सार: ग्यारहवें अध्याय के उस विराट दर्शन के बाद अर्जुन के मन में एक सहज सवाल उठता है, भगवान तक पहुँचने के लिए उन्हें रूप-समेत भजें, या निराकार मानकर? कृष्ण का उत्तर सीधा और करुणामय है। दोनों रास्ते उन तक पहुँचते हैं, पर देह में बँधे साधारण मनुष्य के लिए प्रेम-भरा साकार रास्ता कहीं सरल है। फिर वे उन गुणों की झाँकी देते हैं, जो किसी भक्त को उन्हें प्रिय बना देते हैं।
अर्जुन का सवाल
पिछले अध्याय में अर्जुन वह विराट रूप देख चुके थे, जिसे देखकर मन डर से भर गया था। अब उनके भीतर एक बहुत सहज सवाल उठा कि रोज़ की साधना में किसे थामें। वह भरा-पूरा, स्नेह करने वाला रूप, जिससे बात की जा सकती है, हाथ जोड़े जा सकते हैं, या वह निराकार सत्य, जिसका न कोई आकार है, न ठिकाना।
अर्जुन ने पूछा, “जो भक्त आप जैसे साकार रूप में मन लगाकर आपकी उपासना करते हैं, और जो उस अविनाशी निराकार ब्रह्म की उपासना करते हैं, इन दोनों में योग की दृष्टि से कौन बढ़कर है?”
कृष्ण का उत्तर किसी ऊँची दार्शनिक बहस में नहीं गया। वे बड़े व्यावहारिक ढंग से बोले, “जो मुझमें मन जमाकर, श्रद्धा के साथ मेरे रूप की उपासना करते हैं, मैं उन्हें सबसे युक्त मानता हूँ।”
निराकार का कठिन रास्ता
फिर उन्होंने एक बात खोलकर कही, जो बहुतों के अपने अनुभव की है। जो लोग उस अव्यक्त, अचिन्त्य, निराकार ब्रह्म की उपासना करते हैं, वे भी अंत में उन्हीं तक पहुँचते हैं। पर वह राह अधिक क्लेश भरी है, क्योंकि देह रखते हुए निराकार पर मन टिकाना बहुत कठिन काम है। जिसके पास हाथ हैं, आँख है, मन है और भाव है, उसके लिए एक रूप, एक नाम, एक चेहरा सहज सहारा बन जाता है।
इसलिए कृष्ण एक सीढ़ी-दर-सीढ़ी अभ्यास बताते हैं। पहले तो अपना सारा मन मुझमें लगा दीजिए। यदि यह अभी न बने, तो अभ्यास-योग से, बार-बार लौट-लौटकर, मुझ तक आने की कोशिश कीजिए। यदि यह भी कठिन लगे, तो अपने सब कर्म मेरे लिए कीजिए। और यदि यह भी न सधे, तो कम-से-कम अपने कर्मों के फल की चिंता छोड़ दीजिए, मन अपने-आप शान्त होने लगेगा।
प्रिय भक्त के लक्षण
इसके बाद यह अध्याय अपने सबसे सुंदर हिस्से में पहुँचता है। कृष्ण एक-एक करके उन गुणों को गिनाते हैं, जो किसी को उनका प्रिय बना देते हैं। यह गिनती जैसे भक्त के स्वभाव का पूरा चित्र खींच देती है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
“जो किसी प्राणी से द्वेष नहीं रखता, सबके प्रति मित्रता और करुणा रखता है, ममता और अहंकार से मुक्त है, सुख और दुख में समान रहता है, और क्षमा करना जानता है।” ऐसा भक्त, जो सदा संतुष्ट रहता है, संयमी है, दृढ़ निश्चय वाला है, और अपना मन तथा बुद्धि उन्हीं को सौंप चुका है, कृष्ण कहते हैं कि वही मुझे प्रिय है।
फिर एक और कसौटी आती है, जिसे बाहर से भी नापा जा सकता है।
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥
“जिससे किसी को उद्वेग नहीं होता, और जो स्वयं भी किसी से उद्विग्न नहीं होता, जो हर्ष, ईर्ष्या, भय और घबराहट से छूट चुका है, वह मुझे प्रिय है।” आपकी भक्ति का एक प्रमाण यह भी है कि आपके पास बैठकर दूसरों को कैसा लगता है। जो न किसी को दुख दे, न स्वयं दुखी हो, उसके भीतर का ठहराव अपने-आप बोलने लगता है।
कृष्ण गिनते जाते हैं। वह भक्त जो किसी वस्तु की चाह नहीं रखता, भीतर-बाहर से पवित्र है, काम में निपुण पर फल से उदासीन है, चिंता से मुक्त है, जो न बहुत हर्षित होता है न किसी से घृणा करता है, जो न शोक करता है न कामना, जो निंदा और स्तुति को एक-सा लेता है, सर्दी-गर्मी, सुख-दुख और मान-अपमान में समान रहता है, और जहाँ रह जाए वहीं संतुष्ट हो जाता है। ऐसा स्थिर मन वाला प्रेमी उन्हें अत्यंत प्रिय है।
ध्यान देने की बात यह है कि इस पूरी सूची में कहीं किसी बड़े चमत्कार या कठोर तप की माँग नहीं है। कृष्ण कोई असंभव शर्त नहीं रख रहे। वे बस एक ऐसे इंसान का चित्र खींच रहे हैं, जिसका भीतर ठंडा है, जो किसी से बैर नहीं रखता, और जिसका मन उन्हीं की ओर झुका रहता है। यही स्वभाव, धीरे-धीरे, अपने-आप भक्ति बन जाता है।
और अंत में सब समेटते हुए कृष्ण कहते हैं कि जो इस धर्म-रूपी अमृत का, इसी श्रद्धा के साथ, उन्हें ही परम मानकर पान करते हैं, वे भक्त उन्हें सबसे अधिक प्रिय हैं। यही इस छोटे-से अध्याय का समापन-सूत्र है।
सार
एक वाक्य में कहें तो, भक्ति का रास्ता इसलिए सरल है कि उसमें अपने-आप को समझना नहीं, बस सौंप देना है। और सच्चा भक्त वही है, जो किसी को दुखी न करे और स्वयं भी किसी से दुखी न हो। गीता का यह सबसे छोटा अध्याय है, पर इसकी एक-एक पंक्ति जीवन भर साथ चलने लायक है। सदियों बाद दक्षिण के आचार्य रामानुज ने इसी अध्याय को अपने भक्ति-दर्शन का केंद्र बनाया, और भारत का बहुत सारा भक्ति-गीत इन्हीं पंक्तियों की गोद में पला।
आधार: श्रीमद्भगवद्गीता