सलोक महला 9 · Salok Mahalla 9
गुरु तेग बहादुर की वाणी। गुरु गोबिंद सिंह से ठीक पहले की आख़िरी आवाज़, जो ग्रंथ के अन्तिम पन्नों पर एक ही बात बार-बार कहती है: यह सब बीत जाएगा, और जो साथ रहेगा वह सिर्फ़ नाम है।
पहले एक बात
ग्रंथ के आख़िरी पन्ने हैं। जपुजी से शुरू हुई पूरी यात्रा यहाँ अपने अन्तिम मोड़ पर आती है, और जो आवाज़ हम सुनते हैं वह गुरु तेग बहादुर जी की है, नौवें गुरु। यह सलोक उन्होंने ही रचे, और गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1706 में ग्रंथ का संकलन पूरा करते हुए इन्हें यहाँ जोड़ा। यानी यह दसवें गुरु से ठीक पहले की आवाज़ है, एक तरह से पूरी गुरु-परम्परा का समापन-स्वर।
तेग बहादुर जी ने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत और यात्रा में बिताया, असम और बिहार की राहों पर। और 1675 में औरंगज़ेब के हुक्म पर दिल्ली के चाँदनी चौक में उनकी शहादत हुई, कश्मीरी पंडितों के धर्म की रक्षा करते हुए। उस स्थल पर आज सीस-गंज गुरुद्वारा है। इस पृष्ठभूमि को मन में रखिए, क्योंकि जो वाणी आगे आ रही है, वह किसी कुर्सी पर बैठ कर नहीं, जीवन और मृत्यु के बीच खड़े हो कर कही गई है।
57 सलोक हैं, हर एक दो-दो पंक्तियों का छोटा दोहा। और एक ही धागा सब में बुना है: दुनिया क्षणभंगुर है, शरीर बीत जाने वाला है, धन-परिवार साथ नहीं देंगे, और जो टिकता है वह सिर्फ़ हरी का नाम है। पहला सलोक ही पूरी बात कह देता है, और बाक़ी 56 उसी एक स्वर को अलग-अलग कोनों से छूते हैं। आइए, साथ चलते हैं।
इसे कैसे पढ़ें
धीरे, एक-एक सलोक रुक कर। ये दोहे छोटे हैं, पर हर एक अपने आप में पूरा है, उसे जल्दी में पढ़ना उसका हक़ मारना है। एक प्यारी बात महसूस कीजिए: बार-बार एक ही टेक लौटती है, “कहु नानक भजु हरि मना”, कह नानक, हे मन, हरी को भज। इसे एक थाप की तरह सुनिए, जो पूरे पाठ में चलती रहती है। और आख़िरी सलोक (53 से 57 तक) एक अलग सुर पकड़ते हैं, गज और ग्राह की कथा से ले कर “राम नामु उर मै गहिओ” तक, यहाँ वाणी सलाह से प्रार्थना में बदल जाती है।
शुरुआत · सलोक 1
दुनिया की क्षणभंगुरता तेग बहादुर जी की वाणी का केन्द्रीय धागा है, और पहली ही पंक्ति में वह सीधा सवाल रख देते हैं: अगर परमात्मा के गुण कभी गाए ही नहीं, तो यह दुर्लभ मानस-जन्म निकम्मा कर लिया। और साथ ही एक सुंदर उपमा, हरी को इस तरह जीवन का आसरा बनाओ जैसे मछली पानी को।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक महला 9 ॥
गुन गोबिंद गाइओ नही जनमु अकारथ कीनु ॥
कहु नानक हरि भजु मना जिह बिधि जल कउ मीनु ॥1॥
सलोक 2 · 3
अगला सवाल और भी कोमल है। विषयों में इतना डूबे क्यों रहते हैं कि पल भर के लिए भी उनसे मन नहीं हटता? हरी का भजन वह कवच है जिससे जमों का फंदा गले में नहीं पड़ता। और फिर समय की याद, जवानी बेपरवाही में बीत गई, बुढ़ापे ने शरीर जीत लिया, और उम्र लगातार बीतती जा रही है।
बिखिअन सिउ काहे रचिओ निमख न होहि उदासु ॥
कहु नानक भजु हरि मना परै न जम की फास ॥2॥
तरनापो इउ ही गइओ लीओ जरा तनु जीति ॥
कहु नानक भजु हरि मना अउध जातु है बीति ॥3॥
सलोक 4 · 5
बुढ़ापा आ गया, मौत सिर पर आ पहुँची, फिर भी समझ नहीं आती, तो गुरु बहुत प्यार से झिड़कते हैं, हे बावले, अब भी हरी को क्यों नहीं भजता? और एक बात जो पूरे संग्रह की रीढ़ है, यह धन, यह स्त्री, यह सारी जायदाद, इनमें से एक भी अन्त तक साथ नहीं जाने वाला। इसे सच्ची बात समझ लीजिए।
बिरधि भइओ सूझै नही कालु पहूचिओ आनि ॥
कहु नानक नर बावरे किउ न भजै भगवानु ॥4॥
धनु दारा संपति सगल जिनि अपुनी करि मानि ॥
इन मै कछु संगी नही नानक साची जानि ॥5॥
सलोक 6 · 7
अब रुख बदलता है, और एक सांत्वना आती है। वह प्रभू पतितों को तारने वाला है, सारे डर हरने वाला, अनाथों का नाथ, और वह सदा आपके साथ ही बसता है। फिर एक उलाहना, जिसने शरीर दिया, धन दिया, उसी से प्रेम नहीं जोड़ा, तो अब दीन-हीन बन कर घबराते क्यों फिरते हैं?
पतित उधारन भै हरन हरि अनाथ के नाथ ॥
कहु नानक तिह जानीऐ सदा बसतु तुम साथि ॥6॥
तनु धनु जिह तो कउ दीओ तां सिउ नेहु न कीन ॥
कहु नानक नर बावरे अब किउ डोलत दीन ॥7॥
सलोक 8 · 9
जिसने शरीर, धन, जायदाद, सुख, सुंदर घर, सब कुछ दिया, उसका सिमरन क्यों नहीं करते? और एक निश्चय, सारे सुखों का दाता एक राम ही है, उसके बराबर कोई दूसरा नहीं, और उसे सिमरते हुए ऊँची आत्मिक अवस्था अपने आप मिल जाती है।
तनु धनु संपै सुख दीओ अरु जिह नीके धाम ॥
कहु नानक सुनु रे मना सिमरत काहि न रामु ॥8॥
सभ सुख दाता रामु है दूसर नाहिन कोइ ॥
कहु नानक सुनि रे मना तिह सिमरत गति होइ ॥9॥
सलोक 10 · 11
वही टेक फिर लौटती है, उसी का भजन कर जिसका सिमरन ऊँची अवस्था देता है, क्योंकि उम्र नित घटती जा रही है। और फिर एक गहरी याद, हे चतुर, हे समझदार, यह शरीर पाँच तत्वों से बना है, और दोबारा उन्हीं तत्वों में लीन हो जाएगा, तो इसके झूठे मोह में फँस कर सिमरन क्यों भूल रहे हैं?
जिह सिमरत गति पाईऐ तिह भजु रे तै मीत ॥
कहु नानक सुनु रे मना अउध घटत है नीत ॥10॥
पांच तत को तनु रचिओ जानहु चतुर सुजान ॥
जिह ते उपजिओ नानका लीन ताहि मै मानु ॥11॥
सलोक 12 · 13
संत जनों ने पुकार कर बता दिया, परमात्मा हर शरीर में बसता है, उसी को भज, और संसार-समुंदर से पार लाँघ जाएगा। और फिर एक सुंदर परिभाषा, जिसे सुख-दुख छू नहीं सकते, जिसे लोभ-मोह-अहंकार पोह नहीं सकते, वही मनुष्य साक्षात भगवान का रूप है।
घट घट मै हरि जू बसै संतन कहिओ पुकारि ॥
कहु नानक तिह भजु मना भउ निधि उतरहि पारि ॥12॥
सुखु दुखु जिह परसै नही लोभु मोहु अभिमानु ॥
कहु नानक सुनु रे मना सो मूरति भगवान ॥13॥
सलोक 14 · 15
यहाँ एक जोड़ा सलोक आता है, दोनों एक ही गहरी बात के दो रूप। जिसे स्तुति और निंदा एक जैसी लगे, जिसे सोना और लोहा एक समान दिखे, समझ लो उसे मोह से छुटकारा मिल गया। और जिसके हृदय में हर्ष-शोक अपना ज़ोर न डाल सकें, जिसे वैरी और मित्र एक से लगें, वही सच में मुक्त है।
उसतति निंदिआ नाहि जिहि कंचन लोह समानि ॥
कहु नानक सुनि रे मना मुकति ताहि तै जानि ॥14॥
हरखु सोगु जा कै नही बैरी मीत समानि ॥
कहु नानक सुनि रे मना मुकति ताहि तै जानि ॥15॥
सलोक 16 · 17
निडरता की एक सुंदर कसौटी, जो किसी को डराता नहीं और किसी से डरता नहीं, उसी को सच्चा ज्ञानी समझो। और फिर वैराग्य की असली कसौटी, जिसने सारी माया त्याग दी और वैराग का भेष धारण किया, उसी के माथे पर सच्चा भाग्य जागा समझो।
भै काहू कउ देत नहि नहि भै मानत आन ॥
कहु नानक सुनि रे मना गिआनी ताहि बखानि ॥16॥
जिहि बिखिआ सगली तजी लीओ भेख बैराग ॥
कहु नानक सुनु रे मना तिह नर माथै भागु ॥17॥
सलोक 18 · 19
जिसने माया का मोह छोड़ दिया और सारे विकारों से उपराम हो गया, उसके हृदय में प्रत्यक्ष परमात्मा का निवास हो जाता है। और जिसने करतार से गहरी सांझ डाल कर अपने भीतर का अहंकार त्याग दिया, यह सच मान लीजिए, वही मनुष्य मुक्त है।
जिहि माइआ ममता तजी सभ ते भइओ उदासु ॥
कहु नानक सुनु रे मना तिह घटि ब्रहम निवासु ॥18॥
जिहि प्रानी हउमै तजी करता रामु पछानि ॥
कहु नानक वहु मुकति नरु इह मन साची मानु ॥19॥
सलोक 20 · 21
इस कलेशों भरे संसार में हरी का नाम ही सारे डर नाश करता है और खोटी मति दूर करता है, जो उसे रात-दिन जपता है उसके सब काम सफल होते हैं। और एक सीधी सलाह, जीभ से गोबिंद के गुण भजो, कानों से हरी का नाम सुनो, फिर जमों के घर नहीं पड़ोगे।
भै नासन दुरमति हरन कलि मै हरि को नामु ॥
निसि दिनु जो नानक भजै सफल होहि तिह काम ॥20॥
जिहबा गुन गोबिंद भजहु करन सुनहु हरि नामु ॥
कहु नानक सुनि रे मना परहि न जम कै धाम ॥21॥
सलोक 22 · 23
जो ममता, लोभ, मोह, अहंकार दूर करता है, वह स्वयं तो पार लाँघता ही है, औरों को भी बचा ले जाता है। और फिर वही पुरानी याद नए शब्दों में, यह जगत सपने और तमाशे जैसा है, इसमें भगवान के नाम के सिवा कुछ भी सच्चा साथी नहीं।
जो प्रानी ममता तजै लोभ मोह अहंकार ॥
कहु नानक आपन तरै अउरन लेत उधार ॥22॥
जिउ सुपना अरु पेखना ऐसे जग कउ जानि ॥
इन मै कछु साचो नही नानक बिनु भगवान ॥23॥
सलोक 24 · 25
माया की खातिर मनुष्य रात-दिन भटकता है, और करोड़ों में कोई एक विरला होता है जिसके मन में नारायण बसा रहता है। फिर एक बेहद कोमल उपमा, जैसे पानी से बुलबुला उठता और मिटता रहता है, वैसे ही यह जगत-रचना बनी हुई है, सुनो मित्र।
निसि दिनु माइआ कारने प्रानी डोलत नीत ॥
कोटन मै नानक कोऊ नाराइनु जिह चीति ॥24॥
जैसे जल ते बुदबुदा उपजै बिनसै नीत ॥
जग रचना तैसे रची कहु नानक सुनि मीत ॥25॥
सलोक 26 · 27
माया के नशे में अंधा हुआ मनुष्य कुछ नहीं सोचता, और भजन के बिना जमों के फंदे उस पर पड़े रहते हैं। फिर एक मीठी सलाह, अगर सदा सुख चाहते हो तो राम की शरण ले लो, क्योंकि यह मनुष्य-शरीर बड़ी मुश्किल से मिलता है, इसे यूँ ही मत गँवाओ।
प्रानी कछू न चेतई मदि माइआ कै अंधु ॥
कहु नानक बिनु हरि भजन परत ताहि जम फंध ॥26॥
जउ सुख कउ चाहै सदा सरनि राम की लेह ॥
कहु नानक सुनि रे मना दुरलभ मानुख देह ॥27॥
सलोक 28 · 29
मूर्ख बेसमझ लोग निरी माया के लिए भागते रहते हैं, और भजन के बिना उनका जन्म व्यर्थ बीत जाता है। और फिर सलोक 29, जो दो अंगों पर फैला है, जो रात-दिन हरी को भजता है उसे राम का ही रूप जानो, और यह सच मान लो कि हरी-जन और हरी में कोई फर्क नहीं।
माइआ कारनि धावही मूरख लोग अजान ॥
कहु नानक बिनु हरि भजन बिरथा जनमु सिरान ॥28॥
जो प्रानी निसि दिनु भजै रूप राम तिह जानु ॥
हरि जन हरि अंतरु नही नानक साची मानु ॥29॥
सलोक 30 · 31
जिसका मन माया में फँसा रहता है और जिसे गोबिंद का नाम भूला रहता है, उसका जीना किस काम का? और फिर वही चेतावनी दोहरी हो कर लौटती है, माया के नशे में अंधा हुआ जो राम को याद नहीं करता, भजन के बिना उसके गले में जमों के फंदे पड़े रहते हैं।
मनु माइआ मै फधि रहिओ बिसरिओ गोबिंद नामु ॥
कहु नानक बिनु हरि भजन जीवन कउने काम ॥30॥
प्रानी रामु न चेतई मदि माइआ कै अंधु ॥
कहु नानक हरि भजन बिनु परत ताहि जम फंध ॥31॥
सलोक 32 · 33
दुनिया का सच, सुख में अनेक संगी बन जाते हैं, पर दुख में कोई साथ नहीं, इसलिए उस हरी को भज जो अन्त समय भी साथ निभाता है। और फिर एक प्रार्थना, अनेक जन्मों की भटकन में भी जमों का डर नहीं मिटा, अब उसे भज जिसमें बसने पर कोई डर छू नहीं सकता।
सुख मै बहु संगी भए दुख मै संगि न कोइ ॥
कहु नानक हरि भजु मना अंति सहाई होइ ॥32॥
जनम जनम भरमत फिरिओ मिटिओ न जम को त्रासु ॥
कहु नानक हरि भजु मना निरभै पावहि बासु ॥33॥
सलोक 34 · 35
यहाँ स्वर बदल कर पहली बार अपनी ओर मुड़ता है, हे भगवान, मैंने बहुत यतन किए पर मन का अहंकार नहीं मिटा, यह खोटी मति से चिपका रहता है, अब आप ही रक्षा करो। और फिर जीवन की तीन अवस्थाएँ, बचपन, जवानी, बुढ़ापा, भजन के बिना ये सब व्यर्थ ही बीत जाती हैं।
जतन बहुतु मै करि रहिओ मिटिओ न मन को मानु ॥
दुरमति सिउ नानक फधिओ राखि लेहु भगवान ॥34॥
बाल जुआनी अरु बिरधि फुनि तीनि अवसथा जानि ॥
कहु नानक हरि भजन बिनु बिरथा सभ ही मानु ॥35॥
सलोक 36 · 37
एक कठोर पर सच्ची झलक, जो करना था वह किया नहीं, लोभ के फंदे में फँसे रहे, समय बीत गया, अब रोने से क्या? और एक यादगार उपमा, जो मन माया में रम गया वह उससे निकल नहीं पाता, जैसे दीवार पर बना चित्र दीवार को नहीं छोड़ता।
करणो हुतो सु ना कीओ परिओ लोभ कै फंध ॥
नानक समिओ रमि गइओ अब किउ रोवत अंध ॥36॥
मनु माइआ मै रमि रहिओ निकसत नाहिन मीत ॥
नानक मूरति चित्र जिउ छाडित नाहिन भीति ॥37॥
सलोक 38 · 39
मनुष्य चाहता कुछ है और रजा में कुछ और ही हो जाता है, औरों को ठगने की सोचता है पर अपने ही गले में फंदा पड़ जाता है। और फिर एक गहरी स्वीकृति, सुख के तो हम अनेक यतन करते हैं, दुख का एक भी नहीं, पर जो हरी को भाता है वही होता है।
नर चाहत कछु अउर अउरै की अउरै भई ॥
चितवत रहिओ ठगउर नानक फासी गलि परी ॥38॥
जतन बहुत सुख के कीए दुख को कीओ न कोइ ॥
कहु नानक सुनि रे मना हरि भावै सो होइ ॥39॥
सलोक 40 · 41
सारा जगत भिखारी बन कर भटकता है, यह भूल कर कि दाता तो एक राम ही है, उसी का सिमरन करो और सब काम पूरे होंगे। और फिर वही याद, झूठी दुनिया का मान क्यों, जगत को सपना समझो, इनमें से कुछ भी आपका नहीं, यह नानक खोल कर कह रहे हैं।
जगतु भिखारी फिरतु है सभ को दाता रामु ॥
कहु नानक मन सिमरु तिह पूरन होवहि काम ॥40॥
झूठै मानु कहा करै जगु सुपने जिउ जानु ॥
इन मै कछु तेरो नही नानक कहिओ बखानि ॥41॥
सलोक 42 · 43
जिस शरीर का इतना मान करते हैं वह पल भर में नाश हो जाता है, पर जिसने हरी का यश गाया उसने पूरे जगत को जीत लिया। और फिर वही निश्चय, जिसके हृदय में राम का सिमरन है उसे मुक्त जानो, और सच मानो कि उस मनुष्य और हरी में कोई फर्क नहीं।
गरबु करतु है देह को बिनसै छिन मै मीत ॥
जिहि प्रानी हरि जसु कहिओ नानक तिहि जगु जीति ॥42॥
जिह घटि सिमरनु राम को सो नरु मुकता जानु ॥
तिहि नर हरि अंतरु नही नानक साची मानु ॥43॥
सलोक 44 · 45
जिसके मन में भगवान की भगती नहीं, उसका शरीर सूअर या कुत्ते के शरीर जैसा ही समझो, गुरु की यह उपमा कठोर है पर जगाने वाली। और फिर उसी कुत्ते की उपमा को पलट कर एक सीख, जैसे कुत्ता मालिक का दरवाज़ा कभी नहीं छोड़ता, वैसे ही एक-मन एक-चित्त हो कर हरी को भजो।
एक भगति भगवान जिह प्रानी कै नाहि मनि ॥
जैसे सूकर सुआन नानक मानो ताहि तनु ॥44॥
सुआमी को ग्रिहु जिउ सदा सुआन तजत नही नित ॥
नानक इह बिधि हरि भजउ इक मनि हुइ इक चिति ॥45॥
सलोक 46 · 47
तीर्थ, व्रत, दान कर के मन में अहंकार भर ले, तो वह सब हाथी के स्नान जैसा व्यर्थ है (हाथी नहा कर फिर अपने ऊपर धूल डाल लेता है)। और फिर बुढ़ापे की एक मार्मिक तस्वीर, सिर काँपने लगा, पैर डगमगाने लगे, आँखों की ज्योति चली गई, फिर भी मनुष्य हरी-रस में मगन नहीं होता।
तीरथ बरत अरु दान करि मन मै धरै गुमानु ॥
नानक निहफल जात तिह जिउ कुंचर इसनानु ॥46॥
सिरु कंपिओ पग डगमगे नैन जोति ते हीन ॥
कहु नानक इह बिधि भई तऊ न हरि रसि लीन ॥47॥
सलोक 48 · 49
जगत को अपना समझ कर देखता रहा, पर यहाँ कोई किसी का सदा के लिए अपना नहीं, सदा रहने वाली तो हरी की भगती ही है, उसे मन में परो लो। और फिर एक यादगार पंक्ति, यह सारी जग-रचना झूठ है, मित्र जान लो, यह रेत की दीवार की तरह टिकती नहीं।
निज करि देखिओ जगतु मै को काहू को नाहि ॥
नानक थिरु हरि भगति है तिह राखो मन माहि ॥48॥
जग रचना सभ झूठ है जानि लेहु रे मीत ॥
कहि नानक थिरु ना रहै जिउ बालू की भीति ॥49॥
सलोक 50 · 51
राम चले गए, इतने बड़े परिवार वाला रावण भी चला गया, यहाँ कुछ भी स्थिर नहीं, संसार सपने जैसा है। और फिर एक गहरी बात, चिंता तो उसकी कीजिए जो कभी न होने वाली हो, पर संसार की चाल तो यही है कि यहाँ कोई भी सदा कायम रहने वाला नहीं।
रामु गइओ रावनु गइओ जा कउ बहु परवारु ॥
कहु नानक थिरु कछु नही सुपने जिउ संसारु ॥50॥
चिंता ता की कीजीऐ जो अनहोनी होइ ॥
इहु मारगु संसार को नानक थिरु नही कोइ ॥51॥
सलोक 52 · 53 · दोहरा
जो उपजा है वह नाश होगा, आज या कल सब को कूच करना है, इसलिए सारे जंजाल छोड़ कर हरी के गुण गा लो। और फिर एक दोहरा, जहाँ वाणी सीधी प्रार्थना बन जाती है, बल छूट गया, बंधन पड़ गए, कोई उपाय नहीं चलता, अब हे हरी आपका ही आसरा है, जैसे आपने गज को बचाया वैसे सहाई बनो।
जो उपजिओ सो बिनसि है परो आजु कै कालि ॥
नानक हरि गुन गाइ ले छाडि सगल जंजाल ॥52॥
दोहरा ॥
बलु छुटकिओ बंधन परे कछू न होत उपाइ ॥
कहु नानक अब ओट हरि गज जिउ होहु सहाइ ॥53॥
सलोक 54 · 55
और फिर वही प्रार्थना अपना उत्तर पा लेती है, बल आ गया, बंधन टूट गए, हर उपाय सफल हुआ, क्योंकि सब कुछ आपके हाथ में है और आप ही सहाई हो। फिर अकेलेपन की वह घड़ी, जब सारे संगी छोड़ जाते हैं और कोई साथ नहीं निभाता, उस विपत्ति में एक रघुनाथ का ही सहारा रह जाता है।
बलु होआ बंधन छुटे सभु किछु होत उपाइ ॥
नानक सभु किछु तुमरै हाथ मै तुम ही होत सहाइ ॥54॥
संग सखा सभि तजि गए कोऊ न निबहिओ साथि ॥
कहु नानक इह बिपति मै टेक एक रघुनाथ ॥55॥
समापन · सलोक 56 · 57
और पूरा संग्रह जिस बात की ओर बढ़ रहा था, वह अब खुल जाती है, अन्त समय जिसने गुरु का मंत्र अपने भीतर बसाया, उसके साथ नाम रहता है, साधु-संगति रहती है, गुरु-गोबिंद रहता है। और आख़िरी सलोक एक प्रार्थना पर ठहरता है, जिसने वह राम-नाम हृदय में पकड़ लिया जिसके बराबर कोई नहीं, जिसे सिमरते ही संकट मिटते हैं, उसे आपका दर्शन हो जाता है।
नामु रहिओ साधू रहिओ रहिओ गुरु गोबिंदु ॥
कहु नानक इह जगत मै किन जपिओ गुर मंतु ॥56॥
राम नामु उर मै गहिओ जा कै सम नही कोइ ॥
जिह सिमरत संकट मिटै दरसु तुहारो होइ ॥57॥1॥
पढ़ कर आगे क्या
इसी site पर: जपुजी साहिब, गुरु नानक की सुबह वाली प्रार्थना, ग्रंथ का पहला पन्ना। जपुजी यात्रा का दरवाज़ा है और सलोक महला 9 उसका समापन-स्वर, दोनों को साथ पढ़िए, तो पूरी परम्परा का आरंभ और अन्त एक धागे में बँध जाता है।
और एक छोटा सा अभ्यास जेब में रखिए। तेग बहादुर जी बार-बार एक ही बात कहते हैं, “जो साथ नहीं जाएगा, उसका मोह क्यों।” आज एक चीज़ देखिए जिसे आप अपना मान कर बहुत कस कर पकड़े हुए हैं, और एक पल के लिए हाथ ढीला कर के देखिए, कैसा लगता है।
साथ में पढ़ें · Companion Texts
- जपुजी साहिब M1 की रचना, ग्रंथ का आरंभ-द्वार।
- सुखमनी साहिब M5 की magnum opus, मन की शांति।
- अंग 1426 से 1429 मूल अंग-पाठ, हिन्दी अर्थ सहित।