पार्वती की परीक्षा

ब्रह्माजी देवर्षि नारद से कहते हैं, सुनिए। देवताओं के अपने अपने धाम लौट जाने पर भगवान् शंकर पार्वती के तप की परीक्षा लेने के लिए समाधिस्थ हो गये। भक्तों के अधीन जो ठहरे, गिरिराजकुमारी की उस भारी तपस्या से रुद्रदेव भी विस्मय में पड़कर समाधि से विचलित हो उठे। तब हर ने वसिष्ठ आदि सप्तर्षियों का स्मरण किया, और स्मरण करते ही वे सातों ऋषि वहाँ आ पहुँचे। हँसते हुए शिव बोले, हे सप्तर्षियो! गिरिराजकुमारी पार्वती गौरी शिखर पर मुझे पति रूप में पाने के लिए तप कर रही हैं। आप मेरी आज्ञा से वहाँ जाइए और प्रेमपूर्ण हृदय से उनकी दृढ़ता की परीक्षा कीजिए; वहाँ आपको सर्वथा छलयुक्त बातें कहनी हैं, इसमें संशय न कीजिए।

सप्तर्षियों की परीक्षा

वे सातों ऋषि तुरंत उस स्थान पर जा पहुँचे जहाँ जगन्माता तपस्या की मूर्तिमती सिद्धि के समान विराजमान थीं। मस्तक झुकाकर उन्होंने पूछा, हे गिरिराजनन्दिनि! आप किसलिए तप कर रही हैं और किस फल को पाना चाहती हैं? पार्वती ने गोपनीय होने पर भी सच कह दिया, मुनीश्वरो! देवर्षि नारद का उपदेश पाकर, भगवान् रुद्र मेरे पति हों, इसी मनोरथ को लिये मैं तप कर रही हूँ। मेरा मनरूपी पक्षी बिना पंख के ही हठपूर्वक आकाश में उड़ रहा है; इस आशा को करुणानिधान शंकर ही पूर्ण कर सकते हैं।

यह सुनकर मुनि हँस पड़े और छलपूर्ण मिथ्या वचन बोले। गिरिराजनन्दिनि! देवर्षि नारद व्यर्थ ही अपने को पण्डित मानते हैं; वे छल कपट से दूसरों के चित्त को मोह में डाल देते हैं। दक्ष के पुत्रों को उन्होंने ऐसा समझाया कि वे घर लौटकर न आ सके; विद्याधर चित्रकेतु का घर उजाड़ दिया; प्रह्लाद को चेला बनाकर हिरण्यकशिपु से बड़े दुःख दिलवाये। उनके भुलावे में आकर आप भी दुष्कर तप करने लगीं। हे बाले! जिन रुद्र के लिए यह तप है, वे सदा उदासीन और काम के शत्रु हैं; न उनका कहीं घर है न कुल का पता। पहले भी उन्होंने साध्वी सती से विवाह किया, पर कुछ दिन निर्वाह न कर सके और उसे त्याग दिया। ऐसे वर के साथ किसी स्त्री का निर्वाह कैसे होगा! आप घर लौट चलिए; आपके योग्य वर तो सद्गुणों से युक्त वैकुण्ठवासी विष्णु हैं, उन्हीं से हम आपका विवाह करा देंगे।

जगदम्बिका हँस पड़ीं और बोलीं, मुनीश्वरो! आपने अपनी समझ से कहा, पर मेरा हठ छूटनेवाला नहीं है। देवर्षि का उपदेश मेरे लिए परम हितकारक है, उसे मैं कभी न छोड़ूँगी। शिव साक्षात् परब्रह्म हैं, केवल भक्त के लिए अवधूत रूप धरते हैं; भूषण की रुचि तो मायालिप्त जीवों को होती है, ब्रह्म को नहीं। यदि शिव मुझसे विवाह न करेंगे तो मैं सदा कुमारी रह जाऊँगी, पर दूसरे का वरण कभी न करूँगी। यदि सूर्य पश्चिम में उगने लगे, मेरु अपने स्थान से हट जाय, अग्नि शीतलता अपना ले और कमल शिला पर खिलने लगे, तो भी मेरा हठ नहीं छूट सकता। यह मैं सच कहती हूँ। उनके इस निश्चय को जानकर सप्तर्षि जय जयकार करते और आशीर्वाद देकर शिव के पास लौट गये और सारा वृत्तान्त कह सुनाया।

जटाधारी ब्राह्मण

अब साक्षात् भगवान् शंकर ने स्वयं देवी के तप की परीक्षा लेने का विचार किया। परीक्षा के बहाने उन्हें देखने के लिए वे जटाधारी तपस्वी का रूप धरकर वन में गये, अपने तेज से प्रकाशमान अत्यन्त बूढ़े ब्राह्मण का रूप, हाथ में दण्ड और छत्र। आश्रम में देखा, देवी सखियों से घिरी वेदी पर बैठी हैं, चन्द्रमा की विशुद्ध कला सी। पार्वती ने उस तेजस्वी ब्राह्मण की पूजा की और प्रेमपूर्वक कुशल पूछा, आप कौन हैं और कहाँ से पधारे हैं? आप अपने तेज से इस वन को प्रकाशित कर रहे हैं।

ब्राह्मण ने कहा, मैं इच्छानुसार विचरनेवाला बूढ़ा ब्राह्मण हूँ, पवित्रबुद्धि, तपस्वी और परोपकारी। पर आप कौन हैं, किसकी पुत्री हैं, और इस निर्जन वन में किसलिए ऐसी तपस्या कर रही हैं जो मुनियों के लिए भी दुर्लभ है? क्या आप वेदमाता गायत्री हैं, अथवा लक्ष्मी या सरस्वती? पार्वती बोलीं, विप्रवर! न मैं गायत्री हूँ, न लक्ष्मी, न सरस्वती। इस समय हिमाचल की पुत्री पार्वती हूँ। पहले के जन्म में मैं प्रजापति दक्ष की पुत्री सती थी; एक दिन पिता ने मेरे पति की निन्दा की, तो कुपित होकर मैंने योग से शरीर त्याग दिया। इस जन्म में भी शिव मिले, पर कामदेव को भस्म करके मुझे छोड़कर चले गये। उनके विरह में तप्त होकर मैं गंगा के तट पर तप के लिए आ गयी, पर दीर्घकाल तप करके भी अपने प्राणवल्लभ को न पा सकी। अब मैं अग्नि में प्रवेश करूँगी, क्योंकि शिव ने मुझे स्वीकार नहीं किया; किन्तु जहाँ जहाँ जन्म लूँगी, उन्हीं का पति रूप में वरण करूँगी।

ऐसा कहकर पार्वती ब्राह्मण के सामने ही अग्नि में समा गयीं, यद्यपि वे बार बार रोकते रहे। पर प्रवेश करती हुई तपस्विनी के तप के प्रभाव से वह आग उसी क्षण चन्दन के लेप सी शीतल हो गयी। क्षण भर आग के भीतर रहकर जब पार्वती ऊपर उठने लगीं, तब ब्राह्मण रूपधारी शिव हँसते हुए फिर बोले, अहो भद्रे! आपका तप मेरी समझ में नहीं आया। अग्नि से शरीर नहीं जला, यह तप की सफलता है; पर अब तक मनोरथ नहीं मिला, यह उसकी विफलता। अपने अभीष्ट को मुझे सच सच बताइए। पार्वती ने अपनी सखी विजया को उत्तर देने के लिए प्रेरित किया। विजया बोली, साधो! मेरी सखी हिमाचल की पुत्री हैं, पार्वती और काली नाम से विख्यात; ये शिव के सिवा किसी को नहीं चाहतीं और तीन हजार वर्षों से केवल पिनाकपाणि को पति रूप में पाने के लिए तप कर रही हैं। ब्राह्मण हँसकर बोले, इसमें तो मुझे परिहास जान पड़ता है; यदि सच है तो पार्वती स्वयं कहें।

शिव ही शिव की निन्दा

तब पार्वती बोलीं, विप्रवर! मेरी सखी ने जो कहा वह सत्य है; मन, वाणी और क्रिया से मैंने पति भाव से शिव का वरण किया है। जानती हूँ कि वह वस्तु दुर्लभ है, फिर भी मन के विश्वास से तप कर रही हूँ। यह सुनकर ब्राह्मण जाने को उठे, तो पार्वती ने प्रणाम कर कहा, विप्रवर! ठहरिये और मेरे हित की बात बताइए। तब ब्राह्मण रुककर बोले, देवि! महादेव को मैं सब प्रकार से जानता हूँ, इसलिए यथार्थ कहता हूँ, सुनिए। वृषभ की ध्वजावाले महादेव सारे शरीर में भस्म रमाये रहते हैं, सिर पर जटा, धोती की जगह बाघ का चाम और चादर की जगह हाथी की खाल ओढ़ते हैं। हाथ में भीख का खप्पर, अंगों में साँप लिपटे, विष खाकर पुष्ट, नेत्र भद्दे और डरावने, भुजाएँ एक दो नहीं, दस। जन्म कब कहाँ किससे हुआ, आज तक प्रकट नहीं; घर गृहस्थी से सदा दूर, नंग धड़ंग, भूत प्रेतों को साथ रखनेवाले। ऐसे वर को आप किस कारण पति बनाना चाहती हैं?

आप तो स्त्रियों में रत्न हैं और आपके पिता समस्त पर्वतों के राजा। फिर सोने की अशर्फी के बदले उतना ही बड़ा काँच क्यों लेना चाहती हैं? उत्तम चन्दन छोड़कर अंगों में कीचड़, सूर्य का तेज छोड़कर जुगनू की चमक, रत्नों का भंडार त्यागकर लोहा पाने की यह इच्छा भली नहीं। कहाँ आपके नेत्र प्रफुल्ल कमल से और कहाँ उनकी तीन भद्दी आँखें; आपके अंगों में चन्दन का अंगराग और उनके शरीर में चिता का भस्म; आपके कंठ में सुन्दर हार और उनके गले में नरमुंडों की माला। यदि उनके पास धन होता तो दिगम्बर क्यों रहते? सवारी में एक बूढ़ा बैल, और कुछ नहीं। वर में जो गुण खोजे जाते हैं, एक भी उनमें नहीं। आपके परम प्रिय कामदेव को भी उन्हीं ने भस्म कर दिया। दक्ष ने तो अपने यज्ञ में अपनी पुत्री सती को इसीलिए नहीं बुलाया कि वह कपालधारी भिक्षुक की भार्या थी; सब देवताओं को बुलाया, पर शंभु को छोड़ दिया, और उसी अपमान से सती ने अपने प्राण भी छोड़े। उनकी न जाति दिखती है, न विद्या न ज्ञान; पिशाच उनके सहायक और विष उनके कंठ में। मुझे तो यह सम्बन्ध नहीं रुचता; उस असत् वस्तु से मन हटा लीजिए। फिर जैसी इच्छा हो, वैसा कीजिए; मुझे और कुछ नहीं कहना।

पार्वती का प्रत्युत्तर

यह सुनकर पार्वती उस निन्दक पर मन ही मन कुपित हो उठीं और बोलीं, बाबाजी! अब तक तो समझती थी कि कोई ज्ञानी महात्मा पधारे हैं, पर अब आपकी कलई खुल गयी। आपने कहा था कि आप शिव को जानते हैं; यदि यह सच होता तो ऐसी बुद्धि के विरुद्ध बात न बोलते। महेश्वर कभी अपनी लीलाशक्ति से अद्भुत वेष धर लेते हैं, पर वास्तव में वे साक्षात् परब्रह्म परमात्मा हैं। शिव निर्गुण ब्रह्म हैं, कारणवश सगुण हुए हैं; समस्त गुण जिनके स्वरूप हैं, उनकी जाति और कुल कैसा? कल्प के आरम्भ में शंभु ने ही श्रीविष्णु को उत्पन्न होते ही सम्पूर्ण वेद प्रदान किये। उनके भजन से जीव मृत्यु को जीत लेता है, इसीलिए तीनों लोकों में उनका नाम मृत्युंजय प्रसिद्ध है। उन्हीं के अनुग्रह से विष्णु ने विष्णुत्व, ब्रह्मा ने ब्रह्मत्व और देवताओं ने देवत्व पाया।

जिनके सामने आठों सिद्धियाँ सिर झुकाये खड़ी रहती हैं, उनके लिए कौन सी वस्तु दुर्लभ है? देवता जिस भस्म को उनके शरीर से गिरा पाकर सिर पर धारण करते हैं, वह अपवित्र कैसे हो सकता है; शिव के अंगों के स्पर्श से तो अपवित्र वस्तु भी पवित्र हो जाती है। जो तत्त्व को न जानकर शिव की निन्दा करता है, उसका जन्म भर का संचित पुण्य भस्म हो जाता है। आपने यहाँ महादेव की निन्दा की और मैंने आपकी पूजा की, इससे मैं भी पाप की भागिनी हो गयी। फिर अधिक रुष्ट होकर बोलीं, अरे दुष्ट! आपने कहा कि आप शंकर को जानते हैं, पर निश्चय ही उन सनातन शिव को आपने नहीं जाना। रुद्र को आप जैसा भी कहें, वे नित्य निर्विकार शिव ही मेरे अभीष्टतम देव हैं। ब्रह्मा और विष्णु भी उन हर के समान नहीं हो सकते, फिर दूसरे देवताओं की क्या बात, क्योंकि वे सदा काल के अधीन हैं। इसी शुद्ध बुद्धि से विचारकर मैं उन सर्वेश्वर के लिए वन में तप कर रही हूँ।

इतना कहकर पार्वती फिर शिव का ध्यान करने लगीं। ब्राह्मण ज्यों ही कुछ और कहने को उठा, त्यों ही उसकी निन्दा से विमुख पार्वती ने सखी विजया से कहा, सखी! इस अधम ब्राह्मण को यत्नपूर्वक रोकिए, यह फिर शिव की निन्दा ही करेगा। जो निन्दा करता है उसे ही नहीं, जो सुनता है वह भी पाप का भागी होता है। इसका मुँह भी नहीं देखना चाहिए; चलिए, हम इसी क्षण किसी दूसरे स्थान को चलें, जिससे इस अज्ञानी के साथ फिर बात करने का अवसर न मिले।

प्रत्यक्ष दर्शन

पार्वती ने ज्यों ही अन्यत्र जाने को पैर उठाया, त्यों ही भगवान् शिव अपने साक्षात् स्वरूप में प्रकट हो गये और प्रिया का हाथ पकड़ लिया। जिस रूप का वे ध्यान करती थीं, वही सुन्दर रूप धारण कर शिव ने उन्हें दर्शन दिया। पार्वती ने लज्जावश मुँह नीचे कर लिया।

शिव बोले, प्रिये! मुझे छोड़कर कहाँ जाएँगी? अब मैं फिर कभी आपका त्याग न करूँगा। मैं प्रसन्न हूँ, वर माँगिए; आपके लिए मुझे कुछ भी अदेय नहीं। देवि! आज से मैं तपस्या के मोल खरीदा हुआ आपका दास हूँ; आपके बिना एक क्षण भी युग के समान बीतता है। लज्जा छोड़िए, आप तो मेरी सनातन पत्नी हैं। लोकलीला का अनुसरण करनेवाले मुझ स्वजन ने नाना प्रकार से बारंबार आपकी परीक्षा ली, इस अपराध को क्षमा कर दीजिए। तीनों लोकों में आप जैसी अनुरागिणी मुझे दूसरी नहीं दिखती; मैं सर्वथा आपके अधीन हूँ। आप मेरी पत्नी हैं और मैं आपका वर; अब शीघ्र ही मैं आपको अपने निवास उत्तम पर्वत कैलास ले चलूँगा।

देवाधिदेव के ऐसा कहते ही पार्वती आनन्दमग्न हो उठीं। तप से उपजा उनका सारा कष्ट मिट गया, सारी थकावट दूर हो गयी; क्योंकि परिश्रम का फल पा जाने पर प्राणी का पहले का सारा श्रम नष्ट हो जाता है। फिर उन्होंने पास ही खड़े अपने स्वामी से हिमालय के घर विधिपूर्वक विवाह का अनुरोध किया, पर वह अगली कथा है।

आधार: शिवपुराण (गीता प्रेस, संक्षिप्त शिवपुराणाङ्क), रुद्रसंहिता (पार्वती खण्ड)