‘तत्त्वज्ञान’ पन्द्रहवाँ-प्रकरण है। तत्त्व का ज्ञान। यह ज्ञान-शास्त्र की भारतीय-दृष्टि से दो-स्तरीय है, परोक्ष (indirect, शब्द-प्रमाण से) और अपरोक्ष (direct, अनुभव-प्रमाण से)। अष्टावक्र अपरोक्ष-ज्ञान पर ज़ोर देते हैं। आधुनिक-दर्शन में बर्ट्रैंड रसेल (Bertrand Russell, 1872-1970) ने ‘knowledge by acquaintance’ और ‘knowledge by description’ का जो विभेद किया था, वह अष्टावक्र के परोक्ष-अपरोक्ष विभेद से मिलता-जुलता है।पाठ्य-संगति
तत्त्वज्ञान
Knowledge of Truth · 20 श्लोक
बीस श्लोकों में पूरा अद्वैत समा गया है। हर श्लोक अपने-आप में एक रत्न है, और यह प्रकरण साधक को बार-बार पढ़ने योग्य है। यहाँ अष्टावक्र अपने शिष्य से सीधी, और सबसे सघन बात कह रहे हैं।
पन्द्रहवें प्रकरण में “तत्त्व–ज्ञान” की चर्चा है। तत्त्व-ज्ञान का अर्थ है “मूल-तत्त्व का ज्ञान”, और संस्कृत-दार्शनिक-परम्परा में यह केन्द्रीय-शब्द है। आदि शंकराचार्य ने अपनी “तत्त्व-बोध” रचना (आठवीं-सदी) में इसी विषय पर सिर्फ़-तीन पन्ने लिखे, और वो वेदान्त–शिक्षा का foundational-पाठ बन गयी।

अष्टावक्र पहले ही पग पर साधक के दो रूप खींच देते हैं। जिसकी बुद्धि निर्मल है, वह किसी भी प्रकार के उपदेश से कृतार्थ हो जाता है, बस एक स्वर सुनते ही बात उसके भीतर बैठ जाती है। और दूसरा, जो जीवन-भर जिज्ञासु बना रहता है, फिर भी उसी तत्त्व में उलझा-मोहित रह जाता है। फिर वे मोक्ष और बन्धन की सबसे छोटी परिभाषा रख देते हैं, विषयों में रस का सूख जाना ही मुक्ति है, और विषयों में रस का बना रहना ही बन्धन। इतना ही समूचा विज्ञान है, और आगे का चुनाव वे शिष्य पर छोड़ देते हैं, जैसी आपकी इच्छा हो, वैसा करिए। साथ ही एक चेतावनी भी रख देते हैं, यह तत्त्व-बोध जिसमें उतर आए, वह बोलने वाला, बुद्धिमान, बड़ा उद्योगी पुरुष भी बाहर से मूक, जड़, आलसी-सा हो जाता है, और इसीलिए भोग में डूबे लोग इस ज्ञान को छोड़ देते हैं।
श्लोक 1 · 2 · 3
यथातथोपदेशेन कृतार्थः सत्त्वबुद्धिमान्।
आजीवमपि जिज्ञासुः परस्तत्र विमुह्यति॥
मोक्षो विषयवैरस्यं बन्धो वैषयिको रसः।
एतावदेव विज्ञानं यथेच्छसि तथा कुरु॥
वाग्मिप्राज्ञमहोद्योगं जनं मूकजडालसम्।
करोति तत्त्वबोधोऽयमतस्त्यक्तो बुभुक्षिभिः॥
अब वे शिष्य की ओर सीधे मुड़ते हैं और उसका असली स्वरूप उसके सामने रख देते हैं। आप देह नहीं हैं, और देह आपकी नहीं है; न आप भोगने वाले हैं, न करने वाले। आप तो चिद्रूप हैं, सदा साक्षी, और किसी पर अवलम्बित नहीं; इसी निरपेक्षता में सुख से विचरिए। फिर मन की बारी आती है। राग और द्वेष मन के धर्म हैं, और वह मन कभी आपका रहा ही नहीं। आप तो निर्विकल्प हैं, बोध-स्वरूप हैं, निर्विकार; इसी पहचान में सुख से चलिए। और इस पहचान को वे विस्तार दे देते हैं, सब प्राणियों में आत्मा को और सब प्राणियों को आत्मा में जान लीजिए, फिर अहंकार और ममता, दोनों एक साथ छूट जाते हैं, और सुख अपने-आप आ बैठता है।
श्लोक 4 · 5 · 6
न त्वं देहो न ते देहो भोक्ता कर्ता न वा भवान्।
चिद्रूपोऽसि सदा साक्षी निरपेक्षः सुखं चर॥
रागद्वेषौ मनोधर्मौ न मनस्ते कदाचन।
निर्विकल्पोऽसि बोधात्मा निर्विकारः सुखं चर॥
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
विज्ञाय निरहङ्कारो निर्ममस्त्वं सुखी भव॥
इस ऊँचाई से वे एक चित्र उठाते हैं। जैसे समुद्र में लहरें उठती हैं, वैसे ही जिसमें यह सारा विश्व स्फुरित होता है, हे चित्-मूर्ति, वही आप हैं; इसमें रत्ती-भर सन्देह नहीं, इसलिए मन का ज्वर, वह भीतर की बेचैनी, उतार दीजिए। और जहाँ तर्क की डोर छोटी पड़ जाए, वहाँ वे श्रद्धा का सहारा देते हैं। श्रद्धा कीजिए, हे वत्स, श्रद्धा कीजिए, यहाँ मोह में मत पड़िए; आप तो ज्ञान-स्वरूप भगवान् हैं, प्रकृति से परे स्थित आत्मा।
श्लोक 7 · 8
विश्वं स्फुरति यत्रेदं तरङ्गा इव सागरे।
तत्त्वमेव न सन्देहश्चिन्मूर्ते विज्वरो भव॥
श्रद्धस्व तात श्रद्धस्व नात्र मोहं कुरुष्व भोः।
ज्ञानस्वरूपो भगवानात्मा त्वं प्रकृतेः परः॥
अब वे शोक की जड़ पर हाथ रखते हैं। गुणों से लिपटा हुआ देह ठहरता है, आता है, चला जाता है; पर आत्मा न कहीं जाती है, न कहीं से आती है, फिर इसका शोक किस बात का? देह चाहे कल्प के अन्त तक टिका रहे, चाहे आज ही चला जाए, चित्-मात्र-स्वरूप आपकी न कोई वृद्धि है, न कोई हानि। आप तो अनन्त महा-समुद्र हैं, जिसमें यह विश्व-रूपी लहर अपने स्वभाव से उठती है और अपने-आप अस्त हो जाती है; इस उठने-गिरने से आपकी न बढ़ती है, न घटती है।
श्लोक 9 · 10 · 11
गुणैः संवेष्टितो देहस्तिष्ठत्यायाति याति च।
आत्मा न गन्ता नागन्ता किमेनमनुशोचसि॥
देहस्तिष्ठतु कल्पान्तं गच्छत्वद्यैव वा पुनः।
क्व वृद्धिः क्व च वा हानिस्तव चिन्मात्ररूपिणः॥
त्वय्यनन्तमहाम्भोधौ विश्ववीचिः स्वभावतः।
उदेतु वास्तमायातु न ते वृद्धिर्न वा क्षतिः॥
इसी सूत्र को वे एक के बाद एक गहरा करते जाते हैं। हे वत्स, आप चित्-मात्र-स्वरूप हैं, और यह जगत आपसे भिन्न है ही नहीं; तो फिर किसके लिए, कैसे, कहाँ यह त्यागने-पकड़ने की कल्पना उठे? जो एक है, अव्यय है, शान्त और निर्मल चिदाकाश है, उस आप में जन्म कहाँ, कर्म कहाँ, अहंकार कहाँ? और इस अभेद को वे सोने के दृष्टान्त से दिखा देते हैं, आप जो भी देखते हैं, वहाँ अकेले आप ही प्रतिभासित होते हैं; क्या कभी सोने से कंगन, बाजूबन्द और पायल अलग दिखाई देते हैं?
श्लोक 12 · 13 · 14
तात चिन्मात्ररूपोऽसि न ते भिन्नमिदं जगत्।
अतः कस्य कथं कुत्र हेयोपादेयकल्पना॥
एकस्मिन्नव्यये शान्ते चिदाकाशेऽमले त्वयि।
कुतो जन्म कुतो कर्म कुतोऽहंकार एव च॥
यत्त्वं पश्यसि तत्रैकस्त्वमेव प्रतिभाससे।
किं पृथग्भासते स्वर्णात्कटकाङ्गदनूपुरम्॥
अब वे पहचान की सारी रेखाएँ मिटा देने को कहते हैं। यह मैं हूँ, यह मैं नहीं, इस विभाजन को छोड़ दीजिए; सब आत्मा ही है, ऐसा निश्चय कर के, संकल्प-रहित हो कर सुखी हो जाइए। यह विश्व तो आपके ही अज्ञान से प्रतीत होता है, परमार्थतः आप अकेले हैं; आपसे अलग न कोई संसारी है, न कोई असंसारी। और जिसे यह निश्चय हो गया कि यह सारा विश्व भ्रान्ति-मात्र है, कुछ है ही नहीं, वह वासना-रहित, स्फूर्ति-मात्र पुरुष बाहर से ऐसा शान्त दिखता है मानो वहाँ कुछ हो ही न।
श्लोक 15 · 16 · 17
अयं सोऽहमयं नाहं विभागमिति सन्त्यज।
सर्वमात्मेति निश्चित्य निःसङ्कल्पः सुखी भव॥
तवैवाज्ञानतो विश्वं त्वमेकः परमार्थतः।
त्वत्तोऽन्यो नास्ति संसारी नासंसारी च कश्चन॥
भ्रान्तिमात्रमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी।
निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिव शाम्यति॥
अन्त की ओर अष्टावक्र तीनों कालों को एक में बाँध देते हैं। इस संसार-समुद्र में एक ही था, एक ही है, और एक ही रहेगा; आपका न कोई बन्धन है, न कोई मोक्ष; जो करना था सब हो चुका, अब कृतकृत्य हो कर सुख से चलिए। फिर वे मन की दो हलचलों पर उँगली रखते हैं, हे चिन्मय, संकल्प और विकल्प से चित्त को क्षुब्ध मत कीजिए; उपशान्त हो कर, अपने आनन्द-स्वरूप आत्मा में सुख से ठहर जाइए। और अन्तिम श्लोक में वे सबसे साहसी बात कह देते हैं, ध्यान को भी छोड़ दीजिए, हृदय में कुछ भी धारण मत कीजिए; आप तो आत्मा हैं, मुक्त ही हैं, अब विचार कर के और करेंगे ही क्या? यहीं पन्द्रहवाँ प्रकरण विचार से आगे ले जा कर ठहर जाता है।
श्लोक 18 · 19 · 20
एक एव भवाम्भोधावासीदस्ति भविष्यति।
न ते बन्धोऽस्ति मोक्षो वा कृत्यकृत्यः सुखं चर॥
मा सङ्कल्पविकल्पाभ्यां चित्तं क्षोभय चिन्मय।
उपशाम्य सुखं तिष्ठ स्वात्मन्यानन्दविग्रहे॥
त्यजैव ध्यानं सर्वत्र मा किञ्चिद् हृदि धारय।
आत्मा त्वं मुक्त एवासि किं विमृश्य करिष्यसि॥