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गीतासंकट के बीच संवाद

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 18: जीवन्मुक्ति

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पाठ्य-संगति

‘जीवन्मुक्ति’ अठारहवाँ-और-सबसे-बड़ा प्रकरण है, पूरे सौ श्लोकों का। जीवित-रहते-हुए मोक्ष की अवधारणा भारतीय-दर्शन का एक अपना योगदान है। ईसाई और इस्लामी-परम्पराओं में मुक्ति मृत्यु-के-बाद आती है। हिन्दू-बौद्ध-जैन-तीनों में जीवन्मुक्ति की स्थापना है।

आधुनिक-काल में आर. के. नारायण के उपन्यास ‘द गाइड’ (1958) में और सत्यजित राय की फ़िल्म ‘अपराजितो’ (1956) में जीवन्मुक्त-व्यक्तित्व-चित्रण देखा जा सकता है। ये दोनों कलाकार बौद्धिक-स्तर पर अष्टावक्र के दर्शन से परिचित थे।

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 18

जीवन्मुक्ति

Liberation in Life · 100 श्लोक

अष्टावक्र का सबसे लम्बा प्रकरण। सौ श्लोक, और हर श्लोक एक ही अद्वैत-ज्ञानी की दशा को किसी नए कोण से छूता है। यहाँ पूरी रचना का सार एक जगह बँध आया है। पढ़ते रहिए, बार-बार। बाद के एक जन्म में रमण महर्षि को यही प्रकरण सबसे प्रिय था।

अठारहवाँ प्रकरण “जीवन्मुक्ति” का वर्णन रखता है, यानी जीवित-रहते-मुक्ति। यह भाव अष्टावक्र-गीता और योग-वसिष्ठ में सबसे विस्तार से मिलता है। बाद की वेदान्त-परम्परा में जीवन्मुक्ति-विवेक (1450 के क़रीब विद्यारण्य-स्वामी द्वारा रचित) इसी सिद्धान्त पर सबसे विस्तृत ग्रंथ है।

अब तक

तत्त्व-स्वरूप के बाद, जीवन्मुक्ति। ज़िंदा रहते हुए मोक्ष।

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एक ही व्यक्ति के आठ चित्र: भोजन करते, राह चलते, किसी से बात करते, लिखते, ध्यान में बैठे, पौधों को पानी देते, आराम-कुर्सी पर सुस्ताते और सोते हुए

अष्टावक्र पहले प्रणाम करते हैं, और प्रणाम भी उस ओर जहाँ बोध जागते ही सारा भ्रम स्वप्न-सा बिखर जाता है। वही सुख-रूप, वही शान्त, वही तेज, शान्ति और तेज एक ही दशा के दो रूप। फिर वे एक टका-सी बात कहते हैं। सब कुछ कमा लीजिए, अनगिनत भोग बटोर लीजिए, फिर भी भीतर के सर्व-त्याग के बिना, उस “मेरा” के छूटे बिना, सुख नहीं उतरता। कर्तव्य का बोझ एक सूरज की तरह भीतर जलाता रहता है, और उस आग को बुझाने वाली प्रशम की अमृत-धारा के बिना अन्तरात्मा कैसे शीतल हो। यह संसार तो बस भावना-मात्र है, परमार्थ में कुछ भी नहीं।

श्लोक 1 से 4

यस्य बोधोदये तावत्स्वप्नवद् भवति भ्रमः।
तस्मै सुखैकरूपाय नमः शान्ताय तेजसे॥
अर्जयित्वाखिलानर्थान्भोगानाप्नोति पुष्कलान्।
न हि सर्वपरित्यागमन्तरेण भवेत्सुखी॥
कर्तव्यदुःखमार्तण्डज्वालादग्धान्तरात्मनः।
कुतः प्रशमपीयूषधारासारमृते सुखम्॥
भवोऽयं भावनामात्रो न किञ्चित्परमार्थतः।
नास्त्यभावः स्वभावानां भावाभावविभाविनाम्॥

अष्टावक्र अब उस मर्म पर आते हैं जो पूरे अद्वैत का बीज है। आत्मा का वह पद न कहीं दूर है, न किसी संकोच से दूर हुआ है, वह तो पहले से मिला ही हुआ है, निर्विकल्प, निर्आयास, निर्विकार, निरंजन। भ्रम भर हट जाए और स्वरूप स्वीकार हो जाए, तो मनुष्य शोक-रहित हो कर बिना किसी पर्दे की दृष्टि से दीप्त हो उठता है। और जब यह जान लिया कि सब कुछ कल्पना है और आत्मा तो सदा से मुक्त और सनातन है, तब धीर बालक की तरह कोई अभ्यास क्यों दोहराए। “आत्मा ब्रह्म है” यह निश्चय कर लेने पर, भाव और अभाव दोनों कल्पित ठहर जाते हैं, और निष्काम पुरुष के पास फिर न कुछ जानना बचता है, न बोलना, न करना।

श्लोक 5 से 8

न दूरं न च सङ्कोचाल्लब्धमेवात्मनः पदम्।
निर्विकल्पं निरायासं निर्विकारं निरञ्जनम्॥
व्यामोहमात्रविरतौ स्वरूपादानमात्रतः।
वीतशोका विराजन्ते निरावरणदृष्टयः॥
समस्तं कल्पनामात्रमात्मा मुक्तः सनातनः।
इति विज्ञाय धीरो हि किमभ्यस्यति बालवत्॥
आत्मा ब्रह्मेति निश्चित्य भावाभावौ च कल्पितौ।
निष्कामः किं विजानाति किं ब्रूते च करोति किम्॥

जो योगी “सब आत्मा है” यह निश्चय कर के मौन हो गया, उसकी “यह मैं हूँ, यह मैं नहीं” वाली सारी विकल्पना क्षीण हो जाती है। उपशान्त की दशा में न विक्षेप रहता है न एकाग्रता, न अति-बोध न मूढता, न सुख न दुःख, हर जोड़ी गिर जाती है, और यह कोई सधा-सा सन्तुलन नहीं, इन सबके पार की दशा है। राज-सिंहासन हो या भीख का कटोरा, लाभ हो या हानि, भीड़ हो या जंगल, निर्विकल्प स्वभाव वाले योगी को कहीं कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। और जो “यह किया, यह नहीं किया” के द्वन्द्वों से मुक्त है, उसके लिए धर्म कहाँ, अर्थ कहाँ, काम कहाँ, और विवेक तक कहाँ।

श्लोक 9 से 12

अयं सोऽहमयं नाहमिति क्षीणा विकल्पना।
सर्वमात्मेति निश्चित्य तूष्णीम्भूतस्य योगिनः॥
न विक्षेपो न चैकाग्र्यं नातिबोधो न मूढता।
न सुखं न च वा दुःखमुपशान्तस्य योगिनः॥
स्वाराज्ये भैक्ष्यवृत्तौ च लाभालाभे जने वने।
निर्विकल्पस्वभावस्य न विशेषोऽस्ति योगिनः॥
क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेकिता।
इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तस्य योगिनः॥

यहीं पहली बार वह शब्द आता है जो इस प्रकरण का प्राण है, जीवन्मुक्त, जीते-जी मुक्त। ऐसे योगी के लिए न कोई करने योग्य काम बचता है, न हृदय में किसी चीज़ का राग, बस जो जीवन चल रहा है वही उसका सहज ढंग है। सब संकल्पों की सीमा पर विश्रान्त उस महात्मा के लिए मोह कहाँ, विश्व कहाँ, ध्यान कहाँ, और मुक्ति तक कहाँ। जिसने विश्व को देखा है वही उसे “यह है ही नहीं” कह कर त्याग सकता है, पर जिसमें वासना ही नहीं बची, वह तो देखते हुए भी नहीं देखता। और जिसने परम ब्रह्म को देख लिया वही “मैं ब्रह्म हूँ” सोच सकता है, पर जो दूसरा कुछ देखता ही नहीं, वह निश्चिन्त किसका चिन्तन करे।

श्लोक 13 से 16

कृत्यं किमपि नैवास्ति न कापि हृदि रञ्जना।
यथा जीवनमेवेह जीवन्मुक्तस्य योगिनः॥
क्व मोहः क्व च वा विश्वं क्व तद्ध्यानं क्व मुक्तता।
सर्वसङ्कल्पसीमायां विश्रान्तस्य महात्मनः॥
येन विश्वमिदं दृष्टं स नास्तीति करोतु वै।
निर्वासनः किं कुरुते पश्यन्नपि न पश्यति॥
येन दृष्टं परं ब्रह्म सोऽहं ब्रह्मेति चिन्तयेत्।
किं चिन्तयति निश्चिन्तो द्वितीयं यो न पश्यति॥

जिसने भीतर अपने ही विक्षेप को देखा, वही उसे रोकने का यत्न करता है, पर उदार पुरुष विक्षिप्त ही नहीं होता, तो जब पाने को कुछ शेष ही नहीं तो वह रोके भी क्या। धीर भीतर से सारे लोक के विपरीत है, फिर भी बाहर लोक की ही तरह बरतता है, और अपने में न कोई समाधि देखता है, न विक्षेप, न कोई लेप। भाव-अभाव से रहित, तृप्त, वासना-शून्य वह ज्ञानी लोक की आँखों में करता हुआ भी कुछ नहीं करता। प्रवृत्ति में रहे या निवृत्ति में, धीर को कोई पकड़ नहीं बाँधती, जब जो सामने आ पड़े वही कर के वह सुख से ठहर जाता है।

श्लोक 17 से 20

दृष्टो येनात्मविक्षेपो निरोधं कुरुते त्वसौ।
उदारस्तु न विक्षिप्तः साध्याभावात्करोति किम्॥
धीरो लोकविपर्यस्तो वर्तमानोऽपि लोकवत्।
न समाधिं न विक्षेपं न लेपं स्वस्य पश्यति॥
भावाभावविहीनो यस्तृप्तो निर्वासनो बुधः।
नैव किञ्चित्कृतं तेन लोकदृष्ट्या विकुर्वता॥
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा नैव धीरस्य दुर्ग्रहः।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वा तिष्ठते सुखम्॥

वासना से मुक्त, किसी सहारे से रहित, स्वच्छन्द और बन्धन-मुक्त यह पुरुष संस्कारों की हवा में सूखे पत्ते की तरह उड़ता है, हवा जिधर ले जाए उधर बह जाता है, कहीं कोई प्रतिरोध नहीं। संसार जिसके लिए रहा ही नहीं, उसे कहीं हर्ष नहीं, कहीं विषाद नहीं, वह नित्य शीतल-मन हो कर मानो देह के बिना ही दीप्त रहता है। न कहीं कुछ छोड़ने की चाह, न कहीं नाश का डर, आत्मा में ही रमता वह धीर भीतर से और भी शीतल, और भी निर्मल होता जाता है। स्वभाव से ही जिसका चित्त शून्य है और जो एक साधारण मनुष्य की तरह अनायास काम किए जाता है, उसे न मान छूता है न अपमान।

श्लोक 21 से 24

निर्वासनो निरालम्बः स्वच्छन्दो मुक्तबन्धनः।
क्षिप्तः संस्कारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत्॥
असंसारस्य तु क्वापि न हर्षो न विषादिता।
स शीतलमना नित्यं विदेह इव राजते॥
कुत्रापि न जिहासास्ति नाशो वापि न कुत्रचित्।
आत्मारामस्य धीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः॥
प्रकृत्या शून्यचित्तस्य कुर्वतोऽस्य यदृच्छया।
प्राकृतस्येव धीरस्य न मानो नावमानता॥

“यह कर्म तो देह से हुआ, मुझ शुद्ध-स्वरूप से नहीं”, इस भाव में बसा हुआ जो रहता है, वह करता हुआ भी नहीं करता। ऊपर से वह ऐसे बरतता है मानो कुछ मानता ही न हो, फिर भी मूर्ख नहीं, यही जीवन्मुक्त है, सुखी, श्रीमान्, संसार में रहते हुए भी शोभित। अनेक विचारों से थका हुआ धीर अब विश्राम में आ बैठा है, अब न वह कल्पना करता है, न जानता है, न सुनता है, न देखता है। समाधि और विक्षेप, दोनों से रहित होने के कारण वह न मुमुक्षु रहा न उसका उलटा, कल्पित को कल्पित जान कर वह महाशय बस ब्रह्म ही हो कर रहता है।

श्लोक 25 से 28

कृतं देहेन कर्मेदं न मया शुद्धरूपिणा।
इति चिन्तानुरोधी यः कुर्वन्नपि करोति न॥
अतद्वादीव कुरुते न भवेदपि बालिशः।
जीवन्मुक्तः सुखी श्रीमान् संसरन्नपि शोभते॥
नानाविचारसुश्रान्तो धीरो विश्रान्तिमागतः।
न कल्पते न जानाति न शृणोति न पश्यति॥
असमाधेरविक्षेपान्न मुमुक्षुर्न चेतरः।
निश्चित्य कल्पितं पश्यन्ब्रह्मैवास्ते महाशयः॥

जिसके भीतर अहंकार बैठा है, वह न करते हुए भी करने वाला बन जाता है, पर अहंकार-रहित धीर के लिए न कुछ किया हुआ है, न अनकिया। मुक्त का चित्त ऐसा होता है, न उद्विग्न, न सन्तुष्ट, अकर्ता, स्पन्द से रहित, आशा-रहित और सन्देह-रहित। उसका चित्त न तो ध्यान में लगने को उठता है, न किसी चेष्टा में, फिर भी बिना किसी निमित्त के वही चित्त ध्यान भी करता है और चेष्टा भी। उधर मन्द-बुद्धि का हाल उलटा है, तत्त्व को यथार्थ रूप में सुन कर वह और भी मूढ़ता में डूब जाता है या संकोच में सिमट जाता है, और कोई बिरला अमूढ़ ही ऊपर से मूढ़-सा दिखता है।

श्लोक 29 से 32

यस्यान्तः स्यादहंकारो न करोति करोति सः।
निरहंकारधीरेण न किञ्चिदकृतं कृतम्॥
नोद्विग्नं न च सन्तुष्टमकर्तृ स्पन्दवर्जितम्।
निराशं गतसन्देहं चित्तं मुक्तस्य राजते॥
निर्ध्यातुं चेष्टितुं वापि यच्चित्तं न प्रवर्तते।
निर्निमित्तमिदं किन्तु निर्ध्यायेति विचेष्टते॥
तत्त्वं यथार्थमाकर्ण्य मन्दः प्राप्नोति मूढताम्।
अथवा याति सङ्कोचममूढः कोऽपि मूढवत्॥

मूढ़ लोग एकाग्रता और निरोध का बहुत-बहुत अभ्यास करते रहते हैं, पर धीर तो अपने ही पद में सोते-से स्थित रहते हैं, उन्हें कोई कर्तव्य दिखता ही नहीं। यत्न से हो या बिना यत्न के, मूढ़ शान्ति नहीं पाता, जबकि प्राज्ञ केवल तत्त्व के निश्चय-मात्र से शान्त हो जाता है। शुद्ध, बुद्ध, प्रिय, पूर्ण, प्रपंच से परे और निरामय उस आत्मा को, अभ्यास में ही उलझे रहने वाले लोग जान ही नहीं पाते। विमूढ़ कर्म से, अभ्यास के सहारे मोक्ष नहीं पाता, जबकि धन्य पुरुष केवल विज्ञान-मात्र से मुक्त हो कर अविकार स्थित रहता है।

श्लोक 33 से 36

एकाग्रता निरोधो वा मूढैरभ्यस्यते भृशम्।
धीराः कृत्यं न पश्यन्ति सुप्तवत्स्वपदे स्थिताः॥
अप्रयत्नात्प्रयत्नाद्वा मूढो नाप्नोति निर्वृतिम्।
तत्त्वनिश्चयमात्रेण प्राज्ञो भवति निर्वृतः॥
शुद्धं बुद्धं प्रियं पूर्णं निष्प्रपञ्चं निरामयम्।
आत्मानं तं न जानन्ति तत्राभ्यासपरा जनाः॥
नाप्नोति कर्मणा मोक्षं विमूढोऽभ्यासरूपिणा।
धन्यो विज्ञानमात्रेण मुक्तस्तिष्ठत्यविक्रियः॥

मूढ़ इसलिए ब्रह्म नहीं पाता क्योंकि उसे कुछ “बनने” की चाह है, जबकि धीर न चाहते हुए भी परब्रह्म-स्वरूप का भागी हो जाता है। आधार-हीन, पकड़ में उलझे हुए मूढ़ ही संसार को पालते-पोसते रहते हैं, और बुधजन इसी अनर्थ की जड़ को ही काट डालते हैं। मूढ़ इसलिए शान्ति नहीं पाता क्योंकि वह शान्त होने का यत्न करता है, जबकि धीर तत्त्व को निश्चित कर के सदा शान्त-मन रहता है। आत्मा का दर्शन उसका कहाँ जो किसी देखी हुई वस्तु का सहारा पकड़ता है, धीर तो उन भिन्न-भिन्न वस्तुओं को नहीं, उस अव्यय आत्मा को ही देखते हैं।

श्लोक 37 से 40

मूढो नाप्नोति तद्ब्रह्म यतो भवितुमिच्छति।
अनिच्छन्नपि धीरो हि परब्रह्मस्वरूपभाक्॥
निराधारा ग्रहव्यग्रा मूढाः संसारपोषकाः।
एतस्यानर्थमूलस्य मूलच्छेदः कृतो बुधैः॥
न शान्तिं लभते मूढो यतः शमितुमिच्छति।
धीरस्तत्त्वं विनिश्चित्य सर्वदा शान्तमानसः॥
क्वात्मनो दर्शनं तस्य यद्दृष्टमवलम्बते।
धीरास्तं तं न पश्यन्ति पश्यन्त्यात्मानमव्ययम्॥

जो विमूढ़ निरोध के लिए हठ करता है, उसके लिए निरोध कहाँ; अपने में ही रमने वाले धीर का निरोध तो सदा सहज है, बना-बनाया नहीं। कोई भाव का चिन्तन करता है, कोई “कुछ नहीं है” का, और कोई दोनों के अभाव का, पर इन सबसे परे जो रहा वही सच में निराकुल है। शुद्ध-अद्वय आत्मा की भावना तो कुबुद्धि भी करते हैं, पर मोह में फँसे रहने से जान नहीं पाते और जीवन भर अशान्त ही रहते हैं। मुमुक्षु की बुद्धि किसी न किसी सहारे के बिना टिकती ही नहीं, जबकि मुक्त की बुद्धि सदा निरालम्ब और निष्काम रहती है।

श्लोक 41 से 44

क्व निरोधो विमूढस्य यो निर्बन्धं करोति वै।
स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदासावकृत्रिमः॥
भावस्य भावकः कश्चिन्न किञ्चिद्भावकोऽपरः।
उभयाभावकः कश्चिदेवमेव निराकुलः॥
शुद्धमद्वयमात्मानं भावयन्ति कुबुद्धयः।
न तु जानन्ति सम्मोहाद्यावज्जीवमनिर्वृताः॥
मुमुक्षोर्बुद्धिरालम्बमन्तरेण न विद्यते।
निरालम्बैव निष्कामा बुद्धिर्मुक्तस्य सर्वदा॥

अष्टावक्र अब दो चित्र खींचते हैं। एक ओर विषय रूपी बाघों को देख कर डरे हुए लोग शरण की तलाश में झट से गुफा में जा घुसते हैं, निरोध और एकाग्रता सिद्ध करने को। दूसरी ओर वासना-रहित सिंह को देख कर विषय रूपी हाथी चुपचाप भाग जाते हैं, और जो भाग नहीं पाते, वे चाटुकारी कर के उसी की सेवा में लग जाते हैं। निःशंक और स्थिर-मन वाला तो मुक्ति का शास्त्र भी हाथ में नहीं थामता, वह देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, सब करता हुआ बस सुख से रहता है। तत्त्व को सुन लेने भर से जिसकी बुद्धि शुद्ध और निराकुल हो गई, वह न आचार देखता है, न अनाचार, न उदासीनता।

श्लोक 45 से 48

विषयद्वीपिनो वीक्ष्य चकिताः शरणार्थिनः।
विशन्ति झटिति क्रोडं निरोधैकाग्रसिद्धये॥
निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा तूष्णीं विषयदन्तिनः।
पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः॥
न मुक्तिकारिकां धत्ते निःशङ्को युक्तमानसः।
पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्न् अश्नन्नास्ते यथासुखम्॥
वस्तुश्रवणमात्रेण शुद्धबुद्धिर्निराकुलः।
नैवाचारमनाचारमौदास्यं वा प्रपश्यति॥

जब जो करने को सामने आ जाए, सरल चित्त वह वही कर लेता है, शुभ हो या अशुभ, उसकी चेष्टा बच्चे की चेष्टा जैसी सहज होती है। और फिर वह स्वातन्त्र्य की एक घोषणा करते हैं, स्वातन्त्र्य से सुख मिलता है, स्वातन्त्र्य से परम, स्वातन्त्र्य से शान्ति, स्वातन्त्र्य से ही परम पद। जब आत्मा अपने अकर्तृत्व और अभोक्तृत्व को मान लेती है, तभी चित्त की सारी वृत्तियाँ क्षीण हो जाती हैं। धीर की दशा भले उच्छृंखल और बिना सजावट की लगे, फिर भी वह दीप्त रहती है, जबकि चाह-भरे चित्त वाले मूढ़ की शान्ति बनावटी और झूठी होती है।

श्लोक 49 से 52

यदा यत्कर्तुमायाति तदा तत्कुरुते ऋजुः।
शुभं वाप्यशुभं वापि तस्य चेष्टा हि बालवत्॥
स्वातन्त्र्यात्सुखमाप्नोति स्वातन्त्र्याल्लभते परम्।
स्वातन्त्र्यान्निर्वृतिं गच्छेत्स्वातन्त्र्यात्परमं पदम्॥
अकर्तृत्वमभोक्तृत्वं स्वात्मनो मन्यते यदा।
तदा क्षीणा भवन्त्येव समस्ताश्चित्तवृत्तयः॥
उच्छृङ्खलाप्यकृतिका स्थितिर्धीरस्य राजते।
न तु सस्पृहचित्तस्य शान्तिर्मूढस्य कृत्रिमा॥

कल्पना से रहित, अबद्ध और मुक्त-बुद्धि वाले धीर कभी महान् भोगों में विलास करते दिखते हैं, कभी पहाड़ की गुफाओं में बैठे, दोनों जगह वे समान हैं। वेदज्ञ हो, देवता हो, तीर्थ हो, स्त्री हो, राजा हो या कोई प्रिय, इन सबको देख कर और पूज कर भी धीर के हृदय में कोई वासना नहीं उठती। सेवक, पुत्र, पत्नी, दौहित्र, गोत्र के लोग, चाहे हँसी उड़ाएँ या तिरस्कार करें, योगी ज़रा भी विकृत नहीं होता। वह सन्तुष्ट दिख कर भी सन्तुष्ट नहीं, खिन्न दिख कर भी खिन्न नहीं, उसकी ये विचित्र दशाएँ बस वैसे ही पुरुष समझ पाते हैं।

श्लोक 53 से 56

विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरिगह्वरान्।
निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः॥
श्रोत्रियं देवतां तीर्थमङ्गनां भूपतिं प्रियम्।
दृष्ट्वा सम्पूज्य धीरस्य न कापि हृदि वासना॥
भृत्यैः पुत्रैः कलत्रैश्च दौहित्रैश्चापि गोत्रजैः।
विहस्य धिक्कृतो योगी न याति विकृतिं मनाक्॥
सन्तुष्टोऽपि न सन्तुष्टः खिन्नोऽपि न च खिद्यते।
तस्याश्चर्यदशां तां तां तादृशा एव जानते॥

कर्तव्य का यह भाव ही असल में संसार है, और ज्ञानीजन इसी कर्तव्यता को नहीं देखते, वे तो शून्य-आकार, निराकार, निर्विकार और निरामय हो जाते हैं। मूढ़-बुद्धि कुछ न करते हुए भी भीतर के क्षोभ से हर जगह व्यग्र रहता है, जबकि कुशल पुरुष काम करते हुए भी निराकुल बना रहता है। ऐसा शान्त-बुद्धि व्यवहार में भी सुख से बैठता है, सुख से सोता है, सुख से आता-जाता है, सुख से बोलता और खाता है। स्वभाव से ही जिसे पीड़ा नहीं छूती, लोक की तरह बरतते हुए भी, वह किसी बड़े झील की तरह अक्षुब्ध और क्लेश-रहित रह कर दीप्त होता है।

श्लोक 57 से 60

कर्तव्यतैव संसारो न तां पश्यन्ति सूरयः।
शून्याकारा निराकारा निर्विकारा निरामयाः॥
अकुर्वन्नपि सङ्क्षोभाद्व्यग्रः सर्वत्र मूढधीः।
कुर्वन्नपि तु कृत्यानि कुशलो हि निराकुलः॥
सुखमास्ते सुखं शेते सुखमायाति याति च।
सुखं वक्ति सुखं भुंक्ते व्यवहारेऽपि शान्तधीः॥
स्वभावाद्यस्य नैवार्तिर्लोकवद्व्यवहारिणः।
महाह्रद इवाक्षोभ्यो गतक्लेशः स शोभते॥

मूढ़ की निवृत्ति भी भीतर एक नई प्रवृत्ति बन जाती है, जबकि धीर की प्रवृत्ति तक निवृत्ति का फल देती है। मूढ़ का वैराग्य प्रायः बाहरी परिग्रहों के प्रति दिखता है, पर जिसकी देह से ही आशा गल गई, उसके लिए राग कहाँ और विराग कहाँ। मूढ़ की दृष्टि सदा भावना और अभावना में आसक्त रहती है, जबकि स्वस्थ की दृष्टि भाव्य और भावना दोनों से रहित, मानो अदृष्टि-स्वरूप हो जाती है। सब आरम्भों में निष्काम, बालक की तरह विचरने वाले मुनि को कर्म होते हुए भी कोई लेप नहीं लगता।

श्लोक 61 से 64

निवृत्तिरपि मूढस्य प्रवृत्तिरुपजायते।
प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्तिफलभागिनी॥
परिग्रहेषु वैराग्यं प्रायो मूढस्य दृश्यते।
देहे विगलिताशस्य क्व रागः क्व विरागता॥
भावनाभावनासक्ता दृष्टिर्मूढस्य सर्वदा।
भाव्यभावनया सा तु स्वस्थस्यादृष्टिरूपिणी॥
सर्वारम्भेषु निष्कामो यश्चरेद्बालवन्मुनिः।
न लेपस्तस्य शुद्धस्य क्रियमाणेऽपि कर्मणि॥

वही धन्य आत्म-ज्ञानी है जो सब भावों में सम रहता है, देखते, सुनते, छूते, सूँघते, खाते हुए भी जिसका मन तृष्णा से रहित रहता है। उसके लिए संसार कहाँ, आभास कहाँ, साध्य कहाँ और साधन कहाँ, वह तो आकाश की तरह सदा निर्विकल्प रहता है। ऐसा अर्थ का सन्न्यासी, अपने पूर्ण रस-रूप में स्थित, बना-बनाया नहीं बल्कि अविच्छिन्न समाधि में डूबा हुआ पुरुष ही सच्ची जय पाता है। बहुत कहने से क्या, तत्त्व को जान चुका वह महाशय भोग और मोक्ष दोनों की चाह से परे हो कर, हर जगह सदा नीरस रहता है।

श्लोक 65 से 68

स एव धन्य आत्मज्ञः सर्वभावेषु यः समः।
पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्न् अश्नन्निस्तर्षमानसः॥
क्व संसारः क्व चाभासः क्व साध्यं क्व च साधनम्।
आकाशस्येव धीरस्य निर्विकल्पस्य सर्वदा॥
स जयत्यर्थसन्न्यासी पूर्णस्वरसविग्रहः।
अकृत्रिमोऽनवच्छिन्ने समाधिर्यस्य वर्तते॥
बहुनात्र किमुक्तेन ज्ञाततत्त्वो महाशयः।
भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी सदा सर्वत्र नीरसः॥

महत्तत्त्व से ले कर सारा यह द्वैत-जगत बस नाम-मात्र से फैला हुआ है, उसे छोड़ देने के बाद शुद्ध-बोध के लिए कोई कर्तव्य बाक़ी ही नहीं रहता। जिसे यह निश्चय हो गया है कि यह सब भ्रम ही है और कुछ भी नहीं है, वह शुद्ध पुरुष, जिसकी भीतरी आभा किसी को दिखती नहीं, अपने स्वभाव से ही शान्त हो जाता है। जो शुद्ध प्रकाश-रूप है और दृश्य को सत्ता वाला नहीं देखता, उसके लिए विधि कहाँ, वैराग्य कहाँ, त्याग कहाँ और शम भी कहाँ। और जो अनन्त रूप में दीप्त है और प्रकृति को अलग नहीं देखता, उसके लिए बन्धन कहाँ, मोक्ष कहाँ, हर्ष कहाँ और विषाद कहाँ।

श्लोक 69 से 72

महदादि जगद्द्वैतं नाममात्रविजृम्भितम्।
विहाय शुद्धबोधस्य किं कृत्यमवशिष्यते॥
भ्रमभूतमिदं सर्वं किञ्चिन्नास्तीति निश्चयी।
अलक्ष्यस्फुरणः शुद्धः स्वभावेनैव शाम्यति॥
शुद्धस्फुरणरूपस्य दृश्यभावमपश्यतः।
क्व विधिः क्व च वैराग्यं क्व त्यागः क्व शमोऽपि वा॥
स्फुरतोऽनन्तरूपेण प्रकृतिं च न पश्यतः।
क्व बन्धः क्व च वा मोक्षः क्व हर्षः क्व विषादिता॥

जब तक बुद्धि है, तब तक यह संसार है, और उसमें माया-मात्र ही खेलती है; ममता, अहंकार और कामना से रहित ज्ञानी उसमें शोभा पाता है। जो मुनि आत्मा को अक्षय और सन्ताप-रहित देखता है, उसके लिए विद्या कहाँ, विश्व कहाँ, देह कहाँ, और “मैं” और “मेरा” भी कहाँ। पर जड़-बुद्धि मनुष्य यदि निरोध जैसे अभ्यास छोड़ दे, तो उसी क्षण वह मनोरथों और व्यर्थ प्रलाप में जा पड़ता है। मन्द-बुद्धि उस तत्त्व को सुन कर भी अपनी मूढ़ता नहीं छोड़ता; बाहर से यत्न कर के वह निर्विकल्प दिखता है, पर भीतर विषयों की लालसा बनी रहती है।

श्लोक 73 से 76

बुद्धिपर्यन्तसंसारे मायामात्रं विवर्तते।
निर्ममो निरहङ्कारो निष्कामः शोभते बुधः॥
अक्षयं गतसन्तापमात्मानं पश्यतो मुनेः।
क्व विद्या च क्व वा विश्वं क्व देहोऽहं ममेति वा॥
निरोधादीनि कर्माणि जहाति जडधीर्यदि।
मनोरथान् प्रलापांश्च कर्तुमाप्नोत्यतत्क्षणात्॥
मन्दः श्रुत्वापि तद्वस्तु न जहाति विमूढताम्।
निर्विकल्पो बहिर्यत्नादन्तर्विषयलालसः॥

ज्ञान से जिसके कर्म गल चुके हैं, वह लोगों की दृष्टि में कर्म करता दिखे तब भी, उसे अपनी ओर से कुछ करने या कहने का अवसर ही नहीं मिलता। जो धीर निर्विकार है और सदा निर्भय, उसके लिए अँधेरा कहाँ, उजाला कहाँ, हानि कहाँ; कुछ भी नहीं। जिस योगी का स्वभाव कहा नहीं जा सकता और जिसका अपना कोई अलग स्वभाव ही नहीं, उसके लिए धैर्य कहाँ, विवेक कहाँ, और निर्भयता भी कहाँ। न स्वर्ग है, न नरक, न जीवन्मुक्ति ही; बहुत कहने से क्या, योग की दृष्टि में कुछ भी नहीं है।

श्लोक 77 से 80

ज्ञानाद् गलितकर्मा यो लोकदृष्ट्यापि कर्मकृत्।
नाप्नोत्यवसरं कर्तुं वक्तुमेव न किञ्चन॥
क्व तमः क्व प्रकाशो वा हानं क्व च न किञ्चन।
निर्विकारस्य धीरस्य निरातङ्कस्य सर्वदा॥
क्व धैर्यं क्व विवेकित्वं क्व निरातङ्कतापि वा।
अनिर्वाच्यस्वभावस्य निःस्वभावस्य योगिनः॥
न स्वर्गो नैव नरको जीवन्मुक्तिर्न चैव हि।
बहुनात्र किमुक्तेन योगदृष्ट्या न किञ्चन॥

धीर न लाभ की प्रार्थना करता है, न लाभ न होने पर शोक करता है; उसका शीतल चित्त मानो अमृत से भरा रहता है। निष्काम पुरुष न शान्त की स्तुति करता है, न दुष्ट की निन्दा; दुःख और सुख में सम और तृप्त, वह करने योग्य कुछ भी नहीं देखता। धीर न संसार से द्वेष करता है, न आत्मा को देखने की इच्छा रखता है; हर्ष और क्रोध से छूटा हुआ वह न मरा है, न जीता है। पुत्र, पत्नी आदि में स्नेह-रहित, विषयों में निष्काम, अपने शरीर तक की चिन्ता से मुक्त और आशा-रहित ज्ञानी शोभा पाता है।

श्लोक 81 से 84

नैव प्रार्थयते लाभं नालाभेनानुशोचति।
धीरस्य शीतलं चित्तममृतेनैव पूरितम्॥
न शान्तं स्तौति निष्कामो न दुष्टमपि निन्दति।
समदुःखसुखस्तृप्तः किञ्चित् कृत्यं न पश्यति॥
धीरो न द्वेष्टि संसारमात्मानं न दिदृक्षति।
हर्षामर्षविनिर्मुक्तो न मृतो न च जीवति॥
निःस्नेहः पुत्रदारादौ निष्कामो विषयेषु च।
निश्चिन्तः स्वशरीरेऽपि निराशः शोभते बुधः॥

जो कुछ आ पड़े उसी पर जीने वाला, देश-देश में स्वच्छन्द विचरने वाला और जहाँ सूरज डूबे वहीं सो जाने वाला धीर हर जगह सन्तुष्ट रहता है। देह गिरे या उठे, उस महात्मा को इसकी कोई चिन्ता नहीं; वह अपने स्वभाव की भूमि पर विश्राम करता है और सारा संसार-चक्र भूल चुका है। अकिंचन, अपनी इच्छा से विचरने वाला, द्वन्द्वों से परे, जिसके संशय कट चुके और जो किसी भाव में आसक्त नहीं, ऐसा ज्ञानी अकेला ही रमता है। ममता-रहित धीर शोभा पाता है; उसके लिए ढेला, पत्थर और सोना एक समान हैं, उसके हृदय की गाँठ कट चुकी है और रज और तम झड़ चुके हैं।

श्लोक 85 से 88

तुष्टिः सर्वत्र धीरस्य यथापतितवर्तिनः।
स्वच्छन्दं चरतो देशान् यत्रस्तमितशायिनः॥
पततूदेतु वा देहो नास्य चिन्ता महात्मनः।
स्वभावभूमिविश्रान्तिविस्मृताशेषसंसृतेः॥
अकिञ्चनः कामचारो निर्द्वन्द्वश्छिन्नसंशयः।
असक्तः सर्वभावेषु केवलो रमते बुधः॥
निर्ममः शोभते धीरः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
सुभिन्नहृदयग्रन्थिर्विनिर्धूतरजस्तमः॥

जो किसी चीज़ की परवाह ही नहीं करता, जिसके हृदय में ज़रा-सी भी वासना नहीं, उस पूर्ण तृप्त मुक्तात्मा की तुलना किससे की जाए। जानते हुए भी न जानना, देखते हुए भी न देखना, बोलते हुए भी न बोलना, यह वासना-रहित के सिवा और किसके बस का है। भिखारी हो या राजा, वही शोभा पाता है जो निष्काम है और जिसकी बुद्धि में चीज़ों के प्रति “अच्छा” और “बुरा” का भाव गल चुका है। जिस योगी का प्रयोजन पूरा हो चुका है और जो निश्छल सरलता ही बन गया है, उसके लिए स्वच्छन्दता कहाँ, संकोच कहाँ, और तत्त्व का निश्चय भी कहाँ।

श्लोक 89 से 92

सर्वत्रानवधानस्य न किञ्चिद् वासना हृदि।
मुक्तात्मनो वितृप्तस्य तुलना केन जायते॥
जानन्नपि न जानाति पश्यन्नपि न पश्यति।
ब्रुवन्नपि न च ब्रूते कोऽन्यो निर्वासनादृते॥
भिक्षुर्वा भूपतिर्वापि यो निष्कामः स शोभते।
भावेषु गलिता यस्य शोभनाशोभना मतिः॥
क्व स्वाच्छन्द्यं क्व सङ्कोचः क्व वा तत्त्वविनिश्चयः।
निर्व्याजार्जवभूतस्य चरितार्थस्य योगिनः॥

जो आत्म-विश्राम से तृप्त है, आशा-रहित है और जिसकी पीड़ा जा चुकी है, वह भीतर जो अनुभव करता है, उसे कैसे और किससे कहा जाए। धीर सोते हुए भी गहरी नींद में नहीं, सपने में भी सपना देखता नहीं, जागते हुए भी जागता नहीं; वह पग-पग पर तृप्त है। ज्ञानी सोचते हुए भी विचार-रहित है, इन्द्रियों के साथ भी इन्द्रिय-रहित, बुद्धिमान हो कर भी बुद्धि-रहित, और अहंकार के साथ भी अहंकार-रहित। वह न सुखी है न दुःखी, न विरक्त न आसक्त, न मुमुक्षु न मुक्त; वह न कुछ है, न कुछ नहीं।

श्लोक 93 से 96

आत्मविश्रान्तितृप्तेन निराशेन गतार्तिना।
अन्तर्यदनुभूयेत तत् कथं कस्य कथ्यते॥
सुप्तोऽपि न सुषुप्तौ च स्वप्नेऽपि शयितो न च।
जागरेऽपि न जागर्ति धीरस्तृप्तः पदे पदे॥
ज्ञः सचिन्तोऽपि निश्चिन्तः सेन्द्रियोऽपि निरिन्द्रियः।
सुबुद्धिरपि निर्बुद्धिः साहङ्कारोऽनहङ्कृतिः॥
न सुखी न च वा दुःखी न विरक्तो न सङ्गवान्।
न मुमुक्षुर्न वा मुक्तो न किञ्चिन्न च किञ्चन॥

वह धन्य पुरुष विक्षेप में भी विक्षिप्त नहीं, समाधि में भी समाधि वाला नहीं, जड़ता में भी जड़ नहीं, और पाण्डित्य में भी पण्डित नहीं। मुक्त पुरुष जैसी भी स्थिति हो उसमें स्वस्थ रहता है, जो करना था उसके हो चुकने से सन्तुष्ट, और तृष्णा न रहने से सब जगह सम; उसे याद नहीं रहता कि उसने क्या किया और क्या नहीं किया। वन्दना होने पर वह प्रसन्न नहीं होता, निन्दा होने पर कुपित नहीं होता; न मृत्यु से घबराता है, न जीवन पर हर्षित होता है। शान्त-बुद्धि पुरुष न भीड़ की ओर दौड़ता है, न जंगल की ओर; जैसे भी हो, जहाँ भी हो, वह सम ही रहता है। इसी समता पर यह सबसे लम्बा प्रकरण विश्राम पा लेता है।

श्लोक 97 से 100

विक्षेपेऽपि न विक्षिप्तः समाधौ न समाधिमान्।
जाड्येऽपि न जडो धन्यः पाण्डित्येऽपि न पण्डितः॥
मुक्तो यथास्थितिस्वस्थः कृतकर्तव्यनिर्वृतः।
समः सर्वत्र वैतृष्ण्यान्न स्मरत्यकृतं कृतम्॥
न प्रीयते वन्द्यमानो निन्द्यमानो न कुप्यति।
नैवोद्विजति मरणे जीवने नाभिनन्दति॥
न धावति जनाकीर्णं नारण्यमुपशान्तधीः।
यथातथा यत्रतत्र सम एवावतिष्ठते॥
॥ जीवन्मुक्ति ॥