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रात बीत रही थी और अयोध्या जाग रही थी, पर उसका जागना उत्सव का नहीं, एक अनदेखे अनिष्ट का था। एक ओर राजमहल में अभिषेक की सामग्री सजी थी (गंगा-यमुना के संगम का जल, सोने के घट, श्वेत चँवर, चंद्र-समान छत्र, मत्त गजराज, और वे आठ कन्याएँ जो मंगल-विधि के लिए प्रस्तुत थीं)। दूसरी ओर, अंतःपुर के एकांत में महाराज दशरथ धरती पर पड़े थे, अचेत-से, और उनकी प्रिया रानी कैकेयी उन पर वल्कल का बोझ डाल रही थीं, राजमुकुट के बदले वनवास। यह वह प्रभात था जब अयोध्या का परम-प्रिय राजकुमार राम राजगद्दी की ओर नहीं, दंडकारण्य की ओर मुड़ने वाला था, और उसके इस मुड़ने ने पूरी नगरी को रुला दिया। हम वाल्मीकि के क्रम से, सर्ग 14 से 27 तक, वही सुनाते हैं, जैसा घटा, जैसा कहा गया, बिना घटाए, बिना बढ़ाए।
सत्य की दुहाई और कैकेयी का हठ
महाराज दशरथ को शोक से व्याकुल, अचेत और भूमि पर तड़पते देखकर, पापमति कैकेयी ने कहा, “वर देकर आप ऐसे पड़े क्यों हैं, मानो कोई पाप कर बैठे हों? अपने पूर्वजों की मर्यादा में स्थिर रहिए। धर्म को जानने वाले सत्य को ही परम धर्म कहते हैं, और मैंने सत्य का ही आश्रय लेकर आपको धर्म की याद दिलाई है।”
कैकेयी ने सत्य के दृष्टांत गिनाए। राजा शैब्य ने, बाज (श्येन) से शरण माँगते कबूतर की रक्षा के लिए, अपने ही शरीर का माँस उस पक्षी को तौलकर दे दिया और परम गति पाई। तेजस्वी राजा अलर्क ने वेदपारंगत ब्राह्मण के माँगने पर अपनी आँखें निकालकर बिना खेद के दे दीं। समुद्र (सरिताओं का स्वामी) भी सत्य के व्रत में बँधकर, ज्वार के समय भी अपनी मर्यादा का अतिक्रमण नहीं करता। “सत्य ही एकपद ब्रह्म (ओंकार से सूचित परम तत्त्व) है, धर्म सत्य में ही प्रतिष्ठित है। हे श्रेष्ठ राजन्, यदि आपकी बुद्धि धर्म में है तो सत्य का पालन कीजिए, और मेरा वर सफल कीजिए।”
फिर उसने वही माँग तीन बार दोहराई, “धर्म की कामना से और मेरे अनुरोध से, अपने ज्येष्ठ पुत्र राम को अभी वन भेजिए। मैं तीन बार कहती हूँ। यदि आप यह वचन पूरा न करेंगे, तो आपके सामने ही मैं अपने प्राण त्याग दूँगी।”
निःशंक कैकेयी के इस आग्रह से बँधे राजा वैसे ही असहाय हो गए जैसे इंद्र के बंधन में फँसा बलि। वे रथ के दो पहियों के बीच फँसे बैल की तरह छटपटाए, उनका मुख पाण्डु पड़ गया। बेसुध आँखों से जैसे कुछ देख न पाते हुए, बड़े कष्ट से धैर्य धारण करके उन्होंने कैकेयी से कहा, “हे पापिनी, जो हाथ मैंने मंत्रोच्चार के साथ अग्नि के समक्ष ग्रहण किया था, आपके उस हाथ को और मुझसे उत्पन्न आपके पुत्र भरत को, आपके सहित, मैं छोड़ता हूँ। रात बीत चुकी, सूर्योदय देखकर लोग मुझे राम के अभिषेक की त्वरा देंगे। पर अब मैं जीवित न रहूँगा; राम मेरे न रहने पर इन्हीं अभिषेक की सामग्रियों से मेरा जलक्रिया (श्राद्ध का जल) करें। हे दुराचारिणी, यदि आप राम का अभिषेक रोकेंगी तो पुत्र सहित आप मेरा जलदान मत कीजिएगा।”
दशरथ ने आगे कहा, “जिन लोगों के चेहरों पर मैंने पहले हर्ष देखा है, उन्हें आज आनंदहीन और मुख झुकाए देखना मुझसे न सहा जाएगा।” इतना कहते-कहते वह पुण्य रात्रि, जो चंद्र-नक्षत्रों की माला पहने थी, बीत गई और प्रभात हो आया। तब रोष से भरी, वाक्य-चतुर कैकेयी ने फिर कठोर वचन कहे, “हे राजन्, आप विष और रोग के समान ये बातें क्यों कहते हैं? व्याकुल हुए बिना अपने पुत्र राम को यहाँ बुलाइए।” “मेरे पुत्र भरत को राज्य पर बिठाकर और राम को वनचर बनाकर, जब आप मुझे निष्कंटक कर देंगे, तभी आपका कर्तव्य पूरा होगा।”
तीखे चाबुक से कोड़े खाते उत्तम घोड़े की तरह बार-बार उकसाए जाने पर राजा ने उत्तर दिया, “मैं धर्म के बंधन में बँधा हूँ, मेरी चेतना नष्ट हो गई है। मैं अपने धार्मिक, प्रिय ज्येष्ठ पुत्र राम को देखना चाहता हूँ।”
सार: अभिषेक की सजी हुई सामग्रियों के बीच ही कैकेयी सत्य के नाम पर वही पुराने वर वसूलती है, भरत का राज्य और राम का वनवास। दशरथ टूटते हैं, कैकेयी को धिक्कारते हैं, पर वचन के पाश को काट नहीं पाते।
सुमंत्र का आगमन और राजा की स्तुति
उसी समय सूत-पुत्र (सारथि-मंत्री) सुमंत्र अंतःपुर में आए। महाराज की दशा से अनजान, उन्होंने उन्हें प्रसन्न वचनों से जगाना चाहा। हाथ जोड़कर उन्होंने स्तुति की, “जैसे सूर्योदय पर तेजस्वी समुद्र आनंदित होता है, वैसे ही आप प्रसन्न मन से हमें आनंदित कीजिए। इसी प्रभात-वेला में इंद्र के सारथि मातलि ने इंद्र की स्तुति की थी, जिससे इंद्र ने समस्त दानवों को जीता; वैसे ही मैं आपको जगाता हूँ। हे राजशार्दूल, उठिए, रात्रि देवी बीत गई, आपका कार्य संपन्न हुआ। श्री राम के अभिषेक की सारी सामग्री तैयार है। पौरजन (नगरवासी), जानपद (देहात के लोग) और व्यापारी हाथ जोड़े द्वार पर खड़े हैं। स्वयं भगवान वसिष्ठ ब्राह्मणों सहित खड़े हैं। हे राजन्, राघव के अभिषेक की आज्ञा शीघ्र दीजिए।”
“जैसे रखवाले के बिना पशु बिखर जाते हैं, सेनापति के बिना सेना, चंद्रमा के बिना रात्रि और बैल के बिना गायें, वैसे ही जिस राष्ट्र में राजा न दिखे, उसकी दशा होती है।” सांत्वना-भरे इन सार्थक वचनों को सुनकर महीपति का शोक और गहरा हो उठा। पुत्र-शोक से लाल आँखों वाले राजा ने ऊपर देखकर कहा, “हे सूत, अनुचित समय पर कही गई इन स्तुतियों से आप मेरे मर्म को फिर-फिर काट रहे हैं।”

करुण वचन सुनकर और राजा को दीन देखकर सुमंत्र हाथ जोड़े कुछ पीछे हट गए। जब राजा स्वयं दीनता के कारण कुछ कह न सके, तब मंत्र-कुशल कैकेयी ने सुमंत्र को उत्तर दिया, “हे सूत, राजा रात-भर राम के हर्ष में जागते रहे और थककर निद्रावश हो गए। अतः शीघ्र जाकर यशस्वी राजकुमार राम को ले आइए; इसमें कोई विचार न कीजिए।” सुमंत्र बोले, “हे भामिनी (देवी), राजा का वचन सुने बिना मैं कैसे जाऊँ?” तब राजा ने स्वयं कहा, “हे सुमंत्र, मैं राम को देखना चाहता हूँ, उस सुंदर को शीघ्र ले आइए।”
इसे कल्याणकारी मानकर सुमंत्र हृदय में आनंदित हुए और राजा की आज्ञा से प्रसन्नतापूर्वक निकले। मन में सोचते हुए कि निश्चय ही राम को शीघ्र अभिषेक के लिए बुलाया जा रहा है, वे राघव को देखने की उत्कंठा से बाहर आए।
सार: सुमंत्र अनजाने में राजा की मंगल-स्तुति करते हैं, जो दशरथ के घाव को और गहरा कर देती है। राजा बोल नहीं पाते, कैकेयी उत्तर देती है, और अंततः दशरथ स्वयं राम को बुलवाते हैं।
राम के भवन की ओर सुमंत्र
द्वार पर वसिष्ठ, वामदेव आदि वेदपारंगत ब्राह्मण और राजपुरोहित, तथा अमात्य, सेनापति और श्रेष्ठ व्यापारी, सब अभिषेक की प्रतीक्षा में एकत्र थे। निर्मल सूर्य उदित था, पुष्य नक्षत्र चंद्रमा के साथ था, और सूर्य कर्क राशि में था, ठीक वैसा योग जैसा राम के जन्म के समय था। सोने के जल-घट, सुसज्जित भद्रपीठ (शुभ काष्ठासन), व्याघ्रचर्म से ढका रथ, और गंगा-यमुना के पुण्य संगम का जल तैयार था; नर्मदा आदि पूर्व से निकलकर पश्चिम की ओर बहने वाली, पर्वतों से बहती तिर्यग्वाही और गंगा-गंडक-सोन जैसी दूधिया जलधाराओं तथा समुद्रों से लाया गया जल भी रखा था।
राजा को न देखकर, अभिषेक की सामग्री लिए एकत्र हुए लोग आपस में कहने लगे, “हमारी उपस्थिति राजा को कौन सूचित करेगा? सूर्य उदित हो चुका, फिर भी राजा नहीं दिखते।” तभी राजसम्मानित सुमंत्र ने उन सभी से और वहाँ उपस्थित राजाओं से कहा, “महाराज की आज्ञा से मैं राम को लाने जा रहा हूँ। आप सब राजा के, और विशेषकर राम के, पूज्य हैं। मैं ही उनकी कुशल और न आने का कारण पूछता हूँ।”
यह कहकर सुमंत्र राजमार्ग की ओर बढ़े, जहाँ राम के विषय में जनता की हर्ष-भरी बातें गूँज रही थीं। फिर उन्होंने राम का मनोहर भवन देखा, कैलास और इंद्र के भवन की-सी प्रभा लिए, विशाल कपाटों से सुरक्षित, सैकड़ों झरोखों से सजा, मणि-मूँगे के तोरण और सोने की प्रतिमाओं से शोभायमान। चंदन-अगुरु की सुगंध फैलाता, क्रौंच और मयूरों से सुशोभित, वह भवन मेरु-शृंग-सा ऊँचा जान पड़ता था। द्वार के मार्ग पर देहात से आए लोग भेंट लिए, हाथ जोड़े, अपने वाहन दूर छोड़कर खड़े थे। सुमंत्र ने राम के वाहन शत्रुंजय नामक उस उन्नत गजराज को भी देखा। अमात्यों को एक ओर हटाकर वे समृद्ध अंतःपुर में प्रवेश कर गए।
सार: नगरी अभिषेक के हर्ष में डूबी है; सुमंत्र राम के वैभवशाली भवन से होते हुए भीतर बढ़ते हैं, यह वही उल्लास है जो आगे शोक में पलटेगा।
राम का राजसी प्रस्थान
भीतरी द्वार, जहाँ कुंडलधारी युवक प्रास (बरछी) और धनुष लिए पहरे पर थे, और जहाँ अधेड़, गेरुआ-वस्त्रधारी, वेत्रहस्त अध्यक्ष अंतःपुर की रक्षा कर रहे थे, वहाँ से होते हुए सुमंत्र ने द्वारपालों से कहा, “राजकुमार राम से कहिए कि सुमंत्र द्वार पर खड़े हैं।” वे शीघ्र भीतर गए और राम को, जो अपनी प्रिया सहित थे, सूचना दी। राम ने उस सूत को, जो पिता के विश्वासपात्र थे, उसी कक्ष में बुलवा लिया।
सुमंत्र ने राम को देखा, कुबेर-समान, सोने के पर्यंक पर बैठे, उत्तम चंदन से अनुलिप्त, और बगल में चँवर-हस्त सीता के साथ, मानो चित्रा नक्षत्र के साथ चंद्रमा हों। विनयज्ञ सुमंत्र ने सूर्य-समान तेजस्वी, वरदाता राम को नम्रता से प्रणाम किया। हाथ जोड़कर बोले, “हे राम, कौसल्या आप-से पुत्र को पाकर धन्य हैं। आपके पिता महाराज दशरथ रानी कैकेयी सहित आपको देखना चाहते हैं। वहाँ चलिए, विलंब न कीजिए।”
यह सुनकर अति आनंदित राम ने सीता का सम्मान करते हुए कहा, “हे देवी, राजा और देवी (माता कैकेयी) मिलकर मेरे विषय में, मेरे अभिषेक के विषय में, कुछ मंत्रणा कर रहे होंगे। श्यामनयना, चतुर, राजा की प्रिय और मेरी हितैषिणी माता कैकेयी अवश्य राजा को मेरे पक्ष में उकसा रही होंगी। सौभाग्य से महाराज ने प्रिय रानी सहित मेरे हित-साधक सुमंत्र को दूत बनाकर भेजा है। ऐसा दूत आया है, जैसी वहाँ सभा है; निश्चय ही आज राजा मुझे यौवराज्य पर अभिषिक्त करेंगे। मैं शीघ्र जाकर महाराज को देखूँगा; आप अपनी सखियों सहित सुख से रहिए।”
सीता ने पति का सम्मान पाकर, मंगलकामना करती हुई, अपने स्वामी को द्वार तक छोड़ा और कहा, “राजा को धर्म-संपन्न ब्राह्मणों से युक्त अपने राज्य में राजसूय यज्ञ के लिए भी आपका अभिषेक करना चाहिए, जैसे ब्रह्मा ने इंद्र का किया था। दीक्षित, व्रत-संपन्न, मृगचर्म-धारी और हाथ में कुरंग-शृंग लिए आपको देखकर मैं आपकी सेवा करना चाहती हूँ।”

पर्वत-गुफा से निकलते सिंह की भाँति भवन से निकलकर राम ने पहले ही द्वार पर हाथ जोड़े लक्ष्मण को खड़ा देखा। मध्य द्वार पर मित्रों और बंधुओं से मिले, उन्हें प्रसन्न किया, और फिर अग्नि-समान, व्याघ्रचर्म से सजे उत्तम रथ पर चढ़े। मेघ-गर्जना-सा ध्वनि करता, मणि-स्वर्ण से जड़ा वह रथ उत्तम अश्वों से जुता था, इंद्र की भाँति राम ने उसे हाँका। चित्र-विचित्र चँवर हाथ में लिए लक्ष्मण रथ पर पीछे बैठकर बड़े भाई की रक्षा करने लगे। रथ के चलते ही चारों ओर से जनसमूह का जय-घोष उठा। सैकड़ों-हज़ारों उत्तम अश्व और पर्वत-समान गज राम के पीछे चले; आगे चंदन-अगुरु से सज्जित, खड्ग-धनुष लिए शूर सैनिक और आशीर्वाद देते लोग चले।
मार्ग पर वाद्यों के स्वर, वंदियों की स्तुति और शूरों के सिंहनाद सुनाई दिए। हर्म्यों के झरोखों में खड़ी, आभूषणों से सजी स्त्रियाँ राम पर पुष्प-वर्षा करती हुई कहती थीं, “हे माता के आनंददाता, आपको पिता के राज्य पर अभिषिक्त देखकर आपकी माता कौसल्या आनंदित होंगी।” सीता को वे राम के हृदय की प्रिया, समस्त सीमंतिनियों में श्रेष्ठ मानती थीं, और कहती थीं, “इस देवी ने अवश्य पूर्व-जन्म में महान तप किया, जो रोहिणी की भाँति राम का संयोग पाया।”
राजमार्ग पर राम ने लोगों की बातें सुनीं, “राजकृपा से आज राघव विपुल राजश्री पाएँगे; ये हमारे शासक होंगे, हम सबकी कामनाएँ पूरी होंगी। जब तक यह मनुजाधिप रहेगा, किसी को कोई दुःख न होगा।” राम ने वह स्वच्छ राजमार्ग देखा, जो मत्त गज-गजी, रथ-अश्वों और जनसमूह से भरा, रत्नों और बहुमूल्य वस्तुओं की दुकानों से सुसज्जित था।
सार: राम अभिषेक के विश्वास में, राजसी ठाट से, स्तुति और पुष्प-वर्षा के बीच पिता के भवन की ओर चलते हैं; पाठक जानता है कि यह वैभव क्षणभंगुर है, पर राम और नगरी नहीं जानते।
अयोध्या की शोभा निहारते राजभवन तक
रथ पर बैठे श्रीमान राम ने अयोध्या को निहारा, पताका-ध्वजों से युक्त, अगुरु की सुगंध से सुवासित, नाना प्रकार के जनों से भरी। मेघ-समान श्वेत भवनों से सुशोभित मध्य-मार्ग से होते हुए वे उस उत्तम राजमार्ग पर बढ़े, जो चंदन-अगुरु, उत्तम गंध, क्षौम-कौशेय वस्त्र, बिना छेदे मोती और स्फटिक की दुकानों से शोभायमान था; जिसके दोनों ओर पुष्प और भक्ष्य पदार्थ रखे थे, और चौराहे दही, अक्षत, लाजा, धूप और चंदन से सदा पूजित रहते थे।
मित्रों के अनेक आशीर्वाद सुनते और यथायोग्य सबका सम्मान करते राम आगे बढ़े। लोग कहते थे, “पिता, पितामह और प्रपितामह के चले मार्ग का अनुसरण करते हुए, अभिषिक्त होकर आप उसी पर चलिए। राम के राजा होने पर हम पहले से भी सुखी रहेंगे। यदि राम को अभिषिक्त और राज्य पर प्रतिष्ठित देख लें, तो भोग और मोक्ष की भी हमें आवश्यकता नहीं। हमें इससे प्रिय और कुछ नहीं, जो अमित-तेजस्वी राम का राज्याभिषेक हो।”
आत्म-प्रशंसा की ये बातें उदासीन भाव से सुनते राम बढ़ते रहे। राम के निकल जाने पर भी कोई अपना मन या आँखें उस नरश्रेष्ठ से नहीं हटा पाता था; जो राम को न देख पाता, और जिसे राम न देखते, वह सब लोकों में निंदित होता और स्वयं को धिक्कारता। वह धर्मात्मा चारों वर्णों के, और उनसे बाहर के भी, सब आयु के लोगों पर दया करते थे, इसी से सब उनके अनुरक्त थे। चौराहों, देवपथों, चैत्यों और पाठशालाओं को राजकुमार ने आदरपूर्वक दाहिनी ओर रखा।
मेघ-समूह और कैलास-शिखर-से ऊँचे प्रासाद-शृंगों, रत्नजड़ित श्वेत क्रीड़ा-भवनों वाले राजकुल में पहुँचकर, अपने तेज से जगमगाते राजकुमार ने महेंद्र-भवन-समान पिता के उस भवन में प्रवेश किया, जो धरती के समस्त भवनों में श्रेष्ठ था। धनुर्धारियों से रक्षित पहले तीन कक्ष राम ने रथ पर पार किए, और अंतिम दो कक्ष पैदल। सब लोगों को विनम्रता से लौटाकर वे शुद्ध अंतःपुर में पहुँचे। राम के भीतर पिता के पास जाते ही, सारा जन-समूह आनंदित होकर उनके लौटने की प्रतीक्षा करने लगा, जैसे समुद्र चंद्रोदय की।
सार: राम सम्पूर्ण नगरी का आदर बटोरते, पाँचों कक्ष पार करके पिता के अंतःपुर में पहुँचते हैं। बाहर जनता प्रतीक्षारत है; भीतर वह दृश्य प्रतीक्षा कर रहा है जो सब बदल देगा।
वनवास का आदेश

राम ने पिता को शुभ आसन पर कैकेयी के साथ विषादग्रस्त, दीन और मुख सुखाए हुए देखा। उन्होंने पहले पिता के चरणों में, फिर कैकेयी के चरणों में, सावधान मन से प्रणाम किया। शोकाकुल राजा केवल “राम” इतना ही कह सके; आँसुओं से अंधी आँखों से न उन्हें देख सके, न कुछ बोल सके। राजा का वह अपूर्व, भयावह रूप देखकर राम को भी ऐसा भय हुआ जैसे पाँव से साँप छू जाने पर।
राम ने सोचा, “अन्य दिनों पिता मुझे देखकर क्रोध में भी प्रसन्न हो जाते थे; आज मुझे देखकर वे इतने आयासग्रस्त क्यों हैं? कहीं मुझसे अनजाने कोई अपराध तो नहीं हुआ? कहीं भरत, शत्रुघ्न या माताओं के प्रति कोई अनिष्ट तो नहीं? पिता के विरुद्ध जाकर या उन्हें असंतुष्ट करके मैं एक घड़ी भी जीना न चाहूँगा। जिस पिता से मेरा जन्म हुआ, उस प्रत्यक्ष देवता में कोई भक्तिहीन कैसे रह सकता है?” फिर उन्होंने कैकेयी से ही पूछा, “हे देवी, क्या आपने अभिमान या रोष में पिता से कोई कठोर वचन कह दिया है, जिससे इनका मन व्यथित है? मुझ जिज्ञासु को सच-सच बताइए; यह अपूर्व विकार किस कारण है?”
निर्लज्ज हो चुकी कैकेयी ने धृष्टतापूर्वक उत्तर दिया, “हे राम, राजा न क्रुद्ध हैं, न इन्हें कोई व्यसन है। पर इनके मन में कुछ है जिसे ये आपको दुःख देने के भय से नहीं कहते। आपको प्रिय, पर अप्रिय बात इनकी वाणी से नहीं निकलती। पर इन्होंने मुझे जो वचन दिया है, उसे आपको अवश्य पूरा करना है। वर देकर अब ये साधारण मनुष्य की तरह पछता रहे हैं, और बही हुई नदी पर बाँध बाँधना चाहते हैं। सत्य धर्म का मूल है; राजा आपके लिए उस सत्य को न त्यागें, इसका ध्यान रखिए। यदि आप राजा का कहा, शुभ हो या अशुभ, पूरा करने का वचन दें, तभी मैं सब कहूँगी; अन्यथा ये आपके सामने मुख न खोलेंगे।”
राजा के समक्ष ही व्यथित राम ने कहा, “हाय! धिक्कार है, हे देवी, मुझे ऐसे वचन न कहिए। पिता की आज्ञा से मैं अग्नि में भी कूद सकता हूँ, तीक्ष्ण विष खा सकता हूँ, समुद्र में डूब सकता हूँ। मेरे पिता, गुरु, हितैषी राजा जो चाहें, सो आज्ञा दें; राम दो बार नहीं बोलता।”

तब अनार्या कैकेयी ने उस सरल, सत्यवादी राम से अति कठोर वचन कहे, “पूर्वकाल में देवासुर-संग्राम में, मेरे द्वारा रक्षित आपके पिता ने मुझे दो वर दिए थे। उन्हीं के बदले मैंने आज राजा से भरत का अभिषेक और आपका दंडकारण्य-गमन माँगा है। यदि आप पिता को और स्वयं को सत्यप्रतिज्ञ रखना चाहते हैं, तो मेरा वचन सुनिए; पिता की प्रतिज्ञा के अनुसार आपको नौ और पाँच, यानी चौदह वर्ष वन में रहना है। भरत का अभिषेक उसी सामग्री से होगा जो आपके लिए जुटाई गई है। आप यह अभिषेक छोड़कर जटा-वल्कल धारण कीजिए। भरत इस वसुधा पर शासन करें। राजा ने आपके प्रति करुणा से मुझे ये वर दिए हैं और शोक से वे आपको देख नहीं पाते। हे रघुनंदन, राजा का यह वचन पूरा कीजिए और अपने महान सत्य से नरेश्वर का उद्धार कीजिए।”
कैकेयी के इन कठोर वचनों पर भी राम ने शोक नहीं किया; पर पुत्र-वियोग की पीड़ा से तप्त राजा अत्यंत व्यथित हो गए।
सार: राम पिता की पीड़ा का कारण कैकेयी से ही पूछते हैं, और वह स्पष्ट रूप से दो वरों का सौदा सुना देती है, चौदह वर्ष का वनवास और भरत का राज्याभिषेक। राम विचलित नहीं होते; दशरथ टूट जाते हैं।
राम की स्वीकृति और माता की ओर प्रस्थान

मरण-समान उस अप्रिय वचन को सुनकर भी राम विचलित न हुए और कैकेयी से बोले, “ऐसा ही हो। राजा की प्रतिज्ञा का पालन करते हुए, जटा-वल्कल धारण कर मैं वन में निवास के लिए यहाँ से जाऊँगा। पर इतना जानना चाहता हूँ कि राजा मुझे पहले की तरह अभिनंदित क्यों नहीं करते। हे देवी, इस पूछने पर आप मुझ पर क्रोध न कीजिए। मित्र, गुरु और कृतज्ञ पिता की आज्ञा पाकर मैं निःशंक होकर कौन-सा प्रिय कार्य न करूँगा? एक ही बात मेरे मन को सालती है; राजा स्वयं मुझे भरत के अभिषेक के विषय में नहीं कहते। मैं तो प्रसन्न होकर भरत को राज्य, अपना धन, यहाँ तक कि सीता और प्राण भी, स्वयं दे देता; फिर पिता की आज्ञा और आपकी प्रसन्नता के लिए तो कहना ही क्या। अतः इन लज्जित महीपति को आश्वस्त कीजिए। पर राजा भूमि पर दृष्टि गड़ाए मंद-मंद आँसू क्यों बहाते हैं?”
“मैं अभी, शीघ्र, दंडकारण्य जाता हूँ, ताकि पिता का वचन निर्विवाद रहे और चौदह वर्ष वहाँ रहूँ।” यह सुनकर कैकेयी प्रसन्न हुई और राम को शीघ्रता के लिए उकसाने लगी, “ऐसा ही हो; दूत तेज़ घोड़ों पर भरत को मामा के घर से लाने जाएँगे। आपके वन जाने में अब विलंब उचित नहीं; जब तक आप शीघ्र नगरी से न निकल जाएँगे, राजा न स्नान करेंगे, न भोजन।” राजा ने “धिक्कार है, कितना कष्ट है” कहकर लंबी श्वास भरी और शोक में डूबकर सोने-जड़े पर्यंक पर अचेत गिर पड़े। राम ने राजा को उठाया, और कैकेयी द्वारा फिर उकसाए जाने पर, कोड़े खाए घोड़े की भाँति वन जाने को उद्यत हुए।
उस अनार्या के दारुण वचन सुनकर भी व्यथारहित राम ने कहा, “हे देवी, मैं धन-लोलुप होकर संसार में जीना नहीं चाहता; मुझे ऋषियों के समान निर्मल धर्म में स्थित जानिए। पिता को प्रिय और मुझसे साध्य जो भी था, वह मैंने प्राण देकर भी पूरा कर दिया-सा समझिए। पिता की सेवा और उनका वचन-पालन, इससे बड़ा कोई धर्म नहीं। पूज्य पिता के सीधे न कहने पर भी, आपके वचन से, मैं चौदह वर्ष निर्जन वन में रहूँगा। हे कैकेयि, आपका मुझ पर पिता से भी अधिक अधिकार है, फिर भी आपने ऐसी छोटी बात के लिए राजा से कहा; लगता है आप मुझमें कोई गुण नहीं देखतीं। माता से विदा लेकर और सीता को समझाकर मैं आज ही दंडकवन को जाऊँगा। भरत राज्य का पालन करें और पिता की सेवा करें; यही सनातन धर्म है, इसका आप ध्यान रखें।”
राम के वचन सुनकर शोक से अशक्त पिता ऊँचे स्वर में रो पड़े। अचेत पड़े पिता और अनार्या कैकेयी के चरणों में प्रणाम कर महातेजस्वी राम चल पड़े। आँसुओं से भरी आँखों वाले, अति क्रुद्ध, सुमित्रानंदन लक्ष्मण उनके पीछे चले। अभिषेक के पात्र की प्रदक्षिणा कर, उस पर दृष्टि न डालते हुए राम धीरे-धीरे आगे बढ़े।
राज्य खोने से उनके तेज में कोई कमी न आई, जैसे शीतल किरणों वाले चंद्रमा के क्षीण होने पर भी उसका मनोहर रूप नहीं घटता। वन जाने और वसुंधरा त्यागने को उद्यत होने पर भी उनके चित्त में कोई विकार न दिखा, जैसे द्वंद्वों से ऊपर उठे योगी में। सुंदर छत्र और चँवरों का निषेध कर, अपने जन, रथ और पौरजनों को लौटाकर, अपने दुःख को मन में रोककर और इंद्रियों को संयत कर, आत्मवान राम अप्रिय समाचार सुनाने माता के भवन में गए। मीठे वचनों से सबका सम्मान करते वे धर्मात्मा राम माता के पास पहुँचे, और गुणों में उनके समान, विपुल पराक्रमी लक्ष्मण अपने मन का दुःख दबाए पीछे-पीछे आए। अत्यंत हर्ष-भरे उस भवन में पहुँचकर भी, अपनी अर्थ-विपत्ति देखकर, राम ने प्रियजनों की प्राण-हानि के भय से कोई विकार प्रकट न किया।
सार: राम बिना किसी रोष या शोक के आदेश स्वीकार करते हैं; उन्हें पिता की सत्य-रक्षा से बड़ा कोई धर्म नहीं दिखता। दशरथ अचेत हो जाते हैं, क्रुद्ध लक्ष्मण साथ चलते हैं, और राम पूर्ण संयम के साथ माता को सूचना देने जाते हैं।
कौसल्या का विलाप
हाथ जोड़े पुरुषश्रेष्ठ राम के अंतःपुर से निकलते ही स्त्रियों में महान आर्तनाद उठा। वे रानियाँ बछड़ों से बिछुड़ी गायों की भाँति विलाप करने लगीं, और अपने पति को भी कोसने लगीं, “वही राम, जो बिना कहे ही सारे अंतःपुर का कार्य देखता था, जो हमारी गति और शरण था, आज वनवास को जा रहा है! जो डाँटे जाने पर भी क्रुद्ध न होता था, क्रुद्धों को मनाता था, वह आज जा रहा है! अबुद्धि राजा, जो सब प्राणियों की गति राम को त्याग रहा है, इस जीवलोक में विचरता है!” यह कठोर आर्तनाद सुनकर पुत्र-शोक से तप्त राजा ने लाज और दुःख से अपने को बिस्तर में छिपा लिया।
संयमी राम हाथी की तरह लंबी श्वास भरते, लक्ष्मण सहित माता के भवन में पहुँचे। द्वार पर वृद्ध, अति-पूजित द्वारपाल और अन्य अनेक रक्षक बैठे थे; राम को देखते ही सब उठ खड़े हुए और जय-घोष से उन्हें बधाने लगे। पहले कक्ष को पार कर दूसरे में राजा द्वारा सत्कृत वेदसंपन्न वृद्ध ब्राह्मण, तीसरे में द्वार-रक्षा में लगी स्त्रियाँ, बालक और वृद्ध मिले।
कौसल्या रात-भर समाहित रहकर, प्रभात में पुत्र के हित की कामना से विष्णु की पूजा कर रही थीं। श्वेत क्षौम वस्त्र पहने, व्रत से कृश, वे मंत्रोच्चार के साथ अग्नि में आहुति दिलवा रही थीं। राम ने वहाँ दही, अक्षत, घृत, मोदक, हविष्य, लाजा, श्वेत माल्य, पायस, कृसर और समिधा-पूर्ण कलश देखे। बहुत समय बाद आए पुत्र को देखकर वे अति प्रसन्न होकर, बछेड़े की ओर दौड़ती घोड़ी की भाँति, आगे बढ़ीं। राम बाँहों में लिपटे, और माता ने उन्हें भुजाओं में भरकर सिर सूँघा।
पुत्र-वात्सल्य से कौसल्या ने प्रिय और हितकर वचन कहे, “आप धर्मशील, महात्मा राजर्षियों की आयु, कीर्ति और कुल-योग्य धर्म पाएँ। हे राघव, अपने सत्यप्रतिज्ञ पिता राजा से मिलिए; वह धर्मात्मा आज ही आपको यौवराज्य पर अभिषिक्त करेंगे।”
दिए गए आसन को मात्र छूकर, थोड़ा अंजलि फैलाकर, स्वभाव से विनम्र और गौरव से नत राम ने कहा, “हे देवी, निश्चय ही आप नहीं जानतीं कि महान भय आ पड़ा है। जो मैं कहूँगा, वह आपको, वैदेही और लक्ष्मण को दुःख देगा। मैं दंडकारण्य जाऊँगा; अब इस रत्नजड़ित आसन से क्या? मेरे लिए कुश-आसन (विष्टर) का समय आ गया है। चौदह वर्ष निर्जन वन में मुनियों की तरह कंद-मूल-फल पर जीवन बिताऊँगा, राजसी भोजन छोड़कर। महाराज भरत को यौवराज्य दे रहे हैं और मुझे तापस बनाकर दंडकारण्य भेज रहे हैं। छह और आठ, यानी चौदह वर्ष मैं वन-फल-मूल पर रहूँगा।”

यह अप्रिय समाचार सुनकर देवी कौसल्या वन में कुल्हाड़ी से कटे साल-वृक्ष की डाल की भाँति सहसा गिर पड़ीं, और अचेत पड़ी हुई स्वर्ग से गिरी देवी-सी जान पड़ीं। दुःख के अयोग्य, केले के पेड़-सी गिरी माता को राम ने उठाया, और धूल से सने उनके अंगों को अपने हाथों से पोंछा। तब लक्ष्मण के सुनते हुए कौसल्या ने कहा,
“हे राम, यदि आप मेरे शोक के लिए जन्म न लेते, तो भी मुझे यह दुःख न होता; निःसंतान रहती तो केवल इतना ही मानसिक शोक होता कि मैं वंध्या हूँ, इससे अधिक नहीं। पति के पुरुषार्थ से मैंने कभी कल्याण या सुख नहीं देखा; आशा थी कि पुत्र के राज्य में देखूँगी, पर अब वह भी नहीं। मैं ज्येष्ठा रानी होकर भी अपनी छोटी सौतों के हृदय-छेदक वचन सुनूँगी। आपके पास रहते भी मैं तिरस्कृत हूँ, फिर आपके जाने पर तो मरण ही निश्चित है। मैं पति की अमान्य, सदा अत्यंत निगृहीत, कैकेयी की दासियों के समान या उनसे भी नीची मानी गई हूँ। जो मेरी सेवा या अनुवर्तन करता है, वह भी कैकेयी के पुत्र को देखकर मुझसे न बोलेगा। उस नित्य-क्रुद्ध कैकेयी का खरवादी मुख मैं दुर्गता हुई कैसे देख सकूँगी?”
“आपके जन्म और उपनयन के सत्रह वर्ष मैंने दुःख-नाश की आशा में बिताए, पर यह अक्षय दुःख मुझसे चिरकाल तक न सहा जाएगा। आपके पूर्ण-चंद्र-समान मुख को न देखकर, कृपण जीवन जीते हुए मैं कैसे रहूँगी? व्रत, उपवास और परिश्रम से मैंने दुःख सहकर आपका पालन व्यर्थ किया। निश्चय ही मेरा हृदय लोहे का है, जो इस दुःख से भी नहीं फटता; निश्चय ही मेरा अकाल-मरण नहीं है। मेरे व्रत, दान, संयम और संतान-कामना से किया तप ऊसर में बोए बीज की तरह निष्फल हुआ। यदि कोई गुरु-दुःख से कृश व्यक्ति इच्छानुसार मर सकता, तो मैं आज ही, बछड़े-विहीन गाय-सी, यमलोक चली जाती। आपके बिना मेरा जीवन व्यर्थ है; मैं अति-दुर्बल होकर भी गाय की तरह आपके पीछे वन चलूँगी।” पुत्र की विपत्ति देखकर कौसल्या बंदी पुत्र को देखती किन्नरी की भाँति बहुत विलाप करती रहीं।
सार: कौसल्या के समक्ष राम वनवास का सत्य रखते हैं। वे अपने वैधव्य-तुल्य उपेक्षित जीवन, सौतों के तिरस्कार और निष्फल मातृत्व पर विलाप करती हैं, और राम के साथ वन चलने की बात कहती हैं।
लक्ष्मण का रोष और राम की धर्म-दृष्टि
विलाप करती राम-माता कौसल्या से दीन लक्ष्मण ने समयोचित वचन कहे, “हे आर्ये, मुझे भी यह नहीं रुचता कि राघव राज्यश्री छोड़कर, एक स्त्री के वचन में पड़कर वन जाएँ। विषयों से प्रमत्त, बूढ़े और विपरीत-बुद्धि राजा, कैकेयी से उकसाए जाने पर, कामवश क्या न कहेंगे? मुझे राम का ऐसा कोई अपराध या दोष नहीं दिखता जिसके कारण उन्हें राष्ट्र से निकाला जाए। ऐसा कोई व्यक्ति संसार में नहीं, चाहे वह राम का घोर शत्रु ही क्यों न हो, जो परोक्ष में भी उनका दोष बता सके। देवतुल्य, सरल, संयमी और शत्रुओं के भी हितैषी पुत्र को कौन बिना कारण त्यागेगा? पुनः बालकपन को प्राप्त राजा के ऐसे वचन को राजनीति-ज्ञ कौन पुत्र मन में लाएगा?”

राम की ओर मुड़कर लक्ष्मण बोले, “इससे पहले कि कोई यह जान ले, आप मेरी सहायता से अपने को अभिषिक्त कर राज्य की बागडोर सँभालिए। धनुष लिए मेरे रक्षण में खड़े आपसे, मृत्यु-समान आपके सामने, कौन अधिक पराक्रम दिखा सकता है? यदि अयोध्या आपके विरुद्ध खड़ी होगी तो मैं तीक्ष्ण बाणों से उसे निर्मनुष्य कर दूँगा। भरत के पक्षधर और हितैषी, सबको मारूँगा; कोमल ही तिरस्कृत होता है। यदि कैकेयी से उकसाया हमारा पिता शत्रु-समान आचरण करे, तो उसे भी निःसंकोच बंदी या मार्ग से हटा देना चाहिए। मद से उन्मत्त, कर्तव्य-अकर्तव्य न जानने वाले, कुमार्गगामी गुरु पर भी शासन उचित है।”
“किस बल या हेतु से वह कैकेयी के पुत्र को आपका न्यायतः प्राप्त राज्य देना चाहता है? आपसे और मुझसे परम बैर लेकर भरत को राज्यश्री देने की उसमें क्या शक्ति है?” कौसल्या से लक्ष्मण ने कहा, “हे देवी, धनुष और अपने सत्य-दान-देव-पूजन के पुण्य की शपथ खाकर कहता हूँ कि मैं सच्चे हृदय से अपने ज्येष्ठ भाई का अनुरक्त हूँ। यदि राम प्रज्वलित अग्नि या वन में प्रवेश करेंगे, तो मुझे पहले ही वहाँ प्रविष्ट जानिए। उदित सूर्य की तरह मैं अपने पराक्रम से आपका दुःख हर लूँगा। देवी और राघव मेरा पराक्रम देखें। मैं कैकेयी में आसक्त-मन, कृपण, बूढ़े और बुढ़ापे से निंदित अपने पिता को मार डालूँगा।”
लक्ष्मण के ये वचन सुनकर शोक-विह्वल कौसल्या ने रोते हुए राम से कहा, “पुत्र, आपने भाई की बात सुनी; यदि रुचे तो जो उचित हो, कीजिए। मेरी सौत के अधर्म-वचन सुनकर शोक-तप्त मुझे छोड़कर जाना आपको उचित नहीं। यदि आप धर्मज्ञ और धर्म आचरण चाहते हैं, तो यहीं रहकर मेरी सेवा करते हुए परम धर्म का पालन कीजिए। माता की सेवा करता हुआ कश्यप-पुत्र भी परम तप से स्वर्ग गया। राजा जैसे पूज्य हैं, गौरव से मैं भी वैसी ही हूँ; मैं आपको वन जाने की अनुमति नहीं देती। आपके वियोग में मुझे जीवन और सुख से क्या? आपके साथ तृण खाना भी मेरे लिए श्रेयस्कर है। यदि आप मुझे शोक में छोड़कर वन जाएँगे, तो मैं यहीं अनशन करूँगी, जी न सकूँगी; तब आपको भी लोक-विख्यात नरक भोगना होगा, जैसे सरिताओं के स्वामी समुद्र ने ब्रह्महत्या-समान अधर्म से भोगा।”
धर्मात्मा राम ने धर्मसंगत वचन कहे, “मुझमें पिता का वचन उल्लंघने की शक्ति नहीं; इसी से मैं वन जाना चाहता हूँ। मैं सिर झुकाकर आपकी कृपा माँगता हूँ। वनचारी ऋषि कण्डु ने धर्म जानते हुए भी पिता की आज्ञा से गाय मारी। हमारे ही कुल में सगर के पुत्रों ने पिता की आज्ञा से धरती खोदते हुए महान वध पाया। जमदग्नि-पुत्र परशुराम ने पिता की आज्ञा से अपनी माता रेणुका का वन में सिर काट दिया। इन और अन्य अनेक देवतुल्य पुरुषों ने पिता का वचन निःसंकोच पूरा किया; मैं भी पिता का हित करूँगा। यह कोई अपूर्व, अरुचिकर धर्म मैं नहीं चला रहा; पूर्वजों का ही मार्ग अपना रहा हूँ। पिता का वचन पालते हुए कोई धर्म से नहीं गिरता।”
वचन-वेत्ताओं और धनुर्धरों में श्रेष्ठ राम ने लक्ष्मण से कहा, “हे लक्ष्मण, मैं आपका अनुपम स्नेह, पराक्रम, सत्त्व और दुरासद तेज जानता हूँ। पर मेरी माता सत्य और शम के अभिप्राय को न समझकर महान, अतुल दुःख भोग रही हैं। संसार में धर्म ही परम है, धर्म में सत्य प्रतिष्ठित है, और पिता का यह वचन भी धर्म पर आधारित होने से उत्तम है। पिता, माता या ब्राह्मण को वचन देकर, धर्म में स्थित व्यक्ति को उसे व्यर्थ नहीं करना चाहिए। पिता के वचन और कैकेयी की प्रेरणा से बँधा मैं इस नियोग का उल्लंघन नहीं कर सकता। अतः क्षत्रधर्म पर टिकी यह बुद्धि छोड़िए, धर्म का आश्रय लीजिए, तीक्ष्णता मत दिखाइए; मेरी बुद्धि का अनुसरण कीजिए।”
स्नेहवश भाई को समझाकर, हाथ जोड़े और सिर झुकाए राम ने फिर माता से कहा, “हे देवी, वन जाते मुझे अनुमति दीजिए; मेरे प्राणों की शपथ है, मेरे लिए मंगल-कार्य कीजिए। प्रतिज्ञा पूरी कर मैं फिर नगरी लौटूँगा, जैसे पूर्वकाल में राजर्षि ययाति एक बार स्वर्ग छोड़कर फिर स्वर्ग लौटे थे। हे माता, हृदय में शोक रोक लीजिए, शोक न कीजिए; पिता का वचन पालकर मैं वनवास से लौटूँगा। आप, मैं, वैदेही, लक्ष्मण और सुमित्रा, सबको पिता के नियोग में रहना चाहिए, यही सनातन धर्म है। हे अम्ब, हृदय का दुःख रोककर, अभिषेक की सामग्री हटाकर, मेरे इस धर्म्य निश्चय का अनुसरण कीजिए।”
राम के इस सुधर्म्य, धीर और अविह्वल वचन को सुनकर माता पुनर्जीवित-सी होश में आईं और बोलीं, “हे पुत्र, जैसे आपके पिता पूज्य हैं, वैसे ही धर्म और स्नेह से मैं भी। मैं आपको अनुमति नहीं देती; मुझ अति-दुःखी को छोड़कर जाना आपको उचित नहीं। समस्त जीवलोक के सान्निध्य या शासन से अधिक मुझे एक घड़ी का आपका संग प्रिय है।”
माता का यह करुण विलाप सुनकर राम वैसे ही प्रज्वलित हो उठे जैसे अंधकार-गुफा में घुसा महागज, मनुष्यों की मशालों से उकसाया जाता है। धर्म में स्थित राम ने अचेत-प्राय माता और संतप्त लक्ष्मण से वही धर्म्य वचन कहे जो वही कह सकते थे, “हे लक्ष्मण, मैं आपकी नित्य भक्ति और पराक्रम जानता हूँ; पर मेरे अभिप्राय को न समझकर आप माता के साथ मुझे अति-दुःखी कर रहे हैं। आपके बिना जीवन, या स्वधा-अमृत वाले लोक से मुझे क्या? एक घड़ी का आपका संग मुझे समस्त जीवलोक से प्रिय है।”
“धर्म, अर्थ और काम (जो इस जीवलोक में सुख के साधन कहे गए हैं) सब धर्म के अनुगामी होते हैं, जैसे वश्य भार्या धर्म, सुख और संतान देती है। जिसमें ये तीनों न हों, उसे त्याग कर वही करना चाहिए जिससे धर्म हो; धर्महीन अर्थपरायण द्वेष्य होता है, और कामासक्ति भी प्रशस्त नहीं। जो वृद्ध पिता, गुरु और राजा, क्रोध, हर्ष या काम से भी कोई कार्य आदेश दे, उसे धर्म समझकर कौन अक्रूर पुरुष न करेगा? अतः मैं पिता की इस प्रतिज्ञा को पूरा किए बिना नहीं रह सकता; वही हम दोनों के गुरु हैं, और देवी के भर्ता, गति और धर्म हैं। ऐसे धर्मराज पति के जीवित रहते देवी मेरे साथ कैसे चलें, मानो विधवा हों? अतः हे देवी, वन जाते मुझे अनुमति दीजिए और मंगल-कार्य कीजिए, ताकि प्रतिज्ञा पूरी कर मैं ययाति की भाँति लौटूँ। केवल राज्य के लिए मैं महोदय यश को पीछे नहीं फेंक सकता; जीवन इतना अल्प है कि अधर्म से मैं आज यह तुच्छ धरती नहीं चाहता।”
माता को प्रसन्न करते और लक्ष्मण को अपनी धर्म-दृष्टि भली-भाँति समझाते, दंडकारण्य जाने को उद्यत उस नरश्रेष्ठ ने मन ही मन माता की प्रदक्षिणा की।
सार: लक्ष्मण रोष में दशरथ-कैकेयी के विरुद्ध बल-प्रयोग और राज्य-ग्रहण का प्रस्ताव रखते हैं; कौसल्या भी राम को रोकती हैं। राम धैर्य से उत्तर देते हैं; पिता का वचन धर्म पर टिका है, पूर्वज भी ऐसा करते आए हैं, और राज्य से यश-धर्म बड़ा है।
राम का दैव-वाद और लक्ष्मण को सांत्वना
व्यथा से दीन, अत्यंत असहिष्णु, क्रोध से फैली आँखों वाले, क्रुद्ध नागराज-से लक्ष्मण के पास आकर, धैर्य से चित्त सँभालते आत्मवान राम ने कहा, “हे सौमित्र, अपना क्रोध और शोक रोककर, अनुपम धैर्य धारण कर, इस अपमान की उपेक्षा कर, और पिता के वचन-पालन में सहायक होने का परम हर्ष लेकर, जो सामग्री मेरे अभिषेक के लिए जुटी थी, उसे शीघ्र लौटाइए और निर्विघ्न कार्य कीजिए। जैसी त्वरा अभिषेक की सामग्री जुटाने में थी, वैसी ही अभिषेक-निवृत्ति की तैयारी में हो। हमारी जो माता कैकेयी मेरे अभिषेक की चिंता से संतप्त हैं, वे आशंका-रहित हो जाएँ, ऐसा कीजिए; मैं उनकी मन की आशंका-पीड़ा एक घड़ी भी उपेक्षित नहीं कर सकता।”
“मुझे याद नहीं कि मैंने जान-बूझकर या अनजाने अपनी माताओं या पिता का कोई अपराध किया हो। मेरे पिता सदा सत्य, सत्यप्रतिज्ञ और परलोक-भय से डरने वाले हैं; मेरे द्वारा उनका वचन पूरा होने पर वे निर्भय हो जाएँ। जब तक यह अभिषेक का कार्य पूरा न हो, उनके मन में भी सत्य के अपालन का संताप रहेगा, और उनका संताप मुझे भी संतप्त करेगा। अतः हे लक्ष्मण, अभिषेक-विधान समेटकर मैं शीघ्र वन जाना चाहता हूँ। मेरे वनवास से कृतकृत्य होकर कैकेयी आज ही अपने पुत्र भरत को निश्चिंत होकर अभिषिक्त करें। मेरे वल्कल-मृगचर्म और जटा-मंडल धारण कर वन जाने पर ही कैकेयी का मन सुखी होगा।”
“हे सौमित्र, मेरे प्रवासन में दैव को ही देखिए, जिसने यह बुद्धि और सुसमाहित मन कैकेयी में डाला; अतः मुझे उसे क्लेश नहीं देना चाहिए, मैं अविलंब प्रव्रजन करूँगा। मेरे प्रवासन और दिए गए राज्य के पुनः छिन जाने में दैव ही उत्तरदायी है। यदि यह भाव दैव-प्रेरित न होता, तो कैकेयी के मन में मुझे सताने का विचार कैसे आता? आप जानते हैं कि मैंने माताओं में कभी भेद नहीं किया, न कैकेयी ने अपने पुत्र और मुझमें कभी अंतर किया। फिर अभिषेक रोकने और प्रवास के दुर्वच, उग्र वचन कहने का कारण दैव के सिवा क्या हो सकता है? ऐसी सद्गुण-संपन्न राजपुत्री प्राकृत स्त्री की तरह पति के समक्ष मुझे पीड़ित करने वाले वचन कैसे कहती?”
“जो अचिंत्य है, वही दैव है, और वह प्राणियों में भी टाला नहीं जाता; स्पष्ट है कि मुझ पर और उन पर यह विपर्यय आ पड़ा। कौन पुरुष दैव से लड़ने का साहस करे, जिसका कर्म-फल के सिवा कोई चिह्न नहीं दिखता? सुख-दुःख, भय-क्रोध, लाभ-अलाभ, जन्म-मृत्यु, जो भी ऐसा हो, वह दैव का ही कर्म है। उग्र तपस्वी ऋषि भी दैव से प्रेरित होकर काम-क्रोध से नियमों को छोड़ बैठते हैं। आरंभ किए कार्य को छोड़कर जो अकस्मात्, बिना कारण, घटित होता है, वह दैव का कर्म है। इस सत्य-बुद्धि से मन सँभालने पर, अभिषेक रुक जाने पर भी मुझे कोई संताप नहीं।”
“अतः आप भी संताप छोड़कर, मेरा अनुसरण कर, अभिषेक की क्रिया शीघ्र रुकवा दीजिए। इन्हीं अभिषेक के लिए जुटे जल-घटों से मेरा व्रत-स्नान होगा। अथवा राज्य-द्रव्य से युक्त इस जल से क्या? मेरा स्वयं निकाला जल ही व्रत का आरंभ कराएगा। लक्ष्मण, लक्ष्मी के विपर्यय पर संताप मत कीजिए; मेरे लिए राज्य हो या वनवास, वनवास ही महोदय है। हे लक्ष्मण, मेरी छोटी माता कैकेयी और पिता, दोनों पर शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वे दैव के वश हैं; आप जानते हैं कि दैव अमोघ-प्रभाव है।”
सार: राम कैकेयी और पिता को निर्दोष मानकर सारा दायित्व दैव पर डालते हैं। वे लक्ष्मण को क्रोध-शोक छोड़ने और अभिषेक की सामग्री लौटाने को कहते हैं; उन्हीं घटों के जल से वे व्रत-स्नान कर लेंगे।
लक्ष्मण का प्रतिवाद और पराक्रम-वाद
राम के यह कहने पर लक्ष्मण सिर झुकाए, दैन्य और हर्ष के बीच डोलते रहे। फिर भौंहों के बीच भृकुटि चढ़ाकर वह नरश्रेष्ठ बिल में बैठे क्रुद्ध महासर्प की भाँति फुफकारे; उनका वह भृकुटि-युक्त, दुर्निरीक्ष्य मुख क्रुद्ध सिंह के मुख-सा शोभा पाने लगा। हाथी की तरह अग्र-भुजा झटकते, गर्दन को तिरछा और ऊपर झुलाते, आँख के कोर से देखते लक्ष्मण ने कहा,
“अस्थान पर यह महान सम्भ्रम आपमें उठा है, धर्म-दोष के भय से और लोक की शंका मिटाने के लिए। पर आप-जैसा अशौंडीर (निर्बल) नहीं, शौंडीर क्षत्रियर्षभ हैं; आप इस कृपण, अशक्त दैव की प्रशंसा कैसे करते हैं? आपको उन दोनों पापियों (दशरथ और कैकेयी) पर शंका कैसे नहीं? हे धर्मात्मन, क्या आप नहीं जानते कि धर्म का आभास ओढ़े लोग होते हैं? यदि उन दोनों का, जो छल से स्वार्थ साधना चाहते हैं, यही अभिप्राय न होता, तो अभिषेक आरंभ ही न होता; और यदि वर का सौदा सच होता, तो वह तैयारियों से पहले ही दिया जाता।”
“जो आरंभ हुआ वह लोक को अप्रिय है; आपके अतिरिक्त किसी और का अभिषेक मैं नहीं सह सकता; मेरी इस असहिष्णुता को क्षमा कीजिए। वह धर्म भी मुझे द्वेष्य है जिसके मोह में आपकी बुद्धि भटक गई। कैकेयी के वशवर्ती पिता का अधर्म्य, निंदित वचन आप कर्म से रोक सकते हुए भी क्यों पूरा करते हैं? छल से किए इस भेद को आप दैव-कृत मानते हैं, इससे मुझे दुःख होता है, और ऐसी झूठी धर्म-आसक्ति निंदनीय है।”
“आपका यह धर्म-संयोग इस लोक में निंदित है। कामवृत्त, सदा अहितकारी, पिता-नाम धारी इन दो शत्रुओं की कामना को आपके सिवा और कौन मन से भी पूरा करे? यद्यपि आपकी मान्यता है कि उनका यह निश्चय भी दैव-प्रेरित है, तो भी इसकी उपेक्षा करनी चाहिए; ऐसा दैव-निर्णय भी मुझे नहीं रुचता। जो विह्वल और वीर्यहीन है, वही दैव का अनुसरण करता है; आत्म-विश्वासी वीर दैव की उपासना नहीं करते। जो पुरुषार्थ से दैव को रोक सके, वह दैव से कार्य बिगड़ने पर भी अवसन्न नहीं होता।”
“आज लोग दैव और पुरुष के बल को देखेंगे; दैव और मानुष का अंतर आज प्रकट होगा। जिन्होंने आपका राज्याभिषेक दैव से रुका देखा, वे आज मेरे पुरुषार्थ से दैव को परास्त देखेंगे। मद-जल से उद्धत, अंकुश से अवश्य गज की भाँति झपटते दैव को मैं पुरुषार्थ से लौटा दूँगा। समस्त लोकपाल या तीनों लोकों के निवासी भी आज राम का अभिषेक नहीं रोक सकते, फिर पिता क्या? जिन्होंने आपका वनवास समर्थित किया, वे ही चौदह वर्ष वन में रहें। मैं पिता की और कैकेयी की उस आशा को जला दूँगा जो अभिषेक-विघात से पुत्र के राज्य की ओर है। जो मेरे बल का विरोधी होगा, उसके लिए दैव-बल उतना सहायक न होगा जितना मेरा उग्र पराक्रम दुःखदायी होगा।”
“हज़ारों वर्षों के बाद वनवास तब उचित है जब राजर्षियों की रीति से राजा प्रजा को पुत्रों के सुपुर्द कर दे। यदि राज्य में विद्रोह की शंका से, राजा के अनिश्चित रहते, आप राज्य नहीं चाहते, तो भी कोई शंका न कीजिए; मैं समुद्र की तटरेखा की भाँति आपकी और आपके राज्य की रक्षा करूँगा; ऐसा न कर पाऊँ तो वीर-लोक न पाऊँ। आप मंगल-द्रव्यों से अभिषिक्त होइए, उसी कार्य में लगिए; शत्रु-राजाओं को बलपूर्वक रोकने को मैं अकेला ही पर्याप्त हूँ।”

“मेरी ये भुजाएँ शोभा के लिए नहीं, न धनुष आभूषण है, न खड्ग कमर-पट्टी का चिह्न, न बाण किसी आधार के लिए; ये सब शत्रु-मर्दन के लिए हैं। बिजली-सी चमक वाले तीक्ष्ण-धार खड्ग से, चाहे शत्रु वज्रधारी इंद्र ही हो, उसे काट न डालूँ, ऐसा मैं नहीं चाहता। मेरे खड्ग से कटे हस्ती-अश्व-रथियों के अंगों से भूमि दुर्गम हो जाएगी; मारे गए शत्रु दीप्त अग्नि या सविद्युत मेघों की तरह गिरेंगे। गोधा-अंगुलित्राण बाँधे, धनुष उठाए मेरे सामने कौन अपने पुरुषत्व पर गर्व करेगा? अनेक बाणों से एक को और एक बाण से अनेक को मारता हुआ मैं नर-अश्व-गज के मर्म बेधूँगा। आज मेरे अस्त्र-प्रभाव का प्रभाव प्रकट होगा, राजा की अप्रभुता और हे प्रभो, आपकी प्रभुता सिद्ध करने को। चंदन-अनुलेप, केयूर, धन-दान और मित्र-रक्षा के योग्य ये भुजाएँ आज अभिषेक-विघ्नकारियों को रोकने में लगेंगी। कहिए, आज किस शत्रु को मैं प्राण, यश और स्वजनों से वंचित कर दूँ; जैसे यह वसुधा आपके वश हो, वैसा आदेश दीजिए; मैं आपका किंकर हूँ।”
राघव-वंश-वर्धक राम ने लक्ष्मण के आँसू पोंछकर, बार-बार सांत्वना देते हुए कहा, “हे सौम्य, मुझे पिता के वचन में दृढ़ स्थित जानिए; सत्पुरुषों का यही मार्ग है।”
सार: लक्ष्मण दैव-वाद को निर्बलता बताकर पुरुषार्थ की श्रेष्ठता पर ज़ोर देते हैं और अकेले समस्त विरोधियों को रोकने का संकल्प करते हैं। राम उनके आँसू पोंछकर शांत करते हैं; वे पिता के वचन में अटल हैं।
कौसल्या की अंतिम विदा
पिता के आदेश-पालन में दृढ़ राम को देखकर, आँसुओं से रुँधे कंठ से कौसल्या ने धर्म्य वचन कहे, “हाय! दशरथ से मुझमें जन्मा यह दुःख-अनभिज्ञ, सब प्राणियों से प्रिय बोलने वाला धर्मात्मा बाज़ार में बचे अन्न के दानों पर कैसे जिएगा? जिसके भृत्य-दास भी उत्तम अन्न खाते हैं, वही राम वन में मूल-फल कैसे खाएगा? यह कौन मानेगा, और किसे भय न होगा, कि राजा का प्रिय, गुणवान काकुत्स्थ निर्वासित हो रहा है? निश्चय ही इस लोक में दैव ही बलवान है और सब निर्देश देता है, जहाँ आप-सा अभिराम वन जा रहा है।”
“आपके आगमन की चिंता से उपजी यह विशाल शोकाग्नि, मन में जन्मी, आपके आसन्न वियोग की वायु से प्रदीप्त, विलाप के दुःख-समिध से प्रज्वलित, रोने के आँसुओं की आहुति से पुष्ट और चिंता के महाधूम से युक्त, मुझे कृश करके वैसे ही जला देगी, जैसे हेमंत के अंत में दावाग्नि सूखी घास को। जैसे गाय अपने बछड़े के पीछे जाती है, वैसे ही, हे वत्स, जहाँ आप जाएँगे, मैं आपके पीछे आऊँगी।”
माता के यह वचन सुनकर अत्यंत दुःखी माता से राम ने कहा, “कैकेयी से ठगे गए राजा, मेरे अरण्य चले जाने पर, यदि आपसे भी त्यागे जाएँ तो निश्चय ही जीवित न रहेंगे। पति का त्याग स्त्री की नृशंसता है, यह अति-निंदित है; आप मन से भी ऐसा न करें। जब तक मेरे पिता काकुत्स्थ जगतीपति जीवित हैं, उनकी सेवा कीजिए; यही सनातन धर्म है।” शुभदर्शना कौसल्या ने प्रसन्न होकर ‘तथास्तु’ कहा।
राम ने फिर कहा, “पिता का वचन आपको और मुझे, दोनों को पालना है। वे राजा, भर्ता, गुरु, श्रेष्ठ, ईश्वर और हम सबके प्रभु हैं। महावन में नौ और पाँच वर्ष विहार कर, परम-प्रीति से मैं आपके वचन में लौट आऊँगा।” आँसू-भरे मुख से अति-व्याकुल, पुत्र-वत्सला कौसल्या ने कहा, “इन सौतों के बीच रहना मुझे सहन नहीं; हे काकुत्स्थ, यदि पिता की इच्छा से आपकी जाने की ठान है, तो वन्य मृगी की तरह मुझे भी ले चलिए।”
रोती हुई माता से राम ने रोते हुए कहा, “जीवित स्त्री का भर्ता ही उसका देवता और प्रभु है; आज आप पर और मुझ पर राजा का प्रभुत्व है। बुद्धिमान लोकनाथ राजा के रहते हम अनाथ नहीं। भरत भी धर्मात्मा, सब प्राणियों से प्रिय बोलने वाला, धर्मरत है; वह आपकी सेवा करेगा। आप सावधान रहकर ऐसा कीजिए कि मेरे जाने पर पुत्र-शोक से राजा को कष्ट न हो, और यह दारुण शोक उन्हें नष्ट न करे। वृद्ध राजा का हित निरंतर समाहित होकर कीजिए।”
“जो स्त्री व्रत-उपवास में रत होकर भी भर्ता का अनुवर्तन नहीं करती, उसकी पाप-गति होती है; पति-सेवा से ही नारी उत्तम स्वर्ग पाती है। जो किसी और को नमस्कार नहीं करती और देवपूजन से विमुख है, वह भी भर्ता की सेवा से स्वर्ग पाती है; पति का प्रिय-हित करना ही स्त्री का नित्य धर्म है, यही वेद और स्मृति में कहा गया है। मेरे लिए, हे देवी, अग्नि-कार्यों में देवताओं और ब्राह्मणों का पुष्पादि से सत्कार कीजिए। नियमित, संयमित आहार लेती, भर्ता-सेवा में रत होकर मेरे लौटने की प्रतीक्षा कीजिए; मेरे लौटने पर आप परम कामना पाएँगी, यदि धर्मश्रेष्ठ राजा प्राण धारण किए रहें।”
आँसू-भरी आँखों से कौसल्या ने कहा, “हे प्रिय, वीर पुत्र, आपके सुविचारित गमन-निश्चय को मैं बदल नहीं सकती; दैव दुरतिक्रम है। अतः हे विभो, एकाग्र मन से जाइए, आपका सदा कल्याण हो। आपके लौटने पर ही मैं ग्लानि-मुक्त होऊँगी; हे महाभाग, कृतार्थ और व्रत-संपन्न होकर लौटे, पिता का ऋण चुकाए आपको देखकर ही मैं परम सुख से सोऊँगी। दैव की गति दुर्विभाव्य है, हे राघव, जो मेरे प्रतिवाद को टालकर आपको जाने को प्रेरित कर रहा है। अब जाइए, हे महाबाहु, सकुशल लौटकर मीठे सांत्वना-वचनों से मुझे आनंदित कीजिएगा। क्या वह समय आएगा जब मैं आपको जटा-वल्कल धारी, वन से लौटा देखूँगी?” राम को वनवास में दृढ़-निश्चय देखकर देवी ने उन्हें शुभ वचन कहे और स्वस्त्ययन के लिए उद्यत हुईं।
सार: कौसल्या साथ चलने की इच्छा प्रकट करती हैं, पर राम समझाते हैं कि जीवित पति की सेवा ही पत्नी का सनातन धर्म है, और वृद्ध राजा का हित देखना उनका कर्तव्य। माता अंततः मान जाती हैं और विदा का स्वस्त्ययन रचाती हैं।
माता का स्वस्त्ययन और आशीर्वाद
विवेक से उस आयास (वियोग-पीड़ा) को सहकर, शुद्ध जल का आचमन कर, मनस्विनी राम-माता कौसल्या ने राम के मंगल-कार्य किए। उन्होंने कहा, “हे रघूत्तम, आपका गमन रोका नहीं जा सकता; अब जाइए, सत्पुरुषों के मार्ग पर चलिए और वनवास की अवधि पूरी कर शीघ्र लौटिए। जिस धर्म का आप प्रीति और नियम से पालन करते हैं, वही धर्म, हे राघवशार्दूल, आपकी रक्षा करे। जिन देवों को आप चौराहों और मंदिरों में प्रणाम करते हैं, वे महर्षियों सहित वन में आपकी रक्षा करें। बुद्धिमान विश्वामित्र ने आपको जो अस्त्र दिए, वे आपकी रक्षा करें। पिता-माता की सेवा और सत्य से रक्षित होकर आप चिरंजीवी रहें।”
“समिधा, कुश, पवित्र, यज्ञ-वेदियाँ, मंदिर, ब्राह्मणों के स्थंडिल, पर्वत, वृक्ष, क्षुप, हृद, पतंग, पन्नग और सिंह, सब आपकी रक्षा करें। साध्य, विश्वेदेव, मरुद्गण महर्षियों सहित, धाता-विधाता, पूषा-भग-अर्यमा, इंद्रादि लोकपाल, छहों ऋतुएँ, मास, संवत्सर, रात-दिन और मुहूर्त सदा आपका कल्याण करें। वेद, स्मृति और धर्म सब ओर से आपकी रक्षा करें। भगवान स्कंद, बृहस्पति सहित सोम, सप्तर्षि और नारद आपकी रक्षा करें। मेरे द्वारा स्तुत सिद्ध और दिशाओं के स्वामी उस वन में नित्य आपकी रक्षा करें।”
“सब पर्वत, समुद्र, राजा वरुण, द्यौ-अंतरिक्ष-पृथ्वी, चराचर सहित वायु, समस्त नक्षत्र-ग्रह देवताओं सहित, अहोरात्र और संध्या आपकी रक्षा करें। राक्षस, पिशाच, क्रूरकर्मा और मांसभक्षी, इनसे आपको भय न हो। वानर, वृश्चिक, डंक, मच्छर, सरीसृप और कीट आपके वन में न हों। महागज, सिंह, व्याघ्र, रीछ, दाढ़वाले और शृंगी महिष आपके प्रति द्रोह न करें। नर-मांस-भोजी अन्य सब जातियाँ, जिन्हें मैंने यहाँ पूजा है, आपको न मारें। आपके मार्ग शुभ हों, पराक्रम सफल हों, वन की सब संपदाएँ आपके वश हों; हे पुत्र, सुखपूर्वक जाइए। शुक्र, सोम, सूर्य, कुबेर और यम (मेरे द्वारा अर्चित) दंडकारण्यवासी आपकी रक्षा करें। अग्नि, वायु, धूम और ऋषि-मुख से निःसृत मंत्र स्नान-आचमन के समय आपकी रक्षा करें। सर्वलोक-प्रभु ब्रह्मा, भूत-कर्ता और शेष देवता वनवासी आपकी रक्षा करें।”
ऐसा कहकर यशस्विनी कौसल्या ने माल्य, गंध और अनुरूप स्तुतियों से देवगणों की पूजा की। फिर एक महात्मा ब्राह्मण से, विधिपूर्वक, राम के मंगल के लिए अग्नि में आहुति दिलवाई; घृत, श्वेत माल्य, समिधा और सरसों उन्होंने जुटाई। उपाध्याय ने शांति और आरोग्य के लिए हवन कर, बचे हविष्य से बाह्य बलि अर्पित की। फिर मधु, दही, अक्षत और घृत से ब्राह्मणों से राम के वन-स्वस्त्ययन के मंत्र पढ़वाए, और उस द्विजेंद्र को इच्छित दक्षिणा देकर राम से कहा,
“वृत्र-नाश पर सर्वदेव-नमस्कृत सहस्राक्ष इंद्र को जो मंगल मिला, वही आपको मिले। अमृत चाहते गरुड़ को विनता ने जो मंगल दिया, वही आपको मिले। अमृत-मंथन में दैत्यों को मारते इंद्र को अदिति ने जो मंगल दिया, वही आपको मिले। तीन पग रखते अतुल-तेज विष्णु को जो मंगल हुआ, वही आपको मिले, हे राम। ऋषि, सप्त समुद्र, सप्त द्वीप, वेद, तीन लोक और चारों दिशाएँ आपको मंगलों का मंगल दें, हे महाबाहु।”

ऐसा कहकर, पुत्र के मस्तक पर अक्षत और गंध लगाकर, बड़ी आँखों वाली कौसल्या ने सिद्ध-अर्थ, शुभ विशल्यकरणी ओषधि से रक्षा बाँधी और मंत्र जपे। दुःख में डूबी होकर भी, राम का उत्साह न टूटे इसलिए, वे मात्र वाणी से, हर्षित-सी, बिना भाव-मेल के मंत्र बोलती रहीं। फिर सिर झुकाकर, मस्तक सूँघकर, आलिंगन कर उन्होंने कहा, “हे राम, कृतार्थ होकर सुख से जाइए। नीरोग, सर्वसिद्धार्थ, राजमार्गों पर सभी से मेल रखते हुए अयोध्या लौटे आपको मैं सुख से देखूँ। शोक-संकल्प मिटाकर, हर्ष से दीप्त मुख लिए, वन से लौटे आपको उदित पूर्ण-चंद्र-सा देखूँ। पिता का वचन पूरा कर, भद्रासन पर बैठे आपको फिर देखूँ। वन से लौटकर, मंगल-वस्त्रों से सज्जित होकर, सदा मेरी बहू की कामनाएँ पूरी कीजिएगा। मेरे द्वारा अर्चित शिवादि देवगण, महर्षि, भूतगण, सुर-उरग और दिशाएँ चिरकाल आपका हित चाहें।”
विधिवत स्वस्त्ययन पूरा कर, आँसू-भरी आँखों वाली कौसल्या ने राम की प्रदक्षिणा की और बार-बार देखकर आलिंगन किया। माता द्वारा प्रदक्षिणित, माता के चरण बार-बार दबाते, उसके मंगल-तेज से प्रज्वलित महायशस्वी राघव सीता के भवन की ओर चले।
सार: कौसल्या समस्त देवों, दिशाओं, ऋतुओं और प्राणियों से राम की रक्षा की प्रार्थना करती हैं, हवन और रक्षा-बंधन करती हैं, और दुःख दबाकर हर्षित स्वर में आशीर्वाद देती हैं। राम माता की प्रदक्षिणा कर सीता के भवन की ओर बढ़ते हैं।
सीता की जिज्ञासा
कौसल्या को प्रणाम कर, माता से स्वस्त्ययन पाकर, धर्मिष्ठ मार्ग में स्थित राम वन को चल पड़े; अपने गुणों से जन-हृदयों को मथते, अपने सान्निध्य से राजमार्ग को शोभित करते। व्रत-परायणा तपस्विनी वैदेही ने अभी तक वह सब नहीं सुना था जो अभिषेक को रोकने और वनवास का कारण बना; अतः राम का यौवराज्याभिषेक ही उसके हृदय में था। देवपूजन कर, राजधर्म-अभिज्ञ वह राजपुत्री हर्षित-चित्त पति की प्रतीक्षा कर रही थी।
तब राम, लज्जा से कुछ मुख झुकाए, अपने सुसज्जित, हर्षित-जन-पूर्ण भवन में पहुँचे। आसन से उठकर, काँपती हुई सीता ने अपने पति को शोक-तप्त, चिंता से व्याकुल इंद्रियों वाला देखा। उन्हें देखकर धर्मात्मा राम मन का शोक छिपा न सके; वह प्रकट हो गया। उनके विवर्ण मुख, पसीने और असहिष्णुता को देख, दुःख से संतप्त सीता बोलीं, “हे प्रभो, यह क्या है? आज तो बृहस्पति-अधिष्ठित श्रीमान पुष्य नक्षत्र चंद्रमा से युक्त है, जिसे प्राज्ञ ब्राह्मण अभिषेक के लिए शुभ कहते हैं; फिर आप किससे दुर्मन हैं? सैकड़ों शलाकाओं वाले, जल-फेन-से श्वेत छत्र से आपका सुंदर मुख क्यों आच्छादित नहीं दिखता? चंद्र-हंस-से श्वेत उत्तम चँवरों से आपका शतपत्र-नयन मुख क्यों नहीं झलाया जा रहा?”
“वाग्मी और वंदी आज हर्ष से आपकी स्तुति करते नहीं दिखते; सूत-मागध मंगल-वचनों से नहीं गाते। वेदपारंगत ब्राह्मण मूर्धाभिषिक्त के सिर पर विधिपूर्वक मधु और दही नहीं डालते। समस्त प्रजा, श्रेणी-मुख्य, आभूषित पौर-जानपद आपके पीछे चलने को उद्यत नहीं। सोने के आभूषणों से सज्जित, चार स्वस्थ अश्वों वाला मुख्य पुष्परथ आपके आगे क्यों नहीं चलता? सर्व-लक्षण-पूजित, कृष्ण-मेघ-गिरि-सा श्रीमान हस्ती आगे क्यों नहीं दिखता? सोने से चित्रित भद्रासन आगे लिए कोई पुरःसर क्यों नहीं दिखता? जब अभिषेक तैयार है, तब यह क्या; आपके मुख का रंग अपूर्व है और हर्ष नहीं दिखता?”
सार: सीता, घटनाक्रम से अनजान, राम को विषादग्रस्त देखकर एक-एक राजसी चिह्न गिनाती हैं (छत्र, चँवर, स्तुति, हस्ती, रथ) और पूछती हैं कि अभिषेक के शुभ दिन उनका मुख उदास क्यों है।
राम का सीता को समझाना

विलाप करती सीता से रघुनंदन ने कहा, “हे सीते, मेरे पूज्य पिता मुझे वन भेज रहे हैं। हे जानकि, आप कुलीन, धर्मज्ञ और धर्मचारिणी हैं; सुनिए, यह क्रम से आज मुझ पर कैसे आ पड़ा। मेरे सत्यप्रतिज्ञ पिता राजा दशरथ ने पूर्वकाल में माता कैकेयी को दो महान वर दिए थे। आज जब राजा के प्रयत्न से मेरे अभिषेक की तैयारी पूरी हुई, तो उन्होंने उन्हीं वरों के बदले राजा को बाँध लिया और धर्म के आधार पर पूर्णतः वश में कर लिया। मुझे चौदह वर्ष दंडक में रहना है, और भरत को पिता ने यौवराज्य पर नियुक्त किया है। अतः निर्जन वन को जाते हुए मैं आपको देखने आया हूँ।”
“भरत के समक्ष कभी मेरी प्रशंसा मत कीजिएगा; ऋद्धि-युक्त पुरुष दूसरों की स्तुति सहन नहीं करते। उसके सामने मेरे गुण मत कहिएगा, न विशेष रूप से मुझे ऊँचा बताइएगा; उसके अनुकूल आचरण से ही आप उसके साथ रह सकेंगी। राजा ने उसे सनातन यौवराज्य दिया है; अतः हे सीते, उसे और विशेषकर राजा को प्रसन्न रखिएगा। मैं भी पिता की प्रतिज्ञा पालते हुए आज ही वन जाऊँगा; हे मनस्विनी, आप धीर रहें। मेरे वन जाने पर, हे अनघे, आप व्रत-उपवास में रत रहिएगा। प्रातः उठकर, विधिपूर्वक देवपूजन कर, मेरे पिता राजा दशरथ को प्रणाम कीजिएगा। मेरी वृद्ध, संताप-कृश माता कौसल्या को धर्म आगे रखकर सम्मान दीजिएगा। मेरी शेष माताएँ भी नित्य प्रणम्य हैं; स्नेह, प्रणय और भरण-पोषण में सब मेरी समान माताएँ हैं।”
“भरत और शत्रुघ्न, जो मुझे प्राणों से प्रिय हैं, उन्हें आप विशेष रूप से अपने भाई या पुत्र-सम देखिएगा। हे वैदेहि, भरत का कभी अप्रिय मत कीजिएगा; अब वही, मानो, हमारे देश और कुल का राजा है। राजा अच्छे आचरण और निरंतर सेवा से प्रसन्न होते हैं, अन्यथा कुपित। नरेश अहितकारी होने पर अपने औरस पुत्रों को भी त्याग देते हैं, और हितैषी जनों को भी अपना लेते हैं। अतः हे कल्याणि, राजा के संरक्षण में, भरत के अनुकूल, धर्म में रत और सत्यव्रत-परायणा होकर अयोध्या में रहिए। मैं महावन जाता हूँ, हे भामिनी; आपको यहीं रहना है। ऐसे रहिएगा कि किसी को ठेस न पहुँचे; यही मेरी सीख है।”
सार: राम सीता को दो वरों की कथा और चौदह वर्ष के वनवास का सत्य बताते हैं, और उसे अयोध्या में रहकर भरत के अनुकूल आचरण, सास-ससुर की सेवा, तथा भरत-शत्रुघ्न को भाई-पुत्र-सम मानने का उपदेश देते हैं।
सीता का संकल्प
ऐसा कहे जाने पर, प्रिय-वचना और पति की कृपा-योग्य वैदेही ने प्रणयवश ही कुछ क्रुद्ध होकर पति से कहा, “हे राम, यह कैसा हल्का वचन आप बोलते हैं, जिसे सुनकर मुझे हँसी आती है, हे नरवरोत्तम? शस्त्रास्त्र-विद्या जानने वाले वीर राजपुत्रों के लिए यह अयोग्य और अपयश-कारी वचन है, सुनने योग्य नहीं। हे आर्यपुत्र, पिता, माता, भाई, पुत्र और बहू, सब अपने-अपने पुण्य भोगते, अपने-अपने भाग्य का आश्रय लेते हैं; पर भर्ता का भाग्य ही पत्नी पाती है। इसी से मुझे भी, आप के साथ, वन में रहने का आदेश है।”
“स्त्रियों के लिए न पिता, न पुत्र, न आत्मा, न माता, न सखीजन; इस लोक और परलोक में पति ही एकमात्र गति है। हे राघव, यदि आप आज ही दुर्गम वन को चलते हैं, तो मैं कुश-कंटक कुचलती हुई आपके आगे चलूँगी। ईर्ष्या और रोष बाहर कर, जैसे पिए-बचे जल को कोई फेंक देता है, वैसे ही हे वीर, निःशंक होकर मुझे ले चलिए; मुझमें कोई पाप नहीं। प्रासाद-शिखर, विमान या आकाश-गमन से भी, हर अवस्था में भर्ता के चरणों की छाया स्त्री के लिए श्रेष्ठ है।”
“माता-पिता ने मुझे आपके प्रति आचरण विविध प्रकार से सिखाया है; अब मुझे यह कहने की आवश्यकता नहीं कि मैं कैसे रहूँ। मैं उस दुर्गम, नाना मृग-समूहों से भरे, व्याघ्रों से सेवित वन में आपके साथ चलूँगी; पतिव्रत का चिंतन करती, तीनों लोकों की भी परवाह न करती, मैं वन में पिता के घर-सी सुख से रहूँगी। संयम और ब्रह्मचर्य से आपकी नित्य सेवा करती, मधु-गंध-भरे वनों में आपके साथ विहार करूँगी। आप तो वन में दूसरों का भी पालन कर सकते हैं, फिर मुझ अपनी वश्य भार्या का तो कहना ही क्या, हे मानद?”
“मैं आज आपके साथ अवश्य वन चलूँगी; मुझ उद्यत को कोई नहीं रोक सकता, हे महाभाग। मैं नित्य फल-मूल खाऊँगी और आपके साथ रहती कभी आपको दुःख न दूँगी। आपके आगे चलूँगी, आपके भोजन कर लेने पर ही खाऊँगी। आपके साथ निर्भय होकर पर्वत, पल्वल और सरोवर देखना चाहती हूँ; हंस-कारंडवों से भरे, सुपुष्पित कमल-सरोवरों में नित्य अनुव्रता होकर स्नान करूँगी और परम आनंद से विहार करूँगी। आपके साथ हज़ारों या लाखों वर्ष भी बिताऊँ, तो कोई शोक न होगा; आपके बिना स्वर्ग भी मुझे स्वीकार नहीं। हे नरव्याघ्र, आपके बिना स्वर्ग में वास मिले तो भी मुझे न रुचेगा।”
“मैं उस सुदुर्गम, मृग-वानर-गजों से भरे वन में जाऊँगी और आपके चरणों का आश्रय लेकर, आपसे सम्मानित होकर, पिता के घर-सी रहूँगी। अनन्य-भाव से अनुरक्त, आपसे वियुक्त होने पर मरण को निश्चित मुझ को, हे प्रिय, ले चलिए और मेरी याचना पूरी कीजिए; मैं आप पर भार न बनूँगी।” धर्म-वत्सला सीता के ऐसा कहने पर भी नरश्रेष्ठ राम उसे वन ले जाना नहीं चाहते थे; वन-निवास के दुःखों को विस्तार से कहकर वे उसे उसके संकल्प से लौटाने का प्रयत्न करने लगे।
सार: सीता प्रणयवश रोष से कहती हैं कि पति ही स्त्री की एकमात्र गति है, और वन में पति-संग को स्वर्ग से भी श्रेष्ठ मानती हैं। राम फिर भी उसे ले जाना नहीं चाहते और वन के कष्ट गिनाकर लौटाने का प्रयत्न करते हैं।
वन के काँटे गिनाते राम, और सीता का अटल हृदय
धर्म से प्रेम रखने वाले राम के मन में अब भी यही था कि सीता को वन के दुःख न झेलने पड़ें। आँसुओं से धुँधली आँखों वाली सीता को सान्त्वना देकर उन्होंने फिर से उन्हें लौटाने की मनसा से कहा, “हे सीते, आप महान कुल में जन्मी हैं और सदा धर्म में रत रहती हैं। आप यहीं रहकर धर्म का आचरण कीजिए, जिससे हमारे मन को सुख मिले।”
फिर उन्होंने वनवास के एक-एक संकट गिनाने आरम्भ किए। “हे अबला (कोमल नारी), वन के बहुत-से दोष हैं, उन्हें हमसे सुनिए। वन इस वनवास का विचार ही छोड़ दीजिए; घना वन तो अनेक संकटों से भरा कान्तार (दुर्गम जंगल) कहा जाता है। यह हम आपके हित-बुद्धि से कह रहे हैं; वन में सदा सुख नहीं, हमारी जानकारी में तो वह सदा दुःख ही है।
“पर्वत-झरनों के शोर से और भी ऊँची होती सिंहों की दहाड़ें सुनने में दुःखदायी हैं। निर्भय होकर क्रीड़ा करते मतवाले वन-पशु मनुष्य को देखकर चारों ओर से टूट पड़ते हैं। नदियाँ ग्राहों (मगरमच्छों) से भरी और दलदली हैं, मतवाले हाथी तक उन्हें पार नहीं कर पाते। मार्ग जल-रहित और अत्यन्त ऊबड़-खाबड़ हैं, लताओं-काँटों से ढके और जंगली मुर्गों के शोर से गूँजते। फल खोजने के परिश्रम से थककर रात में अपने-आप गिरे सूखे पत्तों की शय्या पर सोना पड़ता है।
“दिन-रात संयमपूर्वक मन को वश में रखकर वृक्षों से स्वयं गिरे फलों से ही भूख मिटानी पड़ती है। हे मैथिलि (मिथिला की राजकुमारी), शक्ति के अनुसार उपवास करना पड़ता है, सिर पर जटा-भार धारण करना और वल्कल (वृक्ष की छाल के वस्त्र) पहनना पड़ता है। विधिपूर्वक देवताओं और पितरों की पूजा तथा अनायास आ पहुँचे अतिथियों का नित्य सत्कार करना होता है। नियमपूर्वक रहने वालों को प्रातः, मध्याह्न और सायं तीनों समय स्नान करना पड़ता है। अपने हाथों से चुने फूलों से ऋषि-विधि के अनुसार वेदी पर पूजा करनी पड़ती है।
“वहाँ अत्यन्त तेज़ हवा चलती है, घोर अन्धकार रहता है, भूख सदा प्रचण्ड रहती है और बड़े-बड़े भय भी हैं। हे भामिनि (तेजस्विनी), अनेक प्रकार के सर्प गर्व से मार्गों पर रेंगते हैं। नदियों में रहने वाले और नदी की भाँति टेढ़े-मेढ़े चलने वाले साँप राह रोककर पड़े रहते हैं। पतंगे, बिच्छू, कीड़े, डाँस और मच्छर नित्य सताते हैं। काँटेदार वृक्ष, कुश और काश घास अपनी शाखाओं को चारों ओर फैलाए रहते हैं। क्रोध और लोभ का सर्वथा त्याग करना पड़ता है, मन को तप में लगाना पड़ता है, और जिससे डरना चाहिए उससे भी नहीं डरना पड़ता।
“इसलिए वन जाने का विचार छोड़ दीजिए; वन आपके लिए क्षेम (सुरक्षित) नहीं है। सोचने पर हमें तो वन बहुत दोषों से भरा ही दिखाई पड़ता है।” महात्मा राम के इतना कहने पर भी उनकी बात स्वीकार करने को सीता का मन न हुआ, और अत्यन्त दुःखी होकर उन्होंने राम से उत्तर दिया।
सार: राम वन के एक-एक कष्ट गिनाकर सीता को रोकना चाहते हैं, पर धर्मवत्सला सीता का मन डिगता नहीं। यहाँ वाल्मीकि का वन यथार्थ का दुर्गम वन है, कोई रमणीय तपोवन नहीं।
सीता का प्रत्युत्तर: साथ रहूँ तो वन भी स्वर्ग है
राम का यह वचन सुनकर, स्नेह से भरी और आँसू बहाती सीता ने कोमलता से कहा, “हे राघव, वन-निवास के विषय में आपने जो दोष बताए, उन्हें आप मेरे प्रति स्नेह के कारण गुण ही मानिए। हे राघव, हरिण, सिंह, हाथी, बाघ, शरभ (आठ पैरों वाला कल्पित पशु, सिंह से भी बलवान कहा जाता है), चँवर-गाय और अन्य वनचर पशु आपका रूप पहले कभी न देखने के कारण आपको देखते ही भाग खड़े होंगे, क्योंकि सब आपसे डरते हैं।
“माता-पिता की आज्ञा से मुझे आपके साथ अवश्य चलना है, क्योंकि मैं आपकी अर्धांगिनी हूँ और आपके बिना नहीं जी सकती। हे राम, आपसे वियोग होने पर मुझे यहाँ जीवन त्याग ही देना होगा। आप मेरे समीप रहते हुए तो साक्षात इन्द्र भी मुझे अपने बल से नहीं दबा सकते।
“हे महाप्राज्ञ (परम बुद्धिमान), पहले पिता के घर में मैंने ब्राह्मणों से सुना था कि मुझे किसी समय वन में रहना पड़ेगा। शरीर के लक्षण पहचानने वाले ब्राह्मणों से यह सुनकर मैं सदा वनवास के लिए उत्साहित रही हूँ। हे प्रिय, वनवास की वह भविष्यवाणी मुझे सत्य करनी ही है, इसलिए मैं अपने पति आपके साथ चलूँगी, इसमें अन्यथा कुछ नहीं। यह काल अब आ पहुँचा है; ब्राह्मणों का वचन सत्य हो।
“वनवास में अनेक प्रकार के दुःख हैं, यह मैं जानती हूँ; पर वे तो अजितेन्द्रिय (इन्द्रियों को न जीतने वाले) पुरुषों को ही भोगने पड़ते हैं। हे वीर, कुमारी अवस्था में पिता के घर एक शान्त-स्वभाव भिक्षुणी ने मेरी माता के सामने भी यही कहा था कि मुझे आपके साथ वनवास करना होगा। आपके साथ वन में जाने की अभिलाषा मुझे बहुत पहले से है।
“हे राघव, मैं आपके साथ वन-गमन के क्षण की प्रतीक्षा करती रही हूँ; आपका कल्याण हो। हे शुद्धात्मन्, पति के पीछे-पीछे वन जाती हुई मैं प्रेमपूर्वक सब पापों से मुक्त हो जाऊँगी, क्योंकि स्त्री के लिए पति ही परम देवता है। यशस्वी ब्राह्मणों से सुनी यह पवित्र श्रुति है कि जिस पुरुष को इस लोक में पिता-माता ने जल हाथ में लेकर अपने धर्म के अनुसार कन्या दान में दी, परलोक में भी वह स्त्री उसी की पत्नी रहती है।

“हे प्रभो, इसी कारण पहले भी कई बार आपसे मैंने वन ले चलने का अनुरोध किया है। मुझ-जैसी सुशीला, पतिव्रता पत्नी को आप किस कारण इस नगर से ले जाने में असहमत हैं? हे काकुत्स्थ, सुख-दुःख में समान रहने वाली, भक्तिमती, दीन मुझ पतिव्रता को आप साथ ले चलने योग्य ही हैं। यदि आप मुझ दुःखिया को वन ले जाना नहीं चाहते, तो मैं मृत्यु के लिए विष, अग्नि या जल का आश्रय ले लूँगी।”
इस प्रकार सीता ने अनेक प्रकार से वन-गमन के लिए याचना की, फिर भी महाबाहु राम ने उन्हें उस निर्जन वन में ले चलना स्वीकार न किया। तब सीता चिन्ता में डूब गईं और उनकी आँखों से गिरे गर्म आँसुओं से मानो धरती भीगने लगी। उनके इस संकल्प से उन्हें रोकने के लिए आत्मवान राम ने प्रेम से उपजे क्रोध से भरी उस वैदेही को बहुत प्रकार से समझाया।
सार: सीता अपने सतीधर्म, माता-पिता की आज्ञा और बाल्यकाल में सुनी भविष्यवाणी का हवाला देकर साथ चलने का अटल आग्रह करती हैं; वियोग में मृत्यु तक का संकल्प कह देती हैं।
“मेरे राम में पराक्रम नहीं” यह कलंक न लगे
राम के समझाने पर मैथिली सीता ने स्नेह और अभिमान से राघव पर मानो व्यंग्य-बाण चलाया। उन्होंने कहा, “हे राम, क्या मिथिलापति मेरे पिता वैदेह ने आप-जैसे जामाता को पाकर आपको पुरुष-रूप में स्त्री समझ लिया था? यदि आप मुझे साथ न ले गए तो अयोध्या के लोग अज्ञानवश यह झूठ कहेंगे कि ‘सूर्य की भाँति देदीप्यमान होकर भी राम में परम पराक्रम नहीं है।’ यह मेरे लिए दुःख की बात होगी।
“कौन-सी बात सोचकर आप विषाद में पड़े हैं, अथवा आपको किस बात का भय है, जो आप अनन्यपरायणा मुझे त्याग देना चाहते हैं? जैसे सावित्री द्युमत्सेन-पुत्र वीर सत्यवान की अनुगामिनी थीं, वैसे ही मुझे अपने वश में चलने वाली समझिए। हे अनघ (निष्पाप), मैं कुल को कलंकित करने वाली किसी अन्य स्त्री की भाँति मन से भी आपके सिवा किसी और को नहीं देखूँगी; हे राघव, मुझे आपके साथ चलना ही है।
“हे राम, बाल्यावस्था में विवाही और चिरकाल आपके साथ रही अपनी सती पत्नी को क्या आप किसी नट की भाँति स्वयं दूसरों को सौंप देना चाहते हैं? हे अनघ, जिसके वश में और जिसके लिए आप मुझे रहने को कह रहे हैं, आप सदा उसी के वशवर्ती और आज्ञाकारी बने रहें। आप मुझे साथ लिए बिना वन को न जाइए। तप हो, वन हो या स्वर्ग, सब आपके साथ ही मुझे स्वीकार है।
“आपके पीछे चलते हुए वन-मार्गों पर मुझे उद्यान में टहलने या शय्या पर सोने से अधिक श्रम न होगा। कुश, काश, सरकंडे और काँटेदार झाड़ियाँ आपके साथ रहते हुए मेरे तलवों को रुई या कोमल मृगचर्म-सी छुएँगी। आँधी से उठी जो धूल मुझ पर पड़ेगी, हे रमण, उसे मैं अनमोल चन्दन के समान मानूँगी। वन के बीच घास पर आपके साथ लेटूँगी, तो क्या कोमल बिछौनों वाली शय्या उससे अधिक सुखदायी होगी?
“पत्ते, मूल या फल, थोड़ा या बहुत, जो भी आप स्वयं लाकर मुझे देंगे, वह मुझे अमृत-सा लगेगा। वहाँ ऋतु के फूल-फल भोगती हुई मैं न माता को, न पिता को, न घर को याद करूँगी। मेरे साथ रहने से आपको कोई अप्रिय बात न देखनी पड़ेगी, न मेरे कारण शोक होगा, न मैं दुर्भर (भारी) सिद्ध होऊँगी। आपके साथ का निवास स्वर्ग है, आपके बिना का नरक; यही मेरी परम प्रीति जानकर, हे राम, मुझे साथ लेकर वन को चलिए।
“यदि आप मुझे वन ले जाना निश्चय ही नहीं चाहते, तो मैं आज ही विष पी लूँगी, पर शत्रुओं के वश में नहीं जाऊँगी। आपसे बिछुड़कर मैं पीछे जी भी न सकूँगी; हे नाथ, इससे तो आपके सामने ही मर जाना श्रेष्ठ है। मैं इस शोक को क्षण भर भी सहने में असमर्थ हूँ, फिर चौदह वर्ष कैसे सहूँगी?”
इस प्रकार करुण विलाप कर, थकी हुई सीता पति से लिपटकर ऊँचे स्वर में रो पड़ीं। अनेक कठोर वचनों से बिंधी हुई वे चिरकाल से रोके आँसू वैसे ही छोड़ने लगीं, जैसे काठ रगड़ से अग्नि उगलता है। उनकी आँखों से स्फटिक-सा निर्मल जल, सन्ताप से उपजा, दो कमलों से झरते जल की भाँति बहने लगा। पूर्णिमा के निष्कलंक चन्द्र-सा चमकता उनका बड़े नेत्रों वाला मुख जल से निकाले कमल की भाँति गर्म आँसुओं से सूखने लगा। मूर्च्छित-सी दुःखिया सीता को बाँहों में भरकर राम ने उन्हें भरपूर आश्वासन देते हुए कहा।
“हे देवि, आपको कष्ट देकर मिले स्वर्ग में भी मुझे रुचि नहीं। ब्रह्मा की भाँति मुझे किसी ओर से कोई भय नहीं है। हे शुभानने (सुन्दर मुखवाली), आपका पूरा मन न जानने के कारण ही, रक्षा में समर्थ होते हुए भी, मैंने आपका वन-वास स्वीकार नहीं किया था। हे मैथिलि, जब आप मेरे साथ वन में रहने को ही सृजी गई हैं, तो जैसे आत्मज्ञानी अपनी प्रीति नहीं त्याग सकता, वैसे ही मैं आपको नहीं त्याग सकता। हे गजगामिनी, पूर्वकाल में सत्पुरुषों ने जिस धर्म का आचरण किया, उसी का मैं अनुसरण करूँगा; जैसे सुवर्चला (संज्ञा, सूर्य-पत्नी) सूर्य का अनुसरण करती हैं, वैसे ही आप मेरा अनुसरण कीजिए।
“हे जनकनन्दिनि, ऐसा नहीं कि मैं वन न जाऊँ; पिता का सत्य से बँधा वह वचन मुझे वन ले जा रहा है। माता-पिता के वश में रहना ही धर्म है; उनकी आज्ञा का उल्लंघन कर मैं जीना नहीं चाहता। स्वर्ग, धन, धान्य, विद्या, पुत्र और सुख, गुरुजनों की आज्ञा पालने से कुछ भी दुर्लभ नहीं रहता। माता-पिता और गुरु की सेवा के समान न सत्य, न दान-मान, न दक्षिणा-युक्त यज्ञ परलोक में सुख देने वाला है। हे सीते, अब आप मेरे साथ दण्डक-वन चलने के लिए दृढ़ निश्चय कर ही चुकी हैं, इसलिए आपको न ले जाने का मेरा पुराना निश्चय शिथिल हो गया है।
“हे निर्दोष अंगों वाली भीरु, अब आप मेरे साथ वन चलिए और वनवासियों के धर्माचरण में मेरी सहधर्मचारिणी बनिए। हे सीते, आपने सब प्रकार से मेरे और अपने कुल के योग्य ही निश्चय किया है। हे शुभश्रोणि, अब वनवास के योग्य कार्य आरम्भ कीजिए; आपके बिना अब मुझे स्वर्ग भी नहीं रुचता। ब्राह्मणों को रत्न और याचक भिक्षुओं को भोजन दीजिए, और शीघ्रता कीजिए, विलम्ब न कीजिए।
“बहुमूल्य आभूषण, उत्तम वस्त्र, क्रीड़ा की सामग्री, शय्याएँ, वाहन, मेरे और आपके सब साधन, तथा ब्राह्मणों को देने के बाद जो शेष रहे, वह अपने सेवकवर्ग को बाँट दीजिए।” पति की सम्मति जानकर अत्यन्त प्रसन्न देवी सीता शीघ्र ही दान देने में लग गईं, और मनस्विनी यशस्विनी ने धर्मात्माओं को धन-रत्न बाँटने आरम्भ कर दिए।
सार: सीता की दृढ़ता और इस तर्क पर कि साथ न जाने से राम पर “पराक्रमहीन” का कलंक लगेगा, राम अन्ततः साथ ले जाना स्वीकार कर लेते हैं और सीता को सब सम्पत्ति दान में बाँटने को कहते हैं।
लक्ष्मण की याचना: मैं आगे-आगे चलूँगा
राम और सीता का यह संवाद सुनकर, कौसल्या के भवन से राम के साथ आए लक्ष्मण वियोग का शोक न सह सके; उनका मुख आँसुओं से भीग गया। बड़े भाई के चरण कसकर पकड़ते हुए रघुनन्दन लक्ष्मण ने महाव्रती राम और यशस्विनी सीता से कहा, “यदि आपने हरिण और हाथियों से भरे वन जाने का विचार कर ही लिया है, तो धनुष धारण कर मैं आगे-आगे चलते हुए आपके साथ चलूँगा। आपके साथ रहकर मैं पक्षियों और मृग-समूहों के शब्दों से गूँजते रमणीय वनों में विचरूँगा। आपके बिना न मैं देवलोक में जाना चाहता हूँ, न अमरत्व, न लोकों का ऐश्वर्य।”
राम ने अनेक मीठे वचनों से रोका, फिर भी वनवास के लिए दृढ़ लक्ष्मण ने फिर कहा, “जब आपने पहले ही मुझे साथ चलने की अनुमति दे दी थी, तो अब मुझे क्यों रोका जा रहा है? हे अनघ, मैं यह जानना चाहता हूँ कि किस कारण मुझे रोका जा रहा है; मेरे मन में सन्देह है।” हाथ जोड़े, आगे चलने को उत्सुक खड़े धीर लक्ष्मण से महातेजस्वी राम ने कहा, “हे सौमित्र, आप मुझ पर स्नेह रखने वाले, धर्म में रत, धीर, सत्पथ पर स्थिर, मुझे प्राणों के समान प्रिय, वश में रहने वाले और आज्ञाकारी हैं; आप मेरे मित्र भी हैं, इसलिए साथ चलने के सर्वथा योग्य हैं।
“पर हे सौमित्र, यदि आप भी आज मेरे साथ चले गए, तो यशस्विनी कौसल्या और सुमित्रा की सेवा कौन करेगा? जो महाराज पृथ्वी पर वर्षा-सी कृपा बरसाते थे, वे काम-पाश में बँध गए हैं। अश्वपति की पुत्री कैकेयी यह राज्य पाकर अपनी दुःखी सौतों के साथ अच्छा बर्ताव नहीं करेगी। राज्य पाकर कैकेयी में आसक्त भरत भी अत्यन्त दुःखिनी कौसल्या और सुमित्रा का भरण-पोषण नहीं करेंगे। इसलिए हे सौमित्र, आप अपने प्रयत्न से अथवा राजा की अनुग्रह-दृष्टि से यहीं कौसल्या की देखभाल कीजिए; मेरा यह कार्य पूरा कीजिए। इससे मेरे प्रति आपकी भक्ति प्रकट होगी और महान धर्म भी होगा।”
वाणी के मर्मज्ञ लक्ष्मण ने कोमल स्वर में उत्तर दिया, “हे वीर, आपके ही तेज से प्रेरित भरत कौसल्या और सुमित्रा का आदर करेंगे, इसमें सन्देह नहीं। यदि उत्तम राज्य पाकर अहंकार और दुर्बुद्धि से भरत अपनी माताओं की रक्षा न करें, तो उस दुर्बुद्धि क्रूर को मैं मार डालूँगा, उसके पक्षपातियों को भी, चाहे तीनों लोक उसके पक्ष में हों। और जिनके आश्रितों ने हज़ारों गाँव दान में पाए हैं, वे आर्या कौसल्या तो मुझ-जैसे हज़ार को पाल सकती हैं; वे अपना, मेरी माता का और मुझ-जैसों का भरण-पोषण करने में समर्थ हैं। इसलिए मुझे अपना अनुचर बनाइए; इसमें कोई अधर्म नहीं। मैं धनुष लेकर, कुदाल और टोकरी धारण कर, आपको मार्ग दिखाता हुआ आगे-आगे चलूँगा। आपके लिए नित्य कन्दमूल और फल ले आऊँगा; आप वैदेही के साथ पर्वत-शिखरों पर विहार करेंगे, मैं जागते-सोते सब समय आपकी सेवा करूँगा।”
इस वचन से अत्यन्त प्रसन्न राम ने कहा, “हे सौमित्र, जाइए, अपने सब स्वजनों से विदा माँग आइए। और महात्मा वरुण ने जनक के महायज्ञ में राजा को जो दो दिव्य धनुष, दो अभेद्य कवच, अक्षय बाणों वाले दो तरकश और सूर्य-सी निर्मल कान्ति वाली दो स्वर्ण-मण्डित तलवारें दी थीं, और जो जनक ने दहेज में मुझे दीं, वे सब आचार्य वसिष्ठ के घर पूजित होकर रखी हैं; उन्हें शीघ्र ले आइए।” अपने प्रियजनों से विदा लेकर और इक्ष्वाकु-गुरु वसिष्ठ के पास जाकर वनवास के लिए निश्चित लक्ष्मण वे उत्तम अस्त्र ले आए। मालाओं से सजे, दिव्य-रूप में पूजित उन सब अस्त्रों को सुमित्रापुत्र ने राम को दिखाया। लौटे हुए लक्ष्मण से राम ने प्रेम से कहा, “हे सौम्य, आप मेरी इच्छा के अनुसार मुहूर्त भर में ही लौट आए।
“हे परन्तप, अब आपके साथ मैं अपना सारा धन तपस्वी ब्राह्मणों को, गुरुओं में भक्ति रखने वाले श्रेष्ठ ब्राह्मणों को और अपने सब आश्रितों को बाँट देना चाहता हूँ। आप वसिष्ठ-पुत्र आर्य सुयज्ञ को और अन्य शिष्ट ब्राह्मणों को शीघ्र बुला लाइए; उन सबका सत्कार कर मैं वन को प्रस्थान करूँगा।”
सार: लक्ष्मण साथ चलने की हठ करते हैं; राम पहले उन्हें माताओं की सेवा हेतु रोकना चाहते हैं, फिर उनकी भक्ति देख स्वीकार कर लेते हैं और दान के लिए सुयज्ञ आदि ब्राह्मणों को बुलवाते हैं।
सुयज्ञ, त्रिजट और सम्पूर्ण धन का दान
बड़े भाई की आज्ञा शिरोधार्य कर लक्ष्मण शीघ्र सुयज्ञ के घर गए। अग्निशाला में बैठे उस ब्राह्मण को प्रणाम कर उन्होंने कहा, “हे मित्र, दुष्कर कार्य करने वाले राम के भवन में चलकर उसे अपनी आँखों से देखिए।” मध्याह्न की सन्ध्योपासना समाप्त कर सुयज्ञ लक्ष्मण के साथ राम के समृद्ध और रमणीय भवन में गए। वेदज्ञ सुयज्ञ को आया देख राम सीता के साथ हाथ जोड़कर उठे, मानो पूजित अग्नि का स्वागत कर रहे हों।
राम ने सुयज्ञ का सत्कार सोने के उत्तम अंगद (बाजूबन्द), सुन्दर कुण्डल, स्वर्ण-सूत्र में पिरोए मणि, केयूर (बाजू के ऊपर पहना जाने वाला आभूषण), कंकण तथा अनेक अन्य उत्तम आभूषणों से किया। फिर सीता की प्रेरणा से कहा, “हे सौम्य, आपकी पत्नी की सखी सीता उन्हें एक हार, एक स्वर्ण-सूत्र और एक करधनी देना चाहती हैं; इन्हें उन तक पहुँचा दीजिए। वन जाती हुई आपकी पत्नी की सखी आपकी पत्नी के लिए चित्रित अंगद और सुन्दर केयूर भी देना चाहती हैं। वैदेही नाना रत्नों से जड़ा और उत्तम बिछौने वाला एक पलंग भी आपके घर भेजना चाहती हैं। हे द्विजश्रेष्ठ, मेरे मामा ने शत्रुंजय नामक जो हाथी मुझे दिया था, उसे एक सहस्र स्वर्ण-मुद्राओं सहित मैं आपको देता हूँ।” वह सब स्वीकार कर सुयज्ञ ने राम, लक्ष्मण और सीता को मंगलमय आशीर्वाद दिए।
फिर जैसे ब्रह्मा इन्द्र से कहें, वैसे राम ने अपने प्रिय भाई लक्ष्मण से कहा, “हे सौमित्र, ब्राह्मणश्रेष्ठ अगस्त्य (अगस्त्य-पुत्र) और कौशिक (विश्वामित्र-पुत्र), दोनों को बुलाकर रत्नों से उनका सत्कार कीजिए, और हे महाबाहु, जैसे मेघ धरती को जल से सींचता है, वैसे एक-एक सहस्र गायों, स्वर्ण-रजत और बहुमूल्य मणियों से उन्हें तृप्त कीजिए। जो ब्राह्मण नित्य कौसल्या की आशीर्वाद-सहित सेवा करता है, जो तैत्तिरीय शाखा का आचार्य और वेदवित् है, उसे वाहन, दासियाँ, रेशमी वस्त्र और जितने से वह तृप्त हो, उतना धन दिलवाइए।
“चिरकाल से सेवा करने वाले सारथि-मन्त्री आर्य चित्ररथ को बहुमूल्य रत्न, वस्त्र, धन और सब प्रकार के पशु तथा एक सहस्र गायों से सन्तुष्ट कीजिए। जो अनेक दण्डधारी ब्रह्मचारी कठ और कलाप शाखाओं के स्वाध्याय में लगे रहते हैं और महान् लोगों द्वारा भी सम्मानित हैं, उन्हें रत्नों से भरे अस्सी ऊँट, चावल लादे एक सहस्र बैल और खेती के दो सौ बैल दिलवाइए। हे सौमित्र, भोजन में स्वाद के लिए दूध-दही आदि देने वाली एक सहस्र गायें और जुटाइए। जो ब्रह्मचारी व्रत-समाप्ति पर विवाह की इच्छा से कौसल्या की सेवा करते हैं, उन्हें एक-एक सहस्र गायें दिलवाइए, जिससे मेरी माता कौसल्या प्रसन्न हों।”
तब पुरुषश्रेष्ठ लक्ष्मण ने कुबेर की भाँति राम का वह सब धन ब्राह्मणों में बाँटा। आँसू बहाते आश्रितों से राम ने कहा, “मेरे लौटने तक लक्ष्मण का और मेरा यह घर आप सब बारी-बारी से सुरक्षित रखिए।” फिर कोषाध्यक्ष से कहा, “मेरा धन यहाँ लाया जाए।” वहाँ धन का देखने योग्य विशाल ढेर लग गया, जिसे राम ने लक्ष्मण के साथ ब्राह्मणों, बालकों, वृद्धों और दीन-दुखियों में बँटवा दिया।
एक उप-कथा: उन दिनों अयोध्या के पास वन में गर्गवंशी त्रिजट नामक एक दरिद्र ब्राह्मण रहते थे, जो खेत खोदकर जीते और कुदाल-कुल्हाड़ी ढोते थे। उनकी युवती पत्नी ने बच्चों को साथ लेकर कहा, “पति स्त्रियों का देवता है, उन्हें आज्ञा देना उचित नहीं, फिर भी मेरी बात मानिए: कुल्हाड़ी-कुदाल छोड़कर धर्मज्ञ राम के पास जाइए, कुछ अवश्य मिलेगा।” फटी धोती लपेटे त्रिजट राम के भवन की ओर चल पड़े। तेज में भृगु-अंगिरा से समान वे पाँचवें द्वार तक बिना रोके पहुँच गए और राम से बोले, “हे राजपुत्र, मैं निर्धन हूँ पर बहुत बच्चों वाला; मेरी रक्षा कीजिए।” राम ने हँसी से कहा, “मैंने अभी एक सहस्र गायें भी दान नहीं की हैं; आप दण्ड फेंककर जितनी दूरी तक की गायें घेर लें, उतनी पाएँगे।” त्रिजट ने धोती कसकर पूरे बल से दण्ड घुमाकर फेंका; वह सरयू पार कर अनेक सहस्र गायों के झुंड में एक बैल के पास जा गिरा। राम ने उन्हें गले लगाकर उस स्थान से सरयू-तट तक की सब गायें त्रिजट के आश्रम भिजवा दीं, और कहा, “क्रोध न कीजिए, यह तो मेरा हँसी-विनोद था। आप और कुछ चाहें तो माँगिए; मेरा धन ब्राह्मणों के लिए ही कमाया गया है, और आप-जैसों को देने से ही मुझे यश मिलेगा।” सपत्नीक त्रिजट गायों का झुंड पाकर प्रसन्न हुए और राम को यश-बल-सुख बढ़ाने वाले आशीर्वाद दिए।
राम ने अपना समस्त धन यथायोग्य स्वजनों, मित्रों, सेवकों, ब्राह्मणों और भिक्षाजीवी दरिद्रों में बाँट दिया; उस समय अयोध्या में ऐसा कोई न रहा जो सम्मान, दान और सत्कार से तृप्त न हुआ हो।
सार: वन जाने से पूर्व राम और सीता अपना सम्पूर्ण ऐश्वर्य ब्राह्मणों, सेवकों और दीनों को दान कर देते हैं; त्रिजट-प्रसंग राम की उदारता और विनोद-वृत्ति दोनों दिखाता है।
पिता को विदा कहने की राह में नगर का विलाप
सीता के साथ ब्राह्मणों को प्रचुर धन देकर दोनों राघव अपने पिता दशरथ से मिलने चले। उनके पीछे दो सेवकों के हाथों में, मालाओं से सजे और सीता द्वारा चन्दन से पूजित, दोनों भाइयों के अस्त्र शोभा पा रहे थे। मन्दिरों, हवेलियों और सात-मंज़िली भवनों की छतों पर चढ़कर सम्पन्न लोग उदास होकर उन्हें देख रहे थे। गलियाँ भीड़ से भरी थीं, इसलिए लोग छतों से ही दुःखी होकर राम को निहार रहे थे। पैदल चलते, छोटे भाई और सीता सहित राम को देखकर शोक से व्याकुल लोग कहने लगे:
“जिस राम के पीछे कभी चतुरंगिणी सेना चलती थी, वही आज अकेले सीता के साथ चल रहे हैं, और पीछे केवल लक्ष्मण हैं। ऐश्वर्य के सुख और भोगों के भण्डार होकर भी, धर्म के गौरव से प्रेरित होकर, वे पिता का वचन झूठा नहीं करना चाहते। जिन सीता को पहले आकाशचारी प्राणी भी नहीं देख पाते थे, उन्हें आज राजमार्ग पर खड़े लोग देख रहे हैं। अंगराग और रक्त-चन्दन से सजने वाली सीता को वर्षा, गर्मी और सर्दी शीघ्र ही विवर्ण (मलिन) कर देगी।
“आज दशरथ अवश्य किसी अशुभ भाव से बोल रहे हैं; राजा अपने प्रिय पुत्र को कभी वनवास नहीं दे सकता। गुणहीन पुत्र का भी निर्वासन कठिन है, फिर जिसने केवल अपने चरित्र से सारे लोक को जीत लिया, उसका कैसे? इस जगत्पति के दुःख से समस्त जगत वैसे ही पीड़ित है, जैसे जल के घटने से जलचर। ये महातेजस्वी राम मनुष्यों के मूल हैं, और शेष लोग फूल-फल-पत्ते और शाखाएँ; इसलिए, चलो, हम भी अपने उद्यान, खेत और घर छोड़कर लक्ष्मण की भाँति, पत्नियों और बन्धुओं के साथ, सुख-दुःख में समान भागी होकर धर्मात्मा राम के पीछे चलें।
“हमारे छोड़े हुए, धन-धान्य से रहित, धूल से ढके, देवताओं से त्यागे ये घर कैकेयी भोगे। जहाँ राम जाएँगे, वही वन नगर बन जाए, और हमारा छोड़ा यह नगर वन हो जाए। हमारे भय से डरकर साँप अपने बिल, मृग-पक्षी पर्वत-शिखर और हाथी-सिंह वन छोड़ दें। पुत्र और बन्धुओं सहित कैकेयी वही प्रदेश भोगे जहाँ क्रूर पशु-पक्षी रहते हैं; हम सब राघव के साथ वन में सुखपूर्वक रहेंगे।” अनेक लोगों के ये नाना वचन सुनकर भी राम का मन तनिक भी विचलित न हुआ।
मतवाले हाथी की चाल से चलते धर्मात्मा राम कैलास-शिखर-सी आभा वाले माता कैकेयी के भवन की ओर बढ़े, जहाँ पिता ठहरे थे। राजभवन में प्रवेश कर उन्होंने पास ही खड़े उदास सुमन्त्र को देखा। अयोध्या के लोगों को दुःखी देखकर भी अनार्त-रूप (निश्चिन्त) दिखते राम मानो मुस्कराते हुए पिता को देखने और उनकी आज्ञा विधिवत निभाने के लिए आगे बढ़े। पिता को सूचित करने हेतु वे क्षण भर रुके और सुमन्त्र से कहा, “महाराज को मेरे आगमन की सूचना दे दीजिए।”
सार: पिता से विदा माँगने जाते राम के पथ पर पूरी अयोध्या विलाप करती है; प्रजा साथ वन चलने तक की बात कहती है, पर राम का मन अविचल रहता है।
दशरथ की मूर्च्छा और राम का दृढ़ निश्चय
कमल-नयन, श्याम और अनुपम राम ने सूत से कहा, “पिता को मेरी सूचना दे दीजिए।” भीतर जाकर सुमन्त्र ने लम्बी साँसें भरते राजा को देखा, मानो ग्रहण-ग्रस्त सूर्य, राख से ढकी अग्नि, या जल-रहित तालाब हो। हाथ जोड़कर सूत ने जय की आशीर्वाद के साथ मन्द, कोमल, भय से काँपते स्वर में कहा, “हे राजन्, ब्राह्मणों और आश्रितों को सब धन देकर आपके पुरुषश्रेष्ठ पुत्र राम द्वार पर खड़े हैं। सब स्वजनों से विदा लेकर वे आपके दर्शन की इच्छा रखते हैं; वे महावन को जाने वाले हैं, इसलिए किरणों से घिरे सूर्य की भाँति राजगुणों से युक्त उन राजकुमार को देख लीजिए।”
सत्यवादी, गम्भीरता में समुद्र-से और निर्मलता में आकाश-से दशरथ ने कहा, “सुमन्त्र, मेरी जितनी रानियाँ यहाँ हैं, सबको ले आओ; मैं सब पत्नियों से घिरकर राघव को देखना चाहता हूँ।” सुमन्त्र ने रनिवास में जाकर रानियों से राजा की आज्ञा कही। साढ़े तीन सौ युवतियाँ धृतव्रता कौसल्या को घेरकर, राम के वियोग से आँखें लाल किए धीरे-धीरे राजा के पास आईं। पत्नियों को आया देख राजा ने सूत से कहा, “अब मेरे पुत्र को ले आओ।” सुमन्त्र राम, लक्ष्मण और मैथिली को लेकर शीघ्र लौटे।
हाथ जोड़े आते पुत्र को दूर से देखते ही, आर्त राजा स्त्रियों से घिरे आसन से उठ पड़े और वेग से राम की ओर दौड़े, पर उन तक पहुँचने से पहले ही दुःख से मूर्च्छित होकर धरती पर गिर पड़े। राम और महारथी लक्ष्मण तुरन्त उनकी ओर लपके। राजभवन में आभूषणों की झंकार से मिश्रित “हाय! हाय!! राम!!!” का तुमुल नाद उठ खड़ा हुआ। राम और लक्ष्मण ने सीता के साथ राजा को बाँहों में सँभालकर रोते हुए पलंग पर लिटा दिया।
मुहूर्त भर में होश में आए, शोक-सागर में डूबे राजा से हाथ जोड़कर राम ने कहा, “हे महाराज, आप हम सबके स्वामी हैं, मैं आपसे विदा माँगता हूँ। दण्डकारण्य को प्रस्थान करते मुझ पर कृपा-दृष्टि कीजिए। लक्ष्मण को आज्ञा दीजिए और सीता मेरे साथ वन चलें; अनेक सच्चे कारणों से रोकने पर भी ये रुकना नहीं चाहते। हे मानद, शोक त्यागकर हम तीनों, लक्ष्मण, सीता और मुझे, वैसे ही विदा दीजिए जैसे प्रजापति ने अपने पुत्रों सनक आदि को।”
आज्ञा की प्रतीक्षा करते राम को देखकर, कैकेयी से एकान्त में प्रेरित और सत्य-पाश में बँधे राजा रोते हुए बोले, “हे राघव, मैं कैकेयी को वर देकर मोहित हो गया; आप मुझे बन्दी बनाकर आज ही अयोध्या के राजा बन जाइए।” धर्मधुरीण, वाणी-कुशल राम ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया, “हे राजन्, आप एक सहस्र वर्ष और पृथ्वी का पालन करें; मुझे राज्य की लालसा नहीं, मैं वन में रहूँगा। नौ और पाँच, चौदह वर्ष वन में बिताकर, प्रतिज्ञा पूरी कर, मैं फिर आपके चरण ग्रहण करूँगा।”
आँसू बहाते राजा बोले, “हे तात, शुभ, मंगलमय और निर्भय मार्ग पर निश्चिन्त मन से जाइए। हे रघुनन्दन, आप स्वभाव से सत्यनिष्ठ और धर्मप्रिय हैं; आपका वनवास का निश्चय पलटा नहीं जा सकता। फिर भी आज की यह रात किसी भी प्रकार न जाइए; एक दिन के दर्शन से ही मैं सुख पा लूँ। मुझे और अपनी माता को देखते हुए आज की रात रहिए; सब इच्छित भोगों से तृप्त होकर कल प्रातः चले जाइए।
“हे प्रिय पुत्र, आप सर्वथा दुष्कर कार्य कर रहे हैं, क्योंकि मेरे लिए ही आपने वन का आश्रय लिया है। पर हे राम, सत्य की शपथ, यह मुझे प्रिय नहीं; आग को राख-सी ढककर छल करने वाली स्त्री ने मुझे मेरे पथ से भटका दिया।” राम ने कहा, “हे नराधिप, मेरा वनवास का निश्चय अब नहीं डिगेगा। आपने युद्ध में कैकेयी को जो वर दिया था, उसे पूर्णतः निभाकर अपनी सत्यनिष्ठा प्रमाणित कीजिए। मैं चौदह वर्ष वनवासियों के साथ वन में रहूँगा; इसमें कोई आपत्ति न कीजिए। यह पृथ्वी भरत को दे दीजिए।
“मुझे न राज्य चाहिए, न सुख, न पृथ्वी, न ये सब भोग, न स्वर्ग, न जीवन; मैं केवल चाहता हूँ कि आप सत्यवादी रहें, मिथ्यावादी न हों। आपके सत्य और सुकृत की शपथ; आपको जो मलिनता असत्य से लगने वाली है, उसके बदले मैं शाश्वत राज्य, समस्त भोग, सम्पूर्ण पृथ्वी और मैथिली तक नहीं चाहता; आपका वचन सत्य हो। पिता देवताओं का भी देवता कहा गया है; इसलिए पिता के वचन को मैं देव-वचन मानकर पालूँगा। चौदह वर्ष बीतने पर, हे नृपश्रेष्ठ, आप मुझे लौटा हुआ पाएँगे; यह सन्ताप छोड़िए। हे पुरुषश्रेष्ठ, जिसे आँसुओं से भरे सब लोगों को सान्त्वना देनी चाहिए, वही आप विकार को क्यों प्राप्त हो गए? हे प्रभो, मेरे लिए यहाँ क्षण भर भी ठहरना सम्भव नहीं; आपका सन्ताप दूर हो।
“हे देव, उत्कण्ठा न कीजिए; हम वन में, जहाँ शान्त हरिण और नाना पक्षी रहते हैं, सुखपूर्वक विहार करेंगे। पिता देवताओं का भी देवता है, इसलिए मैं पिता का वचन देव-वचन मानकर ही करूँगा। मेरे द्वारा छोड़ी हुई यह पर्वत-खण्डों, नगरों और उपवनों सहित पृथ्वी भरत शासित करें; वे न इसका भोग करें, न गर्व, केवल राजा के लिए कल्याणमयी सीमाओं में रहें। आप पर असत्य का दोष न आए, इसके लिए ही मैं वन जाता हूँ।”
ऐसा कहते राम को गले लगाकर, सन्ताप और दुःख से पीड़ित राजा बिलकुल मूर्च्छित होकर धरती पर गिर पड़े और कोई चेष्टा न कर सके। कैकेयी को छोड़कर वहाँ उपस्थित सब रानियाँ रोने लगीं; सुमन्त्र भी रोते-रोते मूर्च्छित हो गए, और सारा भवन हाहाकार से भर उठा।
सार: राम के दर्शन मात्र से दशरथ मूर्च्छित हो जाते हैं और उन्हें बन्दी बनाकर स्वयं राजा बनने को कहते हैं; राम राज्य की पूर्ण अनिच्छा प्रकट कर पिता की सत्यनिष्ठा को सर्वोपरि बताते हैं।
सुमन्त्र की फटकार और कैकेयी की कठोरता

तब दशरथ का सूत सुमन्त्र सहसा सिर धुनकर, बार-बार साँसें भरकर, हाथ मसलकर, दाँत पीसते हुए, क्रोध से आँखें लाल किए, अशुभ सन्ताप से भरकर, मानो तीखे वाक्-बाणों से कैकेयी का हृदय कँपाते हुए, और अनुपम वज्र-से वचनों से उसके सब मर्म बेधते हुए बोला:
“हे देवि, जिसने अपने पति दशरथ को त्यागा, जो समस्त चराचर जगत के स्वामी हैं, आपके लिए कुछ भी अकार्य नहीं रहा। मैं आपको पतिघातिनी और अन्ततः कुलघातिनी मानता हूँ, जो अपने कर्मों से उस पति को सता रही हैं जो महेन्द्र-सा अजेय, पर्वत-सा अकम्प और समुद्र-सा अक्षोभ्य है। वरदाता पति दशरथ का अपमान न कीजिए; स्त्रियों के लिए पति की इच्छा करोड़ों पुत्रों से बढ़कर है। राजा की मृत्यु पर पुत्र आयु के क्रम से राज्य पाते हैं; इक्ष्वाकु-नाथ के जीते-जी ही आप इस मर्यादा का लोप करना चाहती हैं।
“आपका पुत्र भरत राजा बने, पृथ्वी का शासन करे; हम तो वहीं जाएँगे जहाँ राम जाएँगे। आपके राज्य में कोई ब्राह्मण भी न रहना चाहेगा। यदि आप आज ऐसा मर्यादाहीन कर्म करेंगी, तो हम सब राम के मार्ग पर ही चलेंगे। सब बन्धुओं, ब्राह्मणों और साधुओं से त्यागी जाकर आपको राज्य-लाभ से कौन-सी प्रीति मिलेगी? आश्चर्य है कि ऐसा करते हुए आपके पैरों तले धरती फट नहीं जाती, और महाब्रह्मर्षियों के धिक्कार-दण्ड आपको भस्म नहीं कर देते।
“आम का वृक्ष काटकर नीम को कौन सींचेगा? दूध से सींचने पर भी नीम मीठा नहीं होता। मैं आपका स्वभाव भी ठीक आपकी माता के समान ही समझता हूँ; लोकोक्ति है कि नीम से मधु नहीं झरता।”
एक उप-कथा: सुमन्त्र ने कैकेयी की माता की दुर्बुद्धि का स्मरण कराया। किसी वरदाता ने कैकेय-नरेश, कैकेयी के पिता, को सब प्राणियों की बोली समझने का अनुपम वर दिया था, पर इस शर्त पर कि वे इसका भेद किसी को न बताएँ। एक रात शय्या पर किसी पक्षी की बोली सुनकर राजा हँसे। कैकेयी की माता हठ करने लगी, “हँसी का कारण बताइए, चाहे आप जिएँ या मरें।” राजा ने कहा, “बताऊँगा तो तत्काल मेरी मृत्यु हो जाएगी।” फिर भी रानी न मानी। राजा ने वरदाता से सब कह दिया। उस प्रसन्न वरदाता ने कहा, “वह मरे या निकल जाए, पर भेद मत बताइए।” राजा ने तुरन्त उस रानी को त्यागकर कुबेर-सा सुख से जीवन बिताया। सुमन्त्र ने कहा, “आप भी वैसे ही दुर्जनों के पथ पर चलकर मोहवश राजा को कुमार्ग पर प्रेरित कर रही हैं; यह लोकोक्ति सच जान पड़ती है कि पुरुष पिता पर और स्त्रियाँ माता पर जाती हैं।”
सुमन्त्र ने आगे कहा, “ऐसा न कीजिए; राजा जो कहें, वह स्वीकार कीजिए; पति की इच्छा का पालन कर इन प्रजाओं की रक्षिका बनिए। पापियों के बहकावे में आकर लोक-रक्षक, इन्द्र-तुल्य अपने पति को अधर्म में प्रेरित मत कीजिए। ज्येष्ठ, उदार, कर्मठ, स्वधर्म और जीवलोक के रक्षक बलवान राम का राज्याभिषेक हो। यदि राम पिता को छोड़कर वन गए, तो हे देवि, लोक में आपकी बड़ी निन्दा फैलेगी। राम अपना राज्य पालें, आप निश्चिन्त रहिए; इस श्रेष्ठ नगर में राम के सिवा कोई राजा आप पर प्रसन्न न रहेगा। राम के युवराज होने पर महाधनुर्धर दशरथ अपने पूर्वजों का आचरण स्मरण कर वन को चले जाएँगे।” इस प्रकार राजसभा में हाथ जोड़कर सुमन्त्र ने कठोर और कोमल दोनों वचनों से कैकेयी को बार-बार झकझोरा; पर वह देवी न क्षुब्ध हुई, न दुखी, न उसके मुख का रंग बदला।
सार: सुमन्त्र कठोर और कोमल दोनों वचनों से कैकेयी को धर्म-मर्यादा का स्मरण कराता है, उसकी माता का दृष्टान्त देता है; पर कैकेयी अपने निश्चय से नहीं डिगती।
असमंज का दृष्टान्त और सिद्धार्थ की मन्त्रणा
प्रतिज्ञा से बँधे दशरथ ने आँसू भरकर, लम्बी साँस लेकर सुमन्त्र से फिर कहा, “हे सूत, रत्नों से भरी चतुरंगिणी सेना शीघ्र राघव के साथ चलने को तैयार की जाए। वाक्-चतुर रूपजीवा (गणिकाएँ) और महाधनी व्यापारी राजकुमार की सेना की शोभा बढ़ाएँ। जो मल्ल उस पर निर्भर हैं और जिनके बल-परीक्षण में राम आनन्द लेते थे, उन्हें भी अनेक उपहार देकर साथ भेजो। मुख्य अस्त्र, सभ्य-सुसंस्कृत जन, बैलगाड़ियाँ और वन के मर्मज्ञ व्याध काकुत्स्थ के साथ चलें। मृग और हाथी मारता, जंगली मधु पीता, नाना नदियाँ देखता वह राज्य को न याद करेगा। मेरा जो धान्य-कोष और धन-कोष है, दोनों निर्जन वन में रहने जाते राम के साथ चलें। पुण्य-स्थानों में यज्ञ करता, दक्षिणा देता और ऋषियों से मिलता वह सुखपूर्वक वन में रहेगा। महाबाहु भरत अयोध्या का पालन करेंगे; श्रीमान राम सब भोगों सहित भेजे जाएँ।”
दशरथ के यों कहते ही कैकेयी भयभीत हो गई; उसका मुख सूख गया और स्वर रुक गया। खिन्न और भयभीत कैकेयी ने राजा की ओर मुख कर कहा, “हे साधो, मद्य के सार-रहित (शराब का नशीला अंश निकाल लेने पर बचे) झाग-जैसे, धन-विहीन, सूने और अभोग्य राज्य को भरत स्वीकार न करेंगे।” इस अत्यन्त निर्लज्ज और कठोर वचन पर बड़े नेत्रों वाली उस स्त्री से राजा ने कहा, “हे शत्रु-रूपिणी, हे अनार्ये, मुझे यह भार सौंपकर अब ढोते हुए मुझे क्यों कोंच रही हैं? यह कार्य आरम्भ करते समय पहले ही क्यों न रोक दिया?” इन क्रोध-भरे वचनों को सुनकर दुगुनी क्रुद्ध कैकेयी ने कहा, “आपके ही वंश में सगर ने अपने ज्येष्ठ पुत्र असमंज को त्याग दिया था; वैसे ही राम भी बिना किसी सहारे के जाएँ।” यह सुनकर राजा ने केवल “धिक्कार!” कहा; वहाँ उपस्थित सब लज्जित हुए, पर वह तनिक भी विचलित न हुई।
एक उप-कथा: वहाँ राजा के परम सम्मानित वृद्ध, शुचि और उपयुक्त (योग्य) महामात्र सिद्धार्थ ने कैकेयी से कहा, “असमंज खेलते बालकों को पकड़कर सरयू में फेंक देता और उसमें आनन्द लेता था। यह क्रूरता देख क्रुद्ध नागरिकों ने राजा सगर से कहा, ‘हे राष्ट्रवर्धन, या तो आप अकेले असमंज को रखिए, या हमें बचाइए।’ राजा ने त्याग का कारण पूछा तो प्रजा ने उसकी मूर्खता और बालक-हत्या की बात कही। प्रजा को प्रसन्न करने हेतु धार्मिक सगर ने उस अहितकारी पुत्र को सपत्नीक रथ पर चढ़ाकर ‘यह आजीवन निर्वासित रहे’ कहकर निकाल दिया। वह कुदाल-टोकरी लेकर पापी की भाँति दिशा-दिशा भटकता रहा।” सिद्धार्थ ने आगे कहा, “पर राम ने ऐसा कौन-सा पाप किया, जिसके कारण उन्हें राज्य से वंचित किया जा रहा है? हम राघव में कोई दोष नहीं देखते; नवचन्द्र में कलंक खोजना जितना कठिन है, उतना ही राम में दोष पाना। हे देवि, यदि आप कोई दोष देखती हैं तो आज ही ठीक-ठीक बताइए, तब राम वन भेजे जाएँ। निर्दोष और सत्पथ-निरत व्यक्ति का त्याग धर्म-विरुद्ध है; ऐसा करने वाला तो इन्द्र की कान्ति को भी भस्म कर देता है। इसलिए हे शुभानने, राम की राजलक्ष्मी का अपहरण मत कीजिए; लोक की निन्दा से भी बचिए।”
सिद्धार्थ का वचन सुनकर शोक से क्षीण स्वर वाले राजा ने कैकेयी से कहा, “हे पापरूपे, क्या आपको यह हितकारी वचन नहीं रुचते? कष्ट के मार्ग पर चलकर आप न मेरा हित जानती हैं, न अपना; आपकी चेष्टा सत्पथ से दूर और अनुचित है। आज मैं राज्य, सुख और धन त्यागकर अयोध्या की सारी प्रजा सहित राम के पीछे वन जाऊँगा; आप भरत के साथ चिरकाल यह राज्य सुख से भोगिए।”
सार: राम के साथ सेना-कोष भेजने पर कैकेयी असमंज का उदाहरण देकर अड़ती है; मन्त्री सिद्धार्थ असमंज और राम की तुलना को अनुचित बताते हैं और राजा कैकेयी से क्षुब्ध होकर स्वयं वन चलने तक की बात कह देते हैं।
वल्कल का प्रसंग और वसिष्ठ का रोष

महामात्र का वचन सुनकर विनयज्ञ राम ने नम्रता से दशरथ से कहा, “हे राजन्, भोग त्यागकर वन में कन्दमूल पर जीने वाले और सब आसक्ति छोड़ चुके मुझे सेना का क्या प्रयोजन? जो श्रेष्ठ हाथी देकर रस्सी पर मन लगाए, वह मूर्ख है; उत्तम गज को त्याग चुके के लिए रस्सी का क्या मोल? हे सत्पुरुषश्रेष्ठ, वैसे ही मुझे ध्वजिनी (सेना) से क्या? मैं सब कुछ भरत के लिए छोड़ता हूँ; माता कैकेयी की दासियाँ मुझे वल्कल ले आएँ, और मुझ चौदह वर्ष वन में रहने वाले के लिए एक कुदाल और एक टोकरी ले आएँ।”
तब कैकेयी स्वयं वल्कल ले आई और उस जनसमूह के बीच निर्लज्ज होकर राम से बोली, “इन्हें पहन लीजिए।” पुरुषश्रेष्ठ राम ने कैकेयी से वे दो वल्कल लेकर अपने महीन वस्त्र उतार दिए और मुनि-वेश धारण कर लिया। लक्ष्मण ने भी वहीं अपने सुन्दर वस्त्र छोड़कर पिता के सामने दो वल्कल पहन लिए। पर रेशमी वस्त्र पहने सीता उस वल्कल को देखकर वैसे ही डर गईं, जैसे फन्दे को देखकर हिरनी। अत्यन्त खिन्न होकर शुभलक्षणा जानकी ने कैकेयी के दिए कुश-वल्कल को मानो लज्जित होकर हाथ में लिया, और गन्धर्वराज-से अपने पति से कहा, “वन में रहने वाले मुनि वल्कल कैसे बाँधते हैं?” वल्कल पहनने में अनभ्यस्त सीता बार-बार चूक गईं। एक वल्कल गले में डाल और दूसरा हाथ में लेकर वे लज्जित खड़ी रह गईं। तब धर्मधुरीण राम ने पास जाकर स्वयं उनके रेशमी वस्त्र के ऊपर वल्कल बाँध दिया।

सीता पर वल्कल बँधते देख रनिवास की स्त्रियाँ आँसू बहाने लगीं और दुखी होकर तेजस्वी राम से बोलीं, “हे प्रभो, इस मनस्विनी को तो वनवास की आज्ञा नहीं मिली; हे वत्स, आप पिता के वचन से अकेले लक्ष्मण को साथ लेकर वन जाइए, यह कल्याणी तपस्विनी की भाँति वन में रहने योग्य नहीं। हे पुत्र, हमारी याचना मानिए, सीता यहीं रहें; धर्म ही जिसका सदा साथी है, वैसे आप तो रुकना नहीं चाहते।” फिर भी राम सीता के लिए वैसे ही वल्कल बाँधते रहे, जैसी सीता की इच्छा थी और जिनका शील राम से मेल खाता था।
सीता को वल्कल लेते देख राजगुरु वसिष्ठ ने आँखों में आँसू भरकर सीता को रोका और कैकेयी से कहा, “हे दुर्बुद्धि, कुलकलंकिनी कैकेयि, अति बढ़ चुकी आप राजा को छलकर भी मर्यादा पर नहीं ठहरतीं! हे शीलहीने, देवी सीता को वन नहीं जाना चाहिए; वे राम के लिए नियत आसन पर बैठेंगी। गृहस्थों के लिए पत्नी ही उनका आत्मा है; राम का आत्मा होकर सीता ही पृथ्वी का पालन करेंगी। यदि वैदेही राम के साथ वन जाएँगी, तो हम भी पीछे जाएँगे और यह नगर भी जाएगा। रनिवास के रक्षक भी वहीं जाएँगे जहाँ राम सपत्नीक रहेंगे; सम्पूर्ण कोसल-राष्ट्र और सम्पत्ति-सहित अयोध्या भी जाएगी। वल्कल पहने वनचर बने भरत और शत्रुघ्न भी वन में अपने अग्रज का अनुसरण करेंगे।

“तब हे दुर्वृत्ते, प्रजा की अहित-कामी आप अकेली वृक्षों-सहित सूनी, जन-रहित धरती का शासन करना। जिस राष्ट्र में राम राजा न हों, वह राष्ट्र टिकेगा नहीं, और जिस वन में राम रहेंगे, वही राष्ट्र बन जाएगा। पिता की स्वेच्छा से न दी गई पृथ्वी को भरत शासित न करेंगे, और यदि वे राजा के औरस पुत्र हैं, तो आपके साथ पुत्रवत भी न रहेंगे। आप धरती छोड़कर आकाश में उड़ जाएँ तो भी, पूर्वजों का आचरण जानने वाला भरत अन्यथा न करेगा। हे पुत्र-कामिनी, आपने पुत्र का अहित ही किया, क्योंकि लोक में राम का अनुगामी न हो, ऐसा कोई नहीं। हे कैकेयि, आप आज ही देखेंगी कि पशु, सर्प, मृग, पक्षी और सम्मुख झुके वृक्ष तक राम के साथ वन जाने को उत्सुक हैं।
“इसलिए हे देवि, वल्कल हटाकर अपनी पुत्रवधू को उत्तम आभूषण दीजिए; वल्कल इसके लिए नियत नहीं।” यों कहकर वसिष्ठ ने सीता को वह वस्त्र पहनने से रोका, और कहा, “हे कैकेय-राजपुत्रि, आपने केवल राम का वनवास माँगा था; इसलिए नित्य शृंगार-योग्य सीता भली प्रकार सजी-धजी राम के साथ वन में रहें। राजपुत्री उत्तम वाहनों, सेवकों, वस्त्रों और सब साधनों सहित जाएँ; वर माँगते समय आपने इनका निर्वासन नहीं माँगा था।” इतना कहने पर भी, पति का अनुसरण करने की इच्छुक सीता अपने संकल्प से तनिक भी न डिगीं।
सार: राम सेना ठुकराकर वल्कल माँगते हैं; कैकेयी स्वयं वल्कल लाती है। राम-लक्ष्मण उन्हें पहन लेते हैं, सीता को वल्कल बाँधने में राम सहायता करते हैं, और वसिष्ठ कैकेयी को कठोर फटकार लगाकर सीता का सादर वन-गमन सिद्ध करते हैं।
दशरथ की कैकेयी को फटकार और माता की चिन्ता
पति की रक्षा में रहते हुए भी अनाथ-सी सीता को वल्कल पहने देख वहाँ उपस्थित सब लोग चीख पड़े, “धिक्कार है आप दशरथ को, जो इस घोर अन्याय को नहीं रोकते!” उस तुमुल पुकार से दुखी राजा का जीवन, धर्म और अपने यश से सारा अनुराग टूट गया। उन्होंने गर्म साँस भरकर अपनी पत्नी कैकेयी से कहा, “हे कैकेयि, सीता कुश-वल्कल पहनकर जाने योग्य नहीं। मेरे गुरु वसिष्ठ ठीक कहते हैं कि सुकुमारी, बालिका और सदा सुख की अभ्यस्त सीता वन के योग्य नहीं। यह निर्दोष राजपुत्री, जो किसी का अनिष्ट नहीं करती, वल्कल पहनकर मूर्च्छित-सी क्यों जनों के बीच खड़ी है?
“सीता वल्कल छोड़ें; राजपुत्री सब रत्नों सहित सुखपूर्वक वन जाएँ। मैंने नीच प्रतिज्ञा बाँधी है, पर सीता को वल्कल पहनाने वाला यह अन्याय आपने बाल-बुद्धि से किया है; यह मुझे वैसे ही जलाएगा, जैसे फूलते समय बाँस अपने आप को। हे पापे, यदि राम ने आपका कुछ अनिष्ट किया हो, तो वैदेही ने आपका क्या बिगाड़ा, हे अधमे? हरिणी-सी विकसित नेत्रों वाली, कोमल-स्वभावा, मनस्विनी जनकात्मजा ने आपका क्या अपकार किया? राम को मुनि-वेश में वन भेजना ही आपके लिए पर्याप्त था; इन दीन पापों से आप और क्या पाना चाहती हैं? राम के अभिषेक के समय आपने जो वर माँगा, वह सुनकर मैं चुप रह गया था; पर अब उससे आगे बढ़कर, मैथिली को भी वल्कल पहनाकर, आप नरक जाना चाहती हैं।”
सिर झुकाए बैठे यों कहते पिता से, वन को प्रस्थान कर चुके राम ने कहा, “हे पिता, मेरी यशस्विनी माता धर्मात्मा कौसल्या वृद्ध हैं, उदार-स्वभावा हैं और कभी आपकी निन्दा नहीं करतीं। हे वरदाता, मुझसे बिछुड़कर शोक-सागर में पड़ी, पहले कभी दुःख न जानने वाली माता का आप और भी आदर कीजिए, जिससे वे पुत्र-वियोग के शोक से न मरें। पूज्य आपके आदर से सम्मानित होकर, मेरा चिन्तन करती हुई वे तपस्विनी आपके आश्रय में जीवित रहें। हे महेन्द्र-तुल्य, पुत्र के लिए तरसती मेरी माता को आप ऐसे रखिए कि मेरे वनवास में शोक से दुर्बल होकर वे यमलोक न चली जाएँ।”
सार: सीता को वल्कल पहने देख जनता और दशरथ कैकेयी को धिक्कारते हैं; राम विदा लेते हुए पिता से माता कौसल्या की देखभाल का आग्रह करते हैं।
कौसल्या की सीख और रथ की प्रतीक्षा
राम का वचन सुनकर और मुनि-वेश में उन्हें देखकर राजा रानियों सहित चेतना खो बैठे। सन्ताप से जलते वे न राम की ओर देख सके, न उनसे बोल सके। मुहूर्त भर मूर्च्छित रहकर महाबाहु राजा राम का ही चिन्तन करते विलाप करने लगे, “जान पड़ता है पूर्व जन्म में मैंने अनेक गायों को बछड़ों से विलग किया या प्राणियों की हिंसा की; तभी यह विपत्ति आ पड़ी। पर समय आए बिना शरीर से प्राण नहीं निकलते, इसीलिए कैकेयी से सताए जाते हुए भी मैं मरता नहीं, और महीन वस्त्र छोड़कर तपस्वी-वेश में अग्नि-से तेजस्वी पुत्र को सामने खड़ा देख रहा हूँ। यह सब केवल अपने स्वार्थ के लिए छल का आश्रय लेने वाली अकेली कैकेयी के कारण हो रहा है।” इतना कहकर “राम!” एक बार कहकर ही, आँसुओं से रुँधे कण्ठ वाले राजा और कुछ न कह सके। मुहूर्त भर में होश में आकर आँसू-भरी आँखों से उन्होंने सुमन्त्र से कहा, “विहार के लिए बना रथ उत्तम घोड़ों से जोतकर शीघ्र लौटो और इस महाभाग पुत्र को इस जनपद के पार पहुँचा दो। गुणवानों के गुणों का यही फल कहा जाता है, कि पिता-माता द्वारा ही साधु-वीर वन भेजा जाए।”

राजा की आज्ञा मानकर शीघ्रगामी सुमन्त्र अलंकृत अश्वों से जुता रथ ले आए और हाथ जोड़कर राजकुमार राम को सूचना दी। तब देश-काल के ज्ञाता, सर्वथा शुचि राजा ने कोषाध्यक्ष को बुलाकर कहा, “सीता के वनवास के सब वर्ष गिनकर वैदेही के लिए बहुमूल्य वस्त्र और महान आभूषण शीघ्र ले आओ।” कोष से सब लाकर उसने सीता को सौंप दिया। वन जाने को तैयार उत्तम कुल में जन्मी वैदेही ने उन विचित्र आभूषणों से अपने शुभ-लक्षण अंगों को सजाया, और भली प्रकार सजी सीता उस भवन को वैसे ही दीप्त करने लगीं, जैसे उगते सूर्य की किरणें निर्मल आकाश को।
उन्हें बाँहों में भरकर, उनका सिर सूँघकर सास कौसल्या ने कहा, “इस संसार में अपने प्रिय पतियों से सदा सम्मानित होकर भी जो स्त्रियाँ विपत्ति में पड़े पति का आदर नहीं करतीं, वे दुष्टा कहलाती हैं। सुख भोग चुकीं जो स्त्रियाँ थोड़ी-सी विपत्ति आते ही पति की निन्दा करती या त्याग देती हैं, यही दुष्ट स्त्रियों का स्वभाव है। कुल, उपकार, विद्या, दान या विवाह-बन्धन भी ऐसी चंचल-हृदया स्त्रियों का मन नहीं बाँधते। पर शील, सत्य और शास्त्र-वचन में स्थित सती स्त्रियों के लिए पति ही परम पवित्र और सर्वोपरि है। वन भेजा जाता मेरा पुत्र राम आपसे अनादृत न हो; धनवान हो या निर्धन, वह आपके लिए देवता-तुल्य है।”
यह धर्म-अर्थ-संगत वचन सुनकर सीता ने हाथ जोड़कर कहा, “हे आर्ये, आप जो आज्ञा देंगी, सब करूँगी; मैं जानती हूँ कि पति के साथ कैसे रहना है, और यह मैंने अपने गुरुजनों से सुना भी है। आर्या मुझे दुष्ट स्त्रियों के समान न समझें; जैसे चाँदनी चन्द्र से अलग नहीं हो सकती, वैसे मैं धर्म से नहीं हट सकती। तार के बिना वीणा नहीं बजती, पहिए के बिना रथ नहीं चलता, और पति के बिना सौ पुत्र होने पर भी स्त्री सुख नहीं पाती। पिता सीमित सुख देता है, भाई और पुत्र भी सीमित; तो असीम सुख देने वाले पति को कौन स्त्री न पूजेगी? गुरुजनों से स्त्री-धर्म जान चुकी मैं, हे आर्ये, पति को कैसे अनादर करूँ, जब पति ही स्त्री का देवता है?” सीता का यह हृदयस्पर्शी वचन सुनकर शुद्ध-हृदया कौसल्या वियोग के दुःख और सीता के पुण्य-भाव के हर्ष, दोनों से उपजे आँसू बहाने लगीं।
माताओं में परम सम्मानित कौसल्या को देखकर परम धर्मात्मा राम ने हाथ जोड़कर कहा, “हे अम्ब, दुखी होकर मेरे पिता को मत देखिए; वनवास का अन्त भी शीघ्र ही आ जाएगा। सोते-सोते ही आपके ये नौ और पाँच, चौदह वर्ष बीत जाएँगे; एक दिन आप मुझे मित्रों-बन्धुओं सहित सकुशल लौटा हुआ देखेंगी।” फिर साढ़े तीन सौ सौतेली माताओं को भी उतना ही दुखी देख, हाथ जोड़कर उन्होंने कहा, “साथ रहते हुए अनजाने में मुझसे कोई कठोर वचन या कार्य हुआ हो, तो क्षमा कीजिए; अब मैं आप सभी से विदा माँगता हूँ।” राघव का यह धर्मयुक्त शान्त वचन सुनकर शोक से व्याकुल सब रानियों के मुख से क्रौंची-पक्षियों के स्वर-सा करुण नाद उठ पड़ा। पहले मृदंग और मेघ-गर्जना-से बाजों से गूँजने वाला दशरथ का वह भवन अब विलाप और रुदन से व्याकुल, विपत्ति में पड़ा, अत्यन्त दुःखमय हो गया।
सार: कौसल्या पुत्रवधू को सती-धर्म की सीख देती हैं, सीता विनम्रता से ग्रहण करती हैं; राम माताओं से क्षमा माँगकर विदा लेते हैं और रनिवास विलाप से भर उठता है।
मूल: श्रीमद्वाल्मीकि-रामायण, अयोध्याकाण्ड, सर्ग 14-56; पाठान्तर में गीता प्रेस का क्रम रखा गया है।
आधार: वाल्मीकि रामायण (गीता प्रेस, गोरखपुर)