चूड़ाला

कथा · 06

चूड़ाला: रानी जो गुरु बनी

पति को सीधे सिखा नहीं सकीं, तो रानी ने एक नौजवान ब्राह्मण-बालक का रूप धरा और वर्षों उसी रूप में पति को राह दिखाई। और बीच में एक बार एक स्त्री का रूप धरकर उसकी परीक्षा भी ली।

सरयू पर भोर थी। पानी अब भी रात की काली रंगत में था और ऊपर आसमान हलका नीला होने लगा था। दूर पहाड़ों पर कहीं सूरज की पहली रेखा फूट रही थी। किनारे पर एक स्त्री अपने पति के लिए स्नान-कपड़े धो रही थी, और उसके पटकने की आवाज़ नदी की धीमी लय में मिलती जाती थी।

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राम बहुत देर से एक ही पत्थर पर बैठे थे। उन्होंने पानी की ओर देखा, फिर वसिष्ठ की ओर मुड़े – “गुरुदेव, क्या कोई स्त्री किसी पुरुष को सिखा सकती है?”

वसिष्ठ ने राम को देखा। उनकी आँखों में पहले हलकी हैरानी आई, फिर एक हँसी; यह प्रश्न उन्होंने सोचा नहीं था कि राम पूछेंगे।

“क्यों पूछ रहे हो?”

राम ने पानी की ओर देखते हुए कहा – “कल माँ कौसल्या एक बात पिता से कह रही थीं, और मैंने अनजाने में सुन ली। माँ कह रही थीं, महाराज, यह जो हम कर रहे हैं वो ग़लत है। पिता हँसे और बोले, कौसल्या, आप राजनीति नहीं समझतीं। माँ कुछ नहीं बोलीं। पर उनकी आँख में जो थकान थी, वो मैंने पहले नहीं देखी थी; जैसे यह बात पहली बार नहीं हुई हो।

“मैं रात भर सोचता रहा। माँ बहुत कुछ जानती हैं, पर वो जानती हैं कि अगर वो कहेंगी तो पिता सुनेंगे नहीं, इसलिए बहुत बरस से चुप रहती हैं। यह बात मुझे बेचैन कर रही है। क्या यह हमेशा से ऐसा है? क्या एक पुरुष कभी अपनी पत्नी से सच में सीखता है?”

वसिष्ठ ने अपनी हथेली पानी पर रखी; पानी ठंडा था।

“राम, यह प्रश्न जिसने पूछा है, वो ख़ुद उसका उत्तर है। तुम पूछ रहे हो, तो तुम सुनोगे भी। पर बहुत पुरुष इस प्रश्न को कभी पूछते ही नहीं, और जो नहीं पूछते, उनके लिए स्त्री की बुद्धि एक बन्द किताब रहती है।

“मैं तुम्हें एक कथा सुनाता हूँ। एक रानी थीं, नाम चूड़ाला, और उनके पति का नाम शिखिध्वज। दोनों पन्द्रह बरस से एक-दूसरे से प्रेम करते थे और दोनों ज्ञान के मार्ग पर थे। फिर एक दिन रानी को वो मिल गया जो वो ढूँढ रही थीं, पर पति को नहीं मिला। और रानी को अपने पति को सिखाने में अठारह बरस लगे। जो रास्ता उन्होंने चुना, वो शास्त्र में कहीं और नहीं है। यह सुनो।”

राम बैठ गए, पीठ एक पत्थर से टिकाई।

दोनों एक साथ

चूड़ाला सुन्दर थीं, पर सुन्दरता उनकी असली पहचान नहीं थी। उनकी पहचान उनकी आँखों में थी; उन आँखों में एक तेज़ था जो देखने वाले को रुकने पर मजबूर कर देता था। उनका माथा खुला रहता, बाल पीछे जूड़े में बँधे, कानों में सोने के दो छोटे फूल। उनकी चाल धीमी थी, पर हर क़दम तय। जब वो किसी से बात करतीं तो उनकी आँखें कुछ नरम हो जातीं, जैसे सुनते समय वो अपने भीतर कुछ रख रही हों।

शिखिध्वज भी सुन्दर थे; ऊँचे, गठीली देह वाले, दाढ़ी कटी हुई। उनकी आदत थी कि बात करते समय वो अपने दाहिने हाथ की उँगलियों से बायें हाथ की कलाई पर रखी कड़ी छूते रहते। यह उनके सोचने का स्वर था। वो धीरे बोलते थे, पर उनके भीतर एक तीव्र अधीरता रहती थी जिसे वो ख़ुद से छिपाते थे। एक बार चूड़ाला ने रात को देखा था कि वो सोते समय अपनी मुट्ठी बाँधते, फिर खोलते थे; यह उनके देह की भाषा थी जो उनके मुँह से नहीं निकलती थी।

दोनों राजा-रानी थे। राज्य अच्छा था, प्रजा सुखी, कोई बड़ा संकट नहीं। पर दोनों के भीतर एक ही प्यास थी।


पन्द्रह बरस की शादी के बाद की एक रात की बात है।

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वो दोनों राजमहल की छत पर बैठे थे, मध्य पहर। नीचे नगर के हज़ारों दीप जल रहे थे, और ऊपर तारे उनसे भी ज़्यादा। हवा हलकी थी, पर उसमें रात की ठंडक थी। चूड़ाला ने अपने कन्धों पर एक ओढ़नी रखी। बहुत देर तक कोई नहीं बोला; दोनों के बीच यह चुप्पी आराम की थी।

फिर चूड़ाला बोलीं – “महाराज, मुझे लगता है हम जो हैं, वो यह नहीं है।”

शिखिध्वज ने उन्हें देखा, फिर अपनी कलाई पर रखी कड़ी छुई – “क्या मतलब, चूड़ाला?”

“मतलब, हम राजा-रानी हैं, पति-पत्नी हैं, हमारे राज्य हैं, हमारे काम हैं। पर यह सब हमारी बाहरी पहचान है। भीतर कोई और है, जिसे हम जानते नहीं।”

शिखिध्वज ने उनका हाथ छुआ; उनकी हथेली ओढ़नी की सिलाई के नीचे ठंडी थी।

“आप क्या कहना चाहती हैं?”

“मैं कहना चाहती हूँ कि हम दोनों मिलकर इस भीतर वाले को ढूँढें। पुस्तकें पढ़ें, गुरुओं के पास जाएँ, ध्यान करें। शायद हमें वो मिल जाए जिसकी प्यास हमारे भीतर है।”

शिखिध्वज की मुट्ठी बँधी, फिर खुली, फिर बँधी।

“आपके मन में यह बात कब आई?”

“बहुत बरस से है, पर आज ही बाहर निकली।”

“क्यों आज?”

चूड़ाला ने सिर एक ओर किया – “महाराज, आज दोपहर मैं एक प्रजा-स्त्री से मिली। वो अपने पुत्र की बीमारी के लिए राजवैद्य के पास आई थी। मैंने उसका चेहरा देखा। उसके पुत्र को बचाया जा सकता था, पर वो स्त्री बीच में ही समझ गई कि वो बच नहीं पाएगा। उसका चेहरा बदला, पर वो रोई नहीं। उसने अपना देह सीधा किया, राजवैद्य को सिर झुकाया, और चली गई।

“मैंने वो चेहरा रात भर देखा। उसमें कुछ स्थिर था, शायद हार, शायद कुछ और। पर वो जो भी था, वो हमारी सब चीज़ों से बड़ा था।

“और मुझे लगा, अगर हम राजा-रानी होने में अपनी पहचान ढूँढते रहें और कल वो छिन जाए, तो हमारे पास क्या रहेगा? क्या हम भी सिर झुकाकर चले जाएँगे, या हम बिखर जाएँगे? मैं चाहती हूँ कि हमारे पास कुछ ऐसा हो जो छिन न सके।”

शिखिध्वज ने उनका हाथ अपने दोनों हाथों में लिया – “आप ठीक कह रही हैं, चूड़ाला।”


उस रात के बाद दोनों ने एक नया जीवन शुरू किया।

दिन में राज-काज, शाम को पाठ। उन्होंने ब्राह्मणों को बुलाया, पुराने ऋषियों के पास सन्देश भेजे, और पुस्तकालय में जो भी मिला, सब निकाला। पहले उन्होंने वेदान्त की बातें पढ़ीं, फिर योग-सूत्र, फिर पुराने उपनिषद्, फिर भगवद्गीता पर भाष्य।

Rich painterly classical-Indian color illustration of Chudala and Shikhidhvaja seated close on a reed mat in a small lamplit chamber, two oil lamps and an open palm-leaf manuscript between them, one reading aloud while the other listens, scrolls of Vedanta scripture nearby; dignified, no text, no watermark

हर रात वो एक छोटे कक्ष में बैठते; दो दीप, एक चटाई, और बीच में एक पुस्तक। कभी चूड़ाला पढ़तीं और शिखिध्वज सुनते, कभी शिखिध्वज पढ़ते और चूड़ाला सुनतीं। जो बात आती, उस पर दोनों बात करते।

एक रात उन्होंने इसा उपनिषद् पढ़ा।

“तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः।”

शिखिध्वज ने रुककर पढ़ा – “त्याग से भोगो। क्या मतलब?” फिर वो ख़ुद ही सोचने लगे – “शायद यह मतलब है कि जो हमें पकड़कर मिलता है, वो नहीं रहता; जो हम छोड़कर लेते हैं, वो असली होता है।”

चूड़ाला बोलीं – “महाराज, यह बात अच्छी है, पर मुझे लगता है यह कुछ और भी है।”

“क्या?”

“शायद यह मतलब है कि भोगने वाला और भोगने की चीज़ अलग नहीं। जब हम ‘मैं भोग रहा हूँ’ से अलग होते हैं, तब भोग का असली रूप दिखता है।”

शिखिध्वज ने उन्हें देखा – “चूड़ाला, आप बहुत गहरी बात करती हैं।”

“महाराज, यह बात मेरी नहीं, यह बात इस श्लोक में है। मैंने बस उसे थोड़ा खोला।”


तीन बरस बीते, फिर पाँच, फिर आठ। दोनों एक साथ चलते रहे; चूड़ाला कोई बात पढ़तीं तो शिखिध्वज को बतातीं, शिखिध्वज कोई बात पढ़ते तो चूड़ाला को।

पर एक बात चूड़ाला ने ख़ुद से कहनी शुरू की थी – मेरी समझ अलग है, धीमी नहीं; शायद कुछ बातें मुझे जल्दी मिल रही हैं। यह बात उन्होंने शिखिध्वज को नहीं बताई, क्योंकि उन्हें लगता था कि कहने पर वो इसे एक दिखावा समझेंगे।

जो जागीं

एक रात चूड़ाला अपने कक्ष में अकेली बैठी थीं। शिखिध्वज दूसरे कक्ष में किसी मन्त्री से बात कर रहे थे। चूड़ाला के सामने एक पुरानी पुस्तक खुली थी, और उस दिन उन्होंने एक श्लोक पढ़ा था कि जो देख रहा है, वो ख़ुद को देख नहीं सकता; और जो ख़ुद को नहीं देख सकता, वो ख़ुद को कभी ख़त्म भी नहीं कर सकता।

उन्होंने इस बात को अपने भीतर रखा और आँखें बन्द कीं। जो देख रहा है, वो मैं हूँ; पर मैं ख़ुद को कैसे देखूँ? उन्होंने अपने भीतर मुड़ने की कोशिश की। मन था, विचार थे; मन को वो देख सकती थीं, पर देखने वाला कौन था? अगर देखने वाला और मन एक हों, तो देखने वाला कैसे देखे? देखने वाला और मन एक नहीं, देखने वाला अलग है।

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और उस क्षण कुछ हुआ। चूड़ाला के भीतर एक प्रकाश था जो अब तक छिपा था; अब वो खुला। वो प्रकाश हर विचार से पहले था, हर भावना से पहले, हर देह की संवेदना से पहले। वो प्रकाश ही चूड़ाला थीं। देह नहीं, मन नहीं, भावना नहीं, बस वो प्रकाश।

और एक अजीब बात हुई। वो प्रकाश जो उनके भीतर था, वो उनके बाहर भी था – दीवारों के पीछे, तारों के पीछे, उस मन्त्री की आवाज़ के पीछे जो दूसरे कक्ष से आ रही थी, हर जगह। और हर जगह वो एक ही था।


चूड़ाला कुछ देर हिल नहीं पाईं। उनकी साँस बहुत धीमी हो गई थी और उनके देह में एक हलकी गरमी थी, पर वो सुखद थी, बीमारी की नहीं। जब उन्होंने आँखें खोलीं, तो वो वही चूड़ाला नहीं थीं। बाहर से सब वही था, साड़ी, बाल, चाल; पर भीतर एक भारी हलकापन था, एक ऐसी स्थिरता जो उन्हें पहले मालूम नहीं थी।

उन्होंने पुस्तक बन्द की, दीप बुझाया, बिस्तर पर लेटीं। नींद नहीं आ रही थी, पर नींद की कमी की कोई बेचैनी भी नहीं थी; वो बस जागी हुई थीं, और जागे हुए होने में एक रस था। उन्होंने सोचा, यह बात मुझे शिखिध्वज को बतानी है।

जो रुक गए

सुबह दोनों राज-कक्ष से बाहर आए और नाश्ता खाने जा रहे थे। चूड़ाला ने उनकी कलाई पकड़ी – “महाराज, मुझे कल रात एक बात मिल गई।”

शिखिध्वज एक पल को रुके, उनकी आँखों में जिज्ञासा – “क्या?”

“वो भीतर वाला, जिसे हम ढूँढ रहे थे।”

शिखिध्वज की कलाई पर हाथ अपने आप कड़ी पर पहुँचा – “अच्छा? बताइए।”


चूड़ाला ने उन्हें पूरी बात बताई – श्लोक की बात, अपने भीतर मुड़ने की बात, प्रकाश की बात, और यह कि वो प्रकाश भीतर और बाहर एक ही था। शिखिध्वज ने पूरा सुना; नाश्ता ठंडा हो गया। बाहर सूरज की रोशनी जाली से छनकर आ रही थी और उनके चेहरे पर उसकी एक हलकी लाली थी।

जब चूड़ाला ख़त्म हुईं, शिखिध्वज ने पूछा – “आप ऐसा क्यों कह रही हैं कि आपको कुछ मिल गया?”

चूड़ाला ने उन्हें देखा – “क्योंकि मिल गया, महाराज।”

शिखिध्वज की हँसी में अब कुछ और छुपा था, मित्रता से अलग कोई चीज़ – “देखिए, चूड़ाला, यह बात पुरुषों के तप से मिलती है, बहुत बरस की तपस्या से। बड़े-बड़े ऋषि जीवन भर लगाते हैं और फिर भी कई बार उन्हें नहीं मिलती। हम पन्द्रह बरस से बस पुस्तकें पढ़ रहे हैं, कोई बड़ी तपस्या नहीं की, मैंने भी नहीं। तो आपको कैसे मिल गया?”

चूड़ाला ने सिर एक ओर किया – “महाराज, मैं समझती नहीं। आप क्या कहना चाहते हैं?”

“मैं कह रहा हूँ कि शायद आपने पढ़ाई का कोई असर अपनी कल्पना में लिया है। यह वो नहीं है जो हम ढूँढ रहे हैं।”

चूड़ाला कुछ देर चुप रहीं। बाहर की रोशनी अब उनके चेहरे से चली गई थी, एक बादल पास से गुज़रा था।

“महाराज, क्या आप यह इसलिए कह रहे हैं कि मैं स्त्री हूँ?”

शिखिध्वज एक पल को चौंके, उनकी कलाई पर हाथ रुक गया – “नहीं, चूड़ाला। मैं यह इसलिए कह रहा हूँ कि बात बड़ी है। हम दोनों को इसमें और समय देना होगा। आपको अभी जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए।”

चूड़ाला ने बहुत धीरे से सिर हिलाया।


उस दिन उन्होंने और कुछ नहीं कहा। पर भीतर कुछ हो गया था; उन्हें पहली बार लगा कि शिखिध्वज और वो एक स्थान पर नहीं हैं, और शायद वो स्थान कभी एक नहीं होंगे।

रात को सोते समय शिखिध्वज ने उनका हाथ अपनी ओर खींचा – “चूड़ाला, नाराज़ हैं? मैंने कोई ग़लत बात तो नहीं कह दी?”

चूड़ाला ने एक पल सोचा, फिर बोलीं – “महाराज, आपने जो कहा, वो आपके अनुसार सही था; पर मेरे अनुसार वो नहीं था। अभी इतना ही।”

शिखिध्वज दूसरी ओर मुड़ गए और उनकी साँस धीरे-धीरे सोने वाले की हो गई। चूड़ाला बहुत देर तक जागती रहीं।


चूड़ाला ने यह बात फिर कभी नहीं उठाई। बहुत दिन बीते और वो वैसी ही रहीं; पाठ करती रहीं, पति के साथ बैठती रहीं, राज-काज सम्हालती रहीं। पर भीतर एक चुप शान्ति थी, जिसका कोई कारण उनके बाहर नहीं था।


शिखिध्वज ने इसे महसूस किया। पहले उन्होंने ध्यान नहीं दिया था, पर एक रात उन्होंने पूछा। वो दोनों रात के भोजन के बाद बगीचे में टहल रहे थे; बगीचे में चमेली की गाढ़ी महक थी।

“चूड़ाला, आप कुछ बदल गई हैं।”

“मैं?”

“हाँ। आपकी आँखों में पहले एक प्यास थी, अब वो नहीं है।”

चूड़ाला रुक गईं। उन्होंने शिखिध्वज को देखा; चन्द्रमा अब पूरा था और उसकी रोशनी में शिखिध्वज की दाढ़ी और सफ़ेद दिख रही थी।

“महाराज, यह वही बात है जो मैंने आपको बताई थी। आप मानने को तैयार नहीं थे।”

शिखिध्वज कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “चूड़ाला, अगर सच में आपको कुछ मिला है, तो मुझे ख़ुशी है। पर शायद यह एक स्त्री का तरीक़ा है; पुरुष का तरीक़ा अलग है। मुझे अभी और तप करना होगा।”

चूड़ाला ने सिर हिलाया और कुछ नहीं कहा। पर उनके भीतर एक हलकी पीड़ा उठी, हर उस स्त्री के लिए जो किसी पुरुष के साथ खड़ी हो और जिसकी बात उसका पति न सुने; और एक करुणा शिखिध्वज के लिए, जो अपनी सीमा के भीतर ईमानदार थे, पर अपनी सीमा को देख नहीं पा रहे थे।


रात को अपने कक्ष में चूड़ाला ने पहली बार एक नया निर्णय किया – मैं इन्हें सिखाऊँगी, पर अब जल्दी नहीं करूँगी। मैं इन्तज़ार करूँगी; जब समय आएगा, तब रास्ता मिलेगा।

अकेला तप

शिखिध्वज ने अकेले तप शुरू किया। पहले उन्होंने एक छोटा कक्ष चुना, जिसमें एक चटाई, एक मटका पानी और एक दीप था। वो हर सुबह वहाँ बैठते – आँखें बन्द, मन्त्र, प्राणायाम। फिर उन्होंने भोजन कम किया, एक समय का, फिर एक पहर का; और सोना भी कम किया, तीन पहर के बजाय दो। उनका देह पतला होने लगा और उनके चेहरे पर एक थकान उतर आई।


चूड़ाला यह देखती रहीं। उन्होंने न रोका, न कुछ कहा; पर भीतर उन्हें पता था कि शिखिध्वज ग़लत दिशा में जा रहे हैं। एक रात उन्होंने उनके हाथ छुए; हाथ ठंडे थे।

“महाराज, आप कुछ खा लीजिए।”

“नहीं।”

“क्यों नहीं?”

“भोजन देह को मज़बूत करता है, पर तप के लिए देह को कमज़ोर होना है। तब मन का बल बढ़ता है।”

चूड़ाला एक पल चुप रहीं, फिर बोलीं – “महाराज, क्या आपको लगता है कि भोजन देह को मज़बूत करता है?”

“हाँ।”

“और देह की मज़बूती तप में बाधा है?”

“हाँ।”

“तो जब कोई ऋषि बहुत बरस का तप करता है, तो वो भूख से कैसे जीवित रहता है?”

शिखिध्वज एक पल रुके – “उसके पास कोई आन्तरिक शक्ति होती है।”

“और वो आन्तरिक शक्ति कहाँ से आती है?”

“उसकी तपस्या से।”

“और तपस्या के लिए क्या चाहिए?”

शिखिध्वज ने सोचा – “देह का होना।”

चूड़ाला बोलीं – “महाराज, तो जो देह को कमज़ोर करता है, वो तप को भी कमज़ोर करता है। यह एक चक्र है।”

शिखिध्वज माने नहीं – “चूड़ाला, यह बातें ऋषियों ने सिखाई हैं।”

“महाराज, ऋषियों ने और भी बहुत बातें सिखाई हैं। उन सब में जो ठीक है, वो आपको ख़ुद चुनना होगा।”

शिखिध्वज ने कुछ नहीं कहा, पर भोजन उन्होंने नहीं लिया।

बहुत दिन बीते। शिखिध्वज और कमज़ोर हुए, पर उन्हें कोई आन्तरिक खुलासा नहीं हुआ। एक रात उन्होंने चूड़ाला से कहा – “चूड़ाला, मैं राज्य छोड़ रहा हूँ।”

चूड़ाला रुकीं, उनकी हथेली अपने पल्लू पर रुक गई – “महाराज?”

“मैं जंगल जाऊँगा, अकेले, तपस्या के लिए। जब तक मुझे वो नहीं मिल जाता, मैं नहीं लौटूँगा।”

चूड़ाला ने हाथ बढ़ाकर शिखिध्वज की कलाई छुई; कलाई पतली थी।

“महाराज, आप जो चाहते हैं, वो जंगल में नहीं मिलेगा।”

“क्यों?”

“क्योंकि वो भीतर मिलता है, बाहर नहीं। आप जंगल जाएँगे, पर मन वही रहेगा। और मन ही ढूँढने वाला है। मन को बदलना है, जगह को नहीं।”

शिखिध्वज बोले – “चूड़ाला, आप समझ नहीं रही हैं। मुझे एकान्त चाहिए। राज-काज में मन व्यस्त रहता है; जंगल में वो शान्त होगा।”

चूड़ाला कुछ देर चुप रहीं – “महाराज, अगर यही आपका निर्णय है, तो ठीक है।”

“राज्य आप सम्हालेंगी?”

“हाँ।”

“धन्यवाद।”

चूड़ाला ने धीरे से कहा – “महाराज, एक बात। लौटिए। मैं प्रतीक्षा करूँगी।”

शिखिध्वज ने उन्हें देखा; उनकी आँखों में पहली बार कुछ ऐसा था जो ज्ञान नहीं, बस प्रेम था – “लौटूँगा।”


Rich painterly classical-Indian color illustration of King Shikhidhvaja in a plain ascetic wrap walking out of the palace gate at dawn carrying only a small seed-pouch, a kamandalu water-vessel and a simple cloth, having left his turban and royal signet behind; Chudala watching from the lit doorway, ministers gathered; dignified, no text, no watermark

अगली सुबह वो चले। पगड़ी छोड़ी, राजमुद्रिका छोड़ी; बस एक छोटी थैली में कुछ बीज, एक कमंडल, और एक सादी ओढ़नी ली। चूड़ाला उन्हें द्वार तक छोड़ने आईं। राज-दरबार में मन्त्री, सेनापति, सब इकट्ठा थे और सब हैरान थे।

शिखिध्वज ने एक मन्त्री से कहा – “राज्य अब महारानी का है। हर निर्णय उनका। मेरी प्रतीक्षा मत करना; जब मैं लौटूँगा, तब बात होगी।”

मन्त्री ने सिर झुकाया।

फिर शिखिध्वज चूड़ाला की ओर मुड़े। उन्होंने एक पल को उनका हाथ अपने हाथ में लिया – “चूड़ाला, क्या आप मुझसे नाराज़ हैं?”

“नहीं, महाराज। बस मुझे आपकी चिन्ता है।”

शिखिध्वज हँसे – “मेरी चिन्ता मत करिए। मैं ठीक रहूँगा।”

चूड़ाला ने उन्हें देर तक देखा – “महाराज, एक बात याद रखिएगा। जब आप थक जाएँ, जब आपको लगे कि कुछ नहीं हो रहा, तब मन की कोशिश छोड़ दीजिए। बस बैठिए, कुछ करिए मत। शायद तब कुछ खुले।”

शिखिध्वज ने सिर हिलाया, पर उनकी आँख में था कि वो यह बात नहीं सुन रहे। फिर वो चले।


चूड़ाला द्वार पर देर तक खड़ी रहीं। फिर उन्होंने पीछे मन्त्री की ओर देखा – “मन्त्री, राज-सभा बुलाइए। आज से राज्य का काम मेरे पास होगा।”

मन्त्री ने सिर झुकाया।

राज्य अकेली

Rich painterly classical-Indian color illustration of Queen Chudala enthroned alone in a great pillared hall, turbaned ministers seated and standing in a semicircle below her, a kneeling scribe presenting a palm-leaf petition, ornate oil lamps and daylit arched windows; a queen ruling with calm authority, dignified, no text, no watermark

चूड़ाला ने राज्य सम्हाला। पहले कुछ दिन मन्त्रियों में हलकी हिचक थी; महारानी ने पहले राज्य देखा था, पर पीछे से, और अब वो आगे थीं। पर जल्दी ही उन्होंने ध्यान दिया।

महारानी कोई निर्णय जल्दी नहीं लेती थीं। वो हर बात पूरी सुनतीं, फिर सोचतीं, फिर बोलतीं; और जो वो बोलतीं, उसमें कुछ ऐसा होता जो किसी और से सुना नहीं जा सकता था।


एक दिन एक प्रजा-स्त्री दरबार में आई; उसका पति लापता था। उसने कहा, मेरा पति राज्य के बाहर व्यापार पर गया था, पाँच महीने हुए, नहीं लौटा। मुझे लगता है उसे कुछ हुआ है। आप मेरे लिए कुछ कर सकती हैं?

मन्त्री ने कहा – “महारानी, यह राज्य के बाहर की बात है। हम क्या कर सकते हैं?”

चूड़ाला बोलीं – “मन्त्री, हम राज्य के बाहर अपने दूत भेज सकते हैं, पास के राज्यों से पूछ सकते हैं। यह स्त्री हमारी प्रजा है, इसका पति हमारे राज्य का व्यक्ति है। हम कोशिश करेंगे।”

मन्त्री ने सिर झुकाया, स्त्री ने भी।

स्त्री बोली – “महारानी, धन्यवाद।”

“मैं कोई बड़ा वादा नहीं कर सकती, पर हम कोशिश करेंगे। अगर वो जीवित है, तो हम उन्हें पाएँगे; अगर नहीं, तो हम आपको ख़बर देंगे, और राज्य की ओर से आपकी सहायता होगी।”

स्त्री एक पल चुप रही, फिर बोली – “महारानी, महाराज होते, तो शायद वो भी यही कहते। पर वो ऐसे नहीं कहते।”

चूड़ाला ने कहा – “महाराज अभी राज्य में नहीं हैं।”

“मुझे पता है।”

स्त्री चली गई।


ऐसे ही और भी निर्णय हुए। प्रजा को जल्दी पता चल गया कि महारानी अलग हैं। उनकी कठोरता मन्त्रियों जैसी नहीं थी, उनकी कठोरता न्याय की थी; और उनके न्याय में करुणा थी। ऐसे ही बरस बीते।


राज्य का काम पूरा होने के बाद, रात को चूड़ाला अपने उसी पुराने कक्ष में अकेली बैठतीं। वहाँ वो ध्यान करतीं, पर अब उनके लिए ध्यान कोई काम नहीं था; वो बस अपने उस प्रकाश में लौटतीं।

एक रात उन्हें एक विचार आया – मैं उन्हें देखना चाहती हूँ, पर वो दूर हैं, जंगल में; मैं कैसे देखूँ? उन्होंने अपने भीतर देखा और एक बात मालूम हुई – जो भीतर के प्रकाश में स्थिर है, उसके लिए दूरी कोई बाधा नहीं।

आकाश-यात्रा

चूड़ाला अपने आसन पर बैठीं। वो जानती थीं कि चेतना देह से अलग की जा सकती है; पुस्तकों में पढ़ा था, पर पढ़ने और करने में अन्तर था। उन्होंने आँखें बन्द कीं और साँस को देखा – साँस अन्दर, साँस बाहर, और बीच में चुप। उस चुप में वो देर तक रुकीं।


Rich painterly classical-Indian color illustration of Chudala in lotus posture on a moonlit palace terrace, a luminous translucent form of herself rising up from her seated body toward the night sky to fly over distant forest and hills, city lamps glowing below; sky-journey of consciousness, dignified, no text, no watermark

फिर उन्होंने अपनी चेतना को ऊपर की ओर खींचा। देह बैठा रहा, पर वो ऊपर थीं।

पहले वो कक्ष की छत पर थीं। नीचे उन्होंने अपना देह देखा – साड़ी का रंग, बालों का जूड़ा, कलाई पर एक चूड़ी। अपने ही देह को बाहर से देखना एक अजीब दृश्य था। फिर वो ऊपर बढ़ीं – कक्ष की छत पार की, महल की छत पार की, और नगर के ऊपर पहुँचीं। रात थी, नगर के दीप जल रहे थे, और चूड़ाला नीचे देख रही थीं। उनके भीतर एक हँसी उठी।


फिर वो उत्तर की ओर, जंगल की ओर बढ़ीं – बहुत दूर, बहुत तेज़ी से। उन्होंने पहाड़ पार किए, नदियाँ पार कीं, और आख़िर में एक जंगल पहुँचीं।


जंगल में एक बड़ा पेड़ था, और उसके नीचे एक आदमी बैठा था।


चूड़ाला उतरीं, पर उनके पाँव ज़मीन को नहीं छुए, क्योंकि उनका देह वहाँ नहीं था। वो पास गईं।


Rich painterly classical-Indian color illustration of the emaciated long-bearded ascetic Shikhidhvaja sitting beneath a great tree by a forest river, ribs showing, matted tangled hair, torn cloth, sunken eyes, a begging bowl and gourd vessels beside him; a translucent halo-form of Chudala silently watching unseen; dignified, no text, no watermark

शिखिध्वज एक पेड़ के नीचे बैठे थे। उनका देह बहुत पतला हो चुका था, दाढ़ी बहुत बढ़ी और उलझी हुई, बाल भी उलझे, आँखें भीतर धँसी हुई, और कपड़े फटे।

चूड़ाला ने उन्हें बहुत देर तक देखा। उनके भीतर एक प्रेम उठा, और एक दर्द भी – उनके पति इतना कठिन तप कर रहे थे, और जिसे ढूँढ रहे थे, वो उनके भीतर पहले से था।


चूड़ाला ने अपने हाथ बढ़ाए, पर वो छू नहीं सकती थीं। उन्होंने शिखिध्वज के चेहरे को पास से देखा; उनकी पलकें बन्द थीं, पर पलकों के नीचे आँखें हिल रही थीं, उनके होंठ हलके खुले थे और साँस उथली।

वो ध्यान में थे, पर ध्यान शान्त नहीं था; उनके भीतर एक हलचल थी।


चूड़ाला उठीं और वापस लौटीं।


जब उन्होंने अपने देह में लौटकर आँखें खोलीं, तो उनका माथा गीला था। बाहर अब भोर हो रही थी।

यह कई रात होता रहा। हर रात चूड़ाला अपनी चेतना से शिखिध्वज को देखने जातीं, और हर बार उन्हें वैसा ही पातीं – बैठे, ध्यान में, पर ज्ञान अब भी दूर। एक रात उन्होंने ध्यान दिया कि शिखिध्वज ने अपने देह पर मिट्टी पोत ली है, एक अजीब रिवाज, शायद किसी पुरानी पुस्तक में पढ़ा होगा।

चूड़ाला बोलीं – “महाराज, यह सब बेकार है। बात इन सब से नहीं होगी।” पर शिखिध्वज सुन नहीं सकते थे।


एक रात चूड़ाला ने सोचा – मुझे कुछ करना होगा। मेरे पति यहाँ अकेले बिना ज्ञान के मर रहे हैं; मैं उन्हें ऐसे नहीं छोड़ सकती। पर अगर मैं अपने रूप में जाऊँ, तो वो सुनेंगे नहीं; वो मुझे स्त्री की तरह, पत्नी की तरह देखेंगे। उन्होंने पहले एक बार मेरी बात नहीं सुनी, अब भी नहीं सुनेंगे। तो मुझे और रूप लेना होगा।


चूड़ाला अपने देह में लौटीं और बैठीं। बहुत देर तक सोचा, फिर एक निर्णय किया – मैं एक पुरुष का रूप लूँगी, एक युवक ब्राह्मण का। उसके साथ जाऊँगी। मेरा यह पति, जो स्त्री की बात नहीं सुनता, शायद एक युवा ब्राह्मण की सुने।

कुम्भ

चूड़ाला ने अपनी चेतना से एक रूप रचा। यह एक नया अनुभव था, उन्होंने पहले कभी ऐसा नहीं किया था; पर उनकी समझ अब इतनी थी कि वो अपनी कल्पना से एक देह रच सकती थीं। एक युवक, ब्राह्मण, पतला और ऊँचा; दाढ़ी अभी पूरी नहीं आई थी, बस एक हलकी रेखा; आँखें तेज़; आवाज़ हलकी, पर उसमें एक स्थिरता। नाम कुम्भ।


चूड़ाला ने आँखें बन्द कीं, अपना देह एक तरफ़ रखा, और अपनी चेतना से कुम्भ का देह बनाया। कुछ क्षण के लिए वो दोनों थीं – एक तरफ़ चूड़ाला का जिस्म, सोते जैसा; दूसरी तरफ़ कुम्भ का देह, खड़ा। फिर चूड़ाला की चेतना कुम्भ के देह में उतर गई।


कुम्भ ने अपनी हथेली देखी, पुरुष की हथेली, उँगलियाँ पतली पर मज़बूत। फिर उन्होंने अपने देह पर हाथ फेरा, पुरुष का देह; यह पहले अजीब लगा। फिर एक हँसी उठी – यह बस एक रूप है, मैं इसके भीतर वही हूँ।


Rich painterly classical-Indian color illustration of the young lean brahmin youth Kumbha (Chudala's assumed male form) in simple cloth with rudraksha beads and a tall staff, a faint first beard, walking out toward the mountains and forest carrying a small seed-pouch and kamandalu; dawn light, a thatched hut behind; dignified, no text, no watermark

कुम्भ अपने कक्ष से बाहर निकले, एक छोटी थैली में कुछ बीज, एक कमंडल और एक सादी ओढ़नी लेकर। राजमहल छोड़ा, पहले पहाड़ों की दिशा में चले, फिर जंगल की।

कुम्भ जंगल पहुँचे। शिखिध्वज वहीं, उसी पेड़ के नीचे बैठे थे।


कुम्भ थोड़ी दूरी पर रुके, अपने देह को सीधा किया, आवाज़ ठीक की, फिर पुकारा – “नमस्कार, ऋषिवर।”

शिखिध्वज ने आँख खोली। उन्होंने एक युवक को देखा – ब्राह्मण, साधारण कपड़े, पर आँखों में कुछ खास।

“नमस्कार।”

“मैं आ सकता हूँ?”

“आइए।”

कुम्भ पास आकर बैठे, दूरी रखकर।

“आपका नाम?”

“कुम्भ।”

“और मेरा नाम?”

“महाराज शिखिध्वज। आप ही हैं?”

बहुत बरस बाद अपना नाम सुनकर शिखिध्वज हलके मुस्कुराए – “अब महाराज नहीं, बस तपस्वी।”

“क्षमा।”

“नहीं, बात ठीक है। बोलिए, आप कैसे आए?”


कुम्भ ने कहा – “महाराज, मैंने आपकी ख्याति सुनी। बहुत बरस पहले आपने राज्य छोड़ा था और तब से जंगल में हैं। मैं स्वयं एक छोटा तपस्वी हूँ; मुझे लगा, आप जैसे महान से कुछ सीखूँ।”

शिखिध्वज ने उन्हें देखा – “कुम्भ, मेरी कोई ख्याति नहीं। मैं बस तप कर रहा हूँ।”

“महाराज, पर आपको कुछ मिला?”

शिखिध्वज एक पल चुप रहे, फिर बोले – “नहीं। अभी नहीं।”

“कितने बरस हुए?”

“पता नहीं। अठारह, बीस, शायद ज़्यादा।”

कुम्भ ने कहा – “महाराज, क्षमा करिएगा, पर एक प्रश्न पूछूँ?”

“पूछिए।”

“अगर बीस बरस का तप करके भी आपको कुछ नहीं मिला, तो क्या आपको लगता है कि कुछ और बीस बरस से मिल जाएगा?”

शिखिध्वज एक पल रुक गए। उन्होंने कुम्भ को बहुत देर तक देखा – “कुम्भ, यह प्रश्न…”

“महाराज, मैं बस सीखने आया हूँ। आपका अनुभव बड़ा है; मुझ छोटे का यह प्रश्न था।”


शिखिध्वज ने हलकी साँस ली – “कुम्भ, यह प्रश्न मेरे भीतर भी आता है, बहुत बार आता है, पर मैं इसे रोक देता हूँ।”

“क्यों?”

“क्योंकि अगर मैं इसे मानूँ, तो मेरी पूरी तपस्या व्यर्थ हो जाएगी।”

“महाराज, अगर वो ग़लत दिशा में है, तो वो व्यर्थ ही है। उसे न मानने से वो सार्थक नहीं हो जाएगी।”


शिखिध्वज बहुत देर तक चुप रहे, फिर बोले – “कुम्भ, मुझे कुछ बताइए। आप कह रहे हैं तप ग़लत दिशा में है। तो सही दिशा क्या है?”

कुम्भ ने कहा – “महाराज, बैठिए। मैं भी बैठूँ?”

“बैठिए।”


कुम्भ बैठे, और बात शुरू हुई।

धीमी शिक्षा

पहले दिन कुम्भ ज़्यादा नहीं बोले। उन्होंने शिखिध्वज से उनके दिन के बारे में पूछा – वो क्या खाते हैं, कब उठते हैं, कब ध्यान करते हैं। शिखिध्वज ने बताया, कुम्भ ने सुना। फिर कुम्भ ने एक बात कही – “महाराज, मन एक बहुत चालाक चीज़ है, वो हर रूप ले लेता है। आप उसे शान्त करना चाहते हैं, तो वो शान्त होने का रूप ले लेगा, पर अन्दर वैसा ही चलता रहेगा। आप उसे रोकना चाहते हैं, तो वो रुकने का रूप ले लेगा। पर मन को आप रोक नहीं सकते।”

“तो क्या करें?”

“बस उसे देखें। हर विचार को आते देखें, जाते देखें। ख़ुद को विचार न समझें; आप विचार के पीछे हैं।”


यह पहली शिक्षा थी। शिखिध्वज ने सुनी, पर पूरी तरह नहीं मानी।

कुम्भ ने कहा – “महाराज, मैं फिर आऊँगा। आप यह बात देखिए, फिर बात होगी।” वो उठे और पीछे मुड़कर देखा; शिखिध्वज वहीं बैठे थे, पर उनकी आँखों में अब कुछ था जो पहले नहीं था।


कुम्भ वापस लौटे। जंगल से बाहर निकलकर वो कुछ देर एक पेड़ के पीछे रुके। फिर उनके देह से चूड़ाला की चेतना निकली और चूड़ाला अपने देह में लौटीं। वो कक्ष में बैठीं और आँखें खोलीं; बाहर रात थी और एक दीप जल रहा था।

उन्होंने सोचा – मेरे पति को अब मुझसे सीखना होगा, पर एक स्त्री से नहीं; यह उनकी सीमा है। मेरे प्रेम की सीमा यह नहीं कि मैं उन्हें वो दिखाऊँ जो उन्हें चाहिए; मेरे प्रेम की सीमा यह है कि मैं उन्हें वो रूप दूँ जिसमें वो सीख सकें।

कुम्भ बार-बार आए। हर बार उन्होंने शिखिध्वज से कुछ बात की – पहले छोटी-छोटी बातें, फिर बड़ी।


एक दिन कुम्भ ने पूछा – “महाराज, आपको अपना राज्य क्यों छोड़ना पड़ा?”

“क्योंकि वहाँ मन व्यस्त रहता था।”

“और यहाँ?”

“यहाँ शान्ति है।”

कुम्भ ने कहा – “महाराज, माफ़ी, पर मैं एक बात देखता हूँ। आपने अपना देह छोड़ा नहीं है। आप अब भी खाते हैं, हालाँकि कम; अब भी सोते हैं, हालाँकि कम; अब भी जागते हैं। बस आपके खाने में, सोने में परिवर्तन हुआ है, पर मूल बात नहीं बदली। आप अब भी देह हैं, और आपका मन अब भी देह को सोच रहा है, बस अलग तरीक़े से।”

“तो?”

“तो जब तक आप अपने देह को ही ‘मैं’ समझते हैं, तब तक सच्ची तपस्या नहीं हुई। आपने एक चीज़ छोड़ी, राज्य; पर बहुत चीज़ें नहीं छोड़ीं।”

शिखिध्वज ने सिर हिलाया – “क्या छोड़ूँ?”

“महाराज, सब छोड़िए। इस पेड़ के नीचे जो भी है, सब छोड़िए। आसन छोड़िए, माला छोड़िए, कपड़े छोड़िए। हर वो चीज़ छोड़िए जो आपकी पहचान है।”

शिखिध्वज ने एक पल सोचा – “छोड़ता हूँ।”


जलाना

Rich painterly classical-Indian color illustration of Shikhidhvaja kneeling before a blazing fire of his own possessions, a blanket, an old prayer-mala, a small book and a kamandalu feeding the flames, while the young brahmin Kumbha stands watching at his shoulder; renunciation by fire under a great tree; dignified, no text, no watermark

शिखिध्वज ने अपना सब इकट्ठा किया – एक कमण्डल, बहुत बरस पुरानी एक माला, एक कम्बल, और एक छोटी पुस्तक जिसे वो बीच-बीच में पढ़ते थे। उन्होंने यह सब एक छोटे ढेर में रखा।

फिर आग जलाई।


आग ने पहले कम्बल पकड़ा, फिर माला, फिर पुस्तक, फिर कमण्डल। शिखिध्वज खड़े देख रहे थे, और कुम्भ पास खड़े थे।


जब आग धीमी हुई, तो शिखिध्वज ने राख देखी और अपने भीतर देखा। कुछ हलका तो हुआ था, पर वो प्यास वैसी ही थी।

“कुम्भ, मैंने जला दिया, पर कुछ नहीं बदला।”

“महाराज, क्योंकि आपने बाहर की चीज़ें जलाईं। भीतर वो चीज़ें अब भी हैं।”

“क्या मतलब?”

“माला आपके हाथ में थी, आपने जला दी; पर माला से जो आपका लगाव था, वो आपके मन में अब भी है। पुस्तक आपके पास थी, आपने जला दी; पर पुस्तक से जो आपका जुड़ाव था, वो आपके मन में अब भी है। असली त्याग चीज़ों का नहीं, चीज़ों से जुड़ाव का है।”

शिखिध्वज ने सिर हिलाया – “तो भीतर कैसे जलाऊँ?”

“महाराज, यह बात कठिन है, पर एक शुरुआत है। बैठिए। हर उस चीज़ को देखिए जो आपके मन में है, एक-एक करके; और हर एक से कहिए, तू मेरी नहीं, तू मुझ में है, पर तू मैं नहीं।”


शिखिध्वज ने यह करना शुरू किया, बहुत दिन तक। मन में सबसे पहले उनकी पगड़ी आई; उन्होंने उसे देखा और कहा, तू मेरी नहीं। फिर सिंहासन आया; कहा, तू मेरा नहीं। फिर सेना; कहा, तू मेरी नहीं। फिर राज्य; कहा, तू मेरा नहीं। फिर आईं चूड़ाला।


शिखिध्वज रुक गए। चूड़ाला का चेहरा उनके भीतर बहुत स्पष्ट था – उनकी हँसी, उनकी पन्द्रह बरस की बातें, उनकी आँखों का तेज़। क्या यह भी कहूँ?


उन्होंने कुम्भ से पूछा – “कुम्भ, क्या मुझे अपनी पत्नी को भी छोड़ना है?”

कुम्भ एक पल चुप रहे, फिर बोले – “महाराज, यह छोड़ने की बात नहीं, यह पहचानने की बात है। आपकी पत्नी आपकी नहीं हैं, वो अपनी हैं। आपने बहुत बरस उन्हें अपनी समझा; अब उन्हें उनकी रहने दीजिए।”

शिखिध्वज बहुत देर तक चुप रहे, फिर उन्होंने भीतर कहा – “चूड़ाला, तुम मेरी नहीं, तुम तुम्हारी हो।” और जैसे ही उन्होंने यह कहा, उनके भीतर कुछ खुला।

कुम्भ ने यह देखा; उनके होंठों के कोने पर एक मुस्कान आई, फिर चली गई – “महाराज, अब आगे।”


शिखिध्वज ने आगे किया – हर पहचान को देखा, हर लगाव को देखा, हर एक से कहा, तू मेरी नहीं। आख़िर में आया – “मैं। क्या मैं भी मेरा नहीं?”


शिखिध्वज एक पल रुक गए – “कुम्भ, मैं अपने आप को भी छोड़ूँ?”

कुम्भ बोले – “महाराज, यह अन्तिम बात है। यह जो ‘मैं’ आप अपने को समझते हैं, यह भी आप नहीं। आप इस ‘मैं’ के पीछे हैं। इसे देखिए, फिर आप जानेंगे कि आप कौन हैं।”


शिखिध्वज ने आँखें बन्द कीं और अपने भीतर ‘मैं’ को देखा। मैं कौन हूँ? देह? नहीं। मन? नहीं। विचार? नहीं। तो?


और उस क्षण कुछ खुला। शिखिध्वज के भीतर एक प्रकाश था जो हर ‘मैं’ से पहले था; वो प्रकाश ही वो थे। उनके भीतर एक हँसी उठी और उन्होंने आँखें खोलकर कुम्भ को देखा।


“कुम्भ, मुझे…”

“मिल गया?”

“हाँ।”

कुम्भ बोले – “महाराज, अब कुछ देर बैठिए। यह बात अपने भीतर बैठ जाए।”


शिखिध्वज बैठे। बहुत बरस की कोशिश, और अन्त में बस यह – मैं वो हूँ जो हर ‘मैं’ के पीछे है।

बहुत दिन, बहुत बातें। चूड़ाला ने अपनी पन्द्रह बरस की पढ़ाई और अपने भीतर के खुलासे का सब अनुभव कुम्भ के द्वारा शिखिध्वज को दिया, और शिखिध्वज सीखते रहे।

सीखों के बीच

मैं कह रहा हूँ “बहुत दिन” और “बहुत बातें,” राम, पर यह उतना आसान नहीं था जितना सुनने में लगता है।


एक दिन कुम्भ ने शिखिध्वज को पेड़ के नीचे बैठे देखा। उनकी आँखें खुली थीं, पर वो कहीं और थे। कुम्भ ने पूछा – “महाराज, क्या हुआ?”

“कुम्भ, मैं सोच रहा था।”

“क्या?”


शिखिध्वज बोले – “मैंने अपनी पगड़ी छोड़ दी, अपनी राजमुद्रिका, अपना सिंहासन, अपनी प्रजा, अपना नाम। पर एक चीज़ अभी तक नहीं छोड़ी।”

“क्या?”

“अपने सीखने को।”


कुम्भ ने पूछा – “महाराज, इसका क्या मतलब?”

“कुम्भ, मैं हर रोज़ सीख रहा हूँ। पर सीखना भी पकड़ने का एक रूप है। मैंने यह बात पकड़ ली है कि मुझे सीखना है, और मैं उसी पकड़ में बँधा हूँ।”


कुम्भ हलके मुस्कुराए – “महाराज, आप जल्दी देख रहे हैं।”

“क्या मतलब?”

“मतलब, बहुत साधक यह बात बहुत बाद में देखते हैं, और कुछ तो कभी नहीं देखते; वो सीखने के बँधन में फँसे रहते हैं। आपने पहले ही देख लिया।”


शिखिध्वज ने पूछा – “तो अब क्या?”

“महाराज, सीखना छोड़ दें।”

“पर कुम्भ, आप तो मुझे सिखा रहे हैं।”

“हाँ, मैं सिखाता हूँ और आप सीखते हैं। पर आप सीखने को न पकड़ें, बस होने दें। जब मैं कुछ कहूँ, तो सुनें; अगर बात भीतर बैठे, बैठ जाए, अगर न बैठे, छोड़ दें। कोई जल्दी नहीं।”


शिखिध्वज ने सिर हिलाया – “समझा।”

“अभी नहीं, पर समझेंगे।”


बहुत दिन बीते।


एक रात शिखिध्वज ने एक और बात देखी। वो ध्यान में बैठे थे, हमेशा की तरह, तभी मन में चूड़ाला का चेहरा आया।


पहले शिखिध्वज ने उसे हटाने की कोशिश की – “मैंने इसे छोड़ दिया, अब नहीं चाहिए।” पर चेहरा बना रहा। शिखिध्वज ने सोचा – मुझे यह क्यों दिख रहा है? मैंने तो भीतर कह दिया था।


अगले दिन कुम्भ आए और शिखिध्वज ने उन्हें यह बताया। कुम्भ कुछ देर चुप रहे, फिर बोले – “महाराज, एक बात। जब आपने अपनी पत्नी को छोड़ा, तो आपने क्या किया?”

“मैंने भीतर कहा, चूड़ाला, तुम मेरी नहीं।”

“और?”

“और मुझे लगा कि कुछ खुला।”

“पर?”

“पर अब उनका चेहरा वापस आ रहा है।”


कुम्भ बोले – “महाराज, यह स्वाभाविक है।”

“क्यों?”

“क्योंकि छोड़ना और मिटाना अलग हैं।”

शिखिध्वज ने कहा – “समझाइए।”


कुम्भ बैठ गए – “महाराज, छोड़ना मतलब, अब मैं इससे बँधा नहीं; पर यह नहीं मतलब कि यह मुझ में नहीं। आपकी पत्नी आपके मन में हैं और हमेशा रहेंगी। आपने पन्द्रह बरस उनके साथ बिताए, वो आपका हिस्सा हैं। पर अब वो आपको बाँधती नहीं। पहले अगर आप उन्हें सोचते, तो आपके भीतर एक हलचल होती; अब उन्हें सोचते हैं, पर हलचल नहीं होती। यही फ़र्क़ है।”


शिखिध्वज ने पूछा – “तो मैं उन्हें अब भी सोच सकता हूँ?”

“हाँ।”

“और यह ठीक है?”

“बिल्कुल।”


शिखिध्वज बोले – “कुम्भ, मुझे एक राहत हुई।”

“क्या?”

“मुझे लग रहा था कि मैंने अपनी पत्नी को छोड़कर ग़लत किया। पर अब समझ आया – मैंने उन्हें छोड़ा नहीं, मैंने बस बँधन छोड़ा।”


कुम्भ हलके मुस्कुराए।


बहुत दिन बीते।


एक दिन कुम्भ ने एक नई बात कही – “महाराज, मुझे एक बात बताइए। आपके लिए अब सबसे बड़ी बात क्या है?”

शिखिध्वज ने देर तक सोचा।


“कुम्भ, सबसे बड़ी बात अब यह है कि कुछ भी सबसे बड़ी बात नहीं।”


कुम्भ हँसे – “महाराज, आप तैयार हैं।”

“किस लिए?”


कुम्भ बोले – “पहले एक छोटी यात्रा।”

“यात्रा?”

“हाँ। मेरे साथ चलिए।”


जंगल

कुम्भ शिखिध्वज को पेड़ के नीचे से उठाकर ले गए। बहुत बरस में पहली बार शिखिध्वज पेड़ से दूर गए। पहले उनका देह काँपा और पैर पेड़ छोड़ने को तैयार नहीं थे; यह आदत बहुत बरस की थी।


कुम्भ ने कहा – “महाराज, पेड़ छोड़िए।”

“मुझे पेड़ की आदत हो गई।”

“हाँ। पर अगर आप पेड़ से बँधे हैं, तो आपने अपनी पगड़ी छोड़ी, सिंहासन छोड़ा, और एक पेड़ पकड़ लिया। पेड़ भी एक पहचान बन सकता है।”


शिखिध्वज ने पेड़ को एक बार छुआ – “धन्यवाद, मित्र।” फिर वो आगे चले।


दोनों जंगल में चले।

बहुत बरस में पहली बार शिखिध्वज ने जंगल को सच में देखा। पहले वो जंगल को बस अपने आसपास का स्थान समझते थे – पेड़, पत्तियाँ, हवा। अब वो हर पेड़ को अलग देखते, हर पेड़ की अपनी कथा।


कुम्भ ने एक पेड़ की ओर इशारा किया – “महाराज, यह पेड़ देखिए।”

शिखिध्वज ने देखा। पेड़ बहुत बूढ़ा था, उसकी छाल टूटी हुई, डालियाँ कुछ सूखी और कुछ हरी।

“यह पेड़ क्या?”

“महाराज, यह पेड़ बहुत बरस से यहाँ है। यह पैदा हुआ, बढ़ा, बूढ़ा हुआ, पर इसने कभी अपनी पहचान नहीं माँगी। यह बस पेड़ है। न इसे शिकायत है, न गर्व। यह तप का सबसे शुद्ध रूप है।”


शिखिध्वज ने सिर हिलाया, और वो आगे चले।


आगे एक छोटी नदी थी। कुम्भ ने उसकी ओर इशारा किया – “महाराज, नदी देखिए।”

शिखिध्वज ने देखा। नदी हलकी आवाज़ के साथ बह रही थी।


“महाराज, नदी रुकती नहीं, पर जल्दबाज़ी भी नहीं करती; वो बस बहती है, हर रोज़, हर पल, बिना थके। और जब कोई पत्थर आता है, तो वो उसके चारों ओर बहती है, पत्थर से लड़ती नहीं। यह कर्म का सबसे शुद्ध रूप है।”


शिखिध्वज ने सिर हिलाया।

दोनों नदी के किनारे एक चट्टान पर बैठे।


“महाराज, आप अब क्या देखते हैं?”


शिखिध्वज बोले – “कुम्भ, मैं देखता हूँ कि मैं पेड़ हूँ, मैं नदी हूँ, मैं चट्टान हूँ, मैं हर वो चीज़ हूँ जो यहाँ है।”


कुम्भ ने पूछा – “महाराज, और?”

“और मैं वो हूँ जो इन सबको देख रहा है।”


“दोनों एक साथ?”

“हाँ।”

“बिना विरोध?”

“बिना विरोध।”


कुम्भ बोले – “महाराज, अब आप वाक़ई तैयार हैं।”


“किस लिए?”

“अगली परीक्षा के लिए। और फिर एक बात के लिए, जो मैंने अभी तक आपसे नहीं कही।”


शिखिध्वज ने कुम्भ को देखा; कुम्भ की आँखों में कुछ था जो उन्होंने पहले नहीं देखा था। पर उन्होंने पूछा नहीं, बस सिर हिलाया।

दोनों कुछ देर वहीं बैठे रहे। नदी बहती रही, पेड़ हलके से हिलते रहे।


फिर कुम्भ उठे – “महाराज, अब लौटें।”


दोनों पेड़ के नीचे लौटे।


शिखिध्वज ने पेड़ को एक पल देखा, फिर हलके मुस्कुराकर बोले – “मित्र, मैं लौट आया, पर अब तुम मेरे लिए सिर्फ़ पेड़ हो, मेरी पहचान नहीं।”


पेड़ ने जवाब नहीं दिया, पर उसकी पत्तियाँ एक पल को हिलीं।


शिखिध्वज ने आसन लगाया, कुम्भ ने भी।


कुम्भ बोले – “महाराज, अब परीक्षा।” शिखिध्वज ने सिर हिलाया।

और सीख

बहुत दिन बीते। कुम्भ ने शिखिध्वज को एक-एक करके बहुत बातें सिखाईं; हर बात पहले छोटी लगती, फिर उसके पीछे एक बड़ी समझ खुलती।

एक दिन कुम्भ ने पूछा – “महाराज, आपके मन में अब क्या चलता है?”

शिखिध्वज ने एक पल सोचा – “कुम्भ, बहुत कुछ नहीं। पर एक बात रह जाती है, मेरी पत्नी की याद।”


कुम्भ ने पूछा – “महाराज, यह क्या है?”

“एक हलकी कमी।”

“और?”

“और एक छोटी पछताहट, कि मैंने उन्हें नहीं सुना, जब उन्होंने मुझे पहले बताया था कि उन्हें मिल गया।”


कुम्भ बोले – “महाराज, यह पछताहट छोड़िए।”

“कैसे?”

“पछताहट को देखिए, जैसे आप दूसरे विचारों को देखते हैं। उसे रोकिए मत, बस देखिए।”


शिखिध्वज ने आँखें बन्द कीं और पछताहट को देखा।


पछताहट उनके सीने में एक हलकी हलचल थी, बहुत बरस की। शिखिध्वज ने उसे देखा और रोका नहीं। धीरे-धीरे वो छोटी होती गई; पूरी तरह तो नहीं गई, पर अब वो उनके पीछे थी।


कुम्भ बोले – “महाराज, अब आप तैयार हैं।”

“किस लिए?”

“एक और परीक्षा के लिए।”


परीक्षा

बहुत बरस बीते। शिखिध्वज अब बहुत बदल गए थे। उनका देह अब उतना पतला नहीं था, क्योंकि अब वो स्वाभाविक रूप से खाते थे; दाढ़ी अब भी थी, पर उसमें वो पुरानी उलझन नहीं रही, और उनके चेहरे पर वो पुरानी तीव्रता भी नहीं। अब उनकी आँखों में एक स्थिरता थी।


कुम्भ अब कम आते थे; शिखिध्वज को ज़्यादा कुछ सीखने की ज़रूरत नहीं रह गई थी, बस कुछ बातें। एक दिन कुम्भ ने सोचा – मुझे इनकी एक परीक्षा लेनी है। मैंने इन्हें ज्ञान दिया, पर ज्ञान बस सुना हुआ हो सकता है; ज्ञान भीतर बैठा है या नहीं, यह जानने के लिए परीक्षा ज़रूरी है।

उस दिन कुम्भ नहीं आए।


शिखिध्वज ने सुबह उठकर पेड़ के नीचे आसन लगाया, हमेशा की तरह; पर कुम्भ नहीं थे। उन्होंने सोचा – शायद वो आज देर से आएँगे।


दोपहर हुई, कुम्भ नहीं आए। शाम हुई, कुम्भ नहीं आए। रात हुई, फिर भी नहीं।


शिखिध्वज ने अपनी सोच को छोड़ दिया – “कुम्भ का आना या न आना, यह मेरे ऊपर नहीं। मैं अपना अभ्यास करूँगा।” और उन्होंने ध्यान शुरू किया।


तभी हवा में एक सुगन्ध आई – बहुत मीठी, पर पृथ्वी की नहीं। शिखिध्वज ने आँख खोली।


कुम्भ के बदले एक स्त्री खड़ी थी।

Rich painterly classical-Indian color illustration of a radiant celestial woman with flowing hair and shimmering ornaments, a mischievous glint in her eyes, materializing before the seated calm ascetic Shikhidhvaja in the night forest; she is Chudala's conjured illusion testing him, a thatched shelter behind; dignified, no text, no watermark

स्त्री युवा थी, बहुत सुन्दर; उसके देह से चमक उठ रही थी और उसकी आँखों में एक शरारत थी।

(वो चूड़ाला की रची एक छाया थी, एक देवांगना का रूप। पर शिखिध्वज को यह पता नहीं था।)


स्त्री बोली – “महाराज।”

“देवी, आप यहाँ क्यों?”

“मैं इन्द्र की पत्नी हूँ। मैं आपके लिए आई हूँ।”

शिखिध्वज ने अपने भीतर देखा। पहले उन्हें लगा कि कोई हलचल होगी, कोई इच्छा उठेगी; पर भीतर कुछ नहीं था, बस एक स्थिरता।


यह बात उन्हें ख़ुद आश्चर्य की लगी। शिखिध्वज ने पूछा – “देवी, माफ़ी, पर आप किसके लिए आई हैं?”

“आपके लिए। आप तपस्वी हैं, बहुत बड़ी तपस्या की है। तप का फल मिलना चाहिए। मैं आपके लिए आई हूँ।”


शिखिध्वज एक पल चुप रहे, फिर बोले – “देवी, धन्यवाद, पर मुझे कोई फल नहीं चाहिए।”

स्त्री ने एक क़दम बढ़ाया – “महाराज, मैं इन्द्र की पत्नी हूँ। मेरे पीछे कोई पुरुष कभी नहीं आया था; मैं ख़ुद आपके पास आई हूँ। क्या आप मुझे मना करेंगे?”

“हाँ।”

“क्यों?”


शिखिध्वज ने स्त्री को बहुत देर तक देखा। उन्हें कोई इच्छा नहीं हुई; उनके भीतर वो स्थिरता बनी रही।

“देवी, मेरी एक पत्नी है, उसका नाम चूड़ाला। मैं उसी का हूँ, उसके अलावा किसी के लिए नहीं।”

“पर वो तो आपको छोड़कर आपके राज्य में है। आपने बहुत बरस उसे नहीं देखा।”

“मैंने उसे नहीं छोड़ा। मैंने अपनी पुरानी पहचान छोड़ी।”

“महाराज, ये बातें छोड़िए। मैं देवी हूँ; मैं तुरन्त आपको स्वर्ग ले जा सकती हूँ। वहाँ आप मेरे साथ रहिए, फिर आपको कोई और चाहिए नहीं होगा।”


शिखिध्वज बोले – “देवी, आप ग़लत आदमी के पास आई हैं।”

“क्यों?”

“क्योंकि स्वर्ग की भी मुझे ज़रूरत नहीं। मुझे जो चाहिए था, वो मिल चुका है; और वो स्वर्ग में नहीं था, वो मेरे भीतर था।”

स्त्री ने उन्हें देखा – “महाराज, यह आख़िरी बार, मुझे स्वीकार करिए।”

“देवी, क्षमा। नहीं।”


स्त्री के चेहरे पर अब वो शरारत नहीं थी, बस एक सन्तुष्टि।

“महाराज, मैं आपको परीक्षा देने आई थी। आप उत्तीर्ण हुए।”

शिखिध्वज ने पूछा – “आप अदृश्य हो जाएँगी?”

“हाँ।”

और स्त्री अदृश्य हो गई।

शिखिध्वज वैसे ही बैठे रहे। उनके भीतर कोई हलचल नहीं, कोई गर्व नहीं, कोई पछतावा नहीं। वो बस बैठे थे।


कुछ देर बाद कुम्भ आए – “महाराज, एक बात आज मुझे आपसे कहनी है।”

“बोलिए।”


कुम्भ एक पल रुके, फिर उन्होंने अपना रूप छोड़ा।

परदा हटा

Rich painterly classical-Indian color illustration of Chudala revealed in her own form, sari and bound hair and the loose bangle on her wrist, standing with hand gently extended over Shikhidhvaja who has dropped to his knees with joined palms in pranam at her feet, a forest waterfall behind; the disguise lifted, recognition and reverence; dignified, no text, no watermark

कुम्भ के सामने अब चूड़ाला खड़ी थीं। वही चूड़ाला – साड़ी, बाल, चाल, सब वही; कलाई पर वही चूड़ी, थोड़ी ढीली; और माथे पर वही छोटा निशान जो शिखिध्वज ने पहली रात देखा था।


शिखिध्वज एक पल कुछ नहीं समझे। फिर उन्होंने बहुत देर तक देखा।


“चूड़ाला।”

“महाराज।”

“आप?”

“मैं ही कुम्भ थी।”


शिखिध्वज ने अपने दोनों हाथ अपने मुँह के पास लाए। उनकी आँखें भीगीं, पर आँसू नहीं गिरे।

“चूड़ाला, मैं इतने बरस से आपसे सीख रहा था?”

“हाँ।”

“और मैंने पहचाना नहीं?”

“नहीं।”


“क्योंकि आपने पुरुष का रूप लिया?”

चूड़ाला बोलीं – “क्योंकि आप पुरुष से ही सीखते।”


शिखिध्वज बहुत देर तक चुप रहे। बाहर हवा हलकी थी और एक पंछी कहीं ऊँचाई से पुकार रहा था।

फिर शिखिध्वज ज़मीन पर बैठ गए, उनके घुटने धरती पर लगे – “चूड़ाला, मैंने आपके साथ बहुत बड़ी नाइंसाफ़ी की।”

चूड़ाला उनके पास बैठीं; उनके बैठने में कोई ग़ुस्सा नहीं था, कोई गर्व भी नहीं, बस एक स्थिरता।

“नहीं, महाराज। आपने अपना धर्म निभाया, आप जैसे थे वैसे थे; मैंने अपना धर्म निभाया, मैंने आपको वो दिया जो मैं दे सकती थी, जिस रूप में आप ले सकते थे।”

“पर आप एक स्त्री हैं।”

“हाँ।”

“और आप मुझसे ज्ञान में पहले पहुँचीं।”

“हाँ।”

“और मैंने यह नहीं माना। मुझे क्षमा करें।”

चूड़ाला बोलीं – “महाराज, क्षमा की क्या ज़रूरत? आपने जो ग़लती की, वो ग़लती नहीं थी, वो आपकी सीमा थी। हर पुरुष की सीमा होती है, हर स्त्री की भी। मेरी सीमा यह थी कि मैं उस सीमा को देखकर भी आपसे प्रेम करती रही। आपकी सीमा यह थी कि आपने उस प्रेम को देखकर भी एक बार नहीं सोचा कि स्त्री सिखा सकती है।”

“पर अब?”

“अब हम दोनों एक स्थान पर हैं। अब और कुछ नहीं चाहिए।”


शिखिध्वज ने चूड़ाला का हाथ बहुत देर तक पकड़े रखा। उनकी हथेली पर अब वही चूड़ी थी जो उन्होंने पहले दिन देखी थी, थोड़ी ढीली; शिखिध्वज ने उसे एक उँगली से छुआ।

“चूड़ाला, आपने मेरे लिए कितना किया।”

“महाराज, यह आपके लिए नहीं, हम दोनों के लिए था। आप अकेले तप कर रहे थे, मैं अकेली राज्य चला रही थी। अगर मैं कुम्भ नहीं बनती, तो हम दोनों अलग रहते। मैं हमारे प्रेम के लिए कुम्भ बनी थी।”

शिखिध्वज ने सिर हिलाया।


बहुत देर तक दोनों चुप रहे। फिर शिखिध्वज ने उठने की कोशिश की और चूड़ाला ने उन्हें सहारा दिया।

“महाराज, अब लौटें?”

“हाँ, राज्य।”

“राज्य?”

“क्यों, और कुछ?”

चूड़ाला हँसीं – “नहीं, महाराज, राज्य ही चलेगा। बस अब हम दोनों मिलकर चलाएँगे।”


जो बीच में

लेकिन जाने से पहले दोनों कुछ देर बैठे, उसी पेड़ के नीचे जहाँ कुम्भ बहुत बरस से बैठते थे।


चूड़ाला ने एक साँस ली – “महाराज, मुझे एक बात बतानी है।”

“बोलिए।”


“महाराज, जब मैंने पहली बार कुम्भ का रूप लिया था, तो मुझे डर था।”

“डर? किस बात का?”


चूड़ाला एक पल चुप रहीं, फिर बोलीं – “महाराज, मुझे डर था कि मैं वापस अपने रूप में नहीं आ पाऊँगी। कुम्भ बनना सीखना कठिन था, पर एक बार बन जाने के बाद मुझे एक और बात मालूम हुई। कुम्भ का अपना मन था, अपनी इच्छाएँ, अपने विचार; मैंने उन्हें बनाया था, पर अब वो अलग थे।

“और एक स्तर पर मुझे कुम्भ अच्छा लगने लगा। उनका जीवन सीधा था, एक तपस्वी का जीवन; मेरे पास इतनी ज़िम्मेदारियाँ नहीं थीं। कुम्भ बनकर मैं एक स्तर पर मुक्त थी। मुझे डर था कि अगर मैं कुम्भ में बहुत देर रहूँ, तो मैं चूड़ाला को भूल जाऊँगी।”

शिखिध्वज ने सुना और बहुत देर तक चुप रहे।


“चूड़ाला, आपने यह सब मुझसे छिपाया।”

“हाँ।”

“क्यों?”

“क्योंकि अगर मैं आपको बताती, तो मेरा कुम्भ बनना काम नहीं आता; आप मुझे चूड़ाला की, अपनी पत्नी की तरह देखते रहते। मुझे आपको एक नया व्यक्ति, एक पुरुष दिखना था, तभी आप सुन सकते थे।”


शिखिध्वज बोले – “चूड़ाला, यह बात मेरे लिए भारी है।”

“क्यों?”

“क्योंकि मैं समझ रहा हूँ। आपने मुझे सिखाने के लिए अपनी पहचान को जोखिम में डाला। अगर आप कुम्भ में फँस जातीं, तो हमारा क्या होता?”


चूड़ाला बोलीं – “महाराज, मैंने वो जोखिम इसलिए लिया, क्योंकि मेरे लिए आप मेरी अपनी सुरक्षा से ज़्यादा ज़रूरी थे।”


शिखिध्वज ने चूड़ाला का हाथ अपने दोनों हाथों में लिया – “चूड़ाला, मुझे क्षमा करिए।”

“महाराज, क्षमा किस बात की?”

“मैंने आपके साथ बहुत बड़ी नाइंसाफ़ी की। पर वो नाइंसाफ़ी सिर्फ़ यह नहीं कि मैंने आपकी बात नहीं सुनी; वो यह भी थी कि मैंने आपको मेरे लिए इतना जोखिम लेने पर मजबूर किया। अगर मैं पहले आपकी बात मान लेता, तो आपको कुम्भ बनना नहीं पड़ता।”


चूड़ाला बोलीं – “महाराज, यह बात बहुत बड़ी है, और आप यह कह रहे हैं, यही असली प्रगति है। पर एक बात – अगर आपने पहले सुन लिया होता, तो आप वो ज्ञान नहीं पाते जो आपने अब पाया है; शायद ज्ञान सतही रहता। बहुत बरस का अकेला तप, और फिर कुम्भ के माध्यम से सीखना, इसने आपके भीतर एक गहराई बनाई। मेरी तरह सीधा सीखना आपके लिए सम्भव नहीं था। तो आपका रास्ता वही था जो था, और मेरा रास्ता वही था जो था। हम दोनों अपने-अपने रास्ते आगे पहुँचे।”


शिखिध्वज ने सिर हिलाया – “चूड़ाला, एक और बात। क्या आप अब कुम्भ को याद करेंगी?”


चूड़ाला कुछ देर चुप रहीं।

“महाराज, हाँ।”

“क्यों?”

“क्योंकि कुम्भ का जीवन सीधा था। मेरा अब फिर जटिल होगा – रानी, पत्नी, माँ बनने वाली (हाँ, मैंने सोचा है), मन्त्रिणी, सब। पर यह जटिलता मेरा धर्म है। मैंने इसे चुना है।”


शिखिध्वज ने पूछा – “माँ?”

चूड़ाला हँसीं – “महाराज, हम अब इतने बूढ़े नहीं हैं। पर हाँ, बच्चे के बारे में मैं सोच रही थी।”


शिखिध्वज हँसे – “चूड़ाला, आपके पास हमेशा एक नई बात होती है।”

“हाँ।”


दोनों कुछ देर चुप रहे, फिर उठे।


जाते-जाते शिखिध्वज ने पेड़ को एक बार और देखा – “मित्र, धन्यवाद।”


पेड़ हलके से हिला।

लौटना

दोनों एक साथ चलते हुए लौटे। शिखिध्वज का देह अभी पतला था, पर वो अब चल सकते थे। रास्ते में दोनों ने बहुत बात की – पुरानी बातें, नई बातें।


एक रात वो दोनों एक नदी के किनारे रुके, आग जलाई, और बैठे। शिखिध्वज ने पूछा – “चूड़ाला, राज्य कैसा चला?”

“अच्छा।”

“मन्त्री?”

“वही हैं।”

“प्रजा?”

“उनकी कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं रही।”

“और आप? आप कैसी थीं इतने बरस?”


चूड़ाला एक पल चुप रहीं, फिर बोलीं – “महाराज, मैं ठीक थी, पर अकेली थी। मुझे आपकी कमी थी। पर मैं जानती थी कि आप कहाँ हैं और क्या कर रहे हैं, क्योंकि मैं आपको रोज़ देखती थी।”

“रोज़? कैसे?”

“मैंने आकाश-यात्रा सीख ली थी। हर रात मैं आती थी, बस देखती थी, फिर लौट जाती।”

शिखिध्वज ने सिर हिलाया – “और मैंने आपको कभी नहीं देखा।”

“नहीं, क्योंकि मेरा देह वहाँ नहीं था, बस चेतना थी।”

शिखिध्वज ने उनका हाथ अपने हाथ में लिया – “चूड़ाला, आपने मेरे लिए बहुत सहा।”

चूड़ाला बोलीं – “महाराज, सहा नहीं, मैंने प्रतीक्षा की। यह अलग है।”

रात भर वो बात करते रहे, और सुबह आगे चले।


वो राज्य पहुँचे। मन्त्री ने उन्हें देखा; मन्त्री बूढ़े हो चुके थे और उनके बाल लगभग पूरे सफ़ेद थे।

मन्त्री बोले – “महाराज, आप लौटे।”

“हाँ।”

“महारानी से एक बात कहूँ?”

“बोलिए।”


मन्त्री चूड़ाला की ओर मुड़े – “महारानी, यह राज्य आपने अकेली चलाया, बहुत बरस। आपने जो किया, वो किसी पुरुष राजा से कम नहीं था, शायद ज़्यादा।”

चूड़ाला बोलीं – “मन्त्री, आपका धन्यवाद। पर अब महाराज लौट आए हैं; अब हम दोनों मिलकर चलाएँगे।”

मन्त्री ने सिर झुकाया।


वो दोनों अपने राज-कक्ष में पहुँचे। कक्ष वैसा ही था, पर साथ ही कुछ बदला हुआ भी। चूड़ाला ने इतने बरस उसमें अकेली रहना सीख लिया था, और अब शिखिध्वज लौट आए थे; उन्हें कक्ष को फिर से दोनों के लिए बनाना था।

शिखिध्वज ने अपने पुराने कपड़े और पुरानी पगड़ी देखी और हलके मुस्कुराए – “चूड़ाला, यह सब अब अलग दिखता है।”

“हाँ।”

“पर पहचान में आता है।”

“हाँ।”


बहुत बरस वो दोनों राजा-रानी रहे। राज्य चला, बहुत अच्छा चला, प्रजा सुखी रही। पर अब उनके बीच कुछ और था जो पहले नहीं था; अब वो एक-दूसरे को बराबर देखते थे, ज्ञान में बराबर, प्रेम में बराबर।


रात को वो दोनों कक्ष में बैठते, कभी पाठ करते, कभी बस चुप रहते। एक रात शिखिध्वज ने चूड़ाला से पूछा – “चूड़ाला, मुझे एक बात बताइए। जब आपने मुझे कुम्भ के रूप में सिखाया, तो क्या आपको कभी मुझ पर ग़ुस्सा आया?”

चूड़ाला ने सोचा – “महाराज, बहुत बार, ख़ास तौर से शुरू में। आप मेरी बात मानते नहीं थे, हालाँकि मैं वही बात कह रही थी जो मैंने पन्द्रह बरस पहले आपको कही थी। आप एक स्त्री के मुँह से वो बात नहीं ले पाए, पर एक पुरुष के मुँह से ले रहे थे। यह बात मुझे बहुत दुख देती थी।”

“पर आपने रोका नहीं।”

“नहीं, क्योंकि मेरा प्रेम मेरी सीमाओं से बड़ा था। मुझे ज़रूरी था कि आप ज्ञान पाएँ, चाहे जिस रास्ते से।”

शिखिध्वज ने सिर हिलाया – “चूड़ाला, मैं आपके लिए एक काम करूँगा।”

“क्या?”

“मुझे जो भी मेरे जैसे पुरुष मिलेंगे, उन्हें मैं यह कथा सुनाऊँगा। जो पुरुष अपनी पत्नी की बात नहीं सुनते, उन्हें मैं बताऊँगा कि वो कितना खो रहे हैं।”

चूड़ाला हँसीं – “महाराज, बहुत अच्छा। पर एक बात – मेरा नाम बीच में न लीजिएगा, मेरी पहचान नहीं; बस यह बात कि एक पुरुष की पत्नी ने उन्हें सिखाया।”

“क्यों?”

“क्योंकि मेरी पहचान महत्वपूर्ण नहीं, बात महत्वपूर्ण है।”


बहुत बरस बीते। एक रात शिखिध्वज ने चूड़ाला से पूछा – “चूड़ाला, क्या आप अब भी कभी कुम्भ बनती हैं?”

चूड़ाला हँसीं – “नहीं, महाराज। कुम्भ का काम पूरा हो गया।”

“पर क्या वो कहीं रहते हैं, आपके भीतर?”

चूड़ाला ने एक पल सोचा – “महाराज, कुम्भ मेरी ही चेतना का एक रूप था। वो मेरे भीतर हैं, हाँ; पर अब वो कहीं और जाएँगे, ऐसा मुझे नहीं लगता।”

एक दिन वो दोनों एक साथ, एक रोज़ की तरह, सोए। सुबह उनका सेवक उन्हें जगाने आया। दोनों एक-दूसरे के पास सोए हुए दिखे – आँखें बन्द, चेहरे शान्त। पर साँस नहीं थी।


लोगों ने कहा, यह कैसी विचित्र बात है, दोनों एक ही रात में चले गए। पर जो जानते थे, वो हँसते थे और कहते थे – जब दो चेतनाएँ एक हो जाती हैं, तो उनका देह भी एक ही समय छूटता है। यह विचित्र नहीं, यह स्वाभाविक है।

राम बहुत देर तक चुप रहे। सरयू पर अब सूरज ऊँचा था और पानी पर तेज़ रोशनी थी।

“गुरुदेव, मेरी माँ की बात मुझे अब समझ आ रही है।”

“क्या?”

“माँ बहुत कुछ जानती हैं। पिता को बताना चाहती हैं, पर पिता सुन नहीं रहे। फिर भी माँ हार नहीं रहीं; वो अपना रास्ता ढूँढ रही हैं। शायद वो ख़ुद से रास्ता नहीं ढूँढ रहीं, पर भीतर कहीं वो जानती हैं कि एक दिन रास्ता मिलेगा।”

वसिष्ठ मुस्कुराए – “राम, यह बात तुम पिता को बताना। शायद वो सुनें।”

“मैं बताऊँगा, पर शायद वो भी न सुनें। तब?”

“तब चूड़ाला की कथा याद रखना। उसकी असली शिक्षा यह नहीं कि शिखिध्वज ने आख़िर में सीखा; उसकी असली शिक्षा यह है कि चूड़ाला ने अपनी सीखने और सिखाने की क्षमता को नहीं छोड़ा, उसे एक नया रूप दिया। तुम्हारी माँ भी ख़ुद अपना रास्ता ढूँढेंगी, चाहे पिता सुनें या न सुनें।”

राम ने पूछा – “और मैं?”

“तुम, राम, एक काम करना। जब तुम्हारी पत्नी एक दिन तुमसे कोई बात कहे, और तुम्हें लगे कि वो बात तुम्हारी समझ से ऊपर है, तब रुकना। तुरन्त मना मत करना; उसे जगह देना। उसकी समझ अलग है, हो सकता है उसकी समझ तुमसे आगे हो।”

राम ने एक पल सोचा – “गुरुदेव, मैं ध्यान रखूँगा।”


फिर राम ने कहा – “गुरुदेव, एक और बात। चूड़ाला ने कुम्भ बनकर शिखिध्वज को सिखाया; यह बहुत बड़ा त्याग था।”

“हाँ।”

“पर एक स्तर पर यह विडम्बना भी है।”

“क्यों?”


“क्योंकि चूड़ाला को अपनी पहचान बदलनी पड़ी, ताकि उनके पति उन्हें सुन सकें। यह विचित्र है। पुरुष अपनी पत्नी की बात नहीं सुनते, पर अगर वही बात किसी अनजान युवक से आए, तो सुन लेते हैं। यह कौन सी सोच है?”


वसिष्ठ ने कहा – “राम, यह बहुत पुरानी सोच है, पुरुष की एक कमज़ोरी। वो अपनी पहचान से मिल चुकी हर चीज़ को छोटा समझता है और अनजान को बड़ा। उसकी पत्नी उसके पास हमेशा रहती है, तो वो उसे साधारण समझता है; पर एक नया युवक उसे कुछ और लगता है। यह कमज़ोरी बहुत बरस के बाद जाती है, और कई पुरुषों में कभी नहीं जाती।”


राम ने सिर हिलाया – “गुरुदेव, यह बात मैं याद रखूँगा।”

“बहुत अच्छा, राम।”


वसिष्ठ ने राम का कन्धा हल्के से छुआ।

राम मुड़कर वसिष्ठ को देखा – “गुरुदेव, मुझे एक प्रतिज्ञा करनी है। मैं अपनी पत्नी की बात पहले सुनूँगा, फिर सोचूँगा, फिर बोलूँगा।”


वसिष्ठ मुस्कुराए – “राम, यह बहुत अच्छी प्रतिज्ञा है।”

“क्यों?”

“क्योंकि बहुत पुरुष पहले बोलते हैं, फिर सोचते हैं, फिर सुनते हैं। तुम उल्टा रास्ता ले रहे हो।”


राम ने सिर हिलाया और पानी की ओर देखा। सूरज अब बादलों के बीच से निकल रहा था और नदी पर पीली रोशनी पड़ी। बहुत दूर एक स्त्री अब भी कपड़े धो रही थी, और उसके पटकने की आवाज़ नदी की धीमी लय में मिलती जा रही थी।


साहित्यिक-संदर्भ

यह कथा योग वासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 6अ.77-110 पर आधारित है। चूड़ाला और शिखिध्वज की कथा शास्त्र की सबसे लम्बी और सबसे आधुनिक प्रासंगिकता वाली कथाओं में से है। एक स्त्री का अपने पति को गुरु बनकर सिखाना, और पुरुष की उस सीमा को देखकर भी प्रेम से उसे पार करना, यह कथा का सबसे अद्भुत योगदान है। स्वामी वेंकटेशानन्द के अनुवाद और विहारी-लाला मित्र के अनुवाद, दोनों में इस कथा का विस्तार से वर्णन है। चूड़ाला के माध्यम से शास्त्र ने यह कहा है कि ज्ञान का देह से, लिंग से, जाति से, कोई सम्बन्ध नहीं। पर शास्त्र ने यह भी कहा है कि पुरुष की सीमा अक्सर वही नहीं होती जो पुरुष को दिखती है।

दर्शन-दृष्टि

चूड़ाला और शिखिध्वज की कथा रूप और चेतना के बीच के अन्तर पर बहुत स्पष्ट है। एक रानी अपने पति को सिखाने के लिए कुम्भ नाम के एक युवक का रूप लेती है। पति तब सुनता है, जब पहले नहीं सुनता था। बात बदली नहीं, बस उसे कहने वाले का रूप बदला। और रूप ही उसकी पहचान बना। कथा यह कहती है कि असली शिक्षा अक्सर उसी रूप में नहीं उतरती जिसमें हम उसे ढूँढते हैं, उसे पहुँचाने के लिए ज्ञानी अपना रूप तक बदलते हैं।

आधुनिक मनोविज्ञान में कार्ल युङ्ग (Carl Jung, 1875-1961) ने अपनी Two Essays on Analytical Psychology (1928) में पर्सोना और एनिमा-एनिमस की व्याख्या की, कि हम सब अपनी पहचानें बहुत बार ओढ़ते-उतारते हैं, और पुरुष के भीतर एक स्त्री-तत्त्व, स्त्री के भीतर एक पुरुष-तत्त्व रहता है। चूड़ाला यह जान-बूझकर करती है। उसकी कथा युङ्ग से सदियों पहले की है, पर वो भी यही कहती है, कि असली चेतना किसी एक रूप से बँधी नहीं।