कथा · 6
चूड़ाला: रानी, योगिनी और गुरु
उज्जयिनी की रानी चूड़ाला ने आत्मतत्त्व को अपने अनुभव में जाना, राज्य सँभाला और वर्षों तक अपने पति शिखिध्वज को समझने योग्य घड़ी की प्रतीक्षा की। जब राजसी जीवन छोड़कर किया गया उनका कठोर तप भी शान्ति तक न पहुँचा, चूड़ाला कुम्भ नामक ब्राह्मणकुमार का रूप धरकर उनके गुरु बनीं। यह दाम्पत्य, राजधर्म, त्याग और परिपक्व समझ की विस्तृत कथा है।
उज्जयिनी में साथ-साथ
श्रीराम ने वसिष्ठ से पूछा कि शिखिध्वज कौन थे और उन्हें परमपद किस प्रकार मिला। वसिष्ठ ने प्रसंग को दूर अतीत में रखा। सातवें मन्वन्तर की चौथी चतुर्युगी के द्वापर में कुरुवंश के राजा शिखिध्वज मालव देश की उज्जयिनी में राज्य करते थे। बाल्यकाल में पिता का देहान्त हो गया, इसलिए शासन की जिम्मेदारी उनके सामने शीघ्र आ गई। धैर्य, दानशीलता, संयम, मधुर वाणी और शास्त्रश्रवण में उनकी रुचि थी। वे यज्ञ और लोकहित के काम करते, याचकों को देते और प्रजा का धर्मपूर्वक पालन करते थे। अपने बाहुबल से सोलह वर्ष तक विजय और राज्य-संगठन का कार्य करने के बाद वे निश्चिन्त होकर शासन में स्थित हुए।
यौवन आने पर मन्त्रियों ने उनके विवाह का विचार किया। सौराष्ट्र के राजा की कन्या चूड़ाला रूप, बुद्धि और आचरण में उनके योग्य मानी गईं। विधिपूर्वक विवाह हुआ और दिनों के क्रम में दोनों के बीच का स्नेह गहरा होता गया। वे वन और उपवन में घूमते, सरोवरों और लतागृहों में ठहरते, संगीत, चित्र, नृत्य, वाद्य, काव्य और शास्त्र की बातें साझा करते। एक दूसरे से सीखने की सहजता उनके दाम्पत्य का स्वभाव बन गई। शिखिध्वज ने चूड़ाला से कलाओं की बारीकियाँ ग्रहण कीं; चूड़ाला ने पति और आचार्यों से शास्त्रों का तात्पर्य सुना। राजसभा और अन्तःपुर के बीच भी उनकी मित्रता बनी रही। वे प्रजा की दशा जानते, मर्यादा का पालन करते और मिलने वाले सुख को परस्पर स्नेह के साथ भोगते थे।
कई वर्ष बीते। देह में यौवन की गति धीमी पड़ती देखकर दोनों के विचार में परिवर्तन आया। आयु का क्षय, वृद्धावस्था और मृत्यु अब सुनी हुई बातें भर न रहीं। उन्होंने देखा कि तरंग उठकर विलीन हो जाती है, पका फल शाखा से गिरता है और वर्षा का बुलबुला क्षण में मिट जाता है। उसी प्रकार शरीर और उससे जुड़ी सम्पदा भी परिवर्तन के अधीन हैं। इस विचार ने उनके भीतर वैराग्य जगाया। उन्होंने अध्यात्मशास्त्र को रोग की औषधि की तरह ग्रहण किया और एक दूसरे के साथ आत्मा, मन, दृश्य और ज्ञान का विचार करने लगे।

चूड़ाला ने पूछना आरम्भ किया: “मैं किसे अपना स्वरूप कहती हूँ?” उन्होंने देह को देखा, फिर हाथ-पैर जैसी कर्मेन्द्रियों, आँख-कान जैसी ज्ञानेन्द्रियों, संकल्प करने वाले मन, निर्णय करने वाली बुद्धि और “मैं” कहने वाले अहंभाव की जाँच की। ये सब जाने जा रहे थे और बदलते रहते थे। जानने वाली सत्ता प्रत्येक परिवर्तन में उपस्थित थी। प्राण देह को चलाता है, मन विषयों की ओर जाता है, बुद्धि निर्णय करती है, फिर भी इन सबका प्रकाश किसी और आधार में सम्भव होता है। विचार क्रमशः सूक्ष्म हुआ और चूड़ाला ने उस चैतन्य को अपने अनुभव में पहचाना जो विषय के आने-जाने से घटता-बढ़ता नहीं।
उस बोध के साथ उनका मन शान्त हुआ। इच्छा और भय की पुरानी तीव्रता ढीली पड़ गई। राजमहल, शरीर और सम्बन्ध अपने व्यवहारिक स्थान पर रहे, पर उनकी आत्मपहचान का भार उन पर टिका न रहा। भीतर की प्रसन्नता मुख और देह पर उज्ज्वलता बनकर दिखाई देने लगी। शिखिध्वज ने उनकी अपूर्व शोभा देखी और पूछा कि उन्हें कौन-सा दुर्लभ राज्य, चिन्तामणि या अमृत मिला है। चूड़ाला ने कहा कि उन्होंने आत्मा को आत्मा में देखा है; देह, इन्द्रिय और मन के पार वही निर्मल सत्ता सब अनुभवों को प्रकाशित करती है।

शिखिध्वज उनकी बात का आशय ग्रहण न कर सके। उन्हें लगा कि चूड़ाला देह में रहते हुए देह से परे होने और जगत में रहते हुए जगत की सत्ता शान्त होने जैसी उलझी बातें कह रही हैं। वे हँसे, उनकी वाणी को असंगत कहा और मध्याह्न-स्नान के लिए चले गए। चूड़ाला ने वाद-विवाद बढ़ाने की जगह पति की ग्रहणशीलता को देखा। बोध शब्दों के साथ सामने था, श्रोता के भीतर उसके लिए स्थान अभी पकना शेष था। उन्होंने अपने अनुभव को सँभाला और राजकाज तथा दाम्पत्य के व्यवहार में पहले जैसी विनम्रता से लगी रहीं।
बोध के बाद भी अधूरा संवाद
चूड़ाला ने योगाभ्यास को और गहरा किया। प्राण, नाड़ी, धारणा और समाधि के अभ्यास से उन्हें अणिमा आदि सिद्धियाँ प्राप्त हुईं। वे आकाशमार्ग से दूर प्रदेशों तक जातीं, समुद्र के भीतर के द्वीप देखतीं और इच्छा के अनुसार रूप बदल सकती थीं। काष्ठ, तृण, पत्थर, आकाश, वायु, अग्नि और जल के बीच उनकी गति निर्बाध हो गई। उन्होंने मेरु के शिखरों, लोकपालों के नगरों और विविध लोकों का अनुभव किया। इन क्षमताओं ने उनके आत्मबोध का स्थान न लिया। वे जानती थीं कि सामर्थ्य और शान्ति अलग विषय हैं; सिद्धि व्यवहार की शक्ति है, आत्मस्थिति उसके उपयोग को दिशा देती है।
वे समय-समय पर शिखिध्वज को फिर समझातीं। पति उनके निकट रहते, उनके गुण देखते और उनसे प्रेम करते थे, फिर भी आत्मज्ञान की बात उनके भीतर स्थिर न हो पाती। चूड़ाला ने अपनी सिद्धियाँ दिखाकर विश्वास जीतने का प्रयत्न भी छोड़ दिया। असमय प्रकट किया गया चमत्कार जिज्ञासा या भय जगा सकता था, पर जिस विवेक की आवश्यकता थी उसका स्थान कोई दृश्य शक्ति नहीं ले सकती थी। इसलिए उन्होंने प्रतीक्षा को अपनी साधना बनाया। राजसभा में रानी, अन्तःपुर में पत्नी और भीतर से स्थितप्रज्ञ साधिका की भूमिकाएँ एक साथ चलती रहीं।
उधर शिखिध्वज का वैराग्य बढ़ता गया। भोग-सामग्री सामने आती तो मन उससे हट जाता। निर्झर, गुफा और निर्जन वन का विचार उन्हें अधिक आकर्षित करने लगा। वे गौ, भूमि और स्वर्ण दान करते, कृच्छ्र और चान्द्रायण जैसे व्रत करते और तीर्थों का सेवन करते। उन्हें लगता था कि राज्य, परिवार और नगर की जिम्मेदारियाँ शान्ति के मार्ग में बाधा हैं। मन का दुख बाहरी व्यवस्था से जुड़ गया: सब छोड़ देने पर शोक भी पीछे छूट जाएगा, ऐसी आशा भीतर दृढ़ होने लगी।
एक दिन उन्होंने चूड़ाला से कहा, “प्रिये, मैंने राज्य और विभव का पर्याप्त अनुभव कर लिया है। अब मेरा मन वन में रहने को चाहता है। वहाँ देश के विनाश, युद्ध, सम्पत्ति और प्रजाकार्य की चिन्ता मुझ पर अधिकार न करेगी। मुझे जाने दो।”
चूड़ाला ने अवसर और कर्तव्य का विचार सामने रखा। उन्होंने कहा कि वनगमन का अपना समय होता है। वृद्धावस्था आने पर दोनों साथ चल सकते हैं; अभी स्वस्थ देह और व्यवस्थित राज्य को असमय छोड़ने से प्रजा को हानि होगी। उनका निवेदन पति को रोकने की निजी व्याकुलता तक सीमित न था। उसमें राजधर्म, समय और साझा जीवन का विवेक था।
शिखिध्वज ने अपना निर्णय बदलने से इनकार किया। उन्होंने चूड़ाला से कहा कि वनवास कठिन है, कोमल देह वाली युवती के लिए वहाँ जाना उचित न होगा। वे राज्य और कुटुम्ब का भार सँभालें। इस उत्तर में उस युग की पारिवारिक धारणा बोल रही थी। चूड़ाला ने आगे विवाद न किया। संध्या के काम पूरे हुए, दोनों एक ही शय्या पर सोए और आधी रात को जब राजमहल तथा नगर गहरी निद्रा में थे, शिखिध्वज उठ खड़े हुए। उन्होंने सोती हुई चूड़ाला और राजलक्ष्मी को प्रणाम किया, फिर अकेले नगर से निकल गए।

प्रातः होते-होते वे घने वन में पहुँच चुके थे। बारह दिनों में अनेक नगर, देश, पर्वत और नदियाँ पार करके मन्दराचल के निकट एक दुर्गम कानन में पहुँचे। मनुष्य-बस्ती बहुत दूर थी। जल से घिरे, हरी घास और फलदार वृक्षों वाले एक स्वच्छ स्थान पर उन्होंने लताओं से पर्णशाला बनाई। बाँस का दण्ड, फल और अर्घ्य के पात्र, पुष्पपात्र, कमण्डलु, रुद्राक्षमाला, गुदड़ी, चटाई और मृगचर्म जुटाए। प्रातः जप, फिर पुष्प-संग्रह, स्नान, देवपूजा और सीमित कन्द-मूल का आहार उनकी दिनचर्या बन गई। राजसी स्मृतियों को दबाते हुए वे बाहरी अनुशासन में लग गए।
चूड़ाला की नींद खुली तो शय्या का दूसरा भाग खाली था। योगबल से उन्होंने पति की दिशा देखी और आकाशमार्ग से उनके पीछे पहुँचीं। उन्हें वन में भटकते देखकर तत्काल साथ रहने की इच्छा उठी, फिर उन्होंने उनके भावी क्रम का विचार किया। शिखिध्वज का मन बाहरी त्याग को ही पूर्ण उपाय मान रहा था। उसी घड़ी सामने आने पर पुरानी अस्वीकृति फिर लौट सकती थी। चूड़ाला ने उचित समय की प्रतीक्षा चुनी और उज्जयिनी लौट आईं।

अगले दिन उन्होंने नगर में घोषणा कराई कि महाराज विशेष कार्य से बाहर गए हैं। प्रजा को आश्वस्त करके राज्य का संचालन सँभाला। प्रशासन उसी व्यवस्था से चला जिसे दोनों ने मिलकर बनाया था। ऋतुएँ बदलीं, पक्ष और मास बीते। आठ वर्ष तक चूड़ाला उज्जयिनी सँभालती रहीं और शिखिध्वज वन में तप करते रहे। इतने समय में राजा की देह कृश और वृद्ध दिखाई देने लगी; चूड़ाला की दृष्टि में उनकी ग्रहणशीलता अब नये उपदेश के योग्य हो चुकी थी।

मन्दराचल में आया कुम्भ
रात्रि में चूड़ाला फिर आकाशमार्ग से मन्दराचल पहुँचीं। ऊपर से उन्होंने पति को देखा: तप से क्षीण देह, जटा, वन के उपकरण और नियमित कर्मों में लगा मन। चूड़ाला समझ गईं कि अपने परिचित रूप में कही गई बात पुरानी स्मृति से टकराएगी। उन्होंने एक तेजस्वी ब्राह्मणकुमार का रूप रचा। गौर वर्ण, स्वच्छ वस्त्र, यज्ञोपवीत, रुद्राक्ष, कमण्डलु, मृगचर्म और शान्त मुख के साथ वह कुमार मानो किसी दूसरे आश्रम से आया हुआ मूर्तिमान तप था।

शिखिध्वज ने अतिथि को देखकर उठकर स्वागत किया। अर्घ्य, पाद्य, पुष्प और आसन अर्पित किए। कुमार के मुख और अंगों में उन्हें चूड़ाला की झलक-सी लगी, फिर उन्होंने उसे दिव्य अतिथि मानकर पूछा, “आप कौन हैं, किसके पुत्र हैं और किस प्रयोजन से यहाँ आए हैं?”

कुमार ने अपना नाम कुम्भ बताया और एक अद्भुत जन्मकथा कही। मेरु की कन्दरा के पास गंगा बहती थी। एक दिन देवर्षि नारद ध्यान से उठे तो नदी में रम्भा, तिलोत्तमा और दूसरी अप्सराओं को जलक्रीड़ा के बाद बाहर आते देखा। क्षणिक चित्तविक्षेप से उनका वीर्य स्खलित हुआ। नारद ने तत्काल मन को सँभाला और उस तेज को पास रखे उज्ज्वल स्फटिक-कुम्भ में स्थापित कर दिया। संकल्प से पात्र को दूध से भर दिया। समय आने पर उसी पात्र से कमलनयन बालक उत्पन्न हुआ।
नारद ने जातकर्म आदि संस्कार किए, अपना विद्याधन उसे दिया और ब्रह्मलोक ले गए। वहाँ बालक ने ब्रह्मा के प्रश्नों के उत्तर दिए। ब्रह्मा ने पौत्र को गोद में बैठाकर आशीर्वाद दिया और ज्ञान में समर्थ बनाया। कुम्भ से जन्म लेने के कारण नाम कुम्भ पड़ा। उसने कहा, “मैं नारद का पुत्र और ब्रह्मा का पौत्र हूँ। लोकों में कौतूहलवश घूमता हूँ। आज आकाशमार्ग से जाते हुए आपको देखा, इसलिए यहाँ उतर आया।”
सभा-विराम के बाद बातचीत फिर चली। कुम्भ ने शिखिध्वज से उनका परिचय पूछा। राजा ने कहा कि वे राज्य, पत्नी और धन छोड़कर संसार-भय से वन में आए हैं। बहुत काल से तप कर रहे हैं, फिर भी भीतर की शान्ति हाथ नहीं लगी। कमण्डलु, दण्ड, जप और आश्रम का नियम चलता है; संशय का मूल बना हुआ है। उन्होंने अतिथि की वाणी में अधिकार अनुभव किया और उन्हें गुरु मानकर सत्य उपदेश ग्रहण करने की प्रतिज्ञा की।
कुम्भ ने पहले एक सामान्य बात रखी। ज्ञान के लिए गुरु का मिलना महत्त्वपूर्ण है, फिर भी शब्द अपने आप बोध उत्पन्न नहीं करते। शिष्य की शुद्ध, विश्वासयुक्त और विचारशील प्रज्ञा उस शब्द को भीतर खोलती है। इसे समझाने के लिए उन्होंने विन्ध्य के एक कृपण किरात की कथा भी कही। उसकी एक कौड़ी घास में गिर गई। वह तीन दिन तक उसे खोजता रहा और उसी खोज में उसे महान चिन्तामणि मिल गई। कौड़ी की खोज स्वयं चिन्तामणि का मूल्य न थी; उसके बिना वह उस स्थान तक पहुँचता भी नहीं। उचित साधन शिष्य को उपलब्ध सत्य के सामने लाता है, फिर पहचान उसकी परिपक्व दृष्टि करती है।
शिखिध्वज ने विनय से कहा कि वे अपनी स्थिति का निर्णय कुम्भ पर छोड़ते हैं। तब कुम्भ ने दो बड़े दृष्टान्त आरम्भ किए। उन्हीं के भीतर राजा के वनवास, त्याग और शान्ति के बीच छिपी गाँठ खुलनी थी।
चिन्तामणि, हाथी और सर्वत्याग
पहली कथा एक समर्थ, उद्यमी पुरुष की थी। वह अस्त्र, कला और व्यवहार में निपुण था, फिर भी परमपद का ज्ञान चाहता था। उसने चिन्तामणि के लिए कठिन तप किया। अपेक्षा से बहुत पहले वास्तविक मणि उसके सामने प्रकट हो गई। उसने उसे देखा और संदेह में पड़ गया: इतनी अल्प तपस्या में ऐसा दुर्लभ रत्न उसे कैसे मिल सकता है? कहीं छूते ही गायब न हो जाए; कहीं यह उसकी पात्रता का उपहास न हो। विचार करते-करते उसने हाथ बढ़ाया ही नहीं। चिन्तामणि अन्ततः अदृश्य हो गई।
वह फिर खोज में लगा। कुछ समय बाद चमकता हुआ काँच का टुकड़ा मिला। इस बार उसने शीघ्र निर्णय कर लिया कि यही चिन्तामणि है। उसी भरोसे अपनी पुरानी सम्पदा छोड़ दी और निर्जन वन चला गया। काँच ने कोई इच्छा पूरी न की। उसके पास जो साधन थे वे भी जा चुके थे, इसलिए वह भारी विपत्ति में पड़ा। कुम्भ ने कहा कि चूड़ाला की वाणी वास्तविक चिन्तामणि की तरह सामने आई थी। शिखिध्वज ने अपने अनुभव और पात्रता पर संदेह करके उसे ग्रहण न किया। फिर बाहरी वनवास और कर्मकठोरता को अन्तिम उपाय मान लिया; वह चमकता काँच था, जिसने पुरानी व्यवस्था छुड़ा दी और मूल भ्रम को ज्यों का त्यों रखा।
दूसरा दृष्टान्त विन्ध्य के एक विशाल गजराज का था। महावत ने उसे लोहे की जंजीरों से बाँध दिया और पीड़ा दी। तीन दिन बाद हाथी ने अपने दाँतों से चार घड़ी के कठिन प्रयत्न में बन्धन तोड़ दिया। महावत उसे रोकने के लिए ताड़ के वृक्ष से कूदा और हाथी के सामने गिर पड़ा। गजराज चाहता तो शत्रु को कुचल सकता था, पर उसके भीतर करुणा जागी। उसने महावत को छोड़ दिया और वन में चला गया।
महावत बच गया। उसने बहुत दिनों तक हाथी को खोजा, फिर जिस वृक्ष के नीचे वह विश्राम करता था उसके पास गहरा गोल गड्ढा खोदा और लताओं से ढक दिया। कुछ दिन बाद हाथी उसी में गिरा और फिर बाँध लिया गया। कुम्भ ने समझाया कि राज्य के प्रति अरुचि ने शिखिध्वज की पहली जंजीर तोड़ दी। उसे बाँधने वाला महावत, अर्थात अज्ञान और अहंभाव, जीवित रहा। वन की कठोर तपस्या उसी महावत का ढका हुआ गड्ढा बन गई। जंजीर से मुक्त होने का अनुभव सच्चा था, पर मुक्त करने वाली समझ अधूरी थी।
शिखिध्वज ने कहा, “मैं राज्य, घर, धन, भूमि, पत्नी और बन्धु सब छोड़ चुका हूँ। फिर सर्वत्याग में क्या बचा?” कुम्भ ने पूछा कि जिन वस्तुओं को वे अपना कहते हैं, उन पर उनका स्वत्व कब से हुआ। राज्य प्रजा और काल के बीच था; वन, पर्वत, वृक्ष और जल प्रकृति के थे; कुटिया और पात्र मिट्टी, लकड़ी और श्रम से बने थे। उन्हें छोड़ देने पर व्यक्ति की “मैं” और “मेरा” वाली वृत्ति अपने आप शान्त नहीं होती। शिखिध्वज ने वन को अपना मानकर उसके त्याग की बात कही। कुम्भ ने वही प्रश्न दोहराया। फिर राजा ने आश्रम, पात्र, मृगचर्म और माला को अपना शेष सर्वस्व कहा।
उन्होंने सूखी लकड़ियाँ इकट्ठी कीं और आग जलाई। पात्र, आसन, मृगचर्म, अक्षमाला, चटाई, गुदड़ी, पर्णशाला और वस्त्र अग्नि में डाल दिए। कमण्डलु एक श्रोत्रिय ब्राह्मण को दे दिया। कुछ ही देर में वर्षों से जोड़ा गया तपस्वी जीवन धुएँ और राख में बदल गया। राजा प्रसन्न हुए और बोले कि अब दिशाएँ ही उनके वस्त्र और घर हैं। कुम्भ ने फिर कहा कि सर्वोत्तम भाग का त्याग शेष है।

राजा ने अपने शरीर को देखा। उन्हें लगा कि रक्त, मांस और इन्द्रियों से बनी यही अन्तिम सम्पत्ति है। वे पास की गहरी खाई में कूदकर देह समाप्त करने को उठे। कुम्भ ने उन्हें रोक लिया। उन्होंने शरीर को निरपराध और जड़ उपकरण कहा। हवा के वेग से फल गिरता है तो वृक्ष को अपराधी मानना अनुचित है। उसी प्रकार सुख-दुख का अनुभव-स्थान होने से शरीर मूल कर्ता नहीं हो जाता। देह नष्ट होने पर भी कारण बचा रहे तो दूसरा शरीर उसी कारण से उठ सकता है।
शिखिध्वज ने पूछा, “फिर वह कारण कौन है?” कुम्भ ने चित्त, अहंभाव, वासना और संकल्प की ओर संकेत किया। जिस बीज से स्वामित्व, आग्रह, कर्म और पुनरावृत्ति की शाखाएँ निकलती हैं, सर्वत्याग उस बीज की पहचान और निवृत्ति है। राज्य या वन, महल या कुटिया, सम्पत्ति या भिक्षापात्र अपने स्वभाव में बन्धन रचते नहीं। चित्त उनसे अपना परिचय जोड़ता है, फिर उसी परिचय की रक्षा और विरोध में दुख पाता है। कुम्भ की बात सुनकर शिखिध्वज की दृष्टि बाहरी वस्तुओं से भीतर के कर्ताभाव की ओर मुड़ी।
कर्ताभाव से शान्ति तक
कुम्भ और शिखिध्वज का संवाद अब कथा से गहरे तत्त्वविचार में गया। राजा ने पूछा कि चित्त का त्याग किस प्रकार हो, जगत का विस्तार कहाँ से आता है और कारण का अन्त होने पर अनुभव कैसे चलता है। कुम्भ ने कहा कि जिस वस्तु को मन बार-बार सत्य, अपना और स्थायी मानता है, उसी के अनुसार उसका संसार रचता है। संकल्प से नाम और रूप उठते हैं; उनके साथ कर्ता, कर्म, फल, भय और आशा की परम्परा चलती है। विवेक उस परम्परा को दबाता नहीं, उसकी मानी हुई स्वतन्त्र सत्ता की जाँच करता है।
उन्होंने स्वप्न, मृगतृष्णा, शुक्ति में दिखाई देने वाले रजत, सागर और तरंग जैसे अनेक संकेत दिए। अनुभव के क्षण में दृश्य पूरी तरह सामने आता है, फिर ज्ञान बदलते ही उसका पुराना दावा मिट जाता है। आत्मा उस आने-जाने का प्रकाशक है। उसे किसी नये कर्म से बनाया नहीं जाता। शिखिध्वज को समझ में आया कि वे शान्ति को भविष्य की उपलब्धि मानकर कर्म जोड़ते रहे थे। राजकाज छोड़ा तो वन के कर्म पकड़ लिए; महल छोड़ा तो पर्णशाला को साधना का केन्द्र बना लिया। कर्ता की गाँठ ने पोशाक बदली थी।
कुम्भ ने देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि और अहंभाव को क्रम से विचार में रखा। हाथ-पैर कर्म करते हैं, इन्द्रियाँ विषय ग्रहण करती हैं, मन विकल्प उठाता है, बुद्धि निर्णय देती है और अहंकार उसे “मैंने किया” से जोड़ता है। इन सभी को जाना जा सकता है। जानने की निर्मल उपस्थिति उनके परिवर्तन से खण्डित नहीं होती। जब राजा ने इस बात को अपने भीतर देखा, उनके प्रश्नों की गति धीमी हुई। मौन किसी थकान से नहीं आया; विचार अपने स्रोत तक पहुँचकर विश्राम लेने लगा।
लम्बे संवाद के बाद शिखिध्वज उसी क्षण आत्मपद में स्थित हुए। वाणी शान्त हो गई, देह निश्चल हो गई और वे निर्विकल्प समाधि में बैठे रहे। कुम्भ का रूप धारण किए चूड़ाला ने देखा कि उपदेश अपना काम कर चुका है। वे अदृश्य हुईं, आकाशमार्ग से उज्जयिनी पहुँचीं और राज्य के आवश्यक कार्य पूरे किए। तीन दिन बाद फिर कुम्भ बनकर वन में लौटीं। राजा उसी आसन पर पर्वत-शिला जैसे अचल बैठे थे।
कुम्भ ने भीषण सिंहनाद किया, शरीर हिलाया, फिर भी समाधि न टूटी। चूड़ाला ने स्पर्श और योगदृष्टि से देखा कि देह में उष्णता, प्राण और वासनारहित सत्त्वशेष विद्यमान है। उन्होंने सूक्ष्म रूप से पति के अन्तःकरण में प्रवेश किया और उसकी अभिव्यक्ति की शक्ति को हल्का-सा स्पन्दित किया। अपने शरीर में लौटकर पास के पुष्पस्थल पर बैठीं और सामगान करने लगीं। स्वर सुनते ही राजा की चेतना बाहर की ओर खुली। उन्होंने आँखें खोलीं और सामने कुम्भ को देखा।
शिखिध्वज ने गुरु का स्वागत किया। कुम्भ ने पूछा कि क्या उन्हें परम विश्राम मिला, भोग की तृष्णा और हेय-उपादेय का आग्रह शान्त हुआ, और मन प्रारब्ध से आने वाले व्यवहार में सम रहता है। राजा ने उत्तर दिया कि बहुत काल बाद उन्हें पूर्ण तृप्ति मिली है। ज्ञान पाने या छोड़ने के लिए अलग वस्तु शेष नहीं रही। वे मोह, भय और आग्रह से हल्के होकर अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हैं। कुम्भ ने उन्हें किसी जड़ निष्क्रियता में रोकने की जगह इसी समझ के साथ जीवन के व्यवहार में लौटने दिया।
दोनों तीन मुहूर्त तक अध्यात्म की बातें करते रहे। फिर दूसरे शिखर, सरोवर और वन में घूमे। अगले आठ दिन साथ-साथ बीते। उसके बाद वे जंगल, नदी, ग्राम, नगर, तीर्थ और आश्रमों से होकर विचरते रहे। कभी धूल, कभी चन्दन, कभी भस्म, कभी पत्ते और कभी दिव्य वस्त्र उनके शरीर पर होते। भोजन, पूजा और विश्राम में भी मित्रता का भाव था। घर और परदेश का विकल्प उनके मन को बाँधता न था। चूड़ाला ने पति की नयी शान्ति को निकट से देखा, फिर उस स्थिरता को भोग, अपमान और ईर्ष्या के स्पर्श में भी परखने का विचार किया।
कुम्भ का शाप और मदनिका का विवाह
एक दिन कुम्भ ने कहा कि वे स्वर्ग जाकर सायंकाल तक लौटेंगे। आकाश में दृष्टि से ओझल होते ही चूड़ाला अपने रूप में उज्जयिनी गईं, राजकार्य देखा और फिर उदास मुख वाले कुम्भ के रूप में वापस आईं। शिखिध्वज ने चिन्ता का कारण पूछा। कुम्भ ने एक काल्पनिक वृत्तान्त सुनाया। स्वर्ग से लौटते हुए मेघों के बीच दुर्वासा मिले। कुम्भ ने उनके गहरे नीले वस्त्र पर परिहास करते हुए कहा कि वे अभिसारिका नारी जैसे लगते हैं। दुर्वासा ने क्रुद्ध होकर शाप दिया कि कुम्भ प्रत्येक रात स्तन, केश और स्त्रीलक्षणों से युक्त युवती बनेंगे।
शिखिध्वज ने मित्र को सान्त्वना दी। सुख-दुख प्रारब्ध के अनुसार देह पर आते हैं; ज्ञानवान की बुद्धि उनमें सम रह सकती है। चन्द्रमा निकला तो कुम्भ का शरीर धीरे-धीरे युवती का रूप लेने लगा। राजा ने उस परिवर्तन को देखा और कहा कि अवश्यम्भावी देह-दशा पर व्यर्थ शोक बढ़ाने से कुछ सिद्ध न होगा। प्रातः कुम्भ का पुरुषरूप लौट आया। अब दिन में कुम्भ और रात में युवती बनकर चूड़ाला पति के साथ कैलास, मन्दर, महेन्द्र, सुमेरु और सह्यगिरि के प्रदेशों में घूमने लगीं।
कुछ दिन बाद रात के रूप ने अपना नाम मदनिका रखा और शिखिध्वज के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा। उसने कहा कि प्रतिदिन स्त्रीरूप धारण करने पर उसके लिए योग्य पति चुनना समयोचित होगा, और तीनों लोकों में शिखिध्वज ही उसे स्वीकार्य हैं। राजा ने कर्मफल की इच्छा छोड़ चुके मन से उत्तर दिया कि इस सम्बन्ध से उन्हें शुभ या अशुभ की कोई आकांक्षा नहीं; कुम्भ को जो उचित लगे वही किया जाए।
उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा थी। विवाह महेन्द्र पर्वत पर होना निश्चित हुआ। दोनों ने वन से चन्दन, पुष्प और दूसरी सामग्री जुटाई। मन्दाकिनी में स्नान करके देवताओं, पितरों और ऋषियों का पूजन किया। सूर्यास्त के बाद संध्या, जप और अघमर्षण पूरे हुए। कुम्भ मदनिका बनी और बोली, “मैं आपकी भार्या मदनिका हूँ। अग्नि प्रज्वलित कर विधिपूर्वक मेरा पाणिग्रहण कीजिए।”
उन्होंने लताओं और फूलों से वेदी सजाई, चन्दन की लकड़ियों से अग्नि जलाई और पूर्वाभिमुख बैठे। शिखिध्वज ने मदनिका का हाथ ग्रहण किया। दोनों ने अग्नि की तीन बार प्रदक्षिणा की और लाजाहोम सम्पन्न किया। फिर पहले से सजाई गई कन्दरा में पुष्पशय्या पर गए। दिन में वे गुरु-मित्र के रूप में साथ रहते और रात में पति-पत्नी के रूप में। कई मास इसी क्रम में बीते। चूड़ाला अब देखना चाहती थीं कि शिखिध्वज की शान्ति मधुर निकटता और असाधारण सुखों के बीच भी समान रहती है या नहीं।
उन्होंने योगमाया से इन्द्र, देवताओं और अप्सराओं का एक दिव्य समूह प्रकट किया। शिखिध्वज ने अतिथि-धर्म से इन्द्र की पूजा की और आगमन का प्रयोजन पूछा। इन्द्र ने कहा कि देवगण उनके गुण सुनकर प्रतीक्षा कर रहे हैं; वे सिद्धमार्ग से स्वर्ग चलें और वहाँ के उत्तम भोग स्वीकार करें। शिखिध्वज ने शान्ति से उत्तर दिया कि परमात्मा की सत्ता उनके लिए प्रत्येक स्थान को पूर्ण बनाती है। किसी एक देश को स्वर्ग मानकर वहाँ जाने की इच्छा उनके भीतर उठती नहीं। वे जहाँ हैं वहीं सन्तुष्ट हैं। इन्द्र ने फिर आग्रह किया; राजा मौन रहे। अन्त में इन्द्र आशीर्वाद देकर देवसमूह सहित अदृश्य हो गए।

चूड़ाला ने देखा कि भोग का आमन्त्रण उन्हें खींच न सका। अगली परीक्षा में राग और क्रोध दोनों का स्पर्श रखा गया। एक चाँदनी रात शिखिध्वज नदी-तट पर संध्या और जप में लगे थे। मदनिका पास के सघन पुष्पकुञ्ज में गई और संकल्प से एक सुन्दर पुरुष रचा। उसने पुष्पशय्या पर उस पुरुष के साथ आलिङ्गन की अवस्था बनाई। जप के बाद राजा मदनिका को खोजते हुए वहाँ पहुँचे और दोनों को देखा। मायानिर्मित पुरुष भयभीत हुआ। शिखिध्वज ने सहज स्वर में कहा, “भय मत करो। तुम दोनों सुखपूर्वक रहो, मैं विघ्न न डालूँगा।” फिर वे वहाँ से चले गए और एक शिला पर समाधि में बैठ गए।
दो घड़ी बाद चूड़ाला ने दृश्य समेटा। मदनिका लज्जित मुख से राजा के पास गई और अपराध का कारण बनाकर क्षमा माँगी। शिखिध्वज ने कहा कि उनके भीतर क्रोध नहीं उठा। प्राचीन सामाजिक मर्यादा का उल्लेख करते हुए उन्होंने मदनिका को फिर पत्नी के रूप में स्वीकार करने से विराम लिया, पर मित्रभाव से साथ रहने का प्रस्ताव रखा। इस उत्तर में आकर्षण, अपमान और प्रतिशोध की पकड़ ढीली हो चुकी थी। चूड़ाला को विश्वास हुआ कि ज्ञान विचार की घड़ी से आगे बढ़कर मन के कठिन स्पर्शों में भी स्थिर है।
गुरु का असली रूप और राज्य में वापसी
चूड़ाला ने मदनिका का रूप उसी स्थान पर छोड़ दिया और अपने परिचित शरीर में प्रकट हुईं। शिखिध्वज ने सामने खड़ी रानी को देखा तो विस्मित रह गए। चूड़ाला ने कहा, “मैं आपकी चूड़ाला हूँ। कुम्भ और मदनिका के रूप आपके बोध के लिए रचे गए थे। यदि पूरा क्रम देखना चाहते हैं तो ध्यान में प्रवेश कीजिए।”

राजा ने आसन लगाया। एक मुहूर्त के ध्यान में उन्होंने अपने राज्य-परित्याग से उस क्षण तक की घटनाएँ देखीं। आधी रात का प्रस्थान, मन्दराचल का तप, कुम्भ का आगमन, दोनों दृष्टान्त, आश्रम का दहन, समाधि, दुर्वासा का कथित शाप, मदनिका, इन्द्र और पुष्पकुञ्ज का दृश्य एक ही क्रम में खुल गया। ध्यान से उठे तो उनके नेत्र प्रसन्न थे। उन्होंने दोनों भुजाएँ फैलाकर चूड़ाला का आलिङ्गन किया और प्रेमाश्रु बहने लगे।
शिखिध्वज ने उनकी बुद्धि और दीर्घ धैर्य की प्रशंसा की। उन्होंने स्वीकार किया कि जिस भवकूप में वे डूब रहे थे, वहाँ से चूड़ाला ने उन्हें निकाला। पत्नी ने सखा, शिक्षक और गुरु की सभी भूमिकाएँ निभाईं। राजा ने कहा, “तुम मेरी गुरु हो। तुम्हारी कृपा से मैं भवसागर पार कर सका। जिस-जिसमें तुम हो, उसी-उसीमें मैं भी हूँ; अब मेरी निष्ठा उस एक चिन्मय आत्मा में है।”
चूड़ाला ने उत्तर दिया कि पति को व्याकुल देखकर उनकी अपनी चिन्ता बनी रहती थी। उन्हें ज्ञान में स्थित कर उन्होंने उस चिन्ता को भी शान्त किया। सेवा और स्वार्थ का यह सम्बन्ध कथा में बहुत सूक्ष्म है। प्रिय व्यक्ति का बोध उसके साथ रहने वाले के मन को भी मुक्त करता है; करुणा किसी ऊँचे आसन से दिया गया उपकार बनकर नहीं आती। चूड़ाला ने उनके पुराने कर्मों का उपहास न किया। उन्होंने पूछा कि अब वे अपने पूर्व व्यवहार को किस दृष्टि से देखते और शेष जीवन में क्या चाहते हैं।
शिखिध्वज ने कहा कि इच्छा और एकदेशता की पकड़ हट गई है। प्राप्त वस्तु की प्रशंसा या निन्दा में मन डोलता नहीं। जो न्यायपूर्वक सामने आए, उसके अनुरूप व्यवहार किया जा सकता है। चूड़ाला ने तब उज्जयिनी लौटने का प्रस्ताव रखा। उनका विचार था कि दोनों राज्य-शासन में शेष आयु बिताएँ और समय आने पर विदेहमुक्त हों। राज्य के भोग की कामना उनके भीतर भी शान्त थी; प्रजापालन यथाप्राप्त कर्तव्य था। शिखिध्वज ने सहमति दी।
प्रातः चूड़ाला ने उनसे मुनि का क्षीण रूप छोड़कर राजा के योग्य तेजस्वी स्वरूप धारण करने को कहा। फिर संकल्प से विशाल सेना प्रकट की। हाथी, घोड़े, रथ, पैदल सैनिक, ध्वजाएँ और सामन्त वन में भर गए। दम्पती एक मदमस्त राजहाथी पर सवार हुए और महेन्द्र पर्वत से चले। मार्ग में शिखिध्वज उन स्थानों को दिखाते गए जहाँ तप के वर्षों की घटनाएँ घटी थीं। पर्वत, नदी, ग्राम और वन पार करके वे उज्जयिनी के निकट पहुँचे।
आगमन का समाचार मिला तो नगर के सामन्त और सेना स्वागत के लिए बाहर आए। तुरहियों का नाद हुआ, नागरिकों ने लाजा और पुष्प बरसाए और दोनों सेनाएँ मिलकर नगर में प्रविष्ट हुईं। राजमहल ध्वजा-पताकाओं से सजा था। सात दिनों तक उत्सव चला। शिखिध्वज ने राजसिंहासन सँभाला और चूड़ाला पटरानी के रूप में उनके साथ रहीं। ज्ञान के बाद लौटे राजकर्म को उन्होंने बन्धन की पुनरावृत्ति बनने न दिया। कथा के अनुसार दोनों ने दस हजार वर्ष तक पृथ्वी पर राज्य किया और देहावसान के बाद परमपद प्राप्त किया।