सलोक महला 9

सलोक महला 9

गुरु तेग बहादुर जी (M9) · 57 सलोक · अंग 1426-1429

अगर एक पंक्ति याद रखनी हो

गुन गोबिंद गाइओ नही जनमु अकारथ कीनु ॥

“गोबिंद के गुण नहीं गाए, जनम बेकार किया।”

सलोक महला 9, सलोक 1

यह आज, दिल्ली में

दिल्ली के सीस-गंज साहिब (Chandni Chowk में, लाल किले से 5 मिनट) में रोज़ शाम सलोक महला 9 का path होता है। यह गुरु तेग बहादुर जी की वो वाणी है जो उन्होंने अपने अंतिम वर्षों में, 1675 की शहादत से पहले, अपने बेटे गोबिंद राय (बाद में गुरु गोबिंद सिंह) के साथ साझा की।

सलोक महला 9 गुरु तेग बहादुर जी की 57-सलोक रचना है, आदि ग्रंथ के अंतिम section में, अंग 1426-1429 पर।

इन सलोकों का mood spare और Stoic है। गुरु तेग बहादुर जी 11 साल अपने पिता (गुरु हर गोबिंद जी) से अलग जंगल में बिताए, फिर 20 साल Bakala में retreat-mode में रहे, फिर गुरुगद्दी संभाली। उनकी वाणी उसी monastic-experience से निकली है।

1675 में औरंगज़ेब ने उन्हें Chandni Chowk में सर कलम करवाया, Kashmiri Pandits की रक्षा के लिए। यह सलोक उन्हीं अंतिम वर्षों की reflections हैं, मृत्यु-aware, मगर भयभीत नहीं।

थीम: हरि-नाम के बिना जीवन का क्या मूल्य? 57 सलोक इसी एक प्रश्न के अलग-अलग reformulations हैं। हर सलोक 2 पंक्तियों का, मगर compressed।

दिल्ली के Sikh-घरों में आज भी सलोक महला 9 का पाठ बहुत common है, खासतौर पर शाम की रहिरास के बाद। बच्चे यह सलोक याद कर के बड़े होते हैं।

सब अंग, क्रम से

पूरी रचना verse-by-verse इन अंगों पर है:

कैसे पढ़ें

एक approach: पहले इस intro page को पढ़िए, फिर अंगों पर क्रम से जाइए। हर अंग पर 5-10 मिनट लगेंगे। पूरी रचना 90-120 मिनट में पूरी होती है।

दूसरा approach: अगर समय कम है, सिर्फ़ पहले अंग और आख़िरी अंग पढ़िए। बीच का flow आप mentally fill कर सकते हैं अगर context पता है।

तीसरा approach: कोई एक अंग जो आज resonate करे, उसी पर ध्यान दीजिए। ग्रंथ साहिब का design “हुकमनामा” वाला है, हर रोज़ कुछ एक अंग आज के लिए है।

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