वृक्ष तक राम के साथ वन जाने को उत्सुक हैं।
“इसलिए हे देवि, वल्कल हटाकर अपनी पुत्रवधू को उत्तम आभूषण दीजिए; वल्कल इसके लिए नियत नहीं।” यों कहकर वसिष्ठ ने सीता को वह वस्त्र पहनने से रोका, और कहा, “हे कैकेय-राजपुत्रि, आपने केवल राम का वनवास माँगा था; इसलिए नित्य शृंगार-योग्य सीता भली प्रकार सजी-धजी राम के साथ वन में रहें। राजपुत्री उत्तम वाहनों, सेवकों, वस्त्रों और सब साधनों सहित जाएँ; वर माँगते समय आपने इनका निर्वासन नहीं माँगा था।” इतना कहने पर भी, पति का अनुसरण करने की इच्छुक सीता अपने संकल्प से तनिक भी न डिगीं।
सार: राम सेना ठुकराकर वल्कल माँगते हैं; कैकेयी स्वयं वल्कल लाती है। राम-लक्ष्मण उन्हें पहन लेते हैं, सीता को वल्कल बाँधने में राम सहायता करते हैं, और वसिष्ठ कैकेयी को कठोर फटकार लगाकर सीता का सादर वन-गमन सिद्ध करते हैं।
दशरथ की कैकेयी को फटकार और माता की चिन्ता
पति की रक्षा में रहते हुए भी अनाथ-सी सीता को वल्कल पहने देख वहाँ उपस्थित सब लोग चीख पड़े, “धिक्कार है आप दशरथ को, जो इस घोर अन्याय को नहीं रोकते!” उस तुमुल पुकार से दुखी राजा का जीवन, धर्म और अपने यश से सारा अनुराग टूट गया। उन्होंने गर्म साँस भरकर अपनी पत्नी कैकेयी से कहा, “हे कैकेयि, सीता कुश-वल्कल पहनकर जाने योग्य नहीं। मेरे गुरु वसिष्ठ ठीक कहते हैं कि सुकुमारी, बालिका और सदा सुख की अभ्यस्त सीता वन के योग्य नहीं। यह निर्दोष राजपुत्री, जो किसी का अनिष्ट नहीं करती, वल्कल पहनकर मूर्च्छित-सी क्यों जनों के बीच खड़ी है?
“सीता वल्कल छोड़ें; राजपुत्री सब रत्नों सहित सुखपूर्वक वन जाएँ। मैंने नीच प्रतिज्ञा बाँधी है, पर सीता को वल्कल पहनाने वाला यह अन्याय आपने बाल-बुद्धि से किया है; यह मुझे वैसे ही जलाएगा, जैसे फूलते समय बाँस अपने आप को। हे पापे, यदि राम ने आपका कुछ अनिष्ट किया हो, तो वैदेही ने आपका क्या बिगाड़ा, हे अधमे? हरिणी-सी विकसित नेत्रों वाली, कोमल-स्वभावा, मनस्विनी जनकात्मजा ने आपका क्या अपकार किया? राम को मुनि-वेश में वन भेजना ही आपके लिए पर्याप्त था; इन दीन पापों से आप और क्या पाना चाहती हैं? राम के अभिषेक के समय आपने जो वर माँगा, वह सुनकर मैं चुप रह गया था; पर अब उससे आगे बढ़कर, मैथिली को भी वल्कल पहनाकर, आप नरक जाना चाहती हैं।”
सिर झुकाए बैठे यों कहते पिता से, वन को प्रस्थान कर चुके राम ने कहा, “हे पिता, मेरी यशस्विनी माता धर्मात्मा कौसल्या वृद्ध हैं, उदार-स्वभावा हैं और कभी आपकी निन्दा नहीं करतीं। हे वरदाता, मुझसे बिछुड़कर शोक-सागर में पड़ी, पहले कभी दुःख न जानने वाली माता का आप और भी आदर कीजिए, जिससे वे पुत्र-वियोग के शोक से न मरें। पूज्य आपके आदर से सम्मानित होकर, मेरा चिन्तन करती हुई वे तपस्विनी आपके आश्रय में जीवित रहें। हे महेन्द्र-तुल्य, पुत्र के लिए तरसती मेरी माता को आप ऐसे रखिए कि मेरे वनवास में शोक से दुर्बल होकर वे यमलोक न चली जाएँ।”
सार: सीता को वल्कल पहने देख जनता और दशरथ कैकेयी को धिक्कारते हैं; राम विदा लेते हुए पिता से माता कौसल्या की देखभाल का आग्रह करते हैं।
कौसल्या की सीख और रथ की प्रतीक्षा
राम का वचन सुनकर और मुनि-वेश में उन्हें देखकर राजा रानियों सहित चेतना खो बैठे। सन्ताप से जलते वे न राम की ओर देख सके, न उनसे बोल सके। मुहूर्त भर मूर्च्छित रहकर महाबाहु राजा राम का ही चिन्तन करते विलाप करने लगे, “जान पड़ता है पूर्व जन्म में मैंने अनेक गायों को बछड़ों से विलग किया या प्राणियों की हिंसा की; तभी यह विपत्ति आ पड़ी। पर समय आए बिना शरीर से प्राण नहीं निकलते, इसीलिए कैकेयी से सताए जाते हुए भी मैं मरता नहीं, और महीन वस्त्र छोड़कर तपस्वी-वेश में अग्नि-से तेजस्वी पुत्र को सामने खड़ा देख रहा हूँ। यह सब केवल अपने स्वार्थ के लिए छल का आश्रय लेने वाली अकेली कैकेयी के कारण हो रहा है।” इतना कहकर “राम!” एक बार कहकर ही, आँसुओं से रुँधे कण्ठ वाले राजा और कुछ न कह सके। मुहूर्त भर में होश में आकर आँसू-भरी आँखों से उन्होंने सुमन्त्र से कहा, “विहार के लिए बना रथ उत्तम घोड़ों से जोतकर शीघ्र लौटो और इस महाभाग पुत्र को इस जनपद के पार पहुँचा दो। गुणवानों के गुणों का यही फल कहा जाता है, कि पिता-माता द्वारा ही साधु-वीर वन भेजा जाए।”

राजा की आज्ञा मानकर शीघ्रगामी सुमन्त्र अलंकृत अश्वों से जुता रथ ले आए और हाथ जोड़कर राजकुमार राम को सूचना दी। तब देश-काल के ज्ञाता, सर्वथा शुचि राजा ने कोषाध्यक्ष को बुलाकर कहा, “सीता के वनवास के सब वर्ष गिनकर वैदेही के लिए बहुमूल्य वस्त्र और महान आभूषण शीघ्र ले आओ।” कोष से सब लाकर उसने सीता को सौंप दिया। वन जाने को तैयार उत्तम कुल में जन्मी वैदेही ने उन विचित्र आभूषणों से अपने शुभ-लक्षण अंगों को सजाया, और भली प्रकार सजी सीता उस भवन को वैसे ही दीप्त करने लगीं, जैसे उगते सूर्य की किरणें निर्मल आकाश को।
उन्हें बाँहों में भरकर, उनका सिर सूँघकर सास कौसल्या ने कहा, “इस संसार में अपने प्रिय पतियों से सदा सम्मानित होकर भी जो स्त्रियाँ विपत्ति में पड़े पति का आदर नहीं करतीं, वे दुष्टा कहलाती हैं। सुख भोग चुकीं जो स्त्रियाँ थोड़ी-सी विपत्ति आते ही पति की निन्दा करती या त्याग देती हैं, यही दुष्ट स्त्रियों का स्वभाव है। कुल, उपकार, विद्या, दान या विवाह-बन्धन भी ऐसी चंचल-हृदया स्त्रियों का मन नहीं बाँधते। पर शील, सत्य और शास्त्र-वचन में स्थित सती स्त्रियों के लिए पति ही परम पवित्र और सर्वोपरि है। वन भेजा जाता मेरा पुत्र राम आपसे अनादृत न हो; धनवान हो या निर्धन, वह आपके लिए देवता-तुल्य है।”
यह धर्म-अर्थ-संगत वचन सुनकर सीता ने हाथ जोड़कर कहा, “हे आर्ये, आप जो आज्ञा देंगी, सब करूँगी; मैं जानती हूँ कि पति के साथ कैसे रहना है, और यह मैंने अपने गुरुजनों से सुना भी है। आर्या मुझे दुष्ट स्त्रियों के समान न समझें; जैसे चाँदनी चन्द्र से अलग नहीं हो सकती, वैसे मैं धर्म से नहीं हट सकती। तार के बिना वीणा नहीं बजती, पहिए के बिना रथ नहीं चलता, और पति के बिना सौ पुत्र होने पर भी स्त्री सुख नहीं पाती। पिता सीमित सुख देता है, भाई और पुत्र भी सीमित; तो असीम सुख देने वाले पति को कौन स्त्री न पूजेगी? गुरुजनों से स्त्री-धर्म जान चुकी मैं, हे आर्ये, पति को कैसे अनादर करूँ, जब पति ही स्त्री का देवता है?” सीता का यह हृदयस्पर्शी वचन सुनकर शुद्ध-हृदया कौसल्या वियोग के दुःख और सीता के पुण्य-भाव के हर्ष, दोनों से उपजे आँसू बहाने लगीं।
माताओं में परम सम्मानित कौसल्या को देखकर परम धर्मात्मा राम ने हाथ जोड़कर कहा, “हे अम्ब, दुखी होकर मेरे पिता को मत देखिए; वनवास का अन्त भी शीघ्र ही आ जाएगा। सोते-सोते ही आपके ये नौ और पाँच, चौदह वर्ष बीत जाएँगे; एक दिन आप मुझे मित्रों-बन्धुओं सहित सकुशल लौटा हुआ देखेंगी।” फिर साढ़े तीन सौ सौतेली माताओं को भी उतना ही दुखी देख, हाथ जोड़कर उन्होंने कहा, “साथ रहते हुए अनजाने में मुझसे कोई कठोर वचन या कार्य हुआ हो, तो क्षमा कीजिए; अब मैं आप सभी से विदा माँगता हूँ।” राघव का यह धर्मयुक्त शान्त वचन सुनकर शोक से व्याकुल सब रानियों के मुख से क्रौंची-पक्षियों के स्वर-सा करुण नाद उठ पड़ा। पहले मृदंग और मेघ-गर्जना-से बाजों से गूँजने वाला दशरथ का वह भवन अब विलाप और रुदन से व्याकुल, विपत्ति में पड़ा, अत्यन्त दुःखमय हो गया।
सार: कौसल्या पुत्रवधू को सती-धर्म की सीख देती हैं, सीता विनम्रता से ग्रहण करती हैं; राम माताओं से क्षमा माँगकर विदा लेते हैं और रनिवास विलाप से भर उठता है।
रथ पर आरोहण और अयोध्या का पीछा करना
तब राम, सीता और लक्ष्मण ने हाथ जोड़कर, दीन-मन से राजा के चरण छूकर उनकी प्रदक्षिणा की। उनसे विदा लेकर शोक से मूर्च्छित-से राघव ने सीता-सहित कौसल्या को प्रणाम किया। भाई के पीछे लक्ष्मण ने भी कौसल्या को प्रणाम किया, फिर अपनी माता सुमित्रा के चरण छुए। प्रणाम करते महाबाहु लक्ष्मण का सिर सूँघकर हितैषिणी माता ने रोते हुए कहा, “हे पुत्र, स्वजनों में अनुरक्त आपको मैंने बड़े भाई के साथ वनवास की अनुमति दी है; पर हे पुत्र, साथ जाते भाई राम की सेवा में प्रमाद न करना। हे अनघ, विपत्ति में हों या वैभव में, राम ही आपकी गति हैं; लोक में सत्पुरुषों का यही धर्म है कि छोटा भाई बड़े के वश में रहे।
“यज्ञों में दान-दीक्षा और युद्ध में शरीर-त्याग, यही इस रघुकुल का सनातन उचित आचरण है।” फिर सिद्ध-संकल्प, सबके प्रिय राम से सुमित्रा ने बार-बार कहा, “जाइए, जाइए; आपका कल्याण हो।” लक्ष्मण से फिर बोलीं, “राम को दशरथ, सीता को मुझ (जननी) और वन को अयोध्या समझकर, हे तात, सुखपूर्वक जाइए।” तब विनयज्ञ सुमन्त्र ने हाथ जोड़कर राम से वैसे कहा जैसे मातलि इन्द्र से, “हे महायश राजपुत्र, रथ पर आरूढ़ हों; आपका कल्याण हो; जहाँ आप कहेंगे, वहीं शीघ्र पहुँचा दूँगा। हे राम, देवी कैकेयी के कहे चौदह वर्ष आज ही से आरम्भ माने जाने चाहिए।”
ससुर के दिए वस्त्र-आभूषणों से सजकर, सुन्दर अंगों वाली सीता प्रसन्न-मन से उस सूर्य-सी आभा वाले रथ पर चढ़ीं। वनवास की अवधि गिनकर ससुर ने उन्हें जो वस्त्र-आभूषण दिए थे, और दोनों भाइयों को जो अस्त्र-समूह तथा कवच दिए थे, उन्हें रथ के पिछले भाग में रखकर, तथा चमड़े से मढ़ी टोकरी और कठोर कुदाल को सँभालकर, राम और लक्ष्मण उस अग्नि-सी आभा वाले स्वर्ण-मण्डित रथ पर चढ़ गए। सीता को तीसरा साथी बनाए तीनों को रथ पर चढ़ा देख सुमन्त्र ने वायु-वेग से समान चलने वाले उत्तम घोड़ों को हाँक दिया।

राम के चिरकाल के लिए महावन को प्रस्थान करते ही नगर में मूर्च्छा छा गई; सेना, घोड़े-हाथी और जनपद से आए लोग भी मूर्च्छित हो गए। समस्त नगर हाथियों के उन्मत्त शोर और घोड़ों के आभूषणों की झंकार से व्याकुल और गूँजायमान हो उठा। बाल-वृद्ध सहित वह अत्यन्त पीड़ित नगरी राम की ओर वैसे ही दौड़ पड़ी, जैसे गर्मी से तपा प्राणी जल की ओर। रथ के पार्श्व और पीछे लटककर, मुख उसी ओर किए, आँसू-भरे मुखों से सब ऊँचे स्वर में सुमन्त्र से बोले, “हे सूत, घोड़ों की रास खींचो, धीरे-धीरे चलो; हम राम का मुख देख लें, जो अब दुर्लभ हो जाएगा।
“राम की माता कौसल्या का हृदय अवश्य लोहे का है, जो देव-शिशु-से पुत्र को वन जाते देख भी नहीं फटता।” कृतकृत्या वैदेही छाया की भाँति पति का अनुसरण कर रही थीं, धर्म में रत होकर वे पति को वैसे न छोड़ रही थीं जैसे सूर्य की प्रभा सुमेरु को नहीं छोड़ती। पीछे-पीछे चलते लोग बोले, “हे लक्ष्मण, आप धन्य हैं, जो देव-तुल्य, सदा प्रियभाषी भाई की सेवा करेंगे; राम का अनुसरण करना ही आपकी महान बुद्धि, महान अभ्युदय और स्वर्ग का मार्ग है।” यों कहते वे आँसू न रोक सके और इक्ष्वाकु-नन्दन राम के पीछे चल पड़े।
इधर दीन रानियों से घिरे, दीन-चित्त राजा “मैं अपने प्रिय पुत्र को देखूँगा” कहते हुए भवन से निकल पड़े। आगे रोती स्त्रियों का महान शब्द ऐसा था, मानो स्वामी हाथी के बँध जाने पर हथिनियाँ चिंघाड़ रही हों। उस समय राम के पिता श्रीमान दशरथ राहु-ग्रस्त पूर्ण चन्द्र की भाँति निस्तेज दिख रहे थे। अचिन्त्य धैर्य वाले राम ने सूत को “रथ शीघ्र हाँको” कहकर प्रेरित किया। राम “चलो” कहते और जनता “रुको” कहती; मार्ग पर दोनों ओर से प्रेरित सूत न यह कर सका, न वह।
राम जब वन को निकले, तो रथ की उठी धूल नागरिकों के गिरते आँसुओं से बैठ गई। राम के विषण्ण, भ्रान्तचित्त पिता और माता को पीछे आते देखकर भी, धर्म-पाश में बँधे राम उन्हें प्रकट रूप से वैसे न देख सके, जैसे फन्दे में फँसा बछड़ा अपनी माँ को। राम का मुख न देख पाने के दुःख से स्त्रियों की आँखों से, मछलियों की हलचल से काँपते कमलों से झरते जल-सा, आँसू बहने लगे। रथ-योग्य, सुखोचित और दुःख के अयोग्य माता-पिता को पैदल चलते देख, राम ने सूत से “शीघ्र चलो” कहा; गजबाण से प्रेरित हाथी की भाँति वे पिता-माता का दुःखद दर्शन न सह सके।

राम की माता कौसल्या उस गाय की भाँति रथ के पीछे दौड़ीं, जिसका बछड़ा बँधा हो और वह उससे मिलने भागती हो। “राम, राम, हाय सीते, हाय लक्ष्मण” पुकारती, आँसू बहाती, नाचती-सी दौड़ती माता को राम बार-बार देखते रहे। राजा “रुको, रुको” चिल्लाते और राघव “चलो, चलो” कहते; दो घूमते पहियों के बीच फँसे-से सुमन्त्र का मन दुविधा में पड़ गया। राम ने सूत से कहा, “उपालम्भ देने पर भी आप राजा से कहिएगा कि ‘मैंने सुना नहीं’; इस दुःख का लम्बा होना ही परम अनिष्टकारी है।” राम का वचन मानकर, उस भीड़ से विदा लेकर, सूत ने आगे बढ़ते घोड़ों को और तेज़ हाँक दिया। राजा के लोग राम की मन से प्रदक्षिणा कर लौट पड़े, पर साधारण प्रजा शरीर से भी न लौटी। मन्त्रियों ने महाराज दशरथ से कहा, “जिसे लौटा हुआ देखना हो, उसके पीछे दूर तक नहीं जाना चाहिए।” यह सुनकर सर्वगुण-सम्पन्न, दीन राजा पसीने से तर शरीर और अत्यन्त खिन्न रूप में, पत्नियों सहित रुककर अपने पुत्र राम को देखते रह गए।
सार: माताओं से विदा लेकर तीनों रथ पर चढ़ते हैं; पूरी अयोध्या रथ के पीछे दौड़ती है, और राम सूत को तेज़ चलने को कहते हैं ताकि पिता-माता का दुःख लम्बा न खिंचे। राजा रुककर पुत्र को निहारते रह जाते हैं।
रनिवास का विलाप, सृष्टि का सूना पड़ना
हाथ जोड़े पुरुषश्रेष्ठ राम के अयोध्या से निकलते ही रनिवास की स्त्रियों के मुख से महान आर्तनाद उठ पड़ा। वे कहने लगीं, “हाय, अनाथ, दुर्बल और दीन हम लोगों के जो गति और शरण थे, वे नाथ कहाँ जा रहे हैं? जो कलंकित किए जाने पर भी क्रोध नहीं करते थे, क्रोध-भरे वचन छोड़ देते और सब रुष्टों को मना लेते थे, सुख-दुःख में समान वे राम कहाँ जा रहे हैं? जो महातेजस्वी हमसे वैसे ही बर्ताव करते थे जैसे अपनी माता कौसल्या से, वे महात्मा कहाँ जा रहे हैं? कैकेयी से सताए राजा द्वारा वन भेजे गए, समस्त लोक के रक्षक राम कहाँ जा रहे हैं? कितना निष्ठुर है यह राजा, जो जीवलोक के विनाश की भाँति धर्मात्मा सत्यव्रती राम को वन भेज रहा है!” इस प्रकार सब रानियाँ बछड़े से वंचित गायों की भाँति दुःख से रो पड़ीं और ऊँचे स्वर में चीख उठीं।
रनिवास में वह घोर आर्तनाद सुनकर पुत्र-वियोग से पहले ही तप्त राजा और भी अत्यन्त दुखी हो गए। अग्निहोत्र की आहुतियाँ नहीं दी गईं, गृहस्थों ने भोजन नहीं पकाया, प्रजा ने कार्य नहीं किया, और सूर्य भी अकाल मेघों के कारण छिप गया। हाथियों ने मुँह से ग्रास छोड़ दिए, गायों ने बछड़ों को दूध नहीं पिलाया, प्रथम पुत्र को पाकर भी माताएँ प्रसन्न न हुईं। त्रिशंकु, मंगल, बृहस्पति और बुध, सब ग्रह चन्द्र के पास आकर भयंकर रूप से स्थित हो गए। नक्षत्र निष्प्रभ और ग्रह निस्तेज हो गए; विशाखा नक्षत्र धुएँ-सा मलिन आकाश में दिखने लगा। आँधी के वेग से उठे महासागर-से मेघ-समूह से, राम के वन जाते ही, वह नगर डगमगा गया। सब दिशाएँ अन्धकार से ढकी-सी व्याकुल हो गईं; न कोई ग्रह, न नक्षत्र प्रकाशित रहा।
सहसा सब नागरिक दीनता को प्राप्त हो गए; किसी का मन भोजन या मनोरंजन में न लगा। शोक के आवर्तों से तप्त, लम्बी साँसें भरते अयोध्या के सब लोग राजा को कोसने लगे। राजमार्ग पर चलते लोगों के मुख आँसुओं से लथपथ थे; कोई हर्षित न दिखा, सब शोक में डूबे थे। न शीतल पवन बहा, न चन्द्र सौम्य दिखा, न सूर्य ने लोक को तपाया; सारा जगत व्याकुल हो उठा। पुत्रों को माताओं की, पतियों को पत्नियों की, भाइयों को भाइयों की चिन्ता न रही; सब कुछ छोड़कर सब केवल राम का ही चिन्तन करने लगे। जो राम के मित्र थे, वे शोक के भार से दबे, मूढ़चित्त होकर सो भी न सके। तब राम-विहीन अयोध्या भय और शोक से प्रदीप्त होकर वैसे ही घोर रूप में डगमगा उठी, जैसे इन्द्र से रहित पर्वतों-सहित पृथ्वी, और अपने हाथी-योद्धा-घोड़ों सहित चीत्कार कर उठी।
सार: राम के वन जाते ही रनिवास और पूरी अयोध्या शोक में डूब जाती है; प्रकृति तक विकल हो उठती है, ग्रह-नक्षत्र मलिन पड़ते हैं और नगरी इन्द्र-विहीन पृथ्वी-सी काँप उठती है।
रथ की धूल तक खो जाने पर दशरथ का गिरना
नय (नीति), धर्म और विनय से सम्पन्न इक्ष्वाकु-श्रेष्ठ दशरथ ने तब तक अपनी दृष्टि नहीं हटाई, जब तक वन को जाते राम की उठी धूल का रूप भी दिखता रहा। जब तक राजा अपने अत्यन्त धार्मिक प्रिय पुत्र को (धूल के रूप में) देखते रहे, तब तक मानो दूर जाते पुत्र की झलक पाने के लिए उनका शरीर धरती पर बढ़ता-सा रहा। पर जैसे ही राजा को राम के रथ की धूल भी न दिखी, वे आर्त और विषण्ण होकर धरती पर गिर पड़े। उनकी ज्येष्ठ पत्नी कौसल्या उन्हें उठाने को उनके दाहिने हाथ की ओर बढ़ीं, और सुन्दर अंगों वाली वही कैकेयी उनके बाएँ पार्श्व की ओर आई।

नीति, धर्म और विनय से युक्त राजा कैकेयी को देखकर व्यथित मन से बोले, “हे पापनिश्चये कैकेयि, मेरे अंगों को मत छूइए; मैं आपको देखना भी नहीं चाहता; आप न मेरी पत्नी हैं, न बान्धवी। जो आपके आश्रित हैं, उनका मैं स्वामी नहीं, और वे मेरे नहीं; केवल स्वार्थ में लगी, धर्म-त्यागिनी आपको मैं त्यागता हूँ। विवाह में जो मैंने आपका हाथ पकड़ा और आपको अग्नि की प्रदक्षिणा कराई, उससे इस लोक और परलोक में मिलने वाले सब फल को मैं त्यागता हूँ। यदि भरत यह अक्षय राज्य पाकर प्रसन्न हों, तो मेरी मृत्यु के बाद पितरों के लिए जो पिण्ड वे मुझे दें, वह दिया हुआ मुझ तक न पहुँचे।”
तब धूल से सने राजा को उठाकर शोक से क्षीण देवी कौसल्या उन्हें लेकर महल लौटीं। जैसे कोई जान-बूझकर ब्राह्मण-हत्या कर या हाथ से जलती अग्नि छूकर पछताता है, वैसे ही धर्मात्मा दशरथ कैकेयी के दबाव में पुत्र राम को वन भेजकर पश्चात्ताप करने लगे, अपने पुत्र राघव का गहरा चिन्तन करते हुए।
सार: रथ की धूल तक ओझल हो जाने पर दशरथ धरती पर गिर पड़ते हैं; कैकेयी सँभालने आती है तो उसे फटकार कर सब सम्बन्ध-फल त्याग देते हैं, और कौसल्या उन्हें महल लौटा लाती हैं।
कौसल्या का विलाप: पुत्र-वियोग की आग
शय्या पर शोक से जर्जर पड़े महाराज को देखकर पुत्र-शोक से व्याकुल कौसल्या ने उनसे कहा, “यदि राम अयोध्या ही में, अपने घर में, भिक्षा माँगकर रहते, तब भी मुझे यह वनवास से अच्छा लगता। हाँ, अपने इस आत्मज को कैकेयी के दास के रूप में सौंप देना भी मुझे अधिक प्रिय होता, बजाय इस निर्वासन के।”
“राम जैसे नरश्रेष्ठ पर अपना विष उँडेलकर अब टेढ़ी चाल वाली कैकेयी उस नागिन की भाँति निश्शंक विचरेंगी जो अपनी केंचुली उतार चुकी हो। राम को बलात् उनके पद से गिराकर इन्होंने वैसा ही किया है जैसे अग्निहोत्र करने वाला कोई पुरुष पर्व के दिन देवताओं के लिए रखे हवि को राक्षसों को दे डाले। मनोरथ सिद्ध कर लेने पर, जिनके ग्रह अब अनुकूल हो गए और मन शान्त हो गया, वे कैकेयी अब घर में बसी हुई दुष्ट सर्पिणी की भाँति निर्भय होकर मुझे और भी डराएँगी।”
कौसल्या आगे विलाप करती हैं, “महाबाहु धनुर्धर राम अब तक तो अपनी पत्नी और लक्ष्मण के साथ, गजराज की चाल से चलते हुए, अवश्य वन में प्रवेश कर चुके होंगे। हे राघव, जिन्होंने पहले कभी दुःख नहीं देखा, उन वैदेही, राम और लक्ष्मण को आपने कैकेयी के कहने पर वनवास के लिए सौंप दिया; अब वन में, जहाँ वे रत्नों से हीन कर दिए गए, फल और मूल खाकर वे तीनों तरुण किस तरह रहेंगे?”
फिर वे उस दिन की कामना करती हैं जब उनके पुत्र लौटेंगे, “कब हजारों लोग राजमार्ग पर मेरे दोनों पुत्रों राम और लक्ष्मण पर लावा (भुने धान) बरसाएँगे, जब वे शत्रुदमन कुण्डल पहने, धनुष और तलवार उठाए, शिखर वाले दो पर्वतों की भाँति नगर में प्रवेश करेंगे? कब वे तीनों प्रिय जन प्रसन्न होकर नगर की प्रदक्षिणा करेंगे, और कन्याएँ मार्ग में उन्हें फूल और ब्राह्मण फल देंगे? और कब वे धर्मात्मा राम, जो बुद्धि में परिपक्व और चिरयौवन में देवता-से दीप्त हैं, समय पर बरसने वाली अच्छी वर्षा की भाँति संसार का पालन करते हुए लौटेंगे?”
अन्त में वे स्वयं को कोसती हैं, “निस्संदेह, हे वीर, किसी पूर्वजन्म में मुझ नीचमति ने दूध पीने को व्याकुल बछड़ों के सामने ही गायों के थन काट डाले होंगे। इसी से, हे पुरुषव्याघ्र, बछड़े से ब्याई गाय की भाँति कैकेयी ने मुझे मेरे पुत्र से वंचित कर दिया, जैसे सिंह छोटे बछड़े वाली गाय को बलपूर्वक उससे अलग कर देता है। मैं एकमात्र पुत्र वाली, उस सर्वगुणसम्पन्न पुत्र के बिना जीवित नहीं रह सकती। पुत्र-शोक से उत्पन्न यह अग्नि आज मुझे वैसे ही जला रही है जैसे ग्रीष्म में भगवान् सूर्य अपनी किरणों से इस पृथ्वी को तपाते हैं।”
सार: कौसल्या का यह विलाप शोक की तीन परतें खोलता है: पुत्र के कष्ट का भय, कैकेयी पर रोष, और स्वयं को दोष देने वाला आत्म-संताप। वाल्मीकि यहाँ माँ की पीड़ा को किसी देव-महिमा से नहीं ढाँपते; वे उसे उसकी पूरी कड़वाहट में रहने देते हैं।
सुमित्रा का सान्त्वन: राम की महिमा का स्मरण
इस प्रकार विलाप करती हुई कौसल्या को धर्म में स्थित सुमित्रा ने धर्म के अनुकूल वचन कहे, “हे आर्ये, आपका वह श्रेष्ठ पुत्र राम, जो महान् बलवान् है और जिसने राज्य त्यागकर पिता को सत्यवादी सिद्ध करते हुए वन की राह ली, उसी सनातन धर्म-पथ पर चल रहा है जिसका पालन शिष्ट जन करते आए हैं और जो परलोक में फल देता है। ऐसा पुत्र शोक का पात्र कभी नहीं हो सकता। आपके इस प्रकार दीन होकर रोने से क्या प्रयोजन सिद्ध होगा?”
“वह अनघ (निष्पाप) लक्ष्मण, जो समस्त प्राणियों पर दयालु है, सदा राम की उत्तम सेवा करता है; अतः उस महात्मा का तो लाभ ही लाभ है। और सुख की योग्य वैदेही भी वनवास के दुःख को जानती हुई आपके धर्मात्मा पुत्र के पीछे-पीछे गई। जिसकी कीर्ति-पताका सारे लोक में फहराती है, उस सत्यव्रती राम ने भला कौन-सा वर नहीं पा लिया?”
सुमित्रा राम की अद्भुत महिमा गिनाती हैं, “जिसकी पवित्रता और महान् माहात्म्य प्रसिद्ध है, सूर्य उसके शरीर को किरणों से तपाने का साहस नहीं करेगा। वनों से बहती शीतोष्ण के योग्य सुखद वायु सदा राम की सेवा करेगी। रात में सोते हुए अनघ राम को शीतल चन्द्रमा पिता की भाँति आलिंगन करते हुए, अपनी किरणों से स्पर्श करते हुए, दिन की गर्मी हरते हुए आह्लादित करेगा। जिस महातेजस्वी को विश्वामित्र ने दिव्य अस्त्र दिए, जिसने रण में ताड़का-पुत्र सुबाहु का वध किया, वह शूर पुरुषव्याघ्र अपने बाहुबल के सहारे वन में अपने घर की भाँति निर्भय रहेगा।”
“जिसके बाणपथ पर पड़ते ही शत्रु विनाश को प्राप्त होते हैं, उसकी आज्ञा का पालन पृथ्वी क्यों न करेगी? जो श्री, शौर्य और कल्याणकारी सत्त्व राम में है, वह बताता है कि वनवास की अवधि बीतते ही वे शीघ्र अपना राज्य पुनः पा लेंगे। वे तो श्री के भी श्री, कीर्ति की भी कीर्ति, क्षमा की भी आधार-शक्ति हैं; देवताओं के भी देवता और भूतों में भूतश्रेष्ठ हैं। हे देवि, ऐसे पुरुष को वन में या नगर में, कहीं भी, क्या प्रतिकूलता हो सकती है? वह पुरुषर्षभ शीघ्र ही मातृरूपा पृथ्वी, वैदेही और श्री, इन तीनों के साथ सिंहासन पर अभिषिक्त होगा।”
“हे देवि, राम के विषय में शोक या दुःख न कीजिए, क्योंकि राम में कोई अनिष्ट दिखाई नहीं देता। आप शीघ्र ही सीता और लक्ष्मण सहित अपने पुत्र को देखेंगी। हे अनघे, ये जो राम के वियोग से पीड़ित सब लोग हैं, इन्हें भी तो आपको ही ढाढ़स बँधाना है; फिर इस समय आप अपने हृदय में यह व्याकुलता क्यों धारण करती हैं? लोक में राम से बढ़कर सत्पथ में स्थित कोई नहीं है। हे कल्याणी, आप अपने पुत्र को वैसे ही फिर देखेंगी जैसे उगते चन्द्रमा को देखा जाता है, जब वह सिर झुकाकर आपके चरणों में प्रणाम करेगा। मैं आपसे सत्य कहती हूँ: शोक और मोह त्याग दीजिए।”
“राज्य पर अभिषिक्त, महान् वैभव से युक्त राम को लौटा हुआ देखकर आप आनन्द के आँसू बहाएँगी। मित्रों सहित आपका वह पुत्र जब अभिवादन करेगा, तब आप वर्षा-मेघ की भाँति शीघ्र ही हर्ष के आँसू बरसाएँगी। अयोध्या लौटकर वह वरदायक पुत्र अपने कोमल और पुष्ट हाथों से आपके चरण दबाएगा।” वाक्योपचार में कुशल देवी सुमित्रा इस प्रकार राम की माता को नाना प्रकार से आश्वस्त कर मौन हो गईं। लक्ष्मण की माता का यह वचन सुनकर राम की माता कौसल्या का शोक, जिसने उनके शरीर को सुखा डाला था, अल्प जल वाले शरद्-मेघ की भाँति शीघ्र विलीन हो गया।
सार: जहाँ कौसल्या ने शोक को बहने दिया, वहाँ सुमित्रा उसे धर्म और श्रद्धा से बाँधती हैं: राम की पवित्रता ऐसी है कि प्रकृति स्वयं उनकी सेवा करेगी, और चौदह वर्ष बाद का लौटना निश्चित है। उनका तर्क करुणा को विश्वास में बदल देता है।
नगरवासियों का अनुगमन और तमसा का तट
महात्मा सत्यपराक्रमी राम के प्रति अनुरक्त नगरवासी उनके पीछे-पीछे वन की ओर चल पड़े। महाराज को मित्रधर्म के अनुसार बलपूर्वक लौटा दिए जाने पर भी वे लोग किसी प्रकार न लौटे और रथ के पीछे चलते रहे; क्योंकि गुणसम्पन्न महायशस्वी राम अयोध्यावासियों के पूर्ण चन्द्रमा-से प्रिय हो गए थे। उन प्रजाजनों के बार-बार प्रार्थना करने पर भी काकुत्स्थ राम पिता को सत्य सिद्ध करते हुए वन की ओर ही बढ़ते रहे।
स्नेह से उन्हें ऐसे देखते हुए मानो आँखों से पी रहे हों, राम ने उन प्रजाजनों से अपनी सन्तान के समान कहा, “हे नगरजनो, मेरे प्रति आप लोगों का जो प्रेम और सम्मान है, उसे मेरी प्रसन्नता के लिए विशेष रूप से भरत पर रखिए। कैकेयी का आनन्द बढ़ाने वाले, कल्याणमय चरित्र वाले भरत आपके लिए वही करेंगे जो प्रिय और हितकर हो। ज्ञान में वृद्ध होते हुए भी आयु में बालक, कोमल होते हुए भी वीरता से सम्पन्न वे भरत आपके योग्य भर्ता होंगे और आपका भय दूर करेंगे। वे राजगुणों से युक्त हैं और युवराज होने योग्य समझे गए हैं; इसलिए, और इसलिए भी कि मैं आपसे कहता हूँ, आप अपने स्वामी की आज्ञा का पालन कीजिए। और मेरी प्रसन्नता के लिए महाराज के साथ ऐसा व्यवहार कीजिए कि मेरे वन जाने पर वे संताप न पाएँ।”
जैसे-जैसे राम धर्म का आश्रय लेते जाते, वैसे-वैसे प्रजा उन्हें ही अपना स्वामी चाहती। उस समय ज्ञान, आयु और तपोबल, इन तीनों में वृद्ध, और जिनके सिर बुढ़ापे से काँप रहे थे, वे ब्राह्मण रथ के साथ न चल सकने के कारण दूर से ही पुकारकर बोले, “हे जात्यश्व उत्तम घोड़ो, राम को ढोने वालो, लौट आइए; आप अपने स्वामी के प्रति हितैषी बनिए। प्राणी, और विशेषकर घोड़े, कान वाले होते हैं; अतः हमारी प्रार्थना सुनकर आप लौट जाइए। आपके ये स्वामी विशुद्धात्मा, शुभ और दृढ़व्रत हैं; आपको इन्हें नगर की ओर ले चलना चाहिए, नगर से वन की ओर नहीं।”

उन वृद्ध ब्राह्मणों को इस प्रकार आर्तस्वर में विलाप करते देखकर राम सहसा रथ से उतर पड़े। चरित्रवत्सल राम घृणारहित दयालु दृष्टि से उन पैदल चलते ब्राह्मणों को रथ में रहकर पीछे न छोड़ सके। सीता और लक्ष्मण सहित वे छोटे-छोटे डग भरते हुए, ताकि वृद्ध ब्राह्मण उन तक पहुँच सकें, वन की ओर पैदल ही चलने लगे। राम को इस प्रकार चलते देख व्याकुल और परम संतप्त वे ब्राह्मण बोले, “हे वत्स, देखिए, वाजपेय यज्ञ में प्राप्त ये हमारे श्वेत छत्र शरद् के मेघों की भाँति आपके पीछे-पीछे आ रहे हैं। आपके सिर पर छत्र नहीं है और आप सूर्य की किरणों से तप रहे हैं; अपने इन वाजपेय-छत्रों से हम आपको छाया देंगे। हमारी जो बुद्धि सदा वेदमन्त्रों के अनुसरण में लगी रहती थी, वह आपके लिए वनवास के अनुसरण में लगा दी गई है। वेद, जो हमारा परम धन है, हमारे हृदयों में सुरक्षित है; और चरित्र से रक्षित हमारी पत्नियाँ घर में ही रहेंगी।”
“आपके पीछे चलने का निश्चय हमने कर लिया है, इस पर फिर से विचार करने की आवश्यकता नहीं। फिर भी हम कहना चाहते हैं कि यदि आप धर्म के प्रति, अर्थात् ब्राह्मणों की सलाह सुनने के प्रति, उदासीन हो जाएँ, तो कौन प्राणी धर्म-पथ पर स्थिर रहेगा? हंस के पंखों-से श्वेत और भूमि पर लोटने से धूलि से सने इन सिरों को झुकाकर हम आपसे प्रार्थना करते हैं, हे दृढ़ आचरण वाले राजकुमार, लौट जाइए। यहाँ आए हुए बहुत-से ब्राह्मणों के अधूरे यज्ञ हैं; हे वत्स, उनकी समाप्ति आपके लौटने पर निर्भर है। यहाँ के सब प्राणी, चर और अचर, आपके भक्त हैं; आप उन भक्तों पर अपना स्नेह दिखाइए जो आपके लौटने की प्रार्थना कर रहे हैं।”
“जो वृक्ष जड़ों से बँधे होने के कारण आपके पीछे नहीं चल सकते, वे ऊँचे उठे हुए वायुवेग से, मानो चरमराकर रोते हुए, आपसे लौटने को कह रहे हैं। जो पक्षी निश्चल बैठे हैं, आहार ढूँढ़ने नहीं जा सकते और एक ही स्थान पर डालों से बँधे हैं, वे भी आपसे, जो सब प्राणियों पर दया करने वाले हैं, लौट आने की याचना कर रहे हैं।” इस प्रकार जब वे ब्राह्मण राम को लौटाने के लिए पुकार रहे थे, तभी वहाँ तमसा नदी दिखाई दी, मानो राघव की गति रोक रही हो। तब सुमन्त्र ने भी थके हुए घोड़ों को रथ से खोलकर, उन्हें जल पिलाकर और उनके अंग धुलाकर, तमसा के तट से अधिक दूर नहीं, चरने को छोड़ दिया।
सार: प्रजा का यह अनुगमन राम की लोकप्रियता का प्रमाण है। राम पैदल उतरकर यह दिखाते हैं कि वे वृद्ध ब्राह्मणों को रथ में बैठे रहकर पीछे नहीं छोड़ सकते। पर वे लौटने को राज़ी नहीं होते, और दिन ढलते ही सब तमसा के तट पर पहुँचते हैं।
तमसा-तट पर रात और प्रजा को छकाकर निकलना
रमणीय तमसा-तट पर ठहरकर, सीता की ओर देखते हुए, राम ने लक्ष्मण से कहा, “हे सौमित्र, आज वनवास की यह पहली रात है। हमें वन ही भेजा गया है, अतः पीछे छूट गए लोगों के लिए आप उत्कण्ठित न हों; आपका कल्याण हो। देखिए, ये शून्य वन चारों ओर रोते हुए से जान पड़ते हैं, क्योंकि पशु-पक्षी अपने-अपने आश्रय में लौट गए हैं। आज मेरे पिता की राजधानी अयोध्या नगरी अपने स्त्री-पुरुषों सहित वन गए हुए हम लोगों के लिए शोक करेगी, इसमें संदेह नहीं।”
“मैं अपने पिता और यशस्विनी माता के लिए शोक करता हूँ; कहीं वे निरन्तर रोते-रोते अपनी आँखों की ज्योति न खो बैठें। पर धर्मात्मा भरत अवश्य ही धर्म, अर्थ और काम से युक्त वचनों से मेरे माता-पिता को सान्त्वना देंगे। भरत की कोमलता का बार-बार स्मरण करके, हे महाबाहु, मैं अपने माता-पिता के लिए शोक नहीं करता। हे नरव्याघ्र, मेरे पीछे वन आकर आपने मेरा बड़ा काम किया है; अन्यथा वैदेही की रक्षा के लिए मुझे सहायता ढूँढ़नी पड़ती। हे सौमित्र, आज मैं केवल जल पीकर रहूँगा; यद्यपि अनेक प्रकार के वन्य फल-मूल हैं, फिर भी मुझे यही रुचता है।”

लक्ष्मण से यह कहकर राम ने सुमन्त्र से भी कहा, “हे सौम्य, अब आप घोड़ों की देखभाल कीजिए।” सूर्यास्त हो जाने पर सुमन्त्र घोड़ों को कसकर बाँध, उन्हें प्रचुर घास देकर राम के पास लौट आए। शिव सन्ध्या की उपासना कर, रात आई देख, सूत ने लक्ष्मण के साथ राम के सोने के लिए स्थान और पत्तों की शय्या तैयार की। तमसा-तट पर वृक्ष के पत्तों से ढकी उस शय्या को देख राम पत्नी सहित उस पर लेट गए। थके हुए राम को पत्नी सहित गहरी नींद में सोया देख लक्ष्मण सूत के सामने राम के विविध गुणों का बखान करने लगे। तमसा-तट पर सूत से राम के गुण कहते-कहते लक्ष्मण के सामने ही सूर्य उदित हो गया; दोनों ने सारी रात जागते बिताई।
तमसा के, जिसका तट गायों के झुंडों से भरा था, उससे उचित दूरी पर राम ने प्रजाजनों के साथ वह रात बिताई। शय्या से उठकर उन लोगों को कुछ दूर सोता देख महातेजस्वी राम ने पुण्यलक्षण भाई लक्ष्मण से कहा, “देखिए, हे सौमित्र, ये नगरवासी हमारे प्रति बड़ी उत्कण्ठा रखते हुए, अपने घरों और सगे-सम्बन्धियों की भी सुध न लेते हुए, इस समय वृक्षों की जड़ों के पास सटे पड़े हैं। जिस तरह ये पौर हमें लौटाने का हठ कर रहे हैं, उससे लगता है कि ये प्राण भले दे दें, पर अपना निश्चय न छोड़ेंगे। इसलिए जब तक ये सोए हैं, तब तक हम शीघ्र रथ पर चढ़कर ऐसा मार्ग ले लें जिसमें किसी ओर से भय न हो, ताकि मुझ पर अनुरक्त ये इक्ष्वाकुपुरवासी फिर वृक्षों की जड़ों के पास सिर टेककर न सोएँ। राजा के पुत्रों को चाहिए कि प्रजा को उसके अपने कारण उत्पन्न दुःख से छुड़ाएँ, न कि स्वयं अपने कारण प्रजा को दुःख में डालें।”

लक्ष्मण ने साक्षात् धर्म की भाँति स्थित राम से कहा, “हे प्राज्ञ, यह मुझे रुचता है; आप शीघ्र रथ पर चढ़िए।” तब राम ने सूत से कहा, “रथ शीघ्र जोतिए; मैं वन को जाऊँगा। हे प्रभो, यहाँ से तुरन्त चलिए।” सूत ने उत्तम घोड़ों से रथ जोतकर हाथ जोड़े राम से निवेदन किया, “हे महाबाहु, हे रथियों में श्रेष्ठ, यह रथ तैयार है; सीता और लक्ष्मण सहित आप शीघ्र चढ़िए; आपका कल्याण हो।” यात्रा की सब सामग्री सहित उस रथ पर चढ़कर राम ने वेगवती और भँवरों से भरी तमसा को पार किया, और निर्बाध, निष्कण्टक मार्ग पर पहुँच गए।
तब प्रजा को भ्रम में डालने के लिए राम ने सूत से कहा, “हे सारथि, अकेले रथ पर चढ़कर आप कुछ देर उत्तर की ओर तेजी से जाइए, फिर रथ लौटा लाइए। सावधान रहकर ऐसा कीजिए कि पौर मेरा पता न पा सकें।” राम का यह वचन सुन सारथि ने वैसा ही किया और दूसरे मार्ग से लौटकर राम को रथ के आने की सूचना दी। तब सीता सहित राम और लक्ष्मण सुखपूर्वक रथ पर बैठे और सारथि ने उस मार्ग से घोड़े हाँके जिससे तपोवन पहुँचा जा सके। आरम्भ में सारथि ने रथ को उत्तराभिमुख रखा, क्योंकि उस ओर उसे यात्रा के लिए मांगलिक शकुन दिखे; फिर महारथी दशरथनन्दन राम सारथि सहित वन की ओर चले।
सार: राम का करुणा से भरा युक्ति-चातुर्य यहाँ खुलता है: प्रजा को कष्ट से बचाने के लिए वे रात में, उनके सोते ही, चुपचाप निकल जाते हैं और रथ की दिशा-भ्रांति रचकर अपना पता मिटा देते हैं। उत्तराभिमुख रथ रखना मात्र शकुन का आचार है, यात्रा की दिशा नहीं।
जागकर पौरों का स्वयं को धिक्कारना और लौट जाना
रात बीतकर प्रभात होने पर वे पौर राघव को न पाकर शोक से जड़ और चेतनाहीन-से हो गए। शोकजनित आँसुओं से व्याकुल वे दुःखी लोग चारों ओर ताकते रहे, पर राम की एक झलक भी न देख सके। विषाद से मुरझाए मुख, उस बुद्धिमान् राम से वंचित और इसी से किंकर्तव्यविमूढ़, वे मनीषी जन भी दीन-करुण वचन कहने लगे, “धिक्कार है उस निद्रा को, जिसके कारण चेतनाहीन होकर आज हम चौड़ी छाती और विशाल भुजाओं वाले राम को न देख सके। उन महात्मा वीर के साथ निकले थे, फिर उनके बिना हम उस नगरी को कैसे देखेंगे? सदा पिता की भाँति हमारी रक्षा करने वाले रघुश्रेष्ठ राम हमें छोड़कर वन कैसे चले गए?”
“राम से रहित हम लोगों के लिए जीवन से क्या लाभ? आओ, इसी स्थान पर हम उपवास से प्राण त्याग दें, अथवा उत्तर की महाप्रस्थान-यात्रा करें। यहाँ बहुत-सी बड़ी सूखी लकड़ियाँ हैं; उनसे चिता जलाकर हम सब उसमें प्रवेश कर जाएँ। पीछे रह गए लोगों के पूछने पर हम क्या कहेंगे? यह कहना कैसे उचित होगा कि महाबाहु, अनसूय, प्रियवादी राघव को हम ही ले गए? वह नगरी, जो हमें राम के बिना लौटा देखकर अपने स्त्री, बालक और वृद्धों सहित दीन और निरानन्द हो जाएगी, उसे हम उनके बिना कैसे देखेंगे?” इस प्रकार बाँहें उठाकर वे लोग बछड़े-छूटी जात्यगायों की भाँति दुःख से नाना प्रकार से विलाप करने लगे।
फिर वे रथ की लीक के सहारे कुछ दूर गए, पर रथ के दूसरे मार्ग से लौटने के कारण लीक तुरन्त लुप्त हो गई, और वे महान् विषाद में डूब गए। मनस्वी पौर अयोध्या से निकलते समय की रथ-लीक के सहारे यह कहते हुए लौटे, “यह क्या? लीक इतनी जल्दी कैसे लुप्त हो गई? हम क्या करें? हम तो दैव से मारे गए।” खिन्न मन से वे सब उसी मार्ग से, जिससे आए थे, उस अयोध्यापुरी को लौटे जहाँ सब सज्जन व्यथित थे। उस नगरी को देखकर, क्षयचिन्ता से व्याकुल मन से, शोकपीड़ित नेत्रों से उन्होंने अश्रु बहाए।
राम से रहित वह अयोध्या उस नदी की भाँति शोभाहीन लगी जिसके गहरे कुण्ड से गरुड़ ने सर्पों को उखाड़ डाला हो। चन्द्रमाहीन आकाश और जलहीन समुद्र की भाँति आनन्दहीन उस नगर को व्याकुल पौरों ने देखा। बड़े-बड़े धनी घरों में दुःख से प्रवेश करते हुए, हर्ष पूरी तरह उड़ जाने से, वे अपने और परायों में भेद न कर सके, चारों ओर देखते रहने पर भी।
सार: जागकर पौर पहले स्वयं को धिक्कारते हैं, फिर मरने तक की बात सोचते हैं, और अन्त में लुप्त हुई रथ-लीक से हारकर एक उजड़ी-सी अयोध्या में लौट आते हैं। राम की युक्ति सफल रही, पर उसका मोल नगर का यह सूनापन है।
अयोध्या की स्त्रियाँ और कैकेयी को धिक्कार
अपने-अपने घर लौटकर, पुत्र और पत्नी से घिरे हुए, वे सब आँसू बहाने लगे, उनके मुख आँसुओं से ढके थे। न लोग आनन्द मनाते थे, न प्रसन्न होते थे; वणिक् अपना माल नहीं फैलाते थे, न माल शोभा पाता, न गृहस्थ अपने घर भोजन पकाते थे। खोई सम्पत्ति के मिलने या प्रचुर धन के आगमन पर भी अयोध्यावासी प्रसन्न न होते थे; न पहले-पहल पुत्र पाकर कोई माता हर्षित होती। घर-घर में रोती हुई स्त्रियाँ राम के बिना लौटे अपने पतियों को दुःख से वैसे ही फटकारती थीं जैसे महावत अंकुश से हाथियों को कोंचते हैं, “जो राम को नहीं देख पाते, उनके घर, पत्नी, धन, पुत्र या सुख से क्या प्रयोजन? इस लोक में एकमात्र सत्पुरुष लक्ष्मण है, जो सीता के साथ राम की सेवा करता हुआ उनके पीछे गया।”
स्त्रियाँ राम के लिए वन की कल्पना भी प्रेम से करती हैं, “जिस नदी, कमल-सरोवर और झील के पवित्र जल में काकुत्स्थ स्नान करेंगे, वे धन्य हैं। जिस वन या पर्वत में राम जाएँगे, वह उन्हें प्रिय अतिथि की भाँति आदर देगा। तरह-तरह के फूलों से लदे, भौंरों से सुशोभित वृक्ष राघव के सामने उपस्थित होंगे; पर्वत स्नेह से अकाल में भी उत्तम फूल और फल दिखाएँगे; और निर्झर निर्मल जल बरसाएँगे। जहाँ राम हैं वहाँ भय नहीं, पराभव नहीं। ऐसे महात्मा स्वामी के चरणों की छाया ही हमारा सुख है; वही हमारे नाथ, गति और परायण हैं।”
फिर वे पतियों से कहती हैं, “हम सीता की सेवा करेंगी और आप राघव की। राम वन में आपके योगक्षेम का प्रबन्ध करेंगे और सीता हम स्त्रियों का। इस अप्रिय, उत्कण्ठा भरी नगरी में, जिसका मन ही उचट गया, कौन सुखी रह सकता है? यदि अनाथ-सा अधर्ममय राज्य कैकेयी का हुआ, तो हमारे जीने से क्या लाभ, फिर पुत्र और धन से क्या? जिसने ऐश्वर्य के लिए सौतेले पुत्र और पति को भी त्याग दिया, वह कुल को कलंकित करने वाली कैकेयी और किसे न त्यागेगी? हम अपने पुत्रों की शपथ खाकर कहती हैं, जब तक जीवित हैं, कैकेयी के राज्य में, चाहे वह हमें पाले भी, हम नहीं रहेंगी।”
“जिस निर्दय, दुष्टचारिणी ने राजेन्द्र के पुत्र को निर्वासित किया, उसे स्वामिनी पाकर कौन सुखी रह सकता है? कैकेयी के कारण यह सारा राज्य शीघ्र ही अराजक, यज्ञहीन और विपत्तिग्रस्त हो जाएगा। राम के वनवासी हो जाने पर महाराज जीवित न रहेंगे, और दशरथ के मरने पर इस राज्य का विनाश निश्चित है। इसलिए, पुण्य के क्षीण हो जाने से अत्यन्त दुःखी आप लोग या तो विष घोलकर पी लीजिए, या राघव के पीछे वन को चलिए, या ऐसे देश को जाइए जहाँ कैकेयी का नाम भी कानों न पड़े। राम सपत्नी, सलक्ष्मण कपटपूर्वक निर्वासित किए गए और हम वधशाला में बँधे पशुओं की भाँति भरत के खूँटे से बाँध दिए गए।”
स्त्रियाँ राम के रूप का स्मरण कर बिलखती हैं, “पूर्णचन्द्र-से मुख वाले, श्यामवर्ण, छिपी हँसली वाले, घुटनों तक लम्बी भुजाओं वाले, कमलनयन, पहले बोलने वाले, मधुरभाषी, सत्यवादी, चन्द्र-से प्रियदर्शन, मतवाले हाथी की चाल वाले वे महारथी राम वनों में विचरते हुए उन्हें अवश्य सुशोभित करेंगे।” नगर में इस प्रकार विलाप करती वे नागरी स्त्रियाँ मृत्यु के भय की आशंका से जैसे चीख उठीं। उन स्त्रियों के घरों में राम के लिए विलाप करते-करते सूर्य अस्त हो गया और रात आ गई।
जिसमें अग्निहोत्र की अग्नि का जलना भी रुक गया, वेदों का अध्ययन और पुराण-कथा भी थम गई, वह नगरी उस समय अन्धकार से पुती-सी दिखी। जिसमें गीत, उत्सव, नृत्य और वाद्य पूरी तरह शान्त हो गए, जिसका हर्ष सदा को उड़ गया और व्यापार की वृद्धि रुक गई, वह अयोध्या उस समय तारों से रहित आकाश और जलहीन सूखे समुद्र की भाँति दिखी। उस अवसर पर राम के निमित्त आतुर वे स्त्रियाँ, मानो उनका पुत्र या भाई निर्वासित हुआ हो, दीन होकर रोईं और मूर्च्छित हुईं; क्योंकि राम उन्हें अपने पुत्रों से भी अधिक प्रिय थे।
सार: घर लौटकर पुरुष पत्नियों की फटकार झेलते हैं। स्त्रियाँ राम के साथ वन जाने की कल्पना करती हैं, कैकेयी के राज्य को नकारती हैं, और एक ऐसी अयोध्या का चित्र खींचती हैं जो राम के बिना जलहीन समुद्र-सी है।
तीन नदियाँ पार: वेदश्रुति, गोमती, स्यन्दिका

पिता की आज्ञा का स्मरण करते हुए पुरुषव्याघ्र राम ने रात के शेष पहर में ही बहुत दूरी तय कर ली। उसी वेग से चलते हुए वह मनोहर रात बीत गई। शिव प्रभात-सन्ध्या की उपासना कर राम ने अनेक प्रदेश पार किए। भली प्रकार जुते खेतों की सीमाओं वाले गाँव और फूलों से लदे वन देखते हुए, उत्तम घोड़ों के कारण तेजी से जाते हुए भी मानो धीरे जाते, वे समीप के गाँव-बस्तियों में रहने वालों के वचन सुनते जाते: “धिक्कार है काम के वश में पड़े राजा दशरथ को। हाय, पापिनी, क्रूरकर्मा कैकेयी, जो मर्यादा का उल्लंघन कर ऐसे महाप्राज्ञ, करुणामय, जितेन्द्रिय, धर्मात्मा राजपुत्र को वनवास भेज रही है। जनकनन्दिनी महाभागा सीता, जो सदा सुख में रत रहीं, कैसे दुःख सहेंगी? हाय, राजा दशरथ अपने पुत्र के प्रति इतने निःस्नेह हो गए कि प्रजा के लिए निष्पाप राम को त्याग रहे हैं।” मनुष्यों के ये वचन सुनते हुए कोसलेश्वर वीर राम ने कोसल की सीमा पार कर ली।
फिर शुभ जल वाली वेदश्रुति नदी पार कर राम अगस्त्य ऋषि से अधिवासित दक्षिण दिशा की ओर बढ़े। बहुत देर उसी दिशा में चलकर उन्होंने गोमती नदी पार की, जो शीतल जल वहन करती है, गंगा के माध्यम से समुद्र की ओर जाती है, और जिसके तट गायों से सुशोभित हैं। गोमती को भी लाँघकर राम ने वेगवान् घोड़ों से मयूर और हंसों से शब्दायमान स्यन्दिका नदी पार की। फिर राम ने वैदेही को कोसल की वह समृद्ध भूमि दिखाई, जिसकी दक्षिणी सीमा स्यन्दिका थी, और जिसे प्राचीन काल में राजाधिराज मनु ने अपने ज्येष्ठ पुत्र इक्ष्वाकु को दिया था।
हंस-से स्वर वाले श्रीमान् पुरुषोत्तम राम ने मधुर वाणी से सूत से कहा, “हे सूत, माता-पिता से मिलकर अयोध्या लौटने पर मैं सरयू-तट के फूलों से लदे वन में कब आखेट के लिए विचरूँगा? यद्यपि सरयू-वन में आखेट की मुझे अधिक चाह नहीं; यह तो राजर्षियों द्वारा मान्य एक विलक्षण आनन्द-व्यवहार है। इस लोक में राजर्षियों ने आखेट विनोद के लिए किया; समय पर मनु के पुत्रों ने भी किया और धनुर्धरों ने चाहा, फिर भी मैं इसकी अत्यधिक चाह नहीं रखता।” “हे सूत” कहकर बार-बार सारथि को सम्बोधित करते हुए, उन-उन विषयों पर मधुर वाणी से बात करते हुए, इक्ष्वाकुनन्दन राम उस मार्ग पर आगे बढ़ते रहे।
सार: यह सर्ग एक यात्रा-वर्णन है: वेदश्रुति, गोमती और स्यन्दिका, तीन नदियों के पार राम कोसल की सीमा छोड़ते हैं। ग्रामवासियों के मुँह से कैकेयी की निन्दा और राम की प्रशंसा गूँजती है, और राम सूत से सहज बातचीत करते चलते हैं।
अयोध्या को विदा, गंगा-तट और निषादराज गुह
विशाल रमणीय कोसल को पार कर, अयोध्या की ओर मुख कर, बुद्धिमान् राम ने हाथ जोड़कर नगरी से कहा, “हे पुरीश्रेष्ठ, काकुत्स्थ राजा से रक्षित नगरी, मैं आपसे और आपकी रक्षा करने वाले देवताओं से विदा लेता हूँ। वनवास की अवधि पूरी कर, राजा से उऋण होकर, माता-पिता से मिलकर मैं आपको फिर देखूँगा।” फिर लाल-लाल नेत्रों वाले राम ने दाहिनी भुजा उठाई और आँसुओं से भरे मुख, दीन होकर जनपद के लोगों से कहा, “मुझ पर आप लोगों ने यथायोग्य अनुकम्पा और दया की। पर आपकी उपस्थिति से मेरे दुःख का चिरकाल तक खिंचना ठीक नहीं; अतः अपने कार्य सिद्ध करने के लिए लौट जाइए।” वे लोग महात्मा राम को प्रणाम कर, प्रदक्षिणा कर, जहाँ-तहाँ खड़े होकर घोर विलाप करते रहे। उन अतृप्त विलाप करते लोगों के देखते ही राम उनकी दृष्टि से वैसे ओझल हो गए जैसे रात के आरम्भ में सूर्य।
फिर पुरुषव्याघ्र राम ने रथ से धान-धन से सम्पन्न, दानशील जनों वाले, अभयमय, मन्दिरों और यज्ञ-स्तम्भों से ढके, उद्यान-आम्रवनों वाले, सरोवरों से भरे, तुष्ट-पुष्ट जनों और गोकुलों से व्याप्त, वेदघोष से गूँजते उस कल्याणमय कोसल को पार किया। वहाँ राम ने त्रिपथगा (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में बहने वाली) दिव्य, शीतल, शैवालरहित, ऋषिसेवित रमणीय गंगा को देखा। वह नदी समीप ही शोभायमान आश्रमों से अलंकृत थी और मुदित अप्सराओं से सेवित। देव, दानव, गन्धर्व और किन्नरों से सुशोभित वह नदी नागों और गन्धर्वों की पत्नियों से निरन्तर सेवित थी; देवताओं के क्रीड़ा-पर्वतों और दिव्य उद्यानों से घिरी थी और देवताओं के हित के लिए आकाश में भी बहती थी।
कहीं जल चट्टानों से टकराकर अट्टहास-सा करता, कहीं फेन से निर्मल हँसी हँसता; कहीं चोटी-सी गुँथी, कहीं भँवरों से शोभित; कहीं स्थिर और गम्भीर, कहीं वेग से व्याकुल; कहीं गम्भीर निनाद, कहीं भैरव शब्द करती। देवसंघ उसके निर्मल कमलों से ढके जल में डुबकी लगाते; कहीं विशाल पुलिन, कहीं श्वेत बालू। हंस, सारस और चक्रवाकों से शब्दायमान, तटवृक्षों की मालाओं-सी शोभा वाली, फूले कमलों से ढकी वह अनिन्द्य नदी मणि-सी निर्मल दिखती थी। शंकर की जटाओं से, भगीरथ के तप से, उतरी, मगर-नाक-सर्पों से युक्त, समुद्र की महिषी वह गंगा, सारस-क्रौंच से शब्दायमान, श्रृंगवेरपुर के पास राम को मिली।
तरंगों और भँवरों से भरी उस नदी को देख महारथी राम ने सुमन्त्र से कहा, “हे सारथि, आज हम यहीं ठहरें। नदी से अधिक दूर नहीं, यह बहुत बड़ा इंगुदी का वृक्ष है, जिस पर बहुत-से फूल और कोमल पत्ते हैं; हम इसी के नीचे ठहरेंगे। यहाँ से मैं नदियों में श्रेष्ठ, देव-मनुष्य-गन्धर्व-पशु-पक्षियों से सम्मानित जल वाली शिवा गंगा को भली-भाँति देखूँगा।” लक्ष्मण और सुमन्त्र ने “बहुत अच्छा” कहकर रथ को इंगुदी-वृक्ष की ओर हाँका। इक्ष्वाकुनन्दन राम उस रमणीय वृक्ष के पास जाकर पत्नी और लक्ष्मण सहित रथ से उतरे। सुमन्त्र ने भी उतरकर उत्तम घोड़े खोले और हाथ जोड़कर वृक्ष-मूल में बैठे राम के पास खड़े हुए।

उस प्रदेश में गुह नामक राजा राम का अपने प्राणों के समान प्रिय मित्र था; वह बलवान्, निषाद-जाति का, चतुरंगिणी सेना का स्वामी और स्थपति के नाम से विख्यात था। पुरुषव्याघ्र राम को अपने राज्य में आया सुनकर वह वृद्ध मन्त्रियों और बन्धुओं सहित राम के पास आया। दूर से निषादाधिपति को आता देख राम लक्ष्मण सहित गुह से मिलने आगे बढ़े। आर्त गुह ने राम का आलिंगन कर कहा, “हे राम, जैसे अयोध्या वैसा ही यह श्रृंगवेरपुर का राज्य आपका है; मैं आपके लिए क्या करूँ? हे महाबाहु, आप जैसा प्रिय अतिथि भला किसे मिलेगा?” फिर उसने अनेक प्रकार के उत्तम भोज्य पदार्थ और अर्घ्य लाकर शीघ्र कहा, “हे महाबाहु, आपका स्वागत है; यह सारी भूमि आपकी है। हम सेवक हैं, आप स्वामी; आप हमारे राज्य का भली-भाँति शासन कीजिए। यहाँ खाने, चबाने, पीने और चाटने योग्य पदार्थ, उत्तम शय्याएँ और घोड़ों के लिए चारा प्रस्तुत है।”
इस प्रकार कहते गुह से राम ने कहा, “आप पैदल आकर मिले और स्नेह दिखाया, इसी से हम सम्मानित हुए और सदा आप पर प्रसन्न हैं।” गुह को अपनी सुडौल भुजाओं से कसकर भींचते हुए राम ने आगे कहा, “हे गुह, सौभाग्य से मैं आपको बन्धुओं सहित नीरोग देखता हूँ; आपके राष्ट्र, मित्रों और वनों में कुशल तो है? जो कुछ आपने प्रेम से प्रस्तुत किया, उस सबको मैं स्वीकार कर लौटा देता हूँ; क्योंकि मैं दान का उपभोग नहीं करता। मुझे कुश, चीर और मृगचर्म धारण करने वाला, फल-मूल खाने वाला, धर्म में स्थित वनवासी तापस जानिए। मुझे केवल घोड़ों के चारे की आवश्यकता है, अन्य किसी की नहीं; इतने भर से मैं आपसे सम्मानित हो जाऊँगा। ये घोड़े मेरे पिता राजा दशरथ को प्रिय हैं; इनके भली प्रकार खिलाए जाने से मैं सम्मानित हो जाऊँगा।” गुह ने तुरन्त अपने लोगों को आज्ञा दी कि घोड़ों को पीने का पेय और चारा शीघ्र दिया जाए।
फिर वृक्षों की छाल का उत्तरीय पहने राम ने पश्चिम-सन्ध्या की उपासना कर, लक्ष्मण के स्वयं लाए जल को ही भोजन के रूप में ग्रहण किया, इस प्रकार उस नदी के सम्मान में उपवास किया। भूमि पर सोते हुए राम और सीता के पैर धोकर लक्ष्मण कुछ दूर हटकर एक वृक्ष के नीचे खड़े हो गए। धनुर्धर गुह भी सूत के साथ लक्ष्मण को राम के गुणों पर बोलने को प्रेरित करते हुए, सावधान रहकर राम के लिए जागते रहे। जिन्होंने कभी दुःख नहीं देखा और सब सुखों के योग्य थे, वे यशस्वी, मनस्वी, महात्मा दशरथनन्दन राम भूमि पर सोए रहे और वह रात बड़ी देर में जैसे-तैसे बीती।
एक उप-कथा: गंगा को “शंकर की जटाओं से, भगीरथ के तप से उतरी” कहा गया है। बाद की परम्परा में यह गंगावतरण-कथा विस्तार पाती है: भगीरथ के पूर्वज सगर-पुत्रों की राख को पवित्र करने हेतु गंगा को पृथ्वी पर लाया गया; वेग सँभालने को शिव ने उसे अपनी जटाओं में धारण किया, तभी वह सौम्य होकर उतरी। वाल्मीकि यहाँ केवल संकेत देते हैं; पूरी कथा बालकाण्ड में आती है।
सार: अयोध्या को विदा देकर राम गंगा-तट पहुँचते हैं, जिसका भव्य वर्णन वाल्मीकि के अद्भुत-रस का शिखर है। निषादराज गुह का राजोचित आतिथ्य राम विनम्रता से लौटा देते हैं और तापस-व्रत पर अडिग रहते हैं, केवल घोड़ों का चारा स्वीकारते हैं।
लक्ष्मण की रातभर पहरेदारी और गुह से बातें
राजकुमार-दम्पति को भूमि पर सोया देख संताप से संतप्त गुह ने उस लक्ष्मण से, जो निष्कपट प्रेम से बड़े भाई की रक्षा हेतु जाग रहे थे, कहा, “हे तात, यह सुखद शय्या आपके लिए तैयार की गई है; हे राजपुत्र, आप इस पर सुखपूर्वक विश्राम कीजिए। हम सब कष्टों के अभ्यस्त हैं, आप सुख के योग्य हैं; काकुत्स्थ की रक्षा के लिए हम यह रात जागेंगे। पृथ्वी पर राम से प्रियतर मुझे कोई नहीं; मैं आपसे सत्य कहता हूँ और सत्य की शपथ खाता हूँ। इन्हीं की कृपा से मैं इस लोक में महान् यश, धर्म और प्रचुर अर्थ-काम की आशा रखता हूँ। अतः मैं अपने बन्धुओं सहित, धनुष हाथ में लिए, सीता सहित सोते अपने प्रिय मित्र राम की हर प्रकार से रक्षा करूँगा। इस वन में सदा विचरने के कारण मुझे कुछ भी अज्ञात नहीं; हम विशाल चतुरंगिणी सेना को भी जीत सकते हैं।”

लक्ष्मण ने उत्तर दिया, “हे अनघ, धर्म को ही देखने वाले आपकी रक्षा में हम किसी से नहीं डरते। पर जब दशरथनन्दन राम सीता सहित भूमि पर सो रहे हैं, तब मुझे नींद, भोजन या सुख कैसे प्राप्त हो सकते हैं? देखिए, जिन्हें सब देव-असुर मिलकर भी युद्ध में नहीं सह सकते, वे तृणों पर सीता सहित सुखपूर्वक सोए हैं। जो मन्त्र, तप और नाना पराक्रमों से प्राप्त दशरथ के सदृशलक्षण एकमात्र पुत्र हैं, उनके वनवासी होने पर राजा चिरकाल न रहेंगे और पृथ्वी शीघ्र ही विधवा हो जाएगी। मेरा विश्वास है कि महारानी कौसल्या, राजा और मेरी माता सुमित्रा, ये सब इस रात को पार नहीं कर सकेंगे। मेरी माता शायद शत्रुघ्न की प्रतीक्षा में बच जाए, पर वीरप्रसवा कौसल्या यदि न रहीं तो वह दुःखद होगा।”
“राम के प्रेम में डूबी, सुखद और सबको प्रिय वह नगरी राजा की मृत्यु से दुःखी होकर नष्ट हो जाएगी। ज्येष्ठ पुत्र को न देखते हुए महात्मा राजा के प्राण उनके शरीर को कैसे धारण करेंगे? राजा के मरने पर कौसल्या उनके पीछे मरेंगी, और तुरन्त मेरी माता भी अन्त को प्राप्त होंगी। अपना मनोरथ न पाकर, राम को राज्य पर न बैठाकर, मेरे पिता ‘गया, सब गया’ कहते हुए प्राण त्यागेंगे। उस समय भाग्यवान् लोग ही उन स्वर्गीय पिता का सब प्रेतकार्यों में संस्कार करेंगे। यदि दशरथ बच जाएँ, तो लोग मेरे पिता की राजधानी में सुखपूर्वक विचरेंगे।”
लक्ष्मण उस नगरी का स्मरण करते हैं, “रमणीय चौराहों, बँटे राजमार्गों, हर्म्य-प्रासादों, श्रेष्ठ गणिकाओं से शोभित, रथ-अश्व-गजों से भरी, तूर्यनाद से गूँजती, सब कल्याणों से पूर्ण, हृष्ट-पुष्ट जनों से व्याप्त, आराम-उद्यानों से सम्पन्न, समाज-उत्सवों से शोभित मेरे पिता की वह राजधानी, यदि दशरथ जीवित रहें, तो प्रजा सुखपूर्वक विचरेगी। यदि दशरथ जीवित रहे, तो हम सत्यप्रतिज्ञ कुशल राम के साथ, वनवास पूरा होने पर, अयोध्या में फिर प्रवेश कर सकेंगे।” इस प्रकार प्रजाहितकारी दशरथनन्दन लक्ष्मण जब बड़े भाई के प्रेम से सत्य कह रहे थे, तब विपत्ति से पीड़ित और संताप से सताए गुह, ज्वर से व्याकुल हाथी की भाँति, आँसू बहाने लगे। इस प्रकार महात्मा राजपुत्र लक्ष्मण के विलाप करते-करते वह रात बीत गई।
सार: गुह की पहरेदारी की पेशकश को लक्ष्मण विनयपूर्वक स्वीकार नहीं करते: बड़े भाई के भूमि पर सोते हुए वे विश्राम नहीं कर सकते। उनके मुँह से दशरथ और दोनों माताओं की मृत्यु की आशंका फूट पड़ती है, और रात बातों में कट जाती है।
गंगा-पार, सुमन्त्र की विदाई और जटा-धारण
रात बीतकर प्रभात होने पर चौड़ी छाती वाले महायशस्वी राम ने शुभलक्षण लक्ष्मण से कहा, “सूर्योदय का समय निकट है और भगवती रात बीत गई; हे तात, वह अत्यन्त काला पक्षी कोयल कूज रहा है। वन में बोलते मयूरों का शब्द भी सुनाई दे रहा है। हे सौम्य, समुद्र की ओर बहने वाली वेगवती जाह्नवी को हम पार करें।” राम के वचन का अभिप्राय समझकर लक्ष्मण ने गुह और सूत को सूचित किया और बड़े भाई के सामने खड़े हो गए। राम का वचन सुन और मानकर निषादराज गुह ने शीघ्र अपने मन्त्रियों को बुलाकर एक से कहा, “जिससे राम सहज पार उतर सकें, ऐसी डाँड़ और कर्णधार से युक्त सुन्दर, सुदृढ़ नाव शीघ्र घाट पर ले आइए।” गुह का आदेश सुन उसका महान् मन्त्री सुन्दर नाव निकटतम घाट पर लाकर गुह को सूचित कर आया।
तब हाथ जोड़कर गुह ने राम से कहा, “हे देव, यह नाव उपस्थित है; और मैं आपके लिए क्या करूँ? हे देवपुत्र-तुल्य, हे सुव्रत, समुद्रगामिनी गंगा को पार करने को यह नाव लाई गई है; आप शीघ्र चढ़िए।” महातेजस्वी राम ने कहा, “आपने मेरा मनोरथ पूर्ण किया; सब सामान शीघ्र नाव में रखवा दीजिए।” तब कवच पहन, तरकश और तलवार बाँधकर धनुर्धर राम और लक्ष्मण सीता सहित उसी घाट से, जहाँ से और लोग उतरते थे, गंगा के पास आए। प्रस्थान को तैयार धर्मज्ञ राम के पास विनयपूर्वक आकर हाथ जोड़े सूत ने पूछा, “मैं क्या करूँ?”
राम ने उत्तम दाहिने हाथ से सुमन्त्र का स्पर्श करते हुए कहा, “हे सुमन्त्र, आप शीघ्र फिर राजा के पास लौट जाइए और सावधान रहिए।” इतना कहकर “लौट जाइए; मेरी इतनी ही सेवा बहुत है; अब रथ छोड़कर हम पैदल ही महावन को जाएँगे” कहा। अपने को विदा हुआ पाकर दुःखी सूत सुमन्त्र ने राम से कहा, “हे पुरुषव्याघ्र, इस लोक में किसी पुरुष ने इस विधि का उल्लंघन नहीं किया, जिसके कारण आप पत्नी और भाई सहित साधारण जन की भाँति वन में रहेंगे। यदि आप जैसे को भी यह विपत्ति आ पड़ी, तो मुझे ब्रह्मचर्य, स्वाध्याय, मार्दव और आर्जव का कोई फल नहीं दिखता। हे वीर, वैदेही और भाई सहित वन में रहते हुए आप वही गति पाएँगे जो तीनों लोकों को जीतने वाले को मिलती है। हे राम, आपसे त्यागे जाकर हम सचमुच मारे गए, क्योंकि अब हम पापिनी कैकेयी के वश में पड़कर दुःख भोगेंगे।” इतना कहकर सूत सुमन्त्र राम को दूर गया जान, दुःखी होकर बहुत देर रोता रहा।
आँसू सूख जाने और सूत के पवित्र जल का आचमन कर शुद्ध हो जाने पर राम ने बार-बार मधुर वचन कहे, “इक्ष्वाकुओं का आपके समान कोई सुहृद् मुझे नहीं दिखता; ऐसा कीजिए कि राजा दशरथ मेरे लिए शोक न करें। राजा शोक से व्याकुलमति, वृद्ध और कामभार से अवसन्न हैं; इसीलिए मैं आपसे यह कहता हूँ: कैकेयी को प्रसन्न रखने की इच्छा से वे महात्मा राजा आपको जो-जैसा करने को कहें, वह कीजिए। राजा लोग इसीलिए राज्य करते हैं कि उनकी इच्छा किसी कार्य में न रुके। ऐसा कीजिए कि वे महाराज न अप्रसन्न हों, न शोक से व्यथित। सुख के अनभ्यस्त, वृद्ध, आर्य, जितेन्द्रिय राजा को अभिवादन करके ही मेरी ओर से यह निवेदन कीजिए:
“‘न मैं शोक करता हूँ, न लक्ष्मण, न सीता को यह दुःख है कि हम अयोध्या से च्युत हुए या वन में रहेंगे। चौदह वर्ष बीतने पर आप लक्ष्मण, मुझे और सीता को शीघ्र लौटे हुए देखेंगे।’” “हे सुमन्त्र, राजा और मेरी माता तथा अन्य देवियों एवं कैकेयी से बार-बार यह कहकर, कौसल्या से मेरी कुशल कहिए और सीता, मुझ आर्य तथा लक्ष्मण की ओर से उनके चरणों में वन्दना निवेदन कीजिए। महाराज पिता से यह भी कहिए: ‘भरत को शीघ्र बुला लीजिए; मामा के घर से लौटने पर भरत को आपके द्वारा निश्चित पद पर बैठा दीजिए। भरत को आलिंगन कर युवराज-पद पर अभिषिक्त कर देने से हमारे कारण उत्पन्न संताप का दुःख आप पर न छाएगा।’ भरत से भी कहिए: ‘जैसे आप राजा के साथ बरतते हैं, वैसे ही बिना भेद के सब माताओं के साथ बरतें। जैसे कैकेयी और सुमित्रा आपको समान रूप से माननीय हैं, वैसे ही, और विशेष रूप से, मेरी माता देवी कौसल्या भी। पिता को प्रसन्न रखने की इच्छा से युवराज-पद स्वीकार कर लेने पर आप दोनों लोकों में सदा सुख पा सकेंगे।’”
राम के समझाने और लौटाए जाने पर, यह सब वचन सुनकर सुमन्त्र ने स्नेहवश काकुत्स्थ से कहा, “हे तात, यदि मैं स्नेहवश आपसे विनयरहित होकर बिना संकोच कहूँ, तो मुझे भक्तिमान् समझकर मेरी वाणी क्षमा कीजिए। आपके बिना मैं उस नगरी को कैसे लौटूँ, जो आपके वियोग से पुत्रशोक से आतुर माता-सी हो गई है? आपके सहित रथ देखकर ही प्रजा फूट-फूटकर रोई थी; अब आपके बिना रथ देखकर वह नगरी फट पड़ेगी। यह सूना रथ देख नगरी वैसी ही दीन हो जाएगी जैसी रण में वीर के मारे जाने पर केवल सारथि बचे रहने पर सेना। आज सब प्रजा आपका, जो दूर रहकर भी मन के आगे विराजते हैं, चिन्तन करती निराहार होगी। आपके वनवास पर पौरों का जो आर्तनाद उठा था, मुझे अकेले रथ सहित देखकर वे सौ गुना अधिक रोएँगे।”
“मैं देवी कौसल्या से यह झूठ क्या कहूँगा कि ‘आपका पुत्र मामा के घर ले जाया गया, संताप न कीजिए’? ऐसा झूठ, चाहे सुनने में प्रिय हो, मैं नहीं कह सकता; और यह सत्य कि राम वन गए, यह अप्रिय वचन मैं कैसे कहूँ? मेरे वश में रहने वाले ये उत्तम घोड़े, जो केवल आपके बन्धुओं और आपको ढोते हैं, आपके बिना रथ कैसे खींचेंगे? इसलिए, हे अनघ, आपके बिना मैं अयोध्या नहीं जा सकता; आप मुझे वनवास में साथ चलने की आज्ञा दीजिए। यदि याचना करने पर भी आप मुझे त्याग देंगे, तो आपके त्यागते ही मैं रथ सहित यहीं अग्नि में प्रवेश कर जाऊँगा। वन में जो आपके तप में विघ्न करेंगे, उन सब प्राणियों को मैं रथ से दूर भगाऊँगा। आपके अनुग्रह से मुझे रथ हाँकने का सुख मिला; अब मैं आपके साथ वनवास का सुख चाहता हूँ। मुझ पर कृपा कीजिए, मैं वन में आपका सेवक बनना चाहता हूँ; प्रेम से ‘मेरे निकट रहिए’ कहकर मुझे अपना समीपवर्ती बनाइए। ये घोड़े भी, यदि वन में आपकी सेवा का अवसर पाएँ, तो परम गति पाएँगे। मैं वन में रहकर सिर झुकाकर आपकी सेवा करूँगा; इसके लिए मैं अयोध्या और देवलोक तक छोड़ने को तैयार हूँ।”
इस प्रकार बार-बार दीन होकर याचना करते सुमन्त्र से भृत्यवत्सल राम ने कहा, “हे भर्तृवत्सल, मैं आपकी परम भक्ति जानता हूँ; पर सुनिए, मैं आपको यहाँ से अयोध्या क्यों भेजता हूँ। नगरी में आपको लौटा देखकर मेरी छोटी माता कैकेयी को विश्वास हो जाएगा कि राम वन चले गए; अन्यथा मेरे साथ रहते देख, जो वनवास पर भी सन्तुष्ट न होंगी, वे धर्मात्मा राजा को झूठा न समझ बैठें। मेरा यह प्रथम अभिप्राय है कि मेरी छोटी माता कैकेयी भरत से रक्षित समृद्ध राज्य पाएँ; और यह आपके लौटने पर ही सम्भव है। मेरी और राजा की प्रसन्नता के लिए, हे सुमन्त्र, आप नगरी लौट जाइए और जो-जो सन्देश कहे गए, वैसे-वैसे कहिए।”

इस प्रकार सूत को बार-बार सान्त्वना देकर, निर्भीक राम ने गुह से तर्कसंगत वचन कहे, “हे गुह, अब अपने ही लोगों से भरे वन में मेरा रहना उचित नहीं; अतः निर्जन प्रदेश के आश्रम में मुझे रहना और वहाँ की विधि का पालन करना चाहिए। पिता का हित चाहता हुआ मैं, सीता और लक्ष्मण की सम्मति से, तापसों के भूषण-रूप नियम ग्रहण कर, जटा धारण कर आगे बढ़ूँगा; अतः वट का दूध ले आइए।” गुह तुरन्त वह दूध ले आया। उस दूध से महाबाहु राम ने अपनी और लक्ष्मण की जटाएँ बनाईं और तापस का चिह्न धारण किया। चीर पहने, जटामण्डल धारण किए वे दोनों भाई राम और लक्ष्मण उस समय दो ऋषियों-से शोभायमान हुए।
तब वैखानस-मार्ग (तापस-व्रत) ग्रहण कर राम ने अपने सहायक गुह से कहा, “हे गुह, सेना, कोश, दुर्ग और जनपद के विषय में सावधान रहिए; राज्य की रक्षा अत्यन्त कठिन मानी जाती है।” गुह से विदा लेकर इक्ष्वाकुनन्दन राम पत्नी और लक्ष्मण सहित शीघ्र, निश्चिन्त, आगे बढ़े। नदी-तट पर नाव देख वेगवती गंगा पार करने को उत्सुक राम ने लक्ष्मण से कहा, “हे नरव्याघ्र, खड़ी इस नाव को थामकर स्थिर कीजिए, मनस्विनी सीता को सँभालकर इस पर चढ़ाइए और स्वयं भी तुरन्त चढ़ जाइए।” बड़े भाई की आज्ञा सुन, सब अनुकूल करते हुए, आत्मवान् लक्ष्मण ने पहले मैथिली को चढ़ाया, फिर स्वयं चढ़े। तब तेजस्वी राम स्वयं अन्त में चढ़े, और निषादाधिपति गुह ने अपने स्वजनों को नाव खेने का आदेश दिया।
नाव पर चढ़कर महातेजस्वी राम ने अपने हित के लिए ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों के योग्य पवित्र मन्त्र (‘दैवी नावम्’ आदि) का जप किया। शास्त्रोक्त विधि से आचमन कर, प्रीति से सन्तुष्ट होकर, राम ने सीता सहित उस नदी को प्रणाम किया, और महारथी लक्ष्मण ने भी वैसा ही किया। फिर सुमन्त्र, गुह और उसकी सेना से विदा लेकर, नाव पर बैठे राम ने नाविकों को नाव खेने को प्रेरित किया।
समझने की कुंजी (वैखानस-व्रत): “वैखानस-मार्ग” तापसों का जीवन-नियम है: फल-मूल का आहार, भूमि-शयन, जटा-धारण और संयम। राम का वट के दूध से जटा बनाना इसी व्रत में दीक्षा का चिह्न है; यह राजसी वेश छोड़ वनवासी रूप अपनाने का क्षण है।
सीता की गंगा-स्तुति और वत्सभूमि में प्रवेश

नाविकों के खेने और कर्णधार के नियन्त्रण से सुन्दर डाँड़ों के वेग से चलती नाव शीघ्र जल पार करने लगी। भागीरथी के मध्य पहुँचकर अनिन्द्य वैदेही ने हाथ जोड़कर उस नदी से कहा, “हे देवि, मैं सकुशल आपका जल पार कर लूँ; और मेरे पति वन में चौदह वर्ष बिताने का व्रत पूरा कर लें। जब पुरुषव्याघ्र राम सकुशल लौटकर अपना राज्य पुनः पाएँगे, तब मैं आपको प्रसन्न करने के लिए एक लाख गायें, वस्त्र और उत्तम अन्न ब्राह्मणों को दूँगी। अयोध्या लौटकर मैं देवदुर्लभ सहस्र पदार्थों, करमुक्त भूमि, वस्त्र और अन्न से आपकी पूजा करूँगी; हे देवि, आप मुझ पर प्रसन्न रहें।”
“आप त्रिपथगा देवि स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में बहती हुई ब्रह्मलोक तक व्याप्त हैं और इस लोक में समुद्रराज की भार्या के रूप में दिखाई देती हैं; इसलिए मैं आपको नमस्कार और प्रशंसा करती हूँ। हे शोभने, राज्य पाने पर पुरुषव्याघ्र राम सकुशल लौट आएँ। आपके तट पर जो देवता, तीर्थ और आयतन हैं, मैं उन सबकी पूजा करूँगी। महाबाहु अनघ राम मुझ और लक्ष्मण सहित वनवास से अयोध्या में फिर प्रवेश करें।” इस प्रकार गंगा से प्रार्थना करती हुई पतिव्रता अनिन्द्य सीता शीघ्र ही दक्षिण तट पर पहुँच गईं।
तट पर पहुँचकर, नाव छोड़कर, परंतप नरश्रेष्ठ राम भाई लक्ष्मण और वैदेही सहित आगे बढ़े। महाबाहु राम ने सुमित्रानन्दन लक्ष्मण से कहा, “हे पुरुषर्षभ, जनयुक्त हो या निर्जन, सीता की रक्षा के लिए तत्पर रहिए; क्योंकि मुझ-जैसे मर्यादापालक पुरुषों के लिए निर्जन वन में स्त्री की रक्षा अवश्य करनी चाहिए। हे सौमित्र, आप आगे चलिए, सीता आपके पीछे; मैं पीछे रहकर सीता और आपकी रक्षा करूँगा। हमें एक-दूसरे की रक्षा करनी है। अभी कोई कठिन परीक्षा बीती नहीं; आज ही वैदेही को वनवास का दुःख भोगना पड़ेगा। वे आज ऐसे वन में प्रवेश करेंगी जहाँ मनुष्यों के पैरों से कुचले तृण के चिह्न तक नहीं दिखते, जो खेत-उद्यान से रहित, ऊबड़-खाबड़ और गहरी खाइयों से भरा है।” राम का वचन सुन लक्ष्मण आगे चले, सीता उनके पीछे, और सीता के तुरन्त बाद रघुनन्दन राघव।
शीघ्र गंगा-पार पहुँचे राम को निरन्तर देखते हुए, और लम्बी दूरी के कारण दृष्टि के टूट जाने पर, पश्चात्तापी और व्यथित तपस्वी सुमन्त्र राम के वियोग में आँसू बहाने लगे। महानदी गंगा पार कर लोकपालों-से प्रभाव वाले वरदायक महात्मा राम क्रमशः समृद्ध, सुन्दर खेतों की पंक्तियों वाली, मुदित वत्सभूमि (गंगा और यमुना के बीच की भूमि) में पहुँचे। वहाँ क्रीड़ा-हेतु वराह, ऋष्य, पृषत और महारुरु, इन चार बड़े मृगों का वध कर, और हवि-योग्य फलादि लेकर, क्षुधित दोनों भाई रात के विश्राम और भोजन के लिए शीघ्र उस वनस्पति-वृक्ष के पास आए, जहाँ उन्होंने आखेट के समय सीता को अपनी दृष्टि के भीतर ठहरा रखा था।
सार: सीता की गंगा-स्तुति इस खण्ड का कोमल केन्द्र है: वे अपने लिए नहीं, पति के व्रत और सकुशल लौटने के लिए प्रार्थना करती हैं। दक्षिण तट पार कर राम पहली बार सीता को आगाह करते हैं कि असली वनवास अब आरम्भ हुआ; तीनों वत्सभूमि के निर्जन वन में प्रवेश करते हैं।
वट-तले पहली रात: लक्ष्मण को लौटने का अनुरोध
उस वृक्ष के पास आकर, पश्चिम-सन्ध्या की उपासना कर, रमयिताओं में श्रेष्ठ राम ने लक्ष्मण से कहा, “आज जनपद के बाहर हमारी यह पहली रात है, जो सुमन्त्र के बिना बीतेगी; इसके लिए आप उत्कण्ठित न हों। आज से रातों में हम दोनों को आलस्यरहित होकर जागना है; क्योंकि सीता की रक्षा और योगक्षेम हम दोनों का दायित्व है, हे लक्ष्मण। हे सौमित्र, यह रात किसी प्रकार बिता लें; आइए, अपने हाथों जुटाए तृण-पत्तों की शय्या पर भूमि बिछाकर लेट जाएँ।”
महामूल्य शय्याओं के योग्य राम खुली भूमि पर बैठकर लक्ष्मण से उपयुक्त बातें कहने लगे, “हे लक्ष्मण, आज निश्चय ही महाराज दुःख से सो रहे होंगे; और कैकेयी, जिसका अभीष्ट सिद्ध हो गया, सन्तुष्ट होगी। कहीं भरत को लौटा आया देख वह देवी कैकेयी राज्य के लिए महाराज के प्राण ही न ले ले। अपनी इच्छा पर चलने वाले पुत्र को मेरी भाँति त्याग दिए जाने पर अनाथ, वृद्ध, कैकेयी के वश में पड़े महाराज क्या कर पाएँगे? अपनी इस विपत्ति और राजा की बुद्धि-विभ्रान्ति को देखकर मुझे लगता है कि अर्थ और धर्म से भी काम भारी पड़ता है। हे सौमित्र, ज्ञानी पुरुष भी कौन होगा जो स्त्री के लिए अपनी इच्छा पर चलने वाले पुत्र को त्याग दे, जैसे पिता ने मुझे त्याग दिया?”
“कैकेयी का पुत्र भरत सुखी और सुभार्या वाला है, जो मुदित कोसलों का अधिराज की भाँति भोग करेगा; क्योंकि पिता बूढ़े हो गए और मैं वन में आ गया, अतः समूचे राज्य का अकेला सुख उसी को मिलेगा। जो अर्थ और धर्म छोड़कर काम के पीछे चलता है, वह राजा दशरथ की भाँति शीघ्र दुःख पाता है। हे सौम्य, मेरा विश्वास है कि कैकेयी दशरथ के अन्त, मेरे निर्वासन और भरत के राज्य के लिए ही इस घर में आई थी। कहीं वह सौभाग्य के मद से मोहित होकर मेरे और आपके कारण कौसल्या और सुमित्रा को न सताए। हे लक्ष्मण, इसलिए आप कल सबेरे ही यहाँ से अयोध्या लौट जाइए; मैं अकेला सीता के साथ दण्डक को जाऊँगा। दशरथ के बाद अनाथ कौसल्या के आप नाथ बनेंगे। नीच कर्म वाली कैकेयी द्वेष से अन्याय कर सकती है, यहाँ तक कि आपकी और मेरी माता को विष भी दे सकती है।”
राम का स्वर और गहरा होता है, “हे तात, अवश्य ही किसी पूर्वजन्म में मेरी माता कौसल्या ने स्त्रियों को उनके पुत्रों से वियुक्त किया होगा, जिसका फल आज उसे मिल रहा है। चिरकाल तक पोसी, दुःख से पाली गई कौसल्या मुझ-जैसे पुत्र से, ठीक फल पाने के समय, वियुक्त हुई; धिक्कार है मुझे! कोई स्त्री मुझ-जैसा पुत्र न जने, जो, हे सौमित्र, अपनी माता को अनन्त शोक देता है। मुझे लगता है कि कौसल्या की वह सारिका मुझसे अधिक प्रिय है, जिससे यह सुना जाता है: ‘हे शुक, शत्रु का पैर काट खा।’ अल्पभाग्या, शोकातुर, पुत्र होते भी अपुत्रा-सी मेरी माता का मुझ-जैसे, जो कुछ उपकार नहीं करता, ऐसे पुत्र से क्या प्रयोजन? मुझसे रहित मेरी माता कौसल्या परम दुःख से आतुर शोक-सागर में पड़ी है।”
“हे लक्ष्मण, क्रुद्ध होने पर मैं अकेला बाणों से अयोध्या और पृथ्वी को भी जीत सकता हूँ; पर बल का प्रदर्शन परलोक में हितकर नहीं होता। हे अनघ, अधर्म के भय और परलोक के भय से मैं आज अपना अभिषेक नहीं करता।” इस प्रकार और भी बहुत-कुछ करुण विलाप कर, आँसुओं से भरे मुख, दीन राम रात में चुपचाप बैठ गए।
बुझती ज्वाला वाली अग्नि और वेगहीन समुद्र-से दिखते राम को, विलाप थमने पर, लक्ष्मण ने आश्वस्त किया, “हे राम, हे आयुधियों में श्रेष्ठ, आपके निकल जाने से अयोध्या निश्चय ही निष्प्रभ हो गई होगी, जैसे चन्द्रहीन रात। हे पुरुषर्षभ, आपका इस तरह दुःखी होना उचित नहीं; इससे आप सीता और मुझे भी विषादग्रस्त करते हैं। हे राघव, आपके बिना न सीता और न मैं ही, जल से बाहर निकाली मछलियों की भाँति, क्षणभर भी जीवित रह सकते हैं। हे परंतप, आपके बिना मैं आज न पिता को, न शत्रुघ्न को, न सुमित्रा को, और न स्वर्ग को ही देखना चाहता हूँ।”
तब उस निर्जन वन में, कुछ ही दूरी पर सीता को देखते हुए, वहाँ बैठे धर्मवत्सल राम और लक्ष्मण वट के नीचे भली प्रकार बनाई शय्या पर आ गए। लक्ष्मण की उस उत्तम, पूर्ण और सुन्दर वचनावली को आदरपूर्वक सुनकर, वनवास को स्वीकार करते हुए, परंतप राघव ने अपने वनवास के समस्त वर्ष लक्ष्मण के साथ बिताने का निश्चय किया, धर्म का चिरकाल तक अनुसरण करते हुए। उसके बाद उस निर्जन महावन में राघववंश को बढ़ाने वाले वे दोनों महाबली राम और लक्ष्मण, पर्वत-शिखर पर रहने वाले दो सिंहों की भाँति, न भय और न ही घबराहट को प्राप्त हुए।
सार: वट-तले की पहली रात राम के मन की परम खुली झाँकी है: वे कैकेयी के और षड्यन्त्र की आशंका करते हैं, माता कौसल्या के लिए तड़पते हैं, और लक्ष्मण को लौटने को कहते हैं ताकि वह माँ की रक्षा करे। लक्ष्मण साफ़ इनकार कर देते हैं, और राम उनके साथ रहना स्वीकार कर लेते हैं।
भरद्वाज-आश्रम और चित्रकूट का संकेत
उस महावृक्ष के नीचे सुन्दर रात बिताकर, निर्मल सूर्य के उदित होने पर, वे तीनों उस स्थान से चल पड़े। जहाँ यमुना भागीरथी गंगा से मिलती है, उस प्रदेश को लक्ष्य कर एक बड़े वन में होकर वे आगे बढ़े। जगह-जगह तरह-तरह की मनोहर, पहले कभी न देखी भूमियाँ और प्रदेश देखते हुए वे यशस्वी यात्री चलते रहे। पुष्पित वृक्षों को सुख से देखते हुए, दिन ढलते ही राम ने सौमित्र से कहा, “हे सौमित्र, प्रयाग के पास यह उत्तम, सुगन्धित धुआँ देखिए; यह भगवान् अग्नि का चिह्न है। मेरा अनुमान है कि भरद्वाज मुनि निकट ही हैं। निश्चय ही हम गंगा और यमुना के संगम पर पहुँच गए; तभी तो जल से जल के टकराने का शब्द सुनाई दे रहा है। वन की उपज पर जीने वालों के काटे लकड़ी के टुकड़े और तरह-तरह के कटे वृक्ष इस आश्रम में दिख रहे हैं।”
सूर्य के ढलते समय वे दोनों धनुर्धर सुखपूर्वक चलकर गंगा-यमुना के संगम पर मुनि के निवास के निकट पहुँचे। आश्रम के पास पहुँचकर, अपने धनुर्धर-रूप से पशु-पक्षियों को डराते हुए, थोड़ी दूरी तय कर राम भरद्वाज के आश्रम पहुँचे। मुनि के दर्शन के इच्छुक, सीता सहित वे दोनों वीर आश्रम पर आकर कुछ दूर खड़े होकर मुनि की अनुमति की प्रतीक्षा करने लगे। किसी शिष्य द्वारा अनुमति पाकर राम भीतर गए और शिष्यगणों से घिरे, संशितव्रत, एकाग्र, तप से लब्धदृष्टि (सर्वज्ञ) महात्मा ऋषि को, जो अग्निहोत्र की आहुति दे चुके थे, देखकर लक्ष्मण और सीता सहित हाथ जोड़कर अभिवादन किया।
लक्ष्मण के अग्रज राम ने अपना परिचय दिया, “हे भगवन्, हम दशरथ के पुत्र राम और लक्ष्मण हैं; यह मेरी कल्याणी अनिन्द्य भार्या जनकात्मजा वैदेही है, जो तप के योग्य निर्जन वन में मेरे पीछे आई हैं। पिता की आज्ञा से, हे भगवन्, हम तपोवन को जाएँगे और वहाँ केवल फल-मूल खाकर धर्म का ही आचरण करेंगे। मेरे साथ मेरा प्रिय अनुज लक्ष्मण भी, दृढ़व्रत होकर, वन को आया।” बुद्धिमान् राजपुत्र का यह वचन सुनकर धर्मात्मा भरद्वाज ने उन्हें अर्घ्य के रूप में एक बैल और हाथ धोने का जल अर्पित किया। तपस्वी मुनि ने उन्हें वन्य फल-मूल से बने अनेक प्रकार के रसमय अन्न दिए और निवास का प्रबन्ध किया।
पशु-पक्षियों और मुनियों से घिरे बैठे भरद्वाज ने आए हुए राम का स्वागत-वचनों से सत्कार कर, और उस अर्घ्य को स्वीकार कर बैठे राघव से धर्मयुक्त वचन कहे, “हे काकुत्स्थ, चिरकाल बाद मैं आपको आया देख रहा हूँ; आपका अकारण निर्वासन भी मैंने सुना। दो महानदियों के संगम का यह एकान्त स्थान पवित्र और रमणीय है; आप यहीं सुखपूर्वक रहिए।” राम ने उत्तर दिया, “हे भगवन्, यहाँ से अयोध्या के पुर और जनपद के लोग निकट हैं; मुझे सुलभ देख, सीता और मुझे देखने को उत्सुक लोग इस आश्रम में आते रहेंगे; इसी कारण मुझे यहाँ रहना नहीं रुचता। हे भगवन्, किसी एकान्त स्थान में कोई उत्तम आश्रम-स्थान देखिए, जहाँ सुख के योग्य जनकात्मजा सीता आनन्द पा सकें।”
राम का यह शुभ वचन सुनकर महामुनि भरद्वाज ने अभिप्राय को ग्रहण करने वाला यह वचन कहा, “हे तात, यहाँ से साठ कोस पर एक पवित्र पर्वत है, जहाँ आप रहिए; वह महर्षियों से सेवित, सुन्दर दर्शन वाला, गोलांगूल (लम्बी पूँछ वाले काले वानरों) से व्याप्त, वानर-भालुओं से सेवित, चित्रकूट नाम से विख्यात और गन्धमादन-सा शोभायमान है। जब तक मनुष्य चित्रकूट के शिखरों को देखता है, तब तक वह कल्याणकारी कर्मों में लगा रहता है और पाप में मन नहीं लगाता। वहाँ खेल-खेल में सौ-सौ शरद् तप करके अनेक ऋषि, कपाल-से धवल सिर वाले होकर, स्वर्ग गए। मेरी राय में वह स्थान आपके निवास के लिए एकान्त और सुखद है; अथवा आप यहीं मेरे साथ वनवास भर रहिए।”
भरद्वाज ने अपने प्रिय अतिथि राम का, पत्नी और भाई सहित, सब अभीष्ट पदार्थों से, हर्षित करते हुए सत्कार किया। प्रयाग में उस महर्षि के पास आए राम जब नाना विषयों पर बातें कर रहे थे, तब पवित्र, विचित्र रात आ गई। थके हुए, सीता को तीसरे रूप में साथ रखे राम ने वह रात भरद्वाज के रमणीय आश्रम में सुखपूर्वक बिताई।
प्रभात होने पर नरश्रेष्ठ राम ने प्रज्वलित तेज वाले मुनि भरद्वाज के पास जाकर कहा, “हे सत्यशील भगवन्, आज की रात हम आपके आश्रम में रहे; अब आप हमें अपने निवास-स्थान को जाने की अनुमति दीजिए।” रात बीत जाने पर भरद्वाज ने कहा, “मधु, मूल और फलों से सम्पन्न चित्रकूट को प्रसन्नतापूर्वक जाइए। हे महाबल राम, वह नाना वृक्ष-समूहों से युक्त, किन्नर-नागों से सेवित, मयूरों के स्वर से रमणीय, गजराजों से सेवित, पवित्र और रमणीय, बहुत फल-मूल वाला विख्यात चित्रकूट-शैल आपके निवास के योग्य है; वहाँ जाइए। वहाँ वनों में विचरते हाथियों और मृगों के झुंड, नदियाँ, झरने, शिखर, गुफाएँ, कन्दराएँ और झरने आप देखेंगे, जो सीता के साथ विचरते आपके मन को आनन्द देंगे। हर्षित टिटीहरी और कोयल के स्वरों से मनोरंजन करते, मतवाले मृगों और हाथियों से अत्यन्त रमणीय, निवास-योग्य उस मनोहर पर्वत पर पहुँचकर आप वास कीजिए।”
समझने की कुंजी (साठ कोस): भरद्वाज “दस कोस” कहते हैं, पर परम्परागत टीकाकार इसे “दस-दस-दस”, अर्थात् तीस कोस, और कोस के माप के हिसाब से लगभग साठ मील मानते हैं। प्रयाग से चित्रकूट की दूरी लगभग इतनी ही ठहरती है। यानी राम को कुछ दिन की और यात्रा करनी है।
सार: भरद्वाज का आश्रम राम के लिए एक पड़ाव और मार्गदर्शन दोनों है। मुनि अयोध्या की निकटता के कारण संगम को अनुपयुक्त मानते राम को चित्रकूट सुझाते हैं, और उसकी पुण्यता-रमणीयता का चित्र खींचते हैं।
यमुना-पार और कालिन्दी-तट पर रात
भरद्वाज के आश्रम में रात बिताकर और महर्षि को अभिवादन कर वे दोनों राजपुत्र, अरिन्दम राम और लक्ष्मण, उस पर्वत की ओर चले। यात्रा को तैयार उन तीनों को देखकर उस महर्षि ने भी, जैसे पिता अपने औरस पुत्रों (और पुत्रवधू) को आशीर्वाद देता है, उनकी निर्विघ्न यात्रा के लिए स्वस्त्ययन (मांगलिक विधि) किया। फिर महातेजस्वी भरद्वाज सत्यपराक्रमी राम को मार्ग बताने लगे, “हे मनुजर्षभ, गंगा-यमुना के संगम पर पहुँचकर पश्चिममुखी हुई कालिन्दी नदी के किनारे-किनारे चलिए। फिर विपरीत दिशा में मुड़ी कालिन्दी पर पहुँचकर, उसके बहुप्रचलित घाट को देखकर, हे राघव, वहाँ एक बेड़ा बनाकर अंशुमती (यमुना) नदी पार कीजिए।”
“फिर एक बड़े वट को पहुँचिए, जो हरे पत्तों वाला होने से ‘श्याम’ कहलाता है, अनेक वृक्षों से घिरा और सिद्धों से सेवित है। उस पर सीता हाथ जोड़कर वहाँ के वृक्ष-देवता से आपकी सकुशल वापसी के लिए प्रार्थना करें। उस वृक्ष के पास पहुँचकर, यदि थकान हो तो कुछ देर ठहरकर, या आगे बढ़कर, उससे केवल दो कोस चलकर नील नामक वन देखिए, जो सल्लकी-बेर से मिश्रित और यमुना-तट के बाँसों से रमणीय है। चित्रकूट का वह मार्ग मेरे द्वारा बहुत बार देखा गया है; वह रमणीय, कोमल और दावाग्नि से रहित है।” इस प्रकार मार्ग बताकर वे महर्षि लौट गए, जब राम ने उन्हें “ऐसा ही करूँगा” कहकर अभिवादन कर लौटने को प्रेरित किया।
मुनि के लौट जाने पर राम ने लक्ष्मण से कहा, “आपका कल्याण हो; अवश्य ही हमने पुण्य-कर्म किए होंगे, जो मुनि ने हम पर अनुग्रह किया।” इस प्रकार परामर्श कर वे दोनों मनस्वी पुरुषव्याघ्र, सीता को आगे रखकर, कालिन्दी नदी की ओर चले। वेगवती कालिन्दी के तट पर पहुँचकर, उसका जल शीघ्र पार करने को उत्सुक वे यात्री तुरन्त चिन्तित हुए। तब दोनों भाइयों ने सूखे बाँसों से भरा और उशीर की सुगन्धित जड़ों से ढका एक बड़ा बेड़ा बनाया, जो लकड़ी के अनेक टुकड़ों को मिलाकर तैयार किया गया था। फिर बलवान् लक्ष्मण ने बेंत और जामुन की टहनियाँ काटकर सीता के लिए सुखद आसन बनाया।
दशरथपुत्र राम ने अचिन्त्य श्री-सी सुन्दर, कुछ लजाती हुई प्रिया सीता को बेड़े पर चढ़ाया। राम ने सीता के पास उनके वस्त्रों का जोड़ा, आभूषण, तथा कुदाल और टोकरी सावधानी से रखी। पहले सीता को चढ़ाकर, बेड़े को स्वयं थामकर, प्रसन्न दशरथपुत्र सावधानी से बेड़ा खेने लगे। बीच धारा में पहुँचकर सीता ने कालिन्दी को प्रणाम कर प्रार्थना की, “हे देवि, मैं सकुशल आपका जल पार करूँ; और मेरे पति वनवास का व्रत पूरा करें। हे देवि, जब इक्ष्वाकु-पालित अयोध्या को राम सकुशल लौटें, तब मैं एक सहस्र गायें और देवदुर्लभ सौ पूजा-पदार्थों से आपकी पूजा करूँगी।” इस प्रकार हाथ जोड़े प्रार्थना करती उत्तम वर्ण वाली सीता तुरन्त यमुना के दक्षिण तट पर पहुँच गईं।
तटवृक्षों से सुशोभित, वेगवती, तरंगमालिनी यमुना को बेड़े से पार कर वे तीनों यमुना के तट के वन से चलकर, हरे पत्तों वाले शीतल ‘श्याम’ वट को पहुँचे। वट के पास जाकर वैदेही ने उसे प्रणाम कर कहा, “हे महावृक्ष, आपको नमस्कार हो; मेरे पति अपना व्रत पूरा करें और हम माता कौसल्या तथा यशस्विनी सुमित्रा को फिर देखें।” इतना कहकर हाथ जोड़े मनस्विनी सीता ने वट की प्रदक्षिणा की। प्रार्थना करती अनिन्द्य प्रिय सीता को देख राम ने लक्ष्मण से कहा, “हे भरत के अनुज लक्ष्मण, सीता को साथ लेकर आप आगे चलिए; मैं आयुधसहित पीछे चलूँगा। हे द्विपदश्रेष्ठ, जनकात्मजा सीता जो-जो फल या फूल चाहें, जिसमें उनका मन रमे, वह वैदेही को देते जाइए।”
हर एक वृक्ष, झाड़ी या फूलों से लदी लता, जिसे पहले न देखा था, देखकर वह अबला राम से उसका नाम पूछती। सीता के कहने पर उत्सुक हुए लक्ष्मण फूलों से भरी टहनियाँ ला देते। जनकराज की पुत्री सीता विचित्र बालू और जल वाली, हंस-सारस से शब्दायमान उस नदी को देख प्रसन्न हुईं। फिर वहाँ से केवल दो कोस चलकर, अनेक हवि-योग्य मृगों का वध कर, राम और लक्ष्मण यमुना-वन में विचरे। मोरों के समूहों से शब्दायमान, हाथियों और वानरों से व्याप्त उस सुन्दर वन में विहार कर, नदी के समतल तट पर पहुँचकर, अदीन मुख वाले वे यात्री शीघ्र ही निवास-योग्य एक वृक्ष के पास आए।
सार: भरद्वाज से मार्ग पाकर वे यमुना (‘कालिन्दी’, सूर्यपुत्री) को स्वयं बनाए बेड़े पर पार करते हैं। बीच धारा में सीता की दूसरी जल-स्तुति और श्याम वट की पूजा आती है। पार उतरकर वे आनन्द से वन देखते हुए एक वृक्ष के नीचे रात के लिए ठहरते हैं।
चित्रकूट की राह और वाल्मीकि-आश्रम में पर्णशाला
रात बीत जाने पर रघुश्रेष्ठ राम ने फिर से सोए हुए लक्ष्मण को धीरे-धीरे जगाते हुए कहा, “हे सौमित्र, मीठी बोली बोलते वन्य पक्षियों, तोता, कोयल और सारिका के स्वर सुनिए; प्रस्थान का समय आ गया, हे परंतप, हम चलें।” समय पर भाई के जगाने पर गहरी नींद में सोए लक्ष्मण ने नींद, तन्द्रा और पिछली यात्रा की थकान त्याग दी। उठकर वे सब यमुना के शीतल जल का स्पर्श कर ऋषियों के सेवित चित्रकूट के मार्ग पर चले। उस समय लक्ष्मण के साथ चलते राम ने कमलनयनी सीता से कहा, “हे वैदेहि, शिशिर के अन्त की इस ऋतु में अपने फूलों से दीप्त-से, मालाओं-से सजे किंशुक वृक्षों को चारों ओर देखिए। ये भिलावे और बेल के वृक्ष, मनुष्यों की पहुँच से बाहर, फल-फूल से झुके हैं; हम अवश्य जी सकेंगे। हे लक्ष्मण, हर वृक्ष से लटकते, मधुमक्खियों के बनाए और भरे, द्रोणभर वज़न के मधु-छत्ते देखिए। यहाँ रमणीय वनप्रदेश में, फूलों की चादर से भरे स्थान में, चातक पुकारता है और मोर उसका उत्तर देता है।”
तब सीता सहित पैदल चलते वे दोनों भाई रमणीय, मनोरम चित्रकूट-शैल पर पहुँचे। राम ने लक्ष्मण से कहा, “इस चित्रकूट पर्वत को देखिए, जिसके शिखर ऊँचे हैं, जो हाथियों के झुंडों से व्याप्त और पक्षी-समूहों से शब्दायमान है। हे तात, हम चित्रकूट के इस समतल, रमणीय, पवित्र, अनेक वृक्षों से ढके वन में विहार करेंगे।” नाना पक्षियों से युक्त, बहुत फल-मूल वाले, मीठे जल से सम्पन्न उस रमणीय पर्वत पर पहुँचकर राम ने कहा, “हे सौम्य, नाना वृक्ष-लताओं से सजा, बहुत फल-मूल वाला यह मनोरम पर्वत मुझे सुगम जीविका वाला जान पड़ता है। इस शैल पर महात्मा मुनि भी रहते हैं; हे तात, यही निवास हो; हम यहीं रहें।”

यह कहकर सीता, राम और हाथ जोड़े लक्ष्मण, वाल्मीकि के आश्रम में जाकर सबने मुनि वाल्मीकि का अभिवादन किया। धर्मज्ञ महर्षि ने अत्यन्त प्रसन्न होकर राम का स्वागत किया, सत्कारपूर्वक “बैठिए” कहा और उन्हें आदर दिया। लक्ष्मण के अग्रज समर्थ महाबाहु राम ने नियमपूर्वक स्वयं को ऋषि के सम्मुख प्रस्तुत कर लक्ष्मण से कहा, “हे सौम्य, लक्ष्मण, दृढ़ और उत्तम लकड़ियाँ लाकर एक आवास बनाओ; मेरा मन यहीं रहने को उत्सुक है।” उनका वचन सुन शत्रुदमन लक्ष्मण ने नाना वृक्षों की डालें लाकर एक पर्णशाला (पत्तों की कुटी) बनाई।
दृढ़ खूँटों की दीवार से बँधी, छाई हुई, सुन्दर उस कुटी को तैयार देख राम ने एकाग्रता से सुनते लक्ष्मण से कहा, “हे सौमित्र, गजकन्द नामक कन्द का गूदा लाकर हम इस शाला की वास्तुशान्ति करेंगे; चिरजीवी होने के इच्छुकों को नवनिर्मित भवन का दोष-शमन अवश्य करना चाहिए। हे शुभलक्षण लक्ष्मण, उस कन्द को खोदकर शीघ्र यहाँ लाइए; क्योंकि शास्त्रोक्त विधि का पालन करना चाहिए। अपने धर्म-कर्तव्यों का सदा स्मरण रखिए।” बड़े भाई का वचन समझकर परवीरहा लक्ष्मण ने वैसा ही किया, और राम ने फिर कहा, “इस कन्द को पका लीजिए; हम इस शाला के अधिष्ठाता देवताओं की पूजा करेंगे। हे सौम्य, शीघ्रता कीजिए; यह मुहूर्त शुभ है और यह दिन ‘ध्रुव’ (स्थिर, मांगलिक) है।”
तेजस्वी लक्ष्मण ने काली खाल वाले, देवताओं को हवि-योग्य उस कन्द को खोदकर प्रज्वलित अग्नि में डाला। जब वह भली प्रकार पक और सिझ गया और उसका लाल रंग जाता रहा, तब लक्ष्मण ने राम से कहा, “इस गजकन्द को मैंने सब अंगों सहित पका दिया है; हे देवतुल्य, आप इस रीति में कुशल हैं, अतः इसकी आहुति देकर देवताओं की पूजा कीजिए।” स्नान कर, संयमी और मन्त्रों में कुशल राम ने यज्ञ-समाप्ति के मन्त्रों का संक्षेप में पाठ कर वास्तुशान्ति की। मन्दाकिनी में शास्त्रोक्त विधि से स्नान कर, न्यायपूर्वक जप कर, वैश्वदेव-बलि अर्पित कर, रुद्र और विष्णु को भी उत्तम बलि दी और दोष-शमन के मांगलिक कर्म किए।
राघव ने आश्रम के अनुरूप दिशा-दिक्पालों के लिए वेदियाँ, चैत्य और आयतन बनवाए और प्रतिष्ठित किए। नवनिर्मित कुटी के अधिष्ठाता समस्त देवताओं की पूजा कर, शुद्ध होकर राम ने उस शाला में प्रवेश किया, और अमिततेजस्वी राम के मन को बड़ा आह्लाद हुआ। जैसे देवगण अपनी सुधर्मा सभा में प्रवेश करते हैं, वैसे ही वे तीनों, उपयुक्त स्थान पर भली प्रकार बनी, निर्वात, वृक्ष-पत्तों से छाई उस मनोहर कुटी में निवास के लिए साथ-साथ प्रविष्ट हुए। अत्यन्त रमणीय चित्रकूट और पशु-पक्षियों से सेवित, सुन्दर घाटों वाली प्रसिद्ध मन्दाकिनी नदी को पाकर राम हर्षित हुए और नगर से निर्वासन का दुःख त्याग दिया।
समझने की कुंजी (एणेय/गजकन्द): मूल में “एणेय मांस” शब्द हैं। गीता प्रेस के टीकाकार स्पष्ट करते हैं कि यहाँ “मांस” का अर्थ गजकन्द नामक कन्द का गूदा है, मृग का मांस नहीं; क्योंकि राम पहले ही माता, पिता और भरद्वाज के सम्मुख फल-मूल पर रहने और तापसों की भाँति मांस त्यागने का संकल्प कर चुके थे, और राम कभी अपना वचन नहीं बदलते। इसी से अनुवाद कन्द-गूदे का है।
सार: चित्रकूट का सौन्दर्य देख राम वहीं बसने का निश्चय करते हैं। वाल्मीकि के आश्रम में पहुँचकर, लक्ष्मण पर्णशाला बनाते हैं, और राम विधिपूर्वक वास्तुशान्ति कर, देवताओं की पूजा कर, कुटी में प्रवेश करते हैं। यहीं उनका अयोध्या-वियोग का दुःख कुछ शान्त होता है।
मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, अयोध्याकाण्ड (गीता प्रेस गोरखपुर)।